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UP में नासिर ने आनंद को तलवार से काटा… नई नहीं दलितों पर इस्लामी कट्टरपंथियों की बर्बरता, आँकड़े देते हैं अत्याचार की गवाही: ऐसी हर घटना के बाद ‘भीम-मीम’ वाले साध लेते हैं चुप्पी

उत्तर प्रदेश के संत कबीर नगर में गुरुवार को नासिर अली नामक शख्स ने बीच बाजार एक दलित युवक आनंद की तलवार से गला काटकर बेरहमी से हत्या कर दी। दलित-मुस्लिम एकता और भीम-मीम के नारे लगाने वालों को इस हत्या के बाद साँप सूँघ गया है। दलितों के नाम पर वोट माँगने वाले दल खामोश हैं क्योंकि मारने वाला मुस्लिम है। यह मामला इस्लामी कट्टरता के साथ-साथ यह भी दिखाता है कि दलितों के नाम पर की जाने वाली राजनीति किस हद तक सुविधाजनक हो गई है।

क्या है आनंद की हत्या का पूरा मामला?

जिस आनंद को सरे राह काटा गया उस बेचारे का ‘कसूर’ उस जिहादी की नजर में ये था कि आनंद ने अपनी भांजी के साथ छेड़छाड़ को लेकर नासिर को थप्पड़ जड़ दिया था। यह थप्पड़ नासिर को इतना नागवार गुजरा कि देर रात आनंद के बाजार से लौटते समय नासिर ने अपने दोस्तों के साथ मिलकर उन्हें घेर लिया और धारदार हथियार से गला रेत दिया। यह पूरा कत्लेआम इतनी भयावहता के साथ हुआ कि आनंद ने मौके पर ही दम तोड़ दिया।

इसके बाद गुस्साए ग्रामीणों ने सड़क जमकर दिया और नासिर के गिरफ्तारी और एनकाउंटर की माँग पर अड़ गए।मामले के बाद संत कबीर नगर में एडीजी, डीआईजी, एसपी समेत पूरा पुलिस महकमा तैनात है और नासिर और उसके साथियों की तलाश की जा रही है।

आनंद की हत्या कोई पहली घटना नहीं है। इस तरह की कई घटनाएँ बीते महीनों में सामने आ चुकी हैं जिसमें दलितों का उत्पीड़न और उनकी हत्या करने में आरोपित मुस्लिम रहे हैं।

मुस्लिमों से सर्वाधिक पीड़ित हैं दलित

मीडिया रिपोर्ट्स को मानें तो जनवरी से अप्रैल 2026 के बीच में एससी/एसटी एक्ट के आँकड़ों में पता चला कि दलितों के उत्पीड़न पर मुस्लिमों के खिलाफ 1,983 मामले दर्ज हो चुके हैं। यह आँकड़े राज्य के सभी जिलों और जून से मिली पुलिस रिपोर्ट, FIR और जाँच रिपोर्ट के आधार पर तैयार किए गए हैं।

इन आँकड़ों के सामने आने के बाद से सियासी महकमे में हलचल तेज हो गई है। समाजवादी पार्टी लगातार PDA नैरेटिव पर लोगों को बरगलाने की कोशिश कर रही है लेकिन NCRB के आँकड़े और रुझान कहते हैं कि मुलायम सिंह यादव और अखिलेश यादव की सरकारों के दौरान दलितों पर अत्याचार के मामले काफी बढ़े थे।

एनसीआरबी और अन्य रिपोर्ट्स के अनुसार, 2012 से 2017 के बीच में यूपी में दलितों पर अपराधों के 15000 से भी अधिक मामले दर्ज हुए। सपा सरकार में ही 2014 में बदायूं में दो दलित बहनों के साथ हुई बर्बरता ने भी देश को तो झकझोरा ही, पर यह भी बता दिया कि सपा राज में कानून व्यवस्था दलितों के लिए अराजक हो चुकी है।

2012-13 में उत्तर प्रदेश में दलितों पर दर्ज अपराध की संख्या 2800 से 3000 के बीच रही। इसके बाद 2014-15 में ये संख्या 3200 से 3400 हो गई। इनमें बलात्कार, हत्या और सामाजिक बहिष्कार के मामलों में बढ़ोतरी देखी गई।

वहीं अखिलेश के आखिरी वर्षों 2016-17 में एनसीआरबी के रिपोर्ट में उत्तर प्रदेश दलितों के अपराध के मामले में पहले नंबर पर रहा। इस वर्ष में उत्तर प्रदेश में दलितों पर दर्ज अपराधों की संख्या 3500 से 3700 तक पहुँच गई। कुल मिलाकर अखिलेश के कार्यकाल में 15130 मामले दर्ज हुए जो देश में सबसे अधिक थे।

मुलायम की सत्ता में भी दलितों का हुआ शोषण

1993 से 1995 और 2003 से 2007 के बीच रही मुलायम सिंह यादव की सरकार की बात की जाए तो दलितों पर अत्याचार की स्थिति ऐसी थी कि उन्हें विपक्षी मतदाता मानकर उनकी लगातार उपेक्षा की जाती थी, थानों में न्याय नहीं मिलता था और ग्रामीण क्षेत्रों में हिंसा हद से अधिक देखने को मिलती थी।

आम जनता को तो छोड़ दीजिए, 1995 का कुख्यात गेस्ट हाउस कांड भी मुलायम सरकार के दौरान ही हुआ जिसने दलितों के प्रति समाजवादी पार्टी का चेहरा और विचार सबके सामने रख दिया। इस घटना ने बताया कि सपा दलित समाज की आवाज को दबाने के लिए किसी भी हद तक जा सकती है।

अपने परिवार के सत्ता में रहने के दौरान दिलों के रुख को जानने के बावजूद समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव पीड़ित, दलित और अल्पसंख्यक (PDA) का नारा देकर सत्ता की रोटियाँ सेंकने की भरपूर कोशिश कर रहे हैं।

यह तो योगी सरकार है जिसकी वजह से न केवल कानून व्यवस्था सुदृढ़ हुई पर साथ ही दलितों पर अत्याचार और उनके उत्पीड़न में भी काफी उल्लेखनीय कमी दर्ज की गई। लेकिन इसमें कोई दो राय नहीं है कि यदि 2027 के चुनाव में अखिलेश यादव सत्ता संभालते हैं तो दलितों के लिए उनका शासन काल किसी डरावने सपने से भी बदतर हो जाएगा।

भीम-मीम राजनीति की भी पोल खोलते हैं ऐसे मामले

सपा जैसे दल ‘भीम-मीम’ राजनीति के सबसे बड़े स्वघोषित मसीहा हैं। ‘भीम-मीम’ के नारे के सहारे दलितों और मुस्लिमों की सामाजिक-राजनीतिक एकता बताने वाले अखिलेश यादव जैसे लोगों का दिल असल में दलितों के नाम पर कम ही पसीजता है। यह कोई इस घटना की बात नहीं है, घटना दर घटना आपको इसके प्रमाण नजर आएँगे। इन दलों द्वारा इस राजनीति में दलितों के मुद्दों से ज्यादा महत्व केवल वोटों की गणित को दिया जाता रहा है। दलित उत्पीड़न के मुद्दों पर सबसे अधिक मुखर होने का दावा करने वाले ये लोग मुस्लिम आरोपित होने पर मुँह बंद कर लेते हैं।

भीम-मीम के नाम पर राजनीति करने वाले लोग सिद्धांत की नही बल्कि सुविधा की राजनीति करते हैं। दलितों पर अत्याचार किसी विशेष राजनीतिक नैरेटिव में फिट बैठता है तो उस पर प्रेस कॉन्फ्रेंस होती है, धरना होता है, सोशल मीडिया अभियान चलाया जाता है लेकिन यदि आरोपित मुस्लिम समुदाय से हो तो वही राजनीतिक ऊर्जा अचानक गायब हो जाती है।

फीफा विश्व कप 2026: कनाडा की पहली जीत से अमेरिका की अग्निपरीक्षा तक

एक दफा फिर सूर्य उदय हुआ। यह एक और नया दिन था। आज मेक्सिको, अमेरिका व कनाडा की भूमि में फीफा विश्व कप के ग्रुप स्टेज के कई मैच खेले जाने थे।

सर्वप्रथम, चेक रिपब्लिक का सामना दक्षिण अफ्रीका से होने जा रहा था। इस मैच में कुछ भी हो सकता था। मैच शुरू होते ही छठे मिनट में चेक रिपब्लिक के लिए 27 वर्षीय मिडफील्डर मिखाल सादिलेक गोल कर टीम को बढ़त दिला देते हैं। खैर, खेल आगे बढ़ता है। पहले हाफ की समाप्ति पर स्कोर 1-0 ही रहता है। दोनों टीमें गोल करने के प्रयास में लगी रहती हैं, परंतु धीरे-धीरे समय बीतता जाता है। अचानक, मैच के 82वें मिनट में अपने ही गोलपोस्ट के समीप एक फाउल कर चेक रिपब्लिक की टीम दक्षिण अफ्रीका को पेनाल्टी का सुनहरा अवसर दे देती है। इस मौके को भुनाने में मोकोएना कोई गलती नहीं करते और पेनाल्टी को सफलतापूर्वक गोल में तब्दील कर अंतिम क्षणों में दक्षिण अफ्रीका की मैच में वापसी करा देते हैं। गौरतलब है कि उम्मीदों के विपरीत इस मैच में 61 प्रतिशत समय गेंद दक्षिण अफ्रीका के पास रही। साथ ही उन्होंने विरोधी गोलपोस्ट पर 17 दफा हमले किए। परंतु मैच 1-1 की बराबरी पर समाप्त हो जाता है। एक दफा फिर इस टूर्नामेंट में एक और मैच ड्रॉ रहता है।

आगे, लॉस एंजेलिस स्टेडियम में स्विट्जरलैंड का मुकाबला बोस्निया एवं हर्ज़ेगोविना की टीम से था। बोस्निया की टीम उम्रदराज एडिन जेको के नेतृत्व में इस टूर्नामेंट में उतरी है। वहीं, कोबेल, अकांजी, झाका व एम्बोलो जैसे खिलाड़ियों से लैस स्विस खेमा जीत के लिए भूखा नजर आ रहा था। मैच के पहले हाफ में दोनों टीमें कोई गोल करने में नाकाम रहती हैं।

दोनों टीमें, खासकर स्विट्जरलैंड, प्रयास तो कर रही थीं, परंतु स्कोर अब भी 0-0 ही था। फिर, स्विस कोच मैच के 71वें मिनट में एक साथ तीन बदलाव करते हैं। यह देखकर कि बोस्निया के खिलाड़ी थक चुके हैं, वे 20 वर्षीय मनजाम्बी को भी मैदान में भेजते हैं। उनका यह फैसला मैच को बदलकर रख देता है। 74वें मिनट में ही मनजाम्बी विरोधी गोलपोस्ट से लगभग 15 मीटर की दूरी से पोस्ट की दाईं ओर निशाना लगाते हैं। वे गोल करने में सफल हो जाते हैं और इस गोल के साथ स्विट्जरलैंड को 1-0 की अहम बढ़त दिला देते हैं। थोड़ी देर बाद बोस्निया के मुहारेमोविक को फाउल करने पर रेफरी रेड कार्ड दिखा देते हैं। इसका लाभ स्विट्जरलैंड को मिलता है। एक अन्य स्थानापन्न खिलाड़ी वारगास, साथी खिलाड़ी एम्बोलो से असिस्ट पाकर, अपनी टीम के लिए गोल करने में सफल हो जाते हैं। स्कोर 2-0 हो जाता है।

फिर, 90वें मिनट में इस बार वारगास गेंद को गोलपोस्ट के समीप मनजाम्बी के लिए परोसते हैं, जो गोल करने में कोई गलती नहीं करते। स्कोर 3-0 हो जाता है। स्विस टीम अंतिम क्षणों में भी गोलों की बौछार कर रही थी। इसके बाद बोस्निया के कोच अरमिन माहमिक को मैदान में भेजते हैं, जो मैदान में उतरते ही बोस्निया के लिए एक गोल कर देते हैं। स्कोर 3-1 हो जाता है। मैच के 90+6वें मिनट में स्विस स्थानापन्न खिलाड़ी जिब्रिल सौ को विरोधी गोलपोस्ट के पास फाउल कर दिया जाता है। टीम को पेनाल्टी मिलती है, जिसे अनुभवी कप्तान ग्रानित झाका गोल में तब्दील कर स्कोर 4-1 कर देते हैं। मैच इसी स्कोरलाइन पर समाप्त हो जाता है।

फिर, कनाडा के खिलाड़ी अपने घरेलू दर्शकों के सामने वैंकूवर में कतर की टीम से मुकाबला करते नजर आए। इस मैच में अपनी टीम को खेलते देखने के लिए लगभग साढ़े बावन हजार दर्शक स्टेडियम में मौजूद थे। यह मैच शुरुआत से ही एकतरफा रहा। कनाडा के खिलाड़ियों ने मैच की शुरुआत से ही कतर को संभलने का मौका नहीं दिया। अपने स्टार स्ट्राइकर जोनाथन डेविड की हैट्रिक की बदौलत कनाडा यह मैच 6-0 से जीतकर अपने ग्रुप में शीर्ष स्थान पर रहने की मजबूत दावेदारी पेश कर चुका है।

यह मात्र तीसरी बार है जब कनाडा फीफा विश्व कप का हिस्सा है और यह विश्व कप में उसकी पहली जीत भी है। अब लगभग निश्चित है कि पहली बार कनाडा ग्रुप स्टेज से आगे का सफर तय करेगा। यह निश्चित ही जश्न का समय होना चाहिए था। हालांकि, ऐसा हुआ नहीं।

24 वर्षीय स्टार कनाडाई मिडफील्डर इस्माइल कोने को दूसरे हाफ की शुरुआत में विपक्षी खिलाड़ी के फाउल के चलते गंभीर चोट लग जाती है। उनकी टांग में मल्टिपल फ्रैक्चर हो जाते हैं। वे दर्द से कराह रहे थे।

रेफरी तुरंत खेल रोककर मेडिकल टीम को बुलाते हैं। टीम के इस अहम खिलाड़ी पर हुए गंभीर फाउल के चलते दोनों टीमों के खिलाड़ियों के बीच झड़प हो जाती है। कोने को स्ट्रेचर पर मैदान से बाहर ले जाया जाता है। यह चोट इतनी गंभीर है कि अब उनका विश्व कप अभियान समाप्त हो गया है। दर्द से कराहते हुए भी इस्माइल कोने स्ट्रेचर से ही हाथ हिलाकर दर्शकों का अभिवादन स्वीकार करते हैं और जाते-जाते सभी को सांत्वना भी देते हैं। यह दृश्य सभी दर्शकों को भावुक कर देता है। नाथन सलीबा घायल इस्माइल कोने की जगह मैदान में आते हैं। और जैसे ही नाथन सलीबा मैच के 64वें मिनट में गोल दागकर घायल साथी खिलाड़ी इस्माइल कोने की जर्सी हाथों में लेकर हवा में लहराते हैं, कोच जेसी मार्श की आंखें भीग जाती हैं। यही तो इस खेल का जादू है, जिसकी हम अक्सर बात करते हैं। कहते हैं, फुटबॉल कमजोर दिल वालों के लिए नहीं है। यह एक पल आपको हंसाता है और अगले ही पल आपको रोने पर मजबूर कर देता है।

आगे, आज सुबह साढ़े छह बजे मेक्सिको की टीम अपने ही घर में दक्षिण कोरिया से दो-दो हाथ करती नजर आई। अपने घरेलू दर्शकों के अपार समर्थन के चलते मेक्सिको यह मैच 1-0 से जीतने में सफल रही और इस जीत के साथ ही वह ग्रुप ए की विजेता के तौर पर टूर्नामेंट के अगले दौर में जगह बनाने वाली पहली टीम बन गई है। क्योंकि दक्षिण कोरिया अपना पिछला मैच जीत चुकी थी, इसलिए उसके पास अभी भी अगले दौर में जगह बनाने का मौका है।

अब आगे, भारतीय समयानुसार आज रात साढ़े बारह बजे सिएटल स्टेडियम में घरेलू समर्थकों की सेना के साथ क्रिश्चियन पुलिसिक की अमेरिकी टीम का सामना होगा ऑस्ट्रेलिया से, जिसने इस टूर्नामेंट का एक बड़ा उलटफेर किया है। ऑस्ट्रेलिया अपने पिछले मैच में तुर्की की अनुभवी टीम को 2-0 से हरा चुकी है। वहीं, अमेरिका ने पैराग्वे को 4-1 से परास्त किया था। ऐसे में एक जोरदार मुकाबले की पूरी संभावना है।

वहीं, बोस्टन स्टेडियम में ग्रुप सी के मुकाबले में स्कॉटलैंड को मजबूत इरादों वाली मोरक्को की टीम से भिड़ना होगा। यह मैच आप दोनों टीमों के जज्बे और जिद के लिए देख सकते हैं।

और कल सुबह, भारतीय समयानुसार साढ़े छह बजे, फिलाडेल्फिया में ब्राजील अपेक्षाकृत कमजोर हैती की टीम के खिलाफ मैदान में उतरेगी। अगले दौर में जगह बनाने के लिए उसे यह मैच अच्छे अंतर से जीतना ही होगा। जहां तक खबर है, चोटिल नेमार एक बार फिर टीम का हिस्सा नहीं होंगे। एक दफा फिर ब्राजील को जिताने की जिम्मेदारी विनीसियस जूनियर के कंधों पर होगी। कोच कार्लो एंसेलोटी के विश्व कप दल में मेहनती युवा सेंटर फॉरवर्ड जाओ पेड्रो के स्थान पर चोटिल नेमार को तरजीह देने के फैसले की चारों ओर आलोचना हो रही है, क्योंकि पिछले मैच में हमने देखा कि इगोर थियागो पूरी तरह असफल रहे थे। इस मैच से पहले आज की रात निश्चित ही कोच कार्लो के लिए एक बड़ी रात होगी।

फिर, कल सुबह साढ़े आठ बजे, अपना पिछला मैच हार चुकी ग्रुप डी की दो टीमें, तुर्की और पैराग्वे, सांता क्लारा के सैन फ्रांसिस्को स्टेडियम में आमने-सामने होंगी। दोनों ही जीत के लिए लालायित रहेंगी। तुर्की के लिए युवा अर्दा गुलेर अहम भूमिका निभाएंगे।

आगे, जापान के विरुद्ध अपना पिछला मैच ड्रॉ खेलने वाली रोनाल्ड कोमान की नीदरलैंड्स का सामना होगा ट्यूनीशिया को 5-1 से रौंद चुकी स्वीडन की आक्रामक टीम से। एक दफा फिर ग्योकेरेस, इसाक और अयारी जैसे अटैकर्स से लैस स्वीडन मैच जीतकर अगले दौर में जगह बनाना चाहेगी। पिछला मैच ड्रॉ रहने के चलते नीदरलैंड्स पर निश्चित रूप से अतिरिक्त दबाव रहेगा। यह भी एक बेहतरीन मुकाबला होगा।

यूं ही कई महत्वपूर्ण मैच हमारा इंतजार कर रहे हैं। कई खूबसूरत कहानियां सदैव के लिए अमर होने का इंतजार कर रही हैं। बने रहिए साथ। फुटबॉल का सिलसिला जारी रहेगा। 

जानिए दुबई के उस ‘Botim’ ऐप की कहानी, जिसके जरिए कनेक्टेड थे राँची में RSS दफ्तर पर बम फेंकने वाले पाकिस्तानी एजेंट

झारखंड की राजधानी रांची में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के दफ्तर पर हुए हालिया पेट्रोल बम हमले ने भारत की सुरक्षा एजेंसियों के कान खड़े कर दिए हैं। इस गंभीर मामले की जाँच जैसे-जैसे आगे बढ़ रही है, वैसे-वैसे इसमें चौंकाने वाले खुलासे हो रहे हैं। इस हमले के तार सीधे तौर पर पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई (ISI) और दुबई से जुड़े हुए पाए गए हैं।

इस पूरी आतंकी साजिश को रचने, स्थानीय स्तर पर लड़कों को तैयार करने और विदेशों में बैठे आकाओं से खुफिया बातचीत करने के लिए एक खास डिजिटल प्लेटफॉर्म का सहारा लिया गया था। इस प्लेटफॉर्म का नाम ‘Botim’ (बोटिम) ऐप है। इस नए और बेहद चालाक तरीके ने सुरक्षा व्यवस्था के सामने एक बिल्कुल नई चुनौती खड़ी कर दी है। आइए इस पूरे मामले का एक-एक पहलू बहुत ही आसान भाषा में समझते हैं।

क्या हुआ था रांची के संघ कार्यालय में

यह घटना 16 जून की आधी रात के वक्त की है। रांची के निवारणपुर (चुटिया थाना क्षेत्र) में स्थित संघ कार्यालय में करीब बीस लोग अंदर मौजूद थे। इसी दौरान दो युवक पैदल चलकर दफ्तर के बाहर पहुँचते हैं। उनके हाथों में पेट्रोल से भरी शीशे की बोतलें थीं। एक युवक लाइटर से बोतल के मुँह पर बंधी पट्टी में आग लगाता है और उसे संघ कार्यालय की तरफ फेंक देता है। हमलावरों ने कुल दो पेट्रोल बम फेंके थे, जिनमें से एक मुख्य गेट के बाहर गिरा और दूसरा इमारत की छत पर जा गिरा।

गनीमत यह रही कि इस हमले में किसी को चोट नहीं आई, वरना बहुत बड़ा हादसा हो सकता था। बम फेंकने के तुरंत बाद आरोपित वहाँ से भाग निकले। वारदात को अंजाम देकर ये लोग ट्रेन से दिल्ली भागने की फिराक में थे। हालाँकि, रांची पुलिस ने मुस्तैदी दिखाई और अलर्ट जारी करके आरोपितों को बिहार के गया रेलवे स्टेशन से धर दबोचा। इस मामले में पुलिस ने मुख्य हमलावरों सहित कुल 4 आरोपितों को गिरफ्तार किया है, जिनमें सैफ अली अंसारी उर्फ रोहित, अमन अंसारी और सायम सुजान शामिल हैं।

क्या है यह ‘Botim’ ऐप और इसका पूरा सच

Botim‘ (बोटिम) मुख्य रूप से संयुक्त अरब अमीरात यानी UAE का एक बहुत ही बड़ा और लोकप्रिय डिजिटल संचार प्लेटफॉर्म है। इसकी शुरुआत काफी समय पहले हुई थी और शुरुआत में यह केवल सुरक्षित Voice और Video कॉलिंग करने के लिए बनाया गया था। आज के समय में दुनिया भर में इसके 15 करोड़ से भी ज्यादा एक्टिव यूजर्स हो चुके हैं। वक्त बदलने के साथ यह ऐप अब सिर्फ बातचीत करने का माध्यम नहीं रहा है, बल्कि यह एक ‘सुपर ऐप’ बन चुका है।

इसके जरिए लोग अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक देश से दूसरे देश में पैसे भेजते हैं, अपने रोजमर्रा के बिलों का भुगतान करते हैं और घरेलू पेमेंट ट्रांसफर भी करते हैं। इस पूरे डिजिटल सिस्टम को एस्ट्रा टेक नाम की कंपनी संचालित करती है। दुबई और खाड़ी देशों में यह ऐप वहाँ के लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी का एक बेहद अहम हिस्सा माना जाता है।

दुबई कनेक्शन और कैसे भारत आया इसका नेटवर्क

इस खतरनाक नेटवर्क के भारत आने की कहानी काफी पेचीदा और चौंकाने वाली है। दुबई और पूरे UAE में सरकार के बहुत कड़े कानून और नियम लागू हैं। वहाँ पर सुरक्षा कारणों से व्हाट्सएप कॉलिंग पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा हुआ है। इस वजह से भारत, पाकिस्तान या दुनिया के किसी भी देश से जो लोग दुबई कमाने या घूमने जाते हैं, वे अपने घर पर Video या वॉयस कॉल करने के लिए अनिवार्य रूप से बोटिम ऐप का ही इस्तेमाल करते हैं।

रांची हमले के दो मुख्य आरोपित सैफ अंसारी और अमन अंसारी भी कुछ समय पहले रोजगार की तलाश में दुबई गए थे। वहाँ रहते हुए उन्होंने अपनों से बात करने के लिए इस ऐप को अपने मोबाइल में डाउनलोड किया था। इसी दौरान दुबई में वे शाहबाज राणा उर्फ भट्टी नाम के एक पाकिस्तानी नागरिक के संपर्क में आए। शाहबाज राणा ही इस पूरी साजिश का मुख्य मास्टरमाइंड है, जो ISI के इशारे पर भारत विरोधी नेटवर्क चला रहा है।

पाकिस्तानी आकाओं ने कैसे किया इस ऐप का इस्तेमाल

दुबई में व्हाट्सएप कॉलिंग बंद होने के कारण मास्टरमाइंड शाहबाज राणा ने इन दोनों भारतीय लड़कों से संपर्क बनाए रखने के लिए बोटिम ऐप का ही इस्तेमाल करना शुरू किया। उसने इन युवाओं की आर्थिक लाचारी का फायदा उठाया और धीरे-धीरे इनका ब्रेनवॉश कर दिया। उसने इन्हें पाकिस्तान समर्थित आतंकी संगठन ‘तहरीक-ए-तालिबान हिंदुस्तान’ (TTH) के लिए काम करने के लिए पूरी तरह राजी कर लिया।

जब सैफ और अमन भारत वापस लौटे, तो वे अपने मोबाइल में इस ऐप के जरिए पाकिस्तानी आका के सीधे संपर्क में थे। शाहबाज राणा ने बोटिम ऐप के जरिए ही इन्हें रांची में RSS दफ्तर की रेकी करने, टारगेट चुनने और हमला करने के निर्देश दिए थे। यहाँ तक कि हमले के लिए पेट्रोल बम कैसे बनाया जाता है, इसके वीडियो ट्यूटोरियल भी सोशल मीडिया और इसी ऐप के जरिए इन तक पहुँचाए गए थे।

हमला करके हैंडलर को सबूत भेजने का खेल

इस पूरी आतंकी घटना में सबसे हैरान करने वाली बात CCTV फुटेज और जाँच में सामने आई है। जब एक आरोपित दफ्तर पर पेट्रोल बम फेंक रहा था, तब उसका दूसरा साथी अपने मोबाइल फोन से इस पूरी घटना का लाइव वीडियो रिकॉर्ड कर रहा था। आरोपियों ने दफ्तर को पूरी तरह से आग के हवाले करने की नियत से यह कदम उठाया था। बम फेंकने की वारदात को अंजाम देने के तुरंत बाद, उन्होंने भागते हुए इस पूरी घटना का वीडियो बोटिम ऐप के जरिए दुबई में बैठे अपने पाकिस्तानी हैंडलर शाहबाज राणा को भेज दिया।

यह वीडियो इसलिए भेजा गया था ताकि वे अपने आका को यह सबूत दे सकें कि उन्होंने दिए गए टास्क को पूरी तरह पूरा कर दिया है। यह इस बात का साफ सबूत है कि यह कोई मामूली तोड़फोड़ नहीं थी, बल्कि विदेशों से संचालित होने वाला एक सोची-समझी साजिश का हिस्सा था।

सुरक्षा एजेंसियों के सामने खड़ी हुई नई चुनौतियां

बोटिम ऐप का इस तरह आतंकी घटना में इस्तेमाल होना भारत की सुरक्षा एजेंसियों के लिए एक बहुत बड़ा सिरदर्द बन गया है। यह ऐप खुद को पूरी तरह से एंड-टू-एंड एन्क्रिप्टेड और सुरक्षित होने का दावा करता है, जिससे इसकी चैट और कॉल्स को आसानी से ट्रैक करना मुश्किल होता है। सबसे बड़ी चिंता इस ऐप के फाइनेंशियल टूल्स को लेकर है। चूंकि इस ऐप के जरिए विदेशों से सीधे पैसे ट्रांसफर किए जा सकते हैं।

इसलिए जाँच एजेंसियाँ अब इस बात की गहराई से छानबीन कर रही हैं कि कहीं इन आतंकियों को हमले के लिए इसी रास्ते से फंडिंग तो नहीं की गई थी। पाकिस्तानी एजेंसियाँ अब बहुत ही कम खर्च में स्थानीय युवाओं को सोशल मीडिया और ऐसे ऐप्स के जरिए बहकाकर छोटे-छोटे आतंकी मॉड्यूल तैयार कर रही हैं, जिन्हें ट्रैक करना बेहद कठिन होता जा रहा है।

सख्त कानूनी कार्रवाई और एनआईए की तैयारी

रांची पुलिस ने इस मामले को बेहद गंभीरता से लिया है। गिरफ्तारी के बाद जब मुख्य आरोपित सैफ अंसारी ने कोतवाली थाने के पास से पुलिसकर्मियों पर हमला करके भागने की कोशिश की, तो पुलिस ने पीछा करके मंडला टोल प्लाजा के पास मुठभेड़ में उसके पैर में गोली मार दी। फिलहाल उसका इलाज चल रहा है। पुलिस ने पकड़े गए सभी आरोपितों पर भारतीय न्याय संहिता के साथ-साथ विस्फोटक पदार्थ अधिनियम और देश का सबसे कड़ा आतंकवाद विरोधी कानून यूएपीए (UAPA) लगा दिया है।

यूएपीए की धाराएँ लगने के बाद अब इन आरोपितों को आसानी से जमानत नहीं मिल पाएगी। मामले की गहराई और इसके अंतरराष्ट्रीय तथा पाकिस्तानी कनेक्शन को देखते हुए राज्य सरकार ने एसआईटी का गठन किया है, और बहुत जल्द इस पूरे नेटवर्क की जाँच NIA को सौंपी जा सकती है ताकि देश के भीतर छिपे इसके अन्य मददगारों को भी बेनकाब किया जा सके।

आरफा जी, बेवकूफ तो आपने उन सेकुलर हिंदुओं को बनाया है जिन्होंने आपको ‘पत्रकार’ समझा

कुंठा और पूर्वाग्रह ऐसी चीजें हैं जो इंसान के दिमाग को खोखला कर देती हैं। जब यह बीमारी किसी के जेहन में घर कर जाए, तो उसे हर सकारात्मक चीज में भी सिर्फ नकारात्मकता ही नजर आती है। इस्लामी पत्रकारिता के लिए कुख्यात आरफा खानम शेरवानी इसी बीमारी से पीड़ित हैं।

आज जब पूरी दुनिया देख रही है कि वैश्विक महाशक्तियों के बीच भारत और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का कद और लोकप्रियता किस स्तर पर बढ़ी है- उस समय आरफा खानम शेरवानी खोज-खोजकर सिर्फ अपने देश के प्रधानमंत्री की बुराई करने में जुटी हैं।

उनकी कुंठा देख साफ पता चलता है कि चाहे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप सरेआम मीडिया के सामने मोदी की सराहना करें, फ्रांस के राष्ट्रपति खुद वीडियो संदेशों के जरिए अपना प्रेम जाहिर करें, या फिर इजरायल के प्रधानमंत्री गर्मजोशी से गले मिलकर भारत के साथ दोस्ती की गहराई को दिखाएँ, लेकिन आरफा को इन दृश्यों से कोई फर्क नहीं पड़ेगा। वो अपने स्तर पर प्रधानमंत्री की छवि धूमिल करने के प्रयास जी-जान से करेंगी।

इस बार भी आरफा ने यही किया है। जी-7 समिट के दौरान सामने आई तस्वीरों को देख पूरा देश प्रधानमंत्री की तारीफ में जुटा था, लेकिन आरफा खानम ने एक पर्ची को देखकर पूरी वीडियो बना दी और ये समझाया कि अब तक कहा जाता था कि नरेंद्र मोदी बहुत अच्छे वक्ता हैं, मगर अब मान लिया जाना चाहिए कि वो पर्ची वाले PM हैं, उन्होंने देश के लोगों को बेवकूफ बनाया है।

अपने इंट्रो में आरफा ने कहा, “15 साल पहले जिस व्यक्ति ने भारत के लोगों को ये कहकर बेवकूफ बनाया कि वो देश के मान-सम्मान-सरहदों की रक्षा करेगा। भारत की जनता ने जिसे तीन बार प्रधानमंत्री बनाया… अब वो सबूत मिल रहे हैं जिसके आधार पर कहा जा सकता है कि प्रधानमंत्री मोदी भारत के इतिहास के सबसे कमजोर प्रधानमंत्री हैं।”

अपनी वीडियो में वो जर्नलिज्म के छात्रों को पीएम मोदी और ट्रंप की मुलाकात पर रिसर्च करने को कहती हैं कि वो पीएम मोदी के बैठने से लेकर हँसने तक को नोट करने को कहती हैं। इतना ही नहीं आरफा ये भी समझाने का प्रयास करती हैं कि प्रधानमंत्री मोदी ने देश को विदेशी नेता के आगे झुका दिया है।

आरफा की समस्या ये है कि आखिर राष्ट्रपति ट्रंप ने प्रधानमंत्री की तारीफ क्यों की, क्यों उन्हें सुंदर, अच्छा डील करने वाला बताया और क्यों ये बोला कि जब तक पीएम मोदी प्रधानमंत्री हैं अमेरिका हमेशा भारत का साथ देगा। ऑपरेशन सिंदूर के समय पर पाकिस्तान के साथ बैठकर सब सुलह करने की पैरवी करने वाली आरफा खानम यहाँ अपनी दोगलई दिखाते हुए ये भी कहती हैं कि क्या हमारे ऐसे दिन आ गए हैं कि दूसरे देश हमारे मामलों में हस्तक्षेप करेंगे!

आगे वीडियो में आरफा खानम को समस्या इस बात से होती है कि प्रधानमंत्री के हाथ में पर्ची कैसे दिख गई। वो इस चीज को अपनी वीडियो में ऐसे हाईलाइट कर रही हैं जैसे दुनिया के पत्रकार की नजर नहीं पड़ी थी और उन्होंने ही प्रधानमंत्री को एक्सपोज किया हो।

अब जरा खुद सोचिए क्या प्रधानमंत्री मोदी को ट्रंप के सामने बैठते हुए ये नहीं पता था कि कैमरे में वो दिख रहे हैं और उनके हाथ में रखा कागज भी… उन्हें भी मालूम है कि उनकी हरकतों पर विदेशी कैमरों से ज्यादा देश में बैठे गिद्धों की नजर है जो मौका मिलते ही झपट्टा मारेंगे। लेकिन फिर भी अगर उन्होंने अपने हाथ में कोई कागज रखा तो ये ऐसा मुद्दा नहीं है कि उनकी वाकशैली पर सवाल खड़े किए जाएँ। ये सिर्फ कुतर्क है।

अब इस कुतर्क की हकीकत को समझिए कि दुनिया का बड़े से बड़ा नेता, चाहे वह अमेरिकी राष्ट्रपति हो या कोई महान विचारक, जब किसी औपचारिक मंच पर देश या विदेश नीति, आँकड़ों और गंभीर विषयों पर बात करता है, तो वह पॉइंटर्स को अपने साथ रखता है।

यह एक जिम्मेदार नेतृत्व की पहचान है ताकि देश को लेकर कोई भी बिंदु गलती से भी गलत न पेश हो। इसे देश को मूर्ख बनाना कहना नहीं, बल्कि जिम्मेदारी समझना भी कहा जाता है। आरफा भी जब टीवी के सामने कैमरे के लिए कभी बोलती होंगी तो टेलीप्राम्पटर उनके सामने रहता होगा ताकि खबर का कोई पहलू न छूटे… है न?

जब बड़े-बड़े पत्रकार किसी मुद्दे पर अपने पाठकों को बिना टेलीप्रॉम्पटर पर देखे खबर पढ़कर नहीं सुना सकते, तो प्रधानमंत्री के हाथ में दिखी एक पर्ची से उनके वाककौशल पर सवाल नहीं उठाना चाहिए उठाइए… क्योंकि इससे मजाक उन्हीं पत्रकारों का बनेगा।

क्या है आरफा खानम की प्रासंगिकता?

हास्यास्पद बात ये है कि प्रधानमंत्री की विश्वसनीयता पर सवाल करने का प्रयास आरफा जैसे वो लोग कर रहे हैं जिनकी खुद की प्रासंगिकता सिर्फ इस्लामी रिपोर्टिंग तक सीमित रह गई है। आज सरकार विवरण दे सकती है कि प्रधानमंत्री ने देश की जनता के लिए क्या किया। उनके पास अपने कामों को सिद्ध करने के लिए जमीन पर दिख रहा विकास और डेटा होगा। मगर, आरफा खानम के पास खुद को ‘निष्पक्ष’ साबित करने के लिए न लेख होगा, न निजी विचार होंगे, न सोशल मीडिया पोस्ट होगा और न ही कोई वीडियो होगी।

वो भले चिल्ला-चिल्लाकर खुद को न्यूट्रल कहें, हाशिए समाज पर बैठे लोगों की आवाज बनने का दावा करें किंतु उनके किए काम और उनकी टाइमलाइन साफ बताती है कि उनकी चिंताओं में देश के हिंदू के मुद्दे हैं ही नहीं। उनकी स्थिति यहाँ पहुँच चुकी है कि अगर आज वह अपने में परिवर्तन करके हिंदुओं की बात करना और मोदी सरकार के कार्यों की सराहना करना शुरू भी कर दें तो उनके अपने दर्शक ही उनको स्क्रीन से दफा कर देंगे।

असल में बेवकूफ बनाने की की जाए तो असली बेवकूफ तो आपने सेकुलर हिंदुओं का बनाया है, जिन्होंने विश्वास किया कि आप निष्पक्ष पत्रकार के तौर पर उन्हें सूचनाएँ देंगी, हिंदुओं के पीड़ित होने पर उनके मुद्दे को भी प्राथमकिता देंगी, लेकिन आपने मंच पाकर कभी अपनी कट्टरपंथी खाल को नहीं बदला। देश के पक्ष में उस समय तक बोला आपको लगा कि आपका फायदा है, मोदी सरकार आते ही आपके सुर बदले और आपकी इस्लामी खाल खाल से आपके सेकुलर हिंदू फॉलोवर्स भी परिचित हुए कि आप सिर्फ उन्हें ठगने के लिए बैठी हैं।

हम केवल बीते दिनों की ही बात करें तो देश-दुनिया में बहुत कुछ हुआ है, लेकिन आपने सूचनाओं को किस तरह प्रसारित किया इसका उदाहरण आपकी वीडियोज के थंबनेल देखकर ही पता चलता है। आइए आरफा खानम के कुछ थंबनेल में लिखे टेक्स्ट पर नजर डालें…

  • ट्रंप के सामने मोदी की बेबसी, दुनिया चौंकी
  • ईरान वसूलेगा अमेरिका से 400 बिलियन? PM Modi को Iran से क्या सीखना चाहिए?
  • आयुष की तरह जब आदित्य ने अपनाया इस्लाम, हिंदुत्ववादियों ने जीना कैसे हराम कर दिया?
  • सकते में Israel, Iran सबसे बड़ा Winner, Pakistan को ज़बरदस्त Diplomatic Success
  • PM Modi के गले मिलने से विदेश नीति नहीं चलती, क्या यही है सबूत?
  • अन्ना आंदोलन का समर्थन बड़ी भूल थी? मोदी सरकार में देश बदतर?
  • “तानाशाह को खटकते हैं मेरे जैसे पत्रकार” पंजाब की मिट्टी से Arfa Khanum Sherwani
  • Deal क़रीब, Shehbaz Sharif ने चौंकाया, गोदी मीडिया की Iran पर डबल बेशर्मी
फोटो साभार: आरफा खानम शेरवानी का यूट्यूब

आप इन थंबनेल और शीर्षक को देखिए। क्या आपको कहीं से भी लगता है कि एक पत्रकार द्वारा दी गई ये रिपोर्ट हो सकती हैं। शीर्षक ही अपने आप में ये बताने के लिए काफी हैं कि आरफा को पीएम मोदी बेबस दिखें तो उनके लिए अच्छा कंटेंट हैं, लेकिन अगर वो गले मिलें तो ये बताया जाएगा कि गले मिलने से विदेश नीति नहीं चलती।

इसके अलावा ईरान से जुड़ी अगर कोई खबर आए तो उसपर आरफा का कैसा रुख होगा और पाकिस्तान की छवि का निर्माण करना हो तो कैसे हेडलाइन में उसकी दलाली को डिप्लोमैटिक सक्सेस बताएँगे।

वहीं देश भर के हिंदुओं को आहत करने वाला आयुष मलिक का मुद्दा अगर चर्चा में आ जाए तो ये देख सकते हैं कि उनकी रिपोर्टिंग उस पर कैसे होगी। वो ऐसी घटना में इस्लामी कट्टरपंथ को उजागर करने की बजाय हिंदूवादियों को बर्बर दिखाने का प्रयास करेंगी।

आरफा खानम के सोशल मीडिया पोस्ट

इसी प्रकार से उनका सोशल मीडिया हैंडल पर पोस्ट भी हैं। मोदी सरकार को देश से उखाड़ने का सपना देखने वाली आरफा एक तरफ राहुल गाँधी की कोटा स्पीच को जरूरी बताती हैं और दूसरी ओर ट्रंप के साथ बैठे प्रधानमंत्री का मखौल उड़ाने से पीछे नहीं हटतीं। उन्हें ईरान की जीत का जश्न इसलिए मनाना है क्योंकि वहाँ एक मजहब के लोगों की बहुलता है, लेकिन भारत के आयुष मलिक को इसलिए दोषी दिखाना है क्योंकि उसके केस पर देश के हिंदुओं में नाराजगी है।

क्या आपको कहीं कोई पोस्ट या वीडियो थंबनेल देखकर ये लगा कि आरफा ने कभी हिंदुओं का मुद्दा उठाया है, लव जिहाद के लिए मारी गई किसी हिंदू लड़की के लिए अपना शोक व्यक्त किया है? वैश्विक संकट के बीच देश की प्रशंसा की है? नहीं, क्योंकि वास्तविकता यही है कि खुद को निष्पक्ष पत्रकार बताने वाली, सत्ता का कॉलर पकड़कर सवाल पूछने का सपना देखने वाली आरफा के लिए हिंदुओं के मुद्दे जरूरी हैं ही नहीं। उन्होंने अपने पत्रकार होने का अस्तित्व सिर्फ इस्लामी कट्टरपंथियों के मुद्दे उठाकर ही बचा रखा है। मोदी सरकार के रहने से उन्हें यही डर कि एक दिन ये अस्तित्व मिट जाएगा। उन्हें लोग पत्रकार की जगह इस्लामी प्रवक्ता कहने लगेंगे।

क्या अकाल तख्त के आदेश पर CM इस्तीफा दे दें? भगवंत मान विवाद और टिवाना का ऐतिहासिक सबक: जब जिन्ना के दवाब में झुके ‘मुख्यमंत्री’

पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान को अकाल तख्त ने ‘गुरु दोखी’ और खालसा पंथ का विरोधी करार दिया है। उनके इस्तीफे की माँग हो रही है, उनके बहिष्कार की बातें हो रही हैं और उन पर राजनीतिक तथा धार्मिक दबाव बनाया जा रहा है। दूसरी तरफ भगवंत मान इन आरोपों को स्वीकार करने से इनकार कर चुके हैं और इस्तीफा देने के संकेत भी नहीं दिए हैं।

भगवंत मान को इस्तीफा देना चाहिए या नहीं, इस सवाल पर बात करने से पहले 1940 के दशक के पंजाब को समझना जरूरी है। क्योंकि वहीं से इस प्रश्न का एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक संदर्भ मिलता है। उस दौर का पंजाब आज के पंजाब से बिल्कुल अलग था। तब लाहौर भी पंजाब का हिस्सा था और रावलपिंडी भी।

1947 से पहले का पंजाब

उस समय पंजाब के मुख्यमंत्री या प्रीमियर मलिक खिज्र हयात टिवाना थे। वे पंजाब की प्रभावशाली यूनियनिस्ट पार्टी के नेता थे और 1942 में पहली बार पंजाब के मुख्यमंत्री बने थे।

साल 1946 में टिवाना दोबारा मुख्यमंत्री बने। उनकी सरकार को पंजाब के दो बड़े राजनीतिक दलों, अकाली दल और कॉन्ग्रेस, दोनों का समर्थन प्राप्त था। यह वह समय था जब देश बेहद उथल-पुथल के दौर से गुजर रहा था। मुस्लिम लीग अलग पाकिस्तान की माँग कर रही थी, कॉन्ग्रेस देश के विभाजन का विरोध कर रही थी और अंग्रेज अपनी सत्ता बचाने की कोशिश में लगे हुए थे।

मलिक खिज्र हयात टिवाना

1945 में द्वितीय विश्व युद्ध समाप्त हो चुका था और अंग्रेजों के लिए भारत पर नियंत्रण बनाए रखना कठिन होता जा रहा था। फरवरी 1947 में ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लेमेंट एटली ने घोषणा की कि भारत को स्वतंत्रता दी जाएगी। जून 1947 में अंग्रेजों ने मुस्लिम लीग की पाकिस्तान संबंधी माँग स्वीकार करते हुए भारत के विभाजन की योजना का भी ऐलान कर दिया।

भारत और पाकिस्तान की सीमाएँ तय करने के लिए सर सिरिल रेडक्लिफ को भारत भेजा गया। सीमांकन के दौरान आबादी, धर्म, भाषा और स्थानीय नेतृत्व की इच्छाएँ महत्वपूर्ण कारक बन गईं। मुस्लिम लीग का दावा था कि पंजाब में मुसलमान सबसे बड़ी आबादी हैं, इसलिए पूरा पंजाब पाकिस्तान में शामिल होना चाहिए।

इस माँग के सामने केवल हिंदू नेता ही नहीं खड़े थे। मुस्लिम लीग को सबसे बड़ा विरोध पंजाब के मुख्यमंत्री मलिक खिज्र हयात टिवाना से झेलना पड़ रहा था। टिवाना स्वयं एक प्रभावशाली मुस्लिम नेता थे लेकिन उन्होंने पंजाब के विभाजन का स्पष्ट विरोध किया।

दरअसल, यह विरोध नया नहीं था। 1935 से ही यूनियनिस्ट पार्टी और मुस्लिम लीग के बीच खींचतान चल रही थी। 1937 में सर सिकंदर हयात खान और मोहम्मद अली जिन्ना के बीच एक समझौता भी हुआ था। हालाँकि, उसमें पाकिस्तान का उल्लेख नहीं था लेकिन जिन्ना चाहते थे कि यूनियनिस्ट पार्टी के विधायक मुस्लिम लीग में शामिल हों।

1940 में मुस्लिम लीग ने लाहौर प्रस्ताव पारित किया, जिसे बाद में पाकिस्तान प्रस्ताव कहा गया। इसके बाद मुस्लिम लीग ने यूनियनिस्ट पार्टी पर लगातार दबाव बनाना शुरू किया कि वह भी पाकिस्तान निर्माण का समर्थन करे। चूँकि यूनियनिस्ट पार्टी के अधिकांश बड़े नेता मुसलमान थे और इसलिए उन पर मजहबी आधार पर दबाव डाला जाने लगा।

1944 तक मुस्लिम लीग का प्रभाव काफी बढ़ चुका था। जिन्ना ने एक बैठक में टिवाना पर पाकिस्तान के समर्थन के लिए दबाव बनाया। टिवाना कुछ समय के लिए असमंजस में पड़े लेकिन पंजाब के गवर्नर ने उन्हें अपने रुख पर कायम रहने की सलाह दी और उन्होंने जिन्ना की माँगों को स्वीकार करने से इनकार कर दिया।

इसके बाद उनके खिलाफ जिन्ना एंड कंपनी ने व्यापक दुष्प्रचार शुरू कर दिया। उन्हें कौम का गद्दार, काफिर और मुसलमानों का दुश्मन कहा गया। यहाँ तक कि जिन्ना ने भी उन्हें काफिर घोषित कर दिया। विभाजन की घोषणा के बाद यह अभियान और तेज हो गया।

टिवाना लगातार यह कहते रहे कि पंजाब का विभाजन नहीं होना चाहिए। उनका मानना था कि पंजाब में रहने वाले विभिन्न धर्मों के लोगों के बीच एक साझा सांस्कृतिक संबंध है। लेकिन यह रुख उनके लिए राजनीतिक रूप से भारी पड़ गया। उनके खिलाफ सड़कों पर विरोध प्रदर्शन शुरू हुए। उनके प्रतीकात्मक जनाजे निकाले गए। मौलानाओं ने उनके खिलाफ तकरीरें दीं। जहाँ भी वे जाते, उन्हें काफिर और कौम का गद्दार कहा जाता। उनकी गाड़ियों को घेरा जाता और उन पर लगातार सामाजिक तथा धार्मिक दबाव बनाया जाता।

आखिरकार 2 मार्च 1947 को खिज्र हयात टिवाना ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। पूर्व आईएएस अधिकारी आर.के. कौशिक ने ‘द ट्रिब्यून’ में प्रकाशित अपने लेख में उनके इस्तीफे की घटना का उल्लेख किया है।

कौशिक के अनुसार, इस्तीफे वाले दिन टिवाना पंजाब के शिक्षा मंत्री इब्राहिम खान बर्क के घर गए थे। वहाँ मंत्री के 8 वर्षीय बेटे ने उनसे कहा, “क्या आप वही खिज्र टिवाना अंकल हैं जो मुस्लिम मुल्क पाकिस्तान के रास्ते का रोड़ा हैं? मैं तो आपसे हाथ नहीं मिलाऊँगा।” यह सुनकर टिवाना विचलित हो गए। बाद में उन्होंने विकास मंत्री सरदार स्वर्ण सिंह से कहा, “मैं मुस्लिम लीग से लड़ाई जारी रख सकता था लेकिन यदि हमारे बच्चे ही हमें खलनायक समझने लगे हैं, तो बेहतर है कि हम रास्ते से हट जाएँ और जो होना है, होने दें।”

इसके बाद उन्होंने इस्तीफा दे दिया। अगले ही दिन मोहम्मद अली जिन्ना ने घोषणा की कि पाकिस्तान के रास्ते की सबसे बड़ी बाधा दूर हो चुकी है। इतिहासकारों का मानना है कि इसके बाद पंजाब में हालात तेजी से बिगड़े और व्यापक सांप्रदायिक हिंसा का दौर शुरू हुआ।

भगवंत मान को देना चाहिए इस्तीफा?

आज भगवंत मान को लेकर उठ रहा विवाद कुछ लोगों को उसी इतिहास की याद दिलाता है। अकाल तख्त का कहना है कि उसे भगवंत मान की दो आपत्तिजनक वीडियो मिली हैं और इसी आधार पर उन्हें खालसा पंथ का विरोधी माना गया है। अकाली दल और कॉन्ग्रेस समेत कई राजनीतिक दलों ने भी इस आधार पर उनके इस्तीफे की माँग की है।

हालाँकि भगवंत मान के इस्तीफे का सवाल यदि उठता है, तो उसके कारण लोकतांत्रिक और प्रशासनिक होने चाहिए। यदि कोई मानता है कि उनके शासनकाल में पंजाब पर कर्ज बढ़ा है, अपराध नियंत्रण कमजोर रहा है, जेलों से अपराधी वीडियो कॉल कर रहे हैं, ड्रग्स की समस्या का समाधान नहीं हुआ या चुनावी वादे पूरे नहीं हुए, तो ये राजनीतिक और जनहित से जुड़े मुद्दे हैं। ऐसे कारणों के आधार पर जनता किसी मुख्यमंत्री से जवाब माँग सकती है और इस्तीफे की माँग भी कर सकती है।

लेकिन केवल इसलिए कि किसी धार्मिक संस्था ने आदेश दिया है, किसी चुने हुए मुख्यमंत्री को पद छोड़ देना चाहिए यह लोकतांत्रिक दृष्टि से गंभीर प्रश्न है। अगर नेता ने धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाई है तो अकाल तख्त उसे धार्मिक दंड दे सकती हैं, उसके धार्मिक अधिकार सीमित कर सकती हैं या उसका सामाजिक बहिष्कार कर सकती हैं। लेकिन लोकतांत्रिक पद पर बने रहने या न रहने का अंतिम निर्णय जनता के हाथ में होना चाहिए।

लोकतंत्र में सत्ता का अंतिम स्रोत जनता होती है। यदि जनता को लगता है कि कोई नेता उसके विश्वास के अनुरूप नहीं है, तो चुनाव में उसे सत्ता से बाहर किया जा सकता है। पंजाब में भी अगला चुनाव दूर नहीं है। ऐसे में फैसला जनता के हाथ में होना चाहिए, न कि किसी ऐसी व्यवस्था के हाथ में जो निर्वाचित जनप्रतिनिधियों से ऊपर स्वयं को स्थापित कर दे।

खिज्र हयात टिवाना की कहानी इसी बहस का ऐतिहासिक उदाहरण प्रस्तुत करती है। यह कहानी केवल एक व्यक्ति के इस्तीफे की नहीं बल्कि इस सवाल की है कि क्या लोकतांत्रिक राजनीति को धार्मिक दबाव के अधीन होना चाहिए। इतिहास बताता है कि जब राजनीतिक निर्णय लोकतांत्रिक प्रक्रिया की बजाय धार्मिक या सामुदायिक दबाव के आधार पर होने लगते हैं, तो उसके दूरगामी परिणाम पूरे समाज को भुगतने पड़ सकते हैं।

दलित-जाट-तमिल कोई नहीं है हिंदू… मौलाना सज्जाद नोमानी खुले में कर रहा भारतीयों को तोड़ने का प्रयास: सनातनियों से करता है घृणा, तालिबानियों को भेजता है सलाम

ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड से जुड़े मौलाना खलीलुर रहमान सज्जाद नोमानी का एक विवादित बयान की वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से शेयर हो रही है। वायरल हो रही एक वीडियो क्लिप में वह दावा करते हैं कि भारत में हिंदू अल्पसंख्यक हैं। किसी भी परिस्थिति में हिंदुओं को बहुसंख्यक नहीं माना जा सकता।

मौलाना नोमानी ने अपने इस दावे के पीछे तर्क देते हुए देश के कई बड़े सामाजिक और क्षेत्रीय समूहों को हिंदू धर्म के दायरे से बाहर आते हैं। उन्होंने कहा, सिख, ईसाई और बौद्ध ये तो हिंदू हैं ही नहीं। इनके अलावा अनुसूचित जाति (SC), जाट और जनजातीय लोग भी हिंदू नहीं हैं। न ही तमिलनाडु के लोग और लिंगायत खुद को हिंदू मानते हैं। 

भाषण में नोमानी की दिखी हिंदू घृणा

अपने भाषण में नोमानी ने केवल सामाजिक वर्गीकरण ही नहीं किया, बल्कि देश की राजनीति और मुस्लिम समुदाय के रुख पर भी गहरी निराशा और हताशा व्यक्त की। उन्होंने कहा “हमने हिंदुओं को ‘सेकुलर’ (धर्मनिरपेक्ष) और ‘फासिस्ट’ (फासीवादी) श्रेणियों में बाँट दिया। हम राजनीतिक समर्थन के लिए सेकुलर हिंदुओं पर निर्भर रहे, लेकिन इन समूहों ने आखिरकार देश की कमान उन लोगों के हाथों में सौंप दी जिन्हें हम फासिस्ट हिंदू कहते हैं। दोनों ने ही मिलकर हमारे मकसद को नुकसान पहुँचाया।”

बता दें कि सज्जान नोमानी का यह भाषण 2 फरवरी, 2026 को नई दिल्ली के इंडिया इस्लामिक कल्चरल सेंटर में आयोजित ‘मिल्लत टाइम्स कॉन्क्लेव 2026’ के समापन सत्र के दौरान दिया गया था।

यह कार्यक्रम इस मीडिया हाउस की 10वीं वर्षगांठ के उपलक्ष्य में रखा गया था। इस कार्यक्रम में कॉन्ग्रेस नेता मणिशंकर अय्यर, सलमान खुर्शीद, इमरान प्रतापगढ़ी, समाजवादी पार्टी की सांसद इकरा हसन चौधरी और भाजपा नेता यासिर जिलानी जैसे कई बड़े राजनेता और पत्रकार शामिल थे।
 
मौलाना नोमानी ने जोर देकर कहा कि उनका यह बयान हवा-हवाई नहीं है, बल्कि देश भर में धार्मिक, जातिगत और आदिवासी पहचानों पर किए गए उनके तीन दशकों के सफर और शोध पर आधारित है।

पहले भी उगल चुका है हिंदुओं के लिए जहर

बता दें कि हिंदुओं को तोड़ने और हिंदुओं को बाँटने की बात करने वाला सज्जाद नोमानी का ये पहला विवादित बयान नहीं है। ये वही सज्जाद नोमानी है जिसे तालिबान के आने पर खुशी हुई थी और जो बच्चियों की शिक्षा का विरोधी रहा है।
 
साल 2023 में नोमानी की वीडियो सामने आई थी। अपनी वीडियो में वह कहता सुनाई पड़ रहे थे, “पाक रमजान की रात में उन लोगों पर लानत भेजता हूँ जो अपनी बच्चियों को अकेले कोचिंग सेंटर या कॉलेज भेजते हैं। अल्लाह उन्हें जहन्नुम में भेजेगा।”

इतना ही नहीं साल 2021 में तालिबान ने जब अफगानिस्तान पर कब्जा किया था तब सज्जाद नोमानी ने भारत में इसका स्वागत किया था। मौलाना सज्जाद नोमानी ने तालिबान की तारीफों के पुल बाँधते हुए तालिबानियों को सलाम भेजा था।

सज्जाद नोमानी की हिंदू घृणा  और भारत को तोड़ने का प्रयास

अजीब बात है कि एक तरफ सज्जाद नोमानी खुलकर भारत के हिंदुओं के विरुद्ध अपनी घृणा जाहिर करता है, उन्हें बाँटने की बात करता है, उनके अस्तित्व पर सवाल उठाता है। दूसरी तरफ खुलकर तालिबान के लिए अपना समर्थन देता है, इस्लामी कट्टरपंथ की पैरवी करता है, बच्चियों की पढ़ाई को हराम बताता है, बड़े-बड़े नेता, लेखक, विचारक उसके भाषणों को सुनते हैं और स्वरा भास्कर जैसे लोग तो मुस्लिमों के बीच राजनीति करने के लिए अपना पहनावा तक बदलकर इनके आगे सरेंडर कर देते हैं। लेकिन फिर भी भारत के लिबरल उसे बुद्धिजीवी मानकर इतना बड़ा मंच देते हैं। उसे सुनने के लिए बड़ी तादाद में लोग आते हैं।

कहना गलत नहीं है कि जिन ‘सेकुलर हिंदुओं’ ने कभी अपनी उदारता दिखाने के लिए नोमानी को ‘महान स्कॉलर’ के रूप में स्थापित किया, आज वही स्कॉलर मंचों से खुलेआम हिंदुओं के अस्तित्व और उनकी जनसांख्यिकीको चुनौती दे रहे हैं। आज मंच से खुलेआम इवकी नफरत जगजाहिर हो रही है।

नोमानी का यह दावा कि भारत में हिंदू बहुसंख्यक नहीं हैं और जो खुद को हिंदू मानते हैं वो असल में अलग-अलग पहचानों में बंटे हैं… कोई साधारण बयान नहीं है।

ये हिंदुओं के लिए ही सीखने का समय है कि जब हम खुद को राजनीति जाति और क्षेत्रो में खुद को बाँटते हैं, तभी नोमानी जैसे लोग इसी कमजोरी को पकड़कर हम पर चोट करते हैं। खुलकर हम भारतीयों को तोड़ने का प्रयास करते हैं और ये संदेश देते हैं कि देश में हिंदू आबादी बहुसंख्यक नहीं है और जो लोग खुद को हिंदू मानते हैं वो अलग हैं। इसका सीधा उद्देश्य बहुसंख्यक समाज के भीतर एक ऐसा हीनभावना और भ्रम पैदा करना है जिससे वे अपनी सामूहिक ताकत को भूल जाएँ और कट्टरपंथी ताकतों का गजवा-ए-हिंद का रास्ता आसान हो सके।

‘हर हिंदू घर में है संभावित हत्यारा-बलात्कारी’: वामपंथी अपूर्वानंद ने हिंदुओं के खिलाफ फिर उगला जहर, मुस्लिमों को बताया पीड़ित

प्रोपेगेंडाई पत्रकार आशुतोष के यूट्यूब चैनल ‘सत्य हिंदी’ पर हाल ही में एक लाइव चर्चा प्रसारित हुई। इस चर्चा के दौरान पत्रकार मुकेश कुमार और वामपंथी विचारक अपूर्वानंद ने हिंदू समाज, उनके रीति-रिवाजों और हिंदू संगठनों को लेकर बेहद गंभीर और विवादित बयान दिए।

‘बात बोलेगी’ नाम के इस शो में देश की सांप्रदायिक स्थिति पर बात हो रही थी, लेकिन धीरे-धीरे पूरी बातचीत का रुख हिंदू समाज की आलोचना की तरफ मुड़ गया। चर्चा के दौरान अपूर्वानंद ने भारत में होने वाली हर तरह की हिंसा के लिए सीधे तौर पर हिंदुओं को जिम्मेदार ठहराने की कोशिश की।

उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS), हिंदू त्योहारों, देश की पुलिस, अदालतों और मुख्यधारा की मीडिया पर भी कई आपत्तिजनक टिप्पणियाँ कीं। उन्होंने पूरे हिंदू समाज को हिंसक, जातिवादी और मुस्लिम-विरोधी मानसिकता से ग्रसित बताने का प्रयास किया।

इस बातचीत का सबसे विवादित हिस्सा वह था जब अपूर्वानंद ने सामान्य हिंदू परिवारों को लेकर एक बड़ा दावा कर दिया। उन्होंने कहा कि आज हर हिंदू घर के अंदर एक संभावित हत्यारा या संभावित बलात्कारी छिपा हुआ है। इस बयान के सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रियाएँ देखने को मिल रही हैं और लोग इसे समाज में नफरत फैलाने वाला बयान बता रहे हैं।

हिंदुओं के कथित सामूहिक कट्टरपंथीकरण पर बात करते हुए अपूर्वानंद ने कहा, “भारत में हिंदुओं का बड़े पैमाने पर कट्टरपंथीकरण हो रहा है… ऐसी स्थिति बन गई है कि अब हर घर में इस तरह का एक हिंदू मौजूद है, जो एक संभावित हत्यारा है।”

इसके बाद भी वह नहीं रुके। उन्होंने आगे कहा, “अगर यह हिंदू संभावित हत्यारा नहीं है, तो वह संभावित बलात्कारी है। और यदि वह सीधे तौर पर बलात्कार नहीं कर रहा है, तो वह अपनी कल्पनाओं में या आभासी रूप से बलात्कार कर रहा है।”

अपूर्वानंद ने हिंदू परिवारों को लेकर की गई अपनी इन व्यापक टिप्पणियों को कुछ वर्ष पहले विवादों में रहे ‘सुल्ली डील्स’ और ‘बुल्ली बाई’ मामलों से जोड़ने की कोशिश की। उन्होंने दावा किया कि इन घटनाओं से यह संकेत मिलता है कि मुस्लिम महिलाओं के प्रति अपमानजनक रवैया और मुसलमानों के खिलाफ हिंसा को अब हिंदू परिवारों में सामान्य या स्वीकार्य मान लिया गया है।

उन्होंने आगे यह भी आरोप लगाया कि मुसलमानों के साथ बलात्कार और उनकी हत्या जैसी घटनाओं को हिंदू समाज के एक हिस्से में उचित ठहराया जा रहा है। इस दौरान उन्होंने पूरे हिंदू समाज और हिंदू परिवारों को लेकर व्यापक निष्कर्ष प्रस्तुत किए।

यह भ्रामक निष्कर्ष है कि यदि इसी प्रकार की भाषा किसी अन्य धार्मिक समुदाय के लिए इस्तेमाल की जाती, तो उसे तत्काल घृणा भाषण (हेट स्पीच), सामूहिक बदनाम करने और अमानवीयकरण के रूप में देखा जाता। लेकिन हिंदुओं के संदर्भ में की गई इन टिप्पणियों को चर्चा के दौरान शैक्षणिक विश्लेषण या बौद्धिक विमर्श के रूप में प्रस्तुत किया गया।

हिंदुओं को हमलावर और मुसलमानों को बताया पीड़ित

कार्यक्रम की शुरुआत से ही यह दावा किया गया कि देशभर में हर दिन सैकड़ों ऐसी घटनाएँ हो रही हैं, जिनमें मुसलमानों को पीटा जाता है, उनके साथ दुर्व्यवहार किया जाता है और उन्हें सार्वजनिक रूप से अपमानित किया जाता है। चर्चा के दौरान यह भी कहा गया कि इस कथित उत्पीड़न का शिकार केवल पुरुष ही नहीं, बल्कि बच्चे, महिलाएँ और बुजुर्ग भी बन रहे हैं।

अपूर्वानंद ने दावा किया कि मुसलमान अब कहीं भी सुरक्षित नहीं हैं। उनके अनुसार, सड़कें, मोहल्ले, स्कूल, कॉलेज, बाजार, ट्रेनें और बसें तक मुसलमानों के लिए असुरक्षित हो चुकी हैं। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि हिंदुओं के नाम पर नफरत फैलाने और हिंसा करने वाले लोग बिना किसी भय के कहीं भी पहुँच जाते हैं और हत्या जैसी घटनाओं को भी अंजाम देते हैं।

बातचीत के दौरान यह भी कहा गया कि ‘लव जिहाद’, धर्मांतरण, घुसपैठ, गौ-रक्षा, खान-पान की आदतों, जीवनशैली और धार्मिक त्योहारों जैसे मुद्दों के नाम पर हिंसा को उचित ठहराया जा रहा है। साथ ही यह आरोप भी लगाया गया कि ऐसे तत्वों को सरकार, प्रशासन और पुलिस का संरक्षण प्राप्त है।

अपूर्वानंद ने आगे दावा किया कि मुख्यमंत्री से लेकर प्रधानमंत्री तक के नेता कथित रूप से भड़काऊ भाषणों, बुलडोजर कार्रवाई और धमकियों के जरिए हिंसा को बढ़ावा दे रहे हैं। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि मुख्यधारा की मीडिया ने अपने प्राइम-टाइम कार्यक्रमों और बहसों के माध्यम से इस माहौल को मजबूत किया है।

पूरी बातचीत के दौरान यह स्पष्ट दिखाई दिया कि चर्चा का केंद्र हिंदू समाज, हिंदू संगठनों और हिंदुत्व से जुड़े विचारों को कठघरे में खड़ा करना था, जबकि मुसलमानों को एक संगठित और कथित रूप से कट्टर हिंदू तंत्र के पीड़ित के रूप में प्रस्तुत किया गया।

हिंदुओं पर सामूहिक रूप से चलाया गया मुकदमा

बातचीत के दौरान अपूर्वानंद ने दावा किया कि हिंदुओं की मूल प्रवृत्तियाँ स्वभावतः हिंसक, अश्लील और अभद्र हैं। चर्चा का मुख्य उद्देश्य यह दिखाना था कि हिंदू धर्म की रक्षा का दायित्व कथित तौर पर आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों के हाथों में चला गया है और धार्मिक नेतृत्व से जुड़े कई लोग भी हिंसक गतिविधियों में संलिप्त दिखाई देते हैं।

अपूर्वानंद ने यह भी दावा किया कि ये कथित प्रवृत्तियाँ लंबे समय तक दबे रूप में मौजूद थीं, लेकिन वर्तमान राजनीतिक और धार्मिक नेतृत्व द्वारा हिंदुओं को जिस प्रकार उकसाया जा रहा है, उसके कारण अब वे अधिक खुलकर सामने आने लगी हैं। उनके अनुसार, राजनीतिक और धार्मिक विमर्श ने हिंदू समाज के भीतर मौजूद इन कथित रुझानों को सार्वजनिक रूप से अभिव्यक्ति का अवसर प्रदान किया है।

पूरी चर्चा के दौरान अपूर्वानंद ने हिंदू समाज के चरित्र, धार्मिक नेतृत्व और हिंदुत्व से जुड़े संगठनों को लेकर व्यापक और विवादास्पद दावे किए, जिनमें हिंदुओं को सामूहिक रूप से हिंसा, कट्टरता और सामाजिक वैमनस्य से जोड़ने का प्रयास दिखाई दिया।

’33 करोड़ देवताओं’ के बहाने हिंदू बहुलवाद का उड़ाया गया मजाक

बातचीत के दौरान अपूर्वानंद ने दावा किया कि केवल 33 करोड़ देवी-देवताओं की पूजा करने से हिंदू सहिष्णु नहीं हो जाते, क्योंकि हिंदू धर्म न तो एकरूप (मोनोलिथिक) है और न ही किसी एक धर्मग्रंथ पर आधारित है। उन्होंने यह भी कहा कि हिंदू स्वभाव से कठोर, जातिवादी और विभाजित समाज में विश्वास रखने वाले होते हैं।

उनका यह कहना है कि हिंदू बहुलतावाद (प्लूरलिज्म) की एक सतही और भ्रामक व्याख्या है। हिंदू परंपरा में प्रचलित 33 करोड़ देवी-देवताओं की अवधारणा को अक्सर गलत तरीके से समझा जाता है।

वैदिक और उपनिषदकालीन संदर्भों में इसका अर्थ 33 प्रकार के देवताओं या 33 देव शक्तियों से है, न कि 33 करोड़ अलग-अलग देवताओं की पूजा से। पारंपरिक व्याख्या के अनुसार इनमें आठ वसु, ग्यारह रुद्र, बारह आदित्य, इंद्र और प्रजापति शामिल हैं।

हिंदू बहुलतावाद देवी-देवताओं की संख्या पर आधारित नहीं है, बल्कि इस विचार पर आधारित है कि परम सत्य या ईश्वर तक अनेक रूपों, नामों, मार्गों और परंपराओं के माध्यम से पहुँचा जा सकता है।

ऐसे में इस अवधारणा को केवल 33 करोड़ देवी-देवताओं तक सीमित करके हिंदुओं को असहिष्णु बताना, उनके के अनुसार, गंभीर अकादमिक विश्लेषण नहीं बल्कि वैचारिक टिप्पणी अधिक प्रतीत होता है।

इसी क्रम में अपूर्वानंद ने यह दावा भी किया कि हिंदू धर्म में सेवा की कोई अवधारणा नहीं है। उनका कहना है कि यह दावा न केवल तथ्यात्मक रूप से गलत है, बल्कि हिंदू धर्मग्रंथों, परंपराओं और सामाजिक व्यवहार की अनदेखी भी करता है।

भगवद्गीता में लोकसंग्रह अर्थात समाज और विश्व के कल्याण को कर्म का महत्वपूर्ण उद्देश्य बताया गया है। वहीं सर्वभूतहित यानी सभी प्राणियों के कल्याण की अवधारणा भी हिंदू चिंतन का केंद्रीय तत्व मानी जाती है।

हिंदू परंपराएँ दान, करुणा, अहिंसा, अन्नदान, गौसेवा, अतिथि सत्कार, मंदिरों में सामुदायिक भोजन, धर्मशालाओं, यात्रियों की सेवा और जरूरतमंदों की सहायता जैसे मूल्यों पर विशेष बल देती रही हैं।

इतिहास में अन्नक्षेत्र, धर्मशालाएँ, गौशालाएँ, मठ, अखाड़े और तीर्थयात्रियों की सहायता की व्यवस्थाएँ लंबे समय से हिंदू समाज का हिस्सा रही हैं। आज भी देशभर के अनेक मंदिर निःशुल्क भोजन, चिकित्सा शिविर, शैक्षणिक संस्थान, गौशालाएँ और प्राकृतिक आपदाओं के दौरान राहत कार्य संचालित करते हैं। ऐसे में हिंदू धर्म में सेवा की कोई अवधारणा नहीं है, यह दावा ऐतिहासिक और धार्मिक साक्ष्यों से मेल नहीं खाता।

अपूर्वानंद ने एक अन्य दावा करते हुए कहा कि हिंदू धर्म में ‘पड़ोसी धर्म’ या पड़ोसी के प्रति कर्तव्य की अवधारणा नहीं है। उनके अनुसार यह निष्कर्ष भी हिंदू दर्शन को अब्राहमिक धार्मिक शब्दावली के सीमित ढाँचे में देखने का परिणाम है।

हिंदू परंपरा भले ही लव थाइ नेबर जैसी शब्दावली का प्रयोग न करती हो, लेकिन उसमें इससे भी व्यापक अवधारणाएँ मौजूद हैं। अतिथि देवो भव, वसुधैव कुटुम्बकम्, सर्वभूतहित, अहिंसा, दया, दान, मैत्री और करुणा जैसे सिद्धांत समाज और समस्त सृष्टि के प्रति उत्तरदायित्व का संदेश देते हैं।

तैत्तिरीय उपनिषद में माता, पिता, गुरु और अतिथि को देवतुल्य मानने की शिक्षा दी गई है। वहीं महाभारत, पुराणों और अन्य धार्मिक ग्रंथों में अतिथियों का सम्मान, यात्रियों की सहायता, भूखों को भोजन, प्यासों को पानी और समाज के कमजोर वर्गों की मदद को धर्म का हिस्सा बताया गया है।

उनका कहना है कि हिंदू नैतिकता केवल पड़ोसी तक सीमित नहीं रहती, बल्कि अतिथि, अजनबी, पशु-पक्षी, प्रकृति, पूर्वजों और समस्त जीवों तक अपने दायित्व का विस्तार करती है। इसलिए हिंदू धर्म में पड़ोसी के प्रति कर्तव्य का कोई विचार नहीं है, यह आलोचना नहीं बल्कि तथ्यात्मक रूप से भ्रामक निष्कर्ष प्रतीत होती है।

वर्ण के कारण हिंदू समाज को स्वाभाविक रूप से हिंसक बताया

बातचीत के दौरान अपूर्वानंद ने वर्ण व्यवस्था का उल्लेख करते हुए हिंदू धर्म और हिंदू समाज को हिंसा से जोड़ने का प्रयास किया। उन्होंने दावा किया कि हिंदू समाज मूल रूप से वर्ण व्यवस्था में विश्वास रखने वाला समाज है।

उनका कहना था कि हिंदू समाज और हिंदू धर्मग्रंथों का अध्ययन करने वाले कई विद्वान मानते हैं कि यदि वर्ण व्यवस्था को हटा दिया जाए, तो हिंदू धर्म की मूल संरचना ही समाप्त हो जाएगी।

अपूर्वानंद ने तर्क दिया कि जो समाज पदानुक्रम, ऊँच-नीच और अस्पृश्यता में विश्वास करता है, वह स्वाभाविक रूप से हिंसक होता है। उनके अनुसार, किसी व्यक्ति को सामाजिक रूप से दूर रखना या उसे बराबरी का दर्जा न देना ‘छिपी हुई हिंसा’ है, जबकि किसी की जान लेना ‘प्रत्यक्ष हिंसा’ का रूप है।

उन्होंने आगे कहा कि यदि किसी ब्राह्मण को यह लगता था कि किसी व्यक्ति ने उसे अपवित्र कर दिया है, तो उस व्यक्ति की हत्या तक की जा सकती थी। साथ ही उन्होंने यह भी दावा किया कि ऐसी प्रवृत्तियाँ कथित तौर पर हमारे भीतर पहले से मौजूद रही हैं।

इस बिंदु पर चर्चा केवल सामाजिक बुराइयों या जातिगत अन्याय की आलोचना तक सीमित नहीं रही, बल्कि पूरे हिंदू समाज और उसकी सभ्यतागत संरचना पर सवाल उठाने की दिशा में बढ़ती दिखाई दी।

हिंदू समाज की आलोचना केवल जाति-आधारित भेदभाव के संदर्भ में नहीं की गई, बल्कि उसे संरचनात्मक रूप से हिंसक तथा बहिष्कार और दमन की प्रवृत्ति वाला समाज बताने का प्रयास किया गया।

बाद में अपूर्वानंद ने कहा कि यह समस्या केवल ब्राह्मणों या तथाकथित उच्च जातियों तक सीमित नहीं है। उन्होंने दावा किया कि पिछड़ी जातियों, दलितों, वाल्मीकि समुदाय, यादवों और आदिवासी समुदायों के कुछ लोग भी मुसलमानों के खिलाफ हिंसा की घटनाओं में शामिल रहे हैं। उनके अनुसार, मुसलमानों के प्रति वैमनस्य या घृणा की भावना हिंदू समाज की लगभग सभी जातियों में किसी न किसी रूप में मौजूद है।

उन्होंने कहा कि इस प्रकार की दलील पहले ‘ब्राह्मणवाद’ की आलोचना से शुरू होती है, लेकिन धीरे-धीरे उसका दायरा बढ़ाकर सभी हिंदू जाति समूहों तक पहुँचा दिया जाता है।

उनके अनुसार, चर्चा का निष्कर्ष किसी एक वर्ग या समूह की हिंसक प्रवृत्तियों की आलोचना नहीं था, बल्कि पूरे हिंदू समाज को एक ऐसी सामाजिक संरचना के रूप में चित्रित करना था, जो कथित रूप से हिंसा, भेदभाव और वैमनस्य से ग्रस्त है।

RSS पर पुरानी सोच को संगठित हिंसा में बदलने का आरोप

अपूर्वानंद ने बातचीत के दौरान दावा किया कि हिंदुओं के मन में मुसलमानों के प्रति पूर्वाग्रह पहले से मौजूद थे, लेकिन अतीत में हिंदू और मुसलमान साथ रहते थे क्योंकि उन पूर्वाग्रहों को लगातार भड़काने और उन्हें हिंसा में बदलने वाली कोई संगठित शक्ति सक्रिय नहीं थी।

इसके बाद उन्होंने हिंदू महासभा, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, विनायक दामोदर सावरकर के लेखन, एम एस गोलवलकर, के बी हेडगेवार और श्यामा प्रसाद मुखर्जी का नाम लेते हुए उन्हें उस कथित सक्रिय शक्ति के रूप में प्रस्तुत किया गया। उनके अनुसार, इस संगठित वैचारिक धारा ने हिंदुओं के भीतर मौजूद पूर्वाग्रहों को उकसाने और उन्हें सक्रिय हिंसा में बदलने का काम किया।

अपूर्वानंद ने आगे दावा किया कि भारत में पहले सांप्रदायिक हिंसा प्रायः छिटपुट या अवसर विशेष पर होने वाली घटनाओं तक सीमित रहती थी। उन्होंने उदाहरण के तौर पर ताजिया जुलूसों या रामनवमी के आसपास होने वाले हिंदू-मुस्लिम दंगों का उल्लेख किया। हालाँकि उनके अनुसार वर्तमान समय में सबसे बड़ा बदलाव यह है कि समाज के एक हिस्से ने हिंसा को न केवल उचित बल्कि स्वीकार्य और निर्लज्जता के साथ समर्थित मानना शुरू कर दिया है।

उन्होंने कहा कि सावरकर, हिंदू महासभा और RSS से जुड़ी विचारधारा, जो पहले मुख्यधारा के विमर्श का हिस्सा नहीं मानी जाती थी, अब प्रभावी और प्रमुख विचारधारा बन गई है। उनके अनुसार, इसका परिणाम यह हुआ है कि हिंसा अब केवल कभी-कभार होने वाली घटना नहीं रही, बल्कि लोगों के व्यवहार, भाषा और दैनिक गतिविधियों में भी दिखाई देने लगी है।

बातचीत के अंत में अपूर्वानंद ने यह दावा किया कि समाज के कथित अपराधीकरण को बढ़ावा देना RSS की सबसे बड़ी सफलता रही है। उनका कहना है कि इस प्रकार के दावों के माध्यम से हिंदुत्व से जुड़े संगठनों, नेताओं और विचारकों को सामाजिक हिंसा तथा सांप्रदायिक तनाव के लिए सामूहिक रूप से जिम्मेदार ठहराने का प्रयास किया गया।

बजरंग दल को आतंकवादी जैसा बताया गया, RSS इकोसिस्टम पर लगाया गया आरोप

बातचीत के दौरान मुकेश कुमार ने अपूर्वानंद से पूछा कि क्या बजरंग दल को एक आतंकवादी संगठन कहा जा सकता है। इसके जवाब में अपूर्वानंद ने कहा कि वह इस आकलन से सहमत हैं और बजरंग दल को एक संगठित समूह बताया।

इसके बाद उन्होंने दावा किया कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) ने ऐसा वातावरण तैयार किया है, जिसमें अनेक संगठन विकसित हो सके हैं। उन्होंने इसकी तुलना एक ऐसे पारिस्थितिकी तंत्र (इकोसिस्टम) से की, जहाँ विशेष प्रकार के पौधे स्वाभाविक रूप से उगते हैं। उनके अनुसार, RSS द्वारा निर्मित इसी वातावरण में घृणा और वैमनस्य (द्वेष) की राजनीति पनपती है।

अपूर्वानंद ने इस संदर्भ में बजरंग दल, विश्व हिंदू परिषद (VHP), विद्या भारती, सरस्वती शिशु मंदिर, राम सेना, रुद्र सेना, हिंदू वाहिनी और अन्य संगठनों का उल्लेख किया। उन्होंने दावा किया कि इनमें से कुछ संगठनों का RSS से प्रत्यक्ष और औपचारिक संबंध भले न हो, लेकिन वे कथित रूप से उसी प्रकार का कार्य करते हैं और समान वैचारिक दिशा में सक्रिय हैं।

चर्चा के दौरान अपूर्वानंद का तर्क यह था कि इन संगठनों को अलग-अलग इकाइयों के रूप में देखने के बजाय एक व्यापक वैचारिक ढाँचे के हिस्से के रूप में देखा जाना चाहिए। उनके अनुसार, चाहे किसी संगठन का RSS  से औपचारिक संबंध हो या न हो, वे सभी एक ऐसे वातावरण में कार्य करते हैं जिसे उन्होंने RSS की विचारधारा से प्रभावित बताया।

इस तरह के तर्क में यदि किसी संगठन का RSS से प्रत्यक्ष संबंध हो तो उसकी गतिविधियों के लिए RSS को जिम्मेदार ठहराया जाता है और यदि ऐसा संबंध न भी हो, तो उसे एक व्यापक ‘इकोसिस्टम’ का हिस्सा बताकर अंततः आरोपों का केंद्र RSS को ही बनाया जाता है।

उनके अनुसार, इस दृष्टिकोण के तहत विभिन्न संगठनों की स्वतंत्र पहचान और कार्यप्रणाली के बीच के अंतर को नजरअंदाज कर दिया जाता है।

1984 के सिख विरोधी दंगों के लिए हिंदुओं को ठहराया गया दोषी, कॉन्ग्रेस की भूमिका को धकेला गया पीछे

बातचीत का एक सबसे विवादास्पद हिस्सा तब सामने आया जब मुकेश कुमार ने 1984 के सिख विरोधी दंगों का मुद्दा उठाया। इस पर अपूर्वानंद ने दावा किया कि उस हिंसा में सामान्य लोगों ने भी भाग लिया था।

उन्होंने कहा कि यदि दिल्ली में लगभग 4000 सिखों की हत्या हुई थी, तो यह भी सोचना चाहिए कि उन्हें मारने में कितने हजार लोग शामिल रहे होंगे। इसी क्रम में उन्होंने कहा, “वे सभी हिंदू थे। वे सभी हिंदू थे और कोई दूसरा नहीं था।”

अपूर्वानंद ने आगे कहा कि उस समय हिंसा में शामिल लोग आज डॉक्टर, शिक्षक, दुकानदार, दादा या बुजुर्ग नागरिक के रूप में समाज में मौजूद हो सकते हैं, लेकिन उनके हाथ खून से सने हुए हैं। उन्होंने यह भी कहा कि हिंदू समाज ने कभी यह स्वीकार नहीं किया कि जिन सिखों को वह अपना रक्षक बताता है, उन्हीं सिखों को घेरकर मार डाला गया।

उन्होंने बताया की इस प्रकार की व्याख्या 1984 की त्रासदी को सांप्रदायिक दृष्टि से देखने का प्रयास करती है। उनके अनुसार, 1984 की हिंसा कोई अमूर्त ‘हिंदू बनाम सिख’ संघर्ष नहीं थी, बल्कि तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियों में घटित एक संगठित हिंसक घटना थी, जो तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी की हत्या के बाद भड़की और उस समय सत्ता में रही कॉन्ग्रेस सरकार के दौर में हुई।

1984 के सिख विरोधी दंगों को लेकर वर्षों तक पीड़ितों, प्रत्यक्षदर्शियों और विभिन्न जाँच आयोगों ने कई कॉन्ग्रेस नेताओं पर आरोप लगाए। पूर्व कॉन्ग्रेस नेता सज्जन कुमार को एक मामले में दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई।

वहीं जगदीश तीतलेर की भूमिका भी लंबे समय तक कानूनी और जाँच एजेंसियों की पड़ताल के दायरे में रही। ननवाती कमिशन ने भी अपनी रिपोर्ट में कुछ कॉन्ग्रेस नेताओं के खिलाफ विश्वसनीय साक्ष्यों का उल्लेख किया था।

उनके अनुसार, ऐसे में 1984 की हिंसा को केवल हिंदुओं द्वारा सिखों की हत्या के रूप में प्रस्तुत करना घटनाओं की राजनीतिक और प्रशासनिक पृष्ठभूमि को नजरअंदाज करता है।

उनका तर्क है कि इससे कॉन्ग्रेस नेतृत्व, राजनीतिक संरक्षण, प्रशासनिक विफलता और पुलिस की भूमिका पर से ध्यान हटाकर पूरे हिंदू समुदाय पर सामूहिक दोषारोपण करने की कोशिश होती है।

इस दृष्टिकोण के अनुसार, 1984 की हिंसा के पीड़ित सिख समुदाय के लोग थे, जबकि आरोपितों में राजनीतिक संरक्षण प्राप्त भीड़, स्थानीय तत्व और उस समय के सत्ता प्रतिष्ठान से जुड़े लोग शामिल थे।

उनका कहना है कि इसे एक राजनीतिक नरसंहार या पोग्रोम के बजाय पूरे हिंदू समाज के अपराध के रूप में चित्रित करना विश्लेषण नहीं, बल्कि वैचारिक निष्कर्ष थोपने का प्रयास माना जा सकता है।

मुसलमानों को हिंदुओं के आस-पास हमेशा असुरक्षित दिखाया गया

बातचीत के दौरान अपूर्वानंद ने दावा किया कि आज मुसलमान लगातार असुरक्षा और अनिश्चितता के माहौल में जी रहे हैं, क्योंकि उन्हें यह नहीं पता होता कि उनके आसपास मौजूद हिंदू व्यक्ति उनके साथ कैसा व्यवहार करेगा।

उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि ट्रेन में सफर कर रहा कोई मुसलमान यह नहीं जानता कि उसके बगल में बैठा व्यक्ति उसके टिफिन को देखकर कैसी प्रतिक्रिया देगा, अगले स्टेशन पर किसी को बुलाएगा या उसके खिलाफ हमला करवाने की कोशिश करेगा। उन्होंने यह भी दावा किया कि मुसलमानों के मन में यह आशंका तक रहती है कि कहीं कोई रेलवे सुरक्षा बल (RPF) का जवान सोते समय उन्हें गोली न मार दे।

अपूर्वानंद ने आगे कहा कि यदि कोई मुसलमान ट्रेन यात्रा के दौरान कोई राजनीतिक राय व्यक्त करता है, तो उसे इसके कारण हिंसा का सामना करना पड़ सकता है या उसकी जान भी जा सकती है। उनके अनुसार, मुसलमान आज घर से निकलते समय भी संदेह और आशंका के साथ निकलते हैं तथा वापस लौटते समय भी उसी मानसिक स्थिति में रहते हैं। उन्होंने कहा कि उनके सामने बैठा हिंदू व्यक्ति अच्छा भी हो सकता है, लेकिन ऐसा नहीं भी हो सकता है।

उन्होंने बताया कि इस प्रकार के दावे हिंदुओं को एक व्यापक और स्थायी खतरे के रूप में तथा मुसलमानों को हमेशा भय और असुरक्षा में जीने वाले समुदाय के रूप में प्रस्तुत करते हैं।

उनके अनुसार, ऐसी टिप्पणियाँ व्यक्तिगत घटनाओं या अपराधों की चर्चा से आगे बढ़कर पूरे समुदायों के बारे में सामान्यीकृत निष्कर्ष निकालती हैं, जिससे सामाजिक विभाजन और अविश्वास की भावना को बल मिल सकता है।

बहराइच में हुई हत्या को सेल्फ डिफेंस के तौर पर किया गया पेश

बातचीत के दौरान अपूर्वानंद ने बहराइच हिंसा का भी उल्लेख किया। उन्होंने दावा किया कि एक जुलूस के दौरान एक व्यक्ति मुस्लिम परिवार के घर में घुस गया, रेलिंग तोड़ दी और वहाँ लगा धार्मिक झंडा हटा दिया। इसके बाद उन्होंने कहा कि जाहिर तौर पर आत्मरक्षा में उस मुस्लिम परिवार या किसी अन्य व्यक्ति की ओर से गोली चलाई गई, जिसमें उसकी मौत हो गई।

यह संदर्भ बहराइच हिंसा के दौरान मारे गए राम गोपाल मिश्रा से जुड़ा था। उन्होंने कहा कि अपूर्वानंद ने घटना को जिस प्रकार दिखाया, उससे यह संदेश जाता है कि गोलीबारी आत्मरक्षा की स्वाभाविक या समझी जा सकने वाली प्रतिक्रिया थी।

उनके अनुसार, यह व्याख्या केवल नैतिक दृष्टि से ही विवादास्पद नहीं है, बल्कि मामले में बाद में आए न्यायिक फैसले से भी मेल नहीं खाती। राम गोपाल मिश्रा हत्याकांड में अदालत ने मुख्य आरोपित सरफराज उर्फ ​​रिंकू को मृत्युदंड और अन्य नौ दोषियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। अदालत ने इस अपराध को गंभीर और जघन्य हत्या माना, न कि आत्मरक्षा के सामान्य मामले के रूप में देखा गया।

उनका तर्क है कि घटना को इस तरह प्रस्तुत करके, जिसमें गोली चलाने की कार्रवाई को आत्मरक्षा के रूप में सामान्य बनाने का प्रयास दिखाई देता है, अपूर्वानंद ने इसे अपने व्यापक तर्क के अनुरूप ढालने की कोशिश की।

उनके अनुसार, इस प्रस्तुति में हिंदू पक्ष को आक्रामक और मुस्लिम पक्ष को पीड़ित के रूप में दिखाया गया, जबकि घटना में मृतक एक हिंदू युवक था। उनका कहना है कि इस प्रकार की व्याख्या जटिल घटनाओं को पूर्वनिर्धारित वैचारिक ढाँचे में फिट करने के प्रयास जैसा प्रतीत होती है।

हिंदू त्योहारों को हिंसक प्रदर्शन के तौर पर दिखाया गया

बातचीत के दौरान अपूर्वानंद ने हिंदू धार्मिक आयोजनों और त्योहारों को लेकर भी तीखी टिप्पणियाँ कीं। उन्होंने दावा किया कि रामनवमी के अवसर पर 13-14 साल की आयु के बच्चे बड़ी संख्या में तलवारें लेकर मुस्लिम बस्तियों और घरों के सामने से गुजरते हैं तथा इसे अपना अधिकार समझते हैं।

उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि कई स्थानों पर आयोजित होने वाले हिंदू जागरण अब देवी-देवताओं की महिमा का गायन करने के बजाय मुसलमानों और मुस्लिम महिलाओं के खिलाफ आपत्तिजनक तथा भड़काऊ गीतों के मंच बन गए हैं। उनके अनुसार, ऐसे आयोजनों में धार्मिक भक्ति की जगह वैमनस्य और आक्रामकता ने ले ली है।

अपूर्वानंद ने इन घटनाओं और प्रवृत्तियों को समाज के चरम पतन का उदाहरण बताया। उनका तर्क था कि धार्मिक आयोजनों और सार्वजनिक उत्सवों का स्वरूप बदलकर अब ऐसे रूप में सामने आ रहा है, जो सामाजिक सौहार्द को कमजोर करता है और समुदायों के बीच तनाव को बढ़ाता है।

उन्होंने आगे बताया कि इस प्रकार की टिप्पणियाँ कुछ घटनाओं या आरोपों के आधार पर पूरे हिंदू धार्मिक और सांस्कृतिक परिदृश्य को सामान्यीकृत कर प्रस्तुत करती हैं।

उनके अनुसार, रामनवमी, जागरण और अन्य धार्मिक आयोजनों में करोड़ों लोग भाग लेते हैं, जिनका मुख्य उद्देश्य धार्मिक आस्था, भक्ति और सांस्कृतिक परंपराओं का पालन होता है। ऐसे में कुछ विवादित घटनाओं को आधार बनाकर पूरे समुदाय या समस्त धार्मिक आयोजनों को नकारात्मक रूप में चित्रित करना एकतरफा निष्कर्ष माना जा सकता है।

ईसाइयों को भी हिंदुओं का शिकार बताया गया

बातचीत के दौरान ईसाई समुदाय को भी हिंदू समाज और मीडिया को पीड़ित बताने का प्रयास किया गया। अपूर्वानंद ने दावा किया कि भारत में ईसाइयों पर हर दिन हमले हो रहे हैं। उन्होंने कहा कि पादरियों की पिटाई की जाती है, कब्रों को नुकसान पहुँचाया जाता है, जन्मदिन समारोहों पर हमले होते हैं और धार्मिक सभाओं में तोड़फोड़ की जाती है।

अपूर्वानंद ने यह भी तर्क दिया कि ईसाई संस्थानों पर धर्मांतरण के आरोप बेबुनियाद तरीके से लगाए जाते हैं। उनके अनुसार, कई पीढ़ियों से भारतीय छात्र मिशनरी स्कूलों में पढ़ते रहे हैं और ईसाई अस्पतालों की सेवाएँ लेते रहे हैं, लेकिन इससे वे ईसाई नहीं बन गए। इस आधार पर उन्होंने धर्मांतरण को लेकर उठाई जाने वाली चिंताओं पर सवाल खड़े किए।

हालाँकि उनका मानना है कि धर्मांतरण को लेकर सालों से उठती रही बहस और शिकायतों को नजरअंदाज करता है। अलग-अलग राज्यों में समय-समय पर ऐसे आरोप लगाए गए हैं कि कुछ मामलों में प्रलोभन, दबाव, धोखाधड़ी या अन्य तरीकों से धर्मांतरण कराने की कोशिश की गई। इन आरोपों के आधार पर कई FIR दर्ज हुई हैं और जाँच एजेंसियों ने संगठित धर्मांतरण नेटवर्क, विदेशी फंडिंग तथा कमजोर और वंचित समुदायों को लक्षित करने से जुड़े मामलों की जाँच भी की है।

उन्होंने बताया कि प्रत्येक आरोप की सत्यता और वैधता का अंतिम निर्णय अदालतों को करना है, लेकिन धर्मांतरण को लेकर मौजूद सभी चिंताओं को केवल हिंदू समाज की आशंका या पूर्वाग्रह बताकर खारिज कर देना एकतरफा दृष्टिकोण माना जा सकता है।

इसी संदर्भ में आलोचक हाल के सालों में चर्चित रहे कुछ मामलों और संगठनों का उल्लेख करते हैं, जिन पर हिंदुओं के धर्मांतरण को बढ़ावा देने के आरोप लगाए गए। उनके अनुसार, ऐसे मामलों की मौजूदगी यह दर्शाती है कि धर्मांतरण को लेकर चल रही बहस को पूरी तरह निराधार बताना सही नहीं है।

उन्होंने तर्क दिया कि इस विषय पर निष्पक्ष चर्चा के लिए सभी पक्षों के दावों, आरोपों और मौजूद जानकारियों की समान रूप से जाँच की जानी चाहिए, न कि किसी एक पक्ष को पूरी तरह निर्दोष और दूसरे को पूरी तरह दोषी मान लिया जाना चाहिए।

न्यायपालिका, पुलिस, नौकरशाही और सेना पर बहुसंख्यकों से नफ़रत करने का आरोप

बातचीत के अंतिम हिस्से में अपूर्वानंद ने दावा किया कि बहुसंख्यकवादी घृणा अब न्यायपालिका, नौकरशाही, पुलिस और सेना जैसी संस्थाओं तक पहुँच चुकी है। उनके अनुसार, हिंसा अब केवल सामाजिक स्तर तक सीमित नहीं रही, बल्कि संस्थागत स्वरूप धारण कर चुकी है।

अपने दावों के समर्थन में उन्होंने ऐसे मामलों का उल्लेख किया, जिनमें पुलिस या अदालतों पर कथित रूप से घृणास्पद भाषणों को यह कहकर उचित ठहराने का आरोप लगाया गया कि संबंधित व्यक्ति केवल हिंदू समाज को संगठित या प्रेरित करने का प्रयास कर रहे थे।

अपूर्वानंद ने कुछ न्यायिक टिप्पणियों, न्यायाधीशों के रुख और राम जन्मभूमि मामले के फैसले की भी आलोचना करते हुए उन्हें बहुसंख्यकवादी दृष्टिकोण से प्रभावित बताया।

उन्होंने कहा कि यदि मुसलमानों का सामना किसी भीड़ या किसी हिंदू संगठन से होता है, तो सैद्धांतिक रूप से उनके पास पुलिस, जिलाधिकारी (DM) या पुलिस अधीक्षक (SP) जैसे संस्थानों तक पहुँचने का विकल्प होता है। लेकिन यदि यही संस्थाएँ कथित रूप से मुसलमानों के खिलाफ पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाने लगें, तो उनके पास न्याय पाने का कोई प्रभावी माध्यम नहीं बचता।

अपूर्वानंद ने यह भी दावा किया कि भारतीय पुलिस व्यवस्था में ऐतिहासिक रूप से मुसलमानों और ईसाइयों के प्रति पूर्वाग्रह मौजूद रहे हैं, लेकिन अब ये पूर्वाग्रह अधिक सक्रिय रूप में दिखाई दे रहे हैं क्योंकि उन्हें कथित तौर पर संरक्षण और प्रोत्साहन मिल रहा है।

उनके अनुसार इस प्रकार के दावों के माध्यम से चर्चा का दायरा केवल हिंदू समाज या कुछ संगठनों की आलोचना तक सीमित नहीं रहा, बल्कि न्यायपालिका, प्रशासन, पुलिस और अन्य सरकारी संस्थाओं सहित पूरे राज्य तंत्र को मुसलमानों और ईसाइयों के प्रति पक्षपाती के रूप में दिखाने का प्रयास रहा है। उनके अनुसार, इस तरह की प्रस्तुति भारतीय लोकतांत्रिक संस्थाओं की निष्पक्षता और विश्वसनीयता पर व्यापक प्रश्नचिह्न लगाने वाली थी।

अपूर्वानंद का हिंदू विरोधी भावनाओं का इतिहास रहा है

अपूर्वानंद का हिंदुत्व, हिंदू संगठनों और हिंदू प्रतीकों को लेकर विवादित टिप्पणियाँ करने का एक लंबा इतिहास रहा है। उनके आलोचक उन्हें दिल्ली दंगों से जुड़े मामलों में आरोपित व्यक्तियों में भी गिनाते हैं और आरोप लगाते हैं कि उन्होंने समय-समय पर ऐसे बयान दिए हैं जिन्हें हिंदू विरोधी विमर्श का हिस्सा माना जाता है।

मई 2019 में वामपंथी झुकाव वाले समाचार पोर्टल द वायर में प्रकाशित एक लेख में अपूर्वानंद ने ‘जय श्री राम’ के नारे को गुंडागर्दी की अभिव्यक्ति बताया था। उस लेख में उन्होंने उस समय की पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के उस रुख का भी समर्थन किया था, जिसमें उन्होंने ‘जय श्री राम’ के नारों को अपने खिलाफ लगाए गए अपमानजनक नारों के रूप में दिखाया था।

इसी लेख में अपूर्वानंद ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को उकसाने वाला बताया था। उनका कहना है कि इस प्रकार की भाषा केवल प्रधानमंत्री की आलोचना तक सीमित नहीं थी, बल्कि देश के सर्वोच्च निर्वाचित पद की गरिमा पर भी टिप्पणी के रूप में देखी गई।

उन्होंने वरिष्ठ भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी को बहुरूपिया कहकर भी संबोधित किया था। अपूर्वानंद का तर्क था कि जय श्री राम के नारे का राजनीतिक इस्तेमाल भारतीय जनता पार्टी द्वारा हिंदुओं के बीच मुसलमानों के प्रति नफरत पैदा करने के लिए किया गया।

अप्रैल 2023 में भी अपूर्वानंद ने ‘गजवा-ए-हिंद’ को लेकर अपनी राय व्यक्त की थी। उन्होंने दावा किया था कि ‘गजवा-ए-हिंद’ की अवधारणा को हिंदुत्ववादी समूह अपनी हिंसा को सही ठहराने के लिए बार-बार सामने लाते हैं, जबकि उनके अनुसार भारतीय मुसलमानों के बीच इस विचार की कोई वास्तविक चर्चा नहीं होती।

उन्होंने सामाजिक कार्यकर्ता योगेंद्र यादव की एक पोस्ट को उद्धृत करते हुए लिखा था कि खालिस्तान और हिंदू राष्ट्र जैसे विचारों की चर्चा के बीच ‘गजवा-ए-हिंद’ को शामिल करना निराशाजनक है।

अपूर्वानंद ने प्रश्न उठाया था कि क्या किसी भारतीय संगठन या व्यक्ति ने ‘गजवा-ए-हिंद’ के लिए उसी तरह खुला आह्वान किया है, जैसा अन्य विचारों के संदर्भ में देखा गया है। उन्होंने कहा था कि ‘गजवा-ए-हिंद’ का उल्लेख मुख्यतः हिंदुत्ववादी समूहों द्वारा किया जाता है और उनके अनुसार आम मुसलमान इस विषय पर बात नहीं करते।

उन्होंने कहा है कि इन बयानों और लेखों से यह साफ होता है कि अपूर्वानंद लंबे समय से हिंदुत्व, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, भाजपा और उनसे जुड़े प्रतीकों की आलोचना करते रहे हैं।

वहीं उनके समर्थकों का तर्क है कि वे राजनीतिक और वैचारिक आलोचना कर रहे होते हैं। इसी कारण उनके वक्तव्यों को लेकर सार्वजनिक और राजनीतिक चर्चा में लगातार विवाद बना रहता है।

आलोचना या सामूहिक बुराई?

जिसे अकादमिक आलोचना के रूप में दिखाया गया, उनके अनुसार वास्तव में हिंदुओं और पूरे हिंदू समाज को बदनाम करने का प्रयास था। उनका कहना है कि हर प्रश्न की रूपरेखा और अपूर्वानंद द्वारा दिए गए जवाबों की गंभीरता से जाँच होनी चाहिए और उन्हें कानूनी कसौटी पर भी परखा जाना चाहिए, विशेषकर वह दावा जिसमें कहा गया कि हर हिंदू घर में एक हत्यारा या बलात्कारी मौजूद है।

(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

‘राख’ पहली नहीं: ‘तांडव’ में हिंदू देवताओं का मजाक, ‘दहाड़’ में लव जिहाद पर पर्दा, ‘पाताल लोक’ में हिंदू-सिखों की नकारात्मक छवि; लंबी है Prime Video के वैचारिक एजेंडे की कहानी

हाल के वर्षों में अमेजन प्राइम वीडियो (Amazon Prime Video) और कई अन्य OTT प्लेटफॉर्म लगातार रचनात्मक स्वतंत्रता (creative liberty) की आड़ में भारतीय कहानियों में हिंदू-विरोधी और विभाजनकारी रंग भरते रहे हैं। बॉलीवुड की उस पुरानी प्रवृत्ति को आगे बढ़ाते हुए जिसमें तिलक लगाने वाले, धार्मिक और ऊँची जाति के हिंदुओं को अक्सर खलनायक दिखाया जाता है, कई OTT शो वास्तविक घटनाओं को अलग नजरिए से पेश करते हैं।

OTT शोज भी वास्तविक घटनाओं को दलित पीड़ितता, मुस्लिमों की अच्छाई और हिंदुओं के उपहास वाले विकृत नजरिए से पेश करते हैं। Amazon Prime Video की नई ओरिजिनल सीरीज ‘राख’ (Raakh) को लेकर भी विरोध हो रहा है। इस पर 1978 के गीता और संजय चोपड़ा अपहरण व हत्या मामले जिसे रंगा-बिल्ला केस के नाम से जाना जाता है में झूठी जातिगत उत्पीड़न की कहानी जोड़ने का आरोप है।

प्रमुख किरदारों की जाति और धर्म बदले गए, ऊँची जाति के हिंदुओं की जगह दलित और मुस्लिम, असली सिख रंगा-बिल्ला को हिंदू राज्जो और बाबू बना दिया गया

12 जून 2026 को रिलीज हुई ‘राख’ एक 8 एपिसोड की क्राइम थ्रिलर सीरीज है। इसमें अभिनेता अली फजल, सोनाली बेंद्रे, आमिर बशीर और राकेश बेदी मुख्य भूमिकाओं में हैं। इस सीरीज को 1978 के वास्तविक रंगा-बिल्ला अपहरण और हत्या मामले से प्रेरित बताया गया है।

हालाँकि, इस शो में वास्तविक पुलिस अधिकारियों और पत्रकारों की जातियों, धर्मों और उनकी भूमिकाओं को बदलकर जबरन ‘भीम-मीम’ नैरेटिव फिट किया गया है।

Prime Video की इस सीरीज ने व्यवस्थित जातिगत उत्पीड़न ‘मुस्लिम ईमानदार हैं’ और ब्राह्मण हिंदू बुरे हैं’ जैसे नैरेटिव गढ़े हैं जबकि असल मामले के रिकॉर्ड में ऐसी कोई बात मौजूद नहीं है।

शो में अभिनेता अली फजल ने सब-इंस्पेक्टर जयप्रकाश जाटव नाम के एक दलित अधिकारी की भूमिका निभाई है। उसके घर में ज्योतिबा फुले और डॉ. बी.आर. आंबेडकर की तस्वीरें दिखाई गई हैं। रंगा-बिल्ला मामले या उस समय के वास्तविक सब-इंस्पेक्टर से इसका कोई संबंध नहीं है। सीरीज में SI जयप्रकाश जाटव को पुलिस विभाग में जातिगत भेदभाव झेलते हुए दिखाया गया है। उसके सेवानिवृत्त हवलदार पिता को भी जातिगत भेदभाव का शिकार दिखाया गया है। जाटव के पिता को ‘जय भीम’ के नारे लगाते हुए भी दिखाया गया है।

दिलचस्प बात यह है कि शो में जावेद मुर्तजा नाम का एक मुस्लिम अधिकारी जाटव के मुख्य सहयोगी के रूप में दिखाया गया है, जो अपने स्वभाव में फिल्म शोले के ‘ईमान का पक्का’ रहीम चाचा की याद दिलाता है। सोशल मीडिया पर कई लोगों ने ध्यान दिलाया कि Amazon Prime Video की ओरिजिनल सीरीज ‘राख’ में एक आलसी हवलदार को मिश्रा ब्राह्मण के रूप में दिखाया गया है।

उम्मीद के मुताबिक ‘ईमानदार’ और ‘निडर’ पत्रकार का किरदार एक मुस्लिम महिला के रूप में दिखाया गया है। जबकि वास्तविक घटना में बाबूलाल नाम के एक व्यक्ति ने अपहृत भाई-बहन को बचाने की कोशिश की थी, शो में बाबूलाल के किरदार को सलीम बना दिया गया है।

और मुख्य खलनायकों को हिंदू पहचान दी गई है तथा उनके नाम बाबू और राज्जो रखे गए हैं। इनमें से एक को हरियाणवी और दूसरे को महाराष्ट्र का दिखाया गया है। जबकि वास्तविकता में हत्यारे कुलजीत सिंह और जसबीर सिंह नाम के सिख पुरुष थे।

रंगा-बिल्ला केस: 1978 के संजय और गीता चोपड़ा अपहरण-हत्या की कहानी

यहाँ रंगा-बिल्ला मामले के बारे में जानना जरूरी है, जिससे Amazon Prime Video की वेब सीरीज ‘राख’ को ‘कुछ हद तक प्रेरित’ बताया गया है। 26 अगस्त 1978 को नौसेना अधिकारी मदन मोहन चोपड़ा के बच्चे 16 वर्षीय गीता और 13 वर्षीय संजय ऑल इंडिया रेडियो के ‘युवा वाणी’ कार्यक्रम में भाग लेने के लिए घर से निकले थे।

रास्ते में भारी बारिश के कारण उन्होंने एक कार से लिफ्ट ली। बाद में लोगों ने दोनों को कार के अंदर अपहरणकर्ताओं से संघर्ष करते देखा। एक व्यक्ति ने पुलिस को सूचना भी दी लेकिन पुलिस ने कार का नंबर गलत दर्ज कर लिया।

इसी बीच गीता और संजय के माता-पिता को लगा कि बच्चे कार्यक्रम में पहुँच गए होंगे। जब वे ऑल इंडिया रेडियो पहुँचे तो पता चला कि दोनों वहाँ कभी पहुँचे ही नहीं। इसके बाद उनकी तलाश शुरू हुई।

दो दिन बाद एक ग्वाले को दोनों के शव मिले। जाँच के दौरान पुलिस को पता चला कि अपहरण और हत्या के पीछे जसबीर सिंह उर्फ बिल्ला और कुलजीत सिंह उर्फ रंगा थे। दोनों ने चोटों का इलाज भी नकली पहचान से कराया था। इसके बाद पूरे देश में आक्रोश फैल गया और बड़े पैमाने पर तलाश अभियान चलाया गया। 31 अगस्त 1978 को पुलिस को अपहरण में इस्तेमाल की गई फिएट कार भी बरामद हो गई।

सीरीज ‘राख’ में दिखाया गया है कि दलित पुलिस अधिकारी जयप्रकाश जाटव राज्जो और बाबू का पीछा करते हुए आगरा तक पहुँचता है। लेकिन वास्तविक मामले में रंगा और बिल्ला को किसी एक पुलिस अधिकारी ने नहीं पकड़ा था। असल में सेना के जवानों जिनमें लांस नायक गुरतेज सिंह और ए.वी. शेट्टी शामिल थे, ने आगरा के पास कालका मेल ट्रेन में दोनों को पहचान लिया था। बाद में 8 सितंबर 1978 को उन्हें दिल्ली पुलिस के हवाले कर दिया गया।

पुलिस हिरासत में रंगा बिल्ला (फोटो साभार: ABP न्यूज)

रंगा और बिल्ला को अदालत ने दोषी ठहराया और दोनों को फाँसी की सजा सुनाई गई। बाद में तिहाड़ जेल में उन्हें फाँसी दे दी गई। गीता चोपड़ा के साथ यौन उत्पीड़न का भी आरोप लगा था लेकिन पोस्टमॉर्टम में इसकी पुष्टि नहीं हो सकी थी।

एक क्राइम थ्रिलर में बेजा जाति जोड़ने पर विवाद, लोगों ने उठाए सवाल

‘राख’ में दलित सब-इंस्पेक्टर जयप्रकाश जाटव को मुख्य किरदार के रूप में दिखाया गया है जबकि असल में जाँच का नेतृत्व दिल्ली पुलिस के इंस्पेक्टर वी.पी. गुप्ता ने किया था। उनकी टीम में सब-इंस्पेक्टर राम चंदर उनके मुख्य सहयोगी थे। लेकिन शो में SI राम चंदर की जगह SI जावेद मुर्तजा को दिखाया गया है।

इसी तरह, गीता और संजय चोपड़ा को बचाने की कोशिश करने वाला प्रत्यक्षदर्शी बाबूलाल नाम का एक हिंदू व्यक्ति था लेकिन शो में बाबूलाल की जगह सलीम नाम का एक मुस्लिम किरदार दिखाया गया है। वास्तविक रंगा-बिल्ला मामले को विस्तार से कवर करने वाली पत्रकार प्रभा दत्त नाम की एक हिंदू महिला थीं। हालाँकि, सीरीज में उनकी जगह निसार नाम की एक मुस्लिम पत्रकार को दिखाया गया है।

सोशल मीडिया पर कई लोगों ने वास्तविक घटनाओं से प्रेरित इस कहानी में जाति और धर्म आधारित वैचारिक रंग दिए जाने पर सवाल उठाए हैं।

राहुल त्यागी नाम के एक सोशल मीडिया उपयोगकर्ता ने लिखा, “इस सीरीज में अली फजल द्वारा निभाए गए मुख्य जाँच अधिकारी को एक दलित के रूप में दिखाया गया है जिसके पिता सेवानिवृत्त हवलदार हैं और उन्हें जातिगत भेदभाव का सामना करना पड़ा था। उसका मुख्य सहयोगी एक मुस्लिम अधिकारी है जबकि आलसी हवलदार एक ब्राह्मण है और ईमानदार पत्रकार एक मुस्लिम महिला है। लेकिन वास्तविक मामले में मुख्य जाँच अधिकारी वी.पी. गुप्ता थे, उनके सहयोगी राम चंदर थे और पुलिस आयुक्त जे.एन. चतुर्वेदी थे। मुझे फिल्मों में जातिगत उत्पीड़न दिखाने से कोई समस्या नहीं है लेकिन समस्या तब है जब इसे प्रचार के लिए इस्तेमाल किया जाए।”

X यूजर ‘स्किन डॉक्टर’ ने लिखा, “…यह रचनात्मक स्वतंत्रता नहीं है। रचनात्मक स्वतंत्रता का उद्देश्य कहानी को बेहतर बनाना होता है, न कि किसी खास वैचारिक एजेंडे के अनुरूप ऐतिहासिक तथ्यों को बदलना। यह एक और उदाहरण है कि कैसे रचनात्मक स्वतंत्रता के नाम पर इतिहास को खुलेआम बदला जा सकता है।”

एक अन्य एक्स उपयोगकर्ता ने ‘राख’ के लेखकों अनुशा नंदकुमार और संदीप सकेत की आलोचना करते हुए कहा कि उन्होंने इस भयावह अपहरण और हत्या के मामले को ‘जातिगत मोड़’ दे दिया।

यूजर ने लिखा, “लेखकों ने अली फज़ल के किरदार को दलित पुलिस अधिकारी, उसके सहयोगी को मुस्लिम, ईमानदार पत्रकार को मुस्लिम महिला और आलसी हवलदार को ब्राह्मण के रूप में दिखाने का फैसला किया। यह सब ‘रचनात्मक स्वतंत्रता’ के नाम पर और कुछ खास वर्गों को खुश करने के लिए जानबूझकर किया गया लगता है। वामपंथी प्रोपेगेंडा इसी तरह काम करता है। एक बेहद महत्वपूर्ण और भयावह अपराध को जातिगत रंग दे दिया गया।”

हिंदुओं के खिलाफ इस्लामो-लेफ्टिस्ट एक्टिविज्म को बढ़ावा दे रहा Prime Video

अमेजन प्राइम वीडियो बार-बार ऐसा करता रहा है। इस ऑनलाइन स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म ने लगातार ऐसे लेखकों, निर्देशकों और अभिनेताओं को मंच दिया है जिनका झुकाव ऊँची जातियों के खिलाफ नैरेटिव की ओर रहा है। ‘राख’ ऐसा पहला शो नहीं है जिसमें बेवजह जाति या धर्म आधारित पीड़ितता की कहानी जोड़ी गई हो। यह भी पहली बार नहीं है जब किरदारों की पहचान बदलकर उत्पीड़क-पीड़ित का ढाँचा तैयार किया गया हो और खासकर ब्राह्मण, ठाकुर और बनिया जैसे तथाकथित ऊँची जाति के हिंदुओं को निशाना बनाया गया हो।

चाहे प्राइम वीडियो हो, नेटफ्लिक्स हो या अन्य बड़े OTT प्लेटफॉर्म इनमें से ज्यादातर अलग-अलग स्तर पर ऐसे कंटेंट ला रहे हैं। जिनमें हिंदू-विरोधी पूर्वाग्रह, मुस्लिम पीड़ितता और ‘भीम-मीम’ नैरेटिव देखने को मिलते हैं।

साल 2020 में ‘राख’ के निर्देशक प्रोसित रॉय ने प्राइम वीडियो की वेब सीरीज ‘पाताल लोक’ का भी आंशिक निर्देशन किया था। बॉलीवुड अभिनेत्री अनुष्का शर्मा द्वारा निर्मित इस शो को खुलकर हिंदू-विरोधी बताया गया था और इसमें सिखों को भी नकारात्मक रूप में दिखाया गया था। वेब सीरीज में ऐसे दृश्य शामिल थे, जिनमें सिखों द्वारा दलितों और पिछड़ी जातियों पर अत्याचार दिखाया गया था। इसके अलावा सिख समुदाय से जुड़े बलात्कार वाले आपत्तिजनक दृश्य भी शामिल थे।

इस शो में अभिनेता जयदीप अहलावत ने इंस्पेक्टर हाथीराम चौधरी की भूमिका निभाई है। एक एपिसोड में देखने को मिलता है कि इंस्पेक्टर चौधरी एक मेले में चल रहे भक्त प्रह्लाद के नाटक तक पहुँच जाता है। गुंडे उसका पीछा कर रहे होते हैं और उनसे बचने के लिए वह मंच पर चढ़ जाता है। संयोग से उसी समय भगवान विष्णु का अवतार नरसिंह खंभे को चीरकर राक्षस हिरण्यकश्यप के सामने प्रकट होता है। इंस्पेक्टर चौधरी भाग रहे नरसिंह का किरदार निभा रहे कलाकार को धक्का देता है, जिससे वह सीधे हिरण्यकश्यप के ऊपर जा गिरता है।

यह शो एक मुस्लिम, एक दलित, एक हिंदू और एक ट्रांसजेंडर चार अपराधियों की कहानी के इर्द-गिर्द घूमता था। शो के निर्माताओं ने अपराधियों के ‘मानवीय पक्ष’ को उभारा और उन्हें ऐसे बेबस लोगों के रूप में दिखाया जो केवल इसलिए परेशान हैं क्योंकि उन्हें ISI और पाकिस्तान से जुड़े मामलों में फँसाया जा रहा है।

मुस्लिम अपराधी कबीर अपनी धार्मिक पहचान छिपाता है। कबीर का पिता हाथीराम से कहता है कि उसके बड़े बेटे की हत्या इसलिए कर दी गई क्योंकि वह एक खास धर्म से था। उस दृश्य में भगवा झंडे लिए हिंदू उग्रवादी नरसंहार करते हुए दिखाई देते हैं। कबीर का पिता कहता है कि इसी कारण उसने अपने दूसरे बेटे को मुस्लिम तक नहीं बनने दिया लेकिन तुम लोगों ने उसे आतंकवादी बना दिया।

शो का खलनायक ‘त्यागी’ महादेव का कट्टर भक्त दिखाया गया है।

साल 2021 में प्राइम वीडियो ने ‘मुंबई डायरीज 26/11’ नाम का शो रिलीज किया। यह शो पाकिस्तान द्वारा प्रायोजित इस्लामी आतंकी हमले के दौरान डॉक्टरों, नर्सों, वार्ड बॉय, सुरक्षा कर्मियों, पुलिसकर्मियों, पत्रकारों और अन्य फ्रंटलाइन वर्कर्स की कठिनाइयों पर केंद्रित था।

हालाँकि, यह शो धर्मनिरपेक्षता दिखाने में हद से आगे निकल गया। उस समय कई दर्शकों ने अभिनय की तारीफ की लेकिन भी दिखा कि ‘मुंबई डायरीज’ ने मुस्लिम किरदार डॉ अहान मिर्जा को सहिष्णु और उदार व्यक्ति के रूप में महिमामंडित किया जबकि हिंदू वार्ड ब्याय समर्थ को नफरत से भरा कट्टरपंथी दिखाया गया।

समर्थ को असभ्य, असहिष्णु और खुलकर सांप्रदायिक दिखाया गया है। वह कई मौकों पर गरीब मुस्लिम डॉक्टर के साथ दुर्व्यवहार भी करता है। पत्रकार मानसी का किरदार शो के निर्देशक के मुखपत्र जैसा दिखाई देता है और अंतिम एपिसोड में वह 26/11 हमलों के पीछे मौजूद इस्लामी जिहादी मानसिकता पर सफाई देते हुए एक लंबा संवाद तक बोलती है।

साल 2021 में प्राइम वीडियो ने एक और हिंदू-विरोधी शो ‘तांडव’ रिलीज किया। इस शो का निर्देशन अली अब्बास जफर ने किया था। 14 जनवरी 2021 को रिलीज हुई वेब सीरीज ‘तांडव’ में हिंदू-विरोधी कंटेंट और हिंदू देवी-देवताओं का मजाक उड़ाने वाले दृश्यों भर-भर के थे। उत्तर प्रदेश सहित कई राज्यों में अमेजन इंडिया, निर्देशक, निर्माता और कलाकारों के खिलाफ कई FIR दर्ज की गईं।

सैफ अली खान और कुख्यात इस्लामो-वामपंथी मोहम्मद जीशान अय्यूब अभिनीत इस शो के पहले एपिसोड में अय्यूब को भगवान शिव का किरदार निभाते हुए और हाथ में त्रिशूल लिए दिखाया गया। मंच संचालक मजाकिया अंदाज में उसके सोशल मीडिया फॉलोअर्स का जिक्र करता है और कहता है कि उसे अपने फॉलोअर्स बढ़ाने के लिए ट्वीट करना चाहिए या तस्वीरें अपलोड करनी चाहिए। इसके बाद दर्शकों द्वारा ‘आजादी’ के नारे लगाए जाते हैं।

प्राइम वीडियो की सुपरहिट सीरीज ‘मिर्जापुर’ ने ससुर-बहू और देवर-भाभी के रिश्तों की पूरी मर्यादा को तार-तार कर दिया। इतना ही नहीं, अक्टूबर 2020 में यह भी सामने आया था कि मेवात में निकिता नाम की एक हिंदू लड़की को परेशान करने और इस्लाम में धर्मांतरण के लिए मजबूर करने वाले तौसीफ नाम के एक मुस्लिम युवक ने वेब सीरीज ‘मिर्जापुर’ देखने के बाद उसकी हत्या करने का फैसला किया था।

साल 2023 में प्राइम वीडियो ने सोनाक्षी सिन्हा, गुलशन देवैया, विजय वर्मा और वारिस अहमद जैदी अभिनीत वेब सीरीज ‘दहाड़’ रिलीज की। इस क्राइम थ्रिलर में दो कहानियाँ समानांतर रूप से चलती हैं। पहली कहानी एक ऊँची जाति की हिंदू लड़की रजनी की है, जो अल्ताफ नाम के एक मुस्लिम युवक के साथ भाग जाती है। दूसरी कहानी सायनाइड मोहन पर आधारित एक सीरियल किलर की है।

प्रेम और रेप जिहाद के अनगिनत पीड़ितों का मजाक उड़ाने जैसा प्रतीत होने वाली इस सीरीज में उस पैटर्न के अस्तित्व से इनकार किया गया जिसमें मुस्लिम पुरुषों पर हिंदू लड़कियों को इस्लाम में धर्मांतरित करने के लिए प्रेम और यौन संबंधों को हथियार बनाने तथा हिंदू आस्था का अपमान करने के आरोप लगते रहे हैं।

उस समय ऑपइंडिया के एक रिव्यू में बताया गया था कि सीरीज में राजपूतों को गुंडों के रूप में दिखाया गया, हिंदू संगठनों (बजरंग दल और ऐसे अन्य संगठनों) को नकारात्मक रूप में पेश किया गया, लव जिहाद को सामान्य दिखाया गया, जातिगत भेदभाव की काल्पनिक कहानियाँ जोड़ी गईं और मुख्य खलनायक के रूप में एक ऊँची जाति के हिंदू को चुना गया।

इससे पहले प्राइम वीडियो ने ‘शेरनी’ नाम की एक सीरीज रिलीज की थी। विद्या बालन अभिनीत यह वेब सीरीज वास्तविक घटनाओं पर आधारित थी। हालाँकि, ‘राख’ की तरह ही ‘शेरनी’ में भी हिंदू IFS अधिकारी के. आभारना को बदलकर विद्या बालन द्वारा निभाए गए ईसाई किरदार विन्सेंट के रूप में दिखाया गया। वहीं, वास्तविक जीवन के शिकारी असगर अली खान की जगह कलावा पहनने वाले रंजन राजहंस को दिखाया गया।

2020 में अमेजन प्राइम की तत्कालीन क्रिएटिव हेड अपर्णा पुरोहित को उनके वामपंथी झुकाव के लिए सोशल मीडिया पर घेरा गया था। उनके सोशल मीडिया पेज हिंदू-विरोधी प्रचार, प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा के प्रति नफरत भरी पोस्टों से भरे हुए थे।

ये OTT प्लेटफॉर्म मनोरंजन को ब्रेनवॉश करने के औजारों में बदल रहे हैं, हिंदुओं को ‘गैसलाइ’ कर रहे हैं और एक विभाजनकारी एजेंडा आगे बढ़ा रहे हैं। ‘राख’ को भी प्राइम वीडियो के उसी तरीके की अगली कड़ी माना जा रहा है, जहाँ कहानी में तथ्यों से ज्यादा वैचारिक संदेशों को महत्व दिया गया है।

(यह खबर मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई है जिसे इस लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं)

100 साल पुराने मंदिर के पास सरकारी जमीन पर चर्च बनाने का था प्लान, मद्रास HC ने लगाई रोक: धर्मांतरण की थी आशंका, पढ़ें- कोर्ट ने क्या कहा?

मद्रास हाई कोर्ट ने तमिलनाडु के कोयंबटूर में एक बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कलापट्टी मेन रोड पर स्थित मरिअम्मन मंदिर के पास चर्च बनाने पर रोक लगा दी है। जस्टिस जीआर स्वामीनाथन और जस्टिस वी लक्ष्मीनारायणन की बेंच ने यह अंतरिम आदेश दिया।

यह फैसला स्थानीय निवासी बालासुब्रमण्यम की याचिका पर आया है। उन्होंने जिला कलेक्टर और राजस्व विभागीय अधिकारी (RDO) के आदेश के खिलाफ कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। हाई कोर्ट ने मामले से जुड़े सभी सरकारी रिकॉर्ड्स की जाँच की। जाँच में पता चला कि जिस जमीन पर चर्च बनना था, वह कागजों में ‘सार्वजनिक सड़क’ दर्ज है।

कोर्ट ने नोट किया कि इस इलाके में ईसाई आबादी बहुत ही कम है। वहीं दूसरी तरफ वहाँ रहने वाली बहुसंख्यक हिंदू आबादी इस चर्च का कड़ा विरोध कर रही है। कोर्ट का मानना है कि 100 साल से भी पुराने हिंदू मंदिर के बिल्कुल पास बड़ा चर्च बनाना गलत इरादे की ओर इशारा करता है।

25 मई 2026 को दिए फैसले में जस्टिस स्वामीनाथन ने लिखा कि कोयंबटूर एक सांप्रदायिक रूप से बेहद संवेदनशील शहर है। यह शहर अतीत में बम धमाके और खूनी धार्मिक दंगे झेल चुका है। प्रस्तावित चर्च मंदिर से बिल्कुल थोड़ी ही दूरी पर बनाया जा रहा है। उन्होंने कहा कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है और हमारा समाज विविधताओं से भरा है। इसलिए देश में धार्मिक सौहार्द और भाईचारा बनाए रखना बहुत जरूरी है।

मद्रास हाई कोर्ट के जजमेंट का स्क्रीनशॉट

जस्टिस स्वामीनाथन ने साफ किया कि संविधान सबको अपना धर्म मानने और उसका प्रचार करने का अधिकार देता है। लेकिन यह अधिकार देश की कानून व्यवस्था और शांति के दायरे में ही आता है। हालाँकि, कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि सरकार को किसी भी विरोध के आगे घुटने नहीं टेकने चाहिए। अगर किसी का कानूनी अधिकार पूरी तरह सही है और विरोध बेबुनियाद है, तो सरकार को उस अधिकार को लागू कराने के लिए किसी भी हद तक जाना चाहिए।

मद्रास हाई कोर्ट के जजमेंट का स्क्रीनशॉट

जस्टिस स्वामीनाथन ने याचिकाकर्ता की एक और बात पर विचार किया। याचिकाकर्ता ने कहा था कि इस चर्च का इस्तेमाल धर्मांतरण (धर्म बदलने) की गतिविधियों के लिए हो सकता है। उनके वकील ने आशंका जताई कि नई इमारत धर्मांतरण का केंद्र बन सकती है। इस पर कोर्ट ने कहा कि हम एक धर्मनिरपेक्ष देश हैं। हमारा समाज विविधताओं से भरा हुआ है। इसलिए देश में धार्मिक सौहार्द और भाईचारा बनाए रखना बहुत जरूरी है। अगर किसी का धार्मिक अधिकार पूरी तरह कानूनन साबित होता है, तो उसे लागू कराना सरकार का कर्तव्य है।

मद्रास हाई कोर्ट के जजमेंट का स्क्रीनशॉट

याचिकाकर्ता ने लगाया कट्टरपंथी संगठनों को बढ़ावा मिलने का आरोप

याचिकाकर्ता ने हाई कोर्ट के सामने एक बड़ा दावा किया है। उन्होंने कहा कि राज्य में मुख्यमंत्री सी जोसफ विजय की सरकार आने के बाद से कुछ कट्टरपंथी संगठन काफी सक्रिय हो गए हैं। उनके हौसले लगातार बढ़ते जा रहे हैं। याचिकाकर्ता ने राज्य के बदलते सामाजिक और धार्मिक माहौल को दिखाने के लिए कोर्ट के सामने कुछ उदाहरण भी रखे। उनका कहना है कि नई सरकार बनने के बाद से राज्य की स्थिति में काफी बदलाव आया है।

याचिकाकर्ता ने कोर्ट को बताया कि विधानसभा के अध्यक्ष जेसीडी प्रभाकर खुद हजारों बाइबिल मुफ्त बाँटने का दावा करते हैं। उन्होंने विधानसभा के अपने उद्घाटन भाषण में भी बाइबिल की आयतों का जिक्र किया था। इसके अलावा याचिकाकर्ता ने विपक्ष के नेता उदयनिधि स्टालिन के एक बयान का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि जब उदयनिधि स्टालिन ने विधानसभा में सनातन धर्म को खत्म करने की बात कही, तो सत्ताधारी दल ने इस पर कोई आपत्ति नहीं जताई। सत्ता पक्ष के किसी भी नेता ने इस विवादित बयान की निंदा तक नहीं की।

गाँव में बेहद कम है ईसाई आबादी

जिस गाँव में चर्च बनाने का प्रस्ताव है, वहाँ ईसाई समुदाय की आबादी बहुत ही कम है। इस गाँव में कुल मिलाकर लगभग 1000 परिवार रहते हैं। इनमें से 950 परिवार हिंदू हैं और 15 परिवार मुस्लिम हैं। बाकी बचे परिवारों में से कुछ ही ईसाई मजहब से जुड़े हैं। जनवरी 2010 में जिला कलेक्टर ने मंदिर के पास चर्च बनाने की मंजूरी का एक आदेश जारी किया था। गाँव के हिंदू परिवारों ने इस फैसले का कड़ा विरोध किया। उन्होंने 2011 में जिला कलेक्टर के इस आदेश को कोयंबटूर की जिला मुंसिफ कोर्ट में चुनौती दी। यह दीवानी मामला (सिविल सूट) अदालत में आज भी लंबित है।

इस मामले के करीब 13 साल बाद कुछ निजी लोगों ने चर्च का निर्माण फिर से शुरू करने की कोशिश की। इसके लिए उन्होंने जरूरी आदेश भी हासिल कर लिए। लेकिन इस निर्माण के कारण इलाके में कानून व्यवस्था की स्थिति बिगड़ गई। माहौल खराब होता देख जिला कलेक्टर ने उन्हें तुरंत काम रोकने का निर्देश दिया। इसके बाद साल 2024 में ‘चर्च ऑफ साउथ इंडिया’ (CSI) ने जिला कलेक्टर के इस रोक वाले आदेश के खिलाफ मद्रास हाई कोर्ट में एक रिट याचिका दायर की।

अप्रैल 2026 में मद्रास हाई कोर्ट के जस्टिस एम दंडपाणि की सिंगल बेंच ने इस मामले पर सुनवाई की। अदालत ने मामले के गुण-दोष पर कोई भी अंतिम फैसला सुनाने से साफ इनकार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि चूँकि निचली अदालत में पहले से ही एक सिविल सूट लंबित है, इसलिए अभी इस पर कोई फैसला नहीं लिया जा सकता। हाई कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को निर्देश दिया कि वे निचली अदालत से सिविल सूट का फैसला आने के बाद ही नए सिरे से आवेदन करें। तब तक चर्च के निर्माण कार्य पर पूरी तरह रोक रहेगी।

मद्रास हाई कोर्ट ने पहले भी की थी धार्मिक अधिकारों की रक्षा

पिछले साल दिसंबर में मद्रास हाई कोर्ट की मदुरै बेंच ने एक बड़ा फैसला सुनाया था। अदालत ने हिंदुओं के धार्मिक अधिकारों की रक्षा की थी। कोर्ट ने डिंडीगुल के ‘मांडू कोविल’ और मदुरै की ‘तिरुपरनकुंद्रम पहाड़ी’ पर स्थित दीपथून स्तंभ पर कार्तिकाई दीपम जलाने के अधिकार को सही ठहराया था।

इस मामले की सुनवाई हाई कोर्ट के सिंगल जज जस्टिस जीआर स्वामीनाथन ने की थी। उन्होंने डिंडीगुल और मदुरै के जिला प्रशासनों को कड़ी फटकार लगाई थी। जस्टिस स्वामीनाथन ने कहा था कि प्रशासन हिंदू भक्तों के लिए दीये जलाने की जरूरी व्यवस्था करने में पूरी तरह नाकाम रहा। कोर्ट ने साफ किया था कि प्रशासन को भक्तों के धार्मिक अधिकारों का सम्मान करना चाहिए।

(यह रिपोर्ट मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई है। अंग्रेजी की रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

मेसी और रोनाल्डो: साँझ के सूरज अभी डूबे नहीं, यह खेल अभी बाकी है

कुछ रातें ऐसी होती हैं जब किसी स्टेडियम में बैठे हजारों दर्शक सिर्फ एक मैच नहीं देखते, वे अपने सामने एक किंवदंती को समय के विरुद्ध लड़ते हुए देखते हैं। और फिर ऐसी ही रातों की कहानियाँ पीढ़ियों तक सुनाई जाती हैं।

अमेरिका के कन्सास सिटी स्टेडियम में बीती रात कुछ ऐसा ही हुआ। 76,000 दर्शकों से खचाखच भरे इस मैदान पर विश्वविजेता अर्जेंटीना का सामना ग्रुप जे में अल्जीरिया से था। वह अल्जीरिया जो पिछले पच्चीस मैचों से अजेय चली आ रही थी। कागज पर यह एक कठिन मुकाबला था। लेकिन कभी-कभी फुटबॉल कागजों पर नहीं खेला जाता। क्योंकि जब मैदान पर लियोनेल मेसी मौजूद हों, तब हर आँकड़ा, हर संभावना और हर भविष्यवाणी अचानक छोटी पड़ जाती है।

और फिर, उस रात, दुनिया ने एक बार फिर जादू देखा।

पिछले विश्व कप की विजेता अर्जेंटीनी टीम का सामना ग्रुप जे की अपनी विरोधी टीम अल्जीरिया से था। वह अल्जीरिया जो अपने पिछले पच्चीस मैचों में अविजित थी। इस टूर्नामेंट में सदैव अमूमन धीमी रफ्तार से शुरुआत करने के लिए जाने जानी वाली ‘ला अल्बीसेलेस्त’ अपनी पारंपरिक सफेद-नीली धारियों वाली जर्सी में 4-3-3 की फॉर्मेशन के संग मैदान पर उतरी। गोलपोस्ट पर पिछले विश्व कप के नायक रहे एमिलियानो मार्तिनेज मौजूद थे। डिफेंस का नेतृत्व कर रहे थे रोमेरो। मिडफील्ड में, रौड्रिगो दी पॉल, मैक एलिस्टर व एंज़ो फरनान्देज़ की, पिछले विश्व कप की ही तिकड़ी थी। अटैकिंग लाइन में शुरुआती लाइन अप में थे कप्तान मेसी, लाऊतूरो मार्टीनेज़ व थिआगो अल्माडा। स्टार्टिंग लाइन अप में जगह पाते ही मेसी लगातार छह विश्व कप में अपने वतन के लिए मैदान में उतरने वाले पहले खिलाड़ी बन गए। यह राष्ट्रीय टीम के लिए उनका 200वाँ मैच भी होने जा रहा था।

यह मैच पूरी तरह से एक विशेष खिलाड़ी पर केंद्रित रहा। 39 वर्षीय विश्वविजेता लियोनेल आंद्रेस मेसी कूकुतीनी। यह उनके खेल के जादू का ही तो असर था कि गेंद पर 53% नियंत्रण रखने के पश्चात भी, पिछले पच्चीस मैचों से अविजित, अल्जीरिया की टीम आज मैदान पर कुछ भी न कर सकी। मेसी ने अपनी टीम के लिए तीन जरूरी गोल स्कोर किए। उनके तीन गोलों की ही बदौलत, अर्जेंटीना ग्रुप जे का यह मैच 3-0 से जीत गई।

यह बेहद काव्यात्मक ही तो था कि इस मैच से ठीक-ठीक बीस वर्ष पूर्व रोसारियो के कस्बे से निकले नन्हें जादूगर ‘ला पुल्गा’ ने, अठारह वर्ष की उम्र में, 2006 विश्व कप में अर्जेंटीना के लिए अपने सफर की शुरुआत की थी।

यह वही विश्व कप था जिसमें आज अल्जीरिया के लिए गोलपोस्ट पर खड़े लुका जिदान के पिता जिनेदिन जिदान ने अपने खेल से संपूर्ण विश्व को अपना दीवाना बना लिया था। इस हैट्रिक के साथ ही मेसी विश्व कप में हैट्रिक लगाने वाले सबसे उम्रदराज खिलाड़ी भी बन गए। साथ ही साथ मेसी विश्व कप के लगातार पांच मैचों में गोल स्कोर करने वाले पहले, और इकलौते, खिलाड़ी भी बन गए। क्रिस्टियानो रोनाल्डो के बाद वो दूसरे ऐसे खिलाड़ी भी बन गए जिन्होंने विश्व कप के पांच भिन्न-भिन्न संस्करणों में गोल स्कोर किया है।

फ्रांस का दबदबा और सेनेगल का प्रतिरोध

वहीं, पिछले संस्करण की उपविजेता, फ्रेंच टीम, का सामना अपने चिर प्रतिद्वंद्वी सेनेगल से था। फ्रेंच टीम के पास बेहतरीन युवा खिलाड़ियों का इतना बड़ा पूल है कि वो एक साथ विश्व कप में दो से तीन टीमों को उतार सकता है। ‘लेस ब्ल्यूज’ (फ्रांस) को इस मैच में कुछ पुराने हिसाब भी चुकाने थे।

फ्रेंच टीम कितनी घातक है इसका पता इसी बात से चल जाता है कि उसकी शुरूआती लाइन अप में अटैक की जिम्मेदारी ओलीसे, एमबाप्पे, डेंबेले व देस़िरे दोऊ पर थी। साथ ही साथ चेर्की, बार्कोला व थुर्रम जैसे घातक अटैकिंग खिलाड़ी बेंच पर अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे। हालाँकि, सेनेगल के पास गोलपोस्ट पर एदुआर्द मेंडी, डिफेंस में कूलिबाली, अटैकिंग लाइन में सादियो माने व निकोलस जैक्सन मौजूद थे। यह सभी खिलाड़ी कई वर्षों तक इंग्लिश प्रीमियर लीग में खेलने का अनुभव रखते हैं।

न्यूयॉर्क के न्यूजर्सी स्टेडियम में मैच की शुरुआत होती है। दोनों ही टीमें जीत कर जरूरी अंक बटोरने की फिराक में थीं। फ्रेंच टीम शुरू से ही सेनेगल के गोलपोस्ट पर हमले करने के प्रयास कर रही थी। राबियो व डेंबेले बार-बार मिडफील्ड से गेंद को एमबाप्पे तक पहुंचाने के लिए प्रयासरत थे। हांलांकि, सेनेगल फ्रेंच टीम को गोल करने से रोके हुए थी। फलस्वरूप, मैच का पहला हाफ गोलरहित रहा।

लेकिन आगे कहानी बदलने वाली थी। मैच के छियासठवें मिनट में रियाल मैड्रिड के स्टार फुटबॉलर कीलियन एमबाप्पे गोल लगा कर फ्रांस को बढ़त दिला देते हैं। लेकिन सेनेगल संयम नहीं गंवाती और कैसे भी एक अंक लेने के प्रयास में रहती है। परन्तु अस्सीवें मिनट में फ्रेंच कोच देश्चैंप्स ओसमान डेंबेले को सब्स्टीट्यूट कर बारकोला को मैदान में भेजते हैं। कोच का बारकोला को अंदर भेजना तुरंत रंग लाता है। अपने पहले ही टच से बारकोला एक गोल स्कोर कर स्कोर को 2-0 कर देते हैं। आगे, हांलांकि, अंतिम क्षणों में दोनों ही टीमें एक-एक गोल दागती हैं। मैच का अंत 3-1 से फ्रांस के पक्ष में होता है।

अन्य मुकाबले: नॉर्वे और कोलंबिया की शानदार जीत

वहीं, अपनी वाइकिंग फोटोशूट को लेकर चर्चा में रही नॉर्वे का मुकाबला इराक़ से था। नॉर्वे इक ऐसी टीम है जो विश्व कप के इस संस्करण में एक डार्क हॉर्स साबित हो सकती है। उनकी अटैकिंग लाइन बेहद ही घातक है। नॉर्वे की अटैकिंग लाइन में एंटोनियो नूसा, अर्लिंग हालांड व सोरलोथ मौजूद हैं। वहीं मिडफील्ड में हैं चपल खिलाड़ी ओदेगार्द। ग्रुप आई के इस मुकाबले में अर्लिंग हालांड के दो गोलों की बदौलत नॉर्वे ने 4-1 से इराक को धो दिया। वहीं ग्रुप जे के एक अन्य मुकाबले में ऑस्ट्रिया ने 2-1 से जॉर्डन पर बढ़त बनाई।

मेसी के बाद अब निगाहें रोनाल्डो पर थीं

फिर, बीती रात, क्रिस्टियानो रोनाल्डो के नेतृत्व में एक टाइटल कंटेंडर के तौर पर पुर्तगाल कॉन्गो के विरुद्ध अपने अभियान की शुरुआत करने उतरी। निश्चित तौर पर मेसी की हैट्रिक के बाद क्रिस्टियानो भी जरूर कुछ बड़ा करना चाहते होंगे।

इस विश्व कप के सबसे घातक स्क्वाड के संग पुर्तगाल की टीम मैदान में उतरी। मैच शुरू हुआ। पुर्तगाल की रक्षापंक्ति में कैंसेलो व नूनो मेंडेस मौजूद थे। पुर्तगाल का मिडफील्ड तो खैर, फिलहाल, संपूर्ण जगत में सब से खास है। मिडफील्ड में मौजूद थे ब्रुनो फर्नानदेज़, विटिन्हा व चौबीस वर्षीय सनसनीखेज खिलाड़ी ज़ाओ नेवेज़। अटैक का दारोमदार था बर्नार्डो सिल्वा, क्रिस्टियानो व पेड्रो नेटो पर। वहीं बेंच पर लियाओ, फैलिक्स, दालो, ट्रिंकाओ, नूनेस व नेवेज़ जैसे अनुभवी खिलाड़ी मौजूद थे, जो जीत के लिए भूखे हैं।

कॉन्गो की टीम के पास यूं कोई बड़ा नाम तो नहीं था मगर वो एकजुट होकर इस दैत्य से लड़ने जा रहे थे। कोच देसाब्रे ने 5-3-2 की अति-रक्षात्मक फॉर्मेशन के साथ अपनी टीम को मैदान पर उतारा। एक अपेक्षाकृत छोटी टीम ऐसे टूर्नामेंट में अगर इतनी बड़ी टीम के विरुद्ध मुकाबला ड्रॉ कर के एक अंक भी ले ले तो वह जीत सरीखा ही है। जैसा हमने काबो-वर्दे को स्पेन के विरुद्ध करते देखा था।

लेकिन, मैच के छठवें ही मिनट में मैदान की बांई फ्लैंक से पेड्रो नेटो एक खूबसूरत क्रॉस विपक्षी गोलपोस्ट की ओर बढ़ाते हैं जिसको युवा ज़ाओ नेवेज़, पिछले दो वर्षो से सारी दुनिया में जिनकी तूती बोल रही है, एक बेहद शानदार हेडर लगा कर गोल में तब्दील कर देते हैं। पुर्तगाल को बढ़त मिल जाती है। लेकिन फिर, मैच के पहले हाफ के अंतिम क्षणों में, योआन विस्सा एक अच्छी जंप लेकर दाएं छोर से आए क्रॉस को हेडर से गोलपोस्ट के भीतर भेज ह्यूस्टन स्टेडियम में मौजूद तमाम पुर्तगाली समर्थकों का दिल तोड़ देते हैं। इस गोल के साथ ही पहले हाफ की समाप्ति पर स्कोर हो जाता है 1-1।

दूसरे हाफ में पुर्तगाल गोल लगाने के कई प्रयास करती है मगर मैच में पिचहत्तर प्रतिशत समय गेंद अपने काबू में रखने के बावजूद पुर्तगाल गेंद के संग कुछ चमत्कारी नहीं कर पाते। काबो-वर्दे की ही भांति, कॉन्गो अपने से काफी मजबूत टीम को जीत से वंचित रखने में सफल हो जाती है। तमाम चाहने वालों की आशाओं के उलट, क्रिस्टियानो कुछ खास नहीं कर पाते। 5.9 की रेटिंग के साथ वो इस मैच में बेअसर रहते हैं। खैर, वह बड़े खिलाड़ी हैं और आगे उनके दल को फिलहाल ग्रुप में और भी मैच खेलने हैं। लेकिन कॉन्गो ने जो किया, वो ऐतिहासिक है।

इंग्लैंड का ‘थ्री लायंस’ अवतार

उधर, डल्लास स्टेडियम में थॉमस टुकेल की इंग्लिश टीम का सामना था लुका मॉद्रिच की क्रोएशियाई टीम से। यह एक बेहद ही रोमांचक मैच था जो टूर्नामेंट के शुरुआती चरण में ही खेल प्रेमियों को देखने को मिलने वाला था। दोनों ही टीमें काफी अच्छी हैं। ज्ञात रहे कि दोनों ही टीमें रशिया में खेले गए 2018 विश्व कप के सेमीफाइनल में भी आमने सामने थीं, जहां क्रोएशिया ने इंग्लैंड को हराकर फाइनल में जगह बना ली थी। परन्तु उसके बाद भी चार दफा दोनों टीमें आपस में भिड़ चुकी हैं जहां इंग्लैंड कभी हारी नहीं।

इस दफा इंग्लैंड जहां टाइटल कंटेंडर हैं तो क्रोएशियाई टीम इक ऐसे दौर में है जब उसके कई महत्वपूर्ण खिलाड़ी या तो रिटायर हो चुके हैं या अपने करियर का सूर्यास्त देख रहे हैं। फ्रांस की ही भांति इंग्लैंड की टीम भी इतने खिलाड़ियों से लैस है कि टूर्नामेंट में आराम से दो टीमों को एकसाथ मैदान में उतारने का माद्दा रखती है।

खैर, रेफरी व्हिस्ल बजाते हैं। 4-2-3-1 की फॉर्मेशन के साथ मैदान में उतरी इंग्लिश टीम खेल के शुरुआती क्षणों से ही अटैक शुरू कर देती है। बारहवें मिनट में ही इंग्लैंड को एक पेनाल्टी मिलती है जिसपर थोड़ी कंट्रोवर्सी भी हुई। खैर, उसे गोल में तब्दील कर हैरी केन इंग्लैंड को मैच में बढ़त दिला देते हैं। क्रोएशियाई टीम अपना संयम नहीं खोते और मैच आगे बढ़ता है। फिर होता है एक कमाल। मैच के छत्तीसवें मिनट में क्रोएशियाई राइट आऊट बातूरीना एक झन्नाटेदार गोल लगाकर स्कोर बराबर कर देते हैं। लेकिन जवाबी हमला कर एक दफा फिर हैरी केन बयालिसवें मिनट में मिले कॉर्नर पर एक हेडर द्वारा गोल मार कर स्कोर 2-1 कर देते हैं।

इंग्लैंड के समर्थकों के जश्न पर तब ब्रेक लग जाता है जब साथी खिलाड़ी के संग बेहतरीन तालमेल के जरिए सेंट्रल फॉरवर्ड मूसा पहले हाफ का अंतिम अटैक कर एक गोल जड़ क्रोएशिया की एक दफा फिर मैच में वापसी करवा देते हैं। स्कोर हो जाता है 2-2। इसके साथ ही पहला हाफ समाप्त हो जाता है।

परन्तु, दूसरे हाफ के शुरू होते ही स्टार इंग्लिश मिडफील्डर ज्यूड बेलिंघम एक बेहतरीन अंदाज में अकेले ही गेंद को लेकर विपक्षी गोलपोस्ट की ओर बढ़ते हैं। बेहद करिश्माई अंदाज में गोल लगाकर वो स्कोर 3-1 कर देते हैं। फिर बेंच से मैदान पर आए सब्स्टीट्यूट मार्कस रैशफॉर्ड मैच के पिच्चासीवें मिनट में इंग्लैंड के लिए एक और बेहद खूबसूरत गोल स्कोर कर स्कोर को 4-1 कर देते हैं। ‘द थ्री लायन्स’ ने एक बेहद ही शानदार तरीके से सभी को बता दिया कि वो आ चुके हैं और कोई भी इस दफा उन्हें हल्के में लेने की ग़लती न करे। ‘दे आर गोइंग टू बी अ फोर्स, नो वन वुड लाइक टु मेस विद’।

आगे, टोरंटो में, ग्रुप एल में घाना के सामने थी पनामा की टीम, जहां यैरेंक्ई ने मैच के बिल्कुल ही अंतिम क्षणों में एक गोल स्कोर कर घाना को 1-0 से जीत दिलाई। वहीं उज़्बेकिस्तान बायर्न म्यूनिख के स्टार विंगर लूइस डियाज़ की कोलंबिया से मेक्सिको में टक्कर लेते नजर आई। कोलंबिया ने यह मुकाबला 3-1 से जीत कर ग्रुप में अपनी पकड़ मजबूत कर ली।

आगे, रात साढ़े नौ बजे दक्षिण अफ्रीका का सामना चेक रिपब्लिक से होगा। फिर भारतीय समयानुसार रात साढ़े बारह बजे लॉस एंजेलिस स्टेडियम में स्विट्जरलैंड की टक्कर बोस्निया एवं हर्ज़ेगोविना से होगी। वहीं वैंकूवर में कनाडा अपने घरेलू दर्शकों के सामने कतर के विरुद्ध मैदान में उतरेगा। और कल सुबह साढ़े छह बजे मैक्सिको का सामना दक्षिण कोरिया से होगा।

लेकिन इन तमाम मैचों और परिणामों के बीच, बीती रात की सबसे बड़ी कहानी एक बार फिर उसी खिलाड़ी के नाम रही, जिसने दो दशकों से इस खेल की कल्पना को जीवित रखा है। बीस वर्ष पहले जर्मनी में खेले गए विश्व कप में एक दुबला-पतला किशोर अर्जेंटीना की जर्सी पहनकर पहली बार दुनिया के सामने आया था। तब शायद किसी ने नहीं सोचा होगा कि वही खिलाड़ी आने वाले वर्षों में फुटबॉल के इतिहास की सबसे महान कथाओं में से एक लिखेगा।

आज, उनतालीस वर्ष की उम्र में, लियोनेल मेसी ने विश्व कप में अपने करियर की पहली हैट्रिक लगाई है। समय बदल गया। पीढ़ियाँ बदल गईं। उनके साथ खेलने वाले अधिकांश खिलाड़ी रिटायर हो चुके हैं। लेकिन जब गेंद उनके पैरों में आती है, तो दुनिया अब भी कुछ क्षणों के लिए रुक जाती है।

शायद यही महानता है। कुछ खिलाड़ी ट्रॉफियाँ जीतते हैं। कुछ रिकॉर्ड बनाते हैं। और कुछ ऐसे होते हैं जो खेल से कहीं बड़े हो जाते हैं। लियोनेल मेसी उन्हीं में से एक हैं। और शायद यही कारण है कि फुटबॉल सिर्फ एक खेल नहीं है। यह सपनों की वह भाषा है, जिसे दुनिया का हर बच्चा समझता है। यही इस खेल का जादू है।