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नैहाटी के ‘सिंडिकेट राज’ पर कानून का शिकंजा: पूर्व TMC विधायक सनत डे गिरफ्तार, वसूली-जमीन कब्जे से लेकर 2021 की हिंसा तक के गंभीर आरोप

पश्चिम बंगाल में तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) के नेताओं की दबंगई और आपराधिक कारनामों पर कानून का शिकंजा कसना शुरू हो गया है। उत्तर 24 परगना जिले के नैहाटी विधानसभा क्षेत्र से TMC के पूर्व विधायक सनत डे को पुलिस ने शनिवार (8 अगस्त) को गिरफ्तार कर लिया है।

सनत डे पर इलाके में संगठित रूप से जबरन वसूली का सिंडिकेट चलाने, अवैध रूप से लोगों की जमीनों पर कब्जा करने, साल 2021 के विधानसभा चुनावों के बाद हुए भीषण राजनीतिक खून-खराबे और बीजेपी कार्यकर्ताओं पर जानलेवा हमलों में शामिल होने के गंभीर आरोप हैं।

पुलिस की कई टीमें लंबे समय से सनत डे की तलाश में जगह-जगह छापेमारी कर रही थीं। आखिरकार शनिवार (8 अगस्त 2026) को पुलिस ने गुप्त सूचना के आधार पर उत्तर 24 परगना के दत्तपुकुर इलाके में एक ठिकाने पर दबिश देकर उसे धर दबोचा। गिरफ्तारी के बाद उसे नैहाटी थाने लाया गया और फिर बैरकपुर उपमंडलीय अदालत में पेशी के लिए ले जाया गया।

दत्तपुकुर के गुप्त ठिकाने से नाटकीय गिरफ्तारी और पुलिस स्टेशन पर फूटा जनआक्रोश

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, सनत डे के खिलाफ नैहाटी और आसपास के थानों में पिछले कई महीनों से रंगदारी, मारपीट और डराने-धमकाने की दर्जनों शिकायतें पेंडिंग थीं। जब पुलिस की टीमों ने उनके घर और संभावित ठिकानों पर छापेमारी शुरू की तो वे पुलिस को चकमा देकर फरार हो गए थे। लेकिन शनिवार की सुबह दत्तपुकुर में पुलिस ने घेरकर गिरफ्तार कर लिया।

जैसे ही सनत डे को पुलिस गाड़ी में बैठाकर नैहाटी थाने लेकर पहुँची, वहाँ का माहौल पूरी तरह गरमा गया। लंबे समय से उनके अत्याचारों से पीड़ित स्थानीय लोग और बीजेपी कार्यकर्ता थाने के बाहर जमा हो गए।

जब पुलिस उसे गाड़ी से उतारकर अंदर ले जा रही थी, तो भीड़ ने ‘चोर-चोर’ के जोरदार नारे लगाए और उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की माँग की। सनत डे के खिलाफ इलाके में गुस्सा इतना गहरा था कि कुछ महीने पहले जब वो नैहाटी के विजयनगर में एक दफ्तर का उद्घाटन करने पहुँचे थे, तो जनता ने उस पर सरेआम अंडे फेंके थे और काले झंडे दिखाए थे।

2021 की खूनी पोस्ट-पोल वायलेंस और बीजेपी कार्यकर्ताओं पर बर्बर अत्याचार

पश्चिम बंगाल में 2021 के विधानसभा चुनाव नतीजों के बाद राज्यभर में तृणमूल कॉन्ग्रेस के कार्यकर्ताओं और नेताओं द्वारा जो हिंसा की गई थी, सनत डे को नैहाटी क्षेत्र में उसका मुख्य सूत्रधार माना जाता है। चुनाव खत्म होते ही बीजेपी के समर्थकों और कार्यकर्ताओं के घरों को चुन-चुनकर निशाना बनाया गया, दुकानें लूटी गईं और परिवारों को बेघर कर दिया गया।

बीजेपी महिला मोर्चा की स्थानीय नेता जिनिया चक्रवर्ती ने सनत डे की गिरफ्तारी पर बताया कि केवल बीजेपी से जुड़े होने के कारण 2021 के चुनावों के बाद उनके घर पर TMC के गुंडों ने कई बार हमला किया और तोड़फोड़ की।

इलाके के दर्जनों बीजेपी कार्यकर्ताओं को अपनी जान बचाने के लिए महीनों तक जंगलों और दूसरे राज्यों में छिपकर रहना पड़ा था। सनत डे पर आरोप है कि उसने नैहाटी में विरोध की हर आवाज को दबाने के लिए पुलिस प्रशासन का दुरुपयोग किया और विपक्षी कार्यकर्ताओं पर झूठे मुकदमे दर्ज कराए।

बिना निवेश का धंधा: वसूली का सिंडिकेट और जमीन हड़पने का समानांतर साम्राज्य

नैहाटी और बैरकपुर का औद्योगिक इलाका लंबे समय से TMC के सिंडिकेट राज का शिकार रहा है। सनत डे पूर्व राज्य मंत्री पार्थ भौमिक का बेहद करीबी माना जाता था और वो पहले नैहाटी नगरपालिका का अध्यक्ष भी रह चुका हैं। पार्षद से लेकर विधायक बनने तक के अपने सफर में उसने इलाके में गुंडागर्दी और वसूली का एक बड़ा ताना-बाना तैयार कर लिया था।

बीजेपी नेता देबर्घ्य घोष और स्थानीय निवासियों का कहना है कि सनत डे का मुख्य काम ही व्यापारियों, बिल्डरों और आम लोगों से गुंडा टैक्स वसूलना था। विधायक बनने के बाद उसका यह अवैध कारोबार कई गुना बढ़ गया था।

जो कोई भी उसे रंगदारी देने से इनकार करता, उसकी जमीन पर कब्जा कर लिया जाता था या उसके निर्माण कार्य को रोक दिया जाता था। इलाके में यह बात आम थी कि नैहाटी में कोई भी ईंट बिना सनत डे के कट (कमीशन) के नहीं रखी जा सकती थी।

2024 का उपचुनाव और 2026 में जनता का करारा जवाब

सनत डे की राजनीतिक पृष्ठभूमि देखें तो जब 2024 में पार्थ भौमिक बैरकपुर से लोकसभा चुनाव जीतकर सांसद बने, तो नैहाटी विधानसभा सीट खाली हो गई। इसके बाद हुए उपचुनाव में TMC ने सनत डे को टिकट दिया और वह विधायक चुना गया। हालाँकि विधायक बनने के बाद भी उसके रवैये में कोई बदलाव नहीं आया।

लेकिन जनता के सब्र का बाँध आखिरकार टूट गया। हाल ही में संपन्न हुए 2026 के विधानसभा चुनाव में नैहाटी की जनता ने सनत डे को पूरी तरह से नकार दिया। बीजेपी उम्मीदवार सुमित्रो चटर्जी ने उन्हें 10000 से अधिक वोटों के बड़े अंतर से करारी शिकस्त दी।

TMC की सत्ता खिसकते ही और चुनावी नतीजों में हार मिलते ही सनत डे का राजनीतिक संरक्षण खत्म हो गया, जिसके बाद पीड़ित लोग खुलकर सामने आने लगे और पुलिस को कानूनी शिकंजा कसना पड़ा।

कमर में रस्सी बाँधकर घुमाना काफी नहीं, मिले कठोरतम सजा- मंत्री अर्जुन सिंह

सनत डे की गिरफ्तारी पर नोआपाड़ा से विधायक और राज्य सरकार के मंत्री अर्जुन सिंह ने कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए पुलिस प्रशासन का धन्यवाद किया। अर्जुन सिंह ने साफ शब्दों में कहा, “सनत डे नैहाटी में मुख्य रूप से अवैध वसूली करने वाले व्यक्ति के रूप में जाने जाते हैं। विधायक बनते ही उनका यह बिना निवेश वाला धंधा और तेजी से फलने-फूलने लगा था।”

अर्जुन सिंह ने आगे कहा, “उन्हें गिरफ्तार करके पुलिस ने सही कदम उठाया है, लेकिन सिर्फ गिरफ्तार कर लेना या कमर में रस्सी बाँधकर कोर्ट ले जाना ही काफी नहीं होगा। नैहाटी की जनता ने जो अत्याचार झेला है, उसके लिए सनत डे को अदालत से कड़ी से कड़ी सजा मिलनी चाहिए। नैहाटी के लोग अपने ऊपर हुए अत्याचारों को कभी माफ नहीं करेंगे।”

सनत डे की गिरफ्तारी से यह साफ हो गया है कि तृणमूल कॉन्ग्रेस के शासनकाल में जिस तरह से दबंगई, कट-मनी कल्चर और चुनावी हिंसा को बढ़ावा दिया गया, अब कानून का डंडा उन सभी नेताओं पर चलना शुरू हो गया है। नैहाटी की जनता अब राहत की साँस ले रही है और उम्मीद कर रही है कि दशकों से चला आ रहा सिंडिकेट राज अब पूरी तरह खत्म होगा।

न्यूजलॉन्ड्री पर यौन उत्पीड़न के आरोप? रेपिस्ट तरुण तेजपाल के बचाव के पुराने रिकॉर्ड के बीच पूर्व कर्मचारियों ने खोली पोल

न्यूजलॉन्ड्री और उसके सह-संस्थापक अभिनंदन सेखरी इन दिनों चर्चा में हैं। अभिनंदन सेखरी पर ना केवल रेप के आरोपित का बचाव करने वाले रवैये के आरोप है, बल्कि उन पर महिलाओं के साथ गलत व्यवहार करने और कंपनी के अंदर यौन उत्पीड़न का माहौल बनाने के गंभीर आरोप लगे हैं।

तहलका के संस्थापक तरुण तेजपाल को साल 2013 में अपनी सहकर्मी के साथ दुष्कर्म करने का दोषी पाया गया है। अदालत ने उन्हें 10 साल की सजा सुनाई है। यह वही तरुण तेजपाल हैं जिनका इंटरव्यू साल 2012 में अभिनंदन सेखरी ने लिया था। कुछ लोग यह कह सकते हैं कि उस साल उन पर दुष्कर्म के आरोप नहीं लगे थे। इसलिए उनका इंटरव्यू लेना शायद गलत नहीं लगा हो। लेकिन इसके सबूत बताते हैं कि बात ऐसी नहीं थी। मीडिया जगत के बड़े लोगों को तरुण तेजपाल की हरकतों के बारे में पहले से ही पूरी जानकारी थी।

आरोपित के गलत कामों को देखकर लोग सिर्फ चुपचाप तमाशा नहीं देखते रहे। उन्होंने नए-नए शब्दों और तकनीकी भाषा का इस्तेमाल करके उसके इस गंदे व्यवहार को सही ठहराने की कोशिश की। इस मामले में सबसे कुख्यात बयान जाने-माने ‘पत्रकार’ विनोद मेहता का था। उन्होंने तरुण तेजपाल द्वारा किए गए यौन उत्पीड़न को ‘बिना सहमति के शारीरिक संबंध बनाने की इच्छा’ (non-consensual carnal favour) जैसा अजीब नाम दिया था।

बात सिर्फ यहीं तक नहीं रुकी। साल 2014 में न्यूजलॉन्ड्री के सह-संस्थापक अभिनंदन सेखरी की बहन निरुपमा ने भी आगे आकर तरुण तेजपाल का खुला बचाव किया था। वह इतने पर ही नहीं रुकीं। उन्होंने और आगे बढ़कर उस पीड़ित महिला के चरित्र पर ही कीचड़ उछालना शुरू कर दिया, जिसके साथ गलत हुआ था। उस समय उन्होंने अपने बयान में कहा, “सबसे पहले मैं साफ कर देना चाहती हूँ कि मैं आपको पीड़िता नहीं मानती। सिवाय इसके कि आप ‘बबलगम फेमिनिज्म’ की पीड़िता हों, जिसके बारे में मैं आगे विस्तार से बात करूँगी।”

जब कोई संस्था दुष्कर्म के आरोपित का तुरंत बचाव करने के लिए दौड़ पड़ती है, तो इससे उसकी असलियत सामने आ जाती है। इससे पता चलता है कि कंपनी के भीतर किस तरह का माहौल चल रहा है। न्यूजलॉन्ड्री ने एक ऐसा लेख छापा था जिसमें दुष्कर्म को सही ठहराने की कोशिश की गई थी। उस लेख के छपने के बाद उन्हें पीड़ित महिला के दर्द पर रत्तीभर भी पछतावा नहीं हुआ।

बाद में उन्होंने उस लेख को चुपचाप हटा दिया और एक आम सा माफीनामा या ‘आत्म-चिंतन’ नोट लिख दिया। इससे साफ पता चलता है कि इस व्यवस्था के अंदर गंदगी कितनी गहरी तक फैली हुई थी। यह सारा काला चिट्ठा तब खुला जब तरुण तेजपाल को अदालत से सजा हुई। न्यूजलॉन्ड्री में काम कर चुकीं कुछ पूर्व महिला कर्मचारियों ने इसके बाद कंपनी पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने बताया कि कंपनी के भीतर यौन उत्पीड़न का माहौल खुलेआम मौजूद है। इस पूरे और संवेदनशील मामले को सबसे पहले पत्रकार साईकिरण कन्नन ने दुनिया के सामने उजागर किया था।

सुमेधा मित्तल के ट्वीट का स्क्रीनशॉट

न्यूजलॉन्ड्री की पूर्व वरिष्ठ पत्रकार सुमेधा मित्तल ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X (ट्विटर) पर एक पोस्ट शेयर किया है। उन्होंने अपनी इस पोस्ट में लिखा है, “मुझे उम्मीद है कि वह दिन भी जरूर आएगा जिस दिन यह कंपनी अपने ही न्यूजरूम के अंदर हुई यौन उत्पीड़न की शिकायतों पर भी उतनी ही गंभीरता से विचार करेगी और सोचेगी।”

सुमेधा मित्तल के X प्रोफाइल का स्क्रीनशॉट

सुमेधा मित्तल की यह प्रतिक्रिया तब आई जब कंपनी ने साल 2014 में छपे उस लेख को चुपचाप हटा दिया, जिसे अभिनंदन सेखरी की बहन ने लिखा था और जिसमें दुष्कर्म के आरोपित का बचाव किया गया था। एक पूर्व कर्मचारी का खुलकर सामने आना और यह कहना कि कंपनी के अंदर यौन उत्पीड़न (POSH) की शिकायतों पर कोई कार्रवाई नहीं हुई, बेहद गंभीर चिंता का विषय है।

इससे कई बड़े और कड़े सवाल खड़े होते हैं। कंपनी के भीतर ऐसी कितनी यौन उत्पीड़न की शिकायतें दर्ज की गई थीं? उन शिकायतों पर प्रबंधन ने क्या कदम उठाए और क्या कार्रवाई की गई? क्या न्यूजलॉन्ड्री के मैनेजमेंट ने उन मामलों पर पर्दा डालकर अपने ही लोगों और तरुण तेजपाल जैसे लोगों को बचाने की कोशिश की थी?

प्रियंका ईश्वरी की एक्स प्रोफाइल का स्क्रीनशॉट

प्रियंका ईश्वरी के ट्वीट का स्क्रीनग्रैब

न्यूजलॉन्ड्री की एक और पूर्व कर्मचारी प्रियंका ईश्वरी ने भी इस मामले पर खुलकर अपनी बात रखी है। उन्होंने लिखा, “उम्मीद है कि वे सीनियर पत्रकारों को यह सिखाएँगे कि काम के सिलसिले में होने वाली कॉल पर महिला एडिटर्स पर चिल्लाएँ नहीं और उन्हें ‘कब से देख रहा हूँ मैं तेरेको’ जैसी बातें कहकर धमकाएँ नहीं। क्या पुरुष रिपोर्टरों को महिला सहयोगियों के साथ पेशेवर तरीके से पेश आने और ऑफिस को ‘लड़कों का लॉकर रूम’ न बनाने की ट्रेनिंग देने की उम्मीद करना बहुत बड़ी बात है?”

इन महिलाओं के बयानों से यह साफ पता चलता है कि न्यूजलॉन्ड्री के भीतर महिलाओं से नफरत करने वाला और जहरीला पुरुषवादी माहौल मौजूद है। इसमें एक और गौर करने वाली बात यह है कि कई जाने-माने अपराधी और दुष्कर्म का बचाव करने वाले लोग इस संस्था में आसानी से नौकरी पा लेते हैं। इसका उदाहरण #MeToo के आरोपित विक्रम किलपडी हैं, जिन्होंने तरुण तेजपाल की तरह तहलका में काम किया था।

लेख का स्क्रीनशॉट

लमत आर हसन नाम की एक महिला पत्रकार ने बताया था कि साल 2005 में विक्रम ने उनके साथ दुष्कर्म करने की लगभग कोशिश की थी। उन्होंने अपनी आपबीती सुनाते हुए बताया कि वह काफी हिंसक हो गए थे। उन्होंने उनके बाल खींचे, कलाई पकड़ी, दीवार से सटाया और फिर बिस्तर पर धकेल दिया। खुद को छुड़ाने की उनकी सारी कोशिशें नाकाम हो गईं। वह रोने लगीं, तब जाकर उसने उन्हें छोड़ा और यह किसी रेप होने के सबसे करीब का अनुभव था।

खुद न्यूजलॉन्ड्री के अपने खुलासे के मुताबिक, यही आदमी न्यूजलॉन्ड्री में भी काम कर चुका था।

अगर मेरी याददाश्त सही है, तो मैं न्यूजलॉन्ड्री के प्रधान संपादक रमन कृपाल से जुड़ी एक घटना को याद कर सकता हूँ। उन्होंने नैनीताल में 65 साल के मोहम्मद उस्मान द्वारा एक नाबालिग लड़की के साथ हुए रेप को ‘प्रेम संबंध’ और ‘छोटी घटना’ कहकर कम करके आंका था।

न्यूजलॉन्ड्री के ट्वीट का स्क्रीनशॉट

रमन कृपाल, जिन्हें पहले आपराधिक मानहानि के मामले में दोषी ठहराया जा चुका है, उन्होंने झिझकते हुए एक दिखावे के लिए माफी माँगी। यहाँ तक कि न्यूजलॉन्ड्री को भी एक स्पष्टीकरण जारी करना पड़ा था। जब बातचीत बिना स्क्रिप्ट के होती है, तो लोग अक्सर वही बोल देते हैं जो उनके दिल और दिमाग में चल रहा होता है।

न्यूजलॉन्ड्री के प्रधान संपादक के पद पर रहते हुए रमन कृपाल का एक नाबालिग बच्चे के बलात्कार के बारे में इस तरह की बात कहना हमें साफ तस्वीर दिखाता है। इससे हमें यह स्पष्ट अंदाजा हो जाता है कि उस खास संस्था के अंदर क्या चीज ‘सामान्य’ मानी जाती है।

महिलाओं के अधिकारों और नारीवाद का चुनिंदा समर्थन करने वाले लोग इन तमाम सालों में अपने खुद के घर को ठीक नहीं कर पाए। लेकिन वे दुनिया भर की हर बात पर दूसरों को बड़ी-बड़ी बातें सिखाने और खुद को नैतिक रूप से बेहतर दिखाने के लिए हमेशा तैयार रहते हैं।

शायद अभिनंदन सेखरी और उनकी टीम जिम्मेदारी लेना शुरू कर सकती है। मैं जानता हूँ कि यह वामपंथी-उदारवादी इकोसिस्टम के लिए सबसे मुश्किल काम है, लेकिन (बदलाव के लिए) वह इस बात की कोशिश कर सकते हैं।

PARAM 8000 से परम रुद्र और अब परम प्रज्ञा: भारत ने कैसे बनाई अपनी सुपरकंप्यूटिंग ताकत, AI के दौर में क्यों अहम है यह यात्रा

आज की दुनिया में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI सबसे जरूरी चीज बन गया है। एआई को चलाने के लिए सिर्फ डेटा या अच्छे सॉफ्टवेयर की जरूरत नहीं होती है। इसके लिए बहुत ज्यादा कंप्यूटिंग पावर की जरूरत पड़ती है। बड़े-बड़े AI मॉडल तैयार करने हों या मौसम का हाल जानना हो, इन सभी कामों के पीछे हाई-परफॉर्मेंस कंप्यूटिंग (HPC) की बड़ी भूमिका होती है। नई दवाइयाँ खोजने और अंतरिक्ष से जुड़े जटिल कामों में भी इसकी बहुत जरूरत पड़ती है।

भारत इस क्षेत्र में लगातार आगे बढ़ रहा है। शनिवार (8 अगस्त) को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक बड़ा कदम उठाया है। उन्होंने आईआईटी दिल्ली के 57वें दीक्षांत समारोह के दौरान ‘PARAM प्रज्ञा’ का उद्घाटन किया है। यह एक AI-पावर्ड हाई-परफॉर्मेंस कंप्यूटिंग सुविधा है। इसे IIT दिल्ली के सोनीपत कैंपस में लगाया गया है। विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग (DST) की 2025-26 की रिपोर्ट के मुताबिक, इसकी क्षमता 250 AI PF/8 PF दर्ज की गई है।

लेकिन ‘PARAM प्रज्ञा’ को सिर्फ एक नया सुपरकंप्यूटर समझना सही नहीं है। इसके पीछे भारत की दशकों लंबी एक खास यात्रा जुड़ी हुई है। इसकी शुरुआत ‘PARAM 8000’ सुपरकंप्यूटर से हुई थी। आज देश के अलग-अलग रिसर्च संस्थानों में ‘PARAM’ नाम के कई सुपरकंप्यूटर शानदार काम कर रहे हैं।

सुपरकंप्यूटर क्या है और भारत को इसकी जरूरत क्यों पड़ी

सामान्य कंप्यूटर हमारे रोजमर्रा के कामों को आसानी से संभाल लेते हैं। लेकिन जब किसी समस्या को हल करने के लिए अरबों-खरबों गणनाओं की जरूरत हो, तो सामान्य कंप्यूटर बहुत समय लेते हैं। ऐसे बड़े और कठिन कामों को बहुत तेजी से पूरा करने के लिए सुपरकंप्यूटर का इस्तेमाल किया जाता है। यह हजारों प्रोसेसिंग यूनिट को एक साथ जोड़कर काम करता है।

भारत की इस स्वदेशी सुपरकंप्यूटिंग यात्रा में ‘C-DAC’ (सेंटर फॉर डेवलपमेंट ऑफ एडवांस्ड कम्प्यूटिंग) की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण रही है। सी-डैक का शुरुआती उद्देश्य ऐसा सुपरकंप्यूटर बनाना था जो एक सेकंड में एक अरब गणनाएँ यानी एक गीगाफ्लॉप की क्षमता हासिल कर सके। इसी कोशिश का नतीजा था कि साल 1990 में ‘PARAM 8000’ बनकर तैयार हुआ। यहीं से ‘PARAM’ नाम की पूरी सुपरकंप्यूटर सीरिज की मजबूत नींव पड़ी थी।

इसकी तकनीक पैरेलल कंप्यूटिंग के विचार पर काम करती है। इसका मतलब होता है कि किसी बड़े और भारी काम को एक ही प्रोसेसर पर डालने के बजाय, उसे छोटे-छोटे हिस्सों में बाँट दिया जाता है। इसके बाद बहुत सारे प्रोसेसर मिलकर उस काम को एक साथ बहुत तेजी से पूरा करते हैं। इसी वजह से ‘PARAM’ को भारत की पैरेलल कंप्यूटिंग यात्रा का मुख्य आधार माना जाता है।

भारत को यह तकनीक बनाने की जरूरत सिर्फ अपनी तकनीकी ताकत दिखाने के लिए नहीं थी। उस समय देश को दूसरे देशों से अत्याधुनिक कंप्यूटिंग सिस्टम और तकनीक हासिल करने में बहुत कठिनाइयों का सामना करना पड़ता था। इसलिए वैज्ञानिक शोध और देश को तकनीक के मामले में पूरी तरह आत्मनिर्भर बनाने के लिए खुद की क्षमता विकसित करना बहुत जरूरी हो गया था।

इसी सोच के साथ देश में ‘PARAM 8000’ की शुरुआत हुई थी। इसके बाद भारत ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा और अपनी कंप्यूटिंग क्षमता को गीगाफ्लॉप से आगे बढ़ाकर टेराफ्लॉप और फिर पेटाफ्लॉप के स्तर तक पहुँचा दिया।

PARAM 8000 से PARAM प्रज्ञा तक: कैसे बदलती गई सुपरकंप्यूटिंग?

PARAM को किसी एक मशीन का नाम समझना सही नहीं है। यह भारत में अलग-अलग समय पर विकसित और तैनात किए गए हाई-परफॉर्मेंस कंप्यूटिंग सिस्टम की एक लंबी श्रृंखला है। हर नई पीढ़ी में कंप्यूटिंग पावर, प्रोसेसर आर्किटेक्चर, नेटवर्किंग, स्टोरेज और एप्लिकेशन की क्षमता बढ़ती गई।

PARAM 8000 इस यात्रा का शुरुआती बड़ा पड़ाव था। इसके बाद PARAM 10000 आया, जिसकी पीक परफॉरमेंस 100 गीगाफ्लॉप्स थी। 2002 में PARAM पद्मा ने 1 टेराफ्लॉप की सीमा पार की।

C-DAC के अनुसार PARAM पद्मा दुनिया के टॉप 500 सुपरकंप्यूटरों की सूची में शामिल होने वाला पहला भारतीय सिस्टम था। इसके बाद 2008 में PARAM युवा आया, जिसने नवंबर 2008 की TOP500 सूची में 69वीं रैंक हासिल की।

इसके बाद PARAM युवा-II सहित कई और सिस्टम विकसित हुए और भारत की कम्प्यूटिंग क्षमता लगातार बढ़ती गई। आगे चलकर PARAM सिद्धि, PARAM प्रवेगा, PARAM ब्रह्मा, PARAM शक्ति, PARAM संगनक, PARAM गंगा और PARAM रुद्र जैसे सिस्टम सामने आए।

PARAM Yuva-II के बाद PARAM Siddhi-AI और PARAM Pravega जैसे सिस्टम भारत की सुपरकंप्यूटिंग यात्रा में अगला चरण बने। PARAM Siddhi-AI ने खास तौर पर AI और मशीन लर्निंग वर्कलोड्स के लिए भारत की कम्प्यूटिंग क्षमता को मजबूत किया, जबकि PARAM Pravega जैसे सिस्टम ने अकादमिक और वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए हाई-परफॉर्मेंस कंप्यूटिंग उपलब्ध कराई।

आज उपलब्ध सरकारी आंकड़े इस विकास को और साफ करते हैं। DST के अनुसार NSM के तहत तैनात प्रमुख सिस्टम में PARAM सिद्धि 6.5 PF/210 PF AI, PARAM प्रवेगा 3.3 PF, PARAM रुद्र के कई 3 PF सिस्टम और PARAM ब्रह्म, PARAM युक्ति, PARAM शक्ति, PARAM संगनक तथा PARAM गंगा जैसे सिस्टम शामिल हैं।

यहां PF यानी पेटा फ्लॉप को समझना भी जरूरी है। फ्लॉप का मतलब फ्लोटिंग पॉइंट ऑपरेशन पर सेकंड है, यानी कंप्यूटर एक सेकंड में कितनी गणितीय गणनाएँ कर सकता है। 1 पेटाफ्लॉप का अर्थ लगभग एक क्वाड्रिलियन यानी 10^15 फ्लोटिंग-पॉइंट ऑपरेशन प्रति सेकंड है।

इसलिए जब किसी मशीन की क्षमता 3 पेटाफ्लॉप कही जाती है तो इसका मतलब है कि उसकी गणना क्षमता एक सेकंड में खरबों-खरबों फ्लोटिंग-पॉइंट ऑपरेशन के स्तर की है।

लेकिन AI के बढ़ते इस्तेमाल के साथ सिर्फ सामान्य HPC परफॉर्मेंस पर्याप्त नहीं रह गई। AI वर्कलोड में GPU और AI एक्सेलरेटर की भूमिका बढ़ी और इसी वजह से AI- स्पेसिफिक कंप्यूटिंग कैपेसिटी को अलग तरीके से मापना और डिजाइन करना भी महत्वपूर्ण हो गया। इसी बदलते दौर में PARAM प्रज्ञा जैसी सुविधा सामने आती है।

PARAM प्रज्ञा और PARAM रुद्र में अंतर

‘PARAM प्रज्ञा’ एक आधुनिक सुपरकंप्यूटिंग सुविधा है, जिसे खासतौर पर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और हाई-परफॉर्मेंस कंप्यूटिंग के लिए तैयार किया गया है। इसे IIT दिल्ली के सोनीपत कैंपस में स्थापित किया गया है। सरकारी रिपोर्ट के अनुसार इसकी क्षमता 250 AI PF/8 PF बताई गई है। यहाँ 250 एआई पेटाफ्लॉप्स का आँकड़ा देखकर इसे सामान्य क्षमता न समझें, क्योंकि AI के कार्यों में गणना का तरीका अलग होता है। आज के दौर में बड़े एआई मॉडल को प्रशिक्षित करने और मुश्किल रिसर्च कार्यों के लिए ऐसी ही भारी-भरकम कंप्यूटिंग शक्ति की जरूरत होती है।

भले ही ‘PARAM प्रज्ञा’ और ‘PARAM रुद्र’ दोनों भारत के नेशनल सुपरकंप्यूटिंग मिशन का हिस्सा हैं, लेकिन दोनों अलग मशीनें हैं। ‘PARAM रुद्र‘ भारत की स्वदेशी हार्डवेयर क्षमता का एक बड़ा उदाहरण है। इसके सर्वर को पूरी तरह देश में ही डिजाइन और निर्मित किया गया है। इसके साथ ही इसमें सी-डैक का स्वदेशी सॉफ्टवेयर और त्रिनेत्र तकनीक का इस्तेमाल किया गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कुछ समय पहले ही ऐसे तीन सिस्टम देश को समर्पित किए थे।

दूसरी तरफ ‘PARAM प्रज्ञा’ मुख्य रूप से एआई और आधुनिक कंप्यूटिंग की जरूरतों को पूरा करती है। आसान शब्दों में समझें तो ‘PARAM रुद्र’ भारत के स्वदेशी हार्डवेयर और निर्माण कौशल को दर्शाता है, जबकि ‘PARAM प्रज्ञा’ एआई आधारित आधुनिक शोध और तकनीक की नई माँगों को पूरा करने का काम करती है।

नेशनल सुपरकंप्यूटिंग मिशन ने भारत की पूरी तस्वीर कैसे बदली?

भारत की सुपरकंप्यूटिंग यात्रा में सबसे बड़ा बदलाव नेशनल सुपरकंप्यूटिंग मिशन यानी NSM के साथ आया। 25 मार्च 2015 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता वाली कैबिनेट कमेटी ऑन इकोनॉमिक अफेयर्स ने नेशनल सुपरकंप्यूटिंग मिशनको मंजूरी दी थी।

इसके लिए सात साल में 4500 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया था। मिशन का उद्देश्य देश के एकेडमिक और रिसर्च इन्स्टिच्यूशन को हाई-परफॉर्मेंस कंप्यूटिंग सुविधाओं से जोड़ना और भारत को वर्ल्ड क्लास कम्प्यूटिंग पावर वाले देशों की श्रेणी में ले जाना था।

इस मिशन को DST और तत्कालीन डिपार्ट्मन्ट ऑफ इलेक्ट्रानिक्स एण्ड इनफार्मेशन टेक्नॉलजी, यानी बाद में MeitY, ने मिलकर आगे बढ़ाया। इसका इम्प्लिमेंटेशन C-DAC, पुणे और IISc, बेंगलुरु के जरिए किया गया। शुरुआत में 70 से ज्यादा HPC  फैसिलिटीज का नेटवर्क बनाने की योजना थी, जिन्हें नेशनल नॉलेज नेटवर्क के जरिए जोड़ा जाना था।

मोदी सरकार के दौर में इसका एक महत्वपूर्ण बदलाव यह रहा कि लक्ष्य केवल विदेशी सिस्टम खरीदकर उन्हें देश में लगाने तक सीमित नहीं रहा। सरकार ने डिजाइन, असेंबली, मैन्युफैक्चरिंग, सॉफ्टवेयर स्टैक और महत्वपूर्ण घटक को देश में विकसित करने पर भी जोर दिया।

इसका उदाहरण 2019 में IIT-BHU में स्थापित PARAM शिवाय है। यह देश का पहला इंडिजिनस असेंबलड सुपर कंप्यूटर था और इसकी अधिकतम कंप्यूटिंग क्षमता 837 टेराफ्लॉप्स थी। बाद में PARAM शक्ति, PARAM ब्रह्म और अन्य सिस्टम भी अलग-अलग संस्थानों में लगाए गए।

अगले चरण में रुद्र  सर्वर, स्वदेशी सॉफ्टवेयर स्टैक और HPC इंटरकनेक्ट जैसे कॉम्पोनेंट्स पर काम आगे बढ़ा। DST के मुताबिक नवंबर 2025 तक NSM के तहत 37 सुपरकंप्यूटर और लगभग 39 पेटाफ्लॉप्स की क्यूम्यलेटिव क्षमता तैयार की जा चुकी थी। इनका इस्तेमाल 260 से ज्यादा संस्थानों के 14000 से ज्यादा  यूजर कर रहे थे और 27500 लोगों को HPC में ट्रैनिंग दी गई थी।

सरकार के अगस्त 2025 के आंकड़ों के अनुसार इन सिस्टमों ने 10000 से ज्यादा रिसर्चर्स को सपोर्ट  किया था, जिनमें 1700 से अधिक PhD स्टूडेंट्स शामिल थे। इनका इस्तेमाल दवा की खोज, आपदा प्रबंधन, जलवायु मॉडलिंग, खगोल विज्ञान, कम्प्यूटेशनल केमिस्ट्री, फ्लूइड डाइनैमिक्स और मटेरियल्स रिसर्च जैसे क्षेत्रों में किया गया।

इस तरह NSM का महत्व सिर्फ मशीनों की संख्या में नहीं है। इसका बड़ा उद्देश्य भारत में सुपरकंप्यूटिंग का पूरा इकोसिस्टमतैयार करना है मशीन, सॉफ्टवेयर, स्किल्ड मैनपावर, रिसर्च यूजर और स्वदेशी टेक्नोलॉजी सभी को साथ लेकर।

भारत के लिए PARAM प्रज्ञा और पूरी PARAM यात्रा का असली मतलब क्या है?

सुपरकंप्यूटर का फायदा केवल वैज्ञानिक प्रयोगशालाओं तक सीमित नहीं होता। मौसम की बेहतर भविष्यवाणी से लेकर चक्रवात और बाढ़ के मॉडल, नई दवाओं की खोज, एयरोस्पेस डिजाइन, क्लाइमेट रिसर्च, मैटेरियल साइंस, एग्रीकल्चर मॉडलिंग और AI तक, इनका इस्तेमाल कई क्षेत्रों में हो सकता है।

उदाहरण के लिए किसी नए मॉलिक्यूल को दवा के रूप में इस्तेमाल करने से पहले उसके व्यवहार को कम्प्यूटेशनल सिम्युलेशन के जरिए समझने में HPC मदद कर सकता है। इसी तरह मौसम मॉडल में बड़ी मात्रा में एटमॉस्फेरिक डेटा को प्रोसेस करके फोर्कैस्ट को बेहतर बनाने की कोशिश की जाती है।

AI के आने के बाद इसकी जरूरत और बढ़ गई है। बड़े AI मॉडल्स को ट्रेन करने के लिए हजारों GPU और बहुत ज्यादा कम्प्यूटिंग पावर की आवश्यकता हो सकती है। इसलिए जिस देश के पास मजबूत HPC इंफ्रास्ट्रक्चर होगा, उसके लिए AI रिसर्च,साइंस कम्प्यूटिंग और एडवांस्ड टेक्नॉलॉजी में अपनी क्षमता बढ़ाना आसान होगा।

भारत ने इस दिशा में केवल इन्फ्रास्ट्रक्चर खड़ा करने की कोशिश नहीं की है, बल्कि स्किल्ड मैनपावर तैयार करने पर भी जोर दिया है। NSM के तहत हजारों रिसर्चस्टूडेंट्स को HPC ट्रैनिंग दी गई है।

इससे यह इकोसिस्टम केवल कुछ सरकारी प्रयोगशालाओं  तक सीमित नहीं रहता, बल्कि विश्वविद्यालय, IIT, अनुसंधान संस्थान, स्टार्टअप और अन्य शोधकर्ता तक पहुँचता है।

अब अगर भारत की स्थिति को दुनिया के संदर्भ में देखें तो तस्वीर अभी भी चुनौतीपूर्ण है। नवंबर 2025 की TOP500 सूची में दुनिया के सबसे तेज सुपरकंप्यूटरों में अमेरिका, चीन, जापान और यूरोप की कई मशीनें शीर्ष स्थानों पर थीं। भारत का शक्ति क्लाउड सिस्टम उस सूची में 28वें स्थान पर था, जिसकी Rmax परफॉरमेंस 84.31 पेटाफ्लॉप्स दर्ज की गई थी।

इसका मतलब साफ है भारत ने लंबी दूरी तय की है, लेकिन सबसे शक्तिशाली वैश्विक सुपरकंप्यूटिंग प्रणालियों की दौड़ में अभी आगे जाना बाकी है। यही वजह है कि PARAM प्रज्ञा को केवल एक नए सुपरकंप्यूटर के उद्घाटन के तौर पर देखना अधूरा होगा। यह उस यात्रा का नया पड़ाव है जो PARAM 8000 से शुरू हुई थी।

शुरुआती दौर में भारत का लक्ष्य था कि उसे सुपरकंप्यूटिंग के लिए दूसरों पर निर्भर न रहना पड़े। इसके बाद लक्ष्य बनाया कि देश के वैज्ञानिकों और शैक्षणिक संस्थानों तक यह कंप्यूटिंग शक्ति पहुँचे। अब AI के दौर में चुनौती यह है कि भारत अपनी AI-रेडी HPC क्षमता, स्वदेशी हार्डवेयर, सॉफ्टवेयर, स्किल्ड मैनपावर और रिसर्च इकोसिस्टम को अगले स्तर तक ले जाए।

PARAM 8000 ने भारत को यह भरोसा दिया कि देश अपनी सुपरकंप्यूटिंग मशीन बना सकता है। PARAM युवा और उसके बाद के सिस्टम ने कंप्यूटिंग क्षमता बढ़ाई। नेशनल सुपरकंप्यूटिंग मिशन ने इस क्षमता को देश के अलग-अलग संस्थानों तक पहुँचाया।

PARAM रुद्र ने स्वदेशी हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर की दिशा में बड़ा कदम दिखाया। और PARAM प्रज्ञा जैसी AI-फोकस्ड फैसिलिटी यह संकेत देती है कि भारत अब अगली पीढ़ी की कम्प्यूटिंग जरूरतों के हिसाब से अपने इन्फ्रास्ट्रक्चर को ढाल रहा है।

इसलिए PARAM की कहानी सिर्फ सुपरकंप्यूटरों की कहानी नहीं है। यह भारत की वैज्ञानिक आत्मनिर्भरता के सफर की कहानी है। जहाँ एक समय देश को अत्याधुनिक कंप्यूटिंग शक्ति हासिल करने में मुश्किल आती थी, वहीं आज भारत अपने सुपरकंप्यूटर डिजाइन, असेंबल, मैन्युफैक्चर और डिप्लॉय करने की क्षमता को लगातार मजबूत कर रहा है।

UPI पेमेंट पर टैक्स लगने वाला है? नहीं, कॉन्ग्रेसी और लेफ्ट-लिबरल इकोसिस्टम ने नए कानून को लेकर आपको गुमराह किया

पिछले कुछ दिनों से विपक्षी नेता और लेफ्ट-लिबरल गैंग के लोग यह अफवाह फैला रहे हैं कि मोदी सरकार ने यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) से होने वाले लेन-देन पर शुल्क लगाने के लिए कानून बनाया है जबकि अब तक UPI लेन-देन मुफ्त रहे हैं। कानून को लेकर फैलाई जा रही इस अफवाह से बने माहौल का फायदा उठाने के लिए कई मुख्यधारा के मीडिया प्लेटफॉर्म भी भ्रामक और अटकलों पर आधारित हेडलाइन प्रकाशित कर रहे हैं।

संसद ने हाल ही में कराधान और अन्य कानून संशोधन विधेयक, 2026 को पारित किया। इसके बाद UPI लेन-देन पर कर लगाने को लेकर झूठे दावे फैलने लगे। विपक्ष के साथ-साथ लेफ्ट-लिबरल गैंग ने भी मोदी सरकार को निशाना बनाना शुरू कर दिया। उनका आरोप था कि मोदी सरकार अमेरिका के दबाव में काम कर रही है।

कॉन्ग्रेस सांसद जयराम रमेश ने X पर एक लंबा पोस्ट लिखा। इसमें उन्होंने दावा किया कि अब आम लोगों को UPI लेन-देन करने की कीमत चुकानी पड़ेगी। सांसद ने दावा किया कि मोदी सरकार ने अपने ‘अच्छे दोस्त डोनाल्ड ट्रंप’ के दबाव में UPI लेन-देन पर कर लगाने वाला कानून पारित किया है।

जयराम ने X पर लिखा, “दरअसल, इस संशोधन को लाने की असली वजह शायद और भी ज्यादा चिंताजनक है। यह अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि की 2026 की उस रिपोर्ट के बाद आया है, जिसमें UPI और RuPay के मुफ्त होने की आलोचना की गई है और आरोप लगाया गया है कि इनकी वजह से Visa और MasterCard जैसे अमेरिकी पेमेंट प्लेटफॉर्म बाजार से बाहर हो गए हैं। क्या प्रधानमंत्री अपने अच्छे दोस्त डोनाल्ड ट्रंप के दबाव में UPI को कमजोर करने और डिजिटल भुगतान क्षेत्र को अमेरिकी कंपनियों के लिए खोलने की कोशिश कर रहे हैं?”

कॉन्ग्रेस सांसद की पोस्ट पर कमेंट करते हुए वामपंथी प्रोपेगेंडा पोर्टल ‘द वायर’ के संस्थापक संपादक एमके वेणु ने भी इस झूठ को आगे बढ़ाया और सरकार को गरीब-विरोधी दिखाने की कोशिश की। वेणु ने दावा किया कि पीएम मोदी ने अपने ‘फ्रैंड के दबाव’ में ‘गरीब भारतीयों’ द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले UPI लेन-देन पर टैक्स लगाने का फैसला किया है। यहाँ ‘फ्रैंड’ से स्पष्ट रूप से उनका इशारा अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप की ओर था।

कई मुख्यधारा के मीडिया पोर्टल भी ऐसी भ्रामक हेडलाइन के साथ लेख प्रकाशित कर रहे हैं, जिनसे यह संकेत मिलता है कि सरकार वास्तव में UPI लेन-देन पर टैक्स लगाने जा रही है। विधेयक को लोकसभा में पेश किए जाने के बाद रॉयटर्स ने ‘डिजिटल पेमेंट पर मर्चेंट फीस की वापसी का रास्ता साफ कर रहा भारत’ हेडलाइन से एक लेख प्रकाशित किया। इस लेख की हेडलाइन से ऐसा लगता है कि UPI लेन-देन पर टैक्स जल्द ही हकीकत बनने वाला है।

रॉयटर्स की खबर का स्क्रीनशॉट

इसी तरह, लोकसभा में कानून पारित होने के बाद द टेलीग्राफ ने भी एक लेख प्रकाशित किया, जिसकी हेडलाइन थी, “लोकसभा ने बैंकों और सेवा प्रदाताओं को UPI लेन-देन पर शुल्क लगाने की अनुमति देने वाले विधेयक को मंजूरी दी।”

Screenshot via The Telegraph

कुछ मीडिया पोर्टलों ने दावा किया कि केवल ₹2,000 तक के UPI भुगतान ही मुफ्त होंगे और इससे अधिक की किसी भी रकम के लेन-देन पर टैक्स लगेगा।

सोशल मीडिया पोस्ट और मीडिया रिपोर्ट्स के कारण आम लोगों में डर और भ्रम की स्थिति पैदा हो गई। भ्रामक हेडलाइन और पोस्ट की वजह से लोग यह मानने लगे कि UPI भुगतान पर टैक्स लगाया जा रहा है। इन दावों ने न केवल डिजिटल भुगतान को लेकर गलत जानकारी फैलाई बल्कि यह भी कहा गया कि सरकार ने अमेरिका के दबाव में यह फैसला लिया है। हालाँकि, लेफ्ट-लिबरल प्रोपेगेंडा और मीडिया में किए जा रहे दावों से हकीकत काफी अलग है।

क्या नए कानून में UPI लेन-देन पर टैक्स लगाया गया है?

कराधान और अन्य कानून संशोधन विधेयक, 2026 को वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 4 अगस्त 2026 को लोकसभा में पेश किया था। विपक्ष के अलग-अलग मुद्दों को लेकर किए जा रहे हंगामे के बीच यह विधेयक 6 अगस्त 2026 को पारित हुआ। इस विधेयक के जरिए 2025 के आयकर अधिनियम, 2026 के वित्त अधिनियम और 2007 के पेमेंट एंड सेटलमेंट सिस्टम्स एक्ट समेत कुछ मौजूदा कानूनों में बदलाव किए गए हैं। इसी 2007 के कानून में किए गए बदलाव को लेकर सबसे ज्यादा विवाद हो रहा है।

विधेयक में पेमेंट एंड सेटलमेंट सिस्टम्स एक्ट की धारा 10A को हटा दिया गया है। यह धारा बैंकों और पेमेंट सर्विस प्रोवाइडर्स को सरकार की ओर से अधिसूचित डिजिटल भुगतान माध्यमों, जैसे UPI और RuPay डेबिट कार्ड से किए गए लेन-देन पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) लेने से कानूनी तौर पर रोकती थी। MDR वह शुल्क है, जो किसी डिजिटल भुगतान को प्रोसेस करने के बदले व्यापारी से लिया जाता है। अब तक इसी प्रावधान के कारण UPI भुगतान पर प्रोसेसिंग शुल्क नहीं लिया जा सकता था।

हालाँकि, इस प्रावधान को हटाने का मतलब यह नहीं है कि अब डिजिटल भुगतान पर अपने आप टैक्स लग जाएगा। इस बदलाव के बाद केंद्र सरकार के पास यह तय करने का अधिकार होगा कि किन डिजिटल भुगतान माध्यमों पर शुल्क लगाया जा सकता है और किन पर नहीं।

सीधे शब्दों में कहें तो विधेयक खुद UPI या किसी अन्य डिजिटल भुगतान पर कोई टैक्स नहीं लगाता। इसमें सिर्फ उस कानूनी रोक को हटा दिया गया है, जो डिजिटल भुगतान पर शुल्क लगाने से रोकती थी। यानी अगर भविष्य में सरकार कुछ डिजिटल लेन-देन पर शुल्क लगाने का फैसला करती है, तो वह इसके लिए अलग से अधिसूचना जारी कर सकती है।

संशोधन की जरूरत क्यों पड़ी?

देश में डिजिटल पेमेंट को बढ़ावा देने के लिए सरकार ने UPI और RuPay से होने वाले लेन-देन पर MDR (Merchant Discount Rate) हटा दिया था। यानी डिजिटल भुगतान करने पर व्यापारियों से प्रोसेसिंग फीस नहीं ली जाती थी। लेकिन इन डिजिटल लेन-देन को चलाने में खर्च होता है, जिसे सरकार बैंकों और पेमेंट कंपनियों को सब्सिडी या दूसरे प्रोत्साहनों के जरिए पूरा करती है।

इसका नतीजा यह हुआ कि पिछले कुछ वर्षों में UPI लेन-देन की संख्या में काफी बढ़ोतरी हुई। खास बात यह है कि सरकार की ओर से दी जाने वाली आर्थिक मदद सिर्फ छोटे व्यापारियों और ₹2,000 तक के छोटे लेन-देन के लिए उपलब्ध है। दूसरी ओर, बैंकों और पेमेंट कंपनियों का खर्च लगातार बढ़ रहा है। इसमें सर्वर को बनाए रखना, ऑनलाइन सुरक्षा यानी साइबर सिक्योरिटी सुनिश्चित करना और पूरे पेमेंट सिस्टम को सुचारू रूप से चलाना शामिल है।

एक संसदीय समिति ने भी कहा है कि MDR के बिना पूरे UPI सिस्टम को आर्थिक रूप से लंबे समय तक चलाना मुश्किल होता जा रहा है, क्योंकि सरकार की सब्सिडी इंडस्ट्री के वास्तविक खर्च का केवल एक छोटा हिस्सा ही पूरा करती है। RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा ने भी साफ कहा है कि इतने बड़े UPI सिस्टम को हमेशा पूरी तरह मुफ्त चलाना संभव नहीं है। सिस्टम की सुरक्षा बनाए रखने और इसके नेटवर्क को आगे बढ़ाने के लिए पैसे की जरूरत होती है। हालाँकि, उन्होंने यह भी कहा कि इस समय किसी तरह के शुल्क को लेकर अटकल लगाना जल्दबाजी होगी। सरकार की ओर से आधिकारिक अधिसूचना जारी होने के बाद ही स्थिति साफ होगी।

अगर भविष्य में सरकार MDR लागू करने का फैसला करती भी है, तो इसका असर आम लोगों या छोटे कारोबारियों पर पड़ने की संभावना कम है। डिजिटल पेमेंट में ₹2,000 से ज्यादा के लेन-देन पर टैक्स लगने की चर्चा पेमेंट्स काउंसिल ऑफ इंडिया (PCI) की ओर से दिए गए एक प्रस्ताव के बाद शुरू हुई। PCI गैर-बैंकिंग पेमेंट कंपनियों का प्रतिनिधित्व करने वाला एक उद्योग संगठन है। इस संगठन ने पिछले साल सरकार से UPI पर जीरो-MDR की नीति पर दोबारा विचार करने की अपील की थी।

PCI के मुताबिक, सरकार की ओर से हर साल दी जाने वाली करीब ₹1,500 करोड़ की सब्सिडी UPI सिस्टम को चलाने और उसका विस्तार करने के वास्तविक खर्च का केवल एक छोटा हिस्सा है। संगठन ने पूरे UPI इकोसिस्टम को चलाने और विस्तार देने का सालाना खर्च करीब ₹10,000 करोड़ बताया था।

PCI ने सरकार से सुझाव दिया था कि MDR सिर्फ बड़े कारोबारियों से लिया जाए, जिनका सालाना टर्नओवर ₹50 करोड़ से ज्यादा है। इसके अलावा ₹2,000 से ज्यादा के लेन-देन पर 0.3% से 0.5% तक MDR लगाने का प्रस्ताव दिया गया था।

इसका मतलब यह हुआ कि अगर किसी बड़े रिटेल स्टोर या ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म पर ₹2,000 से ज्यादा का भुगतान किया जाता है, तो उस बड़े कारोबारी से बैंक डिजिटल भुगतान को प्रोसेस करने के लिए मामूली MDR ले सकता है। लेकिन यह सिर्फ एक प्रस्ताव है और सरकार ने इसे अभी लागू नहीं किया है।

इसलिए फिलहाल जो डिजिटल लेन-देन अब तक बिना किसी शुल्क के हो रहे थे, वे बिना शुल्क के ही जारी रहेंगे, जब तक सरकार की ओर से कोई नया बदलाव अधिसूचित नहीं किया जाता।

साथ ही, ऊपर दी गई जानकारी से यह भी साफ है कि कानून में किया गया यह बदलाव अमेरिका या किसी दूसरे बाहरी दबाव की वजह से नहीं है। यह एक आर्थिक और राजकोषीय कदम है, न कि UPI की भुगतान नीति में अचानक किया गया कोई बड़ा बदलाव। UPI से जुड़ा यह प्रावधान सरकार की ओर से किए गए कई अन्य कानूनी और आर्थिक बदलावों वाले एक बड़े पैकेज का सिर्फ एक हिस्सा है।

‘F*cking Old Man तुम्हें थप्पड़ पड़ेगा’: कौन है PM मोदी को गाली देने और मारने की बात करने वाली CEO मुग्धा प्रधान, नेटिजन्स ने लताड़ा तो इंस्टा डिलीट कर भागी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लेकर iThrive की CEO और फाउंडर मुग्धा प्रधान का एक वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। वीडियो में यह महिला पीएम मोदी और केंद्र सरकार के कामकाज को लेकर काफी गुस्से में नजर आती दिखाई दे रही है। इसी दौरान मुग्धा प्रधान वीडियो में कहती हैं कि अगर वह पीएम मोदी से मिलेंगी तो उन्हें ‘एक थप्पड़’ देंगी। बता दें कि जंतर-मंतर पर हुई उग्र प्रदर्शन और हिंसा को मुग्धा प्रदान सपोर्ट करती नजर आती है और गालीबाजों पर कार्रवाई को लेकर ये भड़क जाती है, जिसके बाद इनकी भड़ास वीडियो में साफ दिखाई देती है।

वीडियो में मुग्धा प्रधान अन्य मुद्दों को भी कहती नजर आती है। इसके अलावा, वीडियो वायरल होने के बाद सोशल मीडिया पर मुग्धा प्रधान पर नेटीजन्स का गुस्सा फूट पड़ा है। लोग इस महिला की आलोचना कर रहे हैं। मुग्धा प्रधान कोई सामान्य सोशल मीडिया यूजर नहीं हैं। वह हेल्थ और वेलनेस कंपनी iThrive की फाउंडर और CEO हैं। वह फंक्शनल न्यूट्रिशन के क्षेत्र में काम करती हैं। उनके पास फूड साइंस और न्यूट्रिशन में मास्टर डिग्री है। इतनी पढ़ी-लिखी होने के बावजूद भी गाली देने वालों को ये सपोर्ट करती है और भारत के प्रधानमंत्री के खिलाफ बयानबाजी करती है। आईए जानते हैं, मुग्धा प्रधान ने क्या-क्या कहा है।

वीडियो में क्या भड़ास निकाल रही है मुग्धा प्रधान?

Viral Video में मुग्धा प्रधान काफी गुस्से में नजर आ रही है, ऐसा लग रहा है कि वीडियो से बाहर निकलते ही किसी ना किसी को लपेट ही देंगी। वीडियों में मुग्धा प्रधान कहती हैं, मैं उन सभी बूढ़े आदमियों को थप्पड़ मारना चाहती हूँ जो सोचते हैं कि उन्हें औरतों और बच्चों के गुस्से को दबाने का हक है। जरा देखिए लोग क्या-क्या कर जाते हैं। आपको गाली गंदी लगती है, पर इस देश की सड़कें देखिए, जिन्हें मिसाल बनना चाहिए। मैं प्रकृति के बीच टहलने गई थी और एक पेड़ के नीचे कचरे के ढेर लगे थे। आप उस गंदगी को साफ़ क्यों नहीं कर सकते? आपको वह गंदगी क्यों नहीं दिखती? बेवकूफ लोग।”

इससे आगे मुग्धा प्रधान कहती है, “आपके अंदर ही गंदगी है तो आपको बाहर की गंदगी कैसे दिखेगी? प्रकृति में जो कुछ भी दिख रहा है, उसे एक गंदा शब्द कहा जा रहा है और मुझे लगता है कि आख़िरकार कोई आपको वह सच कह रहा है जिसके आप हकदार हैं और इसीलिए आपको इतना बुरा लग रहा है कि देश के PM होकर आप बैठकर कह रहे हैं कि आप माफ कर रहे हैं। अगर मैं आपसे मिली तो मैं आपको एक ‘माफ करने वाला’ थप्पड़ जरूर मारूँगी। एक बूढ़ा आदमी जिसे वहाँ नहीं होना चाहिए, निकल जाओ, मेरे देश से निकल जाओ, अपनी सत्ता से हट जाओ, निकल जाओ, अब समय आ गया है कि युवा लोग जिम्मेदारी संभालें।”

मुग्धा प्रधान ने पहले भी पीएम मोदी को लेकर एक वीडियो जारी किया था। इसमें ये बार-बार गाली देने वालों को सपोर्ट करती नजर आ रही है और पीएम मोदी के खिलाफ अपनी भड़ास निकालती दिख रही है।

कौन हैं PM मोदी को ‘थप्पड़’ मारने की इच्छा रखने वाली मुग्धा प्रधान?

PM मोदी को ‘थप्पड़’ मारने की इच्छा रखने वाली मुग्धा प्रधान पुणे से जुड़ी फंक्शनल न्यूट्रिशनिस्ट हैं। वह हेल्थ और वेलनेस के क्षेत्र में काम करती हैं। मुग्धा प्रधान ने iThrive नाम की कंपनी शुरू की। आज वह इसी कंपनी की CEO भी हैं।

iThrive का काम हेल्थ, न्यूट्रिशन और वेलनेस से जुड़ा है। कंपनी लोगों की स्वास्थ्य समस्याओं को लेकर फंक्शनल न्यूट्रिशन का तरीका अपनाने की बात करती है। इसमें सिर्फ बीमारी के लक्षणों पर ध्यान देने के बजाय उसके पीछे के कारणों को समझने की कोशिश की जाती है। लेकिन मुग्धा की इस वीडियो को देखकर लगता है कि उन्हें खुद ट्रीटमेंट की जरूरत है।

iThrive की वेबसाइट के मुताबिक, मुग्धा प्रधान के पास MSc फ़ूड साइंस और न्यूट्रिशन की डिग्री है। उन्होंने 2001 में अपनी मास्टर डिग्री पूरी की थी। इसके बाद उन्होंने कॉरपोरेट सेक्टर में भी काम किया। वह Flipkart की शुरुआती HR टीम का हिस्सा रह चुकी हैं। बाद में उन्होंने हेल्थ और न्यूट्रिशन के क्षेत्र में काम शुरू किया।

मुग्धा प्रधान साल 2017 में तीन बड़ी स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ चुकी है। मुग्धा ने क्लिनिकल डिप्रेशन, मोटापे और Hashimoto’s thyroiditis यानी एक ऑटोइम्यून बीमारी का जिक्र भी किया है।

मुग्धा प्रधान की प्रोफाइल में उन्हें दो बार TEDx स्पीकर बताया गया है। वह ‘Health, Inc.’ नाम की किताब की लेखिका भी हैं। कंपनी की वेबसाइट के अनुसार, यह किताब ग्लोबल हेल्थकेयर सिस्टम और उसके काम करने के तरीके पर आधारित है।

PM मोदी पर टिप्पणी करने वाली मुग्धा प्रधान पर नेटीजन्स का फूटा गुस्सा

वीडियो वायरल होने के बाद सोशल मीडिया यूजर्स ने सिर्फ मुग्धा प्रधान के बयान पर ही सवाल नहीं उठाए। कुछ लोगों ने iThrive के कारोबार और उसकी छवि को भी चर्चा में ला दिया। कुछ यूजर्स का कहना है कि हेल्थ और वेलनेस कंपनी के प्रमुख व्यक्ति का सार्वजनिक व्यवहार कंपनी की छवि पर असर डाल सकता है। कुछ पोस्ट में लोगों से पूछा गया कि क्या वे ऐसी कंपनी के उत्पाद खरीदना चाहेंगे जिसकी CEO इस तरह की भाषा का इस्तेमाल करती हैं।

एक यूजर लिखते हैं, iThrive कंपनी की सीईओ PM मोदी को बुरा-भला कहने में लगी हुई हैं। ऐसा लगता है कि उन्हें खुद ही बेहतर सप्लीमेंट्स की ज़रूरत है। सोचने वाली बात यह है कि जब कंपनी की सबसे बड़ी अधिकारी सबके सामने इतनी ज़्यादा नफ़रत और संयम की कमी दिखाती हैं, तो इससे उस ब्रांड की समझदारी और विश्वसनीयता के बारे में क्या पता चलता है?”

अभिजीत मजूमदार लिखते हैं, ” पीएम मोदी के लिए अपशब्दों का इस्तेमाल करने वाली मुग्धा प्रदान को देखकर ऐसा लगता है कि उन्हें मानसिक स्वास्थ्य संबंधी मदद की बहुत जरूरत है। वह बहुत परेशान और अस्थिर लग रही हैं। क्या कोई उनके ब्रांड और उसके प्रोडक्ट्स पर भरोसा कर सकता है?”

राकेश कृष्णन सिंहा लिखते हैं, “एक और पाखंडी से मिलिए। हेल्थ और वेलनेस कंपनी ‘iThrive’ की CEO और फाउंडर मुग्धा प्रधान, जंतर-मंतर पर हो रहे विरोध प्रदर्शनों को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपशब्द कह रही हैं। इस गंदी ज़बान वाली महिला को देखकर ऐसा लगता है जैसे वह किसी गटर में ही पैदा हुई हो। ये सभी नकली लोग FCRA की वजह से बहुत हताश हैं। FCRA जैसे जवाबदेही कानूनों के कारण, बकवास करने और भोले-भाले लोगों को ठगने के उनके सपने पूरे करना मुश्किल होता जा रहा है। उनकी स्पीच, उनकी बेकाबू हताशा भरी बकवास और उनकी साइट पर लिखी बातों को देखिए – सब कुछ एक-दूसरे के बिल्कुल उलट है। ‘सत्-चित्-आनंद’ तो कुछ ही सेकंड में फुस्स हो गया।”

एक यूजर ने फंडिंग को लेकर भी आरोप लगाया है, जिसमें दावा किया है, “iThrive की इस महिला को हांगकांग स्थित ‘फंग स्ट्रैटेजिक इन्वेस्टमेंट्स’ से निवेश मिला है। यही वजह है कि वह हमारे माननीय प्रधानमंत्री के लिए अपशब्दों का इस्तेमाल कर रही हैं। ऐसा लगता है कि वह चीन की एक ‘एसेट’ (मोहरा) हैं। कृपया उचित कानूनी कार्रवाई करें।”

‘iThrive’ की सीईओ मुग्धा प्रधान की कंपनी को हांगकांग की एक फर्म ‘फंग स्ट्रेटेजिक इन्वेस्टमेंट्स’ से पैसा मिलता है। जाँच करने पर पता चलता है कि ‘फंग स्ट्रेटेजिक इन्वेस्टमेंट्स’ (जिसे फंग इन्वेस्टमेंट्स भी कहते हैं) कोई आम कंपनी नहीं है। यह हांगकांग के बहुत अमीर फंग परिवार का निजी पारिवारिक निवेश दफ्तर है, जो उनके विशाल ‘फंग ग्रुप’ के लिए काम करता है। इस पूरी संस्था के मुख्य मालिक और फैसले लेने वाले डॉक्टर विक्टर के फंग (चेयरमैन) और डॉक्टर विलियम फंग (डिप्टी चेयरमैन) हैं, जो दोनों आपस में भाई हैं। यह फंग ग्रुप मुख्य रूप से सामान सप्लाई करने के व्यापार से जुड़ा हुआ है।

वित्तीय (Financial) दस्तावेजों के मुताबिक, पुणे की इस हेल्थ स्टार्टअप ‘iThrive’ में कुछ व्यक्तिगत लोगों ने पैसे लगाए हैं। इनमें फंग स्ट्रेटेजिक इन्वेस्टमेंट्स के कार्यकारी निदेशक राजेश रनावत और एनबी वेंचर्स के प्रबंध निदेशक नीलेश भटनागर के नाम शामिल हैं। राजेश रनावत ने इसमें एक निजी निवेशक के तौर पर पैसा लगाया था।

CJP के प्रदर्शन में PM मोदी को दी गई गालियाँ, उन्होंने किया था माफ

हाल ही में दिल्ली के जंतर-मंतर पर नीट (NEET) पेपर लीक और अन्य मुद्दों को लेकर ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) के नेतृत्व में विरोध प्रदर्शन किया गया था। इस प्रदर्शन के दौरान कुछ नाबालिग बच्चों और युवाओं द्वारा PM मोदी और उनकी दिवंगत माता को गालियाँ तक दी गई थीं।

गाली गलौज का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद काफी विवाद हुआ और एक नाबालिग लड़की के खिलाफ शिकायत भी दर्ज कराई गई थी। विवाद बढ़ने और बच्ची द्वारा अपनी गलती पर रोते हुए देश से माफी माँगने के बाद, PM मोदी ने इंस्टाग्राम पर एक वीडियो संदेश जारी किया। इस वीडियो में उन्होंने इन युवाओं को माफ करने का ऐलान किया था।

उन्होंने कहा था, “एक कल्चरल शौक है कि हमारी बेटियाँ इस प्रकार की भाषा कैसे बोल सकती है? लेकिन समय है इन बच्चों को गले लगा के राह दिखाने का। एक गुमराह बच्चे हैं। उनको राह दिखाना हमारा काम है। मेरे मन में एक ही भाव है। कभी-कभी दाँतों तले हमारी जीभ आ जाती है। खून निकल आता है। लेकिन हम दाँत तोड़ते नहीं है। क्योंकि दाँत भी हमारे हैं। जीभ भी हमारी है। बच्चे भी हमारे हैं। उन्हें राह दिखाना हमारा काम है।”

अरुणाचल की 27 रणनीतिक जगहें आधिकारिक नक्शे में शामिल, चीन की ‘नाम बदलो और दावा करो’ नीति को भारत का करारा जवाब: जानें क्या है इतिहास

सीमा सुरक्षा, प्रशासनिक पहचान और देश की संप्रभुता के मामले में भारत सरकार ने बड़ा और ऐतिहासिक कदम उठाया है। केंद्रीय गृह मंत्रालय की देखरेख में और अरुणाचल प्रदेश सरकार के साथ लंबे विचार-विमर्श के बाद भारत की आधिकारिक मानचित्र संस्था ‘सर्वे ऑफ इंडिया’ ने राज्य की 27 बेहद महत्वपूर्ण और रणनीतिक जगहों को देश के आधिकारिक राष्ट्रीय नक्शे में शामिल कर लिया है।

इन सभी जगहों को उनके असली, स्थानीय और प्रामाणिक नामों के साथ दर्ज किया गया है। यह फैसला ऐसे समय में आया है जब पड़ोसी देश चीन काफी समय से अरुणाचल प्रदेश की अलग-अलग जगहों के मनगढ़ंत और फर्जी चीनी नाम रखकर उन पर अपना झूठा दावा ठोकने की कोशिश कर रहा था।

भारत का यह कदम केवल कागजों पर नाम दर्ज करने का मामूली काम नहीं है बल्कि यह चीन की ‘कार्टोग्राफिक आक्रामकता’ यानी नक्शा-बाजी का एक बेहद करारा, संस्थागत और स्थायी जवाब है। इस कदम से न केवल हमारे दूर-दराज के सीमावर्ती इलाकों की वास्तविक पहचान को कानूनी और संवैधानिक मजबूती मिली है, बल्कि आम नागरिकों, सेना और स्थानीय प्रशासन के बीच इन क्षेत्रों को लेकर सटीक और सही जानकारी हमेशा के लिए स्थापित हो गई है।

अब इस पूरे मामले को विस्तार से समझते हैं कि भारत के इस कदम के पीछे क्या वजहें हैं, इन 27 जगहों का इतिहास क्या है और इसका अंतरराष्ट्रीय स्तर पर क्या असर पड़ेगा।

सर्वे ऑफ इंडिया द्वारा जारी अरुणाचल प्रदेश का नया अपडेटेड आधिकारिक मानचित्र (साभार: surveyofindia)

चीन का ‘नाम बदलो और दावा करो’ एजेंडा और भारत का करारा पलटवार

चीन पिछले कई सालों से एक सोची-समझी रणनीति के तहत अरुणाचल प्रदेश को ‘जंगनान’ या ‘दक्षिणी तिब्बत’ बताकर उसके अलग-अलग इलाकों के नाम बदलने का नाटक करता आ रहा था। चीन के नागरिक मामलों के मंत्रालय ने सबसे पहले साल 2017 में अरुणाचल की 6 जगहों के तथाकथित चीनी नामों की पहली सूची जारी की थी।

इसके बाद अपनी इस नापाक चाल को आगे बढ़ाते हुए उसने 2021 में 15 जगहों, 2023 में 11 जगहों और मार्च 2024 में 30 जगहों के फर्जी नाम घोषित किए थे। चीन की इस हरकत को अंतरराष्ट्रीय मामलों में ‘सलामी स्लाइसिंग’ और ‘मानचित्र आक्रामकता’ कहा जाता है।

इसके तहत चीन दुनिया के सामने कागजी भ्रम फैलाकर यह साबित करने की कोशिश करता है कि ये इलाके ऐतिहासिक रूप से उसके नियंत्रण में रहे हैं। भारत सरकार ने हर बार चीन की इन हरकतों को सिरे से खारिज किया और साफ कहा कि किसी दूसरे देश द्वारा कागजों पर फर्जी नाम लिख देने से अरुणाचल की जमीनी हकीकत नहीं बदल जाएगी।

इतिहास के पन्नों से: 1959 की पहली मुठभेड़ और 1962 की जंग के मुख्य केंद्र

सर्वे ऑफ इंडिया के नए नक्शे में जिन 27 जगहों को शामिल किया गया है, उनमें से कई ऐसी हैं जिनका भारत और चीन के सीमा विवाद के इतिहास से बहुत गहरा संबंध रहा है। इनमें सबसे प्रमुख और ऐतिहासिक नाम ‘लॉन्गजू’ (Longju) का है, जो वास्तविक नियंत्रण रेखा यानी एलएसी के बिल्कुल पास स्थित है।

लॉन्गजू वही ऐतिहासिक स्थान है जो 1962 की भारत-चीन जंग से भी तीन साल पहले, यानी 1959 में दोनों देशों के बीच पहला बड़ा सैन्य संघर्ष बिंदु बना था, जब चीनी सेना ने भारतीय सीमा में घुसपैठ की कोशिश की थी। इसी लॉन्गजू के पास ऊपरी सुबनसिरी जिले में स्थित ‘माजा’ (Maja) गाँव को भी आधिकारिक नक्शे पर प्रमुखता से दर्शाया गया है।

इसके अलावा पश्चिमी क्षेत्र में स्थित ‘थाग ला’ (Thag La) दर्रा इस पूरी सूची का एक और सबसे संवेदनशील हिस्सा है। थाग ला दर्रा और उसके पास की नमका चू घाटी वही इलाका है, जहाँ से 20 अक्टूबर 1962 को चीन ने भारत पर बड़े पैमाने पर हमला शुरू किया था।

इन दो ऐतिहासिक स्थानों के साथ-साथ बेहद दुर्गम और ऊँचाई पर स्थित दर्रों जैसे ‘डजो ला’ (Dzo La), ‘रिजा ला’ (Riza La) और ‘पुकुर ला’ (Pukur La) को भी नक्शे में जगह दी गई है। ये दर्रे भारतीय सुरक्षा बलों की आवाजाही, निगरानी और गश्त के लिहाज से बेहद अहम माने जाते हैं।

हालाँकि अब भारत ने केवल बयानों और कूटनीतिक विरोध तक सीमित रहने के बजाय आगे बढ़कर काम किया है। सर्वे ऑफ इंडिया के नक्शे में इन 27 जगहों को उनके वास्तविक भारतीय नामों के साथ दर्ज करके भारत ने चीन के मनगढ़ंत दावों की पूरी तरह हवा निकाल दी है।

वीरता के प्रतीक: जसवंत सिंह और त्रिलोक सिंह थापा की शौर्य गाथा

भारत सरकार द्वारा जारी सूची में केवल पहाड़, नदियाँ और दर्रे ही शामिल नहीं हैं, बल्कि इसमें भारत माता के उन वीर सपूतों के स्मारक भी शामिल किए गए हैं जिन्होंने देश की सीमाओं की रक्षा करते हुए अपना सब कुछ न्योछावर कर दिया था। इस सूची में तावांग के रास्ते में स्थित ‘जसवंत गढ़’ (Jaswant Garh) को आधिकारिक रूप से दर्ज किया गया है।

जसवंत गढ़ 1962 के युद्ध के अमर नायक राइफलमैन जसवंत सिंह रावत (महावीर चक्र) की बेमिसाल बहादुरी की याद दिलाता है। उन्होंने अकेले ही 72 घंटे तक चीनी सेना की पूरी टुकड़ी को रोके रखा था और दर्जनों दुश्मनों को ढेर करने के बाद वीरगति प्राप्त की थी।

आज भी भारतीय सेना और स्थानीय लोग जसवंत गढ़ को एक पवित्र मंदिर की तरह पूजते हैं। इसी तरह ऊपरी क्षेत्र में बने ‘शेर-ए-थापा स्मारक’ (Sher-e-Thapa Memorial) को भी सर्वे ऑफ इंडिया के नक्शे पर औपचारिक जगह दी गई है।

यह स्मारक 1962 की जंग में सुबनसिरी सेक्टर के पास चीनी सेना के दाँत खट्टे करने वाले सूबेदार त्रिलोक सिंह थापा और उनकी बहादुर टुकड़ी के अप्रतिम शौर्य का प्रतीक है। इन युद्ध स्मारकों को देश के नक्शे में शामिल करने का सीधा संदेश यह है कि भारत अपने बलिदानियों की पावन भूमि और अपनी सीमा के एक-एक इंच हिस्से का सम्मान करता है।

जमीन से जुड़ाव: सेना के आपूर्ति रास्ते और स्थानीय बस्तियों की सुरक्षा

नक्शे में जोड़ी गई कई जगहें ऐसी हैं जो अरुणाचल प्रदेश के प्रशासनिक कामकाज, वहाँ रहने वाली स्थानीय जनजातियों के जीवन और हमारी सेना के लॉजिस्टिक्स यानी रसद प्रबंधन के लिए रीढ़ की हड्डी की तरह काम करती हैं। उदाहरण के तौर पर चांगलांग जिले में मौजूद ‘जयरामपुर’ का नाम इस सूची में विशेष रूप से शामिल है।

जयरामपुर पूर्वी अरुणाचल प्रदेश और म्यांमार सीमा की ओर जाने वाले सुरक्षा बलों की आवाजाही, राशन और सैन्य हथियारों की आपूर्ति के लिए एक बहुत बड़ा रणनीतिक सेंटर है।

इसी तरह लोहित जिले में स्थित ‘कमलांग नगर’, जो प्रसिद्ध कमलांग वाइल्डलाइफ सेंचुरी के करीब है, और ‘सनपुरा’ जैसे प्रशासनिक इलाकों को भी आधिकारिक नक्शे पर पक्की पहचान दी गई है। इसके अलावा इस सूची में ‘सांम्भो सरोवर’ नामक एक बेहद खूबसूरत और ऊँचाई पर स्थित प्राकृतिक झील को शामिल किया गया है।

साथ ही बीसा, बड़ा कुंदन, छोटा कुंदन, धन बारी, प्रीतनगर, बौद्धमंदिर, टेरितनगर, रामनगर, सागर, पद्मा, ज्योतिनगर, बैसाखी, छोटा रोपुक, बड़ा रोपुक और शिवाजी नगर जैसे बसे हुए गाँवों को उनके असली नामों के साथ चिन्हित किया गया है।

इन सभी गाँवों को नक्शे में जोड़ने से वहाँ के स्थानीय जनजातीय समुदायों और उनकी पारंपरिक पहचान को सुरक्षा और सम्मान दोनों मिलता है।

कानूनी ताकत: कागजी दावों के खिलाफ भारत की सबसे बड़ी ढाल

किसी भी आजाद और संप्रभु देश के लिए उसका आधिकारिक नक्शा सिर्फ भूगोल की रेखाएँ नहीं होता, बल्कि वह उसकी संवैधानिक संप्रभुता, प्रशासनिक नियंत्रण और कानूनी अधिकारों का सबसे मजबूत प्रमाण होता है।

जब भारत का आधिकारिक नक्शा बनाने वाला संस्थान यानी सर्वे ऑफ इंडिया किसी जगह को अपने नक्शे में प्रामाणिक नाम के साथ दर्ज करता है, तो उसे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कानूनी मान्यता मिल जाती है।

इसका पहला बड़ा फायदा यह होगा कि भारत के सभी सरकारी दस्तावेजों, जमीन के रिकॉर्ड, विकास योजनाओं, राजस्व खातों और सेना के ऑपरेशन्स में अब केवल और केवल इन्हीं असली नामों का इस्तेमाल किया जाएगा, जिससे भविष्य में किसी भी तरह के भ्रम की कोई गुंजाइश नहीं रहेगी।

दूसरा बड़ा फायदा यह होगा कि जब भी चीन किसी अंतरराष्ट्रीय मंच या बहुपक्षीय बैठक में अपने मनगढ़ंत नक्शों के आधार पर झूठे दावे करने की कोशिश करेगा, तब भारत के पास अपने सरकारी, राजपत्रित और वैज्ञानिक रूप से सर्वे किए गए आधिकारिक नक्शों का ठोस सबूत मौजूद होगा।

जानकारों का कहना है कि भारत का यह कदम यह दिखाता है कि देश अब केवल रक्षात्मक रहने के बजाय अपनी सीमाओं और अधिकारों को बहुत मजबूती से सामने रख रहा है।

27 जगहों का पूरा लेखा-जोखा: दर्रे, झील, स्मारक और 21 गाँव

सर्वे ऑफ इंडिया द्वारा जारी इस नए और अपडेटेड मानचित्र में कुल मिलाकर 27 महत्वपूर्ण भौगोलिक स्थलों को जगह दी गई है, जिन्हें चार मुख्य श्रेणियों में बाँटकर समझा जा सकता है।

पहली श्रेणी में चार प्रमुख पर्वतीय दर्रे यानी पास शामिल हैं, जिनके नाम डजो ला, रिजा ला, पुकुर ला और थाग ला हैं। दूसरी श्रेणी में एक प्राकृतिक जल निकाय यानी बेहद ऊँचाई पर स्थित पवित्र झील सांम्भो सरोवर है। तीसरी श्रेणी में हमारे वीर जवानों के शौर्य की याद दिलाने वाला ऐतिहासिक शेर-ए-थापा मेमोरियल शामिल है।

चौथी और सबसे बड़ी श्रेणी में 21 अलग-अलग आबाद गाँव, प्रशासनिक इलाके और बस्तियाँ हैं, जिनमें लॉन्गजू, माजा, बीसा, बड़ा कुंदन, छोटा कुंदन, धन बारी, प्रीतनगर, बौद्धमंदिर, जयरामपुर, टेरितनगर, रामनगर, जसवंत गढ़, सागर, पद्मा, ज्योतिनगर, बैसाखी, छोटा रोपुक, बड़ा रोपुक, शिवाजी नगर, सनपुरा और कमलांग नगर शामिल हैं।

इन सभी 27 स्थानों को उनके सटीक अक्षांश-देशांतर (Latitude-Longitude) और प्रामाणिक भारतीय नामों के साथ राष्ट्रीय सर्वे नेटवर्क में दर्ज कर लिया गया है, जिससे भविष्य में कोई भी विदेशी ताकत इनकी पहचान को बदल नहीं सकेगी।

अरुणाचल प्रदेश की इन 27 जगहों को देश के आधिकारिक राष्ट्रीय नक्शे में जोड़कर भारत ने चीन समेत पूरे विश्व को एक बहुत ही स्पष्ट और सख्त संदेश दे दिया है। भारत ने फिर से यह साफ दिया है कि अरुणाचल प्रदेश भारत का अभिन्न, अविभाज्य और अटूट हिस्सा था, है और हमेशा रहेगा।

सीमावर्ती इलाकों में नई ऑल-वेदर सड़कों, सुरंगों, पुलों और एडवांस लैंडिंग ग्राउंड्स के निर्माण के साथ-साथ ‘वाइब्रेंट विलेज प्रोग्राम’ और अब नक्शों के इस सुदृढ़ीकरण से भारत की मजबूत और स्पष्ट विदेश नीति साफ नजर आती है।

योगी सरकार ने शुरू किया ‘नशा विरोधी अभियान’, UP के सभी कॉलेज-यूनिवर्सिटी में रोज होगी नशे के खिलाफ शपथ: 500 मीटर दायरे में नशीले पदार्थों की बिक्री पर रोक

उत्तर प्रदेश की योगी सरकार जल्द ही सभी यूनिवर्सिटी और कॉलेजों में नशे के खिलाफ बड़ा अभियान शुरू करने जा रही है। यह अभियान सरकारी और निजी दोनों संस्थानों में चलेगा। हर कार्यदिवस की शुरुआत दो मिनट की नशा विरोधी शपथ से होगी। कैंपस में नियमित जाँच भी की जाएगी।

यूनिवर्सिटी और कॉलेज के 500 मीटर के दायरे में नशीले पदार्थों की बिक्री पर रोक रहेगी। छात्रों को जागरूक करने के लिए कई कार्यक्रम होंगे। इनमें मैराथन, मार्च, भाषण, निबंध और पेंटिंग प्रतियोगिताएँ शामिल हैं। नुक्कड़ नाटक भी होंगे। अगर किसी छात्र में नशे की आदत के संकेत मिलते हैं तो उसकी पहचान की जाएगी। उसे काउंसलिंग दी जाएगी।

यह अभियान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नशा मुक्त भारत के आह्वान को आगे बढ़ाने के लिए शुरू किया जा रहा है। सरकार का लक्ष्य इसे जन आंदोलन बनाना है। इसके साथ ही ‘विकसित भारत-विकसित उत्तर प्रदेश’ के संकल्प को भी आगे बढ़ाया जाएगा। अभियान की निगरानी के लिए पूरे प्रदेश को 5 जोन में बांटा गया है। हर जोन में एक वरिष्ठ विभागीय अधिकारी को नोडल अधिकारी बनाया जाएगा।

विधानसभा में हुई बैठक, तैयार हुआ पूरा प्लान

अभियान को लेकर विधानसभा परिसर में अहम बैठक हुई। इसमें प्रदेश के सभी राज्य विश्वविद्यालयों के कुलसचिव और परीक्षा नियंत्रक शामिल हुए। बैठक की अध्यक्षता उच्च शिक्षा मंत्री योगेंद्र उपाध्याय ने की। बैठक में अभियान को प्रभावी बनाने पर चर्चा हुई। इसे लगातार चलाने की योजना बनाई गई। साथ ही यह तय किया गया कि अभियान का असर जमीन पर भी दिखना चाहिए।

इसके लिए पूरा एक्शन प्लान तैयार किया गया। उच्च शिक्षा मंत्री योगेंद्र उपाध्याय ने कहा कि युवा विकसित भारत की सबसे बड़ी ताकत हैं। युवाओं को नशे से दूर रखना बहुत जरूरी है। इससे प्रदेश और देश का भविष्य मजबूत होगा। उन्होंने कहा कि यूनिवर्सिटी और कॉलेज केवल पढ़ाई की जगह नहीं हैं। यहाँ छात्रों को अच्छे संस्कार और अनुशासन भी मिलना चाहिए। इन संस्थानों को राष्ट्र निर्माण की नींव बनाया जाएगा। नशा विरोधी अभियान भी इसी सोच का हिस्सा है।

बैठक में कई विधायक और अधिकारी मौजूद रहे

बैठक में उच्च शिक्षा के प्रमुख सचिव एमपी अग्रवाल मौजूद रहे। विधायक उमेश द्विवेदी भी बैठक में शामिल हुए। बाबूलाल तिवारी, मानवेंद्र सिंह और चंद्र शर्मा भी मौजूद रहे। धर्मेंद्र भारद्वाज, अरुण पाठक और हरि सिंह ढिल्लों ने भी बैठक में हिस्सा लिया। बैठक में अवनीश कुमार और प्रदेश महामंत्री संजय राय भी मौजूद रहे।

इसके अलावा उच्च शिक्षा विभाग के वरिष्ठ अधिकारी भी बैठक में शामिल हुए। सभी ने अभियान को सही तरीके से लागू करने पर जोर दिया। अभियान की लगातार निगरानी की बात भी कही गई।

हर दिन दो मिनट की शपथ, हर हफ्ते 10 मिनट की बात

सभी सरकारी और निजी यूनिवर्सिटी और कॉलेजों में हर कार्यदिवस की शुरुआत से पहले छात्रों को दो मिनट की नशा विरोधी शपथ दिलाई जाएगी। इसका मकसद छात्रों को नशे के नुकसान के बारे में बताना है। साथ ही उन्हें नशे से दूर रहने का संकल्प दिलाना है। हर शिक्षक सप्ताह में एक कक्षा के आखिरी 10 मिनट नशामुक्त जीवन पर चर्चा के लिए देंगे।

इस दौरान छात्रों से बातचीत की जाएगी। उन्हें नशे से होने वाले नुकसान बताए जाएँगे। उन्हें मोटिवेट भी किया जाएगा। सरकार चाहती है कि नशे के खिलाफ जागरूकता सिर्फ किसी एक दिन के कार्यक्रम तक सीमित न रहे। यह छात्रों की रोज की पढ़ाई और बातचीत का हिस्सा बने।

मैराथन और नुक्कड़ नाटक से होगा जागरूकता अभियान

नशे के खिलाफ ‘रन फॉर नशा मुक्ति’ कार्यक्रम कराया जाएगा। इसके साथ मैराथन और जागरूकता मार्च भी होंगे। छात्रों के लिए भाषण प्रतियोगिताएँ कराई जाएँगी। निबंध और पेंटिंग प्रतियोगिताएँ भी होंगी। नाटक और नुक्कड़ नाटक के जरिए नशे के नुकसान समझाए जाएँगे। इन कार्यक्रमों में ज्यादा से ज्यादा छात्रों को जोड़ने की कोशिश होगी। छात्रों में अच्छी सोच और जीवन के अच्छे मूल्यों को बढ़ाने के लिए शैक्षिक भ्रमण भी कराए जाएँगे।

छात्रों को सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और प्रेरणादायक जगहों पर ले जाया जाएगा। कैंपस और सार्वजनिक जगहों पर होर्डिंग लगाए जाएँगे। दीवारों पर पेंटिंग बनाई जाएगी। सोशल मीडिया पर भी अभियान चलाया जाएगा। ज्यादा से ज्यादा छात्रों को ‘माई भारत’ पोर्टल से जोड़ने की कोशिश होगी।

5 जोन में होगी निगरानी, प्रिंसिपल की भी जिम्मेदारी

नशा विरोधी अभियान की निगरानी के लिए पूरे उत्तर प्रदेश को 5 जोन में बांटा गया है। हर जोन में एक वरिष्ठ विभागीय अधिकारी नोडल अधिकारी होगा। वह अपने जोन में अभियान की निगरानी करेगा। यूनिवर्सिटी स्तर पर भी वरिष्ठ नोडल अधिकारी होगा। कॉलेज स्तर पर प्रिंसिपल को जिम्मेदारी दी जाएगी।

हर फैकल्टी में भी एक अलग नोडल अधिकारी बनाया जाएगा। ये अधिकारी अभियान के काम की नियमित जाँच करेंगे। इसका मकसद यह है कि अभियान सिर्फ कागजों पर न चले। कॉलेज और यूनिवर्सिटी में इसका सही तरीके से पालन हो।

कॉलेजों के 500 मीटर तक नशे की बिक्री पर रोक

सरकार ने नशीले पदार्थों की उपलब्धता रोकने के लिए सख्त कदम उठाए हैं। सभी यूनिवर्सिटी और कॉलेजों के 500 मीटर के दायरे में नशीले पदार्थों की बिक्री पर रोक रहेगी। इसके लिए नियमित जाँच की जाएगी। हॉस्टल की भी जाँच होगी। कैंटीन और पूरे कैंपस की जाँच की जाएगी।

नशीले पदार्थों को कैंपस तक पहुँचने से रोकने पर खास ध्यान दिया जाएगा। ऑनलाइन डिलीवरी और कूरियर के जरिए आने वाले सामान की भी एंट्री गेट पर जाँच होगी। इसका मकसद कैंपस के अंदर नशीली चीजों की पहुँच को रोकना है।

नशे के संकेत मिलने पर छात्र की होगी काउंसलिंग

अगर किसी छात्र में नशे की आदत के संकेत मिलते हैं तो उसकी पहचान की जाएगी। ऐसे छात्र को काउंसलिंग दी जाएगी। जरूरत पड़ने पर उसके माता-पिता को भी बुलाया जाएगा। माता-पिता के साथ बातचीत की जाएगी। छात्र को नशे की आदत से बाहर निकालने की कोशिश होगी।

सरकार का जोर सिर्फ कार्रवाई करने पर नहीं है। छात्रों को सही रास्ते पर लाना भी इस अभियान का बड़ा हिस्सा है। इस पहल का मकसद छात्रों को स्वस्थ और अच्छा माहौल देना है। युवाओं को पढ़ाई के साथ स्वास्थ्य, अनुशासन और जिम्मेदारी से जोड़ने की कोशिश होगी।

जल्द आएगी एकीकृत युवा नीति

उत्तर प्रदेश सरकार जल्द ही एक एकीकृत युवा नीति भी लाने जा रही है। इस नीति में युवाओं को सबसे ज्यादा महत्व दिया जाएगा। सरकार का कहना है कि युवा ही आगे नेतृत्व करेगा। युवा ही नई संभावनाएँ पैदा करेगा। शिक्षा, स्वास्थ्य, स्किलिंग और रोजगार पर खास ध्यान दिया जाएगा। इन क्षेत्रों में युवाओं के लिए नए अवसर बनाने की कोशिश होगी।

नशा विरोधी अभियान को भी युवा सशक्तीकरण की इसी सोच से जोड़कर देखा जा रहा है। सरकार चाहती है कि युवा नशे से दूर रहें। वे अपनी ऊर्जा सही दिशा में लगाएँ। देश में भी नशे के खिलाफ अभियान का दायरा बढ़ रहा है। केंद्र सरकार के आँकड़ों के अनुसार ‘नशा मुक्त भारत अभियान’ लगातार आगे बढ़ रहा है।

जुलाई 2026 में सरकार ने बताया था कि सामुदायिक भागीदारी और देशभर में चलाए गए जागरूकता कार्यक्रमों के जरिए यह अभियान 29.32 करोड़ से ज्यादा लोगों तक पहुँच चुका है। सरकार के अनुसार अभियान 7.81 करोड़ से ज्यादा युवाओं और 5.24 करोड़ महिलाओं तक भी पहुँचा है। इसके अलावा 17 लाख शैक्षणिक संस्थानों सहित 23 करोड़ से ज्यादा लोगों तक अभियान की पहुँच बताई गई है।

इसका मकसद ज्यादा से ज्यादा लोगों को नशे के खिलाफ जागरूक करना है। 18 अगस्त 2026 को ‘नशा मुक्त भारत अभियान’ की छठी वर्षगाँठ है। इस मौके पर देशभर में मादक पदार्थों के दुरुपयोग के खिलाफ राष्ट्रीय संकल्प कार्यक्रम प्रस्तावित है। सरकार ने इस कार्यक्रम में 12 करोड़ से ज्यादा लोगों के संकल्प लेने की संभावना जताई है।

पीएम मोदी ने शुरू किया ‘नशा मुक्त युवा फॉर विकसित भारत’ अभियान

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘नशा मुक्त युवा फॉर विकसित भारत संकल्प अभियान’ की शुरुआत की। उन्होंने देशभर में हुई एक बड़ी वीडियो कॉन्फ्रेंस को संबोधित किया। इस कार्यक्रम से 28 हजार से ज्यादा स्थान जुड़े थे। कार्यक्रम में एक करोड़ से ज्यादा युवा भी जुड़े। पीएम मोदी ने कहा कि आज पूरा देश एक बड़े संकल्प के लिए एक साथ आया है।

पीएम मोदी ने कहा कि नशामुक्ति सिर्फ एक व्यक्ति की सेहत का मामला नहीं है। इसका असर परिवार पर भी पड़ता है। समाज पर भी असर होता है। इसका असर पूरे देश पर पड़ता है। पीएम मोदी ने कहा कि विकसित भारत के लिए युवाओं का स्वस्थ रहना जरूरी है। युवा शारीरिक और मानसिक रूप से मजबूत हों। उनमें आत्मविश्वास हो। वे नशीले पदार्थों जैसी बुरी आदतों से दूर रहें।

काशी से शुरू हुई पहल अब राष्ट्रीय अभियान बनी

पीएम मोदी ने बताया कि इस पहल की शुरुआत पिछले साल काशी से हुई थी। वहाँ इसे एक प्रायोगिक परियोजना के रूप में शुरू किया गया था। काशी घोषणा के तहत 125 से ज्यादा आध्यात्मिक संगठनों और कई गैर सरकारी संगठनों ने इसमें सहयोग किया। अब यह पहल राष्ट्रीय परियोजना बन गई है। प्रधानमंत्री ने नशा विरोधी शपथ लेने वाले लाखों युवाओं की तारीफ की। उन्होंने कहा कि युवाओं ने नशे से दूर रहने का संकल्प लिया है।

साथ ही वे स्कूल, कॉलेज और समाज में नशामुक्त जीवन का संदेश भी दे रहे हैं। पीएम मोदी ने 100 सप्ताह के रोडमैप की भी बात की। इसके तहत हर आने वाले रविवार को अलग-अलग गतिविधियाँ होंगी। इनमें कला, संस्कृति, खेल और ध्यान से जुड़े कार्यक्रम शामिल होंगे। उन्होंने कहा कि आने वाले 100 रविवार नशामुक्त भारत की दिशा में 100 मजबूत कदम होंगे।

जिस कॉन्ग्रेस ने बनाया FCRA, वही अब विदेशी फंडिंग को लेकर BJP सरकार को घेर रही: NGOs की अवैध फंडिंग रोकने पर क्यों मचा बवाल?

कान्ग्रेस पार्टी इन दिनों मोदी सरकार पर विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम यानी FCRA के गलत इस्तेमाल का आरोप लगा रही है। कान्ग्रेस का कहना है कि सरकार FCRA के जरिए नागरिक समाज समूहों और गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) पर दबाव बना रही है और राजनीतिक असहमति को रोकने की कोशिश कर रही है।

हालाँकि, FCRA का इतिहास काफी पुराना है। यह कानून पहली बार 1976 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी की सरकार के दौरान लाया गया था। इसके बाद राजीव गाँधी सरकार ने 1980 के दशक में इसमें बड़े बदलाव किए। 2010 में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली UPA सरकार ने नया FCRA कानून लागू किया, जिसने NGOs के विदेशी फंड पर निगरानी और सरकारी नियंत्रण को और बढ़ाया।

इंदिरा गाँधी के समय आया FCRA

FCRA की शुरुआत 1976 में हुई थी। उस समय देश में प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी के नेतृत्व में आपातकाल लगा हुआ था। नागरिक स्वतंत्रताएं सीमित थीं, विपक्षी नेताओं को MISA यानी आंतरिक सुरक्षा रखरखाव अधिनियम के तहत जेल में रखा गया था और प्रेस पर भी कड़े प्रतिबंध थे।

इसी दौर में विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम, 1976 संसद में लाया गया। इसका उद्देश्य देश में आने वाले विदेशी पैसे और उसके इस्तेमाल को नियंत्रित करना था।

1976 के कानून के तहत साफ तौर पर इन लोगों के लिए विदेशी मेहमाननवाजी और विदेशी चंदे पर रोक लगा दी गई थी:

(a) चुनाव लड़ने वाला उम्मीदवार,
(b) पंजीकृत अखबार का संवाददाता, कॉलम लिखने वाला, कार्टूनिस्ट, संपादक, मालिक, प्रिंटर या प्रकाशक,
(c) न्यायाधीश, सरकारी कर्मचारी या किसी निगम का कर्मचारी,
(d) किसी भी विधानमंडल का सदस्य,
(e) राजनीतिक दल या उसका कोई पदाधिकारी।

पत्रकारों को कानून के तहत इस प्रतिबंधित सूची में शामिल किया जाना इंदिरा गाँधी की मंशा को साफ तौर पर दिखाता है। इसका उद्देश्य राजनीतिक विरोधियों, व्यंग्य लिखने वालों, स्वतंत्र पत्रकारों और नागरिक अधिकार समूहों को विदेशों से आर्थिक मदद मिलने से रोकना था। इस तरह आपातकाल के दौरान उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि सार्वजनिक जीवन में आर्थिक रूप से टिके रहने के लिए सरकार का नियंत्रण बना रहे।

राजीव गाँधी सरकार ने बढ़ाया सरकारी नियंत्रण

आपातकाल खत्म होने और जनता पार्टी सरकार के कार्यकाल के बाद कान्ग्रेस फिर सत्ता में लौटी। प्रधानमंत्री राजीव गाँधी के समय 1985 में FCRA में महत्वपूर्ण बदलाव किए गए।

इससे पहले संगठन कुछ परिस्थितियों में पूर्व सूचना या सामान्य अनुमति के आधार पर विदेशी योगदान ले सकते थे। लेकिन 1985 के संशोधन के बाद विदेशी फंड लेने वाले संगठनों के लिए गृह मंत्रालय (MHA) के साथ औपचारिक पंजीकरण जरूरी कर दिया गया।

इस बदलाव के बाद FCRA NGOs के लिए एक स्थायी और नौकरशाही आधारित निगरानी व्यवस्था बन गया। विदेशी फंड लेने वाले संगठनों को अब सरकार के सामने पंजीकरण और नियमों का पालन करना जरूरी था।

2010 में मनमोहन सिंह सरकार ने बनाया नया FCRA

FCRA में सबसे बड़ा बदलाव 2010 में हुआ। प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली UPA सरकार और तत्कालीन गृह मंत्री पी. चिदंबरम के कार्यकाल में विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम, 2010 लागू किया गया।

इस कानून ने 1976 के पुराने FCRA को पूरी तरह खत्म कर उसकी जगह नया कानून लागू किया। नए कानून में NGOs और दूसरे संगठनों को मिलने वाले विदेशी फंड पर सरकार का नियंत्रण और बढ़ गया।

1976 के कानून के तहत FCRA पंजीकरण एक बार मिलने के बाद तब तक जारी रहता था, जब तक उसे रद्द नहीं किया जाता। लेकिन 2010 के कानून में पंजीकरण की अवधि 5 साल कर दी गई।

इसका मतलब था कि NGOs को अपना FCRA पंजीकरण समय-समय पर नवीनीकृत कराना पड़ता था। इससे सरकार के पास पंजीकरण को रोकने, उसमें देरी करने या उसे मंजूर नहीं करने का अधिकार और प्रभाव बढ़ गया।

2010 के FCRA की धारा 5 में ‘राजनीतिक प्रकृति के संगठन’ नाम की एक नई श्रेणी जोड़ी गई। इसके तहत सरकार को ऐसे संगठनों को विदेशी फंड लेने से रोकने की शक्ति मिली, जिन्हें राजनीतिक प्रकृति का माना जाता था। इसमें उन समूहों पर भी असर पड़ सकता था जो सरकारी नीतियों, बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स या दूसरी सरकारी योजनाओं के खिलाफ प्रदर्शन करते थे।

2010 के कानून की धारा 8 में विदेशी फंड के प्रशासनिक खर्च पर भी सीमा लगाई गई। इसके तहत किसी संगठन को मिले विदेशी योगदान का अधिकतम 50 प्रतिशत ही प्रशासनिक खर्च में इस्तेमाल किया जा सकता था। इसमें संगठन के संचालन, वेतन और रिसर्च जैसे खर्च शामिल थे। इस तरह सरकार ने NGOs के विदेशी फंड के इस्तेमाल पर एक और वित्तीय सीमा तय कर दी।

कुडनकुलम विवाद में FCRA का इस्तेमाल

2011 से 2013 के बीच तमिलनाडु में कुडनकुलम परमाणु ऊर्जा संयंत्र और आनुवंशिक रूप से संशोधित यानी (जीएम) फसलों के फील्ड ट्रायल जैसे मुद्दों को लेकर विरोध प्रदर्शन हुए।

कुडनकुलम में पीपुल्स मूवमेंट अगेंस्ट न्यूक्लियर एनर्जी यानी (PMANE) के नेतृत्व में बड़े स्तर पर परमाणु विरोधी आंदोलन हुआ। इन प्रदर्शनों के कारण रूस की मदद से बनाए जा रहे परमाणु रिएक्टरों को शुरू करने में देरी हुई।

उस समय UPA सरकार के कई वरिष्ठ अधिकारियों ने इन प्रदर्शनों के पीछे विदेशी फंडिंग को जिम्मेदार बताया।

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने एक इंटरव्यू में कहा था कि कुडनकुलम में हो रहे विरोध प्रदर्शनों में विदेशी NGOs की भूमिका थी। उन्होंने कहा था कि इनमें से कई NGOs अमेरिका और स्कैंडिनेवियाई देशों से फंड प्राप्त करते हैं और भारत की ऊर्जा जरूरतों को पूरी तरह नहीं समझते।

करीब 4000 NGOs पर कार्रवाई

कुडनकुलम आंदोलन के दौरान गृह मंत्रालय ने करीब 4,000 NGOs के FCRA पंजीकरण रद्द किए थे। कुडनकुलम आंदोलन को फंड देने वाले बताए गए कुछ संगठनों के बैंक खाते फ्रीज किए गए और उनके वित्तीय रिकॉर्ड की जाँच भी कराई गई।

पर्यावरण से जुड़े कुछ विदेशी नागरिकों को भारत से बाहर भेजा गया या उन्हें वीजा देने से इनकार किया गया। सरकार का कहना था कि इन लोगों ने स्थानीय विकास विरोधी प्रदर्शनों में हिस्सा लेकर अपने वीजा नियमों का उल्लंघन किया था।

तत्कालीन गृह मंत्री पी. चिदंबरम ने भी कुडनकुलम आंदोलन के दौरान विदेशी फंड के इस्तेमाल को लेकर कार्रवाई की बात कही थी। उन्होंने कहा था कि जाँच में धन के गलत इस्तेमाल की जानकारी सामने आई है और इसलिए FCRA के तहत मामले दर्ज करने का फैसला लिया गया।

आज कान्ग्रेस के विरोध के बीच पुराना इतिहास

आज कान्ग्रेस मोदी सरकार पर FCRA का इस्तेमाल NGOs और नागरिक समाज संगठनों को दबाने के लिए करने का आरोप लगा रही है। कान्ग्रेस FCRA संशोधन विधेयक का विरोध कर रही है और उसका कहना है कि इससे नागरिक संगठनों की स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है।

लेकिन FCRA का इतिहास बताता है कि विदेशी फंड पर सरकारी निगरानी किसी एक सरकार तक सीमित नहीं रही है। इसकी शुरुआत 1976 में इंदिरा गांधी सरकार के दौरान हुई। 1985 में राजीव गांधी सरकार ने इसमें महत्वपूर्ण बदलाव किए और 2010 में मनमोहन सिंह सरकार ने नया FCRA कानून लागू किया।

इसके बाद भाजपा सरकार के समय भी FCRA में बड़े बदलाव किए गए। इनमें 2020 और 2026 के महत्वपूर्ण संशोधन शामिल हैं। इन बदलावों का मुख्य उद्देश्य विदेशी सरकारों और संगठनों से मिलने वाले पैसे के जरिए भारत की घरेलू राजनीति, नीतिगत फैसलों या सामाजिक आंदोलनों को प्रभावित करने की संभावना को रोकना बताया गया है।

FCRA की निगरानी का एक तर्क यह भी है कि विदेशी फंड का इस्तेमाल देश में अस्थिरता पैदा करने वाली गतिविधियों, उग्रवाद, अवैध धार्मिक धर्मांतरण या कट्टरपंथी संगठनों को आर्थिक मदद देने के लिए न हो।

इस पूरे विवाद में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि FCRA को लेकर सरकारी नियंत्रण की व्यवस्था अचानक मोदी सरकार के समय शुरू नहीं हुई। यह कानून करीब 5 दशकों से अलग-अलग सरकारों के कार्यकाल में लगातार बदलता और मजबूत होता रहा है। ऐसे में आज कान्ग्रेस द्वारा FCRA को लेकर उठाए जा रहे सवालों के साथ इस कानून के पुराने इतिहास को भी देखना जरूरी है।

नेपाल में हिंदू राष्ट्र की माँग से ईसाई मिशनरी के खिलाफ मोर्चे तक, अब हिंसा के पीड़ित हिंदुओं के लिए आमरण अनशन: जानें- कौन हैं विनय यादव?

नेपाल की राजधानी काठमांडू के मैतीघर मंडला में एक शख्स पिछले 10 दिनों से अन्न त्यागकर बैठा है। यह कोई बड़ा राजनीतिक मंच नहीं लगा है, न ही चुनावी सभा हो रही है, उसके हाथ में बस अपनी माँगों की एक लंबी सूची है और दावा है कि जब तक सरकार इन्हें नहीं मानती, वह अपना अनशन खत्म नहीं करेगा।

यह शख्स हैं नेपाल के राजनीतिक और सामाजिक कार्यकर्ता विनय यादव। उनकी सबसे बड़ी माँग सुनसरी के देवानगंज में हुई हिंसा के पीड़ितों को न्याय दिलाना और सरकार के साथ हुए समझौते को लागू कराना है। लेकिन कहानी सिर्फ इतनी नहीं है।

विनय यादव जिन मुद्दों को लेकर अनशन पर बैठे हैं, उनमें नेपाल को फिर से हिंदू राष्ट्र घोषित करने की माँग, मुस्लिम आरक्षण खत्म करना, मुस्लिम आयोग को भंग करना, अवैध घुसपैठ पर कार्रवाई और हिंदुओं के खिलाफ हिंसा के मामलों में दोषियों पर कड़ी कार्रवाई जैसे मुद्दे शामिल हैं।

यही वजह है कि उनका मौजूदा आमरण अनशन सिर्फ एक स्थानीय घटना को लेकर किया जा रहा विरोध नहीं है बल्कि नेपाल की धार्मिक पहचान, राजनीति और नागरिक अधिकारों से जुड़े कई सवालों को एक साथ सामने ला रहा है।

26 जुलाई 2026 की रात सुनसरी जिले के देवानगंज ग्रामीण नगरपालिका के कप्टानगंज में लाउडस्पीकर, डीजे और कावड़ यात्रा को लेकर विवाद के बाद हिंसा भड़क गई थी। हालात बिगड़ने पर पुलिस की कार्रवाई और गोलीबारी हुई, जिसमें चार लोगों की मौत हो गई। इसके बाद सरकार और पीड़ित परिवारों के बीच 7-सूत्रीय समझौता हुआ।

मृतकों को शहीद का दर्जा, परिवारों को 10 लाख नेपाली रुपए की सहायता, एक सदस्य को रोजगार, घायलों का मुफ्त इलाज और निष्पक्ष जाँच जैसे वादे किए गए। विनय यादव अब सवाल उठा रहे हैं कि इन वादों पर अमल कहाँ तक पहुँचा?

यही सवाल उन्हें मैतीघर मंडला तक लेकर आया है। लेकिन जिस व्यक्ति ने अपनी जान दाँव पर लगाकर यह आंदोलन शुरू किया है, वह आखिर कौन है? नेपाल की राजनीति में उसकी पहचान क्या है और किन-किन मुद्दों पर वह पहले भी सरकारों के खिलाफ मोर्चा खोल चुका है?

चीन के सीमा अतिक्रमण से लेकर पोखरा एयरपोर्ट में भ्रष्टाचार, BRI के विरोध से लेकर मदरसा विधेयक के खिलाफ आंदोलन और नेपाल को हिंदू राष्ट्र बनाने की माँग तक, विनय यादव की राजनीतिक सक्रियता का दायरा काफी बड़ा रहा है। आइए जानते हैं कौन हैं विनय यादव और क्यों इस समय उनका आमरण अनशन नेपाल में चर्चा का विषय बना हुआ है।

कौन हैं विनय यादव?

विनय यादव नेपाल के राजनीतिक और सामाजिक कार्यकर्ता हैं। वह राष्ट्रीय एकता दल के अध्यक्ष हैं और राष्ट्रीय एकता अभियान नाम के नागरिक मंच के मुख्य संयोजक और नेता भी हैं।

राष्ट्रीय एकता दल और राष्ट्रीय एकता अभियान की ओर से दी गई जानकारी के मुताबिक, विनय लंबे समय से नेपाल की संप्रभुता, सीमा सुरक्षा, सनातन धर्म की रक्षा, नेपाल को फिर से हिंदू राष्ट्र घोषित करने और नागरिक अधिकारों जैसे मुद्दों को लेकर आंदोलन करते रहे हैं। उनका राजनीतिक और सामाजिक अभियान सड़कों से लेकर संसद तक अलग-अलग मुद्दों को उठाने पर केंद्रित रहा है।

उनके समर्थक उन्हें ऐसे नेता के तौर पर पेश करते हैं, जिन्होंने राष्ट्रीय हित और नागरिक अधिकारों से जुड़े कई आंदोलनों में सक्रिय भूमिका निभाई है।

पोखरा एयरपोर्ट में भ्रष्टाचार के आरोपों को लेकर आंदोलन

नेपाली मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, उनके प्रमुख आंदोलनों में पोखरा इंटरनेशनल एयरपोर्ट के निर्माण में भ्रष्टाचार को सामने लाने का प्रयास शामिल है। बताया जाता है कि इस मामले की निष्पक्ष जाँच कराने और इसमें शामिल लोगों के खिलाफ कार्रवाई की माँग को लेकर उन्होंने आंदोलन किया।

इसके अलावा पोखरा इंटरनेशनल एयरपोर्ट से अंतरराष्ट्रीय उड़ानें शुरू कराने के लिए भी उन्होंने लगातार दबाव बनाया। इसी तरह भैरहवा स्थित गौतम बुद्ध इंटरनेशनल एयरपोर्ट से नियमित अंतरराष्ट्रीय उड़ानें संचालित करने की माँग को लेकर भी वह सक्रिय रहे हैं।

देश में आर्थिक संकट का हवाला देते हुए विनय ने सांसदों को मिलने वाले संसदीय विकास कोष के वितरण को रोकने की माँग को लेकर भी आंदोलन किया। उनके मुताबिक, आर्थिक संकट के समय इस तरह के फंड के इस्तेमाल पर सवाल उठना जरूरी है।

चीन और सीमा विवाद पर भी मुखर रहे हैं विनय

नेपाल की उत्तरी सीमा पर चीन के अतिक्रमण का मुद्दा भी विनय के आंदोलनों में प्रमुख रहा है। खास तौर पर गोरखा जिले के चुमनुब्री में रुइला पास और हुमला जिले में नेपाली जमीन पर चीनी अतिक्रमण को लेकर उन्होंने आवाज उठाई थी।

फरवरी 2022 में राष्ट्रीय एकता अभियान के नेतृत्व में काठमांडू स्थित संयुक्त राष्ट्र कार्यालय तक प्रदर्शन किया गया था। वहाँ हुमला में चीन के कथित अतिक्रमण को लेकर अंतरराष्ट्रीय समुदाय का ध्यान खींचने के लिए ज्ञापन सौंपा गया। उनके समर्थकों का दावा है कि इस आंदोलन के बाद सरकार ने मामले की जाँच के लिए समिति बनाने की दिशा में कदम उठाया।

विनय ने भूमि प्रबंधन, सहकारी और गरीबी निवारण मंत्रालय पर भी कथित रूप से अतिक्रमित नेपाली जमीन वापस लेने और संयुक्त सीमा निरीक्षण कराने के लिए दबाव बनाया।

इसके अलावा उन्होंने चीन की बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव यानी BRI परियोजना को नेपाल के हितों के खिलाफ बताते हुए इसे रद्द करने की माँग को लेकर काठमांडू में बड़ा प्रदर्शन किया। चीन से अनावश्यक हथियार खरीदने की प्रक्रिया को रद्द करने की माँग को लेकर भी उन्होंने रक्षा मंत्रालय पर दबाव बनाया। बीरगंज में चीनी नागरिकों द्वारा कथित रूप से चलाए जा रहे अवैध व्यावसायिक गतिविधियों को बंद कराने के लिए भी उनके आंदोलन का दावा किया जाता है।

मुस्लिम आयोग और मुस्लिम आरक्षण के खिलाफ भी आंदोलन

विनय के राजनीतिक एजेंडे का एक महत्वपूर्ण हिस्सा नेपाल में धार्मिक और सामाजिक नीतियों से जुड़ा है। वह मुस्लिम आयोग को भंग करने और नेपाल को फिर से हिंदू राष्ट्र घोषित करने की माँग को लेकर लगातार आंदोलन करते रहे हैं। उनका आरोप है कि मुस्लिम आयोग एक खास विचारधारा को बढ़ावा देता है।

इसी तरह वह मुस्लिम आरक्षण खत्म करने की माँग भी उठा रहे हैं। मौजूदा आमरण अनशन में भी यह मुद्दा उनकी प्रमुख माँगों में शामिल है।

उनके समर्थकों के अनुसार, विनय सनातन धर्म और वैदिक परंपराओं की रक्षा के लिए भी लगातार अभियान चलाते रहे हैं। वह नेपाल को हिंदू राष्ट्र घोषित करने की माँग को लेकर नागरिक आंदोलनों में सक्रिय रहे हैं।

मदरसा विधेयक से लेकर ईसाई मिशनरी कार्यक्रम तक

विनय ने मधेश प्रदेश सरकार द्वारा लाए गए मदरसा विधेयक का भी विरोध किया था। उनके आंदोलन के कारण इस विधेयक को रोकने का दावा उनके समर्थकों की ओर से किया जाता है।

इसके अलावा एक टेलीविजन कार्यक्रम को बंद कराने के लिए भी उन्होंने अभियान चलाया था। उनके अनुसार, यह कार्यक्रम ईसाई मिशनरियों से जुड़ा हुआ था और इसमें चर्चित अभिनेता राजेश हमाल की जाति को लेकर सवाल उठाए गए थे। विनय ने इस कार्यक्रम का विरोध करते हुए इसे बंद कराने की माँग की थी।

मधेश प्रदेश के तत्कालीन भौतिक पूर्वाधार विकास मंत्री जितेंद्र सोनल पर भी विनय के समर्थकों ने आरोप लगाया था कि कमीशन के कारण उपभोक्ता समितियों का भुगतान रोका गया। विनय ने इन भुगतानों को जारी कराने के लिए आंदोलन किया था।

अब जिंदगी दाँव पर लगाकर न्याय की माँग

विनय यादव का मौजूदा आंदोलन उनके पुराने राजनीतिक और सामाजिक अभियानों से अलग है, क्योंकि इस बार उन्होंने अपनी जान तक दाँव पर लगा दी है। मैतीघर मंडला में आमरण अनशन के दसवें दिन उनकी सेहत लगातार चिंता का विषय बनी हुई है।

उनका कहना है कि देवानगंज की हिंसा में मारे गए लोगों और उनके परिवारों को न्याय मिलना चाहिए और सरकार के साथ हुए सात-सूत्रीय समझौते को लागू किया जाना चाहिए। विनय के समर्थकों का कहना है कि आमरण अनशन उन लोगों का शांतिपूर्ण हथियार है, जिनकी आवाज सत्ता तक नहीं पहुँचती। वहीं, सरकार के सामने अब सवाल यह है कि एक नागरिक की जिंदगी दाँव पर लगने के बाद भी क्या वह बातचीत का रास्ता खोलेगी?

मुस्लिम आरक्षण खत्म करने से हिंदुओं को न्याय तक… जानें- क्या हैं नेपाल में 9 दिन से आमरण अनशन पर बैठे विनय यादव की माँगें और उन्होंने ऑपइंडिया को क्या बताया?

नेपाल की राजधानी काठमांडू के मैतीघर मंडला में राष्ट्रीय एकता दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष विनय यादव आमरण अनशन पर बैठे हैं। शुक्रवार (7 अगस्त 2026) को उनके अनशन का नौवाँ दिन है। सुनसरी के देवानगंज में ‘हिंदू नरसंहार’ के पीड़ितों को न्याय दिलाने और सरकार के साथ हुए समझौते को लागू कराने की माँग को लेकर उन्होंने अन्न का त्याग कर दिया है।

विनय यादव का संघर्ष केवल एक घटना तक सीमित नहीं है। वह नेपाल में मुस्लिम आरक्षण खत्म करने, मुस्लिम आयोग को भंग करने, अवैध घुसपैठ पर कार्रवाई करने और हिंदू समुदाय के खिलाफ हुई हिंसा के दोषियों पर सख्त कानूनी कार्रवाई की माँग भी उठा रहे हैं।

देवानगंज में 26 जुलाई 2026 की रात लाउडस्पीकर के इस्तेमाल, डीजे बजाने और कावड़ यात्रा को लेकर हिंदुओं और मुस्लिमों के बीच हिंसा भड़की थी। इस झड़प और भीड़ को नियंत्रित करने के लिए की गई पुलिस कार्रवाई में गोलीबारी भी हुआ और इस घटना में 4 लोगों की मौत हो गई।

इसके बाद सरकार ने पीड़ित परिवारों के साथ सात-सूत्रीय समझौता किया। मृतकों को शहीद का दर्जा, परिवारों को 10 लाख नेपाली रुपए की राहत, एक सदस्य को रोजगार, घायलों के मुफ्त इलाज और निष्पक्ष जाँच जैसे भरोसे दिए गए। विनय यादव का कहना है कि इन आश्वासनों को अब कागज से निकालकर जमीन पर उतारने का समय आ गया है।

उनका सवाल सीधा है कि अगर सरकार ने पीड़ित परिवारों से समझौता किया है, तो उसके हर बिंदु पर कार्रवाई कब होगी? अगर हिंसा हुई है, तो दोषियों को कानून के सामने कब लाया जाएगा? और अगर नेपाल में धार्मिक हिंसा रोकनी है, तो ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए स्थायी सुरक्षा व्यवस्था कब तैयार होगी?

आमरण अनशन पर बैठ विनय यादव

ऑपइंडिया से क्या बोले विनय यादव?

इस आंदोलन के केंद्र में सुनसरी की घटना है। राष्ट्रीय एकता दल का कहना है कि हिंसा में मारे गए लोगों के परिवारों को सिर्फ आश्वासन नहीं बल्कि न्याय चाहिए। संगठन ने सरकार से घटना की स्वतंत्र, निष्पक्ष और समयबद्ध जाँच कराने की मांग की है।

माँग है कि दोषियों पर बिना किसी राजनीतिक या सामाजिक दबाव के कानून के अनुसार कार्रवाई हो और जाँच रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए। संगठन का कहना है कि यदि जाँच ही पारदर्शी नहीं होगी तो पीड़ित परिवारों का सरकार और कानून-व्यवस्था पर भरोसा कैसे कायम होगा?

विनय यादव ने ऑपइंडिया से बातचीत में कहा है, “घटना के बाद हमने शांतिपूर्ण प्रदर्शन किया और सरकार को 24 घंटे का अल्टीमेटम दिया और विभिन्न माध्यमों से अपनी माँगें सरकार तक पहुँचाईं। लेकिन जब हमारी माँगों पर कोई ठोस पहल नहीं हुई, तब हमें मजबूर होकर आमरण अनशन शुरू करना पड़ा।”

उन्होंने आगे कहा, “हमारी मुख्य माँगों में सुनसरी घटना की निष्पक्ष जाँच, दोषियों के खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई, पीड़ित परिवारों को न्याय, मृतकों को शहीद घोषित करना, घायलों का पूर्ण उपचार, सीमावर्ती क्षेत्रों में अवैध गतिविधियों पर प्रभावी नियंत्रण तथा हमारे द्वारा उठाए गए अन्य नीतिगत विषयों पर सरकार द्वारा गंभीर पहल शामिल है।”

उनका कहना है कि जब तक सरकार माँगों पर सम्मानजनक, लिखित और कार्यान्वयन योग्य सहमति नहीं देती, तब तक यह आमरण अनशन जारी रहेगा।

सरकार के 7-सूत्रीय समझौते पर भी सवाल

देवानगंज हिंसा के बाद नेपाल सरकार ने पीड़ित परिवारों के साथ सात-सूत्रीय समझौता किया था। राष्ट्रीय एकता दल अब सरकार से इसी समझौते को पूरी तरह और तत्काल लागू करने की मांग कर रहा है।

इसमें मृतकों को शहीद का दर्जा देने की प्रक्रिया पूरी करना, प्रत्येक पीड़ित परिवार को 10 लाख नेपाली रुपए की राहत राशि देना, परिवार के एक योग्य सदस्य को रोजगार उपलब्ध कराना और घायलों का मुफ्त इलाज शामिल है।

राष्ट्रीय एकता दल का माँग पत्र

इसके अलावा घटना की स्मृति में मेमोरियल पार्क बनाने और समझौते में तय अन्य सुविधाओं को भी लागू करने की माँग की गई है। संगठन का कहना है कि राहत की घोषणा कर देना पर्याप्त नहीं है। पीड़ित परिवारों तक सहायता पहुँचे और समझौते के प्रत्येक बिंदु का प्रभाव जमीन पर दिखाई दे, तभी न्याय का भरोसा पैदा होगा।

मुस्लिम आरक्षण और मुस्लिम आयोग की समाप्ति की माँग

राष्ट्रीय एकता दल की सबसे स्पष्ट नीतिगत माँगों में नेपाल में मुस्लिम आरक्षण समाप्त करना और मुस्लिम आयोग को भंग करना शामिल है। विनय यादव ने ऑपइंडिया से कहा, “हमारा मुद्दा किसी धर्म विशेष के नेपाली नागरिकों से नहीं है। हमारी चिंता मुख्य रूप से सीमावर्ती क्षेत्रों से होने वाली अवैध घुसपैठ, अवैध बसावट, नागरिकता के दुरुपयोग तथा गैरकानूनी गतिविधियों को लेकर है।”

मुस्लिम आरक्षण समाप्त करने की माँग को लेकर विनय यादव ने कहा, “हमारा मानना है कि राज्य के सभी नागरिकों के साथ समान व्यवहार होना चाहिए। इसलिए आरक्षण और विशेष प्रावधानों जैसे विषयों की संविधान, समानता के सिद्धांत और राष्ट्रीय आवश्यकता के आधार पर समीक्षा होनी चाहिए। यह एक नीतिगत विषय है, जिस पर सरकार और संबंधित पक्षों के बीच गंभीर संवाद होना चाहिए।”

अवैध घुसपैठ पर भी सरकार को घेर रहा आंदोलन

राष्ट्रीय एकता दल ने रोहिंग्या और बांग्लादेशी नागरिकों को वापस भेजने की माँग भी उठाई है। आधिकारिक पत्र में संगठन ने अवैध आव्रजन और सीमा पार होने वाली अवैध गतिविधियों को राष्ट्रीय सुरक्षा के संदर्भ में गंभीर मुद्दा बताया है।

इसके साथ ही संगठन ने कथित ‘जिहादी’ गतिविधियों के मामलों में मृत्युदंड का प्रावधान करने वाले कानून की माँग की है। यह माँग भी सरकार के सामने औपचारिक बातचीत के जरिए रखने की बात कही गई है।

इन माँगों पर किसी भी निर्णय को नेपाल के संविधान और कानून की प्रक्रिया से गुजरना होगा लेकिन आंदोलन ने इन्हें अब राष्ट्रीय राजनीतिक बहस के केंद्र में ला दिया है।

नेपाल में मुस्लिम आरक्षण

नेपाल में मुस्लिम आरक्षण को लेकर इन दिनों बहस तेज है लेकिन इसका इतिहास समझने के लिए एक जरूरी तथ्य पहले जानना होगा नेपाल में मुस्लिमों के लिए शुरू से कोई अलग तय प्रतिशत वाला आरक्षण नहीं रहा है। सरकारी नौकरियों में समावेशी आरक्षण की मौजूदा व्यवस्था की नींव 2007 में पड़ी, जब सिविल सर्विस में खुली प्रतियोगिता से भरी जाने वाली सीटों में से 45% को समावेशी श्रेणियों के लिए रखा गया। इसमें महिलाओं, आदिवासी-जनजाति, मधेसी, दलित, दिव्यांग और पिछड़े क्षेत्रों के लोगों को अलग-अलग हिस्से मिले लेकिन मुस्लिमों के लिए अलग श्रेणी नहीं थी।

बड़ा बदलाव 2015 के नेपाल संविधान से आया। संविधान के अनुच्छेद 42 में आर्थिक, सामाजिक या शैक्षिक रूप से पिछड़े मुस्लिमों को राज्य के निकायों में समानुपातिक समावेशी सिद्धांत के आधार पर भागीदारी का अधिकार दिया गया। यानी मुस्लिम समुदाय को संवैधानिक तौर पर समावेशी प्रतिनिधित्व या आरक्षण का अधिकार मिला।

नेपाल के संविधान (2015) के अनुच्छेद 264 के तहत ‘राष्ट्रीय मुस्लिम आयोग’ की स्थापना की गई। इसे कानूनी जामा पहनाने के लिए संसद ने ‘मुस्लिम आयोग अधिनियम, 2074 (2017)’ पारित किया। इस कानून की प्रस्तावना में लिखा है कि यह आयोग मुस्लिम समुदाय के इतिहास व संस्कृति की पहचान, उनके अधिकारों की रक्षा, और उनके आर्थिक-सामाजिक सशक्तीकरण के लिए सरकार को सुझाव देगा। आयोग के मुताबिक, 2011 की जनगणना में नेपाल की मुस्लिम आबादी करीब 4.4% थी। 2021 में यह बढ़कर 5.09% हो गई थी।

आरक्षण को लेकर बहस आज भी खत्म नहीं हुई है। मार्च 2025 में प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने संसद में कहा था कि थारू और मुस्लिम समुदाय से जुड़ी आरक्षण संबंधी मांगों को संघीय सिविल सेवा कानून के जरिए संबोधित किया जाएगा। यानी आज की असली बहस यह है कि मुस्लिमों के लिए मौजूदा समानुपातिक प्रतिनिधित्व की व्यवस्था पर्याप्त है या सरकारी नौकरियों में अलग और स्पष्ट मुस्लिम कोटा होना चाहिए। इसी व्यवस्था के विरोध में अब नेपाल में मुस्लिम आरक्षण और मुस्लिम आयोग खत्म करने की माँग भी उठ रही है।

सांसद ने सदन में उठाया अनशन का मुद्दा

अब यह आमरण अनशन का मुद्दा नेपाल की संसद तक भी पहुँच चुका है। राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी की सांसद खुशिबू ओली ने प्रतिनिधि सभा में इस मुद्दे को उठाते हुए सरकार से प्रदर्शनकारी पक्षों के साथ तत्काल बातचीत करने की अपील की।

इस बीच नेशनल मधेसी कमीशन के चेयरमैन विनय दत्ता भी मैतीघर मंडला पहुँचे। उन्होंने विनय यादव से मुलाकात की और सुनसरी घटना की निष्पक्ष जाँच तथा दोषियों पर कानूनी कार्रवाई की जरूरत बताई।

नेपाल सरकार की और से अब तक क्या हुआ?

मैतीघर मंडला में 9 दिन से जारी अनशन अब नेपाल सरकार के लिए सीधी चुनौती बन चुका है। एक तरफ देवानगंज हिंसा के पीड़ित परिवारों के लिए किए गए सात-सूत्रीय समझौते को लागू करने का सवाल है, दूसरी तरफ मुस्लिम आरक्षण, मुस्लिम आयोग, अवैध घुसपैठ और धार्मिक हिंसा जैसे मुद्दों पर आंदोलनकारी पक्षों से बातचीत की माँग है। राष्ट्रीय एकता दल ने साफ किया है कि वह केवल आश्वासन से पीछे हटने वाला नहीं है।

विनय यादव ने बताया है कि अब तक सरकार की ओर से कुछ स्तर पर संपर्क हुआ है। जिला प्रशासन के माध्यम से हमारा माँग-पत्र लिया गया है और संवाद की प्रारंभिक प्रक्रिया शुरू हुई है। उन्होंने कहा, “हमने सरकार से स्पष्ट कहा है कि केवल मौखिक आश्वासन पर्याप्त नहीं है।”

यादव का कहना है, “हम चाहते हैं कि सरकार आधिकारिक स्तर पर वार्ता करे, लिखित सहमति दे और उस सहमति को समयबद्ध तरीके से लागू करे। यदि सरकार सकारात्मक पहल करती है, तो हम भी लोकतांत्रिक और शांतिपूर्ण तरीके से समाधान निकालने के लिए पूरी तरह तैयार हैं। हमारा आंदोलन पूरी तरह शांतिपूर्ण है और इसका उद्देश्य केवल न्याय, सुरक्षा तथा हमारी माँगों पर गंभीर सरकारी पहल सुनिश्चित करना है।”