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US में साइक्लोस्पोरियासिस का प्रकोप, तेजी से फैल रहा आँखों से न दिखने वाला यह खतरनाक पैरासाइट: जानिए, कैसे ये भारत में भी फैल सकता है, बचाव के लिए करें कौन से उपाय

अमेरिका के कई राज्यों में इन दिनों एक छोटा पैरासाइट यानी पैरासाइट के कारण फैली बीमारी ने स्वास्थ्य अधिकारियों और आम जनता की चिंता को काफी बढ़ा दिया है। इस बीमारी का नाम साइक्लोस्पोरियासिस है, जो मुख्य रूप से हमारे पाचन तंत्र पर हमला करती है।

हाल के हफ्तों में इस संक्रमण के मामलों में अप्रत्याशित और बहुत तेजी से बढ़ोतरी देखी गई है, जिसके कारण अस्पतालों और जाँच प्रयोगशालाओं पर भारी दबाव बन गया है।

इस बीमारी की चपेट में आने वाले मरीजों को बेहद गंभीर गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है, जिसमें हफ्तों तक चलने वाले अनियंत्रित और बहुत तेज दस्त यानी डायरिया की शिकायत सबसे ज्यादा है।

मिशिगन जैसे राज्य में तो स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि वहाँ कुछ ही दिनों के भीतर सैकड़ों मामले दर्ज किए गए हैं, जो आम दिनों के मुकाबले कई गुना ज्यादा हैं। हालाँकि स्वास्थ्य विभाग और संघीय एजेंसियाँ लगातार इस बात की जाँच कर रही हैं कि आखिर इस संक्रमण की मुख्य वजह क्या है, लेकिन अभी तक किसी भी एक विशेष खाद्य पदार्थ, ब्रांड या सप्लायर की पहचान नहीं हो सकी है।

शुरुआती जाँच में दूषित ताजे फल और सब्जियों को इसका मुख्य कारण माना जा रहा है, क्योंकि यह पैरासाइट अक्सर खेतों और फसलों के जरिए ही इंसानी आबादी तक पहुँचता है। चूँकि भोजन की आपूर्ति श्रृंखला कई राज्यों से होकर गुजरती है, इसलिए इस संक्रमण के सटीक स्रोत का पता लगाना जाँच कर्ताओं के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है।

क्या है साइक्लोस्पोरियासिस और कैसे होता है इसका हमला

साइक्लोस्पोरियासिस असल में भोजन या पानी के जरिए फैलने वाली एक गंभीर बीमारी है, जो एक बेहद छोटे और छोटा  पैरासाइट  साइक्लोस्पोरा कायटैनेन्सिस के कारण होती है।

सेंटर्स फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन यानी CDC के मुताबिक, यह पैरासाइट इंसानी आँखों से दिखाई नहीं देता और जब कोई व्यक्ति इससे दूषित खाना या पानी लेता है, तो यह उसके शरीर के भीतर प्रवेश कर जाता है।

शरीर में पहुँचने के बाद यह पैरासाइट मुख्य रूप से छोटी आंत को अपना निशाना बनाता है और वहाँ जाकर अपनी संख्या बढ़ाने लगता है, जिससे आँतों का सामान्य कामकाज पूरी तरह प्रभावित हो जाता है।

यह संक्रमण आम तौर पर गर्मी के महीनों में यानी मई की शुरुआत से लेकर अगस्त के अंत तक बहुत ज्यादा सक्रिय रहता है क्योंकि इस मौसम में इस पैरासाइट के पनपने की अनुकूल परिस्थितियाँ होती हैं।

हालाँकि यह बीमारी आमतौर पर जानलेवा नहीं मानी जाती है, लेकिन अगर इसका सही समय पर इलाज न किया जाए तो यह हफ्तों तक शरीर को निचोड़ सकती है। सबसे खास बात यह है कि इसके लक्षण एक बार ठीक होने के बाद दोबारा वापस आ सकते हैं, जिससे मरीज लंबे समय तक कमजोरी और थकावट महसूस करता रहता है।

शरीर पर दिखने वाले लक्षण और डायरिया का खतरनाक रूप

जब कोई व्यक्ति इस खतरनाक पैरासाइट के संपर्क में आता है, तो उसके शरीर में तुरंत लक्षण दिखाई नहीं देते बल्कि इसे उभरने में दो दिन से लेकर चौदह दिन तक का समय लग सकता है।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, इस संक्रमण का सबसे प्रमुख और डरावना लक्षण पानी जैसा तेज दस्त होना है, जिसे कई बार विस्फोटक मलत्याग भी कहा जाता है। इसके अलावा मरीजों को पेट में बहुत तेज और असहनीय मरोड़ या ऐंठन महसूस होती है, जो उन्हें पूरी तरह से बेहाल कर देती है।

संक्रमण के अन्य लक्षणों में लगातार जी मिचलाना, उल्टी होना, शरीर में भारी थकान, भूख में भारी कमी आना और बहुत तेजी से वजन का घटना शामिल है। इसके अतिरिक्त मरीजों को पेट में बहुत ज्यादा गैस बनने, शरीर में तेज दर्द होने और हल्का बुखार रहने की शिकायत भी होती है।

नोरोवायरस जैसे आम पेट के इन्फेक्शन के विपरीत, जो कुछ ही दिनों में खुद-ब-खुद ठीक हो जाता है, साइक्लोस्पोरियासिस का असर बहुत लंबा चलता है। इसके गंभीर दौर में मरीजों के शरीर से पानी इतनी तेजी से निकलता है कि उन्हें डिहाइड्रेशन यानी पानी की गंभीर कमी के कारण अस्पताल में भर्ती तक कराना पड़ जाता है।

अमेरिका में अचानक बढ़े मामले और जाँच की जमीनी हकीकत

इस समय अमेरिका के कई राज्यों जैसे मिशिगन, ओहियो, इलिनोइस, न्यूयॉर्क, टेक्सास, नॉर्थ कैरोलिना और इंडियाना में इस संक्रमण के मामलों में भारी उछाल आया है।

मिशिगन के स्वास्थ्य विभाग के अनुसार, वहाँ पिछले कुछ ही हफ्तों में मामलों की संख्या तेजी से बढ़कर सात सौ से ऊपर पहुँच गई है, जबकि आम तौर पर इस पूरे राज्य में सालभर में सिर्फ चालीस से पचास मामले ही सामने आते थे।

मिशिगन के दक्षिण-पूर्वी हिस्से के कई काउंटियों जैसे मोनरो, वाश्टेनॉ, लेनावी, शियावासी, वेन, जैक्सन, ओकलैंड और लिविंगस्टन में इसका सबसे घातक असर देखा जा रहा है।

मामलों की संख्या इतनी ज्यादा है कि मरीजों का परीक्षण करने वाली प्रयोगशालाएँ पूरी तरह से थक चुकी हैं और जहाँ पहले टेस्ट की रिपोर्ट चौबीस घंटे में आ जाती थी, वहीं अब इसमें दो से तीन दिन का समय लग रहा है।

इस भारी दबाव के कारण डॉक्टरों को यह भी सोचना पड़ रहा है कि अगर जाँच में देरी जारी रही, तो वे केवल लक्षणों के आधार पर ही इलाज शुरू कर देंगे। मिशिगन की मुख्य चिकित्सा कार्यकारी डॉ नताशा बगदासारियन ने बताया कि इतने बड़े पैमाने पर मरीजों का इंटरव्यू लेना और उनके खान-पान का पता लगाना मुस्किल काम हो गया है।

स्वास्थ्य कर्मी दिन-रात काम करके मरीजों की ग्रोसरी लिस्ट खंगाल रहे हैं और यह जानने की कोशिश कर रहे हैं कि उन्होंने पिछले दिनों में किस रेस्टोरेंट में क्या खाया था।

कैसे फैलता है यह पैरासाइट और क्यों है इसे ढूँढना मुश्किल

साइक्लोस्पोरा पैरासाइट के फैलने का मुख्य जरिया इंसानी मल यानी व्हीकल-ओरल रूट होता है, जब किसी संक्रमित व्यक्ति के मल से दूषित हुआ पानी या मिट्टी फसलों के संपर्क में आती है।

हालाँकि स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने यह साफ किया है कि यह बीमारी सीधे तौर पर एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में तुरंत नहीं फैलती है, क्योंकि शरीर से बाहर निकलने के बाद इस पैरासाइट के अंडों को पर्यावरण में संक्रामक यानी एक्टिव होने के लिए कम से कम एक से दो सप्ताह का समय चाहिए होता है।

इसका सीधा मतलब यह है कि यह संक्रमण घर में खाना पकाने के दौरान नहीं, बल्कि सीधे खेतों के स्तर पर असुरक्षित सिंचाई जल या खराब स्वच्छता के कारण फैलता है। चूँकि बहुत से फल और सब्जियाँ कच्चे ही खाए जाते हैं, इसलिए वे इस संक्रमण को फैलाने के सबसे बड़े वाहक बन जाते हैं।

इस जाँच को सबसे ज्यादा जटिल अमेरिका की विशाल फूड सप्लाई चेन बनाती है, जहाँ एक राज्य में उगाई गई फसल को दूसरे राज्य में पैक और प्रोसेस किया जाता है और फिर उसे देश के दर्जनों अलग-अलग राज्यों में बिक्री के लिए भेज दिया जाता है।

पूर्व में हुए इसके आउटब्रेक बताते हैं कि पैक्ड सलाद, धनिया, तुलसी, रास्पबेरी, स्नो पीज और हरी प्याज जैसी चीजें इसके फैलने का मुख्य कारण रही हैं और इस बार भी FDA and CDC प्याज, खीरा और धनिए जैसी चीजों पर अपनी जाँच केंद्रित कर रहे हैं।

संक्रमण से बचाव के उपाय और फल-सब्जियों को साफ करने के तरीके

इस पैरासाइट से सुरक्षित रहने के लिए स्वास्थ्य अधिकारियों और न्यूयॉर्क राज्य के स्वास्थ्य विभाग ने बहुत ही कड़े दिशा-निर्देश और व्यावहारिक सुझाव जारी किए हैं। चूँकि यह पैरासाइट फल और सब्जियों की सतह से बहुत मजबूती से चिपक जाता है, इसलिए केवल साधारण पानी से इसे ऊपर-ऊपर से धो देना काफी नहीं होता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि रास्पबेरी जैसी बेरीज को साफ करना और भी मुश्किल होता है क्योंकि उनके ऊपर छोटे-छोटे बाल होते हैं जिनमें यह पैरासाइट आसानी से छिपा रहता है। इससे बचने के लिए सबसे पहले ताजी सब्जियाँ या फल छूने से पहले और बाद में अपने हाथों को साबुन और पानी से बहुत अच्छे से धोना चाहिए।

सभी कटी हुई या पकी हुई सब्जियों को तैयार करने के दो घंटे के भीतर तुरंत रेफ्रिजरेटर में रख देना चाहिए। इसके अलावा सलाद के पत्तों को इस्तेमाल करने से पहले उनके बाहरी पत्तों को पूरी तरह से हटाकर फेंक देना चाहिए और खीरे या तरबूज जैसी सख्त चीजों को साफ ब्रश से अच्छी तरह रगड़कर धोना चाहिए।

किसी भी फल या सब्जी के खराब हिस्से को खाने से पहले काटकर अलग कर देना चाहिए। हालाँकि इसे जमाने यानी फ्रीज करने से इस पैरासाइट के मरने की कोई गारंटी नहीं होती है, लेकिन भोजन को कम से कम 158 डिग्री फारेनहाइट यानी 70 डिग्री सेल्सियस तक अच्छी तरह पकाना इसे खत्म करने का एकमात्र सबसे सुरक्षित और निश्चित तरीका है।

चिकित्सा परामर्श की आवश्यकता और इलाज के उपलब्ध विकल्प

यदि किसी व्यक्ति को लगातार कई दिनों तक पानी जैसे दस्त हो रहे हों, पेट में तेज मरोड़ उठ रही हो या शरीर में पानी की कमी के लक्षण जैसे चक्कर आना, अत्यधिक प्यास लगना, पेशाब कम होना और बहुत ज्यादा कमजोरी महसूस हो रही हो, तो उसे बिना किसी देरी के तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए।

इम्यूनोकॉम्प्रोमाइज्ड यानी कमजोर रोग प्रतिरोधक क्षमता वाले लोगों के लिए यह संक्रमण और भी ज्यादा खतरनाक हो सकता है क्योंकि उनके शरीर में यह बीमारी लंबे समय तक टिकी रह सकती है और उन्हें ठीक होने में बहुत ज्यादा समय लगता है।

हालाँकि अभी तक इस संक्रमण से किसी के भी मौत की खबर नहीं आई है, लेकिन स्थिति बिगड़ने से रोकने के लिए समय पर इलाज बहुत जरूरी है।

‘मेरी हिंदू बेटी अब मुझे और मेरे बेटे को जान से मारना चाहती है’: पिता ने ऑपइंडिया से बयाँ किया दर्द, कहा- वसीम, इकरा और नेहा खान ने किया बेटी का ब्रेनवॉश; नमाज भी सिखाया

कल्पना कीजिए कि एक आदमी, जिसकी पत्नी नहीं है और वो माँ-बाप दोनों का फर्ज निभाते हुए अपनी 19 साल की बेटी और 17 साल के बेटे को संभाल रहा है, उसकी बेटी एक दिन ऐसे जिहादियों के संपर्क में आ जाती है, कि वो उसी पिता को जान से मारने के लिए आतुर हो जाती है। उस लड़की का ऐसा ब्रेनवॉश किया जाता है कि वो लोगों से कहती है कि उसके पिता और भाई को जहर दे दिया जाए ताकि वो धर्मांतरण कर ले। वो लड़की जो कभी मन से व्रत रखती थी, भगवान की पूजा करती थी, अब नमाज और हिजाब पहनना सीख रही है।

उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद के मधुबन बापूधाम थाना क्षेत्र के मैनापुर गाँव से ऐसा ही हैरान और परेशान करने वाला मामला सामने आया है। यहाँ एक ब्राह्मण हिंदू परिवार की 19 वर्षीय बेटी को बहला-फुसलाकर उसका धर्म परिवर्तन कराने और उसके जरिए पूरे परिवार को खत्म करने की एक गंभीर साजिश का खुलासा हुआ है।

यहाँ वसीम नाम के युवक, उसका परिवार, लड़की को दो सहेलियाँ इकरा खान और नेहा खान ने मिलकर युवती का इस कदर ब्रेनवॉश कर दिया है कि वह अपने ही पिता और भाई की जान लेने पर आमादा हो गई है। जब ऑपइंडिया की पत्रकार सौम्या सिंह ने पीड़ित पिता से बात की, तो उन्होंने अपनी बेटी के बदले व्यवहार, घर में मिले नमाज और हिजाब के सबूतों और परिवार को मिल रही धमकियों को लेकर अपनी गहरी चिंता जताई। उनकी आवाज से साफ समझा जा सकता था कि वे आज कितना बेबस महसूस कर रहे।

मासूमियत का शिकार और षड्यंत्र का जाल: कैसे शुरू हुआ हिंदू युवती का ब्रेनवॉश?

गाजियाबाद के मैनापुर निवासी युवती का परिवार एक सम्मानित हिंदू परिवार है, लेकिन उसके घर में बर्बादी की नींव आज से चार साल पहले पड़ी। पीड़ित पिता ने अत्यंत भावुक होकर बताया कि जब उनकी बेटी केवल 15 वर्ष की थी, तब वसीम उनके घर टाईल्स लगाने आया और लड़की को बरगलाकर इंस्टाग्राम पर बातचीत करनी शुरू कर दी।

खतौली निवासी इस दिहाड़ी मजदूर वसीम ने लड़की को अपनी बातों और झूठे जाल में फँसाना शुरू कर दिया। एक 15 साल की बच्ची, जो मजहबी साजिशों के इस खौफनाक खेल से पूरी तरह अनजान थी, उसे वसीम ने लगातार बरगलाना शुरू किया। इस पूरे घृणित खेल में वसीम अकेला नहीं था।

आरोपित वसीम

उसी गाँव मैनापुर में रहने वाली नेहा खान और उसकी सहेली इकरा के द्वारा लगातार इस प्रेम प्रसंग को बढ़ावा दिया गया। इन दोनों लड़कियों ने हिंदू युवती की अच्छी सहेली बनकर नजदीकी बढ़ाई और लगातार वसीम और युवती के इस तथाकथित प्रेम प्रसंग को हवा दी।

नेहा खान और इकरा ने युवती का ब्रेनवॉश इस स्तर पर किया कि उन्होंने धीरे-धीरे उसके मन से सनातन धर्म के प्रति श्रद्धा को खत्म करना शुरू कर दिया। इन दोनों कट्टरपंथी लड़कियों ने उसे गुपचुप तरीके से नमाज पढ़नी सिखानी शुरू कर दी और उसे धर्मांतरण के लिए बरगलाने लगे।

धीरे-धीरे लड़की को अपने ही धर्म के खिलाफ खड़ा कर दिया गया और उसके धर्मांतरण कराने की साजिश रची जाने लगी।

घर में जहर देने की साजिश और हत्या का खौफ: पीड़ित हिंदू पिता की आपबीती

यह मामला एक लड़की के झूठे प्रेम जाल में फंसने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक पूरे हिंदू परिवार को सामूहिक रूप से समाप्त करने की एक बेहद गंभीर और डरावनी आपराधिक साजिश है। पिता ने पुलिस कमिश्नर कार्यालय, गाजियाबाद को सौंपे गए अपने लिखित शिकायत पत्र में स्पष्ट रूप से अपनी और अपने बेटे की हत्या की गहरी आशंका जताई है।

पीड़ित पिता का कहना है कि यह जिहादी अब उनकी बेटी को बरगलाकर उनकी और उनके बेटे की हत्या कराने की साजिश में है। पिछले महज 15 दिनों के भीतर युवती दो बार घर छोड़कर भाग चुकी है। पिता उसे बार-बार घर लाते हैं, लेकिन घर आने के बाद भी उसकी मानसिक स्थिति और व्यवहार पूरी तरह बदल चुका था।

पिछली बार जब वह घर छोड़कर गई तब से वह अपने ही परिवार में निचली मंजिल पर किराएदारों के साथ रह रही थी। जहाँ इसने उन किराएदारों से अपने पिता एवं अपने भाई को जहर देकर मारने की बात कही। उसने सीधे तौर पर अपने सगे पिता और भाई की हत्या की साजिश की बात स्वीकार की। जब यह बात पिता को पता चली, तो उनके होश उड़ गए।

पिछले 15 दिनों से जब भी उसे समझाने या घर पर रखने का प्रयास किया जाता है, वह लगातार आत्महत्या करने की धमकी दे रही है। वह पूरी तरह से इन दोनों लड़कियों नेहा खान और इकरा के माध्यम से उस जिहादी मजदूर वसीम के संपर्क में बनी हुई है।

पिता का आरोप है कि उनकी बेटी को शायद ड्रग्स दिया जा रहा है, क्योंकि पिछले 9 महीनों से उसका स्वास्थ्य लगातार गिरता जा रहा है और उसकी मानसिक स्थिति भी ठीक नहीं है।

हिजाब, नमाज की डायरी और उर्दू लिखे पन्ने: धर्मांतरण का पुख्ता सबूत

हिंदू युवती का ब्रेनवॉश और धर्मांतरण कोई हवा-हवाई बात नहीं है, बल्कि इसके पुख्ता और रोंगटे खड़े कर देने वाले लिखित और विजुअल सबूत पीड़ित पिता ने ऑपइंडिया को सौंपे हैं। पीड़िता पिता ने ऑपइंडिया की पत्रकार सौम्या सिंह को अपनी बेटी की वो तस्वीरें भेजीं, जिसमें उनकी बेटी ने हिजाब पहना हुआ है।

पिता ने बताया कि इकरा और नेहा खान ने उनकी बेटी को हिजाब पहनाया था, वे उसे हिजाब बाँधना और बुर्का पहनना भी सिखाती थीं। उसने घर में हिंदू देवी-देवताओं की पूजा-पाठ करना और व्रत रखना पूरी तरह से बंद कर दिया है, जबकि वह पहले व्रत भी रखती थी, मन से पूजा भी करती थी।

उसकी माँ नहीं है इसलिए वह पिता और छोटे भाई का ध्यान रखते हुए घर के काम भी करती थी। लेकिन अब उसका व्यवहार पूरी तरह बदल गया है। वह सिर्फ वसीम के साथ रहना चाहती है, धर्मांतरण कर इस्लाम अपनाना चाहती है।

पीड़ित पिता द्वारा सौंपा गया युवती की कॉपी का पेज

इसके साथ ही पिता ने बेटी को नोटबुक की तस्वीरें भी भेजीं, जिसमें वसीम, इकरा और नेहा ने नमाज, वुज़ू और इस्लाम के रिवाजों का पालन करने का तरीका लिखा हुआ है। इस डायरी में कुछ चीजें तो हिंदी में लिखी हुई हैं, लेकिन कुछ चीजें उर्दू में भी हैं, जो समझ नहीं आ रहा है।

कट्टरपंथियों ने लिख कर दिए थे वुज़ू करने के तरीके

पीड़िता पिता ने बताया कि यह साजिश कितनी पुरानी और गहरी है, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इस मामले में उन्होंने एक परिचित मुस्लिम डॉक्टर को कॉपी दिखाई और उसका मतलब पूछा तो उन्होंने कहा कि ये सब किसी को बीमार करवाने की चीजें हैं।

कट्टरपंथियों ने याद करने के लिए लिखा था कब-कब करनी है नमाज

ये बात 2025 की है। उनका कहना है कि इसी दौरान उनका बेटा लंबे समय के लिए बीमार भी पड़ा था, जिसे लेकर वो अस्पताल में थे। उस दौरान भी बेटी भाई को देखने के बहाने घर से निकलती थी लेकिन वो वसीम से मिलने चली जाती थी।

उर्दू में लिखे गए शब्द

लाचार पिता ने बेटी को पुलिस के हवाले छोड़ा

इस खौफनाक और जानलेवा साजिश का खुलासा होने के बाद पीड़ित पिता ने न्याय के लिए हर दरवाजा खटखटाया। पहले एक स्थानीय बीजेपी नेता देहात मंडल अध्यक्ष सचिन ने सहायता की और उन्होंने ही हिंदू संगठनों तक ये बात पहुँचाई। इसके बाद महाकाली वाहिनी ने मदद की और उनके साथ पिता मधुबन बापूधाम थाने गए और SHO से मिले।

लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। उनका कहना है कि इससे अपराधियों के हौसले और बुलंद हो गए और पिछले दो दिन से कुछ मुस्लिम लड़के उनके घर के चक्कर काट रहे हैं। बार-बार बेटी के भाग जाने से परेशान होकर पिता ने फिलहाल बेटी को थाने में छोड़ दिया है, ताकि वो कम से कम जिहादियों से सुरक्षित रहे और पुलिस कार्रवाई करे।

पिता का कहना है कि उन्होंने लिख कर दे दिया है कि वह इस हालत में बेटी को घर लेकर नहीं जाएँगे। वसीम का पूरा परिवार लड़की के ब्रेनवॉश की कोशिश में लगा हुआ है। दूसरी तरफ पिता जब लड़की को समझाने की कोशिश करते हैं तो वह धर्मांतरण करने वसीम के साथ जाने की बातें करती है।

पिता का कहना है कि वसीम, इकरा, नेहा तीनों आपस में मिले हुए हैं और लड़की को बरगलाने की कोशिश कर रहे हैं। उनकी बेटी की वजह से ही तीनों की आपस में जान-पहचान हुई और बाद में तीनों ने मिलकर ये सब शुरू कर दिया। थाने के SHO ने फोन कर पिता से कहा कि वे आएँ लड़की को वे समझा रहे और वे लेकर जाएँ लेकिन पिता राजी नहीं हैं।

हिंदू संगठनों ने बढ़ाया मदद का हाथ, लगातार संपर्क में है महाकाली वाहिनी

इस पूरे मामले को लेकर महाकाली वाहिनी ने एडिशनल कमिश्नर केशव चौधरी से मिल कर यह मामला उठाया। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स डॉ उदिता त्यागी ने एक वीडियो बाइट जारी करके पुलिस से तत्काल हस्तक्षेप करके परिवार और बेटी को बचाने की माँग की।

उन्होंने कहा कि इस्लाम के जिहादी अब समाज की हिंदू बेटियों को अपने ही परिवार को जहर देने के लिए तैयार कर रहे हैं ताकि वो परिवार की सारी धन संपत्ति पर कब्जा कर सकें। जिहादी अब मासूम बच्चियों को शिकार बनाकर उनके परिवार के पुरुषों की हत्या की साजिश कर रहे हैं।

उनका कहना है कि यह मामला हर हिंदू परिवार के लिए एक गंभीर चेतावनी है और अब समय आ गया है कि पुलिस प्रशासन बिना किसी देरी के जिहादी वसीम, नेहा खान और इकरा को तुरंत गिरफ्तार करे, ताकि एक बेबस पिता के आँसुओं को न्याय मिल सके और सनातन की एक और बेटी को इस खौफनाक मजहबी दलदल से बाहर निकाला जा सके।

इस संबंध में ऑपइंडिया ने मधुबन बापूधाम थाने के आधिकारिक नंबर पर बात कर मामले से जुड़ी जानकारी ली। पुलिस अधिकारी ने बताया कि पिता ने कोई लिखित शिकायत अब तक दर्ज नहीं कराई है और उनकी बेटी भी अब घर वापस जाने को तैयार है। हालाँकि जैसा कि हमने इस रिपोर्ट में बताया है कि पीड़ित पिता कार्रवाई हुए बिना बेटी को घर ले जाने के लिए तैयार नहीं है।

पर्यावरण और विकास में संतुलन से समृद्धि की ओर बढ़ रहा उत्तर प्रदेश, ‘1 पेड़ माँ के नाम’ अभियान बना रहा विश्व रिकॉर्ड: पढ़ें 9 साल में योगी सरकार ने कैसे की ‘हरित क्रांति’

हरित विकास, समृद्ध उत्तर प्रदेश! ये नारा है यूपी की बीजेपी सरकार का। इसके तहत पिछले 9 वर्षों से सरकार पौधरोपण से लेकर कार्बन उत्सर्जन को कम करने पर काम कर रही है। यूपी देश का सबसे पहला ईवी इस्तेमाल करने वाला राज्य बन गया है। एक्सप्रेस वे पर ईवी चार्जिंग स्टेशन बन गए हैं। इन सबके बीच सरकार का पौधरोपण अभियान भविष्य में उत्तर प्रदेश को पर्यावरण संतुलन और विकास के बीच आदर्श राज्य के रूप में प्रस्तुत करने वाला है।

‘एक पेड़ माँ के नाम’ अभियान के तहत 35 करोड़+ पौधरोपण

सीएम योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में पर्यावरण संरक्षण के प्रति लोगों को जागरूक करने के लिए महाअभियान चलाया जा रहा है। ‘एक पेड़ माँ के नाम’ अभियान भी इसका हिस्सा है, जिसकी शुरुआत 5 जून को हुई थी। उत्तर प्रदेश में ‘एक पेड़ माँ के नाम’ अभियान के तहत 12 जुलाई को राज्य में एक दिन का बृहत वृक्षारोपण कार्यक्रम किया जाएगा, जिसमें एक ही दिन में 35 करोड़ पौधे लगाने का नया रिकॉर्ड बनाया जाएगा।

प्रधानमंत्री मोदी की प्रेरणा से शुरू किया गया यह एक राष्ट्र व्यापी महाअभियान है, जिसके तहत हर नागरिक से अपनी माँ के नाम पर कम से कम एक पेड़ लगाने का आह्वान किया गया है। इसमें नागरिकों को संकल्प दिलाया जा रहा है कि वे न केवल पेड़ लगाएँ, बल्कि शरारती तत्वों और जानवरों से उसकी सुरक्षा भी करें और जल संरक्षण को जीवन का हिस्सा बनाएँ।

5 जून 2026 को ‘उत्तर प्रदेश स्वच्छ वायु प्रबंध परियोजना’ के शुभारंभ अवसर पर ‘एक पेड़ माँ के नाम’ वृक्षारोपण महाअभियान-2026 के आधिकारिक ‘लोगो’ का अनावरण किया गया था।

‘एक पेड़ मां के नाम’ अभियान के तहत साल 2025-26 में 37 करोड़ पौधरोपण का लक्ष्य रखा गया था। लेकिन राज्य में अक्टूबर 2025 तक 37.21 करोड़ पौधों का रोपण कर विश्व रिकॉर्ड बनाया।

इससे पहले भी सरकार ने कई योजनाओं के माध्यम से राज्य में हरित क्षेत्र का विकास किया है। व्यापक तौर पर पौधरोपण कार्यक्रम चलाया जा रहा है। पौधरोपण में तकनीक का इस्तेमाल और वृक्षों के संरक्षण पर जोर दिया जा रहा है। भविष्य में के प्रयासों से प्रदेश में निरंतर बढ़ रहा हरित आवरण आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित और समृद्ध भविष्य की मजबूत नींव रख रहा है।

9 वर्षों में 247 करोड़ से अधिक पौधरोपण

पिछले 9 साल में योगी सरकार ने व्यापक अभियान चलाकर 247+ करोड़ पौधे लगाने में सफलता पाई। इसे एक ‘जन आंदोलन’ का रूप देकर संभव बनाया गया, जिसमें समाज ने नेतृत्व किया और सरकार ने सहयोगी की भूमिका निभाई। साल 2017 में सरकार के पास वृक्षारोपण के लिए मात्र 5.5 करोड़ पौधे थे, लेकिन 2026 में सरकारी और निजी नर्सरियों की क्षमता बढ़ाने से पौधों का स्टॉक 57 करोड़ हो चुके हैं।

इनमें सांस्कृतिक और औषधीय महत्व वाले पौधों की संख्या काफी है। इससे न केवल संख्या बढ़ेगी, बल्कि पौधों की प्रजातियों में भी गुणात्मक बदलाव आया है। राज्य में 948 ‘विशाल हेरिटेज वृक्षों’ को पहचान कर उन्हें संरक्षित किया गया है।

साल 2017 में प्रदेश में मात्र 9.18 फीसदी क्षेत्र हराभरा था। लेकिन वर्तमान में 9.96 फीसदी हिस्सा पेड़-पौधों से ढ़का हुआ है। सरकार पिछले 9 वर्षों में इंफ्रास्ट्रक्चर में अभूतपूर्व तरक्की की है। एक्सप्रेस वे, सड़क निर्माण, मेट्रो और दूसरी सुविधाओं को बढ़ावा देने के बावजूद वन क्षेत्रों को बढ़ाने में सफल रही है। यह सरकार की अहम उपलब्धि है।

2047 तक 20 फीसदी हिस्से होंगे वनक्षेत्र

2030 तक राज्य में वनक्षेत्र को बढ़ा कर 15 फीसदी करने का लक्ष्य रखा गया है। आजादी के सौ साल पूरे होने पर अर्थात 2047 तक राज्य का 20 फीसदी हिस्से में हरित विकास किया जाएगा।

वनावरण वृद्धि का राष्ट्रीय औसत 3.41फीसदी है जबकि उत्तर प्रदेश में 3.72 फीसदी की दर से हरित क्षेत्र का विकास हो रहा है यानी राष्ट्रीय औसत से 0.31 फीसदी ज्यादा। देश में वनावरण की दृष्टि से यूपी अभी दूसरे नंबर पर है। आर्थिक समीक्षा 2025-26 के मुताबिक, पौधरोपण का असर ये है कि राज्य में साल 2020-21 से 2024-25 के बीच वृक्षारोपण से 84.5 मिलियन टन कार्बन का अवशोषण हुआ है।

‘इंडिया स्टेट ऑफ फ़ॉरेस्ट रिपोर्ट (ISFR) 2023 के अनुसार, उत्तर प्रदेश में ग्रीन कवर एरिया में भारत की दूसरी सबसे बड़ी बढ़ोतरी दर्ज की गई है।

यह उपलब्धि राज्य द्वारा वृक्षारोपण, वृक्ष संरक्षण और पर्यावरणीय स्थिरता की दिशा में की जा रही लगातार कोशिशों को रेखांकित करती है और एक हरित उत्तर प्रदेश के निर्माण में एक और महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित होगी।

नदियों के किनारे औषधीय और छायादार फलदार युक्त पौधों के रोपण को बढ़ावा देने के लिए ‘गंगा बायोडायवर्सिटी पार्क’ की स्थापना की जा रही है। प्रत्येक जनपद में ‘अमृत वन’ स्थापित किए गए है।

सरकार की अमृत सरोवर योजना

राज्य में भूजल स्तर के गिरने और जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए अप्रैल 2022 में मिशन अमृत सरोवर की शुरुआत हुई। इसके तहत अब तक 19111 से अधिक अमृत सरोवरों का निर्माण कार्य पूरा किया जा चुका है, जबकि 25000 से अधिक अमृत सरोवरों का निर्माण किया जा रहा है। ऐसा करने वाला यूपी देश के अग्रणी राज्यों में से एक है।

अमृत सरोवरों का निर्माण ग्रामीण विकास विभाग करवा रहा है, जिसके लिए कम से कम एक एकड़ जमीन की जरूरत है और उसकी गहराई इतनी हो कि इसमें लगभग 10000 क्यूबिक मीटर पानी आ सके।

इतना ही नहीं पुराने तालाबों और दूसरे प्राकृतिक जल स्रोतों का भी वैज्ञानिक तरीके से पुनरुद्धार किया जा रहा है। अगर गहराई कम हो गई है तो उसे ठीक किया जा रहा है। किनारों की ढलान ठीक की जा रही है, ताकि वर्षा का पानी उसमें जा सके । इससे भूजल स्तर में और सुधार आएगा।

तालाबों, पोखरों के चारों ओर नीम, पीपल, बरगद, अर्जुन जैसे विशाल छायादार और औषधि वाले पेड़ लगाए जा रहे हैं और एक हरित पट्टी का निर्माण किया जा रहा है। इसका मकसद मिट्टी के कटाव को रोकना, भूजल स्तर बढ़ाने के साथ-साथ पर्यावरण संतुलन को मजबूत करना है।

नदियों का पुनरुद्धार और पौधरोपण कार्यक्रम

योगी सरकार पौधारोपण महायज्ञ-2026 के तहत राज्य से होकर बहने वाली गंगा- यमुना समेत 13 प्रमुख नदियों के किनारे पेड़-पौधे लगाकर उसे हरा-भरा बनाएगी। अविरल धारा पौधरोपण कार्यक्रम में नदियों के किनारे 5 किलोमीटर की परिधि में 2673 स्थलों पर 22240.11 हेक्टेयर क्षेत्र में 3.83 करोड़ से अधिक पौधे लगाए जाएँगे।

कार्यक्रम का मकसद नदियों की अविरल धारा के साथ-साथ आसपास के क्षेत्र को हराभरा बनाना है। इससे पर्यावरण संरक्षण के साथ साथ जल को प्रदूषित होने से बचाना और उसका संरक्षण करना है।

राज्य से बड़े बड़े शहरों से होकर जाने वाली गंगा की धारा स्वच्छ और प्रदूषण मुक्त बने, इसके लिए 603 स्थलों पर 4,495.72 हेक्टेयर में 79.86 लाख पौधे रोपे जाएँगे। जिन जगहों पर वृक्षारोपण में ज्यादा जोर होगा उनमें प्रयागराज, प्रतापगढ़, कौशांबी, फतेहपुर, वाराणसी, गाजीपुर, मीरजापुर, भदोही, काशी वन्यजीव शामिल हैं।

अभियान के तहत यमुना के किनारे वाले 647 स्थलों पर 6531.77 हेक्टेयर क्षेत्र में 1.08 करोड़ से अधिक पौधे रोपे जाएँगे।
इसके अलावा गोमती के किनारे 297 स्थलों पर 31.37 लाख पौधे लगाए जाएँगे, बेतवा नदी के तट पर 52.35 लाख पौधे, सरयू और घाघरा के किनारे 254 स्थलों पर 27.75 लाख पौधे लगाए जाएँगे।

सई नदी के किनारे 23.29 लाख पौधरोपण का लक्ष्य रखा गया है। राप्ती, छोटी गंडक, सोन, रामगंगा, केन, हिंडन और चंबल जैसी नदियों के तट को भी हराभरा बनाया जाएगा ताकि पर्यावरण संरक्षण कर भविष्य के लिए जल- जीवन- जमीन को संरक्षित किया जा सके। गोरखपुर में 1400 एकड़ के रामगढ़ ताल और 400-500 एकड़ में फैले चिलवा ताल का सफल संरक्षण भी किया गया है।

राज्य सरकार ने अब तक 3363 किलोमीटर लंबाई वाली 50 नदियों का पुनरुद्धार किया है। साथ ही ग्रामीण क्षेत्रों में 3388 तालाबों का निर्माण किया गया। इससे भूजल स्तर और जल संचयन के क्षेत्र में वृद्धि हुई है। किसानों को खेती और पशुपालन में इससे सहयोग मिल रहा है।

नमामि गंगे प्रोजेक्ट के साथ साथ मनरेगा ने भी इस अभियान में अहम भूमिका निभाई है। 2014-15 में शुरू हुई नमामि गंगे प्रोजेक्ट का लक्ष्य गंगा और उसकी सहायक नदियों के प्रदूषण उन्मूलन और पुनर्जीवन पर केन्द्रित है। निर्मल गंगा, अविरल गंगा, जन गंगा और ज्ञान गंगा के माध्यम से सीवेज प्रबंधन, पर्यावरण संरक्षण, सामूहिक भागीदारी और अनुसंधान पर जोर दिया गया।

विश्व बैंक के सहयोग से 2741 करोड़ रुपए की लागत से देश का पहला एयर शेड आधारित परियोजना यूपी कैप स्कीम शुरू की गई।

वन और पारिस्थितकी तंत्र का सफल जुड़ाव

वनक्षेत्र में वृद्धि का सीधा और सकारात्मक असर राज्य के वन्यजीव और पारिस्थितकी तंत्र पर पड़ा है। बाघों के संरक्षण के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ बनी हैं जिससे बाघों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। 2006 में इनकी संख्या 109 थी, जो 2022 में बढ़कर 205 हो गई है।

यह राष्ट्रीय बाघ आबादी का 5.6% है पीलीभीत टाइगर रिजर्व को बाघों की संख्या दोगुनी होने पर प्रतिष्ठित ‘TX2 अवार्ड’ दिया गया है और चित्रकूट के 53,000 हेक्टेयर क्षेत्र को चौथे ‘रानीपुर टाइगर रिजव’ के रूप में पहचाना गया है।

गंगा डॉल्फिन एवं सारस: देश की कुल 6,327 गंगा डॉल्फिन में से सबसे अधिक 2,397 डॉल्फिन (37.8%) उत्तर प्रदेश में पाई गई हैं। 2023 में इसे ‘राज्य जलीय जीव’ घोषित किया गया है। राज्य पक्षी सारस की संख्या साल 2021 के 17329 थी, जो 2025 में 20281 हो गई है।

गिद्ध संरक्षण: पारिस्थितकी तंत्र के लिए अहम माने जाने वाले रेड-हेडेड गिद्धों के संरक्षण के लिए देश का पहला ‘गिद्ध प्रजनन केन्द्र’ गोरखपुर में स्थापित किया गया है।

मानव-वन्यजीव संघर्ष को आपदा घोषित करने वाला यह देश का प्रथम राज्य है, जिसके तहत 2024 में 10 बाघ और 55 तेंदुए, 2025 में 19 बाघ, 54 तेंदुए और 02 भेड़ियों का सुरक्षित रेस्क्यू किया गया।

श्रावस्ती में ‘केन नाला’ को बायोडायवर्सिटी हेरिटेज साइट के रूप में विकसित किया गया है। 100 साल से अधिक पुराने पेड़ों को ‘विरासत वृक्ष’ घोषित कर संरक्षित किया जा रहा है। उदाहरण के लिए संरक्षित वृक्षों में बाराबंकी में 5000 साल पुराना पारिजात वृक्ष अहम है।

कार्बन क्रेडिट योजना से पर्यावरण का बचाव

किसानों के लिए देश की पहली कृषि-वानिकी के तहत ‘कार्बन क्रेडिट फाइनेंस योजना’ उत्तर प्रदेश में लागू की गई है। इससे किसानों को पयावरण अनुकूल खेती और वृक्षारोपण के बदले काबन डाइऑक्साइड अवशोषण की एवज में अतिरिक्त रकम मिल रही है। योजना के तहत किसानों को हर 5 साल में 06 डॉलर प्रति कार्बन क्रेडिट की दर से भुगतान किया जा रहा है।

पहले चरण में 6 मंडलों के 25140 किसानों को पंजीकृत किया गया है। राज्य में अब तक किसानों को आंशिक भुगतान के रूप में 49.05 लाख रुपए वितरित किए जा चुके हैं और 25 लाख दुधवा टाइगर नेशनल पार्क फाउंडेशन को दिए गए हैं।

प्रदूषण मुक्त ईवी योजना

राज्य सरकार ने वायु प्रदूषण से निपटने के लिए इलेक्ट्रिकल वाहनों को सपोर्ट कर रही है। इसके बुनियादी ढाँचे को बढ़ावा देने के लिए एक विस्तृत नीति लागू की गई है। योजना के तहत चार्जिंग स्टेशन लगाने वालों को प्रति यूनिट (उपकरण व बुनियादी ढाँचे की लागत का) ₹10 लाख तक की भारी सब्सिडी और रियायती बिजली दरें दी जा रही हैं। चार्ज पॉइंट ऑपरेटरों को चार्जर, अपस्ट्रीम इन्फ्रास्ट्रक्चर और बैटरी उपकरणों की लागत का 20% (प्रति यूनिट ₹10 लाख तक) सब्सिडी के रूप में मिलता है।

उत्तर प्रदेश विद्युत नियामक आयोग ने सार्वजनिक चार्जिंग स्टेशनों के लिए बिजली की दरें सामान्य औसत लागत से भी कम तय की हैं। राज्य में ‘पीएम ई-ड्राइव’ और राज्य की योजना के तहत हजारों नए चार्जिंग स्टेशन लगाए जा रहे हैं। लखनऊ, कानपुर, मेरठ, अयोध्या, प्रयागराज जैसे शहरों में पीपीपी मॉडल पर 714 नए ईवी स्टेशन स्थापित किए जा रहे हैं।

इतना ही नहीं राज्य में इलेक्ट्रिक वाहन खरीदने वालों को उत्तर प्रदेश इलेक्ट्रिक वाहन विनिर्माण एवं गतिशीलता नीति, 2022 के अंतर्गत सब्सिडी भी दी जा रही है। राज्य में पंजीकृत और निर्मित वाहनों के रोड टैक्स और रजिस्ट्रेशन फीस पर 100 फीसदी की छूट दी है, जो 13 अक्टूबर 2027 तक लागू है। इलेक्ट्रिक टू-व्हीलर पर ₹5,000, फोर-व्हीलर पर ₹1 लाख तक और ई-बसों पर ₹20 लाख तक की सब्सिडी दी जा रही है।

इसका असर ये हुआ है कि देश में सबसे ज्यादा इलेक्ट्रिक वाहन उत्तर प्रदेश में हैं। राज्य में रजिस्टर कराए गए इलेक्ट्रिक वाहनों की संख्या 4.14 करोड़ से ज्यादा हैं। दिल्ली दूसरे और महाराष्ट्र तीसरे नंबर पर है। यूपी में ईवी वाहनों में बड़ी संख्या ई-रिक्शा की है, जो करीब 85 फीसदी हैं।

सबसे ज्यादा ईवी रनिंग हाईवे वाला राज्य बना उत्तर प्रदेश

देश में सबसे ज्यादा 22 एक्सप्रेस वे उत्तर प्रदेश में हैं, जिनमें से यमुना एक्सप्रेस-वे, आगरा-लखनऊ एक्सप्रेस-वे, बुंदेलखंड एक्सप्रेस-वे, पूर्वांचल एक्सप्रेस-वे और गोरखपुर लिंक एक्सप्रेस-वे को ईवी रनिंग हाईवे बनाया जा चुका है साथ ही कई एक्सप्रेस वे पर काम जारी है। दिल्ली-आगरा यमुना एक्सप्रेस वे, आगरा-लखनऊ एक्सप्रेस वे पर फास्ट चार्जिंग स्टेशन स्थापित किए गए हैं। अब इन एक्सप्रेस वे पर ईवी वाहन सरपट दौड़ रही हैं।

सौर ऊर्जा के इस्तेमाल के लिए चलाए जा रहे पीएम सूर्य घर योजना का लाभ भी राज्य को काफी मिला है। अयोध्या के 18 नगर निगमों को सोलर सिटी के रूप में विकसित किया जा रहा है। उत्तर प्रदेश सौर ऊर्जा नीति 2022 के तहत अगले 5 वर्षों में 22000 मेगावॉट वाले सौर ऊर्जा परियोजना शुरू करने का लक्ष्य रखा गया है। 2017 में 288 मेगावॉट वाले सौर ऊर्जा परियोजना थे, जो अब 2815 मेगावाट बिजली पैदा करने वाले सौर ऊर्जा परियोजनाएँ राज्य में चल रही हैं।

राज्य में अवैध कब्जे के खिलाफ जोरदार अभियान चलाया जा रहा है और इसका भी फायदा पर्यावरण को मिल रहा है। कुकरेल में अवैध कब्जों को हटा कर वहाँ शानदार ‘सौमित्र वन’ स्थापित किया गया है। राज्य में अटल वन,एकलव्य वन, ऑक्सी वन और सिटी वन बनाए गए हैं। राज्य में भूमि संरक्षण पर भी काफी काम हुआ है।

रामसर साइट्स के तौर पर 10 आद्रभूमि का संरक्षण किया गया है। इनमें गंगा रिवर, बखीरा,सरसई नावर झील, असन,सूर सरोवर, हैदरपुर वेटलैंड, पार्वती अगरा,सांडी,समसपुर अहम हैं। इन्हें अंतरराष्ट्रीय मान्यता भी मिल चुकी है। गंगा नदी के किनारे वाले 275 आर्द्रभूमि को चिन्हित कर उनमें से 231 के लिए इंटीग्रेटेड वेटलैंड मैनेजमेंट प्लान का निर्माण किया गया है। ऐसा करने वाला उत्तर प्रदेश देश का दूसरा राज्य है।

शहरों को हरा भरा रखने के लिए भी कई योजनाएँ चल रही हैं। उत्तर प्रदेश शहरी हरित नीति इसके लिए योगी सरकार ने लागू किया है। इसके तहत मियावाकी वन वर्टिकल गार्डन और ग्रीन रूफ का विकास किया जा रहा है। सबसे अच्छे शहर को अल्टीमेट ग्रीन सिटी का खिताब दिया जाएगा। जीवाश्म इंधन पर निर्भरता कम करने के लिए ग्रीन हाइड्रोजन नीति 2024 लागू की गई है।

FIFA World Cup: मेस्सी के चमत्कार से अर्जेंटीना ने मिस्र को हराकर क्वार्टर फाइनल में की एंट्री, स्विट्जरलैंड भी बढ़ा आगे; महसूस करें बीती रात का रोमांच

एक मशहूर जापानी कहावत है – 七転び八起き, (Nana korobi ya oki). जिसका अंग्रेजी अनुवाद है – fall down seven times, stand up eight. यह कहावत हमें सिखाती है कि अक्सर सफलता असफलता को टालते रहने से नहीं अपितु हार ना मानने से मिलती है।

मंगलवार (7 जुलाई 2026) की रात हम सभी ने अर्जेंटीना की लातिन अमेरिकी टीम को मिस्र की जुझारू अफ्रीकी टीम के खिलाफ इस कहावत को सच करते देखा। कल जैसा खेल खेला गया, ऐसे मैच सालों में कभी-कभार देखने को मिलते हैं।

इस विश्व कप में पेराग्वे ने जर्मनी को मात दी थी। मोरक्को ने नीदरलैंड्स को परास्त किया था। हाल ही में नॉर्वे ने पाँच बार की विजेता ब्राजील का किला ढहा दिया था। यह कई यादगार मुकाबले रहे जहाँ गजब के उलटफेर देखने को मिले। फिर बेल्जियम ने 2-0 से पिछड़ने के बावजूद अंतिम क्षणों में सेनेगल को मात दे दी थी। ऐसे ही इस विश्व कप में कुल ग्यारह कमबैक अबतक देखने को मिले। हर दिन यहाँ कुछ नया और कुछ बीते दिन से ज्यादा रोचक होता जा रहा है। कल की रात भी अनूठी रही।

बीती रात फीफा विश्व कप के गत विजेता अपने खिताब की रक्षा करने अटलांटा स्टेडियम में अपने राउंड ऑफ 16 मुकाबले में मिस्र के फाराओज़ का सामना करने उतरे।

अल्बीसेलेस्त के कोच लियोनेल स्कालोनी ने 4-1-3-2 की फॉर्मेशन में अपनी टीम को मैदान में उतारा था। फॉरवर्ड लाइन में इस जंग में लियोनेल मेस्सी का साथ देने के लिए हूलियन अल्वारेज़ खड़े थे। उनके पीछे रॉड्रिगो दी पॉल, एंजो फर्नाडेज़ व एलेक्सिस मैकऐलिस्टर की तिकड़ी थी। रक्षापंक्ति में मोलीना, रोमेरो, लीसान्द्रो मार्टीनेज़ व ताग्लियाफीको थे और गोलपोस्ट की रक्षा करने एमिलियानो मार्टिनेज खड़े थे। गत विजेता अपने पिछले ही मुकाबले में काबो वर्दे के खिलाफ संघर्ष करते नजर आए थे। इस बार निश्चित ही उनपर जरूरत से ज्यादा दबाव था, यह साबित करने का कि आखिर क्यों वो पिछले संस्करण के विजेता हैं।

अर्जेंटीनी प्लेइंग इलेवन को मद्देनजर रखते हुए मिस्र के कोच होसाम हसन ने 4-2-3-1 की फॉर्मेशन में अपनी टीम को मैदान में उतारा था। उन्होंने मैच पूर्व यह जताया था कि उनका प्रयास होगा शुरुआती बढ़त लेकर अर्जेंटीना पर दबाव बनाने की। ऐसा नहीं है कि मिस्र कमजोर टीम है। उनके पास अर्जेंटीना को टक्कर देने हेतु अच्छे खिलाड़ियों का एक दल था जो मैच के अंतिम सेकेंड तक हार नहीं मानने वाला था। जो लोग सिर्फ विश्व कप के दौरान फुटबॉल देख रहे हैं वह मिस्र की टीम की मजबूती का अंदाजा इस बात से भी लगा सकते हैं कि इतने बड़े मैच में भी कोच होसाम हसन ओमार मारमूश जैसे खतरनाक स्ट्राइकर को बेंच पर रखने का साहस कर रहे थे।

रेफरी फ्रैंक्वा लेतेक्ज़िर की व्हिस्ल के साथ 67500+ दर्शकों से खचाखच भरे अटलांटा स्टेडियम में इस बहुप्रतीक्षित मुकाबले की शुरुआत हो जाती है।

मिस्र के खिलाड़ियों के पास खोने के लिए कुछ भी न था। सुन त्ज़ू ने ‘द आर्ट ऑफ वार’ में लिखा है ना कि अटैक इज़ द बेस्ट वे टू डिफेंड; कुछ ऐसा ही करते हुए कोच होसाम हसन के निर्देशानुसार उनकी टीम मैच के पहले मिनट से ही अटैकिंग फुटबॉल खेलते हुए दिखती है।

प्रयास था कि मैच के शुरुआती पलों में ही एक सरप्राइज एलिमेंट क्रिएट करते हुए गोल दाग कर अर्जेंटीनी टीम को बैकफुट पर ले आया जाए। और, उनको इस में जल्द ही सफलता भी मिल जाती है।

मैच के चौदहवें मिनट में मिस्र को एक कॉर्नर किक मिलती है। वह शॉर्ट कॉर्नर लेते हुए एक अटैकिंग मूव बनाने का प्रयास करते हैं। छोटे पासों से गेंद मैदान के दाईं छोर पर खड़े खिलाड़ी मारावां अत्तिया की ओर खिसका दी जाती है जो तुरंत अर्जेंटीनी बॉक्स में एक बेहद नपा तुला क्रॉस डालते हैं। वहाँ मिस्र के पाँच खिलाड़ी मौजूद थे। गेंद यासेर इब्राहिम की ओर जाती है, जो एक जोरदार हेडर से गेंद को गोलपोस्ट के भीतर भेज देते हैं। अर्जेंटीनी टीम को काटो तो खून नहीं।

लेकिन इस थ्रिलर में अभी और भी ट्विस्ट आने बाकी थे। एक अर्जेंटीनी खिलाड़ी को अटैकिंग पोजीशन में मिस्र के बॉक्स में फाउल कर दिया गया। नतीजतन मिस्र के गोल के सात-आठ मिनट के अंदर ही अर्जेंटीना को एक पेनाल्टी मिल जाती है। उनके पास इस नॉकआउट मैच में वापसी का सुनहरा मौका आ गया था। कप्तान लियोनेल मेस्सी आगे बढ़कर गेंद को हाथों में लेते हैं। अर्जेंटीनी समर्थक गोल की आस लिए उनकी ओर नजरें गड़ाए बैठे थे। स्टेडियम एक पल के लिए खामोश था।

रेफरी का इशारा मिलते ही मेस्सी गेंद की ओर दौड़ते हैं। वह गोलकीपर की बांई ओर एक किक लगाते हैं। मगर यह क्या हो गया था। उनकी पेनाल्टी मिस्र के बड़े फुटबॉल क्लब अल अहली के लिए खेलने वाले गोलकीपर मोस्तफा शोबिर द्वारा रोक ली गई थी। एक पल के लिए तो सारे स्टेडियम में सन्नाटा पसरा हुआ था।

मिस्र के कोच आगे बढ़कर दर्शकों की ओर बढ़ कर हाथ हवा में लहराते हैं। अपने गोलकीपर द्वारा किए इस बचाव का मोल वो जानते थे। ऐसे बड़े अहम समय में किया गया यह पेनाल्टी सेव किसी गोल से कम नहीं था। मिस्र लगातार हमले करने लगती है। अर्जेंटीना भी तुरंत कुछ जवाबी हमले करती है। मेस्सी विपक्षी गोलपोस्ट पर निशाना साधते हैं मगर गोलकीपर द्वारा बचाव कर लिया जाता है। हूलियन अल्वारेज़ भी एक शानदार शॉट लगाते हैं मगर वह भी गेंद को गोलपोस्ट के भीतर नहीं भेज पाते। हाफ टाइम की समाप्ति पर स्कोर 1-0 रहता है। सारी दुनिया को चौंकाते हुए मिस्र ने गत विजेता पर बढ़त बनाई हुई थी।

अगले हाफ का खेल शुरू होता है। लिएंद्रो पारेदेस गोलकीपर मोस्तफा शोबिर के पोस्ट पर हमला करते हैं, जिसे गोलकीपर द्वारा बचा लिया जाता है। मैच के साठवें मिनट में मिस्र फिर एक गोल जड़ देती है। मगर VAR द्वारा गोल रद्द कर दिया जाता है। मैच के छियासठवें मिनट में अर्जेंटीनी कोच लियोनेल स्कालोनी एक मिडफील्डर को बाहर कर स्ट्राइकर लाऊतारो मार्टीनेज़ को और एक डिफेंडर को बाहर कर एक मिडफील्डर को मैदान में उतारते हैं। मकसद साफ था – कैसे भी एक गोल दागा जाए और मैच में वापसी संभव करी जाए।

लेकिन कोच लियोनेल स्कालोनी को तब झटका लगता है जब इन सब्स्टीट्यूशन्स के दो मिनट बाद ही मिस्र की टीम बिजली की गति से काउंटर अटैक करती है और हासेम हसन से मिले बेहद शानदार पास को गोल में तब्दील करने में मोस्तफा ज़िको कोई ग़लती नहीं करते। संपूर्ण विश्व में फुटबॉल को चाहने वाले इसपर यकीन ही नहीं कर पा रहे थे। मिस्र की टीम ने गत चैंपियन के खिलाफ 2-0 से बढ़त बना ली थी। स्टेडियम में लाल रंग की जर्सी में बैठे मिस्र की टीम के तमाम चाहने वाले झूमने लगे थे। उनका बस एक मैच देखने अपने घरों से हजारों किलोमीटर दूर आना सार्थक हो गया था। वो खुशी से झूम रहे थे।

अर्जेंटीनी मैनेजमेंट कुछ समझ ही नहीं पाया था। मैदान के भीतर उनके तमाम खिलाड़ियों के माथे पर अब चिंता की लकीरें साफ साफ दिखने लगी थीं। सिवाय मेस्सी के, वह लगातार किसी उधेड़बुन में थे। जैसे जैसे खेल आगे बढ़ रहा था, सारी दुनिया में खेल समर्थकों को लगने लगा था कि शायद आज, नेमार की भांति, लियोनेल मेस्सी को भी वो एक अंतिम बार खेलते देख रहे हैं।

लिसांद्रो मार्टिनेज़ गोलपोस्ट पर एक जोरदार किक लगाते हैं। मगर स्कोर अब भी 2-0 ही था। खेल के दूसरे हाफ का हाइड्रेशन ब्रेक भी समाप्त हो जाता है। खेल जैसे आगे बढ़ता जा रहा था, अर्जेंटीनी डगआउट में सभी लोग उम्मीद खोते जा रहे थे। ऐसा लगने लगा था कि शायद आज एक और बड़ा उलटफेर होने जा रहा था।

ऐसा लग रहा था मैदान पर मौजूद कोई भी खिलाड़ी आज थक ही नहीं रहा था। वह पूरा ग्राउंड कवर कर रहे थे और अर्जेंटीना के खिलाड़ियों पर लगाम लगाए हुए थे। मगर मेस्सी किसी वन में मंडराते हिरन की भांति मिस्र की डिफेंसिव लाइन में बारम्बार सेंध लगाए जा रहे थे।

मैच का उन्यासीवाँ मिनट। अर्जेंटीनी टीम छोटे पासों के साथ हाफ लाइन से गेंद को आगे लेकर बढ़ती है। गेंद हूलियन अल्वारेज़ के पास आती है जिसे वो दाईं फ्लैंक पर खड़े मेस्सी की ओर बढ़ाते हैं। मेस्सी मिस्र के बॉक्स का मुआयना करते हैं और तुरंत एक बेहतरीन क्रॉस अंदर डालते हैं। अंदर कूटी रोमेरो अकेले खड़े थे। वह एक जोरदार हेडर लगाते हैं और गेंद जाल से लिपट जाती है। स्कोर 2-1 हो गया था।

चार मिनट बाद एक दफा फिर मैदान के दाईं छोर से ही लियोनेल मेस्सी गेंद को गोलपोस्ट की दिशा में भेजते हैं। अंदर चार अर्जेंटीनी खिलाड़ी मौके की तलाश में खड़े थे। गेंद छिटक कर गोंजालो मोंटील की ओर जाती है जो गेंद को लियोनेल मेस्सी की ओर सरका देते हैं। मेस्सी मौका मिलते ही एक जोरदार लेफ्ट फुटर लगाकर गेंद को गोलकीपर मोस्तफा शोबिर के गोलपोस्ट के भीतर पहुँचा देते हैं। चार मिनट में दो गोल दाग कर अर्जेंटीना ने इस मैच में वापसी कर ली थी।

यह इक चमत्कार सरीखा था। किसी ने भी सोचा नहीं था कि ऐसी स्थिति से भी अर्जेंटीना मैच में वापसी कर सकती थी। मगर नब्बे मिनट पूर्ण हो चले थे और स्कोर 2-2 हो गया था। सारा स्टेडियम एक बार फिर अर्जेंटीनी समर्थकों के शोर से गुंजायमान हो उठा था।

खेल आगे बढ़ता है। ऐसा प्रतीत होता दिख रहा था कि मैच अब एक्स्ट्रा-टाइम में जाएगा और अपने पिछले मैच के बाद एक बार दुबारा अर्जेंटीना को 120 मिनट की थका देने वाली फुटबॉल खेलनी होगी।

लेकिन आज इस मैच में हर पल एक नया मोड़ आते जा रहा था। खेल अभी समाप्त नहीं हुआ था। 90+2। अर्जेंटीना एक बार फिर काउंटर अटैक करने के इरादे से आगे बढ़ती है। नौ नंबर की जर्सी पहने हूलियन अल्वारेज़ गेंद को मैदान की दाईं दिशा में लंबा पास डालकर लाउतारो मार्टिनेज की ओर बढ़ाते हैं। लाउतारो एक सटीक क्रॉस गोलपोस्ट की ओर डालते हैं। वहाँ एंजो फर्नानदेज़ मौजूद थे, जो एक जबरदस्त हेडर लगा कर गेंद को तीसरी दफा मिस्र के गोलपोस्ट के भीतर भेज चुके थे। अर्जेंटीना ने अंतिम क्षणों में एक गोल दाग दिया था। अर्जेंटीना एक बेहद शानदार कमबैक को अंजाम दे चुका था।

दुनिया भर के तमाम फुटबॉल को चाहने वालों को यकीन ही नहीं हो रहा था कि आखिर उन्होंने यह क्या देख लिया था। यह रोमांच का चरमोत्कर्ष था। इस मैच में क्रिस्टोफर नोलान के सिनेमाई संसार से ज्यादा रौंगटे खड़े कर देने वाले लम्हें थे। अगर अर्जेंटीना यह मैच हार जाती, तो पेनाल्टी छोड़ने के चलते मेस्सी आज एक विलेन बना दिए जाते। दुनिया भर में हजारों रोनाल्डो समर्थक अपने अपने कीबोर्ड के समीप तैयार बैठे थे – उन्हें सूली पर चढ़ाने के लिए।

मगर मैच खत्म होने तक एक असिस्ट और एक शानदार गोल के साथ उन्होंने हमें एक ऐसे रोमांचक मैच का साक्षी बना दिया था जिसे वर्षों तक याद किया जाएगा। जब जब समाज में आतंक बढ़ता है, ऊपर बैठे भगवान को धरा पर उतरना पड़ता है। आज दुनिया भर के फुटबॉल प्रेमियों ने भगवान के साक्षात दर्शन कर लिए थे। इससे बढ़ कर अब और क्या ही लिखा जा सकता है।

मेस्सी विश्व कप के विभिन्न संस्करणों में अब कुल इक्कीस गोल कर चुके हैं। यह किसी भी खिलाड़ी द्वारा विश्व कप में लगाए गोलों में सर्वाधिक संख्या है। मेस्सी इस विश्व कप में आठ गोल दाग चुके हैं। यह किसी भी खिलाड़ी द्वारा इस विश्व कप में लगाए गोलों में सर्वाधिक संख्या है। वह विश्व कप के इतिहास में दस दफा मैं ऑफ द मैच के पुरुस्कार से नवाजे जा चुके हैं। वह विश्व कप के नॉकआउट चरण में लगातार छह मैचों में गोल लगाने वाले इकलौते खिलाड़ी भी बन गए हैं।

गौरतलब है कि सदैव इनकी तुलना में खुद को श्रेष्ठ बतलाने वाले क्रिस्टियानो रोनाल्डो ने 2006 विश्व कप से इस प्रतियोगिता का हिस्सा होते हुए भी विश्व कप के नॉकआउट चरण में मात्र एक गोल स्कोर किया है।

खैर गुजरी रात का अगला मैच वैंकूवर में खेला गया था। यहाँ स्विट्जरलैंड का सामना था इस टूर्नामेंट में कमाल का फुटबॉल खेल रही कोलंबिया की टीम से। एक ओर ग्रानित झाका, ब्रीद एम्बोलो व मेनुअल अकांजी की स्विस टीम थी, जो अब तक उम्मीदों से बढ़ कर प्रदर्शन कर रही थी। वहीं कोलंबिया ने भी अबतक अपने दो नायकों जेम्स रॉड्रिगुएज़ व लुइस डियाज़ के नेतृत्व में हर मुश्किल का डट कर सामना किया था। यह दो राष्ट्रों की जिद की टक्कर होने जा रही थी।

देखना यह था कि क्या जेम्स रॉड्रिगुएज़ व लुइस डियाज़ कोलंबिया के लिए गोल दाग उन्हें क्वार्टर फाइनल का टिकट दिल पाएँगे? या अल्जीरिया को हराकर यहाँ तक पहुँची स्विट्जरलैंड एक बार फिर एक कमाल कर दिखाएगी। दोनों ही टीमें अपने इस हसीन ख्वाब को टूटते हुए नहीं देखना चाहती थीं।

इस मैच में हालाँकि नब्बे मिनट का खेल खेले जाने तक दोनों ही टीमें गोल स्कोर करने में नाकाम रहती हैं। खेल एक्स्ट्रा-टाइम में जाता है। फिर भी 0-0 के स्कोर के साथ दोनों ही टीमें बराबरी पर रहती हैं। अब मैच का परिणाम पेनाल्टी शूटआउट से होना था। पेनाल्टी शूटआउट एक काफी क्रूर विधा है, जहां किसी भी दिन कुछ भी हो सकता है। आप नब्बे मिनट तक अच्छा खेल कर भी हारी हुई टीम कहला सकते हैं। खैर, रेफरी के इशारे पर पेनाल्टी शूटआउट की शुरुआत होती है। दोनों टीमों के खिलाड़ी हाफ-लाइन पर इकट्ठा हो जाते हैं व गोलकीपर गोलपोस्ट की ओर बढ़ते हैं। स्टेडियम में दोनों ही टीमों के समर्थकों में खलबली मची हुई थी। सब बेकरार थे यह जानने के लिए की कौन सी टीम अगले दौर में जगह बनाएगी।

स्विट्जरलैंड के लिए अनुभवी खिलाड़ी मैनुएल अकांजी अपनी पेनाल्टी को गोल में नहीं बदल पाते। वहीं, कोलंबिया के लिए दाविन्सन सान्चेज़ व कूचो हर्नान्देज़ अपनी अपनी पेनाल्टी को गोल में तब्दील करने से चूक जाते हैं। नतीजतन पेनाल्टी शूटआउट में स्विट्जरलैंड कोलंबिया को 4-3 से हरा देती है। हताश दाविन्सन सान्चेज़ की नजरें आसमान पर गढ़ गई थीं। उदासी की गहराइयों में उतर चुके कूचो हर्नान्देज़ को उनके साथी खिलाड़ी ढाँढस बंधा रहे थे।

स्टेडियम में मौजूद स्विस दर्शकों का जुनून देखते ही बनता था। कोलंबिया इस विश्व कप में अच्छा प्रदर्शन करने के बावजूद टूर्नामेंट से बाहर हो गई थी। वह वापस अपने वतन लौटेंगे और स्विट्जरलैंड क्वार्टर फाइनल में गत विजेता से भिड़ती नज़र आएगी। यह उनके संपूर्ण राष्ट्र को कितनी खुशी देगा इसका अंदाजा भी लगाना शायद हमारे लिए मुमकिन नहीं।

यही फुटबॉल का जादू है। अपने दिन में मिस्र या काबो वर्दे भी अर्जेंटीना को जीत दर्ज करने के लिए तरसा देती है। आप होंगे विश्व विजेता, मगर यहाँ हर किसी को हर दिन अपनी काबिलियत साबित करनी होती है। यह दुनिया शूरवीरों को सलाम करती है – उनकी वीरता के लिए। और, अगर आप कसौटी पर खरा उतरते हैं, तो आपकी जय-जयकार होनी निश्चित ही है।

अब आगे शुक्रवार से क्वार्टर फाइनल मुकाबले खेले जाएंगे। पहले ही क्वार्टर फाइनल में कल रात भारतीय समयानुसार डेढ़ बजे, बेहतरीन फॉर्म में चल रही मोरक्को की टीम पिछले संस्करण की उपविजेता फ्रांस से भिड़ेगी। मोरक्को के पास अंत तक हार न मानने का जज़्बा है। फ्रांस के पास एक बवंडर की भांति अटैक करने वाली टीम। यह निश्चित रूप से एक यादगार समर होगा। एटलस लायंस क्या लेस ब्ल्यूज़ का रथ रोक सकेंगे यह पता चलेगा कल बोस्टन में होने जा रहे इस मुकाबले के बाद।

बने रहिए साथ। वीवा ला फुटबॉल।

40 दिनों में 70 बार राम मंदिर चढ़ावे की चोरी, CCTV कैमरों में रिकॉर्ड: जानिए SIT ने अपनी रिपोर्ट में क्या क्या बताया, OpIndia Exclusive

अयोध्या के प्रसिद्ध श्री राम जन्मभूमि मंदिर में श्रद्धालुओं द्वारा पूरी श्रद्धा से चढ़ाए गए दान की राशि में हेराफेरी और गबन का एक बेहद गंभीर मामला सामने आया है । मामला संज्ञान में आने के बाद उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने 13 जून 2026 को SIT का गठन किया था।

SIT ने मामले की जाँच करने के बाद अपनी प्रारंभिक रिपोर्ट शासन के अपर मुख्य सचिव (गृह) को सौंप दी है । SIT ने उत्तर प्रदेश शासन को जो रिपोर्ट सौंपी है उसकी एक कॉपी आपइंडिया के पास भी है।

इस टीम की अध्यक्षता लखनऊ मंडल के आयुक्त विजय विश्वास पंत (IAS) को दी गई थी। उनके साथ पुलिस स्तर पर जाँच की जिम्मेदारी आईजी रेंज किरन एस (IPS) को सौंपी गई थी, जो मामले के आपराधिक पहलू और सोशल मीडिया पर फैली अफवाहों की भी जाँच कर रहे थे।

वहीं वित्त विभाग के विशेष सचिव नील रतन को दान राशि, ऑडिट और सभी वित्तीय प्रक्रियाओं की तकनीकी जाँच की जिम्मेदारी दी गई थी। इस विशेष रिपोर्ट में मंदिर के चढ़ावे की चोरी से लेकर सुरक्षा व्यवस्था में हुई बड़ी मानवीय और प्रशासनिक लापरवाहियों का सिलसिलेवार ब्योरा दिया गया है, क्योंकि यह पूरा मामला सीधे तौर पर करोड़ों भक्तों की जनभावना, अटूट आस्था और विश्वास से जुड़ा हुआ है।

SIT की रिपोर्ट की कॉपी

जनभावनाओं के दबाव के बाद ऐसे शुरू हुई SIT की जाँच

इस पूरे मामले की शुरुआत तब हुई जब सोशल मीडिया के जरिए मंदिर के चढ़ावा चोरी की खबरे चलने लगी। इन खबरों के कारण आम जनता के मन में मंदिर के प्रबंधन को लेकर सवाल उठने लगे थे।

आम लोगों की इसी गहरी आस्था और भावनाओं को ध्यान में रखते हुए श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने 12 जून 2026 को सरकार को एक लेटर भेजा।

इस लेटर में ट्रस्ट ने जनभावनाओं के आदर और पारदर्शिता के लिए पूरे प्रकरण की जाँच  विशेष जाँच दल से कराने का अनुरोध किया था। इसके बाद उत्तर प्रदेश के गृह विभाग ने बिना समय गंवाए SIT का गठन किया, जिसने अपनी शुरुआती जाँच  में पाया कि चढ़ावे की गिनती के दौरान वाकई में कुछ सेवारत कर्मियों ने पैसों की चोरी की है।

सोशल मीडिया पर उड़ीं अफवाहों का सच आया सामने

अपनी जाँच के दौरान SIT ने सोशल मीडिया और समाचार माध्यमों पर चल रही उन खबरों का भी बारीकी से संज्ञान लिया, जिनमें करोड़ों के चढ़ावे और बहुमूल्य वस्तुओं के गायब होने के आरोप सीधे ट्रस्ट पर लग रहे थे।

इसमें मुख्य रूप से तीन बड़ी खबरें थीं। पहली खबर इंडियन बुलियन एंड ज्वेलर्स एसोसिएशन के उत्तर भारत के प्रमुख अनुराग रस्तोगी और सराफा एसोसिएशन द्वारा 38kg और 22 Kg से ज्यादा की चाँदी की ईंटें दान करने और उनके गायब होने से जुड़ी थी।

दूसरी खबर विश्व सिंधी सेवा समाज के अध्यक्ष राजू मंडवानी द्वारा बिना रसीद के 200Kg चाँदी की ईंटें भेंट करने के दावे की थी । तीसरी खबर मुंबई के व्यवसायी अनिल विश्वकर्मा के चाँदी के हार और चरण पादुकाओं को लेकर थी।

ऑपइंडिया के पास मौजूद SIT रिपोर्ट के अनुसार, जब ट्रस्ट के बही-खातों और रिकॉर्ड का मिलान किया तो पाया कि सराफा संगठनों की चाँदी को तय प्रक्रिया के तहत गलाकर बैंक लॉकर में सुरक्षित रखा गया है।

वहीं सिंधी समाज और मुंबई के व्यवसायी का सारा सामान भी ट्रस्ट की सुरक्षित अभिरक्षा में मिला। इस तरह सोशल मीडिया के ट्रस्ट पर लगाए आरोप पूरी तरह झूठे साबित हुए, लेकिन SIT ने यह जरूर कहा कि भविष्य में ऐसी अफवाहों से बचने के लिए प्रबंधन व्यवस्था को और मजबूत तथा जवाबदेह बनाने की सख्त जरूरत है।

CCTV कैमरों की फुटेज ने खोला चोरी का पूरा राज

इस गबन का सबसे बड़ा और पुख्ता प्रमाण मंदिर परिसर के भीतर लगे CCTV कैमरों की फुटेज खंगालने से मिला है। हालाँकि SIT को केवल 27 अप्रैल 2026 से लेकर 5 जून 2026 तक की ही फुटेज मिल सकी क्योंकि कैमरों की डेटा इकट्ठा करने की क्षमता सीमित होने के कारण पुरानी फुटेज अपने आप मिट चुकी थी।

लेकिन जितने दिनों के भी रिकॉर्डिंग मौजूद थे, उसने चोरी की बात को सामने लाकर रख दिया। इतने काम समय में ही CCTV कैमरों में कुल 70 चोरी की वारदातें साफ तौर पर रिकॉर्ड पाई गईं।

वीडियो फुटेज में देखा गया कि पैसे गिनने वाले कुछ खास कर्मचारी नोटों की गड्डियों और खुले नोटों को चुपके से अपने कपड़ों, जेबों और जूतों के भीतर छिपा रहे थे, जबकि कुछ अन्य कर्मचारी उन्हें आड़ देकर इस काम में मदद कर रहे थे।

पकड़े गए कर्मचारियों के बयानों और उनके बैंक खातों के लेन-देन से यह भी साफ पता चलता है कि यह चोरी 27 अप्रैल से बहुत पहले से ही लगातार की जा रही थी ।

तय सुरक्षा नियमों की धज्जियाँ उड़ाने से हुआ बड़ा नुकसान

SIT ने अपनी रिपोर्ट में साफ किया है कि यह अपराध सिर्फ एक सामान्य भूल नहीं थी, बल्कि सुरक्षा नियमों की जानबूझकर की गई घोर लापरवाही का नतीजा थी। चढ़ावे के प्रबंधन के लिए ट्रस्ट और भारतीय स्टेट बैंक के बीच बकायदा एक समझौता (MoU) और मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) तैयार की गई थी।

इसके तहत गिनती करने वाले कर्मचारियों के लिए बिना जेब वाले विशेष कपड़े पहनना, बायोमेट्रिक हाजिरी लगाना, मोबाइल फोन और निजी सामान को कमरे से बाहर रखना, दान पात्रों को अलग-अलग गिनना और कमरे में आते-जाते समय सुरक्षाकर्मियों द्वारा तलाशी लेना अनिवार्य था।

लेकिन इन नियमों का बिल्कुल भी पालन नहीं किया गया । हद तो तब हो गई जब 6 फरवरी 2026 को बनी नई SOP में रोज होने वाली सख्त तलाशी के नियम को ढीला करके केवल ‘नियमित या रैंडम’ तलाशी का नियम जोड़ दिया गया।

इसके अलावा साल 2022 से 2026 तक की इन्टर्नल ऑडिट रिपोर्टों में भी इन कमियों को बार-बार सामने लाया गया था और 180 दिनों तक का CCTV बैकअप रखने की स्पष्ट सलाह दी गई थी, लेकिन ट्रस्ट के पदाधिकारियों ने इन चेतावनियों को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया ।

आरोपितों की नियुक्तियाँ और बैंक खातों का चौंकाने वाला खेल

SIT ने मुख्य रूप से छह कर्मचारियों को इस चोरी में सीधे तौर पर संलिप्त पाया है जिनमें अविनाश शुक्ला, अनुकल्प मिश्रा, लवकुश मिश्रा, मनीष कुमार यादव, करुणेश पांडेय और रमाशंकर मिश्रा शामिल हैं।

SIT की रिपोर्ट की कॉपी

ये सभी लोग एक प्राइवेट एजेंसी के माध्यम से बैंक द्वारा इस काम पर लगाए गए थे, लेकिन इनकी नियुक्तियाँ खुद ट्रस्ट के ही कुछ पदाधिकारियों की सिफारिशों पर की गई थीं।

उदाहरण के लिए आरोपित मनीष कुमार यादव की नौकरी उसके ताऊ रामशंकर यादव उर्फ टिन्नु की सिफारिश पर लगी थी, जो खुद बिना किसी आधिकारिक आदेश या प्राधिकार के मंदिर के दान पात्रों की मुख्य चाबियाँ अपने पास रखते थे।

मजे की बात यह है कि इन कर्मियों का मासिक वेतन कटने के बाद केवल 15 हजार के आसपास था, लेकिन जाँच में इनके और इनके सगे-संबंधियों के बैंक खातों में भारी मात्रा में नकदी और बड़ी-बड़ी फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) जमा मिली हैं।

यही नहीं SIT के गठन से पहले ही ट्रस्ट ने इनके पास से करीब 78 लाख 94 हजार की नकदी, विदेशी मुद्रा और आभूषण बरामद किए थे, जबकि 4 जून को गिनती कक्ष के पास वाले बाथरूम से भी सवा दो लाख रुपए लावारिस हालत में मिले थे ।

लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों और चोरों पर दर्ज होगी FIR

इस पूरी शुरुआती जाँच के आधार पर SIT ने दोषी कर्मचारियों के साथ-साथ अपनी जिम्मेदारियों से मुंह मोड़ने वाले अधिकारियों पर भी सख्त कानूनी शिकंजा कसने की मजबूत सिफारिश की है।

सीधे तौर पर चोरी करने वाले 6 आरोपितों के खिलाफ गंभीर धाराओं में मुकदमा दर्ज करने की बात कही गई है । इसके साथ ही गिनती कक्ष के प्रभारी सुभाष श्रीवास्तव, जिन्होंने इस पूरी ढीली और अनौपचारिक व्यवस्था को चुपचाप चलने दिया और नियमित तलाशी नहीं होने दी, उनके खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने के निर्देश दिए गए हैं।

वहीं बिना किसी लिखित अधिकार के चाबियों को अपने कब्जे में रखने वाले और अपने रिश्तेदार की पैरवी करने वाले रामशंकर यादव उर्फ टिन्नु के खिलाफ भी साजिश रचने के आरोप में रिपोर्ट में दर्ज की गई।

SIT के अध्यक्ष विजय विश्वास पंत, सदस्य किरण एस तथा नील रतन ने स्पष्ट किया है कि यह केवल एक प्रारंभिक रिपोर्ट है अंतिम विस्तृत रिपोर्ट जाँच पूरी होने के बाद भेजी जाएगी ।

इंडोनेशिया के प्रम्बानन मंदिर के संरक्षण में मदद करेगी भारत सरकार, कई देशों के हिंदू मंदिरों को देती रही है मदद: समझिए इन सभी में PM मोदी की भूमिका कितनी अहम

भारतीय संस्कृति और सभ्यता की जड़ें केवल भारतीय उपमहाद्वीप तक ही सीमित नहीं रही हैं, बल्कि सदियों से इसका प्रसार सुदूर पूर्व से लेकर खाड़ी देशों तक रहा है। समय के थपेड़ों और ऐतिहासिक उथल-पुथल के कारण इन देशों में मौजूद कई प्राचीन भारतीय सांस्कृतिक धरोहरें जर्जर हो गईं या नष्ट कर दी गईं।

आधुनिक युग में भारत सरकार ने अपनी विदेश नीति और सांस्कृतिक कूटनीति के एक प्रमुख हिस्से के रूप में इन वैश्विक धरोहरों के संरक्षण और जीर्णोद्धार का बीड़ा उठाया है। इस अभियान का एक बेहद जीवंत और ऐतिहासिक दृश्य प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इंडोनेशिया दौरे के दौरान देखने को मिला।

अपनी इंडोनेशिया यात्रा के समय प्रधानमंत्री ने वहाँ के सबसे बड़े और ऐतिहासिक हिंदू मंदिर परिसर ‘प्रम्बानन’ (Prambanan) का दौरा करेंगे। प्रम्बानन मंदिर न केवल इंडोनेशिया की स्थापत्य कला का एक अद्भुत उदाहरण है, बल्कि यह दक्षिण-पूर्व एशिया में भारतीय संस्कृति, रामायण और महाभारत के गहरे ऐतिहासिक प्रभावों को भी प्रदर्शित करता है।

प्रधानमंत्री की इस यात्रा ने दुनिया को यह संदेश दिया कि भारत अपनी सीमाओं से परे बिखरी हुई इस साझी सांस्कृतिक विरासत को न केवल सम्मान देता है, बल्कि इसके संरक्षण के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। इंडोनेशिया के बाली, सुमात्रा और जकार्ता जैसे क्षेत्रों में आज भी भारतीय संस्कृति की गहरी छाप दिखाई देती है।

इसी प्रतिबद्धता के तहत भारत सरकार ने कंबोडिया, वियतनाम, लाओस, बांग्लादेश, श्रीलंका और बहरीन जैसे कई देशों में स्थित ऐतिहासिक मंदिरों के जीर्णोद्धार और पुनर्निर्माण के लिए वित्तीय एवं तकनीकी सहायता प्रदान की है, जिससे इन देशों के साथ भारत के संबंध और अधिक प्रगाढ़ हुए हैं।

इंडोनेशिया में 1100 साल पुरानी हिंदू विरासत को मिलेगा नया संबल: जानें प्रम्बानन मंदिर का इतिहास

प्रम्बानन मंदिर का निर्माण 9वीं शताब्दी के मध्य, लगभग 850 ईस्वी में संजय राजवंश के राजा राकाई पिकातन के शासनकाल में कराया गया था। यह इंडोनेशिया का सबसे बड़ा हिंदू मंदिर परिसर और दक्षिण-पूर्व एशिया के सबसे विशाल हिंदू धार्मिक स्थलों में शामिल है।

प्रम्बानन मंदिर (फोटो साभार: worldhistory)

अपने मूल स्वरूप में इस परिसर में लगभग 240 छोटे-बड़े मंदिर थे, जिनमें ब्रह्मा, विष्णु और भगवान शिव को समर्पित त्रिमूर्ति मंदिर सबसे प्रमुख हैं। इनमें भगवान शिव का केंद्रीय मंदिर लगभग 47 मीटर ऊँचा है, जिसे पूरे परिसर का मुख्य आकर्षण माना जाता है।

इस मंदिर में भगवान शिव के साथ माता पार्वती, भगवान गणेश और महर्षि अगस्त्य की प्राचीन प्रतिमाएँ भी स्थापित हैं। प्रम्बानन की दीवारों पर पत्थरों पर उकेरी गई रामायण और भागवत पुराण की कथाएँ इस बात का प्रमाण हैं कि भारतीय महाकाव्यों का प्रभाव सदियों पहले इंडोनेशिया के सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन में गहराई तक पहुँच चुका था।

मंदिर परिसर में स्थित खुले मंच पर आज भी प्रसिद्ध ‘प्रम्बनन रामायण बैले’ का मंचन होता है, जिसमें रामायण की कथा को नृत्य और संगीत के माध्यम से प्रस्तुत किया जाता है। यह आयोजन दुनिया भर के पर्यटकों को आकर्षित करता है। वर्ष 1991 में यूनेस्को ने पराम्बनन मंदिर परिसर को विश्व धरोहर स्थल घोषित किया था।

हिंदू-बौद्ध साम्राज्यों की विरासत आज भी जीवंत

लगभग 27 करोड़ की आबादी वाले इंडोनेशिया में करीब 24 करोड़ लोग इस्लाम धर्म का पालन करते हैं, लेकिन इस्लाम के आगमन से पहले यहाँ कई शताब्दियों तक शक्तिशाली हिंदू और बौद्ध राजवंशों का शासन रहा। पहली शताब्दी से लेकर 15वीं शताब्दी तक कुताई, तारामुनगर, श्रीविजय, मताराम, कंदिरी, सिंघासारी और महान मजापाहित जैसे साम्राज्यों ने इस क्षेत्र पर शासन किया।

इन राजवंशों ने भव्य मंदिरों, स्तूपों और सांस्कृतिक स्मारकों का निर्माण कराया, जिनके अवशेष आज भी जावा, सुमात्रा, बोर्नियो और बाली जैसे द्वीपों पर सुरक्षित हैं। इंडोनेशिया में इन प्राचीन मंदिरों को ‘चंडी’ कहा जाता है। बाली द्वीप को आज भी ‘देवताओं की भूमि’ के रूप में जाना जाता है।

यहाँ स्थित बेसकिह मंदिर परिसर, जिसे ‘मदर टेंपल’ भी कहा जाता है, इंडोनेशिया का सबसे बड़ा हिंदू मंदिर समूह है। माउंट अगंग ज्वालामुखी की ढलानों पर स्थित इस परिसर में 80 से अधिक मंदिर हैं, जिनका मुख्य केंद्र पुरा पेनाटारन अगंग है। परंपराओं के अनुसार इसकी स्थापना 8वीं शताब्दी में ऋषि मार्कंडेय ने की थी।

वर्ष 1963 में माउंट अगंग में हुए भीषण ज्वालामुखी विस्फोट के दौरान भी मंदिर परिसर सुरक्षित बचा रहा, जिसे स्थानीय लोग दैवीय चमत्कार मानते हैं।

दियांग से सिंघासारी तक बिखरी है भारतीय संस्कृति की छाप, संरक्षण में भारत निभा रहा अहम भूमिका

इंडोनेशिया के जावा द्वीप पर स्थित दियांग पठार, जिसका अर्थ ‘देवताओं का निवास’ माना जाता है, देश के सबसे प्राचीन हिंदू मंदिरों का केंद्र है। यहाँ 7वीं और 8वीं शताब्दी के दौरान मताराम राजवंश ने मंदिरों का निर्माण कराया, जो पराम्बनन से भी पुराने माने जाते हैं।

वर्तमान में यहाँ आठ प्रमुख मंदिर सुरक्षित हैं, जिनके नाम महाभारत के पात्रों- अर्जुन, भीम, घटोत्कच और द्रौपदी पर रखे गए हैं। लावु पर्वत की ढलानों पर स्थित चंडी सुकुह मंदिर अपनी पिरामिड जैसी संरचना के कारण विशेष पहचान रखता है, जबकि चंडी चेतो पहाड़ी सीढ़ियों पर निर्मित एक अनूठा मंदिर है।

चंडी कंदल मंदिर में राजा अनुसापति की स्मृति से जुड़े अवशेष हैं और इसकी शिल्पकला में गरुड़ पुराण की वह प्रसिद्ध कथा उकेरी गई है, जिसमें गरुड़ अपनी माता विनिता को दासता से मुक्त कराने के लिए अमृत कलश लेकर आते हैं। वहीं चंडी सिंघासारी मंदिर भगवान शिव के भैरव स्वरूप को समर्पित है, जहाँ कभी विशाल शिवलिंग स्थापित था।

इस परिसर में देवी सरस्वती और प्रज्ञापारमिता की प्राचीन प्रतिमाएँ भी मिली हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इस यात्रा के दौरान पराम्बनन मंदिर परिसर के क्षतिग्रस्त हिस्सों के संरक्षण और पुनर्स्थापन को लेकर भारत और इंडोनेशिया के बीच सहयोग को नई दिशा मिलने की संभावना है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) पहले से ही इस कार्य में भागीदारी निभा रहा है।

कंबोडिया में अंकोरवाट और ता प्रोहम मंदिरों का जीर्णोद्धार

दक्षिण-पूर्व एशिया में जब भी भारतीय सांस्कृतिक प्रभाव की बात होती है, तो कंबोडिया का नाम सबसे ऊपर आता है क्योंकि यहाँ दुनिया का सबसे बड़ा हिंदू मंदिर परिसर ‘अंकोरवाट’ स्थित है। बारहवीं शताब्दी में राजा सूर्यवर्मन द्वितीय द्वारा निर्मित भगवान विष्णु का यह ऐतिहासिक मंदिर समय के साथ बेहद जर्जर स्थिति में पहुँच गया था।

अंकोरवाट मंदिर (फोटो साभार: Facebook @ Many Wonders)

भारत सरकार ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के माध्यम से अंकोरवाट मंदिर के संरक्षण और मरम्मत का विशाल कार्य अपने हाथों में लिया था। सन 1986 से 1993 के बीच भारतीय विशेषज्ञों की टीम ने कंबोडिया के कठिन जंगलों और सीमित संसाधनों के बीच इस मंदिर के ढाँचे को गिरने से बचाया और इसके मूल स्वरूप को सुरक्षित रखने में सफलता प्राप्त की।

अंकोरवाट की इस ऐतिहासिक सफलता के बाद, भारत सरकार ने कंबोडिया में ही स्थित एक और अत्यंत महत्वपूर्ण और जटिल मंदिर परिसर ‘ता प्रोहम’ (Ta Prohm) के संरक्षण का काम शुरू किया। ता प्रोहम मंदिर अपनी अनूठी स्थिति के लिए जाना जाता है जहाँ सदियों पुराने विशाल पेड़ों की जड़ें मंदिर के पत्थरों और दीवारों के साथ पूरी तरह से गुंथ चुकी हैं।

यहाँ चुनौती यह थी कि पेड़ों को काटे बिना और मंदिर के मूल ताने-बाने को नुकसान पहुँचाए बिना इसका संरक्षण किया जाए। भारत के ASI ने इस चुनौती को स्वीकार किया और कंबोडियाई अधिकारियों के साथ मिलकर आधुनिक इंजीनियरिंग और पारंपरिक संरक्षण तकनीकों के मिश्रण से ता प्रोहम मंदिर के जीर्णोद्धार के कई चरणों को सफलतापूर्वक पूरा किया, जिससे यह वैश्विक पर्यटकों के लिए आकर्षण का एक सुरक्षित केंद्र बन सका।

वियतनाम में ‘माई सन’ शिव मंदिर समूह का पुनरुद्धार

कंबोडिया के साथ-साथ वियतनाम में भी भारतीय संस्कृति के ऐतिहासिक पदचिह्न बेहद स्पष्ट हैं। वियतनाम के क्वांग नाम प्रांत में स्थित ‘माई सन’ (My Son) नाम की जगह पर चौथी से तेरहवीं शताब्दी के बीच चाम राजवंश द्वारा निर्मित एक हजार साल से भी अधिक पुराने शिव मंदिरों का एक विशाल समूह मौजूद है।

माई सन मंदिर (फोटो साभार: Vietnamcoracle)

यह यूनेस्को की विश्व धरोहर स्थल है, जो वियतनाम युद्ध के दौरान हुए बमवर्षक हमलों और लंबे समय की उपेक्षा के कारण बेहद खराब और खंडित अवस्था में पहुँच गया था। भारत सरकार और वियतनाम सरकार के बीच हुए द्विपक्षीय समझौतों के तहत भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने इस ऐतिहासिक स्थल के संरक्षण और बहाली का काम अपने हाथों में लिया।

ASI ने वियतनाम के घने जंगलों के बीच स्थित इन ईंटों और पत्थरों से बने मंदिरों का गहन वैज्ञानिक अध्ययन किया और उनकी मूल वास्तुकला को बनाए रखते हुए उनका संरक्षण किया। संरक्षण कार्य के दौरान भारतीय विशेषज्ञों को कई महत्वपूर्ण प्राचीन मूर्तियाँ, शिलालेख और एक विशाल शिवलिंग भी प्राप्त हुआ, जिसने इस स्थल के ऐतिहासिक महत्व को और बढ़ा दिया।

लाओस के प्राचीन ‘वाट फाउ’ मंदिर का संरक्षण

दक्षिण-पूर्व एशिया के ही एक अन्य महत्वपूर्ण देश लाओस में भी भारत अपनी सांस्कृतिक कूटनीति के तहत ऐतिहासिक धरोहरों को सहेजने का काम कर रहा है। लाओस में स्थित ‘वाट फाउ’ (Vat Phou) एक अत्यंत प्राचीन और पवित्र मंदिर परिसर है जो मुख्य रूप से भगवान शिव को समर्पित है।

पहाड़ी की तलहटी में स्थित यह मंदिर परिसर खमेर साम्राज्य की वास्तुकला और संस्कृति का एक अनूठा उदाहरण है और इसे भी यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर स्थल घोषित किया गया है। समय के साथ प्रकृति की मार और रखरखाव के अभाव में इस मंदिर के कई हिस्से ढहने की कगार पर पहुँच गए थे।

भारत सरकार ने लाओस सरकार के अनुरोध पर इस मंदिर के जीर्णोद्धार की जिम्मेदारी संभाली और ASI के विशेषज्ञों को इस कार्य में लगाया। भारतीय विशेषज्ञों ने वाट फाउ मंदिर के विभिन्न हिस्सों, जैसे कि मुख्य गर्भगृह, दीर्घाओं और नक्काशीदार स्तंभों को वैज्ञानिक तकनीकों के माध्यम से मजबूती प्रदान की।

पहाड़ी क्षेत्र होने के कारण यहाँ वर्षा जल के भराव और मिट्टी के खिसकने की गंभीर समस्या थी, जिसका समाधान भारतीय इंजीनियरों ने बेहद कुशलता से निकाला ताकि मंदिर के ढांचे को भविष्य में होने वाले नुकसान से सुरक्षित रखा जा सके। यह परियोजना लाओस के लोगों के लिए उनकी सांस्कृतिक पहचान को वापस पाने जैसा है और इसमें भारत का सहयोग दोनों देशों के बीच के गहरे दोस्ताना और सांस्कृतिक जुड़ाव को रेखांकित करता है।

बांग्लादेश में ऐतिहासिक रमना काली मंदिर का पुनर्निर्माण

अपने सुदूर पड़ोसियों के अलावा भारत ने अपने निकटतम पड़ोसी देशों में भी ऐतिहासिक और धार्मिक स्थलों के पुनरुद्धार में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण बांग्लादेश की राजधानी ढाका में स्थित ऐतिहासिक ‘रमना काली मंदिर’ और श्री आनंदमयी आश्रम है।

यह मंदिर लगभग तीन सौ साल पुराना था और ढाका के सांस्कृतिक जीवन का एक मुख्य केंद्र माना जाता था। परंतु, सन 1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के दौरान पाकिस्तानी फौज ने ‘ऑपरेशन सर्चलाइट’ के तहत इस ऐतिहासिक मंदिर पर हमला कर इसे पूरी तरह से नष्ट कर दिया था और यहाँ रहने वाले कई पुजारियों व श्रद्धालुओं की बेरहमी से हत्या कर दी थी।

बांग्लादेश की स्वतंत्रता के बाद लंबे समय तक यह स्थल उपेक्षित रहा। भारत सरकार ने इस ऐतिहासिक अन्याय को सुधारने और बांग्लादेश के साथ अपने सांस्कृतिक संबंधों को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से इस मंदिर के पुनर्निर्माण का पूरा खर्च उठाने और वित्तीय मदद देने का फैसला किया।

भारत की आर्थिक और तकनीकी सहायता से रमना काली मंदिर का भव्य पुनर्निर्माण कार्य शुरू किया गया और इसे इसके प्राचीन गौरव के अनुरूप नया स्वरूप दिया गया। इस नवनिर्मित ऐतिहासिक मंदिर का औपचारिक उद्घाटन भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद ने अपनी बांग्लादेश यात्रा के दौरान किया था।

श्रीलंका के प्राचीन तिरुकेतीश्वरम शिव मंदिर का जीर्णोद्धार

भारत के एक अन्य द्वीपीय पड़ोसी देश श्रीलंका में भी भारतीय संस्कृति और रामायण काल से जुड़े कई महत्वपूर्ण स्थल मौजूद हैं। श्रीलंका के मन्नार जिले में स्थित ‘तिरुकेतीश्वरम शिव मंदिर’ (Thiruketheeswaram Temple) वहाँ के पाँच सबसे पवित्र शिव मंदिरों (पंच ईश्वरम) में से एक माना जाता है।

इस मंदिर का इतिहास बेहद प्राचीन है और इसका संबंध रामायण काल से भी जोड़ा जाता है। श्रीलंका में दशकों तक चले गृहयुद्ध के कारण यह पूरा क्षेत्र भारी अशांति और हिंसा की चपेट में रहा, जिसके परिणामस्वरूप इस पवित्र मंदिर परिसर को भारी नुकसान पहुँचा और श्रद्धालुओं का यहाँ आना-जाना लगभग बंद हो गया।

गृहयुद्ध की समाप्ति के बाद, श्रीलंका सरकार के अनुरोध पर भारत सरकार ने इस प्राचीन और ऐतिहासिक मंदिर के जीर्णोद्धार का पूरा खर्च और जिम्मेदारी उठाने का निर्णय लिया।

भारत सरकार ने इस परियोजना के लिए भारी वित्तीय अनुदान जारी किया और भारतीय विशेषज्ञों की देखरेख में मंदिर के मुख्य गोपुरम, महामंडपम और इसके पवित्र तालाब (केनी) की मरम्मत और सौंदर्यीकरण का कार्य अत्यंत बारीकी से करवाया गया।

भारत के इस सहयोग के कारण यह प्राचीन मंदिर एक बार फिर अपने भव्य रूप में लौट आया, जिससे न केवल श्रीलंका के तमिल और हिंदू समुदाय की धार्मिक भावनाओं को संबल मिला, बल्कि युद्ध की विभीषिका से उबर रहे क्षेत्र में शांति और सांस्कृतिक सद्भाव की एक नई शुरुआत हुई।

बहरीन के ऐतिहासिक श्रीनाथजी मंदिर का भव्य कायाकल्प

सांस्कृतिक धरोहरों के संरक्षण का यह भारतीय अभियान केवल दक्षिण या दक्षिण-पूर्व एशिया तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसका विस्तार खाड़ी देशों (पश्चिम एशिया) तक हो चुका है। खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) के देशों में भारत के प्राचीनतम व्यापारिक संबंधों के गवाह के रूप में बहरीन की राजधानी मनामा में एक ऐतिहासिक मंदिर स्थित है।

मनामा के थाट बाजार में स्थित ‘श्रीनाथजी (श्री कृष्ण) मंदिर’ लगभग दो सौ साल पुराना है, जिसकी स्थापना थट्टा के सिंधी व्यापारी समुदाय द्वारा सन 1817 में की गई थी। यह मंदिर खाड़ी क्षेत्र के सबसे पुराने मंदिरों में से एक है और यह बहरीन की धार्मिक सहिष्णुता तथा भारत के साथ उसके सदियों पुराने व्यापारिक व मानवीय संबंधों का एक जीवंत प्रतीक है।

इस ऐतिहासिक मंदिर की दो सौवीं वर्षगांठ के अवसर पर भारत सरकार के सहयोग से इसके भव्य पुनर्निर्माण और कायाकल्प के लिए एक विशाल पुनर्विकास परियोजना की शुरुआत की गई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वयं अपनी बहरीन यात्रा के दौरान इस 4.2 मिलियन डॉलर (लगभग 30 करोड़ रुपए से अधिक) की लागत वाली पुनर्विकास परियोजना का औपचारिक शुभारंभ किया था।

इस प्रोजेक्ट के तहत मंदिर परिसर का विस्तार किया जा रहा है, जिसमें पारंपरिक भारतीय वास्तुकला और आधुनिक सुविधाओं का समावेशन किया गया है ताकि वहां आने वाले हजारों श्रद्धालुओं और पर्यटकों को एक भव्य आध्यात्मिक अनुभव मिल सके। बहरीन और भारत के द्विपक्षीय संबंधों में यह मंदिर एक सेतु का कार्य करता है और इसका यह भव्य जीर्णोद्धार इस बात का प्रमाण है कि भारत अपनी वैश्विक विरासत को हर कोने में सहेजने के लिए तत्पर है।

भारत सरकार द्वारा विभिन्न देशों में किए जा रहे मंदिर संरक्षण कार्य

विदेशी धरती पर भारतीय संस्कृति और इतिहास के इन प्रतीकों को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए भारत सरकार का विदेश मंत्रालय (MEA) और ASI मिलकर एक व्यापक और सुव्यवस्थित नीति के तहत काम कर रहे हैं।

भारत सरकार की इस दीर्घकालिक योजना के अंतर्गत दुनिया के विभिन्न देशों में फैली भारतीय मूल की विरासतों की पहचान की जाती है और संबंधित देशों की सरकारों के साथ मिलकर उनके संरक्षण के लिए तकनीकी सहायता, विशेषज्ञता और शत-प्रतिशत वित्तीय अनुदान (Grant-in-aid) प्रदान किया जाता है।

चाहे वह कंबोडिया के जंगलों में स्थित अंकोरवाट और ता प्रोहम के पत्थरों को नई जिंदगी देना हो, वियतनाम के माई सन में खंडित हो चुके चाम काल के शिव मंदिरों को फिर से वैज्ञानिक पद्धति से जोड़ना हो, लाओस के वाट फाउ मंदिर की पहाड़ी वास्तुकला को बचाना हो, या फिर युद्ध और हिंसा के इतिहास से प्रभावित रहे बांग्लादेश के रमना काली मंदिर और श्रीलंका के तिरुकेतीश्वरम मंदिर को उनके मूल स्वरूप में वापस खड़ा करना हो, इन सभी परियोजनाओं का पूरा वित्तीय और तकनीकी भार भारत सरकार स्वयं उठाती आ रही है।

इसके साथ ही बहरीन जैसे खाड़ी देशों में सदियों पुराने मंदिरों के पुनर्विकास में भारत का सहयोग यह दिखाता है कि भारत की सांस्कृतिक कूटनीति का दायरा कितना व्यापक है।

ये सभी प्रयास केवल पत्थरों और इमारतों की मरम्मत मात्र नहीं हैं, बल्कि यह भारत द्वारा अपनी वैश्विक ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहरों को दुनिया भर में सहेजने, उन्हें आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित करने और वैश्विक स्तर पर आपसी सद्भाव, शांति और साझी विरासत के महत्व को स्थापित करने का एक अत्यंत दूरदर्शी प्रयास है।

फीफा विश्व कप 2026: मिकेल मेरीनो के जादुई गोल से स्पेन क्वार्टर फाइनल में, पुर्तगाल की हार के साथ रोनाल्डो का सपना टूटा; अब मेस्सी और सालाह में टक्कर

नासिर आज़मी का एक बेहतरीन शेर है जो मेरे दिल के बेहद करीब है।

दाएम आबाद रहेगी दुनिया

हम न होंगे कोई हम सा होगा।

नासिर साहब की यह बात सही तो है परन्तु हर किसी के जीवन में कुछ लोग ऐसे जरूर होते हैं जिनके जाने के बाद उनकी कमी कभी भी पूरी नहीं हो पाती। खेल की दुनिया में भी ऐसे कुछ खिलाड़ी हुए हैं जो खेलप्रेमियों की स्मृतियों में हमेशा के लिए जिंदा रहते हैं। फुटबॉल प्रेमियों के लिए आज भी पेले, माराडोना, योहान क्रुएफ, प्लातीनी आदि खिलाड़ी दिलों में बसते हैं। ऐसे ही कई सितारा खिलाड़ियों को इस विश्व कप में हम सब एक अंतिम बार खेलते हुए देख रहे थे। लूका मॉद्रिच, नेमार, गुईलेर्मो ओचोआ आदि ऐसे ही खिलाड़ी हैं जो अब आगे कभी हमें फुटबॉल खेलते हुए नहीं दिखाई देंगे। यह विश्व कप इसलिए भी कई मायनों में खास है।

खैर, बात करते हैं बीती रात (6 जुलाई 2026) हुए मुकाबलों की।

बीती रात निर्धारित समय पर भारतीय समयानुसार साढ़े बारह बजे इस राउंड का सबसे ज्यादा चर्चा में रहा मुकाबला अनुभवी रेफरी एंथोनी टेलर की सीटी बजते ही डलास स्टेडियम में शुरू होता है। मौजूदा यूरो चैंपियन स्पेन का सामना युएफा नेशन्स लीग के फाइनल में पेनाल्टी शूटआउट में उन्हें हराकर ट्राफी जीतने वाली पुर्तगाल की टीम से था।

दोनों ही टीमें काफी दमदार खिलाड़ियों की खेप लेकर इस मैच में उतरी थीं। पुर्तगाल का मिडफील्ड तो खैर फिलहाल संपूर्ण जगत में सब से खास है ही। मिडफील्ड में ब्रुनो फर्नानदेज़ के संग मौजूद थे पीएसजी के साथ लगातार दो चैंपियन्स लीग खिताब जीत चुके विटिन्हा और चौबीस वर्षीय सनसनीखेज खिलाड़ी ज़ाओ नेवेज़। अटैक का दारोमदार था होआओ फेलिक्स, क्रिस्टियानो व पेड्रो नेटो पर। वहीं बेंच पर लियाओ, बर्नार्डो सिल्वा, कोंकेकाओ, दिओगो दालो, ट्रिंकाओ, नूनेस व नेवेज़ जैसे अनुभवी खिलाड़ी मौजूद थे, जो जीत के लिए भूखे हैं।

वहीं कोच लुई डे ला फुएन्ते ने 4-1-2-3 की फॉर्मेशन में अपनी टीम को मैदान पर उतारा। मिडफील्ड में रोड्री के संग पेड्री व दानी ओल्मो मौजूद थे। आगे अटैकिंग लाइन में सेंट्रल फॉरवर्ड ओयारजाबाल का साथ देने के लिए विंगर्स के रूप में एलेक्स बाएना व लामीन यमाल को मैदान पर उतारा गया, जबकि नीको, फेराँ तोरे, गावी, मिकेल मेरीनो, विक्टर मुनोज़, फैबियान रुईज़ जैसे मजबूत खिलाड़ी बेंच पर मौजूद थे। हालाँकि चोट से उबर रहे नीको को मैदान में देखने की उम्मीदें कम ही थीं।

दोनों ही टीमें मैदान में आती हैं। पुर्तगाल की टीम अपनी गहरी लाल रंग की जर्सी में मैदान पर उतरी थी। वहीं स्पेनिश टीम ने अपनी क्रीम/सफेद रंग की बेहद प्यारी अवे जर्सी पहनी थी। रेफरी से इशारा मिलते ही मैच शुरू होता है।

शुरुआती क्षणों से ही स्पेनिश टीम पुर्तगाल पर शिकंजा कस देती है। तीसरे मिनट में ही मिकेल ओयारजाबाल पुर्तगाली गोलकीपर की परिक्षा लेते हैं। मगर गेंद निशाने से दूर रह जाती है। स्पेन का प्रयास था कि मैच के शुरुआती पलों से ही पुर्तगाली मिडफील्ड का दम घोंट दिया जाए जिसके चलते वह अपनी अटैकिंग लाइन के खिलाड़ियों तक गेंद पहुँचा ही न पाएँ। वह काफी हद तक इसमें सफल होते भी नजर आते हैं। मगर बारहवें मिनट में क्रिस्टियानो रोनाल्डो स्पेनिश पोस्ट पर एक जानदार किक लगाते हैं। मगर स्पेनिश गोलकीपर यह मजबूत शॉट रोक लेते हैं। जवाबी कार्रवाई करते हुए लामीन यमाल पुर्तगाली गोलपोस्ट पर एक हमला करते हैं, मगर स्कोर अब भी 0-0 ही रहता है।

पहले हाइड्रेशन ब्रेक तक स्कोर बराबरी पर ही रहता है। शुरुआती दबाव को बेहतरीन तरीके से झेलकर पुर्तगाल अब मैच में अपना खेल खेलने लगे थे। होआओ फेलिक्स व नूनो मेंडेस लगातार बाईं ओर से स्पेन पर हमले करने लगते हैं। यह दोनों ही खिलाड़ी मिलकर लामीन यमाल को बांध कर रख देते हैं। वह उन्हें अपने गोलपोस्ट की ओर बढ़ने ही नहीं दे रहे थे।

स्पेनिश लेफ्ट बैक पेड्रो पोर्रो गोल लगाने का एक जोरदार प्रयास करते हैं मगर उन्हें सफलता नहीं मिलती। एलेक्स बाएना मैदान की बांई फ्लैंक से स्पेन के लिए मौके बनाने के प्रयास जरूर कर रहे थे मगर अब पुर्तगाल स्पेनिश मिडफील्ड को बिल्कुल बाँध कर रखे हुए थी। इकतालीसवें मिनट में नूनो मेंडेस एकबार फिर एक बेहद शानदार किक लगा कर गोल स्कोर करने का प्रयास करते हैं मगर गेंद स्पेनिश डिफेंडर से छिटक कर मैदान से बाहर चली जाती है। हाफ टाइम की समाप्ति पर 0-0 के स्कोर पर दोनों टीमें डगआउट की दिशा में बढ़ती हैं।

उम्मीदों के विपरीत अब तक यह मैच बेहद नीरस रहा था। दोनों ही टीमें कोई खास मूव्स बनाने में सफलता हासिल नहीं कर सकी थीं। खैर, दूसरे हाफ का खेल शुरू होता है। दोनों टीमें मैदान में वापस उतरती हैं। रेफरी सीटी बजा कर खेल आगे बढ़ाते हैं। मैच के चौवनवें मिनट में कुछ ऐसा होता है जो आगे के मैच का रुख मोड़ सकता था। वर्तमान समय में विश्व के सबसे शानदार लैफ्ट बैक पुर्तगाल के नूनो मेंडेस दर्द से कराहते नजर आते हैं। उनको हैमस्ट्रिंग में खिंचाव के चलते मैदान से बाहर जाना पड़ा। नेल्सन सेमेडो चोटिल नूनो मेंडेस की जगह मैदान के भीतर लाए जाते हैं। खेल आगे बढ़ता है।

59वें मिनट में क्रिस्टियानो पुर्तगाल के लिए जबकि एक मिनट पश्चात ही स्पेन के लिए पेड्री विरोधी गोलपोस्ट पर एक शॉट लगाते हैं। दोनों ही खिलाड़ी गेंद को निशाने पर रखने में असफल रहते हैं। तुरंत ही लामीन यमाल भी एक शॉट लेते हैं, मगर यह प्रयास भी बचा लिया जाता है। कुछ ही देर में एलेक्स बाएना पुर्तगाली गोलपोस्ट पर एक शॉट लेते हैं, मगर वह गोल स्कोर नहीं कर पाते। खेल यूँ ही मंद गति से आगे बढ़ता रहता है। पुर्तगाल की तुलना में स्पेन ज्यादा अटैक करती नजर आ रही थी मगर टीम में एक अदद सेंट्रल फॉरवर्ड की कमी साफ खलती नजर आ रही थी। यह कैसा अजीब संयोग है कि स्पेन की माटी अब डेविड विया व फर्नान्दो तोरेस जैसे खिलाड़ी पैदा नहीं कर पा रही है।

70वें मिनट में पुर्तगाल के कोच दो परिवर्तन करते हुए मैदान में नवीन ऊर्जा का प्रवाह करने का प्रयास करते हैं।

पांच मिनट बाद ही स्पेनिश कोच लुई डे ला फुएन्ते भी एलेक्स बाएना की जगह फेराँ तोरेस को मैदान में उतारते हैं।

80 मिनट की समाप्ति पर भी दोनों ही टीमें गोल दागने में असफल रही थीं। अब यह मैच एक्स्ट्रा-टाइम की ओर बढ़ता दिख रहा था। पुर्तगाल के कोच रॉबर्टो मार्टीनेज़ कोंकेकाओ व बर्नार्डो सिल्वा को मैदान में उतारते हैं। कोंकेकाओ इस पूरे टूर्नामेंट में हमेशा बेंच से मैदान में आकर काफी असरकारी नजर आए थे। आज फिर एक बार तमाम समर्थकों को उनसे उम्मीद थी कि वह टीम के लिए एक घातक मौका बनाएं।

85वें मिनट तक भी जब स्कोर 0-0 पर ही अटका था और मैच एक्स्ट्रा टाइम की ओर बढ़ रहा था तो स्पेन के कोच पेड्री व दानी ओल्मो को बाहर बुलाकर फैबियान रुईज़ व मिकेल मेरीनो रुपी दो अनुभवी मिडफील्डरों को मैदान के भीतर लाते हैं। उनका यह कदम एक बेहद शानदार सामरिक चातुर्य की अनुभूति कराता है।

90+1 मिनट में फेराँ तोरेस एक मेस्सीस्क्यू ( मेस्सी की भाँति) अंदाज में तीन-चार पुर्तगाली डिफेंडरों को चकमा देते हुए गेंद को साथी खिलाड़ी मिकेल मेरीनो की ओर बढ़ाते हैं। मिकेल गेंद को बिना कोई ग़लती किए बेहतरीन तरीके से जाल के भीतर पहुँचा देते हैं। अंतिम क्षणों में स्पेन उनके इस गोल के दम पर करो या मरो वाले इस मैच में अहम बढ़त ले लेती है। कुछ ही पलों में मैच समाप्त हो जाता है। स्पेन क्वार्टर फाइनल में जगह बना लेती है। क्रिस्टियानो रोनाल्डो का विश्व कप जीतने का ख्वाब टूट जाता है। पूरा स्टेडियम लाल रंग के लहराते झंडों से पट जाता है। एस्पाना-एस्पाना के नारे लगाते स्पेनिश समर्थकों की खुशी में सारा स्टेडियम डूब गया था। मिकेल मेरीनो द्वारा अंतिम क्षणों में दागा गया यह गोल इस विश्व कप के मैचों में किसी टीम द्वारा अंतिम घड़ी में दागा गया दसवाँ गोल था।

एक मिडफील्डर होने के बावजूद मिकेल मेरीनो ने यूरो कप व यूएफा नेशन्स लीग के सेमीफाइनल मुकाबलों में भी स्पेन के लिए गोल स्कोर किए थे। और आज तो उनके इस ख़ास गोल के चलते ही ला रोजा आज पुर्तगाल व क्रिस्टियानो रोनाल्डो को घर की राह दिखा कर क्वार्टर फाइनल में अपनी जगह पक्की कर चुकी थी। वह हमेशा ही एक बेहद क्लच खिलाड़ी रहे हैं जो बेंच से आकर भी स्पेन के लिए मैच बदल देते हैं।

इसके पश्चात अगला मैच आज सुबह साढ़े पाँच बजे सिएटल स्टेडियम में बेहतरीन फॉर्म में चल रही मेजबान अमेरिकी टीम बनाम बेल्जियम का था। यह भी एक रोचक मुकाबला होगा। इस मैच से पहले इस बात की चर्चा चल रही थी कि आखिर क्यों डोनाल्ड ट्रम्प के कहने पर फीफा ने पिछले मैच में रेड कार्ड पाने वाले अमेरिकी सेंट्रल फॉरवर्ड फोलारिन बालोगन का बैन हटा दिया था। बेल्जियम पिछले मैच में बेहद शानदार तरीके से लड़ते हुए अंतिम क्षणों में स्कोर किए गोलों की बदौलत यहाँ पहुँची थी। अमेरिका का अबतक का सफर बेहद शानदार रहा था। उन्हें अपने घरेलू समर्थकों का साथ भी मिलने जा रहा था। हजारों दर्शक आज अपनी टीम का हौसला बढ़ाने हेतु सीएटल स्टेडियम में मौजूद थे। खैर दोनों ही टीमें मैदान में उतरती हैं और खेल शुरू होता है।

यह मैच बेहद एकतरफा रहता है। बेल्जियम की टीम ने अपने अनुभव के दम पर अमेरिकी टीम को मैदान में कुछ करने ही नहीं दिया। बेल्जियम मैच के शुरुआती पलों से ही विरोधी गोलपोस्ट पर हमले करती रहती है। कुल पन्द्रह शॉट लगाए जाते हैं जिसमें से सात निशाने पर रहे। इसके चलते चार्ल्स डि किटिलीरी के दो व वानाकेन और लुकाकू के एक एक गोल के बदौलत बेल्जियम ने शानदार अंदाज में 4-1 से यह मैच जीत लिया और अब क्वार्टर फाइनल में उनका सामना होगा स्पेन की टीम से।

और आगे आज रात फीफा विश्व कप के गत विजेता अटलांटा स्टेडियम में अपने राउंड ऑफ 16 मुकाबले में मिस्र का सामना करने उतरेंगे। गौरतलब है कि मिस्र की ओर से विपक्षी दल को उकसाने हेतु कुछ दिनों से बयानबाजी भी चल रही है। हाल ही में प्रेस-वार्ता में उनके असिस्टेंट कोच ने बयान दिया था कि क्या हुआ अगर उनके पास मेस्सी है। हमारे पास मोहम्मद सालाह है। हम मेस्सी को नहीं देखते। हम तो अपने खिलाड़ियों को निर्देश देते हैं कि वो मैदान में जाएँ और बिन यह देखें कि उनके सम्मुख कौन खड़ा हे, अपना खेल खेलें। और हमारे पास कुल छब्बीस खिलाड़ी हैं, जो सभी हमारी नज़रों में हमारे लिए मेस्सी हैं।

ऐसे ही मेस्सी को लेकर कई और बयान भी किये गए। इसके चलते इस मैच से पूर्व माहौल गरमा गया है। अर्जेंटीना की टीम अपने पिछले मुकाबले में काबो वर्दे के खिलाड़ियों के सामने संघर्ष करती नजर आई थी। काबो वर्दे ने अपनी जिद से सारी दुनिया को बतला दिया था कि इस टीम की भी कई कमियाँ हैं और इस टीम को भी हराया जा सकता है। कहते हैं वीर भोग्य वसुंधरा।

आज रात एक दफा फिर जंगल के राजा को फिर साबित करना होगा कि आखिर क्यों वो इस जंगल का राजा है। आज एक बार फिर लियोनेल मेस्सी का जादू हमें देखने को मिलेगा। इससे पहले कि वो सदैव के लिए इस खेल को अलविदा कह दें, हमें उनको खेलते हुए देखने का कोई भी मौका हाथों से जाने नहीं देना चाहिए। मगर मिस्र भी निश्चित ही बुलंद हौसलों के संग मैदान में उतरेगी।

मोहम्मद सालाह आज रात मैदान में बेहतरीन प्रदर्शन कर निश्चित ही अपने देश को खुशियाँ देना चाहेंगे। अर्जेंटीना का किसी भी उलटफेर का शिकार होने से बचने हेतु यह जरूरी है कि अबतक खामोश रहे उसके दो स्टार फॉर्वर्ड लाउतारो मार्टिनेज व हूलियन अल्वारेज़ जल्द से जल्द फॉर्म में लौटें और फॉरवर्ड लाइन में लियोनेल मेस्सी का अच्छा साथ निभाएं।

इसके बाद अगला मैच देर रात भारतीय समयानुसार रात डेढ़ बजे वैंकूवर में खेला जाना है। इस मैच में स्विट्जरलैंड का सामना कोलंबिया की टीम से होगा। यह दोनों ही टीमें अलग विचारधारा के साथ फुटबॉल खेलती नजर आती हैं लेकिन दोनों ही टीमों ने अबतक इस विश्व कप में अच्छा प्रदर्शन कर अपने समर्थकों का दिल जीता है। यहाँ कोई भी एक टीम फेवरेट नहीं होगी, जो कल रात नब्ज़ पर काबू रखते हुए अच्छा खेल जाएगा, वह क्वार्टर फाइनल में जगह बना लेगा।

कल हमने नेमार को फुटबॉल की दुनिया को अलविदा कहते देखा। हमारी पीढ़ी के जो लोग फुटबॉल को लेकर पागलपन दिलों में लिए फिरते हैं, उनका 1998 या 2002 विश्व कप के दौरान फुटबॉल से पहला राब्ता हुआ था। 2002 के विश्व विजेता ब्राजीली टीम को जिसने अपने चिर-परिचित अंदाज में खेलते देखा था वह फिर किसी और टीम से दिल लगा ही नहीं सकता था। उनका खेल बेहद खूबसूरत हुआ करता था। उसमें लातिनी जादू और स्ट्रीट स्टाइल फुटबॉल की महक हुआ करती थी। नेमार उस अंदाज में खेलने वाले अंतिम खिलाड़ी थे।

वैश्विक फुटबॉल ने जब बाजारवाद के आगे झुक कर यूरोपीयन चेहरे को अपना लिया, तब ही से ब्राजीली टीमें भी अपना सांबा भूल बैठीं। अफसोस अब सांतोस के हरे मैदानों से कोई नेमार निकल कर नहीं आएगा। वह अपनी तरीके के आखिरी खिलाड़ी थे। उनके साथ फुटबॉल का लातिनी जादू भी अब फिर कभी देखने के लिए नहीं मिलेगा।

कौन जाने क्या पता बीती रात स्पेन के हाथों मिली हार के पश्चात टूर्नामेंट से बाहर हो गई पुर्तगाल के इकतालीस वर्षीय स्टार खिलाड़ी क्रिस्टियानो रोनाल्डो भी जल्द फुटबॉल को अलविदा कह दें। शायद कल हमने उनका अंतिम नृत्य देखा हो।

Cherish them, while they are there. Football will never be this beautiful.

भारत और इंडोनेशिया मिलकर बदलेंगे समंदर का नक्शा, जानिए साबांग और ग्रेट निकोबार के नए गठजोड़ से क्यों परेशान है चीन

भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इंडोनेशिया की आधिकारिक यात्रा पूर्वी हिंद महासागर और वैश्विक समुद्री व्यापार के इतिहास में एक नया अध्याय लिखने जा रही है। जकार्ता के मर्देका पैलेस में राष्ट्रपति प्रबोवो के साथ हुई द्विपक्षीय वार्ता में रक्षा, खाद्य सुरक्षा और डिजिटल भुगतान पर सहमति के साथ-साथ इंडोनेशिया के साबांग बंदरगाह को भारत की ग्रेट निकोबार परियोजना के पूरक हब के रूप में विकसित करने का ऐतिहासिक फैसला लिया गया।

इस यात्रा के दौरान रक्षा, खाद्य सुरक्षा, डिजिटल भुगतान प्रणालियों के एकीकरण और क्रिटिकल मिनरल्स पर व्यापक सहमति बनी है। लेकिन जिस एक दूरगामी और रणनीतिक फैसले ने पूरी दुनिया के भू-राजनीतिक विशेषज्ञों का ध्यान सबसे ज्यादा अपनी ओर खींचा है, वह है इंडोनेशिया के रणनीतिक साबांग बंदरगाह को भारत की ग्रेट निकोबार परियोजना के साथ एक पूरक समुद्री हब के रूप में विकसित करना।

दोनों देशों के राष्ट्रध्यक्षों ने इस बात पर पूर्ण सहमति जताई है कि साबांग बंदरगाह और भारत के अंडमान-निकोबार द्वीप समूह को जोड़ने वाले पोर्ट इन्फ्रास्ट्रक्चर पूर्वी हिंद महासागर में न केवल व्यापारिक कनेक्टिविटी को अभूतपूर्व बढ़ावा देंगे, बल्कि दोनों देशों को एक अटूट रणनीतिक सुरक्षा कवच भी प्रदान करेंगे।

भौगोलिक संयोग से भारत-इंडोनेशिया कंट्रोल करेंगे मलक्का स्ट्रेट का एंट्री प्वॉइंट

वैश्विक समुद्री व्यापार के नक्शे पर साबांग और ग्रेट निकोबार की भौगोलिक स्थिति किसी प्राकृतिक वरदान से कम नहीं है। इंडोनेशिया के सुमात्रा प्रांत के उत्तरी छोर पर वेह द्वीप पर स्थित साबांग और भारत का सबसे दक्षिणी बिंदु ग्रेट निकोबार एक-दूसरे से महज सौ समुद्री मील से भी कम दूरी पर आमने-सामने स्थित हैं। यह पूरा क्षेत्र मलक्का जलडमरूमध्य के पश्चिमी मुहाने पर बैठता है, जो दुनिया के सबसे व्यस्त और संवेदनशील समुद्री गलियारों में से एक माना जाता है। हर साल इस संकरे समुद्री रास्ते से अस्सी हजार से अधिक विशाल व्यापारिक और ऊर्जा जहाज गुजरते हैं, जो पूरे एशिया को यूरोप, मिडिल ईस्ट और अफ्रीका से जोड़ते हैं।

दुनिया का लगभग एक-चौथाई समुद्री व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति (80,000 से अधिक विशाल व्यापारिक और ऊर्जा जहाज) इसी संकरे जलमार्ग के रास्ते से होती है। ऐसे में साबांग और ग्रेट निकोबार को एक साथ एक साथ पूरक हब के रूप में विकसित करने की भारत-इंडोनेशिया की साझा योजना का मतलब है कि इस महा-जलमार्ग के प्रवेश द्वार पर दो सबसे भरोसेमंद लोकतांत्रिक देशों की सीधी आर्थिक और रणनीतिक उपस्थिति होगी।

ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट पर भारत का नौ अरब डॉलर का मास्टरस्ट्रोक

भारत सरकार अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के सबसे दक्षिणी द्वीप ग्रेट निकोबार में लगभग नौ अरब डॉलर की भारी-भरकम लागत से एक विशाल और बहु-आयामी बुनियादी ढाँचा परियोजना विकसित कर रही है। नीति आयोग की देखरेख में चल रही इस ग्रेट निकोबार द्वीप विकास परियोजना का मुख्य आधार गलाथिया बे इंटरनेशनल ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल है। यह एक अत्याधुनिक डीप-वॉटर पोर्ट है जिसकी कंटेनर कार्गो क्षमता बेहद विशाल रखी गई है।

वर्तमान में भारत के पास इस क्षेत्र में गहरे पानी के बर्थ न होने के कारण देश का अधिकांश कंटेनर कार्गो कोलंबो, सिंगापुर या मलेशिया के पोर्ट क्लैंग के रास्ते रूट होता है, जिससे भारत को हर साल भारी वित्तीय और राजस्व का नुकसान उठाना पड़ता है। गलाथिया बे में बीस मीटर से अधिक की प्राकृतिक गहराई है, जो दुनिया के सबसे विशालकाय जहाजों को आसानी से संभालने की क्षमता रखती है।

इसके साथ ही इस मेगा-प्रोजेक्ट के तहत एक नया ग्रीनफील्ड इंटरनेशनल एयरपोर्ट भी बनाया जा रहा है, जो सालाना लाखों यात्रियों और कार्गो को संभालने में सक्षम होगा। इस पूरे हब को ऊर्जा देने के लिए एक आधुनिक गैस और सौर-आधारित बिजली घर और एक आधुनिक ग्रीनफील्ड टाउनशिप का निर्माण भी किया जा रहा है, जो आने वाले समय में वाणिज्य, पर्यटन और वैश्विक लॉजिस्टिक्स का एक बहुत बड़ा केंद्र बनकर उभरेगा।

साबांग और ग्रेट निकोबार का आर्थिक जुड़ाव अहम

इंडोनेशिया के रणनीतिक गलियारों में लंबे समय से यह चिंता रही थी कि भारत की ग्रेट निकोबार परियोजना उनके अपने साबांग मुक्त व्यापार क्षेत्र (Free Trade Zone) के लिए एक आर्थिक खतरा बन सकती है। लेकिन प्रधानमंत्री मोदी की इस यात्रा ने इस नैरेटिव को पूरी तरह बदल दिया है।

सफल और टिकाऊ समुद्री अर्थव्यवस्थाएँ कभी भी अकेले या अलग-थलग रहकर काम नहीं करतीं, बल्कि वे हमेशा इंटर-कनेक्टेड नेटवर्कों के माध्यम से ही फलती-फूलती हैं। साबांग को साल 2000 में ही इंडोनेशिया सरकार ने फ्री ट्रेड एरिया और फ्री पोर्ट घोषित किया था, लेकिन विदेशी पूँजी निवेश की कमी और कमजोर लॉजिस्टिक्स के कारण यह क्षेत्र सुमात्रा द्वीप के पाँच करोड़ लोगों के लिए वह आर्थिक प्रवेश द्वार नहीं बन पाया, जिसकी कल्पना की गई थी।

अब भारत के ग्रेट निकोबार में हो रहे भारी निवेश के समानांतर जब साबांग को विकसित किया जाएगा, तो दोनों बंदरगाह एक-दूसरे के विरोधी बनने के बजाय पूरक साथी के रूप में काम करेंगे।

अंडमान-निकोबार द्वीप समूह में चल रहे विशाल निर्माण कार्यों के लिए मुख्य भूमि भारत से संसाधन मंगाना बहुत महँगा पड़ता है, क्योंकि चेन्नई वहाँ से लगभग बारह सौ किलोमीटर दूर है। इसके विपरीत साबांग वहां से बेहद करीब है और कैंपबेल बे से इसकी दूरी महज 166 किलोमीटर है। ऐसे में इंडोनेशिया का सुमात्रा प्रांत सीमेंट, निर्माण सामग्री और कुशल श्रमशक्ति को बेहद कम लागत पर ग्रेट निकोबार भेज सकता है।

इसके अलावा दोनों बंदरगाह मिलकर आने-जाने वाले कार्गो जहाजों को रिफ्यूलिंग, मेंटेनेंस, वेयरहाउसिंग और ट्रांसशिपमेंट की संयुक्त सुविधाएँ दे सकते हैं। यदि भविष्य में किसी एक बंदरगाह पर ट्रैफिक का अत्यधिक दबाव बढ़ता है, तो दूसरा बंदरगाह एक बेहतरीन बैकअप के रूप में काम कर सकेगा, जिससे पूरे क्षेत्र की लॉजिस्टिक्स दक्षता कई गुना बढ़ जाएगी।

साबांग के विकास का इतिहास और भारत-इंडोनेशिया के ज्वॉइंड वर्किंग फोर्स की भूमिका अहम

भारत और इंडोनेशिया के बीच साबांग बंदरगाह को लेकर आधिकारिक और रणनीतिक बातचीत कोई नई बात नहीं है। इसकी वास्तविक शुरुआत मई 2018 में प्रधानमंत्री मोदी की पहली आधिकारिक इंडोनेशिया यात्रा के दौरान हुई थी, जब इंडोनेशिया के तत्कालीन समुद्री मामलों के समन्वय मंत्री लुहुत पंडजाइतन ने नई दिल्ली को साबांग के बुनियादी ढाँचे को विकसित करने के लिए औपचारिक रूप से आमंत्रित किया था। उसी समय दोनों देशों ने इंडो-पैसिफिक में समुद्री सहयोग पर एक ऐतिहासिक साझा दृष्टिकोण पत्र जारी किया था।

इसके तहत दोनों देशों ने एक ‘संयुक्त कार्य बल’ (Joint Task Force) का गठन किया। इस टास्क फोर्स की पहली बैठक 2019 में बांदा आचे (Aceh) में और दूसरी बैठक 2022 में पोर्ट ब्लेयर में हुई थी। भारत की सरकारी इंजीनियरिंग और कंसल्टेंसी कंपनी ‘राइट्स’ (RITES) ने साबांग बंदरगाह के बुनियादी ढाँचा विकास पर अपनी प्री-फिजिबिलिटी स्टडी भी पूरी कर ली है।

अब 2026 में पीएम मोदी और राष्ट्रपति प्रबोवो के बीच हुई बैठक ने इस संयुक्त परियोजना को कागजों से निकालकर जमीन पर उतारने के लिए नए फंड और समय-सीमा को निर्धारित कर दिया है।

चीन का मुद्दा और साबांग को BRI से बाहर रखने की इंडोनेशियाई रणनीति

इस मेगा प्रोजेक्ट के भू-राजनीतिक निहितार्थों को समझने के लिए ‘चीन के कोण’ (China Angle) को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। दक्षिण-पूर्वी एशिया और हिंद महासागर में चीन अपनी ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ (String of Pearls) नीति के तहत बंदरगाहों का जाल बिछा रहा है। इंडोनेशिया में भी चीन ने अरबों डॉलर का निवेश किया है, जिसमें जकार्ता-बांडुंग हाई-स्पीड ट्रेन और 23 अरब डॉलर के ‘बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव’ (BRI) के तहत चार प्रमुख आर्थिक कॉरिडोर (उत्तरी सुमात्रा, उत्तरी कालीमंतन, उत्तरी सुलावेसी और बाली) शामिल हैं।

लेकिन सबसे महत्वपूर्ण और ध्यान देने योग्य बात यह है कि इंडोनेशिया ने अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को बनाए रखने के लिए बहुत ही सोची-समझी रणनीति के तहत साबांग बंदरगाह को चीन के बीआरआई प्रोजेक्ट्स से पूरी तरह बाहर रखा। हालाँकि एक समय चीन ने साबांग में भारी दिलचस्पी दिखाई थी, लेकिन इंडोनेशिया की सरकार ने इस क्षेत्र की संवेदनशीलता को देखते हुए चीनी प्रस्तावों को आगे नहीं बढ़ाया और साबांग के विकास के लिए चीन के बजाय भारत, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे लोकतांत्रिक देशों को प्राथमिकता दी।

इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि साबांग इंडोनेशिया की राष्ट्रीय अस्मिता और संप्रभुता का एक अमूल्य प्रतीक माना जाता है। इंडोनेशिया की राष्ट्रीय एकता को दर्शाने के लिए वहाँ के राजनीतिक और सामाजिक जीवन में ‘साबांग से मेरुके तक’ का नारा लगाया जाता है, जो ठीक वैसा ही है जैसे भारत में हम ‘कश्मीर से कन्याकुमारी तक’ कहते हैं।

चूँकि साबांग इंडोनेशिया का सबसे पश्चिमी छोर है और इसके पास ही रोंडो और बेंगगाला जैसे संवेदनशील बाहरी द्वीप स्थित हैं, इसलिए इंडोनेशिया कभी नहीं चाहता कि यहाँ चीन जैसी किसी ऐसी विस्तारवादी ताकत का नियंत्रण या प्रभाव स्थापित हो जो भविष्य में उसकी संप्रभुता और सुरक्षा के लिए कोई गंभीर खतरा पैदा कर सके।

सैन्य अड्डा नहीं बल्कि आर्थिक सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता का माध्यम

भारत के रणनीतिक हलकों में अक्सर यह भ्रम फैल जाता है कि साबांग में विकास की अनुमति मिलने का मतलब है कि भारत को वहाँ ‘सैन्य अड्डा’ (Military Base) मिल रहा है। इंडोनेशिया की प्रसिद्ध रणनीतिक विशेषज्ञ देवी फॉर्च्यून अनवर और इंडोनेशियाई राजनयिकों ने हमेशा यह स्पष्ट किया है कि इंडोनेशिया की विदेश नीति ‘स्वतंत्र और सक्रिय’ (Bebas dan Aktif) के सिद्धांत पर चलती है, जो किसी भी विदेशी ताकत को अपनी धरती पर सैन्य अड्डा बनाने की अनुमति नहीं देती।

इसलिए भारत की साबांग में एंट्री कोई सैन्य विस्तार नहीं है, बल्कि यह ‘स्टेटस-सिग्नलिंग’ (Status Signalling) और आर्थिक सुरक्षा का पुल है। साबांग परियोजना का सफल कार्यान्वयन भारत को चीन, जापान और दक्षिण कोरिया की तरह दक्षिण-पूर्वी एशिया में एक बड़े बुनियादी ढाँचा डेवलपर और आर्थिक महाशक्ति के रूप में स्थापित करेगा। यह भारत के एक्ट ईस्ट’ (Act East Policy) और महासागर विजन’ (MAHASAGAR Vision) को वास्तविक ताकत प्रदान करता है।

इस प्रोजेक्ट के सामने कई बड़ी चुनौतियाँ, हालाँकि भारत-इंडोनेशियान निकाल लेंगे हल

इस शानदार और महत्वाकांक्षी साझा समुद्री सपने के सामने कुछ वास्तविक और व्यावहारिक चुनौतियाँ भी खड़ी हैं जिनसे दोनों देशों को मिलकर निपटना होगा। सबसे बड़ी चुनौती बुनियादी ढाँचा परियोजनाओं को तय समय सीमा के भीतर पूरा करने की है, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का पिछला ट्रैक रिकॉर्ड इस मामले में बहुत अच्छा नहीं रहा है और म्यांमार-थाईलैंड त्रिपक्षीय राजमार्ग जैसी कई परियोजनाएं काफी देरी से चल रही हैं।

साबांग के मामले में भारत को अपनी इस प्रशासनिक सुस्ती वाली छवि को पूरी तरह से बदलना होगा और कार्य की गति को तेज बनाए रखना होगा। इसके अलावा आचे और अंडमान के बीच पर्यटन, क्रूज जहाजों और नौकायन को बढ़ावा देने के लिए दोनों देशों को अपने आव्रजन, सीमा शुल्क और वीजा नियमों को बेहद सरल, सुलभ और डिजिटल रूप से आधुनिक बनाना होगा ताकि व्यापारियों और पर्यटकों को कोई असुविधा न हो।

एक और बड़ी चुनौती पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने की है, क्योंकि ग्रेट निकोबार एक बेहद संवेदनशील जैव विविधता क्षेत्र और बायोस्फीयर रिजर्व है। भारत सरकार को यह पूरी तरह सुनिश्चित करना होगा कि बंदरगाह और बुनियादी ढाँचे के विकास के साथ-साथ वहां की मूल जनजातियों के अधिकारों और प्राचीन वर्षावनों का संरक्षण पूरी कड़ाई के साथ किया जाए।

दो समुद्री सभ्यताओं का मिलन साबित हो सकता है ये मेगा प्रोजेक्ट

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की यह इंडोनेशिया यात्रा साबांग और ग्रेट निकोबार को वैश्विक समुद्री व्यापार के नए जुड़वाँ स्तंभों के रूप में स्थापित करने की एक मजबूत और ऐतिहासिक नींव रख चुकी है। यह केवल दो बंदरगाहों का भौतिक विकास नहीं है, बल्कि दो महान समुद्री सभ्यताओं का एक ऐसा आधुनिक पुनर्मिलन है जो आने वाले कई दशकों तक पूरे इंडो-पैसिफिक क्षेत्र की शांति, स्थिरता, आर्थिक प्रगति और सुरक्षा की दिशा और दशा तय करने में सबसे बड़ी भूमिका निभाएगा।

इराक क्यों ले जाया जा रहा है ईरान के अयातुल्लाह खामेनेई का जनाजा?

लंबे इंतजार के बाद ईरान के पूर्व सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई को सुपुर्द-ए-खाक किया जा रहा है। अब यह जनाजा सिर्फ एक मजहबी रस्म नहीं है बल्कि यह ईरान के साथ-साथ इराक, शिया राजनीति और पश्चिम एशिया की बदलती ताकतों से जुड़ा बड़ा संदेश भी बनने जा रहा है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, उनका जनाजा तेहरान और कोम से होते हुए 8 जुलाई को इराक के नजफ और करबला ले जाया जाएगा फिर ईरान के मशहद में गुरुवार (9 जुलाई 2026) को दफनाया जाएगा। इस जनाजे को इराक ले जाने के पीछे कई वजह हैं जिन्हें इस लेख में खोजने की कोशिश करेंगे।

नजफ और करबला की मजहबी अहमियत

शिया मुसलमानों के लिए इराक के नजफ और करबला शहर बेहद मुकद्दस माने जाते हैं। नजफ में हजरत अली की दरगाह है, जिन्हें शिया मुसलमान पहला इमाम मानते हैं। करबला में इमाम हुसैन और हजरत अब्बास की दरगाहें हैं। करबला की घटना शिया इतिहास में सब्र, कुर्बानी और जुल्म के खिलाफ खड़े होने की सबसे बड़ी निशानी मानी जाती है।

इसी वजह से खामेनेई का जनाजा इन शहरों में ले जाना उनके समर्थकों के लिए सिर्फ रस्म नहीं है बल्कि यह उन्हें अहले-बैत की विरासत और शहादत की परंपरा से जोड़ने की कोशिश है। ईरान में खामेनेई को लंबे समय तक इस्लामी क्रांति, शिया नेतृत्व और अमेरिका-इजरायल विरोधी रुख के चेहरे के रूप में देखा गया। अब उनके जनाजे को नजफ और करबला ले जाकर यह दिखाने की कोशिश हो रही है कि उनका रिश्ता सिर्फ ईरानी सत्ता से नहीं बल्कि पूरी शिया उम्मत की मजहबी भावना से था।

खामेनेई के जनाजे को इन मुकद्दस शहरों में ले जाने का मतलब है कि ईरान उन्हें शिया इतिहास की उसी बड़ी कहानी में रखना चाहता है, जिसमें जुल्म के खिलाफ खड़े होने, बाहरी दबाव का मुकाबला करने और मजहबी पहचान बचाने की बात की जाती है। यही वजह है कि उनके समर्थक इस अंतिम यात्रा को सिर्फ एक नेता की विदाई नहीं, बल्कि मुकद्दस सफर के रूप में पेश कर रहे हैं।

अंतिम यात्रा के जरिए ईरान का ‘ताकत’ का संदेश

खामेनेई के जनाजे को इराक ले जाना इसी संदेश का हिस्सा है। ईरान दिखाना चाहता है कि उसके सबसे बड़े नेता की मौत के बाद भी उसका असर खत्म नहीं हुआ है। जनाजा जब ईरान की सीमा से बाहर निकलकर इराक के मुकद्दस शहरों तक जाएगा, तो यह एक तरह से ईरान के क्षेत्रीय प्रभाव का प्रदर्शन भी होगा। संदेश साफ है कि खामेनेई का असर सिर्फ तेहरान तक सीमित नहीं था बल्कि नजफ, करबला और उन शिया समूहों तक भी था जो ईरान को अपना राजनीतिक और धार्मिक सहारा मानते हैं।

इराक के लिए यह जनाजा अकीदत भी है और सियासी इम्तिहान भी

इराक के लिए यह मामला बहुत संवेदनशील है। एक तरफ इराक में बड़ी शिया आबादी है, जिसके लिए नजफ और करबला में किसी बड़े शिया नेता के जनाजे का आना अकीदत का मामला है। दूसरी तरफ इराक एक स्वतंत्र देश है, जिसे अपने रिश्ते ईरान और अमेरिका दोनों के साथ संभालने हैं। यह पूरा कार्यक्रम इराकी प्रधानमंत्री अली अल-जैदी की संभावित अमेरिका यात्रा से ठीक पहले हो रहा है। इसी वजह से इसे और अधिक राजनीतिक माना जा रहा है।

इराकी सरकार नहीं चाहती कि दुनिया को यह संदेश जाए कि बगदाद पूरी तरह तेहरान के प्रभाव में है। खासकर ऐसे समय में जब इराक अमेरिका से भी आर्थिक, सुरक्षा और कूटनीतिक रिश्ते मजबूत करना चाहता है। अगर इराक सरकार जनाजे में ज्यादा सक्रिय दिखती है तो अमेरिका और पश्चिमी देशों को यह संकेत मिल सकता है कि इराक अब भी ईरान की लाइन पर चल रहा है। अगर सरकार दूरी बनाती है तो ईरान समर्थक शिया गुट नाराज हो सकते हैं।

यही वजह है कि खामेनेई का जनाजा इराकी सरकार के लिए एक तरह का सियासी इम्तिहान बन गया है। उसे धार्मिक भावनाओं का सम्मान भी करना है और अपनी स्वतंत्र विदेश नीति की छवि भी बचानी है।

इराक के पॉपुलर मोबिलाइजेशन फोर्सेज (PMU) और शिया कोऑर्डिनेशन फ्रेमवर्क से जुड़े गुट इस जनाजे को इराक में आयोजित कराने के पक्ष में हैं। ईरानी पक्ष का दावा है कि इराकी नेताओं और समूहों ने यह अनुरोध किया था। वहीं, कुछ इराकी सूत्रों के मुताबिक यह माँग सीधे सरकार से नहीं बल्कि शिया राजनीतिक गुटों से आई। इसका मतलब यह है कि इराक के भीतर भी इस आयोजन को लेकर एकराय नहीं है।

सुलेमानी, रईसी और अब खामेनेई

मीडिया रिपोर्ट्स में बताया गया है कि कासिम सुलेमानी का जनाजा ईरान की सैन्य और क्षेत्रीय ताकत का प्रतीक था। इब्राहिम रईसी का जनाजा राज्य की निरंतरता दिखाने वाला आयोजन था। खामेनेई का जनाजा इन दोनों से बड़ा राजनीतिक अर्थ रखता है। यह ईरान की वैचारिक वैधता, शिया नेतृत्व की दावेदारी और क्षेत्रीय प्रभाव की परीक्षा है। इसलिए इराक की पवित्र धरती को इस यात्रा में शामिल करना ईरान के लिए बेहद सोचा-समझा कदम दिखता है।

खामेनेई का जनाजा इराक ले जाने के पीछे धार्मिक श्रद्धा, शिया प्रतीकवाद, ईरान की क्षेत्रीय राजनीति, इराकी सत्ता संतुलन और अमेरिका-ईरान तनाव, सब जुड़े हुए हैं। नजफ और करबला की यात्रा से ईरान यह दिखाना चाहता है कि खामेनेई सिर्फ ईरान के नेता नहीं थे बल्कि पूरे शिया राजनीतिक संसार में असर रखने वाली शख्सियत थे।

वहीं, इराक के लिए यह आयोजन सम्मान, दबाव और जोखिम तीनों का मिला-जुला मामला है। यही वजह है कि यह जनाजा एक अंतिम यात्रा से कहीं ज्यादा, पश्चिम एशिया की बदलती राजनीति का बड़ा संकेत बन गया है।

70 मिनट में एक के बाद एक फटे 21 IED, 57 की मौत और सैकड़ों घायल: पढ़ें- अहमदाबाद ब्लास्ट की कहानी, केरल के जंगलों में ट्रेनिंग कर आए थे SIMI और इंडियन मुजाहिदीन के आतंकी

अहमदाबाद ब्लास्ट केस में 18 साल बाद गुजरात हाईकोर्ट ने अपना फैसला सुनाया है। कोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखते हुए 49 दोषियों में से 11 को उम्रकैद और 38 को फाँसी की सजा दी है। इस मामले में 28 लोगों को पहले ही बरी कर दिया गया था, जबकि एक आरोपित सरकारी गवाह बन गया था।

26 जुलाई 2008 को अहमदाबाद में एक के बाद एक 21 बम धमाके हुए थे, जिसमें 56 लोगों की जान चली गई थी और 240 से ज्यादा लोग घायल हुए थे। कोर्ट ने राज्य सरकार को पीड़ितों को मुआवजा देने का भी निर्देश दिया है। इसके तहत मृतकों के परिजनों को 10 लाख रुपए और घायलों को 1 लाख रुपए देने को कहा है।

70 मिनट में 21 जगहों पर बम धमाके

26 जुलाई 2008 को अहमदाबाद में शाम करीब 6:45 बजे से 8:00 बजे के बीच करीब 70 मिनट के अंतराल में 21 अलग-अलग जगहों पर सिलसिलेवार बम धमाके हुए थे। इन आतंकवादी हमलों में 56 लोग मारे गए और 240 से अधिक लोग घायल हो गए। पूरा शहर दहल चुका था। अस्पतालों में भारी अफरा-तफरी मच गई थी। घायलों को अस्पताल लाया गया था।

धमाकों को अंजाम देने से ठीक पहले, इंडियन मुजाहिदीन के आतंकवादियों ने कई मीडिया घरानों को ईमेल भेजा था और हमलों की चेतावनी दी थी। उस वक्त इंडियन मुजाहिदीन का नाम आतंकी लिस्ट में नहीं था। उसे 2010 की पुणे जर्मन बेकरी विस्फोट की जिम्मेदारी लेने के बाद प्रतिबंधित किया गया था। उस हमले में 17 लोगों की मौत हो गई थी जबकि कई लोग घायल हुए थे।

सबसे चौंकाने वाली बात यह थी कि कुछ धमाके उन अस्पतालों के बाहर हुए जहाँ पहले विस्फोटों के घायलों को इलाज के लिए लाया जा रहा था। इससे अधिक से अधिक जान-माल का नुकसान करने की कोशिश की गई थी। यह हमले शहर के बेहद भीड़-भाड़ वाले और सार्वजनिक स्थानों को निशाना बनाकर किए गए थे। इनमें सिविल अस्पताल और एल.जी. अस्पताल मणिनगर, बापूनगर, और नरोडा इलाके के सार्वजनिक बसों, साइकिलों और बाजारों में ब्लास्ट कैसे किए गए।

साइकिल में टिफिन बम में हुआ ब्लास्ट

आतंकवादियों ने साइकिलों पर टिफिन में आईईडी छिपा कर ज्यादातर जगहों पर रखा था और उन्हें टाइमर के जरिए विस्फोट किया। कई जगहों पर दूसरे वाहनों का भी इस्तेमाल किया गया। 21 जगहों को इस तरह चुना गया, जहाँ काफी भीड़ भाड़ होती थी। धमाकों के दो दिन बाद गुजरात पुलिस और आतंकवाद निरोधी दस्ते ने सूरत के अलग-अलग इलाकों से 29 जिंदा बम बरामद किए थे, जो सही सर्किट या डेटोनेटर नहीं जुड़ने के कारण फटे नहीं थे। इन्हें सुरक्षा एजेंसियों ने इनएक्टिव किया।

जाँच एजेंसियों के मुताबिक, आतंकियों ने ईमेल में लिखा था कि यह 2002 के गोधरा के बाद गुजरात हिंसा का बदला लेने के लिए किया गया है।

तत्कालीन गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने राज्य में शांति की अपील की और घटना की कड़े शब्दों में निंदा करते हुए दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की बात कही थी।

78 पर चला केस, 49 को मिली सजा

इस मामले में एक आरोपित अयाज सैयद सरकारी गवाह बन गया था। केस के दौरान ट्रायल कोर्ट में करीब 1163 गवाहों ने अपने बयान दर्ज कराए। कोर्ट में रोजाना 491 दिनों तक हर दिन केस पर सुनवाई हुई और 100 से ज्यादा वकील इसमें शामिल हुए। इस मामले को देश के सबसे बड़े धमाकों में गिना जाता है। अदालत ने इसे रेयरेस्ट ऑफ रेयर केस माना।

अहमदाबाद की विशेष अदालत ने स्पेशल जज एआर पटेल ने अपने फैसले में 28 आरोपितों को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया गया था। जबकि मृतकों के परिजनों को 1-1 लाख रुपए का मुआवजा देने का भी आदेश दिया।

जाँच के दौरान कई ऐसी घटनाएँ भी घटी, जिसकी चर्चा हुई। 2013 में जेल में बंद कुछ आरोपितों ने सुरंग बनाकर फरार होने की साजिश रची थी, लेकिन सुरक्षाबलों ने नाकाम कर दिया।

अहमदाबाद की विशेष अदालत ने मामले में 49 लोगों को दोषी ठहराया था। गुजरात हाईकोर्ट ने इन सभी 38 दोषियों की फाँसी की सजा और 11 अन्य दोषियों की उम्रकैद की सजा दी थी, जिसे गुजरात हाईकोर्ट ने बरकरार रखा है। इसके साथ ही कोर्ट ने राज्य सरकार को मृतकों के परिजनों को 10 लाख रुपये और घायलों को 1 लाख से 5 लाख रुपये तक का मुआवजा देने का भी आदेश दिया है।

सिमी और इंडियन मुजाहिद्दीन ने रची थी साजिश

2008 के अहमदाबाद बम धमाकों की साजिश बहुत गहरी थी, जिसका ताना-बाना देश के अलग-अलग राज्यों में बुना गया था। पुलिस जाँच और अदालती कार्यवाही में इसके मास्टरमाइंड और आतंकियों की ट्रेनिंग से जुड़ी अहम जानकारी सामने आई थी।

प्रतिबंधित संगठन सिमी (SIMI) और इंडियन मुजाहिदीन (IM) के शीर्ष नेताओं की तिकड़ी ने मिलकर इसकी पूरी साजिश रची थी। मुफ्ती अबू बशर को पूरे ब्लास्ट का मुख्य मास्टरमाइंड और वैचारिक मार्गदर्शक माना गया। उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ के रहने वाले इस मौलवी ने युवाओं को भड़काने और हमले के लिए उनका ‘ब्रेनवॉश’ करने का काम किया था। सिमी के पूरे धमाकों की योजना को अंतिम रूप दिया।

हैदराबाद ब्लास्ट मामले में दोषी पाया गया यासीन भटकल इस मामले मं भी शामिल था। भटकल बंधु यानी रियाज और यासीन इंडियन मुजाहिदीन के खूंखार आतंकियों में शुमार थे, जो बमों को बनाने, विस्फोटक जुटाने और उन्हें सही समय पर प्लांट करने का तकनीकी काम संभाल रहे थे। सुरक्षा एजेंसियों की जाँच के मुताबिक, धमाकों को अंजाम देने से पहले आतंकियों के लिए घने जंगलों में गुप्त ट्रेनिंग कैंप आयोजित किए गए थे।

केरल के वागामोन जंगल में दिसंबर 2007 में सिमी का एक बेहद गुप्त और बड़ा ट्रेनिंग कैंप आयोजित हुआ था। सफदर नागौरी की देखरेख में आयोजित इस कैंप में देश के करीब आधा दर्जन राज्यों (जैसे गुजरात, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश आदि) से आए 50 से अधिक कट्टरपंथी युवाओं ने हिस्सा लिया था।

इस कैंप में आतंकियों को शारीरिक रूप से मजबूत बनाने के अलावा हथियार चलाने, कमांडो कॉम्बैट, रस्सी पर चढ़ने और आईईडी और टाइमर बम बनाने की ट्रेनिंग दी गई थी। इसके बाद गुजरात के स्थानीय युवकों जैसे- अयाज सैयद का इस्तेमाल अहमदाबाद में साइकिलों और बसों में बम रखने के लिए किया गया। फिर एक के बाद एक 21 जगहों पर 70 मिनट में धमाके किए गए।