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सहर-अदनान-एजाज… बकरीद पर क्यों चला रहे ‘रोने’ का अभियान? समझिए क्या है मुस्लिम इन्फ्लुएंसर्स का ‘मकसद’

बकरीद पर बकरा काटने वाले इस्लामी कट्टरपंथी ने नया चलन शुरू किया है। यह चलन है, रोना-पीटना करने का। ये लोग अब विक्टिम कार्ड खेल रहे हैं। बकरीद पर इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर ऐसे कई वीडियोज सामने आ रही हैं। इन वीडियोज में रोना मचा हुआ है कि इन लोगों से बकरीद मनाने की आजादी छीनी जा रही है।

इसे सरकार के खिलाफ अलग नैरेटिव के रूप में गढ़ा जा रहा है क्योंकि सरकार ने सड़क पर नमाज ने पढ़ने, खुले में जानवरों का न काटने जैसे कुछ नियम पालन करने को कह दिया है। उन नियमों का पालन करने से बचने के लिए ये इस्लामी कट्टरपंथी आजादी की बात कर रहे हैं। माहौल बनाया जा रहा है कि मुस्लिमों को उनके त्यौहार मनाने नहीं दिया जाता है। इस तरीके से यह नैरेटिव फैला रहे हैं कि लोग अपने देश, अपनी ही संस्कृति और अपनी ही चुनी हुई सरकार पर सवाल उठाने लगें।

नैरेटिव फैलाने में ये और कोई नहीं बल्कि नौजवान इस्लामी कट्टरपंथियों की कौम है, जो आए दिन रीलों में अपने मजहब का प्रचार करती घूमती है। अदनान शेख, एजाज खान और सहर यूनुस शेख जैसे सोशल मीडिया से उभरे चेहरों ने बकरीद को लेकर इसी तरह के वीडियो बनाए हैं। इन वीडियो में दिखाया कि मुस्लिमों के साथ कितना गलत हो रहा है।

‘चीच्चा’ अदनान शेख ने मीरा रोड के मामले में मजहब की आजादी का रोना रोया

मजहब के आगे किसी को नहीं मानने वाले अदनान शेख ने मीरा रोड वाले मामले में सवाल उठाने वाले लोगों ‘बेरोजगार’ बताते वीडियो बनाया। ‘चीच्चा’ ने वीडियो में जो तर्क दिया उसका सोर्स उन्होंने चैटजीपीटी को बताया। अदनान ने चैटजीपीटी का हवाला देकर दावा किया कि भारत की 80% आबादी नॉन-वेज है, तो मुस्लिमों को खाने से क्यों रोका जाता है।

भूलना नहीं है कि मजहब की आजादी की बात करने वाला ये वही अदनान शेख है जिसने हिंदू लड़की से निकाह कर उसे भी मुस्लिम में परिवर्तित कर दिया है। जो सबसे ऊपर अल्लाह को मानता है लेकिन जब हिंदू लड़की के मजहब की बात आई तो उससे वह छीन लिया और अपना मजहब थोप डाला।

एजाज खान ने बदला लेने की चेतावनी दी

ऐसे ही एजाज खान ने भी ‘नॉन-वेज’ खाने को मुद्दा बनाकर वीडियो बनाया है। उसने भी मुस्लिमों पर अत्याचार का रोना रोया और फिर धमकी दी कि अगर मुस्लिम बदला लेने पर आए तो मुश्किल हो जाएगी।

अब एजाज खान को कौन नहीं जानता? जानता भी सिर्फ लफड़ों की वजह से ही है। यहाँ इतने अहम और संवेदनशील मुद्दे में भी एजाज खान ने मारने-काटने की धमकी दे डाली। उसको नहीं पता कि नॉन-वेज और वेज में क्या फर्क है लेकिन उसे यह पता है कि बदला कैसे लिया जाता है? क्योंकि इस्लामी कट्टरपंथी की एक पहचान यह भी है।

मुंब्रा को हरा रंग में रंगने का ख्वाब देखने के बाद सहर शेख मजहब की बात नहीं करना चाहतीं

यहाँ बात अगर ‘मुस्लिमों पर अत्याचार’ की होने लगी तो मुंब्रा को हरे रंग में रंगने का ख्वाब देखने वाली मेयर सहर यूनुस शेख कैसे पीछे हट सकती थीं। सहर यूनुस शेख एक कदम आगे निकली। सहर ने रोना रोते हुए सीधा हिंदुओं की मान्यताओं पर हमला बोला। सहर ने बकरा काटने की तुलना पशु बलि से की। यहाँ सहर कहती है कि मजहब की बात नहीं करनी चाहिए क्योंकि दुनिया में और भी कई समस्याएँ हैं।

सहर शेख AIMIM की मुंब्रा से मेयर हैं, पार्टी को केवल मजहब के नाम ही वोट मिलते हैं। और सहर यूनुस शेख को भी मुंब्रा में मजहब की बात करने के लिए ही चुना गया। यह खुद सहर शेख अपनी विक्ट्री स्पीच में बता चुकी है। जब सहर शेख ने मुंब्रा को हरे रंग में रंगने के अपने ख्वाब को पब्लिक किया था, और सामने खड़ी मुस्लिम भीड़ ने खूब तालियाँ बजाई थीं। वह आए दिन अपनी वीडियो में केवल मजहब की ही बात करती है, और अब बकरीद पर रोना रोते हुए सहर को मजहब की बात करने से चिढ़ हो रही है।

सरकार के नियम मुस्लिमों पर अत्याचार?

ये वही सोशल मीडिया की दुनिया में उभरे चेहरे हैं, जिन्हें देश की बड़ी संख्या में शामिल युवाओं ने फेमस किया है। इनमें से कोई नाच-गाना करके, कोई इधर-उधर लफड़ेबाजी करके तो कोई राजनीति के नाम पर नफरत फैलाकर आगे बढ़ा है। इनके पास न कोई तर्क है और न ही अपनी बात को साबित करने के लिए कोई तथ्य। इनके दावे सिर्फ भड़ास से भरे हैं।

अगर भारत में अलग-अलग राज्यों की सरकारें बकरीद को लेकर कुछ नियम तय कर रही है तो उसका मकसद ये कैसे हो सकता है कि मुस्लिमों के साथ भेदभाव हो? भारत में आखिर कब और किसने मुस्लिमों को बकरीद मनाने से रोका है? सरकार और प्रशासन का केवल इतना ही तो कहना है कि कानून के दायरे में रहकर, तय स्थानों पर और स्वच्छता के नियमों का पालन करते हुए त्यौहार मनाएँ। क्या कानून व्यवस्ता की बात करना अत्याचार है?

सच्चाई यह है कि ये फेमस चेहरे अपनी वीडियोज के जरिए भारत की एक डरावनी और झूठी तस्वीर पेश करने की कोशिश में लगे हैं ताकि अंतरराष्ट्रीय स्तर की मीडिया पर, विशेषकर खाड़ी देशों और विदेशी दर्शकों के बीच यह नैरेटिव सेट किया जा सके कि भारत में अल्पसंख्यकों पर जुल्म हो रहा है।

‘पीड़ित’ का नकाब पहनने वालों को घिनौनी असलियत

याद रहे कि ये वही चेहरे हैं जो आम दिनों में विशुद्ध कट्टरपंथी और मजहबी कंटेंट पर फलते-फूलते हैं और जिनके सोशल मीडिया अकाउंट्स पर ‘नारा-ए-तकबीर’ जैसी बातें आम होती हैं, लेकिन जैसे ही कोई कानूनी बंदिश आती है, ये अचानक ‘शांतिप्रिय और पीड़ित’ होने का नाटक रचने लगते हैं। यही अदनान शेख और एजाज खान हैं, जिन्होंने 2019 में तबरेज अंसारी मामले पर अपनी मुस्लिम गैंग के साथ रील बनाई थी और मुस्लिमों के आतंकी बनने को जायज दिखाया था।

अब यही चेहरे सार्वजनिक स्थानों, सड़कों या रिहायशी सोसायटियों में खुलेआम दी जाने वाली कुर्बानी को सही ठहराने के लिए ये बार-बार तर्क देते हैं कि हिंदू भी तो मांस खाते हैं।

सवाल है कि क्या कोई हिंदू मीट खाने के लिए खुली सड़क पर मांस काटने की जिद करता है, क्या उनके खान-पान की वजह से सोसायटियों की नालियों में खून बहता नजर आता है। कोई भी सभ्य समाज यह स्वीकार नहीं कर सकता कि त्यौहार के नाम पर सड़कों को अवरुद्ध किया जाए, सार्वजनिक नमाज से ट्रैफिक रोका जाए या खुले में जानवरों को काटकर बच्चों और नागरिकों के मानसिक स्वास्थ्य व स्वच्छता से खिलवाड़ किया जाए।

सालों से सोशल मीडिया और मुख्यधारा के मीडिया में सक्रिय वामपंथी जमात ने हमेशा हिंदुओं के त्योहारों को निशाना बनाया है। दीपावली आते ही इन्हें प्रदूषण याद आता है, होली पर पानी की बर्बादी और रंगों के केमिकल पर ज्ञान दिया जाता है, और महाशिवरात्रि पर दूध की बर्बादी का रोना रोया जाता है। तब सनातनियों ने कभी इस तरह का ‘अंतरराष्ट्रीय रोना’ नहीं रोया।

लेकिन, आज जब प्रशासन सिर्फ इतना कहता है कि गाय, जिसे हिंदू पूजते हैं, उसकी कुर्बानी नहीं होगी और बकरे की कुर्बानी खुले में नहीं, बल्कि कड़े नियमों के तहत बंद जगहों पर होगी, तो इनका त्योहार खतरे में आ जाता है।

हमें समझना होगा कि इस्लामी कट्टरपंथियों का यह पूरा खेल ‘अधिकारों’ से जुड़ा नहीं, बल्कि ‘विशेषाधिकारों’ की जिद का है। इन्हें देश में रहना है और ये भी चाहते हैं कि कानून इनके मुताबिक चले। लेकिन अब समय है इन्हें समझना होगा कि भारत में नियम अगर हिंदुओं के लिए हैं तो दूसरे समुदाय पर भी वो वैसे ही लागू होंगे। इसलिए सोशल मीडिया पर आंसू बहाकर देश को बदनाम करने का यह ड्रामा अब पूरी तरह बंद होना चाहिए। न इस साल, न किसी साल ऐसी हरकतें बर्दाश्त की जानी चाहिए।

सिलेबस बदले, किताबें नहीं मिली, PDF से पढ़ाई: बच्चों का दुख- दर्द कब समझेगा NCERT, टीचर-अभिभावक भी कर रहे त्राहिमाम

NCERT के किताब का झोल बच्चों पर भारी पड़ रहा है। किताबों का ठिकाना नहीं और नया सेशन शुरू हुए करीब दो महीने बीत गए हैं। इतना ही नहीं, गर्मी की छुट्टियाँ भी जारी हैं, लेकिन अब तक खासकर क्लास 9 के छात्र-छात्राओं की मुश्किलें कम होती नहीं दिख रही हैं।

किताबें पीडीएफ फाइल के रूप में डिजिटल फॉर्म में मौजूद है। सिलेबस में बड़े बदलाव किए गए हैं, ऐसे में पढ़ाई जो अप्रैल में शुरू हो जानी चाहिए थी, वो अब तक नहीं हो पाई है। यहाँ तक की स्कूलों के बुक शॉप से ये भी नहीं पता चल पा रहा है कि किताबें अब तक मिलेंगी। केन्द्रीय विद्यालय और दूसरे सरकारी स्कूलों का तो और भी बुरा हाल है। बच्चे परेशान, टीचर परेशान और पैरेंट्स बिचारे सारी बातें जानकर पूरे सिस्टम को कोस रहे हैं।

पैरेंट्स जानना चाहते हैं कि आखिर सिलेबस बदले, तो किताबें पहले क्यों नहीं छपी। अगर किताबों की छपाई न कर पाए तो इस साल नया सिलेबस लागू करने की जरूरत क्या थी। तीन भाषा की जानकारी देने वाला फॉर्मूला क्लास 9 में क्यों इस तरह से थोपा गया। बच्चे पहले से परेशान हैं, वो पूरी चीजों को कैसे मैनेज करेंगे।

किताबों की अनिश्चितता को लेकर टीचर चिंतित

आंध्र प्रदेश के विशाखापत्तनम के एक बड़े स्कूल में साइंस टीचर मिस शिवानी ( बदला हुआ नाम) ने बदले हुए क्लास 9 सिलेबस में बदलाव के बाद टेक्स्टबुक्स की देरी से चिंता जताई। उनका कहना है कि स्कूलों को इस बारे में साफ जानकारी नहीं मिली है कि किताबें कब तक मिल पाएँगी।

टीचर के मुताबिक, “बदकिस्मती से यह बार-बार होने वाली दिक्कत बन गई है। एकेडमिक सेशन अप्रैल में शुरू होता है, फिर भी टेक्स्टबुक्स अक्सर कई महीनों तक अवेलेबल नहीं रहतीं। थ्री-लैंग्वेज फॉर्मूला लागू होने के साथ क्लास 9 के स्टूडेंट्स से अब तीसरी भाषा पढ़ने की उम्मीद की जाती है, लेकिन इन कोर्स के लिए जरूरी टेक्स्टबुक्स भी मौजूद नहीं हैं।”

उन्होंने कहा कि एक टीचर और CBSE स्टूडेंट के पेरेंट्स के तौर पर पूरी परिस्थिति चिंताजनक है। इस तरह की देरी स्कूलों, टीचरों, स्टूडेंट्स और पेरेंट्स, सभी के लिए अनिश्चितता वाली है। सबसे अहम बात यह है कि इससे पूरे सिस्टम की लापरवाही, निरंतरता और तैयारी की कमी का पता चलता है। एजुकेशनल रिफॉर्म्स और करिकुलम में बदलावों को समय पर प्लानिंग, सही रिसोर्स और लागू करने के लिए सही रणनीति की जरूरत होती है, ताकि बच्चों की पढ़ाई-लिखाई पर बुरा असर न पड़े।

दिल्ली-एनसीआर की एक केन्द्रीय विद्यालय में टीचर सीमा (बदला हुआ नाम) सोशल साइंस पढ़ाती हैं। इनका कहना है कि क्लास 9 के सोशल साइंस में काफी बदलाव आए हैं। छात्रों को पीडीएफ से पढ़ाना पड़ता है। क्लास में बच्चों के पास किताब नहीं है, इसलिए उन्हें समझाना अपने आप में बड़ा चैलेंज है। बच्चों को पीडीएफ फाइल की कॉपी निकालने के लिए कहा, ताकि उन्हें जो बताया जा रहा है, वह समझ सकें। इस बीच गर्मी की छुट्टियाँ शुरू हो गई है, किताबों का कोई अता-पता नहीं है। बच्चों की परीक्षा भी शुरू हो जाएगी, आखिर शिक्षक क्या करे?

एडवांस मैथ्स के बाद एडवांस साइंस की एंट्री

क्लास 9 में इस साल से एडवांस मैथ्स के साथ एडवांस साइंस भी शुरू हो गया है। 2024 में सीबीएसई के स्कूलों में एडवांस मैथ्स की शुरुआत हुई थी। आज तक इसके लिए एनसीईआरटी ने कोई किताब नहीं छापा है। अगर छापा भी होगा तो बच्चों के हाथों तक नहीं पहुँचा। ऐसे में टीचर जो किताब मौजूद है, उससे ही मैथ्स करवाते हैं। जो थोड़ा टफ होता है, उसे एडवांस मैथ्स का सवाल बता दिया जाता है और जो आसान होते हैं उसे बेसिक मैथ्स का। अब सोचा जा सकता है कि एक ही क्लासरूम में जो बच्चा एडवांस मैथ्स वाला सवाल कर रहा होगा, उस वक्त बेसिक मैथ्स लिया बच्चा क्या कर रहा होगा।

ऐसी स्थिति में अब एडवांस साइंस की पढ़ाई शुरू हो रही है। आगे जो बच्चे साइंस पढ़ना चाहते हैं, उन्हें एडवांस मैथ्स और एडवांस साइंस लेना है। ह्यूमेनिटी और कॉमर्स लेने वाले बच्चों को अभी से साइंस पर ज्यादा मेहनत नहीं करना है। आखिर क्लास 11 में ये अंतर आ ही जाता है, तो क्लास 9 में इसकी जरूरत क्या थी।

किताब जिसे मिले, वे छात्र भी परेशान

डीपीएस नोएडा में पढ़ने वाली क्लास 9 की छात्रा अक्षरा का कहना है कि उन्हें दो-तीन दिन पहले किताब मिल गई है। लेकिन अभी भी सोशल साइंस की किताब नहीं मिली है। वैसे भी मैथ्स की तो अलग किताब स्कूल पहले से ही पढ़ाता रहा है। साइंस के लिए एनसीईआरटी की किताब मिल गई है। उसका कहना है कि साइंस की किताब पूरी तरह बदल गई है। मैथ्स का पहला चैप्टर पहले नंबर सिस्टम हुआ करता था, लेकिन अब ज्योमेट्री का है। पहले बच्चे के लिए कैलकुलेशन वाले सवाल ज्यादा आते थे, लेकिन अब लैंग्वेज बेस सवाल ज्यादा हैं। गणित में भी ऐसा लगता है कि लैंग्वेज समझना पड़ेगा। काफी मुश्किल लग रहा है इसे समझना।

उसने कहा कि साइंस की किताब भी काफी मुश्किल लग रही है। बहुत ज्यादा गहराई से समझना पड़ेगा। इसे वही छात्र खुद से कर पाएगा, जिसे साइंस पढ़ना काफी पसंद हो। समरबिल स्कूल, दिल्ली में पढ़ने वाली छात्रा रियाना का कहना है कि उसे तो अभी तक किताब भी नहीं मिली है। स्कूल के अंदर जो बुक शॉप हैं, वहाँ पूछने पर बोला जाता है कि अभी तक उन्हें कोई जानकारी नहीं है कि किताब कब तक मिलेगा। टीचर ने बच्चों को पीडीएफ भेज कर उसकी कॉपी करवा कर लाने के लिए कहा था। अप्रैल में जैसे-तैसे उनलोगों ने पढ़ा है। मैम भी परेशान रहती हैं। बच्चे भी किताब नहीं मिलने से परेशान हैं। उनकी तो टर्म 1 की परीक्षा भी हो गई है, लेकिन किताब का ठिकाना नहीं है।

जब स्कूल में मौजूद किताब के दुकानदार से बात करने की कोशिश की, तो उसने कहा कि अभी तक तो किताबें नहीं आई हैं। कब तक आएगी उन्हें भी नहीं पता। अब तो गर्मी की छुट्टियाँ चल रही है। अब बच्चों को जुलाई में स्कूल खुलने के बाद ही पता चलेगा कि किताब मिल पाएगी या नहीं। हालाँकि स्कूल से अलग कोंडली के ‘उत्तराखंड बुक शॉप’ के दुकानदार का कहना है कि उनके यहाँ सारी किताबें मिल रही हैं, सिर्फ क्लास 9 की सोशल साइंस की किताब अब तक नहीं आई है। उन्होंने जानकारी दी कि जल्द ही एडवांस मैथ्स के साथ-साथ एडवांस साइंस की किताब बाजार में आने वाली है।

तीन लैंग्वेज पढ़ने की अनिवार्यता से सभी परेशान

बच्चे जब किताब नहीं मिलने से परेशान हैं, वहीं इस साल तीन लैंग्वेज पढ़ना भी क्लास 9 में अनिवार्य कर दिया गया है। एक मातृभाषा, क्षेत्रीय भाषा और एक विदेशी भाषा। ज्यादातर स्कूलों में इसके लिए हिन्दी, संस्कृत और अंग्रेजी पढ़ाई जा रही है। ऐसे में जर्मन, फ्रेंच, स्पेनिश जैसी विदेशी भाषा अब नहीं पढ़ाई जा रही है। इससे जुड़े शिक्षकों को भी स्कूलों ने बाय-बाय कर दिया है।

डीएवी स्कूल गाजियाबाद में क्लास 10 में पढ़ने वाली छात्रा की माँ अल्पना राय, जो माँ के साथ-साथ बच्चों को पढ़ाती भी हैं, उनका कहना है कि बच्चों को दो-तीन दिन पहले किताबें मिली है। उन्होंने किताबों में कई कमियाँ पाई हैं। साइंस में बहुत ज्यादा सिलेबस है, उसे इस तरह से बनाया गया है कि बच्चों के लिए खुद से समझना काफी मुश्किल है। टीचर को भी पढ़ना पड़ेगा। मैथ्स का भी वही हाल है। सोशल साइंस की किताब मिली नहीं है। अप्रैल से अब तक बच्चों के पास किताबें नहीं थी, सिलेबस बदल दिया गया और किताब भी न मिले, तो बच्चा क्या करे। क्लास 9 बच्चे का आधार होता है। इस क्लास में लापरवाही काफी गंभीर बात है। ऐसी स्थिति में तीन लैंग्वेज की अनिवार्यता बच्चों पर भारी पड़ रही है।

समरविल स्कूल नोएडा में पढ़ने वाली एक छात्रा की माँ जैस्मिन तिर्की का कहना है कि उन्होंने तीन लैंग्वेज की अनिवार्यता के खिलाफ स्कूल प्रबंधन से विरोध जताया है। उनका कहना है कि उन्होंने अप्रैल में स्कूल से पुरानी किताबें खरीद ली थी। तभी वही किताबें बेची जा रही थी। अब सिलेबस बदल गया है, तो फिर खरीदना पड़ रहा है। ये दोहरा खर्च भी उन्हें परेशान कर रहा है।

हालाँकि, उनका कहना है कि सिलेबस को वक्त-वक्त पर परखा जाना चाहिए, इसमें कोई दिक्कत नहीं है। आज के परिवेश में बदलाव होना चाहिए। लेकिन सिलेबस में बदलाव के बाद वक्त पर किताबों का मिलना भी जरूरी है। अगर किताब नहीं मिलेंगे तो पीडीएफ फाइल से बच्चे पढ़ते हैं। मोबाइल से दूर रखने की हमारी सारी कोशिश बेकार हो जाती है, इसलिए बदलाव से पहले सही रणनीति बनाना जरूरी है। बदलाव करिए, लेकिन बच्चों की पढ़ाई की निरंतरता को तोड़ कर नहीं। अगर अगले साल इसे लागू किया जाता, तो किताबें भी मार्केट में आ जाती और बच्चों को सहूलियत भी होती।

ये हाल सिर्फ क्लास 9 के बच्चों का नहीं हुआ है। साल 2025 में क्लास 4 से क्लास 8 तक का सिलेबस बदल गया था। उस वक्त भी कई महीनों तक बच्चों को किताबें नहीं मिल पाई। क्लास 5 और क्लास 8 के बच्चों ने तो जून तक इंतजार किया था। इसके बावजूद एनसीईआरटी ने कोई सबक नहीं लिया और साल 2026 में क्लास 9 का सिलेबस बदल कर किताब उपलब्ध कराने में असफल रहे। फिर वही पीडीएफ फाइल और टीचर्स के नोट्स पर बच्चों की निर्भरता। गाँवों-कस्बों के बच्चे क्या पीडीएफ फाइल खोल पाएँगे? क्या इंटरनेट की ऐसी सुविधा उन्हें मिलती है, ये भी बड़ा सवाल है। कई बार अंग्रेजी माध्यम की पुस्तकें पहले छप जाती हैं, हिन्दी में बाद में आती है। इसको लेकर भी असमानता का आरोप एनसीईआरटी पर लगता है।

नकली किताबों से सावधान रहें

एक बात और है कि प्राइवेट स्कूल प्राइवेट पब्लिशर्स की महँगी किताबें स्कूल में पढ़ाते हैं, इसे खरीदने का दबाव अभिभावकों पर होता है। इसको लेकर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने राज्य सरकारों को नोटिस भेजा है और पूछा है कि जब एनसीईआरटी की किताबें कम पैसों में उपलब्ध है, तो स्कूल क्यों महँगी किताबों से पढ़ाती है। लेकिन, एनसीईआरटी की किताबें उपलब्धता पर भी बड़ा सवाल है।

एनसीईआरटी की किताबों में कमी की वजह से कई जगहों पर नकली किताबें मिल रही हैं। इन किताबों की भारी माँग रहती है। उसके अनुपात में आपूर्ति नहीं हो पाती। इसके कारण बाजार में नकली और पायरेटेड किताबों का बड़ा गिरोह सक्रिय है। ये किताबें घटिया कागज, हल्की स्याही और बिना लोगो के छपती हैं, जिससे बच्चों की पढ़ाई और आँखों पर बुरा असर पड़ता है।

2020 में सिर्फ मेरठ और आसपास के इलाकों में करीब 5.64 करोड़ रुपये की नकली किताबें खपाने की बात सामने आई थी। 2025 में दिल्ली के शाहदरा में नकली किताबों का एक रैकेट पकड़ा गया था जिसके पास से 1.7 लाख से अधिक नकली किताबें जब्त की गई थी, जिसकी कीमत करीब 2.4 करोड़ बताई गई थी। कहने का मतलब यह है कि एनसीईआरटी की नकली किताबों से भी सावधान रहने की जरूरत है। किताबों की कमी की वजह से ‘नकली का धँधा’ भी जोरों से चल रहा है।

NCERT की किताबों में संशोधन और विवाद

एनसीईआरटी की किताबों में हाल ही में कक्षा 8 के सोशल साइंस की किताब में ‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’ के मुद्दे पर जमकर विवाद हुआ। सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी आपत्ति जताई और गरिमा को ठेस पहुँचाने वाला बताया। इसके बाद एनसीईआरटी को माफी माँगनी पड़ी और किताब को बाजार से हटाना पड़ा।

कक्षा 8 के सोशल साइंस की किताब में राजपूत राजघरानों के मराठा साम्राज्य में दिखाए जाने पर जमकर बवाल मचा। दरअसल किताब में संस्थान ने 1759 का एक मैप प्रकाशित किया, जिसमें राजस्थान के स्वतंत्र राजघरानों जैसे- जैसलमेर, बीकानेर, बूंदी को मराठा साम्राज्य में दिखाया गया। सवाल उठने के बाद NCERT को बदलाव करना पड़ा। उसने एक कमेटी बनाई और समीक्षा के बाद संस्थान ने माना कि उससे बड़ी गलती हुई थी और इस मैप का कोई सोर्स नहीं था।

कक्षा 7वीं और 12वीं के पाठ्यक्रम से मुगल साम्राज्य और दिल्ली सल्तनत से जुड़े अध्याय हटाने पर विपक्ष ने भारी हंगामा खड़ा किया। स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े कुछ हिस्सों को हटाने को लेकर एनसीईआरटी ने खेद जताया और इसे आगामी शैक्षणिक सत्र में संशोधित कर पेश करने की बात कही।

कोरोना काल में एनसीआरटी ने क्लास 10 के पाठ्यक्रम से डार्विन का विकासवाद यानी evolution और आवर्त सारणी यानी periodic table हटा दिया था। इसको लेकर शिक्षाविदों ने जमकर लताड़ लगाई। हालाँकि एनसीईआरटी ने स्पष्ट किया कि डार्विन का विकासवाद और आवर्त सारणी को हटाया नहीं गया है, बल्कि कक्षा 11वीं और 12वीं के विज्ञान के विस्तृत पाठ्यक्रम में इन्हें शामिल रखा गया है।

शिक्षाविदों का मानना था कि यह छात्रों को विज्ञान की समझ से दूर करने वाला कदम है। इसके अलावा पर्यावरण से जुड़े चैप्टर जैसे ऊर्जा के स्रोत, प्राकृतिक संसाधनों का प्रबंधन भी हटा दिए गए। इस पर भी बवाल हुआ।

कुल मिलाकर एनसीईआरटी को किताबों में संशोधन से लेकर नई किताब बाजार में लाने के लिए सही रणनीति की जरूरत है। सालों से किताबों की कमी का सामना बच्चे कर रहे हैं। आखिर किताबें कम क्यों छापी जाती है? यह जानते हुए कि इससे कालाबाजारी होती है और नकली किताबों के ढेर में से असली को छाँटना छात्रों के लिए आसान नहीं होता। ऐसे में अगर किताब बाजार में ही उपलब्ध न हो तो बच्चे क्या करें? उनकी पढ़ाई में गैप आता है। मन नहीं करता पढ़ने का। स्कूल भी हाथ खड़े कर देते हैं। जरा सोचिए ऐसे स्टूडेंट्स का क्या हाल होगा, जो गाँव में बगैर सिलेबस और किताब के पढ़ने की कोशिश करते होंगे।

बंगाल में सत्ता नहीं संस्कृति भी बदली, दशकों बाद ईद पर नहीं थमी सड़कें: पढ़ें- कैसे वर्षों तक ममता के तुष्टिकरण का केंद्र बनी रही कोलकाता की ‘रेड रोड’

कोलकाता की प्रसिद्ध और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण ‘रेड रोड’ की कहानी पिछले कुछ सालों में पूरी तरह बदल गई है। साल 2011 से 2025 तक, ममता बनर्जी के शासनकाल में इस सड़क का नजारा कुछ अलग ही होता था। मुस्लिम वोट बैंक को साधने और तुष्टिकरण की राजनीति के तहत इस मुख्य VIP कॉरिडोर को ईद की नमाज के लिए घंटों तक पूरी तरह बंद कर दिया जाता था।

खुद ममता बनर्जी हर साल इस मंच पर मौजूद रहती थीं, जिसके कारण एम्बुलेंस से लेकर दमकल विभाग जैसी आपातकालीन सेवाएँ और दफ्तर जाने वाले आम लोग भीषण ट्रैफिक जाम में फँसे रहते थे। ब्रिटिश काल की यह ऐतिहासिक सड़क, जो कभी द्वितीय विश्व युद्ध में लड़ाकू विमानों की लैंडिंग के काम आती थी, उसे प्रशासनिक नियमों को ताक पर रखकर एक तरह से बँधक बना दिया जाता था और शहरी व्यवस्था पूरी तरह ठप हो जाती थी।

लेकिन साल 2026 में राज्य की सत्ता बदलते ही एक नई तस्वीर सामने आई। 1978 के बाद और 107 साल बाद रेड रोड पर नमाज अदा नहीं हुई। शुभेंदु अधिकारी की अगुवाई वाली BJP सरकार ने कानून और नागरिक सुविधाओं को प्राथमिकता दी। शुभेंदु सरकार ने एक बड़ा और व्यावहारिक फैसला लेते हुए ईद की मुख्य नमाज को रेड रोड से हटाकर पास के खुले ब्रिगेड परेड ग्राउंड में शिफ्ट कर दिया, जिससे सालों बाद इस पर्व पर रेड रोड पूरी तरह खाली और चालू रही।

प्रशासन के इस कदम को कुछ मजहबी नेताओं ने भी सराहा क्योंकि नमाजियों को अब ज्यादा खुली जगह मिली और शहर की लाइफलाइन बिना किसी रुकावट के दौड़ती रही। यह बदलाव साफ दिखाता है कि कैसे एक तरफ सालों तक मजहब और सियासत को कानून से ऊपर रखा गया, वहीं दूसरी तरफ सूझबूझ से धार्मिक आस्था का सम्मान भी हुआ और कोलकाता के आम नागरिकों को घंटों लंबे जाम से हमेशा के लिए आजादी मिल गई।

साल-दर-साल का इतिहास: ममता बनर्जी सरकार में कैसे ठप रहती थी व्यवस्था (2011 से 2025)

2011 में सत्ता में आने के बाद ममता बनर्जी ने अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने के लिए मुस्लिम समर्थकों को रिझाना शुरू किया। इन शुरुआती सालों में रेड रोड पर ईद की नमाज के भव्य आयोजन को सरकारी संरक्षण मिलना शुरू हुआ। मुख्यमंत्री खुद हर साल नमाज के मंच पर उपस्थित रहने लगीं। इस दौरान उत्तर और दक्षिण कोलकाता को जोड़ने वाली इस मुख्य सड़क को घंटों बंद रखा जाने लगा, जिससे आपातकालीन सेवाएँ और आम जनता परेशान होने लगी, लेकिन सरकार ने इसे परंपरा का नाम देकर जारी रखा। अब हम सिलसिलेवार तरीके से तस्वीरों को देखते हैं।

यह तस्वीर साल 2013 की है। जब कोलकाता के रेड रोड पर नमाजियों ने ईद पर नमाज अदा की।

साल 2013 में ममता बनर्जी की सरकार में नमाज अदा करने की तस्वीर (फोटो साभार: Rangan Datta)

यह तस्वीर साल 2014 की है। ममता बनर्जी की सरकार ने कोलकाता के रेड रोड पर नमाजियों के लिए सामूहिक प्रार्थना का आयोजन किया था।

साल 2014 में ममता बनर्जी की सरकार में नमाज अदा करने की तस्वीर

यह तस्वीर साल 2015 की है, जब तत्कालीन मुख्यमंत्री ममता बनर्जी खुद ईद पर वहाँ उपस्थित थीं। ममता बनर्जी ने X पर पोस्ट कर लिखा, “आज सुबह मैंने रेड रोड पर ईद की नमाज अदा की।”

यह तस्वीर साल 2016 की है। कोलकाता के रेड रोड पर ईद के दौरान नमाजियों ने नमाज अदा की।

साल 2016 में ममता बनर्जी की सरकार में नमाज अदा करने की तस्वीर

यह तस्वीर साल 2017 की है। कोलकाता में 25,000 से ज्यादा मुसलमान नमाज अदा करने के लिए रेड रोड पर सबसे बड़ी जमात में इकट्ठा हुए थे। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी इस जश्न में हिस्सा लेने पहुँची थीं।

साल 2017 में ममता बनर्जी की सरकार में नमाज अदा करने की तस्वीर

यह तस्वीर साल 2018 की है। कोलकाता के रेड रोड से ममता बनर्जी ने मंच से संदेश दिया था। रमजान के महीने में रोजा भी रखा था। ममता बनर्जी ने खुद X पर पोस्ट कर लिखा, “यह ईद खुशियाँ और सर्वशक्तिमान का असीम आशीर्वाद लेकर आए। ईद मुबारक”

साल 2018 की तस्वीर। मंच से नमाजियों को ममता बनर्जी संबोधित करते हुए

यह तस्वीर साल 2019 की है। कोलकाता के रेड रोड पर ईद-उल-फितर के अवसर पर नमाज अदा करते मुस्लिम इकट्ठा हुए थे। तस्वीर में देख सकते हैं कि पूरी रोड को जाम कर किस प्रकार ईद मनाया जा रहा था।

साल 2019 में ममता बनर्जी की सरकार में नमाज अदा करने की तस्वीर

साल 2020 और 2021 में कोरोना काल के दौरान लोगों को एकत्रित होने के लिए सख्त मनाही थी। जिस कारण कोलकाता की रेड रोड पर नमाज के लिए परमिशन नहीं मिली थी। फिर साल 2022 में दोबारा इस रोड पर नमाज अदा की गई। ममता ने रेड रोड पर ईद के मौके पर आयोजित सामूहिक नमाज को संबोधित किया था।

साल 2022 की तस्वीर, ममता बनर्जी ईद पर नमाजियों को संबोधित करते हुए

यह तस्वीर साल 2023 की है। कलकत्ता खिलाफत कमेटी ने रेड रोड पर ईद-उल-अजहा की नमाज अदा करने के लिए ईस्टर्न कमांड और राज्य सरकार को एक चिट्ठी लिखकर खुले में नमाज अदा की इजाजत माँगी थी, जिससे ममता सरकार ने स्वीकार किया था। इस तस्वीर में देख सकते हैं कि कोलकाता की रेड रोड पर हजारों की संख्या में मुस्लिम एकत्रित हो रखे हैं।

साल 2023 की तस्वीर, ममता बनर्जी की सरकार में रेड रोड पर नमाज अदा करते हुए

यह तस्वीर साल 2024 की है। तत्कालीन मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी कोलकाता की रेड रोड पर ईद-उल-फितर की नमाज में नमाजियों को संबोधित करते हुए।

साल 2024 की तस्वीर, ममता बनर्जी और भतीजा अभिषेक बनर्जी

यह तस्वीर साल 2025 की है। कोलकाता की रेड रोड पर हजारों की संख्या में एक कतार में ईद के दिन नमाज अदा करते हुए।

साल 2025 की तस्वीर, कोलकाता के रेड रोड पर नमाज अदा करते हुए

दोनों सरकारों के बीच का बड़ा अंतर: तुष्टिकरण बनाम कानून का शासन

ममता बनर्जी और शुभेंदु अधिकारी की सरकार के कामकाज के तरीके में यह साफ अंतर दिखाता है कि कैसे एक तरफ मजहब और वोट बैंक को कानून से ऊपर रखा गया, वहीं दूसरी तरफ प्रशासनिक सुधार को प्राथमिकता दी गई।

ममता सरकार के दौरान कानून और शहरी व्यवस्था को ताक पर रखकर केवल मुस्लिम समर्थकों को खुश करने की राजनीति की गई। एक बेहद संवेदनशील, सैन्य महत्व वाली और मुख्य यातायात सड़क को घंटों ब्लॉक करके नमाज अदा करवाई जाती थी, ताकि अल्पसंख्यक समुदाय में यह संदेश जाए कि सरकार उनके लिए प्रशासनिक नियमों को भी बदल सकती है।

वहीं वर्तमान में शुभेंदु सरकार के सत्ता में आते ही यह स्पष्ट संदेश दिया गया कि कानून और नागरिक सुविधाएँ किसी भी धार्मिक आयोजन से ऊपर हैं। सरकार ने परंपरा को पूरी तरह प्रतिबंधित करने के बजाय एक व्यावहारिक रास्ता निकाला और नमाज को पास के ही बड़े मैदान (ब्रिगेड परेड ग्राउंड) में शिफ्ट कर दिया। इससे नमाजियों को भी ज्यादा जगह मिली और शहर की जीवनरेखा ‘रेड रोड’ भी एंबुलेंस, दमकल और आम जनता के लिए पूरी तरह खुली रही।

यह बदलाव दिखाता है कि जब सरकारें तुष्टिकरण की जगह कानून के शासन और नागरिक सुविधाओं को प्राथमिकता देती हैं, तो धार्मिक परंपराओं की पवित्रता भी बनी रहती है और शहर की सामान्य जिंदगी भी प्रभावित नहीं होती।

जनगणना वाले घर आए, टीवी-फ्रिज-बाइक सब कुछ गिना, पर लोग ही नहीं गिने: Census को लेकर आपके हर सवाल का जवाब है यहाँ

दोपहर का वक्त था। दरवाजे की घंटी बजी तो बाहर दो लोग मोबाइल और टैबलेट लिए खड़े थे। उन्होंने घर के कमरों की संख्या पूछी, फर्श पक्का है या कच्चा, टीवी-फ्रिज है या नहीं, बाइक और इंटरनेट की सुविधा है या नहीं सब कुछ नोट किया। लेकिन जब वे बिना परिवार के सभी लोगों की गिनती किए आगे बढ़ गए, तो घर वालों को लगा कि आखिर ये कैसी जनगणना है?

आपके पास भी अगर जनगणना वाले आएँ होंगे तो आपको भी ये कन्फ्यूजन होगा कि भई ये सब क्या हो रहा है? या जब आपके पास जनगणना वाले आएँगे तब आपको ये कन्फ्यूजन होना तय है, तो चलिए हम आपका सारा कन्फ्यूजन दूर कर देते हैं, उन सारे सवालों के जवाब देने की कोशिश करते हैं जो आपने मन में जनगणना को लेकर हों। बात शुरू से ही शुरू करते हैं।

दरअसल जनगणना 2027 की प्रक्रिया दो चरणों में होगी। पहले चरण में घर और उसमें मौजूद सुविधाओं की जानकारी जुटाई जाएगी, जबकि दूसरे चरण में परिवार के सदस्यों, उनकी शिक्षा, नौकरी, भाषा, जाति और दूसरी सामाजिक जानकारी दर्ज की जाएगी।

यही वजह है कि कई लोगों को शुरुआत में लग सकता है कि जनगणना वाले आए, टीवी-फ्रिज और मोटरसाइकिल गिनकर चले गए लेकिन लोगों के बारे में तो पूछा ही नहीं।

भारत में होने वाली जनगणना 2027 देश की 16वीं जनगणना और आजादी के बाद की 8वीं जनगणना होगी। यह कई मायनों में ऐतिहासिक मानी जा रही है, क्योंकि पहली बार इसे पूरी तरह डिजिटल तरीके से कराया जाएगा। गणनाकर्मी मोबाइल ऐप के जरिए डेटा दर्ज करेंगे जबकि आम लोगों को भी सेल्फ-एन्यूमरेशन पोर्टल के जरिए खुद अपनी जानकारी भरने की सुविधा मिलेगी।

यह जनगणना सिर्फ आबादी गिनने की प्रक्रिया नहीं है बल्कि इसी डेटा के आधार पर सरकार यह तय करती है कि किस इलाके में सड़क, स्कूल, अस्पताल, पानी और दूसरी सुविधाओं की कितनी जरूरत है। संसद और विधानसभा सीटों का परिसीमन, SC-ST सीटों का आरक्षण और कई सरकारी योजनाओं का वितरण भी जनगणना के आँकड़ों पर आधारित होता है।

इस बार की जनगणना इसलिए भी सबसे ज्यादा चर्चा में है क्योंकि 1931 के बाद पहली बार सभी जातियों की गणना की जाएगी। ऐसे में लोगों के मन में सवाल भी कई हैं, जनगणना वाले क्या पूछेंगे, क्या नहीं पूछेंगे और आखिर यह पूरी प्रक्रिया कैसे चलेगी।

जनगणना 2027 कितने चरणों में होगी और पूरा प्रोसेस क्या रहेगा

जनगणना 2027 को सरकार दो बड़े चरणों में पूरा करेगी। पहला चरण ‘हाउस लिस्टिंग और हाउसिंग सेंसस’ कहलाएगा, जबकि दूसरा चरण ‘पॉपुलेशन एन्यूमरेशन’ यानी आबादी की गणना का होगा।

पहला चरण अप्रैल 2026 से सितंबर 2026 तक अलग-अलग राज्यों में चलेगा। इसमें गणनाकर्मी हर घर जाकर मकान और घर से जुड़ी जानकारी इकट्ठा करेंगे। दूसरे चरण में फरवरी 2027 में लोगों की व्यक्तिगत जानकारी दर्ज की जाएगी।

पहले चरण में घर की स्थिति, मकान की दीवार, छत और फर्श किस चीज से बने हैं, कितने कमरे हैं, पानी और बिजली की सुविधा है या नहीं, शौचालय है या नहीं, खाना किस ईंधन से बनता है, मोबाइल, टीवी, इंटरनेट, वाहन जैसी सुविधाएँ हैं या नहीं इन सबकी जानकारी ली जाएगी।

दूसरे चरण में परिवार के हर सदस्य का नाम, उम्र, लिंग, शिक्षा, नौकरी, वैवाहिक स्थिति, धर्म, जाति, जन्म स्थान, माइग्रेशन और दिव्यांगता जैसी जानकारी दर्ज होगी। सरकार ने कहा है कि बेघर लोगों की भी अलग से गणना की जाएगी ताकि कोई छूट न जाए।

इस बार करीब 31 लाख गणनाकर्मी और सुपरवाइजर लगाए जाएँगे। सरकार का दावा है कि डिजिटल सिस्टम की वजह से डेटा जल्दी तैयार होगा और गलतियों की संभावना भी कम होगी।

पहली बार पूरी तरह डिजिटल होगी जनगणना, क्या-क्या बदल जाएगा

जनगणना 2027 भारत की पहली पूरी डिजिटल जनगणना होगी। इससे पहले 2011 की जनगणना कागज पर हुई थी, जिसमें डेटा प्रोसेस करने में कई साल लग गए थे। अब गणनाकर्मी मोबाइल ऐप के जरिए सीधे जानकारी अपलोड करेंगे। इससे डेटा तुरंत सर्वर तक पहुँचेगा और सरकार रियल टाइम में निगरानी कर सकेगी।

सरकार ने एक खास डिजिटल सिस्टम तैयार किया है, जिसमें मोबाइल ऐप, ऑनलाइन पोर्टल, GPS मैपिंग और लाइव मॉनिटरिंग जैसी सुविधाएँ शामिल हैं। गणनाकर्मी अगर कोई गलत जानकारी दर्ज करेंगे, जैसे किसी बच्चे की उम्र माता-पिता से ज्यादा लिख देना या परिवार के सदस्यों की संख्या असामान्य होना, तो सिस्टम तुरंत अलर्ट देगा। इससे गलतियाँ कम होंगी।

इस बार GPS और जियोफेंसिंग तकनीक का इस्तेमाल भी होगा। इससे यह पता चलेगा कि कौन-सा इलाका कवर हो चुका है और कौन-सा नहीं। इससे किसी घर या इलाके के छूटने की संभावना कम हो जाएगी।

सरकार ने यह भी कहा है कि डेटा सुरक्षा पर खास ध्यान दिया गया है। लोगों की जानकारी सुरक्षित रखने के लिए मजबूत डिजिटल सुरक्षा व्यवस्था बनाई गई है। ऑनलाइन सेल्फ-एन्यूमरेशन पोर्टल 16 भाषाओं में उपलब्ध होगा, ताकि अलग-अलग राज्यों के लोग आसानी से अपनी जानकारी भर सकें।

सेल्फ-एन्यूमरेशन क्या है और लोग खुद कैसे भर सकेंगे जानकारी

जनगणना 2027 में पहली बार लोगों को खुद अपनी जानकारी भरने की सुविधा मिलेगी। इसे सेल्फ-एन्यूमरेशन कहा गया है। इसके लिए सरकार ने एक ऑनलाइन पोर्टल और मोबाइल आधारित सिस्टम तैयार किया है।

कोई भी व्यक्ति अपने मोबाइल नंबर से लॉगिन करके अपने परिवार की जानकारी खुद भर सकेगा। इस प्रक्रिया में सबसे पहले व्यक्ति पोर्टल पर लॉगिन करेगा, फिर मैप पर अपना स्थान चुनेगा और उसके बाद परिवार और घर से जुड़ी जानकारी भरेगा।

सारी जानकारी जमा करने के बाद उसे एक यूनिक सेल्फ-एन्यूमरेशन ID मिलेगी। जब गणनाकर्मी घर आएँगे, तब केवल इस ID को दिखाना होगा और वे जानकारी सत्यापित कर देंगे।

सरकार का कहना है कि इससे लोगों को सुविधा मिलेगी और समय की बचत होगी। खासकर शहरों में रहने वाले नौकरीपेशा लोग या ऐसे परिवार जो दिन में घर पर नहीं रहते, वे पहले से अपनी जानकारी भर सकेंगे।

हालाँकि, सेल्फ-एन्यूमरेशन पूरी तरह अनिवार्य नहीं है। अगर कोई व्यक्ति ऑनलाइन जानकारी नहीं भरना चाहता, तो गणनाकर्मी पहले की तरह घर-घर जाकर जानकारी दर्ज करेंगे। सरकार का कहना है कि डिजिटल और पारंपरिक दोनों व्यवस्था साथ-साथ चलेंगी ताकि कोई व्यक्ति छूट न जाए।

जनगणना के दौरान लोगों से कौन-कौन से सवाल पूछे जाएँगे

जनगणना 2027 के पहले चरण में कुल 34 सवाल पूछे जाएँगे। ये सवाल मुख्य रूप से मकान, सुविधाओं और घरेलू सामान से जुड़े होंगे। इसमें बिल्डिंग नंबर, घर नंबर, मकान की छत, दीवार और फर्श किस सामग्री से बने हैं, घर की स्थिति कैसी है और उसमें कितने लोग रहते हैं, जैसी जानकारी ली जाएगी।

इसके अलावा घर में कितने कमरे हैं, कितने शादीशुदा जोड़े रहते हैं, पीने का पानी कहाँ से आता है, बिजली की व्यवस्था कैसी है, शौचालय और नहाने की सुविधा है या नहीं ये सवाल भी शामिल हैं। खाना बनाने के लिए LPG, PNG या लकड़ी जैसे किस ईंधन का इस्तेमाल होता है, इसकी भी जानकारी ली जाएगी। इसमें जाति से जुड़ा केवल यह प्रश्न होगा कि घर के मुखिया की जाति क्या है।

फोटो साभार: PIB

घरेलू सुविधाओं से जुड़े सवालों में TV, रेडियो, इंटरनेट, कंप्यूटर, मोबाइल फोन, बाइक, कार जैसी चीजों की जानकारी भी माँगी जाएगी। सरकार यह जानना चाहती है कि देश में कितने लोगों तक आधुनिक सुविधाएँ पहुँच चुकी हैं।

एक दिलचस्प सवाल यह भी होगा कि परिवार मुख्य रूप से कौन-सा अनाज खाता है। इसके साथ मोबाइल नंबर भी दर्ज किया जाएगा ताकि जरूरत पड़ने पर संपर्क किया जा सके। इन सवालों के जरिए सरकार देश के लोगों की जीवनशैली और बुनियादी सुविधाओं की असली तस्वीर समझ पाएगी।

जनगणना से जुड़े पूछे जाने वाले सवाल और उनके जवाब

जनगणना क्या है?

जनगणना यानी देश में रहने वाले हर व्यक्ति और हर घर की गिनती करने की सरकारी प्रक्रिया। इसमें लोगों से नाम, उम्र, शिक्षा, नौकरी, भाषा, परिवार, घर और सुविधाओं जैसी जानकारी ली जाती है।

यह काम सरकार तय समय पर करती है ताकि देश की आबादी, लोगों की स्थिति और जरूरतों का सही आंकड़ा मिल सके। इन आंकड़ों के आधार पर सरकार योजनाएँ बनाती है और लोगों की सुविधा के लिए योजना तैयार करती है। भारत में आमतौर पर हर 10 साल में होती है। पिछली जनगणना 2011 में हुई थी। 2021 में होनी थी लेकिन कोरोना के कारण टल गई।

अगर कोई व्यक्ति गाँव छोड़कर शहर में रहने लगा है, तो जनगणना में उसकी गिनती कहाँ होगी? क्या किराये या झुग्गी में रहने वालों की भी गिनती होगी?

जनगणना में किसी व्यक्ति की गिनती वहीं की जाती है जहाँ वह सामान्य रूप से रह रहा होता है। अगर कोई व्यक्ति गाँव छोड़कर दिल्ली, मुंबई या किसी दूसरे शहर में नौकरी, मजदूरी या पढ़ाई के लिए रह रहा है, तो उसकी गिनती उसी शहर में होगी।

एक व्यक्ति की गिनती सिर्फ एक ही जगह होती है, गाँव और शहर दोनों जगह नहीं। भले ही उसका नाम गाँव के राशन कार्ड या वोटर लिस्ट में हो, फिर भी जनगणना में वही स्थान माना जाएगा जहाँ वह उस समय रह रहा है।

कुछ इस तरह नक्शा बना रहे जनगणना करने वाले

बाहर काम करने वाले मजदूरों, किराये पर रहने वालों और झुग्गी-झोपड़ी में रहने वाले लोगों की भी जनगणना में पूरी गिनती की जाएगी, ताकि कोई भी व्यक्ति छूट न जाए।

बेघर लोगों की गिनती कैसे होगी?

जनगणना में बेघर लोगों की भी अलग से गिनती की जाती है। इसके लिए सरकारी कर्मचारी रात के समय सड़कों, रेलवे स्टेशन, बस अड्डों, फुटपाथों, मंदिरों या खुले स्थानों पर जाकर उन लोगों की जानकारी दर्ज करते हैं, जिनके पास रहने के लिए पक्का घर नहीं होता। इसका मकसद यह सुनिश्चित करना होता है कि कोई भी व्यक्ति जनगणना से छूट न जाए।

क्या इस बार जनगणना मोबाइल ऐप से होगी, क्या आधार जरूरी होगा और इसमें कौन-कौन सी जानकारी पूछी जाएगी?

इस बार जनगणना को डिजिटल तरीके से कराने की तैयारी है। अधिकारी मोबाइल ऐप के जरिए जानकारी दर्ज करेंगे और लोगों को सेल्फ-एन्यूमरेशन यानी खुद अपनी जानकारी भरने का विकल्प भी मिल सकता है।

जनगणना के लिए आधार कार्ड अनिवार्य नहीं है। NRC और जनगणना दोनों अलग प्रक्रियाएँ हैं, क्योंकि जनगणना का मुख्य उद्देश्य आबादी और सामाजिक जानकारी जुटाना होता है, नागरिकता तय करना नहीं।

जनगणना के दौरान धर्म, शिक्षा, नौकरी और परिवार से जुड़ी जानकारी पूछी जा सकती है। घर में कितने कमरे हैं, मकान की स्थिति और सुविधाओं से जुड़े सवाल भी पहले चरण में पूछे जाते हैं। बैंक बैलेंस सीधे नहीं पूछा जाता लेकिन काम-धंधे और जीवन स्तर से जुड़ी जानकारी लिया जाता है।

अगर कोई अपनी जाति नहीं बताना चाहता है तो क्या ये मुमकिन है?

जनगणना में किसी भी नागरिक की जाति बताना अनिवार्य नहीं है। यदि कोई अपनी जाति नहीं बताना चाहता, तो उसे अवर्गीकृत (अनक्लासिफाइड) या जाति-विहीन के रूप में दर्ज किया जा सकता है।

क्या जनगणना का असर आरक्षण पर पड़ेगा?

जनगणना का सीधे तौर पर आरक्षण पर असर नहीं पड़ेगा यानी जो अभी आरक्षण मिल रहा है वही मिलता रहेगा। हालाँकि, जाति आधारित आँकड़े सामने आने से आरक्षण के प्रतिशत और उसकी सीमा में बदलाव की माँग तेज हो सकती है। राजनीतिक दल और आम लोग आरक्षण में बदलाव की माँग कर सकते हैं।

क्या जनगणना के बाद सीटों का परिसीमन होगा?

हाँ, आगामी जनगणना पूरी होने के बाद लोकसभा और विधानसभा सीटों का परिसीमन (Delimitation) किया जाना तय है। संविधान के अनुच्छेद 82 और 170 के अनुसार, हर नई जनगणना के बाद निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं और सीटों के पुनर्गठन के लिए संसद द्वारा परिसीमन अधिनियम पारित किया जाता है। 

दक्षिण भारत में लोग परिसीमन को लेकर क्यों चर्चा कर रहे हैं?

कुछ राज्यों में आबादी नियंत्रण बेहतर रहा है, इसलिए सीटों के बँटवारे को लेकर राजनीतिक चर्चा चल रही है।

क्या जनगणना से सरकारी योजनाएँ तय होती हैं?

हाँ, कई योजनाओं में जनसंख्या से जुड़ी जानकारी और डेटा काम आता है।

क्या जनगणना में गलत जानकारी देने पर कार्रवाई हो सकती है?

हाँ, जनगणना में जानबूझकर गलत जानकारी देना या सही जानकारी छिपाना एक कानूनन अपराध है। जनगणना अधिनियम, 1948 (Census Act 1948) के तहत ऐसा करने वाले व्यक्ति पर जुर्माना लगाया जा सकता है या जेल की सजा भी हो सकती है।

क्या जनगणना का डेटा सार्वजनिक होगा?

व्यक्तिगत जानकारी गोपनीय रखी जाती है, लेकिन कुल आँकड़े जारी किए जाते हैं।

क्या जनगणना में फोन नंबर पूछा जाएगा?

हाँ, संपर्क करने के लिए माँगा जाता है।

क्या विदेश में रहने वाले भारतीयों की गिनती होगी?

हाँ, विदेश में रहने वाले भारतीयों की भी आधिकारिक तौर पर गिनती होती है। विदेश मंत्रालय (MEA) द्वारा जारी प्रवासी भारतीयों की आबादी के आधिकारिक आँकड़ों के अनुसार, दुनिया भर में फैले अनिवासी भारतीयों (NRIs) और भारतीय मूल के लोगों (PIOs) की सटीक संख्या का ट्रैक रखा जाता है। 

अगर कोई छात्र दूसरे शहर में पढ़ रहा है तो उसकी गिनती कहाँ होगी?

जनगणना के नियमों के अनुसार, यदि कोई छात्र पढ़ाई के लिए दूसरे शहर में रह रहा है, तो उसकी गिनती उसी शहर में की जाएगी जहाँ वह वर्तमान में रहकर पढ़ाई कर रहा है। जनगणना में व्यक्ति के ‘सामान्य निवास स्थान’ (जहाँ वह अधिकांश समय रहता है) को आधार माना जाता है।

अगर परिवार का कोई सदस्य बाहर कमाने गया है?

उसकी मौजूदगी और रहने की स्थिति के हिसाब से जानकारी दर्ज होती है।

क्या ऑनलाइन फॉर्म भरने के बाद अधिकारी फिर आएँगे?

हाँ, आएँगे और उन्हें आप वो ID नंबर देंगे जिस के जरिए आप ने जानकारी भारी है। जिसका वो मिलान करेंगे।    

क्या जनगणना में भाषा भी पूछी जाएगी?

हाँ, जनगणना में भाषा संबंधी जानकारी मुख्य रूप से पूछी जाएगी। जनगणना फॉर्म में आपसे आपकी मातृभाषा के साथ-साथ अन्य ज्ञात भाषाओं (जिन भाषाओं को आप बोल, समझ या लिख सकते हैं) का विवरण भी लिया जाएगा।

क्या जनगणना से पता चलेगा कि किस जाति की आबादी कितनी है?

हाँ, आने वाली राष्ट्रीय जनगणना से यह पता चल जाएगा कि किस जाति की आबादी कितनी है। केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित आगामी जनगणना में जातिगत गणना (Caste Census) को शामिल किया गया है।

क्या पहली बार जाति गणना हो रही है?

नहीं, जाति गणना पहली बार नहीं हो रही है। ब्रिटिश शासनकाल के दौरान 1931 में देश में अंतिम बार विस्तृत जाति आधारित जनगणना जारी की गई थी। इसके बाद, आजादी के बाद स्वतंत्र भारत में पहली बार पूर्ण जाति आधारित जनगणना की जा रही है।

ब्रिटिश शासन के दौरान 1881 से 1931 तक जनगणना में जाति गणना एक नियमित प्रक्रिया थी जबकि वर्ष 1941 की जनगणना में भी जातिगत जानकारी एकत्र की गई थी। हालाँकि, द्वितीय विश्व युद्ध शुरू होने के कारण इसे प्रकाशित नहीं किया गया।

वर्ष 1951 की जनगणना से लेकर अब तक जाति गणना केवल SC और ST के लिए की जाती रही है, जिससे अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) तथा अन्य जाति समूहों पर कोई विश्वसनीय डेटा उपलब्ध नहीं है।

क्या हर राज्य में एक साथ जनगणना होगी?

नहीं, हर राज्य में जनगणना एक ही समय पर पूरी तरह से एक साथ नहीं होती भारत की जनगणना 2026-27 दो चरणों में हो रही है, जिसे राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों द्वारा अधिसूचित 30 दिनों की अवधि के अंदर किया जाता है।

क्या जनगणना में लोगों को उनके काम या पेशे के आधार पर अलग-अलग श्रेणियों में रखा जाता है, जैसे आम नागरिक, सेना के जवान, डॉक्टर, शिक्षक आदि?

हाँ, भारतीय जनगणना में लोगों को उनके काम और पेशे (आक्यूपेशन) के आधार पर अलग-अलग कैटेगरी में बाँटा जाता है। जनगणना के दौरान लोगों से उनके काम (जैसे टीचर, डॉक्टर, सेना आदि) के बारे में जानकारी एकत्र की जाती है

अगर कोई व्यक्ति गाँव में वोटर है लेकिन शहर में नौकरी करता है तो गिनती कहाँ होगी?

अगर कोई व्यक्ति गाँव में वोटर है लेकिन नौकरी या पढ़ाई के कारण शहर में रह रहा है, तो जनगणना में उसकी गिनती वहीं होगी जहाँ वह सामान्य रूप से रह रहा है। यानी जिस जगह वह ज्यादातर समय बिताता है, उसी स्थान की आबादी में उसे शामिल किया जाएगा।

अगर कोई व्यक्ति जनगणना अधिकारी बनकर घर आए, तो असली और नकली अधिकारी की पहचान कैसे करें?

अगर कोई व्यक्ति जनगणना के नाम पर घर आए, तो सबसे पहले उसका सरकारी ID कार्ड और नियुक्ति पत्र जरूर देखें। असली अधिकारी के पास सरकारी पहचान पत्र, मोहर और अक्सर जनगणना/NPR वाली जैकेट या कैप होती है।

ध्यान रखें कि जनगणना में सिर्फ सामान्य जानकारी पूछी जाती है, जैसे परिवार, उम्र और घर से जुड़े सवाल। अगर कोई बैंक डिटेल, ATM PIN या पासवर्ड माँगे, तो तुरंत सतर्क हो जाएँ। शक होने पर नजदीकी पुलिस या 112 नंबर पर सूचना दें।

क्या जनगणना से बेरोजगारी का अंदाजा लगेगा?

हाँ, जनगणना में लोगों के कामकाज और रोजगार से जुड़े सवाल पूछे जाते हैं। इससे यह पता लगाने में मदद मिलती है कि कितने लोग नौकरी कर रहे हैं, कितने बेरोजगार हैं और कितने लोग किस तरह के काम में लगे हुए हैं। इन आँकड़ों के आधार पर सरकार देश में रोजगार और बेरोजगारी की स्थिति का अंदाजा लगाती है।

क्या वोटर आईडी का पता ही माना जाएगा और बिना दस्तावेज वाले लोगों की भी गिनती होगी?

जनगणना में सिर्फ वोटर आईडी या किसी एक दस्तावेज का पता ही अंतिम नहीं माना जाता, बल्कि व्यक्ति वास्तव में जहाँ रह रहा होता है उसे ज्यादा महत्व दिया जाता है। अगर कोई व्यक्ति साल का कुछ समय गाँव और कुछ समय शहर में बिताता है, तो आमतौर पर जनगणना के समय वह जहाँ रह रहा होगा, उसी जगह उसकी गिनती की जाती है।

किरायेदार और मकान मालिक दोनों की अलग-अलग गिनती होती है, क्योंकि घर में रहने वाले हर व्यक्ति को शामिल किया जाता है। वहीं अगर किसी के पास आधार, राशन कार्ड या वोटर आईडी जैसे दस्तावेज नहीं भी हैं, तब भी उसकी जनगणना में गिनती हो सकती है, क्योंकि इसका मुख्य उद्देश्य देश की पूरी आबादी का रिकॉर्ड तैयार करना होता है।

क्या PG और हॉस्टल में रहने वालों की अलग सूची बनेगी?

हाँ, आमतौर पर PG, हॉस्टल, छात्रावास, धर्मशाला, जेल, सेना कैंप, वृद्धाश्रम जैसी जगहों पर रहने वालों की अलग तरीके से गिनती की जाती है। जनगणना में इन्हें अक्सर संस्थागत परिवार (Institutional Household) की श्रेणी में रखा जाता है। यानी ऐसे लोग जो किसी सामान्य परिवार की तरह घर में नहीं, बल्कि किसी संस्था या सामूहिक जगह पर रह रहे हों।

अगर जनगणना के समय घर बंद मिला या कोई जानकारी देने से मना कर दे तो क्या होगा?

अगर जनगणना कर्मचारी जब घर पहुँचे और उस समय घर बंद मिले, तो आमतौर पर बाद में दोबारा आने की कोशिश की जाती है ताकि सही जानकारी दर्ज हो सके। वहीं अगर कोई व्यक्ति जानकारी देने से मना करता है।

तो कर्मचारी उसे समझाने की कोशिश करते हैं कि जनगणना एक राष्ट्रीय प्रक्रिया है और इसका मकसद सिर्फ देश की आबादी, सुविधाओं और सामाजिक स्थिति से जुड़ा डेटा जुटाना होता है। इसलिए लोगों से सही जानकारी देकर सहयोग करने की अपील की जाती है।

क्या जनगणना में जनजातीय इलाकों और LGBTQ समुदाय के लिए अलग व्यवस्था हो सकती है?

हाँ, जनगणना के दौरान दूरदराज, पहाड़ी और जनजातीय इलाकों तक पहुँचने के लिए विशेष टीमें और अलग व्यवस्था की जाती है ताकि वहाँ रहने वाले लोगों की गिनती छूटे नहीं। कई बार स्थानीय भाषा और इलाके को समझने वाले कर्मचारियों की भी मदद ली जाती है।

वहीं LGBTQ समुदाय को लेकर भी लोगों के मन में सवाल हैं। पहले की जनगणना में थर्ड जेंडर का विकल्प जोड़ा जा चुका है, इसलिए इस बार भी ट्रांसजेंडर और अन्य लैंगिक पहचान रखने वाले लोगों की अलग पहचान दर्ज की जा सकती है, ताकि उनकी आबादी और सामाजिक स्थिति से जुड़ा सही डेटा सामने आ सके।

सड़कों पर नमाज बंद और सार्वजनिक जगहों पर कुर्बानी पर प्रतिबंध: बकरीद पर देशभर में सुरक्षा के कड़े इंतजाम, जानिए किस राज्य ने क्या व्यवस्था की

बकरीद को देखते हुए देश के अलग-अलग राज्यों में सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए हैं। स्थिति देखते हुए कहीं पर सड़कों पर नमाज पढ़ने से साफ मना किया गया है, कहीं खुले में कु्र्बानी देने से मना किया गया है तो कहीं पर पहले ही दंगा नियंत्रण बल की तैनाती कर दी गई है।

ये तैयारी सामान्य त्योहारों की तैयारी से इसलिए भी अलग है, क्योंकि कई बार इस त्योहार को मनाने के नाम पर देश की बहुसंख्यक आबादी की भावनाएँ आहत करने का काम होता है। ऐसे में सार्वजनिक व्यवस्था, सामाजिक सौहार्द, कानून-व्यवस्था और स्वच्छता को बनाए रखना किसी भी सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती है। यही कारण है कि त्योहार से पहले प्रशासन को कई कड़े नियम लागू करने पड़ते हैं और सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम करने होते हैं।

बकरीद के दिन दिल्ली से लेकर यूपी और बिहार से लेकर बंगाल-असम तक में सुरक्षाबल की तैनाती की गई है। कहाँ-क्या व्यवस्था है और सरकार ने क्या निर्देश दिए हैं आइए जानते हैं-

बंगाल में कुर्बानी और नमाज को लेकर सख्ती

बकरीद पर बंगाल इस बार काफी बदला नजर आ रहा है। शुभेंदु सरकार के 1950 के पशु वध नियंत्रण अधिनियम को सख्ती से लागू करने के बाद सार्वजनिक स्थानों पर कुर्बानी देने पर सख्त मनाही है। तय बुचड़खानों में ही पशुओं को काटा जा सकता है।

सड़क किनारे या सार्वजनिक स्थानों पर नहीं। सड़कों पर नमाज नहीं पढ़ने को लेकर पहले ही आदेश जारी किया जा चुका है। यहाँ तक कि कोलकात केरेड रोड पर होने वाला नमाज भी इस बार नहीं होगा। इसकी जगह बदल दी गई है। ये वही जगह है, जहाँ पूर्व सीएम ममता बनर्जी 2011 से हर साल बकरीद में आया करती थी और अपने वोट बैंक को संबोधित करती थी। इस बार वह ऐसा नहीं कर पाएँगी।

असम में बकरीद पर व्यवस्था

असम सरकार ने बकरीद पर कानून-व्यवस्था बनाए रखने, सांप्रदायिक सौहार्द सुनिश्चित करने और मवेशियों की सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए हैं। राज्य में गाय की कुर्बानी पर सख्त रोक है। असम कैटल प्रिजर्वेशन एक्ट 2021 में गाय और प्रतिबंधित मवेशियों की कुर्बानी पर रोक लगा दिया गया था। इसको देखते हुए कई ईदगाह कमिटियों ने आगे आकर गाय की कुर्बानी नहीं करने का आग्रह किया है। राज्य में भारी संख्या में पुलिस बल तैनात है। मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने ईदगाह समितियों के इस फैसले का स्वागत किया है और मुस्लिम समुदाय से मौजूदा कानूनों का पालन करने और शांतिपूर्ण तरीके से त्योहार मनाने की अपील की है।

उत्तर प्रदेश में बकरीद पर नजारा

उत्तर प्रदेश सरकार ने बकरीद पर शांति, सुरक्षा और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए सख्त दिशानिर्देश जारी किए हैं। व्यापक इंतजाम किए हैं।योगी सरकार ने पहले ही सड़कों पर नमाज पढ़ने पर रोक लगा दी गई है। जगह तय किए गए हैं, वहीं नमाज अता किए जाएँगे। सार्वजनिक स्थानों पर कुर्बानी देने की भी मनाही है। गोवंश और दूसरे प्रतिबंधित पशुओं की कुर्बानी नहीं दी जा सकती है। कुर्बानी के बाद बुचड़खानों की साफ-सफाई की पुख्ता व्यवस्था करने के निर्देश भी दिए गए हैं, ताकि गंदगी न फैले।

दिल्ली में बकरीद पर व्यवस्थाएँ

बकरा ईद पर सुरक्षा व्यवस्था को चाक-चौबंद करने के लिए दिल्ली पुलिस के जवानों के साथ-साथ पैरामिलिट्री फोर्सेस को भी ग्राउंड पर उतारा गया है। दरअसल हाल ही में भारत-अफ्रीका फोरम समिट के टलने के कारण राजधानी में तैनात की गई पैरामिलिट्री फोर्सेस की 60 कंपनियों को अब दिल्ली के अलग-अलग जिलों में सुरक्षा के मद्देनजर सुरक्षा ड्यूटी पर तैनात किया गया है। विशेषकर उन इलाकों में अतिरिक्त सुरक्षा बल भेजे गए हैं, जो सांप्रदायिक या धार्मिक रूप से बेहद संवेदनशील माने जाते हैं।

जम्मू कश्मीर में बकरीद पर सुरक्षा व्यवस्था

जम्मू-कश्मीर में बकरीद के दौरान शांति और कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए सुरक्षा के बेहद कड़े और व्यापक इंतजाम किए गए हैं। प्रमुख मस्जिदों, संवेदनशील इलाकों और बाजारों में अतिरिक्त पुलिस और अर्धसैनिक बलों की तैनाती की गई है ताकि पर्व शांतिपूर्ण तरीके से संपन्न हो सके।ईदगाहों और हजरतबल दरगाह, जामिया मस्जिद जैसे जगहों के आसपास सुरक्षा का विशेष घेरा बनाया गया है, ताकि नमाजियों को कोई असुविधा न हो।

महाराष्ट्र- बिहार में सुरक्षा इंतजाम

महाराष्ट्र में जगह जगह पर पुलिस तैनात हैं, ताकि कोई अप्रिय घटना न हो, वही बिहार में पुलिस हाई अलर्ट पर है। दंगा नियंत्रण बल के जवानों को भी तैनात किया गया है। ड्रोन से निगरानी की जा रही है और सोशल मीडिया पर नजर रखी जा रही है। अधिकारियों ने असामाजिक तत्वों से निपटने के लिए सख्त इंतजाम कर लिए हैं।

ममता बनर्जी का बंगाल था कैसा, कोई रंजीता प्रमाणिक से पूछे: एसिड अटैक में जल गया पूरा शरीर, व्हीलचेयर पर सिमटी जिंदगी, सत्ता बदलने के बाद भी घर लौटने में लग रहा डर

पश्चिम बंगाल में अब भाजपा की सरकार बन गई है। ममता बनर्जी की सत्ता को लोगों ने उखाड़ फेंका है और BJP को बंपर सीटें मिली हैं। BJP की इस जीत के पीछे जो सबसे बड़ा कारण माना जाता है वो TMC के कार्यकर्ताओं-नेताओं की गुंडागर्दी थी जिससे लोग डरे हुए थे। ये डर बेजा नहीं था और भाजपा महिला मोर्चा की सक्रिय कार्यकर्ता रहीं रंजीता प्रमाणिक इस डर की मिसाल हैं।

रंजीता को अपनी और परिवार की जान बचाने के लिए 2021 में रातों-रात कोलकाता छोड़ना पड़ा था। गुंडई का वो दौर कैसा रहा होगा उसका अंदाजा आप इस बात से भी लगा सकते हैं कि रंजीता और उनका परिवार अब भी कोलकाता लौटने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा है।

दैनिक भास्कर के साथ बातचीत में रंजीता ने अपने साथ हुई प्रताड़ना की पूरी कहानी बताई है। रंजीता बताती हैं कि 2015-16 के आसपास वह भाजपा महिला मोर्चा से जुड़ी जबकि भाई रंजन हिंदूवादी संगठनों के साथ सक्रिय होने लगे। वह बताती हैं कि शुरुआत में सब सामान्य था लेकिन जैसे-जैसे पश्चिम बंगाल की राजनीति गर्माने लगी, वैसे-वैसे उनके लिए हालात बदलते गए।

तेजाब अटैक से लेकर रेप की धमकियों तक

रंजीता बताती हैं कि BJP के साथ सक्रिय रूप से जुड़ने के बाद उन्हें रास्ते में रोकना, गंदे कमेंट करना, छेड़खानी और घर पर पत्थर फेंकने जैसी घटनाएँ शुरू हो गईं। शुरुआत में परिवार ने इन घटनाओं को नजरअंदाज कर दिया लेकिन जैस 2021 विधानसभा चुनाव के दौरान हालात और तनावपूर्ण हो गए।

रंजीता का कहना है कि चुनाव के बाद उन्हें लगातार धमकियाँ मिलने लगीं। एकादशी के दिन जब वह गो-माता को खाना खिलाने बाहर गईं, तभी उन पर तेजाब से हमला हुआ। झुक जाने की वजह से उनका चेहरा बच गया लेकिन शरीर का निचला हिस्सा बुरी तरह जल गया। समय के साथ हालत और बिगड़ती गई, शरीर सिकुड़ने लगा और चलना-फिरना मुश्किल हो गया। वह अब भी व्हील चेयर पर ही रहती हैं।

परिवार का आरोप है कि कोर्ट तक मामला पहुँचने के बाद भी हमलावर उन्हें केस वापस लेने की धमकी देते रहे। रंजीता कहती हैं, “हमला करने वाले बोले- केस वापस लो, नहीं तो तुम्हारी माँ का रेप कर देंगे। पूरे परिवार को जिंदा जला देंगे।” डर के कारण परिवार ने मामला वापस ले लिया। रंजीता के पिता रबिन प्रमाणिक का कहना है कि चुनाव के बाद धमकियाँ इतनी बढ़ गईं कि उन्हें पीढ़ियों पुराना घर और काम छोड़कर रातों-रात कोलकाता से भागना पड़ा।

कोलकाता छोड़ने के बाद परिवार सबसे पहले जयपुर पहुँचा और वहाँ रंजीता का इलाज हुआ। उनके पैर तक टेढ़े हो गए थे जिन्हें डॉक्टरों ने रॉड डालकर सीधा किया। इसके बाद परिवार की जमा पूँजी खत्म होने लगी तो परिवार अपनी जिंदगी बिताने के लिए काशी पहुँच गया। वहाँ जाकर रामकृष्ण मिशन और कई आयुर्वेदिक संस्थानों में इलाज कराया। वे बताती हैं कि कई संतों और धार्मिक संस्थाओं ने भी कठिन समय में उनका साथ दिया।

वाराणसी में जिला अस्पताल में भर्ती रहने के दौरान भी उनकी स्थानीय लोगों ने खूब मदद की थी। समाजसेवियों ने इलाज के लिए पैसे इकट्ठा किए और इलाज में जो मदद संभव थी वो सब की गई। वहाँ भर्ती रहने के दौरान रंजीता ने बताया था कि कोरोना काल में जॉब चले जाने के बाद हम लोग मदद माँगने के लिए पहुँचे तो कहा गया कि तुम लोग BJP कार्यकर्ता हो बीजेपी वालों से जाकर मदद माँग और इसके बाद हम लोगों को प्रताड़ित किया जाने लगा।

भोपाल में रह रहा परिवार, कोलकाता लौटने का डर बरकरार

कई शहरों में भटकने के बाद परिवार भोपाल पहुँचा जहाँ कुछ स्थानीय लोगों और बजरंग दल कार्यकर्ताओं ने उनकी मदद की। परिवार को आधार-वोटर कार्ड, राशन और रहने की जरूरी चीजें मिलीं। मध्य प्रदेश में आने पर मंत्री विश्वास सारंग ने भी रंजीता प्रमाणिक से मुलाकात की थी और उन्हें सारी मदद का भरोसा दिया था।

विश्वास सारंग ने X पर एक पोस्ट में लिखा था, “अपना घर-आँगन और अपनी मिट्टी छोड़कर पश्चिम बंगाल से पलायन होकर भोपाल पहुँची हिंदू बेटी रंजीता प्रमाणिक की व्यथा सुनकर हृदय व्यथित हो उठता है। हिंदू बेटी रंजीता की आँखों में छिपा भय, उसके टूटे सपनों की कसक और असुरक्षा की छाया हमारी अंतरात्मा को झकझोर देती है।”

उन्होंने लिखा था, “आज वह नरेला विधानसभा में अपने परिवार सहित सुरक्षित है। अब बेटी और उसके परिवार का भविष्य, सुरक्षा और मुस्कान हम सबकी सामूहिक जिम्मेदारी है। बेटी के आँखों के आँसू मिटाना, उसके सपनों को नई उड़ान देना और उसे सम्मान व सुरक्षा का वातावरण देना ही हमारा संकल्प है।”

इस पोस्ट के साथ सारंग ने एक वीडियो भी पोस्ट किया था जिसमें रंजीता अपनी प्रताड़ना की कहानी बता रही थीं। उन्होंने बताया था, “ममता बनर्जी के, TMC के गुंडों ने हमारे ऊपर अत्याचार किया। जिहादियों ने मेरे ऊपर तेजाब डाल दिया था।”

आज वे एक छोटे किराए के कमरे में रहते हैं लेकिन आर्थिक हालत इतनी खराब है कि दवाइयों का खर्च उठाना भी मुश्किल हो जाता है। रंजीता के पिता रबिन प्रमाणिक कहते हैं कि कोलकाता में उनका घर और काम था लेकिन अब बेटी के इलाज के लिए मदद माँगनी पड़ती है। वहीं, रंजीता के भाई रंजन का आरोप है कि हिंदूवादी संगठनों से जुड़े होने के कारण कोविड काल में उन्हें खंभे से बाँधकर पीटा गया और धमकियाँ दी गईं।

परिवार का कहना है कि लगातार डर और प्रताड़ना के कारण उन्हें अपना शहर छोड़ना पड़ा। अब भोपाल में नई जिंदगी शुरू करने की कोशिश हो रही है लेकिन पुराने डर अब भी बने हुए हैं। रंजीता कहती हैं कि उन्हें पश्चिम बंगाल लौटने से डर लगता है और अब वापस जाने की हिम्मत नहीं है।

रंजीता की माँ बताती हैं कि उनकी बेटी आज भी रात में डरकर उठ जाती है और कई बार पुरानी बातें याद कर रोने लगती है। वहीं, रंजीता कहती हैं कि अब वहाँ जाने से डर लगता है। उन्होंने कहा, “ऐसा लगता है मार देंगे। परिवार अब पश्चिम बंगाल लौटना नहीं चाहता। BJP की सरकार बनने के बाद भी उनमें वापस लौटने की हिम्मत नहीं है।”

1768962 ने दी 12वीं की परीक्षा, 404319 ने माँगी आंसर शीट की स्कैन कॉपी, ब्लर कॉपीज में मनमर्जी से दिए नंबर: जानिए CBSE के OSM सिस्टम पर हर चौथे छात्र को क्यों है डाउट

साल 2026 की कक्षा 12वीं के नतीजों के बाद CBSE भारी विवादों में घिर गया है। इस बार बोर्ड का पास प्रतिशत 88.39 से गिरकर 85.29 पर आ गया है। साथ ही 90% से अधिक नंबर लाने वाले छात्र भी 16% कम हो गए हैं। इस गिरावट की बड़ी वजह पहली बार लागू हुआ डिजिटल मूल्यांकन यानी ‘ऑन-स्क्रीन मार्किंग’ (OSM) सिस्टम है।

रिजल्ट में गड़बड़ी के कारण देश में पहली बार हर चौथे छात्र ने अपनी कॉपी की स्कैन प्रति माँगी है। इस बड़े बदलाव से छात्र और अभिभावक बेहद परेशान हैं। सबके मन में सवाल है कि क्या अब कॉपियाँ जाँचने का पारंपरिक तरीका खत्म हो गया है। लोग यह भी सोच रहे हैं कि क्या अब शिक्षकों की जगह कंप्यूटर और AI बच्चों का भविष्य तय करेंगे। इस पूरी व्यवस्था को लेकर स्कूलों और सोशल मीडिया पर तरह-तरह की चिंताएँ और अफवाहें तैर रही हैं।

कॉपियों की री-चेकिंग के लिए उमड़ा छात्रों का सैलाब, माँगी कॉपी

13 मई को CBSE का रिजल्ट आते ही देश भर में हड़कंप मच गया। बच्चों के नंबर उम्मीद के मुताबिक नहीं आए थे। छात्रों का आरोप है कि डिजिटल चेकिंग के कारण कॉपियाँ बहुत सख्ती से जाँची गईं। कंप्यूटर स्क्रीन पर देखने की वजह से शिक्षकों से बड़ी चूक हुई। कुछ छात्रों ने कॉपियों की अदला-बदली की भी शिकायत की।

छात्रों के गुस्से को देखते हुए बोर्ड ने कॉपियों की स्कैन कॉपी मँगाने की फीस 700 रुपए से घटाकर सिर्फ 100 रुपए कर दी। इसके बाद 19 मई को पोर्टल खुलते ही शुरुआती तीन घंटे में 1.26 लाख से ज्यादा आवेदन आ गए। इस भारी लोड से CBSE का सर्वर और पेमेंट गेटवे क्रैश हो गया।

इस वजह से आवेदन की तारीख को बढ़ाकर 25 मई करना पड़ा। बोर्ड के अनुसार, परीक्षा में बैठे कुल 17,68,962 छात्रों में से 4,04,319 (यानी लगभग 23 प्रतिशत) छात्रों ने अपनी आंसर शीट की स्कैन कॉपी माँगी है। इन छात्रों ने कुल 11,31,961 कॉपियों के लिए आवेदन किया है। इनमें से 8,98,214 कॉपियाँ मंगलवार (26 मई 2026) शाम तक छात्रों को ऑनलाइन भेजी जा चुकी थीं। पिछले साल की तुलना में इस बार कॉपियों की माँग 4 गुना ज्यादा बढ़ गई है।

छात्रों ने लगाए धुंधली तस्वीरें और गायब पन्नों के गंभीर आरोप

जिन भाग्यशाली छात्रों को शुरुआती चरण में अपनी कॉपियों की स्कैन प्रतियाँ मिल चुकी हैं, उन्होंने CBSE के दावों की पोल खोलते हुए बेहद गंभीर विसंगतियाँ उजागर की हैं। ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की रिपोर्ट के मुताबिक, कई छात्रों ने शिकायत दर्ज कराई है कि उन्हें जो डिजिटल कॉपियाँ भेजी गई हैं, उनकी तस्वीरें बेहद धुंधली (Blurred) हैं और उन्हें पढ़ना नामुमकिन है। कुछ छात्रों की कॉपियों से महत्वपूर्ण पन्ने ही गायब हैं, जिससे उनके लिखे हुए जवाबों का मूल्यांकन ही नहीं हो पाया।

सबसे हैरान करने वाला और सनसनीखेज मामला तब सामने आया जब कुछ छात्रों को अपनी जगह किसी दूसरे ही छात्र की आंसर शीट थमा दी गई। इसके अलावा फीस भुगतान के दौरान तकनीकी खराबी के चलते कई छात्रों के खातों से डबल पैसे कट गए तो कुछ के कम कटे, जिसके लिए बोर्ड को अब IIT कानपुर, IIT मद्रास और चार बड़े सरकारी बैंकों की मदद लेनी पड़ रही है।

हालाँकि, CBSE और शिक्षा मंत्रालय ने इस पूरे डिजिटल सिस्टम का पुरजोर बचाव किया है। CBSE के चेयरमैन राहुल सिंह का कहना है कि यह नया OSM सिस्टम पूरी तरह पारदर्शी, सुरक्षित और मानवीय गलतियों से मुक्त है। उन्होंने बताया कि इस बार कुल 98 लाख कॉपियों में से केवल 13,000 कॉपियाँ ऐसी थीं जो धुंधली होने के कारण कंप्यूटर पर पढ़ी नहीं जा सकती थीं और उन्हें तुरंत रिजेक्ट करके पारंपरिक मैन्युअल तरीके से जाँचा गया।

बोर्ड का दावा है कि कंप्यूटर स्क्रीन पर कॉपी जाँचने से शिक्षकों का क्लेरिकल काम (जैसे नंबरों को जोड़ना, टोटल को आगे बढ़ाना और पोर्टल पर अपलोड करना) पूरी तरह खत्म हो गया है और वे बिना किसी गलती के शांति से मूल्यांकन कर पाए हैं। धुंधली कॉपियों के आरोपों पर बोर्ड ने कहा कि कॉपियों को तीन स्तरों के क्वालिटी चेक से गुजारा गया था और छात्रों की शिकायतों का निपटारा री-इवैल्युएशन पोर्टल के माध्यम से पूरी तरह किया जाएगा।

परीक्षा हॉल में AI की एंट्री: क्या अब शिक्षकों की छुट्टी होने वाली है?

इस पूरे डिजिटल विवाद के बीच एक और बड़ी खबर ने पैरेंट्स और शिक्षकों की नींद उड़ा दी है। CBSE अब चुनिंदा स्कूलों में AI आधारित असेसमेंट टूल्स का पायलट प्रोजेक्ट यानी परीक्षण कर रहा है। इंटरनेट और सोशल मीडिया पर यह अफवाह तेजी से फैल गई है कि अब बोर्ड परीक्षाओं की कॉपियां जाँचने के लिए इंसानी टीचरों की जरूरत ही नहीं बचेगी और AI ही बच्चों को पास या फेल करेगा।

लेकिन सच इससे बिल्कुल अलग है। CBSE ने साफ किया है कि AI का इस्तेमाल शिक्षकों को रिप्लेस करने या उनकी नौकरी छीनने के लिए नहीं, बल्कि उनकी मदद के लिए किया जा रहा है। इस समय AI टूल्स का परीक्षण मुख्य रूप से लंबे निबंधों की बनावट, प्रोजेक्ट्स की मौलिकता और छात्रों के अंग्रेजी बोलने के तौर-तरीकों (उच्चारण और प्रवाह) को अधिक सटीक और निष्पक्ष बनाने के लिए किया जा रहा है।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 के तहत भारतीय शिक्षा व्यवस्था को रट्टा मार प्रणाली से हटाकर व्यावहारिक ज्ञान पर ले जाने का लक्ष्य रखा गया है। AI का काम केवल यह देखना होगा कि छात्र ने व्याकरण, वाक्य संरचना या स्पेलिंग की कोई बुनियादी गलती तो नहीं की है, जिससे शिक्षकों का समय बचे और वे छात्र की रचनात्मकता और सोचने की क्षमता को बेहतर ढंग से परख सकें। ग्रामीण इलाकों में इंटरनेट और कंप्यूटर लैब्स की भारी कमी के कारण भारत में पूरी तरह से AI आधारित कॉपियों की जाँच फिलहाल निकट भविष्य में मुमकिन नहीं है।

क्या है यह ऑन-स्क्रीन मार्किंग (OSM) तकनीक और कैसे काम करता है नया सिस्टम?

CBSE ने इस साल कक्षा 12वीं की कॉपियों को जाँचने के लिए जिस ऑन-स्क्रीन मार्किंग यानी OSM सिस्टम को लागू किया है, वह पूरी तरह से एक डिजिटल मूल्यांकन प्रणाली है। इस नए सिस्टम के तहत छात्रों को परीक्षा हॉल में पेन और पेपर से ही पारंपरिक तरीके से एग्जाम लिखना होता है। परीक्षा खत्म होने के बाद इन सभी उत्तर पुस्तिकाओं को देश भर के परीक्षा केंद्रों से सुरक्षित तरीके से CBSE के संबंधित क्षेत्रीय कार्यालयों (Regional Offices) में भेजा जाता है।

वहाँ कॉपियों की गोपनीयता बनाए रखने के लिए उन पर एक सीक्रेट बारकोड लगाया जाता है। इसके बाद विशेष रूप से डिजाइन किए गए आधुनिक ‘लैंप और बुक स्कैनर्स’ की मदद से पूरी कॉपी को हूबहू स्कैन किया जाता है। इन स्कैनर्स की खासियत यह होती है कि कॉपी को स्कैन करने के लिए उसकी बाइंडिंग या सिलाई को काटने की बिल्कुल जरूरत नहीं पड़ती।

स्कैन होने के बाद इन उत्तर पुस्तिकाओं की डिजिटल कॉपियों को CBSE के एक सुरक्षित मूल्यांकन पोर्टल पर अपलोड कर दिया जाता है। इसके बाद बोर्ड से जुड़े देश भर के प्रमाणित शिक्षकों को उनके व्यक्तिगत लॉगिन क्रेडेंशियल (ID और पासवर्ड) दिए जाते हैं।

शिक्षक अपने घर या स्कूल में कंप्यूटर स्क्रीन के सामने बैठकर माउस की मदद से इन स्कैन की गई कॉपियों को चेक करते हैं। कंप्यूटर स्क्रीन पर ही कॉपियों को जाँचने के लिए शिक्षकों को डिजिटल मार्किंग स्कीम और विभिन्न प्रकार के टूल्स उपलब्ध कराए जाते हैं। शिक्षक हर प्रश्न के सामने उसके नंबर कंप्यूटर में दर्ज करते जाते हैं और पूरा पेपर चेक होने के बाद कंप्यूटर का सिस्टम खुद-ब-खुद सारे नंबरों को बिना किसी गलती के जोड़ देता है।

9 घंटे बिजली, 27% शॉर्टफॉल और ‘कटिया मॉडल’ की सरकारी व्यवस्था: आँकड़े ही बताते हैं अखिलेश राज की बदहाल बिजली व्यवस्था की कहानी

उत्तर प्रदेश में भीषण गर्मी के बीच बिजली को लेकर एक बार फिर सियासत तेज है। विपक्षी दल राज्य में बिजली संकट होने का दावा कर रहे हैं और कह रहे हैं कि लोग नाराज हैं। समाजवादी पार्टी प्रमुख और प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने भी कथित बिजली संकट को लेकर सरकार को घेरने की कोशिश की। साथ ही, उन्होंने यह दावा भी किया कि उनके शासनकाल में बिजली व्यवस्था कहीं बेहतर थी।

लेकिन क्या वास्तव में ऐसा था? क्या उत्तर प्रदेश में बिजली व्यवस्था कभी इतनी सुचारु थी कि आज की परिस्थितियों की तुलना उससे की जा सके? इन सवालों के जवाब तलाशने पर एक ऐसी तस्वीर सामने आती है जिसमें बिजली संकट, बिजली चोरी, ट्रांसफॉर्मर फुंकने, घंटों की कटौती, VIP जिलों को विशेष सप्लाई और बिजली विभाग की बदहाल आर्थिक स्थिति जैसे कई पहलू शामिल हैं। इसी बहस के बीच अचानक साल 2013 में आई एक चर्चित डॉक्यूमेंट्री की याद भी ताजा हो जाती है- कटियाबाज।

कानपुर के बिजली संकट पर बनी थी ‘कटियाबाज’

साल 2013 में रिलीज हुई डॉक्यूमेंट्री ‘कटियाबाज’ का निर्देशन फहद मुस्तफा और दीप्ति कक्कड़ ने किया था। यह फिल्म कानपुर के बिजली संकट, बिजली चोरी और उससे जुड़े सामाजिक-राजनीतिक समीकरणों पर आधारित थी। कहानी कानपुर को बिजली देने वाली सरकारी कंपनी KESCO और उसकी तत्कालीन प्रबंध निदेशक ऋतु माहेश्वरी के इर्द-गिर्द भी घूमती है।

इस डॉक्यूमेंट्री में सिर्फ बिजली चोरी नहीं दिखाई गई थी बल्कि बिजली विभाग पर भ्रष्टाचार के आरोप, भीषण गर्मी में परेशान जनता का गुस्सा, बिजली न आने की स्थिति और पूरे सिस्टम की अक्षमता को भी विस्तार से दिखाया गया था। ‘कटियाबाज’ को 2013 में राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार में सर्वश्रेष्ठ इन्वेस्टिगेटिव फिल्म का पुरस्कार भी मिला था।

क्या अखिलेश यादव के दौर में सचमुच बेहतर थी बिजली व्यवस्था?

उत्तर प्रदेश की बिजली व्यवस्था को लेकर पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के दावों की पड़ताल करने पर सबसे पहले सवाल बिजली आपूर्ति के घंटों पर उठता है। अगर आप उत्तर प्रदेश से आते हैं, तो संभव है कि आपको वह दौर याद हो जब इटावा, मैनपुरी, अमेठी और रायबरेली जैसे जिलों को ‘VIP जिला’ कहा जाता था। आरोप लगते थे कि इन इलाकों में अधिक बिजली दी जाती थी जबकि बाकी प्रदेश घंटों अंधेरे में रहता था।

उत्तर प्रदेश सरकार में ऊर्जा मंत्री रहे श्रीकांत शर्मा ने साल 2021 में दावा किया था कि अखिलेश यादव सरकार के दौरान ग्रामीण क्षेत्रों में औसतन 12 घंटे बिजली आपूर्ति होती थी। हालाँकि, यह आँकड़ा भी स्थिर नहीं था क्योंकि कई जगह ट्रांसफॉर्मर फुंक जाने, लाइन टूटने या स्थानीय तकनीकी खराबियों के चलते बिजली सप्लाई और भी कम हो जाती थी।

अगर कोई यह तर्क दे कि श्रीकांत शर्मा भाजपा के विधायक थे और इसलिए विपक्षी सरकार की आलोचना स्वाभाविक थी, तो इस दावे को परखने के लिए स्वतंत्र रिपोर्टों की ओर देखना जरूरी हो जाता है।

देश में ऊर्जा और पर्यावरण के क्षेत्र में काम करने वाली संस्था Council on Energy, Environment and Water (CEEW) की State of Electricity Access in India रिपोर्ट बताती है कि साल 2015 में उत्तर प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में औसतन सिर्फ 9 घंटे बिजली आपूर्ति हो रही थी। यानी प्रदेश के बड़े हिस्से में दिन का आधा समय बिजली के बिना गुजरता था।

इसका अर्थ सिर्फ इतना नहीं था कि लोग एसी या कूलर नहीं चला पा रहे थे। साल 2015 का ग्रामीण उत्तर प्रदेश आज की तुलना में कहीं कम बिजली-निर्भर था। उस दौर में एसी और फ्रिज ग्रामीण इलाकों में आम नहीं थे बल्कि कई घरों में पंखा और बल्ब चलना ही पर्याप्त माना जाता था। लेकिन स्थिति ऐसी थी कि बुनियादी बिजली जरूरतें भी नियमित रूप से पूरी नहीं हो रही थीं।

यानी आज बिजली कटौती पर जो शोर सुनाई देता है, वैसी व्यापक प्रतिक्रिया उस दौर में शायद इसलिए कम दिखती थी क्योंकि बहुत से क्षेत्रों में बिजली का लंबे समय तक न आना ही सामान्य स्थिति बन चुका था।

पीक पावर डिमांड में सपा के काल में पिछड़ता रहा उत्तर प्रदेश

आजकल ट्विटर पर हर दूसरे-तीसरे दिन ऊर्जा मंत्रालय का एक ना एक ट्वीट वायरल हो जाता है, इसमें बताया जाता है कि आज देश में बिजली की माँग नया रिकॉर्ड बना गई और उसे सप्लाई भी कर दिया गया। अब मई का महीना उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में भीषण गर्मी लेकर आता है, इसके चलते बिजली की माँग बेतहाशा बढ़ती है।

इसे पीक पॉवर डिमांड कहते हैं। अगर किसी राज्य का अपना बिजली ढाँचा ठीक होता है और उसके पास बिजली सप्लाई के साधन मौजूद होते हैं तो वो ये बिजली आपूर्ति कर ले जाता है। लेकिन इस मामले में अखिलेश यादव की सरकार एकदम फिसड्डी थी।

केंद्रीय ऊर्जा मंत्रालय के अंतर्गत कार्य करने वाले थिंक टैंक पालिसी फाउंडेशन ऑफ इंडिया के डेटा के अनुसार, 12 जुलाई 2012 को उत्तर प्रदेश में 13,900 मेगावाट की पीक बिजली माँग दर्ज हुई थी। लेकिन राज्य सरकार केवल लगभग 12,000 मेगावाट बिजली ही उपलब्ध करा सकी। यानी करीब 14.11 प्रतिशत बिजली की कमी रही।

स्थिति अगले वर्षों में सुधरने के बजाय और गंभीर होती दिखाई दी। साल 2013 में बिजली सप्लाई का शॉर्टफॉल करीब 1,500 मेगावाट या लगभग 11 प्रतिशत तक दर्ज किया गया। लेकिन सबसे गंभीर संकट साल 2014 में देखने को मिला जब 14 जून 2014 को बिजली की कमी 26.9 प्रतिशत तक पहुँच गई।

यानी जिस समय गर्मी अपने चरम पर थी, उसी समय राज्य की बिजली व्यवस्था माँग के अनुरूप सप्लाई करने में लगभग एक-चौथाई तक पिछड़ रही थी।

2014 में क्यों बिगड़ी थी स्थिति? जब पावर प्लांट ठप पड़ने लगे और पूरे प्रदेश में बढ़ी कटौती

बिजली संकट के इन आँकड़ों को अगर जमीनी कारणों से जोड़कर देखा जाए तो तस्वीर और साफ होती है। साल 2014 उत्तर प्रदेश की बिजली व्यवस्था के लिए सबसे मुश्किल वर्षों में गिना गया। उस समय प्रदेश के कई बिजली उत्पादन संयंत्र एक के बाद एक प्रभावित होने लगे थे। नतीजा यह हुआ कि राज्य सरकार को शहरों और गाँवों में बड़े पैमाने पर बिजली कटौती करनी पड़ी।

उस दौर की मीडिया रिपोर्ट्स बताती हैं कि हालत सिर्फ सामान्य जिलों तक सीमित नहीं थी, बल्कि कथित तौर पर VIP माने जाने वाले क्षेत्रों में भी बिजली कटौती शुरू हो गई थी। यानी वह व्यवस्था, जिस पर विपक्ष आज “बेहतर बिजली सप्लाई” का दावा करता है, गर्मियों के चरम समय में माँग के सामने लड़खड़ाती दिख रही थी।

उस समय हालात कितने खराब थे, इसका अंदाजा इससे भी लगाया जा सकता है कि इन्वर्टर बाजार अचानक तेजी से बढ़ गया था। एक रिपोर्ट में एक छोटे दुकानदार के हवाले से बताया गया था कि उसने महज कुछ महीनों में हजारों इन्वर्टर बेच दिए। यह सिर्फ कारोबार नहीं था, बल्कि उस दौर के बिजली संकट की सामाजिक तस्वीर भी थी।

उत्तर प्रदेश के शहरों और कस्बों में तब इन्वर्टर-बैटरी की दुकानें तेजी से बढ़ीं। ग्रामीण इलाकों में लोग ट्रांसफॉर्मर फुँकने के बाद प्रदर्शन करते दिखाई देते थे। कई जगहों पर रातें छतों पर गुजरती थीं क्योंकि बिजली का कोई निश्चित शेड्यूल नहीं था। तेज हवा चलना भी लोगों के लिए संकेत बन जाता था कि अब बिजली कभी भी जा सकती है।

सिर्फ बिजली की कमी नहीं, पूरा विभाग में आर्थिक संकट

बिजली आपूर्ति की समस्या एक हिस्सा थी लेकिन असली संकट वितरण व्यवस्था के भीतर भी था। उत्तर प्रदेश का बिजली तंत्र आर्थिक रूप से भी भारी दबाव में था। इसे समझने के लिए ऊर्जा क्षेत्र में इस्तेमाल होने वाले एक महत्वपूर्ण शब्द AT&C लॉसेस (Aggregate Technical & Commercial Losses) को समझना जरूरी है।

सरल भाषा में कहें तो इसका मतलब यह होता है कि जितनी बिजली सप्लाई की गई, उसमें से कितने का भुगतान वापस आया। अगर बिजली सप्लाई तो हो रही है लेकिन उसका पैसा नहीं लौट रहा, तो वितरण कंपनी लगातार घाटे में जाएगी।

नीति आयोग के ICED डैशबोर्ड के अनुसार, साल 2016-17 के आसपास उत्तर प्रदेश में बिजली सप्लाई की गई रकम का लगभग 40 प्रतिशत राजस्व वापस नहीं आ रहा था। इस घाटे का कुछ हिस्सा तकनीकी कारणों जैसे लाइन लॉस और ट्रांसमिशन लॉस से जुड़ा था लेकिन बड़ा कारण बिजली चोरी था।

नीति आयोग के आँकड़े बताते हैं कि पूर्वांचल विद्युत वितरण निगम लिमिटेड (PVVNL) के अंतर्गत आने वाले जिलों में AT&C लॉसेस करीब 53 प्रतिशत तक पहुँच गए थे। यानी आधी से ज्यादा बिजली का भुगतान वापस नहीं मिल रहा था।

बिजली चोरी को सपा का समर्थन

सत्ता में रहते हुए अखिलेश यादव स्वयं ही इसे प्रोत्साहित कर रहे थे। मुजफ्फरनगर में एक रैली में खुद अखिलेश यादव ने कहा था कि उन्हें कटिया से कोई समस्या नहीं है। और उन्हें समस्या होती भी क्यों? अमर उजाला की ही रिपोर्ट कहती है कि उनके खुद के ही जिले में सबसे ज्यादा बिजली चोरी होती थी।

अमर उजाला की रिपोर्ट कहती है कि इटावा में 73% बिजली चोरी हो जाती थी। वैसे इस बिजली चोरी पर अकेले अखिलेश यादव का संरक्षण नहीं था बल्कि उनकी पूरी पार्टी ही इस मॉडल को अपना रही थी। आज जुल्म जुल्म चिल्लाने वाले आजम खान के रामपुर में 50% से ज्यादा बिजली चोरी होती थी।

आजम खान का कहना था कि कोई भी ठेकेदार, बिजली विभाग का कर्मचारी छापा मारने नहीं आ सकता। यहाँ तक कि बिजली चोरी में खलल ना पड़े इसके लिए आजम खान ने रामपुर में बिजली के तार अंडरग्राउंड करने से रुकवा दिए थे और बाकायदा इसका ऐलान भी कर रहे थे।

आजमगढ़, मैनपुरी, संभल और कन्नौज जैसे जिले जहाँ जहाँ भी समाजवादी पार्टी की पकड़ मजबूत थी, सब जगह बिजली चोरी पूरा कारोबार था। यहाँ 60% तक बिजली चोरी हो रही थी। और बिजली चोरी करने वालों को पकड़ने की किसी की हिम्मत नहीं थी क्योंकि उन्हें सीधा संरक्षण समाजवादी पार्टी से मिल रहा था।

ऐसा भी नहीं है कि ये बिजली चोरी गाँव के इलाके में होती हो, यहाँ तक कि समाजवादी पार्टी की सरकार जाने के बाद भी आजम खान और शफीकुर्रहमान बर्क के घर में बिजली चोरी हो रही थी। और ये सिलसिला उनकी सत्ता जाने के सालों बाद तक जारी है।

शिवपाल यादव के बेटे आदित्य यादव ने बदायूँ में खुले तौर पर कहा था कि सपा सरकार में तो कटिया पर भी एक्शन नहीं हुआ। समाजवादी पार्टी में बिजली चोरी का सिस्टम सिस्टेम्टिक तरीके से चलता था, संभल में साल 2026 में मुस्लिम इलाकों में हुई छापेमारी में मस्जिद से लेकर घरों तक करोड़ों की बिजली चोरी पकड़ी गई थी। संभल का ही पूर्व सपा जिलाध्यक्ष भी बिजली चोरी में पकड़ा गया था।

योगी सरकार में कितनी बदली तस्वीर?

यह बात बिल्कुल सही है कि भीषण गर्मी के बीच उत्तर प्रदेश के कई हिस्से पॉवर कट्स का सामना कर रहे हैं। लेकिन आपको आज की स्थिति और पहले की स्थिति में अन्तर समझना होगा। आज जहाँ लोड बढ़ने के चलते लोड शेडिंग हो रही है या फिर ट्रिपिंग हो रही है तो वहीं पहले घुप्प अँधेरे की स्थिति थी।

पहले कुछ जिले VIP थे, जिनकी बिजली सप्लाई कैसे भी इंश्योर की जाती थी और बाकी को अनाथ छोड़ दिया जाता था। योगी सरकार आने के बाद ये भेदभाव खत्म हुआ है और साथ ही बिजली का इंफ्रा भी सुधरा है। रिपोर्ट्स कहती हैं कि योगी सरकार आने के पहले उत्तर प्रदेश में 1.21 लाख बस्तियों में ही बिजली पहुँचती थी।

अब ये आँकड़ा बढ़ चुका है और 2023 तक ही सरकार इस नंबर में 1.2 लाख बस्तियों का एडिशन कर चुकी थी। और सिर्फ ऐसा नहीं है कि बिजली के खंभे लग गए हैं बल्कि घरों तक भी बिजली पहुँची है। साल 2017 में 1 करोड़ 80 लाख घरों में ही बिजली पहुँच रही थी, ये नंबर भी अब बढ़ कर 3 करोड़ 63 लाख हो चुका है।

कनेक्शन देने के साथ ही योगी सरकार ने बिजली का इंफ्रा सुधारने पर भी जोर लगाया है। यूपी में बिजली की जनरेशन कैपैप्सिटी भी 5600 मेगावॉट से 8600 मेगावॉट हुई है। और जो पॉवर सब स्टेशंस इस बिजली की रीढ़ है, वो भी 700 से अधिक योगी सरकार ने बनाए हैं ।

अब यूपी में बिजली चोरी पर कंट्रोल हुआ है तभी संभल में सपा के बिजली चोर भी पकड़े जा रहे हैं और इसका सीधा असर AT&C लॉसेस में इंप्रूवमेंट से दिख रहा है। अखिलश के राज में जहाँ 100 रुपए की बिजली बिकने के बाद जहाँ केवल 60 रुपए ही रेवेन्यू में वापस आ रहे थे तो वहीं अब योगी सरकार में साल 2024-25 में आँकड़ा 80 रुपए पर पहुँच गया है।

ममता बनर्जी जिन घुसपैठियों के होने से करती थीं ‘इनकार’, शुभेंदु सरकार ने आते ही किया ‘प्रहार’: एक चेतावनी और बंगाल बॉर्डर पर मची अवैध बांग्लादेशियों के वापस भागने की होड़!

पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव 2026 में घुसपैठ का मुद्दा सबसे बड़ा चुनावी हथियार बनकर उभरा। बीजेपी ने पूरे चुनाव में लगातार बंगाल में बांग्लादेशी घुसपैठियों का मुद्दा उठाया, जबकि ममता बनर्जी और TMC इसे पूरी तरह नकारती रहीं। उल्टा ममता बनर्जी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार को घुसपैठिया घोषित कर डाला। लेकिन चुनावी नतीजों के बाद अब जमीन पर जो तस्वीर दिख रही है, उसने कई बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं।

राज्य में शुभेंदु सरकार के बनते ही घुसपैठियों के खिलाफ ‘डिटेक्ट, डिलीट और डिपोर्ट’ नीति के तहत सख्त कार्रवाई शुरू हुई तो बंगाल से से ऐसे वीडियो सामने आने लगे, जहाँ घुसपैठिए अपने देश वापस लौटते दिखाई दे रहे हैं। कहीं लोग बॉर्डर पार जाने का इंतजार कर रहे हैं तो कहीं प्रशासन की कार्रवाई के डर से राज्य को छोड़ रहे हैं। अब सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि जब ममता बनर्जी कहती थीं कि बंगाल में घुसपैठिए हैं ही नहीं तो आखिर ये लोग कौन हैं जो कार्रवाई शुरू होते ही दुम दबाकर भागते नजर आ रहे हैं?

बंगाल में घुसपैठियों की बदलती तस्वीर

बंगाल में सरकार बनाते ही बीजेपी ने घुसपैठ के मुद्दे को प्राथमिकता दी। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने सरकार गठन के तुंरत बाद साफ कर दिया कि अब बंगाल में ‘डिटेक्ट, डिलीट और डिपोर्ट’ नीति लागू होगी। सीएम शुभेंदु अधिकारी ने घुसपैठियों को चेतावनी दी, “जल्दी-जल्दी भागो। हम उन्हें जेल में रखकर खिलाना नहीं चाहते। आखिर हम जेल में उन्हें खाना खिलाने पर अपना पैसा क्यों बर्बाद करें?”

सरकार की इस कार्रवाई के बाद बंगाल के बॉर्डर इलाकों से जो तस्वीरें सामने आईं, वह विपक्ष की आँखों को चुभने वाली थीं। उत्तर 24 परगना जिले के हाकिमपुर चेकपोस्ट पर 100 से ज्यादा बांग्लादेशी परिवार अपने सामान के साथ बॉर्डर के पास जमा दिखाई दिए। यहाँ बांग्लादेशी खुद बता रहे थे कि उन्होंने भारत में घुसपैठ की है।

हावड़ा में तीन साल से रहे एक घुसपैठिए ने कहा कि एक व्यक्ति की मदद से वह भारत आया था, उसके साथ 10 और लोग थे और यहाँ वह बिना आधार कार्ड और राशन कार्ड के तीन साल तक रहा। उसने बताया कि उन 10 लोगों में से अब वह अकेला लौट रहा है।

इन्हीं में से एक बांग्लादेशी महिला ने कहा कि TMC ने उन्हें ‘लक्ष्मी भंडार’ से पैसे दिए। इतना ही नहीं महिला ने बताया कि आधार कार्ड, राशन कार्ड और वोटर आईडी भी बनाकर दिए, इसके बदले उन्हें सिर्फ TMC को वोट देना था।

बंगाल में बीजेपी सरकार की घुसपैठ के खिलाफ कार्रवाई

बंगाल के बॉर्डर इलाकों से जो तस्वीरें सामने आ रही हैं, उनके पीछे या सिर्फ डर या अफवाह नहीं, बल्कि सरकार की घुसपैठियों के खिलाफ लगातार कार्रवाई है। विधानसभा चुनाव 2026 के दौरान बीजेपी ने घुसपैठ को सबसे बड़ा मुद्दा बनाया था और दावा किया था कि बंगाल में अवैध बांग्लादेशी और रोहिंग्या नेटवर्क तेजी से बढ़ा है।

अब वही बीजेपी सत्ता में आने के बाद शुभेंदु अधिकारी के नेतृत्व में उसी मुद्दे पर तेजी से फैसले लेती दिखाई दे रही है। मुख्यमंत्री बनने के बाद शुभेंदु अधिकारी ने साफ कहा है कि उनकी सरकार ‘डिटेक्ट, डिलीट और डिपोर्ट’ की नीति पर काम करेगी। इसी दौरान उनका बयान भी काफी चर्चा में रहा, जब उन्होंने कहा, “क्या ये घुसपैठिए हमारे दामाद हैं? उन्हें जल्दी-जल्दी भगाओ।”

घुसपैठ के मुद्दे को केवल चुनाव तक सीमित न रखकर बीजेपी ने सरकार गठन के महज दो दिन बाद, 11 मई 2026 को सीएम शुभेंदु अधिकारी की हुई पहली कैबिनेट बैठक में भारत-बांग्लादेश बॉर्डर पर फेंसिंग के लिए बीएसएफ को जमीन देने का फैसला लिया गया। शुभेंदु अधिकारी सरकार ने ऐलान किया कि सीमा के 27 किलोमीटर हिस्से में फेंसिंग के लिए करीब 75 एकड़ जमीन बीएसएफ को सौंपी जाएगी और अगले 45 दिनों में प्रक्रिया पूरी की जाएगी।

सरकार ने बीएसएफ को जमीन देकर सीमावर्ती इलाकों में लंबे समय से अधूरी फेंसिंग की वजह से घुसपैठ के संकट को खत्म करने की कोशिश की। लेकिन वहीं, ममता सरकार ने इस जमीन के मुद्दे को कोर्ट तक घसीटा लेकिन बीएसएफ को जमीन नहीं दी।

अब राज्य में घुसपैठियों की पहचान और उन्हें वापस भेजने के लिए सरकार 23 जिलों में ‘होल्डिंग सेंटर‘ यानी डिटेंशन सेंटर बनवा रही है मालदा और मुर्शिदाबाद में ये सेंटर बन भी चुके हैं, जिनमें 12 बांग्लादेशी घुसपैठियों को पकड़कर रखा गया है। इन घुसपैठियों पर ‘डिटेक्ट, डिलीट और डिपोर्ट’ की नीति लागू होगी। सबसे पहले इन घुसपैठियों की पहचान कर डिटेंशन सेंटर तक लाया जा चुका है, अब अगले पड़ाव में इनकी सरकारी रिकॉर्ड खंगालकर डिलीट किए जाएँगे और फिर बीएसएफ को सौंप दिया जाएगा। बीएसएफ ने सीमा पार करवाकर वापस बांग्लादेश भेज देगी।

सरकार की इसी कार्रवाई के बाद ही उत्तर 24 परगना जैसे जिलों में घुसपैठिए वापस बांग्लादेश लौटने का इंतजार करते दिखे।

ममता बनर्जी लगातार घुसपैठ से करती रही इनकार

बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 में जहाँ बीजेपी ने घुसपैठ को सबसे बड़ा मुद्दा बनाया, वहीं ममता बनर्जी लगातार इस पूरे मुद्दे को राजनीतिक एजेंडा बताती रहीं। चुनाव से पहले कई रैलियों और सार्वजनिक कार्यक्रमों ने ममता बनर्जी ने बीजेपी पर हिंदू-मुस्लिम की राजनीति करने का आरोप लगाया और कहा कि घुसपैठ का मुद्दा सिर्फ बंगाल को बदनाम करने के लिए उठाया जा रहा है।

20 मार्च 2026 को कोलकाता के रेड रोड पर ईद की नमाज के बाद ममता बनर्जी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ही ‘सबसे बड़ा घुसपैठिया‘ बता दिया। उन्होंने कहा कि लोगों को घुसपैठिया कहकर उनके वोटिंग अधिकार छीने जा रहे हैं और बीजेपी धर्म के नाम पर देश को बाँटने की कोशिश कर रही है।

विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) पर भी ममता बनर्जी सरकार के खिलाफ खड़ी दिखीं। उन्होंने 3 अप्रैल 2026 को दक्षिण दिनाजपुर की रैली में उन्होंने कहा कि अगर घुसपैठियों के वोट से सरकार बनी है, तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इस्तीफा दे देना चाहिए। इसे पहले जनवरी 2025 में ममता बनर्जी ने घुसपैठ को लेकर केंद्र सरकार और बीएसएफ पर ही आरोप मढ़ दिया।

लेकिन जब बीजेपी ने ममता सरकार पर घुसपैठियों को संरक्षण देने और वोटबैंक की राजनीति करने का आरोप लगाया तो मता बनर्जी ने इससे मुँह मोड़ लिया। चुनाव के दौरान ममता बनर्जी लगातार यह संदेश देने की कोशिश करती रहीं कि घुसपैठ का मुद्दा असल में बंगाल चुनाव को ध्रुवीकृत करने की रणनीति है। लेकिन चुनाव नतीजों के बाद जब शुभेंदु अधिकारी सरकार ने घुसपैठ के खिलाफ सख्त कार्रवाई शुरू हुई और बॉर्डर इलाकों से लौटते घुसपैठियों की तस्वीरें सामने आने लगीं तो अब ममता बनर्जी चुप हैं।

TMC की तुष्टिकरण की राजनीति ने बंगाल की कहाँ लाकर खड़ा कर दिया?

बंगाल में ममता बनर्जी नेतृत्व वाली TMC सरकार में पिछले 15 सालों तक घुसपैठ के मुद्दे को या तो नकारा गया या फिर उसे राजनीति कहकर टाल दिया गया। लेकिन सरकार बदलते ही जिसे तेजी से सीएम शुभेंदु के नेतृत्व में फेंसिंग, डिटेंशन सेंटर, पहचान और डिपोर्ट की कार्रवाई शुरू हुई और उसके बाद बॉर्डर इलाकों से जो तस्वीरें सामने आईं, उन्होंने ममता बनर्जी के दावों पर सवाल खड़े कर दिए। अगर बंगाल में घुसपैठिए थे ही नहीं, तो फिर कार्रवाई शुरू होते ही बॉर्डर पर लौटने वालों की भीड़ क्यों दिखाई देने लगी?

असल फर्क सरकार की नीयत और इरादों का होता है। जब सरकार कानून लागू करने की इच्छा रखती है तो सिस्टम जमीन पर दिखने लगता है। लेकिन जब राजनीति तुष्टिकरण और वोटबैंक के इर्द-गिर्द घूमने लगे, तब घुसपैठ भी ‘मुद्दा’ नहीं लगता। यही वजह रही कि वर्षों तक सीमा से जुड़े सवाल दबे रहे और बंगाल की कानून-व्यवस्था, पहचान और सुरक्षा पर लगातार सवाल उठते रहे। अब पहली बार कार्रवाई के बाद जो तस्वीर सामने आई है, उसने यह बहस फिर जिंदा कर दी है कि आखिर बंगाल का यह हाल बनने दिया किसने?

मेरे बेटे को गोली मार देते तो इतना दुख नहीं होता… जानिए क्यों एक पिता ये कहने को हुआ मजबूर, ग्रेटर नोएडा में 15 साल के गोपाल के साथ क्या हुआ?

उत्तर प्रदेश के ग्रेटर नोएडा में 15 वर्षीय गोपाल शर्मा की हत्या के बाद विरोध प्रदर्शन का सिलसिला लगातार जारी है। परिजन का आरोप है कि 9वीं कक्षा का छात्र गोपाल शर्मा की बेरहमी से हत्या की गई है और पुलिस ने अब तक हत्यारों को गिरफ्तार नहीं किया है। वहीं, पुलिस की इस पर अलग थ्योरी है। इस बीच कई ब्राह्मण संगठन सड़कों पर उतर आए हैं और जल्द से जल्द आरोपितों को गिरफ्तार किए जाने की माँग कर रहे हैं।

21 मई से लापता था गोपाल शर्मा: जानें- पहली FIR की डिटेल्स

जेवर कोतवाली क्षेत्र के बनवारी बाँस गाँव के रहने वाले रवि भूषण उर्फ बंटी का बेटा गोपाल 21 मई से लापता था। परिवार ने तलाश की लेकिन कोई सुराग नहीं मिला और शुक्रवार (22 मई 2026) को जेवर कोतवाली में गुमशुदगी की FIR दर्ज कराई।

ऑपइंडिया के पास मौजूद इस FIR कॉपी के मुताबिक, पिता ने शिकायत में लिखा, “मेरा पुत्र गोपाल शर्मा, 21 मई 2026 को अपने घर से समय 3:30 से 4:00 बजे के बीच घर से कही चला गया है और अभी तक घर वापस नही आया है। हमने अपने सब रिश्तेदार को फोन करके पता लगाया गया है। आपसे निवेदन है कि इस मामले को गंभीरता से लें, उसकी खोजबीन जल्द से जल्द शुरु करने की कृपा करें।”

FIR का एक हिस्सा

दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के मुताबिक, शुक्रवार को FIR कराए जाने के बाद पुलिस भी जाँच में जुट गई। इसके बाद शनिवार (23 मई 2026) को गोपाल शर्मा का शव उसके गाँव से 4 किलोमीटर दूर रोही गाँव में एक खाली मकान के कमरे से बरामद हुआ था। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि किशोर के सिर पर गहरे चोट के निशान मिले और कमरे में काफी मात्रा में खून फैला हुआ था। इसके बाद परिजन ने उसकी हत्या की आशंका जताई। इसके बाद पुलिस ने कई लोगों को हिरासत में लेकर पूछताछ शुरू कर दी।

आँखे निकालीं, एसिड से जलाया: नाबालिग के साथ वीभत्सता का दावा

इस मामले में गोपाल शर्मा के साथ वीभत्सता का दावा किया गया है। गोपाल के पिता बंटी ने ZEE न्यूज को बताया कि बच्चे का शव इतनी गंदी हालात में था कि देखा भी नहीं जा रहा था। आँखें निकली हुई थीं, तेजाब डला हुआ था, जीभ कटी हुई थी। वहीं, गोपाल की माँ सरोज शर्मा ने बताया कि बहुत खराब हालत थी और मुझसे देखा तक नहीं गया। मृतक गोपाल की दादी ने बताया कि उसके मुँह में कुछ ठूँस दिया गया था, आँखें भी बाहर निकली हुई थीं।

बंटी ने एक अन्य चैनल से बातचीत में दावा किया कि हमने खुद ही शव ढूँढा था। उन्होंने बताया कि पुलिस ने बताया है कि हमने 6 लोगों को गिरफ्तार किया है लेकिन बेटे के साथ क्या हुआ यह अभी तक कोई नहीं बता रहा है। उन्होंने कहा कि मुझे एनकाउंटर चाहिए, मुझे बुलडोजर कार्रवाई चाहिए।

उन्होंने बताया, “बेटे का प्राइवेट पार्ट काट लिया गया, इतना अत्याचार किया है। मेरे बेटे को एक गोली मार दी होती तो मुझे इतना दुख ना होता जितना इन बातों को सुनकर हुआ है। हाथों में कील गाड़ दी गई, तेजाब डाला और उसके ऊपर पेशाब किया है।”

पुलिस ने क्या बताया?

पुलिस ने इस मामले में बच्चे के साथ वीभत्सता की खबरों को खारिज किया है। ग्रेटर नोएडा के DCP प्रवीण रंजन सिंह ने ऑपइंडिया से बातचीत में कहा कि बच्चे के शव का पोस्टमार्टम किया गया है, उसकी वीडियोग्राफी हुई है और उसमें वीभत्सता जैसी कोई बात सामने नहीं आई है, यह सिर्फ अफवाह उड़ाई गई है। DCP ने बच्चे के शव के वायरल फोटो पर भी बातचीत की है।

बच्चे के शव का वायरल फोटो

DCP प्रवीण रंजन ने वायरल तस्वीर और उसमें दिख रही वीभत्सता को लेकर बताया है कि वो शव के ‘डीकंपोज’ होने की वजह से ऐसे नजर आ रहा है और भी अंग कटा-फटा नहीं है। तस्वीर में आँखें बाहर दिखने पर उन्होंने बताया, “शव ‘डीकंपोजड’ हो रहा था, गरमी थी और कमरा भट्टी जैसा तप रहा था।” वहीं, सोशल मीडिया पर बच्चे का रेप किए जाने के दावों को भी खारिज किया है।

वहीं, मौत की वजह को लेकर DCP ने बताया कि पोस्टमार्ट रिपोर्ट में सिर पर चोट लगने की बात है लेकिन मृत्यु का सही कारण अभी नहीं पता चला है। साथ ही, उन्होंने इसे यकीनी तौर पर हत्या भी नहीं बताया है।

ग्रेटर नोेएडा DCP ने X पर लिखा, “थाना जेवर पर वादी द्वारा अपने पुत्र गोपाल उम्र करीब 15 वर्ष के घर से बिना बताए चले जाने के संबंध में अभियोग पंजीकृत कराया गया। थाना जेवर पुलिस द्वारा तत्काल सूचना प्राप्त होते ही परिजनों के साथ मिलकर गोपाल की तलाश की जा रही थी, इसी दौरान स्थानीय पुलिस को सूचना प्राप्त हुई कि उक्त बालक का शव ग्राम रोही में खाली मकान में है।”

DCP ने आगे लिखा, “प्राप्त सूचना पर त्वरित कार्रवाई करते हुए पुलिस बल तत्काल मौके पर पहुँचा व फील्ड यूनिट / फॉरेंसिक टीम बुलाकर घटना स्थल का निरीक्षण कराया गया। मृतक के शव का पंचायतनामा भरकर पोस्टमार्टम कराया जा चुका है। पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार लगाए गए कथित आरोप ‘प्राइवेट पार्ट का काटना, आँखें पर एसिड अटैक’ पूर्णतः असत्य एवं भ्रामक हैं। घटना के अनावरण के लिए 4 पुलिस टीमें गठित है, इस संबध मे महत्तवपूर्ण सुराग मिले है। शीघ्र सफल अनावरण किया जायेगा।”

दरिंदों के साथ, दरिंदों जैसी कार्रवाई होगी: BJP विधायक

देवरिया सदर से BJP के विधायक शलभ मणि त्रिपाठी ने बताया है कि उन्होंने इस घटना को लेकर यूपी के डीजीपी से बातचीत की है। शलभ मणि ने X पर लिखा, “ग्रेटर नोएडा में मासूम बालक गोपाल शर्मा की जघन्य हत्या से हृदय अत्यंत व्यथित है, इस घटना को अंजाम देने वाले इंसान नहीं कहे जा सकते, वे दरिंदे हैं और उनके साथ दरिंदों जैसी ही कार्रवाई होगी।”

उन्होंने आगे लिखा, “योगी आदित्यनाथ जी की सरकार इस प्रकरण पर तेजी से कार्रवाई कर रही है, मैंने भी इस घटना पर उत्तर प्रदेश के डीजीपी राजीव कृष्ण एवं एसटीएफ चीफ अमिताभ यश से वार्ता कर हैवानों के खिलाफ कठोरतम के कार्रवाई के लिए कहा है। हम सभी की संवेदना पीड़ित परिवार के साथ है, घटना का शीघ्र खुलासा होगा।”

पुलिस की कार्रवाई से नाराज लोगों का गुस्सा लगातार बढ़ता जा रहा है और कई सामाजिक संगठन अब पीड़ित परिवार से मिलने पहुँचे हैं। राष्ट्रीय विप्र एकता मंच के लोगों ने पीड़ित परिजन से मुलाकात की है और कार्रवाई ना किए जाने पर बड़े आंदोलन की चेतावनी दी है। ब्राह्मण समाज के कई संगठन भी आक्रोशित हैं तो वहीं पुलिस ने जल्द से जल्द मामले का खुलासा करने की बात कही है।