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नेपाल में 10 साल बाद ₹200 और ₹500 के नए भारतीय नोटों का इस्तेमाल शुरू, मोदी सरकार की बड़ी कूटनीतिक जीत: जानिए कैसे पड़ोसी देश में यात्रा-व्यापार होगी आसान

नेपाल घूमने जाने वाले भारतीय पर्यटकों और पड़ोसी देश के साथ कारोबार करने वाले व्यापारियों के लिए एक बेहद राहत भरी और बड़ी खबर सामने आई है। नेपाल सरकार ने करीब एक दशक पुराने प्रतिबंध को खत्म करते हुए ₹200 और ₹500 मूल्यवर्ग के नए भारतीय करेंसी (Currency) नोटों के इस्तेमाल को हरी झंडी दे दी है।

नेपाल राष्ट्र बैंक (NRB) की इस आधिकारिक घोषणा को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भारत सरकार के मजबूत द्विपक्षीय (Bilateral) प्रयासों और भारतीय नागरिकों की एक बड़ी जीत के रूप में देखा जा रहा है। इस फैसले के बाद अब दोनों देशों के नागरिक बिना किसी परेशानी के ये नोट सीमा पार ले जा सकेंगे, जिससे सालों से चली आ रही करेंसी से जुड़ी समस्याएँ पूरी तरह दूर हो जाएँगी।

नेपाल राष्ट्र बैंक द्वारा जारी नए दिशानिर्देशों के अनुसार, यह छूट केवल 9 नवंबर 2016 की नोटबंदी के बाद भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) द्वारा जारी किए गए नए ₹200 और ₹500 के नोटों पर ही लागू होगी। नेपाल सरकार ने यह साफ कर दिया है कि 2016 की नोटबंदी से पहले जारी हुए पुराने ₹500 और ₹1,000 के भारतीय नोट नेपाल में पहले की तरह ही पूरी तरह से प्रतिबंधित (Prohibited) रहेंगे।

इसके अलावा नेपाल जाने वाले या वहाँ से वापस भारत आने वाले यात्रियों के लिए भारतीय मुद्रा ले जाने की एक सीमा तय की गई है, जिसके तहत एक व्यक्ति अधिकतम ₹25,000 मूल्य तक के ही भारतीय नोट अपने साथ रख सकता है।

गाइडलाइन्स भी की गई जारी, भारतीय नोटों की एक सीमा तय

विदेशी मुद्रा के लेनदेन को लेकर नेपाल राष्ट्र बैंक ने नए नियम और गाइडलाइंस (Guidelines) भी सार्वजनिक किए हैं। इन नियमों के तहत नेपाली नागरिक और विदेशी यात्री 5,000 अमेरिकी डॉलर (या इसके बराबर की अन्य विदेशी मुद्रा) तक बिना किसी कस्टम डिक्लेरेशन (Custom Declaration) के नेपाल में ला सकते हैं। यदि किसी यात्री के पास ₹100 या उससे छोटे भारतीय नोट हैं, तो वह 5,000 डॉलर के मूल्य के बराबर की राशि बिना कस्टम घोषणा के अपने साथ ले जा सकता है।

हालाँकि अगर किसी यात्री के पास 5,000 अमेरिकी डॉलर से अधिक की विदेशी मुद्रा या तय सीमा से ज्यादा नकदी (Cash) है, तो उसे हवाई अड्डे या सीमा पार कस्टम कार्यालय में इसकी लिखित घोषणा करनी होगी। इसके अलावा नेपाल से किसी तीसरे देश में भारतीय करेंसी ले जाना पूरी तरह से गैर-कानूनी घोषित किया गया है।

इस ऐतिहासिक फैसले और दोनों देशों के बीच बने नए नियमों की जानकारी देते हुए नेपाल राष्ट्र बैंक के प्रवक्ता गुरु प्रसाद पौडेल ने कहा, “हमने भारतीय रिजर्व बैंक के साथ लगातार संपर्क बनाए रखा और आवश्यक समीक्षा के बाद ही नए नियमों को अंतिम रूप दिया है। नेपाल राष्ट्र बैंक (NRB) ने 23 जुलाई 2026 को इस संबंध में औपचारिक अधिसूचना जारी की है। इस फैसले का सीधा मकसद नेपाल आने वाले भारतीय पर्यटकों, सीमावर्ती इलाकों के निवासियों और दोनों देशों के कारोबारियों को करेंसी संबंधी परेशानियों से निजात दिलाना है। अब भारतीय नागरिक बिना किसी झंझट के नेपाल में अपने वैध भारतीय नोटों से भुगतान कर सकेंगे।”

नोट क्यों हुए थे बैन?

भारत और नेपाल के बीच रिश्तों को नई ऊँचाई देने वाले इस फैसले के पीछे एक लंबा घटनाक्रम रहा है। दरअसल, 8 नवंबर 2016 को जब भारत सरकार ने 500 और 1,000 रुपये के पुराने नोटों को बंद करने का फैसला लिया था, तब नेपाल के बैंकिंग सिस्टम (System) में अरबों रुपये के भारतीय नोट मौजूद थे। नोटबंदी के तुरंत बाद नेपाल ने सुरक्षा, विधिक और आर्थिक कारणों से ₹100 से बड़े सभी नए भारतीय नोटों के इस्तेमाल पर पूरी तरह से रोक लगा दी थी।

नेपाल सरकार को मुख्य रूप से यह आशंका थी कि बिना किसी औपचारिक समझौते या तंत्र (Mechanism) के नए नोटों का चलन शुरू होने से सीमा पार जाली नोटों (Counterfeit) का कारोबार बढ़ सकता है और काले धन (Black Money) की जमाखोरी हो सकती है। इसके साथ ही पुराने भारतीय नोटों के निपटारे को लेकर भारत और नेपाल के केंद्रीय बैंकों के बीच लंबे समय तक बातचीत चलती रही, जिसके कारण नए नोटों को हरी झंडी मिलने में एक दशक का समय लग गया।

मोदी सरकार की कूटनीतिक जीत

मोदी सरकार के दौरान भारत ने ‘नेबरहुड फर्स्ट’ (Neighborhood First) नीति के तहत नेपाल के साथ कूटनीतिक और आर्थिक संबंधों को लगातार प्राथमिकता दी है। भारत सरकार के वरिष्ठ विदेश अधिकारियों और वित्तीय संस्थानों के निरंतर संवाद का ही परिणाम है कि नेपाल ने अंततः एक दशक पुराने इस कड़े प्रतिबंध को हटाने का निर्णय लिया।

इससे न केवल भारतीय पर्यटकों का नेपाल दौरा सुगम होगा, बल्कि दोनों देशों के बीच जमीनी स्तर पर होने वाले छोटे और बड़े व्यापार को भी एक नई दिशा मिलेगी। भारतीय यात्रियों को अब नेपाल में खरीदारी, होटल बुकिंग और यात्रा के दौरान छोटे भारतीय नोटों की किल्लत का सामना नहीं करना पड़ेगा।

जहाँ महात्मा बुद्ध ने दिया पहला उपदेश, वो सारनाथ अब UNESCO की विश्व धरोहर: UP की सांस्कृतिक विरासत को वैश्विक पहचान, जानें- राज्य के और कौन से स्थल सूची में शामिल

उत्तर प्रदेश के इतिहास और सांस्कृतिक सफर में एक बड़ा और ऐतिहासिक मोड़ आया है। वाराणसी के पास स्थित सारनाथ को यूनेस्को (UNESCO) की विश्व धरोहर सूची में औपचारिक रूप से शामिल कर लिया गया है। यह कोई साधारण उपलब्धि नहीं है बल्कि इसके पीछे 28 सालों का एक लंबा इंतजार और भारतीय पुरातत्वविदों की मेहनत छिपी हुई है।

साल 1998 में सारनाथ को यूनेस्को की संभावित सूची में जगह मिली थी, और तब से लेकर अब तक इसके पुरातात्विक अवशेषों को संभालने, उनका रिकॉर्ड तैयार करने और अंतरराष्ट्रीय मानकों पर खरा उतरने की निरंतर कोशिशें चल रही थीं। सारनाथ भारत की पहचान और इतिहास का एक बेहद मजबूत स्तंभ है।

यह वही पवित्र जगह है जहाँ बोधगया में ज्ञान प्राप्त करने के बाद भगवान बुद्ध ने अपना पहला उपदेश दिया था और बौद्ध संघ की नींव रखी थी। बौद्ध धर्म के साथ-साथ यह स्थान जैन धर्म के लिए भी उतना ही पवित्र है, क्योंकि इसे 11वें जैन तीर्थंकर भगवान श्रेयांसनाथ की जन्मभूमि और तपस्या की धरती माना जाता है।

इतना ही नहीं स्वतंत्र भारत का जो ‘राष्ट्रीय प्रतीक’- चार सिंहों वाला अशोक स्तंभ, हम आज देखते हैं, उसका मूल स्वरूप भी सारनाथ की इसी पावन मिट्टी से निकला है। अब तक उत्तर प्रदेश में केवल तीन यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल थे और वे तीनों के तीनों आगरा जिले में स्थित थे- ताजमहल, आगरा का किला और फतेहपुर सीकरी।

सारनाथ के इस सूची में जुड़ते ही उत्तर प्रदेश में विश्व धरोहरों की संख्या बढ़कर चार हो गई है। खास बात यह है कि सारनाथ पूरे पूर्वांचल क्षेत्र का पहला यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल बना है, जिससे इस पूरे इलाके के पर्यटन, अर्थव्यवस्था और पहचान को एक नया आयाम मिलेगा।

सारनाथ का यह यूनेस्को सफर कैसे पूरा हुआ, इसका बौद्ध और जैन इतिहास क्या है, सम्राट अशोक का इस जगह से क्या नाता रहा, मिट्टी के नीचे दबे इसके इतिहास की खुदाई कैसे हुई, आइए इन सभी पहलुओं को विस्तार से समझते हैं।

28 साल का लंबा सफर और यूनेस्को की अंतरराष्ट्रीय मान्यता

सारनाथ को यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल कराने का प्रयास कोई एक या दो दिन की बात नहीं है। इसकी औपचारिक शुरुआत वर्ष 1998 में हुई थी जब भारत सरकार ने इसे यूनेस्को की संभावित सूची में नामांकित किया था।

इसके बाद लगभग ढाई दशकों से भी ज्यादा समय तक नोडल एजेंसी के रूप में काम कर रहे भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) और उत्तर प्रदेश के पर्यटन विभाग ने मिलकर इस पूरे परिसर के संरक्षण और दस्तावेजीकरण पर काम किया।

दक्षिण कोरिया के बुसान शहर में आयोजित विश्व धरोहर समिति के 48वें सत्र के दौरान 2025-26 चक्र की दावेदारी में ‘सारनाथ के प्राचीन बौद्ध स्थल’ को यह ऐतिहासिक मान्यता दी गई। इस प्रक्रिया के तहत सितंबर 2025 में आईकोमॉस (ICOMOS) का तकनीकी मूल्यांकन मिशन भी सारनाथ की वैज्ञानिक सुरक्षा जाँच करने भारत आया था।

सारनाथ को यह दर्जा मिलते ही यह भारत का 45वाँ यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल बन गया है। इसके साथ ही भारत अब सबसे ज्यादा विश्व धरोहर स्थलों के मामले में पूरी दुनिया में छठवें और एशिया-पैसिफिक क्षेत्र में दूसरे स्थान पर आ गया है। यूनेस्को ने सारनाथ के उस अद्वितीय विश्वव्यापी महत्व को स्वीकार किया, जिसने सदियों से दुनिया को प्रभावित किया है।

भारत की ओर से 69 अन्य पुरातात्विक स्थल फिलहाल यूनेस्को की संभावित सूची में शामिल हैं। इस फैसले के बाद सारनाथ के अवशेषों के संरक्षण के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर के विशेषज्ञ, तकनीकी संसाधन और विशेष सुरक्षा मानकों का लाभ लगातार मिलता रहेगा।

शिष्यों को उपदेश देते बुद्ध की सारनाथ में स्थित प्रतिमा (फाइल फोटो)

भगवान बुद्ध का पहला उपदेश और सारनाथ का धार्मिक इतिहास

सारनाथ का आध्यात्मिक इतिहास भगवान बुद्ध के जीवन की एक सबसे महत्वपूर्ण घटना से जुड़ा हुआ है। खुद भगवान बुद्ध ने सारनाथ को बौद्ध तीर्थयात्रा के चार सबसे मुख्य तीर्थ स्थलों में से एक बताया था। जब सिद्धार्थ गौतम को बोधगया में पीपल के पेड़ के नीचे ज्ञान की प्राप्ति हुई, तो उन्होंने अपने इस ज्ञान से पूरी दुनिया के दुखों को दूर करने का फैसला किया।

ज्ञान मिलने के बाद भगवान बुद्ध सबसे पहले सारनाथ आए, जिसे उस जमाने में ऋषिपत्तन या मृगदाव यानी हिरणों का अभयारण्य कहा जाता था। सारनाथ के इस शांत वातावरण में हीं बुद्ध ने आषाढ़ पूर्णिमा के दिन अपने प्रथम पाँच शिष्यों को अपना पहला उपदेश दिया, जिसे बौद्ध साहित्य में ‘धम्मचक्कप्पवत्तन’ यानी धर्मचक्र प्रवर्तन कहा जाता है।

सारनाथ में स्थित शिलालेख (फाइल फोटो)

सारनाथ के विश्व धरोहर घोषित होने के साथ ही बुद्ध द्वारा बताए गए चार सबसे प्रमुख तीर्थ स्थलों में से तीन अब यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल हो चुके हैं। इनमें नेपाल का लुंबिनी, बिहार का महाबोधि मंदिर (बोधगया) और अब उत्तर प्रदेश का सारनाथ शामिल है।

बुद्ध ने अपने पहले उपदेश में संसार के दुखों और उनसे मुक्ति के अष्टांगिक मार्ग के बारे में बताया था और यहीं पहले ‘बौद्ध संघ’ की स्थापना की थी। बौद्ध धर्म के अलावा सारनाथ जैन धर्म के लिए भी बेहद पावन है, क्योंकि यह 11वें जैन तीर्थंकर भगवान श्रेयांसनाथ की जन्मभूमि और तपस्या की धरती मानी जाती है।

कालान्तर में इस क्षेत्र का नाम यहाँ स्थित सारंगनाथ (शिव) मंदिर के नाम से प्रभावित होकर ‘सारनाथ’ पड़ा।

सम्राट अशोक, अशोक स्तंभ और भारत का राष्ट्रीय प्रतीक

सारनाथ के इतिहास में ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी का दौर सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है, जब मौर्य वंश के महान सम्राट अशोक का शासन था। कलिंग के भीषण युद्ध और उसमें हुए भारी खून-खराबे के बाद सम्राट अशोक ने हिंसा का रास्ता पूरी तरह त्यागकर बौद्ध धर्म अपना लिया था।

इसके बाद उन्होंने सारनाथ को बौद्ध धर्म का एक बहुत बड़ा केंद्र बनाने का निर्णय लिया और यहाँ कई स्तूपों, विहारों और पत्थर के खंभों का निर्माण कराया। इन्हीं निर्माणों में सबसे प्रसिद्ध है सारनाथ का ‘अशोक स्तंभ’, जो प्राचीन भारतीय स्थापत्य कला और पाषाण शिल्प की एक बेजोड़ मिसाल है।

1904–06 में हुए उत्खनन में मिले अशोक स्तंभ और उसके सिंह शीर्ष के साथ मूलगंधकुटी विहार का दृश्य (स्रोत: भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण)।

यह स्तंभ मिर्जापुर के चुनार से लाए गए बलुआ पत्थर के एक ही विशाल टुकड़े को तराशकर बनाया गया था और इसकी कुल ऊँचाई लगभग 15.25 मीटर थी। इस स्तंभ पर मौर्यकाल की एक विशेष चमकदार पॉलिश की गई है, जो हजारों साल बीत जाने के बाद भी आज भी शीशे की तरह चमकती है।

इस बेलनाकार स्तंभ पर तीन अलग-अलग राजाओं और कालखंडों के अभिलेख लिखे गए हैं। सबसे पहला अभिलेख सम्राट अशोक की ब्राह्मी लिपि में है, जिसमें बौद्ध संघ में फूट डालने वाले भिक्षु-भिक्षुणियों को सख्त हिदायत दी गई है। दूसरा अभिलेख कौशांबी के कुषाण राजा अश्वघोष के काल का है और तीसरा अभिलेख गुप्त काल के आचार्यों से संबंधित है।

सारनाथ में स्थित शिलालेख (फाइल फोटो)

इसी स्तंभ के ऊपर चार पीठ से पीठ सटाकर बैठे सिंहों की मूर्ति लगी थी, जो मौर्य कला का सबसे बेहतरीन नमूना है। आजादी के बाद भारत सरकार ने इसी सिंह शीर्ष को अपने ‘राष्ट्रीय प्रतीक’ के रूप में अपनाया और इसके निचले हिस्से में बने 24 तीलियों वाले धर्मचक्र को हमारे राष्ट्रीय ध्वज यानी तिरंगे के बीच में जगह दी।

प्राचीन स्तूप और खंडहर: धम्मेख, चौखंडी और मूलगंधकुटी

सारनाथ का पुरातात्विक परिसर काफी बड़े क्षेत्र में फैला हुआ है, जहाँ प्राचीन भारत की सुंदर इमारतें और उनके अवशेष आज भी बिखरे पड़े हैं। यहाँ का सबसे विशाल और मुख्य आकर्षण ‘धम्मेख स्तूप’ है। यह विशाल स्तूप ठीक उसी जगह पर बनाया गया है जहाँ खड़े होकर भगवान बुद्ध ने अपने पाँच शिष्यों को पहला उपदेश दिया था।

सारनाथ में स्थित स्तूप (साभार: encounterstravel)

यह स्तूप लगभग 43.6 मीटर ऊँचा है और इसके निचले हिस्से में पत्थरों पर बहुत बारीक और सुंदर नक्काशी की गई है, जिसमें लताएँ, फूल-पत्तियाँ और ज्यामितीय डिजाइन बने हुए हैं।धम्मेख स्तूप के अलावा परिसर में ‘धर्मराजिका स्तूप’ की नींव के अवशेष भी मौजूद हैं, जिसे सम्राट अशोक ने बुद्ध के पवित्र अवशेषों को सुरक्षित रखने के लिए बनवाया था।

इसके पास ही ‘मूलगंधकुटी विहार’ के अवशेष हैं। यह वह खास जगह मानी जाती है जहाँ भगवान बुद्ध सारनाथ में रुकने के दौरान अपनी मूल कुटिया में ध्यान लगाया करते थे। मुख्य परिसर से थोड़ा पहले ईंटों का बना ‘चौखंडी स्तूप’ स्थित है। माना जाता है कि बोधगया से आते समय भगवान बुद्ध की अपने पाँच शिष्यों से पहली मुलाकात इसी स्थान पर हुई थी।

बाद में मुगल काल के दौरान, 1588 ईस्वी में बादशाह हुमायूं के यहाँ आने की खुशी में राजा टोडरमल के पुत्र गोवर्धन ने इस चौखंडी स्तूप के ऊपर एक आठ कोनों वाली मीनार बनवा दी थी। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा हाल के दिनों में भी यहाँ ईंटों से बने मन्नत वाले स्तूपों के वैज्ञानिक संरक्षण का काम प्रमुखता से किया गया है।

मलबे के नीचे दबे इतिहास की खुदाई और सारनाथ संग्रहालय

मध्यकाल के बाद देश में हुई राजनीतिक उथल-पुथल और विदेशी आक्रमणों की वजह से सारनाथ का यह भव्य बौद्ध केंद्र धीरे-धीरे उजाड़ हो गया। समय बीतने के साथ-साथ यहाँ की प्राचीन इमारतें ढह गईं और यह पूरा का पूरा ऐतिहासिक इलाका मिट्टी, झाड़ियों और मलबे के नीचे दबकर गुमनाम हो गया।

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) पिछले 150 से भी ज्यादा सालों से सारनाथ में प्राचीन बौद्ध स्थलों की खुदाई और संरक्षण का काम लगातार करता आ रहा है। इसी निरंतर प्रयास की वजह से सारनाथ की असली पहचान दुनिया के सामने आ सकी।

साल 1798 में मिस्टर डंकन और कर्नल मैकंजी द्वारा शुरुआती ध्यान आकर्षित करने के बाद, 1835-36 में सर अलेक्जेंडर कनिंघम ने यहाँ पहली व्यवस्थित खुदाई कराई। इसके बाद मेजर किट्टो, एफओ ऑरटेल, सर जॉन मार्शल और दयाराम साहनी जैसे पुराविदों ने यहाँ बड़े पैमाने पर काम किया।

खुदाई में मिले ऐतिहासिक अशोक स्तंभ के मूल ‘सिंह शीर्ष’ और गुप्त काल की अति दुर्लभ ‘धर्मचक्रप्रवर्तन बुद्ध प्रतिमा’ को सहेजने के लिए साल 1904 में ही कदम उठाए गए थे।

बाद में 1910 में इसे पूरी तरह स्थापित किया गया, जिसे आज भारत का सबसे पुराना साइट म्यूजियम (स्थल संग्रहालय) माना जाता है। आज भी इस संग्रहालय में खुदाई से निकली सैकड़ों प्राचीन मूर्तियाँ और ऐतिहासिक साक्ष्य रखे हुए हैं।

संग्राहलय में सुरक्षित रखी गई हैं मूर्तियाँ (साभार: casualwalker)

उत्तर प्रदेश के अन्य यूनेस्को स्थल

सारनाथ का नाम यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में दर्ज होने के बाद अब उत्तर प्रदेश में कुल चार यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल हो चुके हैं। सारनाथ से पहले राज्य के बाकी तीनों स्थल आगरा जिले में स्थित हैं। इनमें पहला है ‘ताजमहल’, जो अपनी सुंदरता के लिए दुनिया के सात अजूबों में गिना जाता है।

दूसरा है ‘आगरा का किला’ और तीसरा स्थल ‘फतेहपुर सीकरी’ है, जिसे सम्राट अकबर ने अपनी नई राजधानी के रूप में बसाया था और जहाँ बुलंद दरवाजा स्थित है। सारनाथ उत्तर प्रदेश का चौथा और पूरे पूर्वांचल क्षेत्र का पहला यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल बन गया है। इस अंतरराष्ट्रीय पहचान से भारत की सांस्कृतिक कूटनीति को बहुत बड़ी ताकत मिलेगी।

जापान, थाईलैंड, म्यांमार, कंबोडिया और वियतनाम जैसे बौद्ध बहुल देशों के साथ भारत के रिश्ते और मजबूत होंगे। पूर्वांचल क्षेत्र में विदेशी तीर्थयात्रियों की आवाजाही बढ़ने से वाराणसी और आसपास के इलाकों में होटल, गाइड, लोकल ट्रांसपोर्ट और बनारसी साड़ी व हस्तशिल्प उद्योग से जुड़े लाखों लोगों को सीधा फायदा और रोजगार मिलेगा।

UP में शिक्षकों-शिक्षणेत्तर कर्मियों के लिए ‘CM शिक्षक कैशलेस चिकित्सा योजना’ लागू, 20+ लाख कर्मचारियों को मिलेगा फायदा: जानिए योगी सरकार ने क्यों लिया ये बड़ा फैसला

मुख्यमंत्री शिक्षक कैशलेस चिकित्सा योजना उत्तर प्रदेश की योगी सरकार की एक नई स्वास्थ्य सुरक्षा योजना है, जिसका उद्देश्य राज्य के शिक्षकों और शिक्षा विभाग से जुड़े कर्मचारियों को कैशलेस इलाज मुहैया कराता है। इस योजना का शुभारंभ मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने किया।

योजना के तहत बेसिक और माध्यमिक शिक्षा विभाग के पात्र शिक्षकों- कर्मचारियों और उनके आश्रितों को लाभ पहुँचाने के बाद आगरा में उच्च शिक्षा विभाग के 7.50 लाख से अधिक शिक्षकों और उनके आश्रित परिजनों को स्वास्थ्य-सुरक्षा प्रदान करने वाली ‘मुख्यमंत्री शिक्षक कैशलेस चिकित्सा योजना’ का रविवार (26 जुलाई 2026) को आगरा से शुभारंभ किया।

क्या कहा सीएम योगी ने

आगरा में योजना के शुभारंभ के मौके पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि शिक्षक राष्ट्र निर्माण की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी हैं, इसलिए उनके स्वास्थ्य की सुरक्षा सरकार की प्राथमिकता है। आर्थिक कारणों से किसी शिक्षक या उसके परिवार का इलाज प्रभावित नहीं होना चाहिए। यह योजना शिक्षकों को सम्मान, सुरक्षा और बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं देने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। सरकार शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करने के साथ-साथ शिक्षकों के सामाजिक और स्वास्थ्य संबंधी कल्याण के लिए भी प्रतिबद्ध है।

उन्होंने कहा कि दुर्घटना की चपेट में कोई भी आ सकता है। ऐसे कठिन समय में डबल इंजन सरकार उस व्यक्ति एवं उसके परिवार के साथ पूर्ण संवेदनशीलता, प्रतिबद्धता और विश्वास के साथ खड़ी है, ताकि उन्हें हर संभव सहायता और संबल मिल सके।

इस अवसर पर मुख्यमंत्री शिक्षक कैशलेस चिकित्सा कार्ड वितरित करने के साथ ही शिक्षकों को सामाजिक सुरक्षा कवच उपलब्ध कराने के लिए उच्च शिक्षा विभाग और पंजाब नेशनल बैंक के बीच समझौतों पर हस्ताक्षर हुए।

सीएम योगी ने कहा कि उन्हें पूरा विश्वास है कि राज्य के शिक्षक इस योजना का समुचित लाभ लेते हुए प्रदेश एवं देश की एकता, अखंडता और प्रगति में अपना योगदान देंगे। उन्होंने शिक्षकों और शिक्षा विभाग के कर्मचारियों को इसके लिए बधाई दी।

योजना के तहत अलग-अलग श्रेणियों के पात्र शिक्षा कर्मियों को शामिल किया गया है, इनमें बेसिक, माध्यमिक और उच्च शिक्षा विभाग के पात्र शिक्षक, शिक्षामित्र, अनुदेशक, विशेष शिक्षक, कस्तूरबा गाँधी बालिका विद्यालय के कर्मचारी और कुछ दूसरे शिक्षा विभाग के कर्मचारी और उनके पात्र और आश्रित शामिल हैं।

योजना की खासियत क्या है

₹5 लाख तक का कैशलेस इलाज- योजना के तहत हर पात्र परिवार को प्रति वर्ष ₹5 लाख तक कैशलेस चिकित्सा सुविधा मिलेगी। ये लाभ न सिर्फ शिक्षक या शिक्षा विभाग के कर्मचारी को मिलेगा, बल्कि उनपर आश्रित परिजनों को भी इसका लाभ मिलेगा।

सरकारी और सूचीबद्ध निजी अस्पतालों में इलाज- योजना के तहत राज्य सरकार से संबद्ध सरकारी एवं निजी अस्पतालों में कैशलेस उपचार कराया जा सकेगा।

हेल्थ कार्ड की व्यवस्था: पात्र शिक्षकों को डिजिटल या हार्ड कॉपी हेल्थ कार्ड जारी किया जाएगा, जिसके आधार पर अस्पताल में कैशलेस भर्ती कराया जा सकता है और इलाज कराया जा सकता है।

आयुष्मान भारत की पैकेज दरों पर उपचार- योजना के माध्‍यम से सूचीबद्ध सरकारी और प्राइवेट अस्पतालों में 1900 से अधिक उपचार पैकेजों का लाभ मिलेगा। इनमें कैंसर, हृदय रोग, किडनी रोग, जटिल सर्जरी सहित कई गंभीर बीमारियों का इलाज हो सकेगा। योजना का संचालन साचीज के माध्यम से किया जाएगा।

ऑनलाइन आवेदन और सत्यापन- इलाज आयुष्मान भारत की निर्धारित पैकेज दरों के हिसाब से होगा। आवेदन, दस्तावेज सत्यापन और हेल्थ कार्ड जारी करने की प्रक्रिया ऑनलाइन रखी गई है।

इस योजना की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह विशेष रूप से शिक्षकों के लिए समर्पित कैशलेस स्वास्थ्य सुरक्षा योजना है। इससे पहले उत्तर प्रदेश में राज्य कर्मचारियों और आयुष्मान भारत के पात्र लाभार्थियों के लिए अलग-अलग स्वास्थ्य योजनाएं थीं, लेकिन शिक्षकों के लिए अलग समर्पित कैशलेस चिकित्सा व्यवस्था नहीं थी।

भारत के कई राज्यों में कर्मचारियों या विशेष वर्गों के लिए कैशलेस स्वास्थ्य योजनाएँ चल रही हैं, लेकिन किसी भी राज्य में सिर्फ शिक्षक और शिक्षा विभाग के कर्मचारियों के लिए कोई योजना नहीं है।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने ‘मुख्यमंत्री शिक्षक कैशलेस चिकित्सा योजना’ का शुभारंभ किया। इस योजना के तहत बेसिक और माध्यमिक शिक्षा विभाग के पात्र शिक्षकों व उनके आश्रितों को सूचीबद्ध सरकारी और निजी अस्पतालों में प्रति परिवार ₹5 लाख तक कैशलेस इलाज की सुविधा मिलेगी।

इससे पहले माध्यमिक और प्राइमरी शिक्षा विभाग के कर्मचारियों, शिक्षकों और उनके आश्रितों के लिए इस योजना का क्रियान्वयन 8 जुलाई 2026 को किया गया। योजना में गंभीर बीमारियों, सर्जरी, हृदय रोग, कैंसर, किडनी रोग समेत करीब 1900 उपचार पैकेज शामिल हैं। इस पहल से करीब 12 लाख शिक्षक, रसोइये और अन्य कार्मिक परिवारों को लाभ मिल रहा है।

अमेरिका से युद्ध की आड़ में ईरानी सरकार विरोधियों को निपटाने में लगी, सिर्फ जून में करीब 100 लोगों को दी फाँसी: कई के परिजनों को भी नहीं बताया

अमेरिका–ईरान युद्ध की ओर पूरी दुनिया की नजरें है। इस बीच ईरानी सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर राजनीतिक विरोधियों, प्रदर्शनकारियों और कथित जासूसों के खिलाफ कार्रवाई तेज कर दी है। ईरान के कई मानवाधिकार संगठनों, संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञों और अंतरराष्ट्रीय मीडिया की रिपोर्टों से ये पता चलता है कि सिर्फ जून महीने में ही 100 से ज्यादा लोगों को फाँसी दी गई है।

हालाँकि ईरानी सरकार का कहना है कि ये कदम ‘विदेशी साजिश’, ‘आतंकवाद’ और ‘इजराइल – अमेरिका के लिए जासूसी करने वालों’ से निपटने के लिए उठाए गए हैं। सरकार न सिर्फ खामोशी से फाँसी दे रही है, बल्कि लोगों की धर- पकड़ भी तेज कर दी है।

राजनीतिक विरोधियों को दी जा रही फाँसी

ईरान दुनिया के उन अग्रणी देशों में शामिल हो गया है, जहाँ राजनीतिक विरोधियों को भी फाँसी की सजा दी जा रही है। यह कदम लोगों में भय पैदा करने के लिए उठाया गया है, ताकि दिसंबर 2025 में ईरानी शासन के खिलाफ हुआ देशव्यापी विरोध प्रदर्शन फिर कभी न हो सके। दरअसल ईरान ये सब कुछ अमेरिकी हमले की आड़ में कर रहा है। ईरान हाउस की संस्थापक अजादेह अफसाही ने ईरान इंटरनेशनल के आई फॉर ईरान पॉडकास्ट में भी यह बात मानी है।

उनका कहना है कि ईरान में युद्ध के बहाने तेजी से जनवरी में हुए विरोध प्रदर्शन में हिस्सा लेने वालों और उसकी अगुवाई करने वालों को फाँसी की सजा दी जा रही है। कई मामलों में परिवारों से भी इसे छिपाया जा रहा है। दरअसल दुनिया उन धमाकों को सुन रही है, जो अमेरिकी मिसाइल-ड्रोन से हो रहे हैं, लेकिन उन खामोश मौतों को नहीं देख पा रही, जो चुपचाप ईरानी सरकार अपने राजनीतिक कैदियों को दे रही है।

ईरान मानवाधिकार संगठन ने भी इसकी पुष्टि की है। संगठनों का मानना है कि अब तक करीब 100 राजनीतिक कैदियों और प्रदर्शनकारियों को मौत की सजा सुनाई जा चुकी है और 100 से ज्यादा इस कतार में खड़े हैं। संगठन के मुताबिक, इस्फहान की दस्तगेर्द जेल में ही 70 से अधिक राजनीतिक कैदियों को फाँसी दिया जाने वाला है।

संगठन का मानना है कि जनवरी 2026 में हुए देशव्यापी विरोध प्रदर्शन के बाद गिरफ्तार किए गए लोगों में से 24 लोगों को फाँसी दी जा चुकी है। इनमें 22 जुलाई को कानून स्नातक मेहदी खानेकी शामिल है। जिन लोगों को फाँसी दिया गया है, उनमें से अधिकांश 8 जनवरी को इस्फहान विरोध प्रदर्शन में शामिल थे।

मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि आरोपितों को निष्पक्ष कानूनी प्रक्रिया से भी वंचित रखा गया। न तो ट्रायल तरीके से हुआ और न ही सुनवाई और फाँसी की सजा मुकर्र कर दी गई।

संयुक्त राष्ट्र के फैक्ट चेक मिशन ने ईरानी अधिकारियों से कहा है कि वे इस्फहान के विरोध प्रदर्शन को लेकर फाँसी की सजा पाए 10 नौजवानों की फाँसी को तुरंत रोके। मिशन ने 19 जुलाई को 2 युवकों को दी गई फाँसी की भी कड़ी निंदा की है। ये लड़के थे 18 वर्षीय एस्फंदियारी और 23 वर्षीय अफगान नागरिक गोल मोहम्मद मोहम्मदी।

मिशन की जानकारी के मुताबिक, 10 लोगों में से 2 के परिजनों को मुलाकात के लिए बुलाया गया है। इसका मतलब है कि जल्द ही उन्हें भी फाँसी दिया जाएगा।

विरोध प्रदर्शन के सारे मामले निपटा दिए गए- प्रॉसिक्यूटर जनरल

28 दिसंबर 2025 को ईरानी इस्लामिक सत्ता के खिलाफ हुए विरोध प्रदर्शन में शामिल लोगों को अब फाँसी दिया जा रहा है। मार्च 2026 में सबसे पहले तीन युवकों को फाँसी दी गई। इनपर सुरक्षाकर्मियों की हत्या का आरोप था। इसके बाद अप्रैल 2026 में तेहरान के बासिज अड्डे पर कथित हमले के आरोप में 4 युवकों को फाँसी दी गई।

संयुक्त राष्ट्र के फैक्ट चेक मिशन को आशंका है कि फाँसी की सजा में और बढ़ोतरी होगी, क्योंकि 15 जुलाई 2026 को ईरान के ज्यूडिशरी के प्रमुख गुलाम हुसैन मोहसेनी एजेई ने मामले की जल्दी सुनवाई का निर्देश दिया। इसके बाद तेहरान के प्रॉसिक्यूटर जनरल अली सालेही ने 2025-26 में हुए विरोध प्रदर्शनों के सारे मामले निपटा दिए जाने का ऐलान किया। ईरान के आधिकारिक ऐलान के बाद दुनियाभर के मानवाधिकार संगठन एक्टिव हो गए हैं और ईरान के क्रूरता का विरोध कर रहे हैं।

जून में 100 से ज्यादा लोगों को दी गई फाँसी

आर्टिकल 19 के मुताबिक, ईरान में जून में ही 109 लोगों को फाँसी दी गई, जिनमें 3 महिलाएँ शामिल थी। यह आंकड़ा पिछले साल जून से 10 फीसदी ज्यादा है। संगठन के मुताबिक इनमें से केवल 7 फाँसी दिए जाने की आधिकारिक जानकारी दी गई, बाकी का खुलासा भी नहीं किया गया। यहाँ तक कि कम से कम 12 परिवारों को अपने सदस्यों को फाँसी दिए जाने की खबर बाद में दी गई। कई लोगों को तो स्थानीय मीडिया से ये चला कि उनके परिवार के सदस्य को फाँसी दी जा चुकी है।

एएफपी के मुताबिक, साइंटिस्ट वाहिद बनियामेरियन के परिवार को फाँसी की जानकारी बाद में मिली, उस वक्त परिवार सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार अर्जी पर सुनवाई का इंतजार कर रहा था।

युद्ध की आड़ में गिरफ्तारी भी जोरों पर

हाल के महीनों में ईरान में जिस तरह से फाँसी की सजा तेजी से अमल की जा रही है। उसी तरह छात्र नेताओं, महिला अधिकार कार्यकर्ताओं, पत्रकारों, सोशल मीडिया एक्टिविस्टों, विपक्षी दलों के समर्थकों को राष्ट्रीय सुरक्षा कानूनों के तहत गिरफ्तार किए जाने के मामले में काफी वृद्धि हुई है।

सरकार का कहना है कि ये लोग विदेशी एजेंसियों के साथ मिलकर देश में अस्थिरता पैदा कर रहे थे। ईरान इन लोगों को इजरायल और अमेरिका के जासूस, प्रतिबंधित पीएमओआई और एमईके जैसे संगठनों के सदस्य, ‘मोहारेबेह’ यानी ईश्वर के खिलाफ युद्ध छेड़ना और भ्रष्टाचार के आरोप लगाकर धड़ाधड़ कार्रवाई कर रही है। वहीं मानवाधिकार संगठन इसे असहमति दबाने की कार्रवाई बताते हैं।

मानवाधिकार संगठनों का मानना है कि आरोपों के पर्याप्त सार्वजनिक सबूत नहीं दिए गए, मुकदमे बहुत जल्दी पूरे किए गए,
आरोपियों को स्वतंत्र वकील नहीं मिला, यहाँ तक कि जुल्म के दम पर गुनाह कबूल कराए गए।

सरकार विरोधी प्रदर्शनों को कुचलने के दौरान ईरानी सत्ता ने इंटरनेट और मीडिया पर कड़ा नियंत्रण रखा। कई वेबसाइटें ब्लॉक की गईं, सोशल मीडिया पर प्रतिबंध बढ़े, इंटरनेट की गति कम की गई या कुछ क्षेत्रों में बंद कर दिया गया, लोगों को मीडिया खास कर विदेशी मीडिया के साथ संपर्क नहीं रखने को कहा गया और ऐसे लोगों पर पैनी नजर रखी गई जो मीडिया से बात कर सकते हैं। सरकार का तर्क है कि इससे ‘फर्जी खबरों’ और ‘दुश्मन के साइबर अभियान’ को रोका जा सकता है।

ईरान ने दर्जनों लोगों पर आरोप लगाया कि वे इजरायल की खुफिया एजेंसी मोसाद के लिए काम कर रहे थे और सैन्य ठिकानों की जानकारी दे रहे थे। यहाँ तक कहा गया कि ईरानी सैन्य ठिकानों पर अमेरिकी इजरायल के ड्रोन हमलों में इनलोगों ने मदद की है। ऐसे कुछ मामलों में लोगों को फाँसी की सजा हुई है। ईरानी सरकार इन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए आवश्यक कदम बताती है।

संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञों और मानवाधिकार संगठन लगातार कह रहे हैं कि ईरान में न्यायिक प्रक्रिया स्वतंत्र और निष्पक्ष नहीं है। आरोपितों की बंद कमरे में सुनवाई हुई, परिवारों को समय पर जानकारी नहीं दी गई, अपील का पर्याप्त अवसर नहीं मिला, कुछ मामलों में जबरदस्ती और यातना देकर दबाव बनाया गया और सजा दी गई। हालाँकि ईरान इन आरोपों से इनकार करता है और कहता है कि उसकी न्यायिक प्रक्रिया देश के कानूनों के अनुसार चलती है।

ईरान लगातार देश में भय का माहौल बना रहा है। मानवाधिकार संगठनों का मानना है कि ईरानी विश्वविद्यालयों में निगरानी बढ़ी है, सरकार की आलोचना करने वाले पत्रकारों और बुद्धिजीवियों पर दबाव काफी है। यही वजह है कि कई राजनीतिक कार्यकर्ता देश छोड़कर चले गए हैं।

ईरान ऐसा क्यों कर रहा है

ईरान को जानने वाले विश्लेषकों के अनुसार, ईरानी सत्ता अपने राजनीतिक विरोधियों को कुचल कर देश में ऐसा माहौल बनाना चाहती है कि उसके खिलाफ कोई भी आवाज ऊँची करेगा तो उसकी आवाज को हमेशा हमेशा के लिए खामोश कर दिया जाएगा। इजरायल- अमेरिका युद्ध ऐसा मौका है, जब देश में खामेनेई की सत्ता के साथ विरोधी भी आ गए हैं। राष्ट्रवाद उफान पर है और प्रतिद्वदियों को खामोशी से निपटाने का इससे अच्छा सुनहरा मौका नहीं मिल सकता।

अमेरिका के साथ युद्ध के दौरान जनता को आवश्यक चीजों की कमी हो गई है। लगातार बमबारी को देखते हुए आंतरिक विद्रोह की आशंका है। वैसे भी कुछ महीनों पहले ही सत्ता विरोधी प्रदर्शन हुए थे। ऐसे में भय पैदा कर सत्ता विरोधी लहर को रोकना, साथ ही देश की सुरक्षा व्यवस्था और सत्ता प्रतिष्ठान पर अपना नियंत्रण मजबूत करना ईरानी सरकार का मकसद है। खामेनेई की सत्ता को विदेशी खुफिया एजेंसियों की घुसपैठ का डर है।

बंगाल के आदिनाथ मंदिर को वापस पाने में जुटे सनातनी, इस्लामी आक्रांताओं ने कब्जा कर बना दी थी अदीना मस्जिद: जानिए कब से चल रहा हिंदुओं का संघर्ष, अब तक क्या-क्या हुआ

पश्चिम बंगाल के मालदा जिले में स्थित करीब 650 साल पुरानी अदीना ‘मस्जिद’ को लेकर बड़ा धार्मिक और राजनीतिक विवाद शुरू हो गया है। स्थानीय बीजेपी नेताओं के समर्थन से एक हिंदू संगठन ने मस्जिद के पास पूजा-पाठ शुरू कर दिया है। संगठन का कहना है कि यह ऐतिहासिक ढाँचा एक प्राचीन हिंदू मंदिर को तोड़कर बनाया गया था।

‘आदिनाथ पुरातन शिव मंदिर’ संगठन ने घोषणा की कि वह मस्जिद परिसर के बाहर 3.6 फीट ऊँचा और करीब 1.5 टन वजनी शिवलिंग स्थापित करेगा। यह शिवलिंग तारकेश्वर से लाया जा रहा है, जो यहाँ से करीब 289 किलोमीटर दूर है।

द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, संगठन के मुख्य संरक्षक और बीजेपी नेता काजल गोस्वामी ने कहा, “इस तथाकथित मस्जिद में हिंदू और बौद्ध धर्म की मूर्तियाँ मौजूद हैं। आदिनाथ मंदिर को तोड़कर यहाँ मस्जिद बनाई गई थी।” उन्होंने आगे कहा, “हमारा उद्देश्य मंदिर को फिर से स्थापित करना है और शिवलिंग को उसके अंदर रखना है।”

हालाँकि, काजल गोस्वामी ने कहा कि उनका संगठन कानून का पूरी तरह पालन करेगा और किसी भी तरह की कानून-व्यवस्था की समस्या पैदा नहीं होने देगा। उन्होंने बताया कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) और पुलिस अधिकारियों ने उन्हें निर्देश दिया कि संरक्षित स्मारक क्षेत्र के बाहर ही पूजा-अर्चना की जाए।

इन घटनाक्रमों के बाद मालदा जिला पुलिस ने सख्त सलाह जारी की। पुलिस ने लोगों को याद दिलाया कि अदीना स्मारक 1958 के AMASR (प्राचीन स्मारक और पुरातात्विक स्थल एवं अवशेष) अधिनियम के तहत केंद्र सरकार द्वारा संरक्षित स्मारक है। इसलिए परिसर के भीतर बिना अनुमति किसी भी तरह की धार्मिक पूजा या अनुष्ठान करना पूरी तरह प्रतिबंधित है।

इस मुद्दे ने अब राजनीतिक रूप भी ले लिया है। BJP के राज्यसभा सांसद समित भट्टाचार्य ने संसद में यह मामला उठाते हुए केंद्र सरकार और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) से मूल आदिनाथ मंदिर की सुरक्षा पर ध्यान देने की माँग की। वहीं, विपक्षी नेताओं ने बीजेपी पर निशाना साधा है। CPI(M) के पोलित ब्यूरो सदस्य मोहम्मद सलीम ने आरोप लगाया कि BJP आने वाले चुनावों से पहले लोगों को बाँटने के लिए अपनी पुरानी राजनीतिक रणनीति अपना रही है।

प्राचीन मंदिर का मस्जिद में परिवर्तन

बंगाल के मालदा जिले के पांडुआ में स्थित अदीना मस्जिद के बारे में सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज है कि इसका निर्माण 1373 से 1375 ईस्वी के बीच इलियास शाही वंश के सुल्तान सिकंदर शाह ने कराया था। इतिहास की कई किताबों में इसे भारतीय उपमहाद्वीप की सबसे बड़ी मध्यकालीन मस्जिद बताया जाता है।

हालाँकि, पुरातात्विक और वास्तु संबंधी कई प्रमाण बताते हैं कि इस स्थान का इतिहास इससे भी कहीं अधिक पुराना है। इन प्रमाणों के मुताबिक, मस्जिद का निर्माण मुख्य रूप से पाल-सेन काल (8वीं से 12वीं शताब्दी) के पहले से मौजूद हिंदू और बौद्ध धार्मिक स्थलों से लिए गए पत्थरों, स्तंभों और नक्काशीदार सामग्री का उपयोग करके किया गया था।

मस्जिद में मौजूद कई मूर्तियाँ औऱ अन्य अवशेष इस बात की ओर संकेत करते हैं कि यहाँ पहले भगवान शिव को समर्पित भव्य आदिनाथ मंदिर और भगवान विष्णु का एक मंदिर मौजूद था। मस्जिद का मिंबर (जहाँ से इमाम संबोधन देते हैं) भी काले बेसाल्ट पत्थर से बने एक ऐसे दरवाजे का उपयोग करके बनाया गया है, जिसे मंदिर के खंडहरों से लिया गया था।

इसके अलावा मस्जिद की दीवारों, दरवाजों, मेहराबों और मिहराब (नमाज की दिशा बताने वाला स्थान) पर भगवान शिव, भगवान गणेश और अन्य हिंदू प्रतीकों की नक्काशी दिखाई देती है। यहाँ फूलों की आकृतियाँ, चैत्य मेहराब, कीर्तिमुख, मोतियों की मालाएँ और जंजीर-घंटी जैसे कई डिजाइन भी बने हुए हैं। इस तरह की सजावट आम तौर पर इस्लामी वास्तुकला का हिस्सा नहीं मानी जाती। इसलिए माना जाता है कि ये नक्काशी और डिजाइन पाल-सेन काल के समय के हैं।

इस मस्जिद के केंद्रीय मिहराब में इस स्थान के हिंदू अतीत के कई संकेत दिखाई देते हैं। मिहराब का सामने का हिस्सा तीन पत्तियों जैसी आकृति वाली मेहराब से सजाया गया है। मेहराब के दोनों ओर बने हिस्सों पर फूलों जैसी आकृतियाँ उकेरी गई हैं। मिहराब के अंदर बने पैनलों पर भी मेहराब, फूलों की आकृतियाँ और मेहराब के ऊपरी हिस्से से लटकती जंजीत और घंटी के डिजाइन दिखाई देते हैं।

इतिहासकारों के मुताबिक, जंजीर और घंटी जैसे ये डिजाइन हिंदू वास्तुकला की विशेष पहचान माने जाते हैं। इस तरह की नक्काशी हिंदू काल में बनाए गए स्तंभों पर भी देखी जाती है।

आज भी इस परिसर और इसके आसपास की दीवारों में टूटे हुए शिवलिंग और उलटी पड़ी हिंदू देवी-देवताओं की मूर्तियाँ दिखाई देती हैं। कई लोगों का मानना है कि ये अवशेष इस बात की ओर इशारा करते हैं कि मध्यकालीन आक्रमणों के दौरान इस क्षेत्र की हिंदू विरासत को बड़े पैमाने पर नुकसान पहुँचाया गया था।

इस मुद्दे को कानूनी और सामाजिक स्तर पर तब अधिक चर्चा मिली, जब वरिष्ठ अधिवक्ता हरि शंकर जैन ने हिंदुओं से इस स्थल पर पूजा करने का अपना अधिकार वापस पाने की अपील की। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर सुल्तान सिकंदर शाह के शासनकाल के दौरान हुए ऐतिहासिक विध्वंस का भी मुद्दा उठाया।

TMC सांसद यूसुफ पठान ने इसे मस्जिद के तौर पर पेश करने की कोशिश की

यह विवाद उस समय राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आ गया, जब तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) के सांसद यूसुफ पठान ने इस स्थल का दौरा किया और इसे केवल इस्लामी वास्तुकला की एक ऐतिहासिक उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत किया।

सोशल मीडिया पर अपनी यात्रा की तस्वीरें साझा करते हुए यूसुफ पठान ने लिखा, “बंगाल के मालदा में स्थित अदीना मस्जिद 14वीं शताब्दी की एक ऐतिहासिक मस्जिद है। इसका निर्माण इलियाह शाही वंस के दूसरे शासक सुल्तान सिकंदर शाह ने 1373 से 1375 ईस्वी के बीच कराया था। अपने समय में यह भारतीय उपमहाद्वीप की सबसे बड़ी मस्जिद थी और उस दौर की शानदार वास्तुकला का उदाहरण है।”

इसके बाद सोशल मीडिया पर कई लोग और राजनीतिक कमेंटेटर ने TMC सांसद की आलोचना की। उनका कहना था कि उन्होंने इस स्थल से जुड़े हिंदू इतिहास और विरासत का कोई उल्लेख नहीं किया। कई सोशल मीडिया यूजर्स ने परिसर में मौजूद नक्काशियों और मूर्तियों की तस्वीरें साझा करते हुए अपने दावे पेश किए। अधिवक्ता शेखर कुमार झा ने दीवार पर बनी भगवान गणेश की एक नक्काशी की तस्वीर साझा करते हुए लिखा, “इतिहास: आदिनाथ मंदिर को अदीना मस्जिद बना दिया गया।”

वहीं, ‘PlanH’ नाम के एक यूजर ने यूसुफ पठान को जवाब देते हुए लिखा, “प्रिय यूसुफ पठान, आप भारत के सबसे बड़े हिंदू मंदिरों में से एक आदिनाथ मंदिर के परिसर में खड़े हैं, जिसे इस्लामी आक्रमणकारियों ने अपवित्र कर अपने कब्जे में ले लिया था। आपके संदर्भ के लिए कुछ तस्वीरें अटैच हैं। अब समय आ गया है कि इस अन्याय और बर्बरता को समाप्त कर मंदिर की पुरानी गरिमा को फिर से स्थापित किया जाए।”

एक और यूजर ‘अब्दुल किताबी’ ने लिखा, “एक सच्चे मुसलमान के तौर पर हमें यह मस्जिद हिंदुओं को वापस कर देनी चाहिए।”

वहीं, कुछ अन्य लोगों ने इतिहास को लेकर सवाल उठाते हुए कहा, “क्या

BJP सरकार के दौरान अधिकारों की बहाली और पुनर्स्थापना की दिशा में कदम

कई दशकों तक स्थानीय हिंदुओं को इस विवादित स्थल पर पूजा-पाठ या किसी भी तरह का धार्मिक अनुष्ठान करने की अनुमति नहीं थी। यह परिसर ASI के संरक्षण में था। इसके कारण यहाँ पूजा और आगे पुरातात्विक जाँच कराने की कोशिशों पर रोक लगी रही। हालाँकि, साल 2024 की शुरुआत में इस स्थल को लेकर माहौल बदलना शुरू हुआ।

युवा पुजारी हिरण्मय के नेतृत्व में हिंदू श्रद्धालुओं का एक समूह परिसर के अंदर पहुँचा। उन्होंने वहाँ मौजूद मूर्तियों और वास्तुकला में बने एक शिवलिंग की पहचान की। इसके बाद उन्होंने मंत्रोच्चार करते हुए पूजा शुरू कर दी। स्थानीय मुस्लिमों की शिकायत के बाद पुलिस मौके पर पहुँची और उस समय पूजा रुकवा दी। हालाँकि, इस घटना को स्थानीय हिंदुओं के लिए एक बड़ा मोड़ माना गया।

अब BJP नेताओं के समर्थन के साथ इस स्थल को वापस पाने की माँग और तेज हो गई है। इस अभियान से जुड़े लोग अयोध्या राम जन्मभूमि, ज्ञानवापी और मथुरा जैसे मामलों का उदाहरण देते हुए कहते हैं कि लोगों की धार्मिक आस्था को हमेशा के लिए दबाया नहीं जा सकता।

साथ ही, इस मामले में कोलकाता हाई कोर्ट में पूरे परिसर का ASI से सर्वे कराने की माँग करने की तैयारी भी चल रही है। इसके अलावा, परिसर के बाहर शिवलिंग स्थापित करने का काम भी जारी है। हिंदू समुदाय का कहना है कि वह कानूनी और शांतिपूर्ण तरीके से अपनी धार्मिक विरासत को वापस पाने की दिशा में कदम उठा रहा है।

(मूल रूप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में लिखी गई है, जिसे पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।)

जहाँ युवा, वहाँ PM मोदी… एक ही Reel से बना डाला रिकॉर्ड: मंत्रियों को संदेश- अब Insta करें इस्तेमाल, जानें- कैसे ‘फोटो शेयरिंग ऐप’ बन गया GenZ का फेवरेट

जंतर-मंतर की भीड़ में एक युवा खड़ा था। उसके हाथ में प्लेकार्ड था, आँखों में गुस्सा और दिल में सवाल। NEET पेपर लीक की खबरों ने हजारों सपनों को हिला दिया था। कॉकरोच जनता पार्टी के बैनर तले युवाओं और GenZ की टोली जमा थी। वे कह रहे थे- सिस्टम बदलो, जवाब दो। दूर दिल्ली के किसी कमरे में एक आदमी यह सब देख रहा था। उम्र में फर्क बहुत था, लेकिन बात समझने में कोई फर्क नहीं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने फैसला किया- पुराने तरीके छोड़ो, वहाँ जाओ जहाँ युवा हैं। इंस्टाग्राम खोलो, सेल्फी मोड ऑन करो, और सीधे बात करो। पिछले 24 घंटे में उन्होंने दो Reels अपलोड किए। और फिर जो हुआ, वह सोशल मीडिया की दुनिया में नया रिकॉर्ड बन गया। यह सिर्फ वीडियो नहीं था। यह एक नई कोशिश थी- उम्र के फासले को पार करके युवाओं के दिल तक पहुँचने की।

जंतर-मंतर से शुरू हुई कहानी

देखिए, हालात ऐसे थे कि युवा सड़क पर उतर आए थे। कॉकरोच जनता पार्टी के नाम से चला यह आंदोलन NEET-UG पेपर लीक, परीक्षा प्रणाली में सुधार, शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे और उन परिवारों के मुआवजे की माँग कर रहा था, जहाँ छात्रों ने आत्महत्या कर ली थी। सरकार कह रही थी कि गिरफ्तारियाँ हो चुकी हैं, दोबारा परीक्षा कराई गई, लेकिन युवा संतुष्ट नहीं थे। ऐसे में PM मोदी ने पुरानी प्रेस कॉन्फ्रेंस या लंबे भाषण का रास्ता नहीं चुना। उन्होंने वह तरीका अपनाया जो आज के Gen-Z को सबसे ज्यादा पसंद है– छोटा वीडियो, सीधी बात, सेल्फी स्टाइल।

पहले Video में उन्होंने साफ कहा कि पेपर लीक कोई छोटी बात नहीं है। लाखों छात्रों और उनके माता-पिता को बहुत दर्द हुआ है। पिछले ढाई महीने में कई कदम उठाए गए, दोषियों को गिरफ्तार किया गया, करीब 22 लाख छात्रों को दोबारा परीक्षा का मौका मिला। अब और सख्त कार्रवाई होगी। कैबिनेट में बिल आएगा, फास्ट ट्रैक कोर्ट होंगे। यह वीडियो रात के समय आया, जब ज्यादातर युवा फोन स्क्रॉल कर रहे होते हैं। भाषा साधारण थी, लहजा अपनापन वाला। जैसे कोई बड़ा भाई या चाचा समझा रहा हो। उम्र का फासला तो था, लेकिन बात जेन-जी की भाषा में थी।

फिर दूसरा वीडियो, युवाओं तक पहुँचना का मकसद

दूसरा Video सिर्फ 24 घंटे के अंदर आया। इसमें PM मोदी ने धन्यवाद दिया। ‘थैंक यू फ्रेंड्स। कल रात आप सभी से मिलने का मौका मिला। जिस तरह आपने Video पर रिएक्ट किया, सकारात्मक सुझाव दिए, सबका शुक्रिया। आपका प्यार बना रहेगा और हमारा रिश्ता और मजबूत होगा।’ इतनी सी बात, लेकिन असर गहरा। युवाओं ने महसूस किया कि उनकी बात सुनी जा रही है। सुझाव माँगे जा रहे हैं। यह सिर्फ एकतरफा संदेश नहीं था। यह बातचीत की शुरुआत लग रही थी।

पीएम मोदी बार-बार यही कह रहे हैं कि वे युवाओं के साथ जुड़ना चाहते हैं, उनकी बात सुनना चाहते हैं और उन्हें भरोसा दिलाना चाहते हैं कि सरकार उनके साथ है। परीक्षाओं में धांधली उनके भविष्य से खिलवाड़ है, इसलिए सख्त कानून लाए जाएँगे। कैबिनेट ने पब्लिक एग्जामिनेशन्स (प्रिवेंशन ऑफ अनफेयर मीन्स) एक्ट में संशोधन को मंजूरी दे दी। न्यूनतम पाँच साल की सजा, संगठित गिरोहों के लिए 10 साल तक और एक करोड़ रुपए तक जुर्माना। NEET, JEE, CUET, UPSC, SSC सब कवर होंगे। PM ने कहा था कि प्रेस कॉन्फ्रेंस पुरानी बात हो गई। अब लाइव जाकर युवाओं से सीधा संवाद बेहतर है। उन्होंने हर रविवार रात आठ बजे इंस्टाग्राम लाइव का ऐलान भी किया।

PM के 2 वीडियो के आँकड़े– चौंकाने वाली संख्या

बता दें कि PM मोदी के इंस्टाग्राम अकाउंट पर फॉलोअर्स अब 103 मिलियन यानी 10 करोड़ 30 लाख हो चुके हैं। पहली वीडियो 23 जुलाई को आधी रात को आई थी। इसमें 17.9 मिलियन यानी 1 करोड़ 79 लाख लाइक्स आए, 1.7 मिलियन यानी 17 लाख कमेंट्स पड़े और इम्प्रेशन 346 मिलियन यानी 34 करोड़ 60 लाख तक पहुँच गए। यह Video खुद PM मोदी ने अपने हाथ में फोन लेकर रिकॉर्ड किया था। छात्रों को आश्वासन दिया कि पेपर माफिया पर सख्ती होगी और उनकी मेहनत बर्बाद नहीं होगी।

दूसरी Video 24 जुलाई को अपलोड हुआ। इसमें 10.4 मिलियन यानी 1 करोड़ 4 लाख लाइक्स, 1 मिलियन यानी 10 लाख कमेंट्स और इम्प्रेशन 158 मिलियन यानी 15 करोड़ 80 लाख आए। इसमें PM ने युवाओं का आभार जताया। दोनों वीडियो मिलकर साबित करते हैं कि जब बात दिल से और सही प्लेटफॉर्म पर हो, तो युवा सुनते हैं। ये आँकड़े सिर्फ नंबर नहीं हैं। ये दिखाते हैं कि युवा सरकार की बात सुनने को तैयार हैं, बशर्ते बात उनकी भाषा में हो।

अब PM मोदी का मंत्रियों को साफ संदेश– इंस्टाग्राम पर आओ, रील्स बनाओ

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद युवाओं तक पहुँचने का रास्ता तो बना ही लिया, साथ ही उन्होंने अपने मंत्रिमंडल के सभी सहयोगियों को भी यह संदेश जारी किया। हाल ही में हुई एक उच्चस्तरीय कैबिनेट बैठक के दौरान प्रधानमंत्री ने सभी मंत्रियों से यह सवाल किया कि उनमें से कितने लोग इंस्टाग्राम जैसी आधुनिक सोशल मीडिया साइट्स पर एक्टिव है और इसका इस्तेमाल कर रहे हैं।

पीएम मोदी ने मंत्रियों को साफ शब्दों में हिदायत दी कि केवल सरकारी फाइलों के आँकड़े या कागजी योजनाएँ पेश करने से काम नहीं चलेगा, बल्कि उन्हें भी रील्स और डिजिटल माध्यमों का इस्तेमाल करना होगा। प्रधानमंत्री का मानना है कि देश की एक बहुत बड़ी युवा आबादी अपना वक्त इन्हीं प्लेटफॉर्म्स पर बिताती है, इसलिए सरकार को उनके साथ सीधे जुड़ने की अपनी क्षमता को और ज्यादा मजबूत करना चाहिए।

मंत्रियों को दिए गए इस निर्देश के पीछे एक बहुत बड़ी राजनीतिक दूरदर्शिता छिपी है, जिसे जंतर-मंतर पर सुलग रहे आंदोलन को शांत करने के एक शांत और प्रभावी जरिया के रूप में भी देखा जा रहा है। सरकार यह अच्छी तरह समझ चुकी है कि सड़कों पर चल रहे विरोध प्रदर्शनों और युवाओं के गुस्से को केवल पुलिस या बयानों से नहीं दबाया जा सकता, बल्कि इसके लिए पारदर्शी संवाद और उनकी भाषा में बात करना जरूरी है।

इसी रणनीति का हिस्सा है कि सरकार ने पेपर लीक जैसी गंभीर समस्याओं से निपटने के लिए एक बेहद कड़े कानून का मसौदा तैयार किया है, जिसके तहत संगठित अपराधियों को 10 साल तक की जेल और 10 करोड़ रुपए तक के जुर्माने का प्रावधान है। साथ ही NTA में बड़े स्तर पर संस्थागत सुधार भी किए जा रहे हैं, जिनकी जानकारी अब सरकार सीधे इन डिजिटल माध्यमों से युवाओं तक पहुँचा रही है।

इंस्टाग्राम कैसे बना GenZ का सबसे पसंदीदा ठिकाना?

अब बात करते हैं उस प्लेटफॉर्म की, जिसने यह सब मुमकिन बनाया। इंस्टाग्राम की शुरुआत 6 अक्टूबर 2010 को हुई थी। इसे दो युवकों ने बनाया– केविन सिस्ट्रॉम और माइक क्रीगर। दोनों स्टैनफर्ड यूनिवर्सिटी से जुड़े थे। पहले उन्होंने बर्बन नाम का एक ऐप बनाया था, जिसमें लोकेशन चेक-इन और फोटो शेयरिंग दोनों थे। लेकिन उन्होंने देखा कि लोग फोटो वाले हिस्से को ज्यादा पसंद करते हैं। तो बाकी सब हटाकर सिर्फ फोटो शेयरिंग पर फोकस किया। नाम रखा इंस्टाग्राम– इंस्टेंट कैमरा और टेलीग्राम का मेल। मकसद साधारण था– मोबाइल से अच्छे फिल्टर वाली तस्वीरें आसानी से दोस्तों के साथ शेयर करना। पुरानी पोलरॉइड फोटो की याद दिलाने वाला अंदाज़।

शुरुआत में सिर्फ आईफोन के लिए था। पहले दिन 25 हजार यूजर्स जुड़ गए। एक महीने में दस लाख, एक साल में एक करोड़। 2012 में फेसबुक ने इसे करीब एक अरब डॉलर में खरीद लिया। आज यह मेटा के अधीन है। शुरुआत फोटो शेयरिंग से हुई थी, लेकिन समय के साथ स्टोरीज, रील्स, लाइव, शॉपिंग, क्लोज फ्रेंड्स जैसे फीचर्स जुड़ते गए।

आज 2026 में इंस्टाग्राम GenZ का फेवरेट बन चुका है। यह बात बिल्कुल साफ हो चुकी है कि 13 से 27 साल की उम्र के युवाओं यानी GenZ के बीच इंस्टाग्राम ने अपनी एक बेहद खास जगह बना ली है। आज का इंस्टाग्राम सिर्फ तस्वीरें शेयर करने वाला पुराना ऐप नहीं रहा, बल्कि यह आज के युवाओं की डिजिटल पहचान, शॉपिंग करने का जरिया, मनोरंजन का साधन और कई बार गूगल जैसे सर्च इंजन की जगह लेने वाला प्लेटफॉर्म बन चुका है। रिपोर्ट्स और आँकड़े इस बात की गवाही देते हैं कि यह बड़ा बदलाव रातों-रात नहीं आया, बल्कि कंपनी द्वारा समय पर किए गए नए बदलावों, छोटे वीडियो की सोच और भारत जैसे विशाल देशों में इसकी बढ़ती लोकप्रियता का नतीजा है।

एक रिपोर्ट के अनुसार, लगभग 58 प्रतिशत Gen-Z यूजर हर रोज इंस्टाग्राम का इस्तेमाल करते हैं, जो यह साबित करने के लिए काफी है कि दूसरे वीडियो ऐप्स के बाजार में होने के बावजूद यह टॉप पर बना हुआ है। एक अन्य स्टडी से यह भी सामने आया कि साल 2025 तक इंस्टाग्राम युवाओं के बीच अपने से पुरानी पीढ़ी यानी मिलेनियल्स से भी ज्यादा पॉपुलर हो चुका था और इस पीढ़ी के करीब 5.24 करोड़ लोग इससे जुड़े हुए थे। अगर अमेरिका के 18 से 29 साल के युवाओं की बात करें, तो यूट्यूब के बाद इंस्टाग्राम दूसरा सबसे ज्यादा इस्तेमाल किया जाने वाला प्लेटफॉर्म है, जिसे करीब 80% युवा पसंद करते हैं।

भारत की तस्वीर इस मामले में और भी ज्यादा दिलचस्प और हैरान करने वाली है। ताजा आँकड़ों के मुताबिक, 2026 में भारत दुनिया का वह देश बन चुका है जहाँ सबसे ज्यादा इंस्टाग्राम यूजर्स मौजूद हैं, और यहाँ एक्टिव यूजर्स की संख्या 47.2 करोड़ के आँकड़े को पार कर चुकी है। भारत में तेजी से बढ़ती युवा आबादी इस प्लेटफॉर्म को बुलंदियों पर पहुँचाने में सबसे अहम भूमिका निभा रही है।

रील्स (Reels): वो जादुई फीचर जिसने पूरी बाजी ही पलट दी

अगर यह तलाश की जाए कि इंस्टाग्राम युवाओं के बीच इतना लोकप्रिय क्यों हुआ, तो सबसे बड़ा नाम ‘रील्स’ का आता है। छोटे, तेज और लोगों की पसंद के हिसाब से चलने वाले इस वीडियो फॉर्मेट ने पूरे ऐप का रूप ही बदल कर रख दिया है। मेटा और IPSOS की एक साझा रिपोर्ट बताती है कि भारत में 98 प्रतिशत Gen-Z यूजर, 85 प्रतिशत महिलाएँ और 88 प्रतिशत प्रीमियम दर्शक रोज बिना चूके रील्स देखते हैं। इसके अलावा मेटा का यह भी दावा है कि लोगों को जोड़ने के मामले में रील्स अन्य छोटे वीडियो प्लेटफॉर्म्स के मुकाबले लगभग 60 प्रतिशत ज्यादा असरदार साबित हो रहा है।

एक और रिपोर्ट के अनुसार, लगभग 84% युवा किसी भी नए सामान या ब्रांड की खोज इसी प्लेटफॉर्म के जरिए करते हैं, जबकि 89% यूजर रोज रील्स देखते या उनसे बातचीत करते हैं। इससे साफ पता चलता है कि रील्स अब केवल मनोरंजन का साधन नहीं रह गया है, बल्कि यह लोगों की पसंद, सोच और खरीदारी के फैसलों को भी सीधे तौर पर प्रभावित कर रहा है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी यही ट्रेंड है, जहाँ रील्स देखने वाले 74 प्रतिशत लोग 18 से 34 साल की उम्र के यानी युवा वर्ग से ताल्लुक रखते हैं।

गूगल को टक्कर: जानकारी ढूँढने का नया सर्च इंजन बन रहा ऐप

आज की युवा पीढ़ी के लिए इंस्टाग्राम सिर्फ खाली समय में रील्स स्क्रॉल करने की जगह नहीं है, बल्कि यह किसी भी नई जानकारी को ढूँढने का पहला माध्यम बनता जा रहा है। एक सर्वे के मुताबिक, अमेरिका के 46% युवाओं ने माना कि वे गूगल जैसे पुराने सर्च इंजन पर जाने के बजाय सोशल मीडिया पर चीजें खोजना ज्यादा पसंद करते हैं, और इंस्टाग्राम पर सबसे ज्यादा सर्च किए जाने वाले विषयों में फैशन और ब्रांड्स सबसे आगे रहे हैं। इसके अलावा टिक टॉक और रेडिट के साथ-साथ युवा खबरों से अपडेट रहने के लिए भी इसी का सहारा लेते हैं।

पारंपरिक सर्च इंजन की जगह इस विज़ुअल ऐप का लेना इस बात का पक्का संकेत है कि आज का युवा लंबे लेख पढ़ने के बजाय तस्वीरों और छोटे वीडियो पर ज्यादा भरोसा करता है। छुट्टियों की योजना बनाने में भी यही हाल है, जहाँ भारतीय युवा अलग से यात्रा की जगह नहीं तलाशते, बल्कि इंस्टाग्राम का एल्गोरिदम खुद-बखुद उनकी फीड को खूबसूरत जगहों के वीडियो से भर देता है, जिसे युवा भविष्य के लिए अपने ‘कलेक्शन’ में सेव कर लेते हैं।

असली कनेक्शन की तलाश और छोटे-छोटे फीचर्स का कमाल

Gen-Z की सबसे बड़ी खासियत यह है कि वे केवल चुपचाप वीडियो देखने वाले दर्शक नहीं हैं, बल्कि वे इस प्लेटफॉर्म पर अपनी एक अलग पहचान बनाते हैं। रिपोर्ट्स बताती हैं कि इस पीढ़ी का लगभग आधा हिस्सा टीवी पर आने वाले बड़े सेलिब्रिटीज के मुकाबले सोशल मीडिया क्रिएटर्स के साथ ज्यादा अपनापन महसूस करता है। इंस्टाग्राम ने ‘क्लोज फ्रेंड्स’, ‘स्टोरीज’ और ‘नोट्स’ जैसे फीचर्स लाकर इसी चाहत को पूरा किया है, जिससे लोग पूरी दुनिया के सामने आने के बजाय अपने खास और भरोसेमंद दोस्तों के छोटे दायरे में खुलकर बात कर पाते हैं।

हालाँकि इस मामले में इंस्टाग्राम को दूसरे ऐप्स से कड़ी टक्कर भी मिल रही है। मेटा का ही दूसरा ऐप ‘थ्रेड्स’ युवाओं के बीच तेजी से पैर पसार रहा है और इसके करीब 4.2 करोड़ एक्टिव युवा यूजर हैं। वहीं, ‘बीरियल’ (BeReal) जैसे पूरी तरह असली पल दिखाने वाले ऐप के भी 4 करोड़ से ज्यादा युवा यूजर हैं, जो यह दिखाता है कि आज का युवा किसी एक ऐप पर पूरी तरह निर्भर नहीं रहता, बल्कि मनोरंजन के लिए अलग और निजी पलों के लिए दूसरे ऐप का इस्तेमाल करता है।

शॉपिंग का नया अड्डा: Reels से सीधे सामान खरीदने का दौर

इंस्टाग्राम की ताकत का एक और बड़ा पहलू ‘सोशल कॉमर्स’ यानी खरीदारी से जुड़ा है। भारत में मेटा की स्टडी बताती है कि Reels अब केवल टाइमपास नहीं बल्कि ऑनलाइन शॉपिंग का बहुत बड़ा जरिया बन चुका है, जो 81 प्रतिशत नए सामान की खोज और 47 प्रतिशत खरीददारी के फैसलों को सीधे तौर पर तय करता है। पूरी दुनिया में भी यही हाल है, जहाँ 72 प्रतिशत युवाओं ने किसी न किसी सोशल ऐप के जरिए सीधे सामान खरीदा है और लगभग सभी ने अपने स्मार्टफोन से ही पेमेंट की है।

सिक्के का दूसरा पहलू: डेटा की चिंता और मानसिक सेहत का सवाल

हालाँकि, यह चमक-धमक वाली तस्वीर ही सब कुछ नहीं है, क्योंकि इस सिक्के का एक दूसरा पहलू भी है। Gen-Z का एक बड़ा तबका इंस्टाग्राम और इसकी मुख्य कंपनी मेटा द्वारा यूजर के डेटा के इस्तेमाल के तरीकों को लेकर काफी डरा हुआ रहता है। एक रिपोर्ट के अनुसार, लगभग 67 प्रतिशत युवा इंस्टाग्राम और फेसबुक को यूजर के डेटा का गलत इस्तेमाल करने वाला मानते हैं, जिसकी वजह से कई लोग अब टेलीग्राम या रेडिट जैसे ऐप्स की तरफ भी जा रहे हैं।

इसके अलावा मानसिक सेहत को लेकर भी युवाओं में जागरूकता बहुत बढ़ गई है। एक अध्ययन के मुताबिक, सोशल मीडिया का सबसे ज्यादा इस्तेमाल करने के बावजूद यह पीढ़ी इसके दिमाग पर पड़ने वाले बुरे असर को लेकर भी सबसे ज्यादा सजग है। एक सर्वे में सामने आया कि अमेरिका के एक-तिहाई युवा अब सोशल मीडिया पर अपना समय कम करना चाहते हैं, भले ही वे इसके मौजूदा इस्तेमाल से खुश हों।

युवाओं से जुड़े, युवाओं की आवाज में…

कुल मिलाकर देखा जाए तो इंस्टाग्राम के युवाओं का सबसे पसंदीदा ठिकाना बनने की यह पूरी कहानी किसी एक फीचर का कमाल नहीं है, बल्कि यह एक पूरे सिस्टम की सफलता है। Reels ने वीडियो देखने का तरीका बदला, स्टोरीज ने आपसी रिश्तों को जोड़ा, शॉपिंग फीचर्स ने इसे बाजार बना दिया और एल्गोरिदम ने इसे गूगल जैसा सर्च इंजन अनुभव दे दिया। भारत जैसे देशों में जहाँ मोबाइल इस्तेमाल करने वाले युवाओं की संख्या बहुत तेजी से बढ़ रही है, वहाँ यह ट्रेंड और भी मजबूत होता दिख रहा है। फिर भी, डेटा की सुरक्षा को लेकर बढ़ती चिंताएं यह बताती हैं कि युवा किसी एक ऐप के गुलाम नहीं हैं।

PM मोदी बार-बार यही बता रहे हैं कि वे युवाओं की बात सुनना चाहते हैं। सुझाव माँग रहे हैं। भरोसा दिला रहे हैं कि पेपर लीक जैसी समस्या पर सख्ती होगी। आंदोलन को सिर्फ पुलिस से नहीं, संवाद से भी शांत करने की कोशिश दिख रही है। उम्र का फासला है, लेकिन तकनीक ने उसे पाट दिया। जेन-जी की भाषा में बात करके वे कह रहे हैं – मैं तुम्हारे साथ हूँ।

यह सिर्फ 2 Video की कहानी नहीं है। यह बदलते समय की कहानी है। जब नेता युवाओं के पास जाएँ, उनकी भाषा बोलें, उनकी प्लेटफॉर्म पर आएँ, तो दूरी कम होती है। जंतर-मंतर की आवाज अब इंस्टाग्राम रील्स तक पहुँच गई है। आँकड़े चौंका देने वाले हैं, लेकिन असली परीक्षा आगे है– कानून कितना सख्त लागू होता है, परीक्षा प्रणाली कितनी साफ होती है और युवा कितना भरोसा महसूस करते हैं। PM मोदी ने रास्ता दिखाया है।

आज से आरंभ हुआ चातुर्मास: 120 दिनों तक योगनिद्रा में रहेंगे भगवान विष्णु, शिव संभालेंगे सृष्टि का संचालन; जानें- इन महीनों में कैसा हो आपका आचरण और भोजन

सनातन परंपरा में चातुर्मास का समय केवल महीनों का बदलना मात्र नहीं है, बल्कि यह आत्म-साधना, संयम और आत्म-निरीक्षण का एक पावन और विस्तृत पर्व है। पंचांग के अनुसार, आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की देवशयनी एकादशी से इसका आरंभ होता है और कार्तिक मास की देवउठनी एकादशी तक यह चलता है।

देवशयनी एकादशी को हरिशयनी या पद्मा एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। इस वर्ष यह पवित्र अवधि 25 जुलाई 2026 से शुरू होकर 21 नवंबर तक, यानी कुल 120 दिनों तक चलेगी। इन चार महीनों के लंबे अंतराल को एक विशेष धर्म-काल माना गया है, जिसके दौरान सृष्टि के पालनहार भगवान विष्णु क्षीरसागर में शेषनाग की शैया पर योगनिद्रा में लीन रहते हैं।

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इस अवधि में वे पाताल लोक में राजा बलि के यहाँ निवास करते हैं। भगवान विष्णु के योगनिद्रा में रहने के कारण पृथ्वी पर विवाह, सगाई, मुंडन, नामकरण और गृह प्रवेश जैसे सभी मांगलिक कार्यों पर पूरी तरह से विराम लग जाता है।

ढोल और शहनाइयों की गूँज खामोश हो जाती है, लेकिन उनकी जगह मंदिरों और घरों में भक्ति गीतों, भजनों और सत्संग का मधुर स्वर गूँजने लगता है। भले ही सांसारिक उत्सवों पर रोक लग जाती है, लेकिन यह समय जप, तप, ध्यान, व्रत और आत्मिक उन्नति के लिए साल का सबसे सर्वोत्तम समय माना गया है।

आइए विस्तार से समझते हैं कि चातुर्मास का हमारे जीवन में क्या महत्व है और इस दौरान किन-किन बातों का विशेष ध्यान रखना चाहिए।

जब योगनिद्रा में लीन होते हैं हरि: जानिए कौन सँभालेगा सृष्टि का संचालन?

धार्मिक मान्यताओं और प्राचीन ग्रंथों के अनुसार, जब भगवान श्रीहरि विष्णु चार माह के लिए अपनी योगनिद्रा में चले जाते हैं, तब संपूर्ण सृष्टि के संचालन और संरक्षण का भारी दायित्व देवाधिदेव महादेव अर्थात् भगवान शिव के कंधों पर आ जाता है।

इस पूरे कालखंड में भगवान शिव ही पालनकर्ता और संहारक, दोनों भूमिकाओं में रहकर सृष्टि की व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाते हैं। चातुर्मास की कथा अत्यंत रोचक है।

श्रीमद्भागवत पुराण और पद्म पुराण के प्रसंगों के अनुसार, जब भगवान विष्णु ने वामन अवतार लेकर राजा बलि से तीन पग भूमि दान में माँगी थी, तब बलि की अटूट भक्ति और दानशीलता से वे अत्यंत प्रसन्न हुए थे। प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने राजा बलि को वरदान दिया था कि वे हर साल चार महीने उनके पाताल लोक स्थित महल में निवास करेंगे।

इसी पौराणिक घटना के कारण देवशयनी एकादशी से चातुर्मास की शुरुआत मानी जाती है और देवउठनी एकादशी पर जब विष्णु जी पुनः जागृत होते हैं, तब वे अपने लोक लौटते हैं।

यद्यपि पंचांगीय गणना के अनुसार, चातुर्मास में आषाढ़, सावन, भाद्रपद, आश्विन और कार्तिक, ये पाँच महीने स्पर्श होते हैं, परंतु तिथियों के आधार पर देवशयनी से देवउठनी एकादशी तक की कुल अवधि चार महीने की ही बैठती है। सनातन धर्म के साथ-साथ जैन परंपरा में भी चातुर्मास का बहुत गहरा महत्व है।

जैन समाज का चातुर्मास भी इसी समय के आसपास, 29 जुलाई से शुरू होगा, जहाँ साधु-संत यात्राएँ रोककर एक ही स्थान पर ठहरते हैं और समाज को ध्यान तथा धर्मोपदेश देते हैं।

शुभ कार्यों पर विराम, फिर भी भक्ति का महाकुंभ: चातुर्मास के 120 दिनों का उत्सव

यद्यपि चातुर्मास में विवाह या नए घर में प्रवेश जैसे शुभ संस्कार वर्जित होते हैं, परंतु यह काल पूजा-पाठ, उपवास और बड़े-बड़े उत्सवों से पूरी तरह से भरा होता है। इस दौरान आपकी नियमित पूजा या किसी व्रत-त्योहार को मनाने पर कोई पाबंदी नहीं होती है, बल्कि इनका फल और भी कई गुना बढ़ जाता है।

इन 120 दिनों की अवधि में देश भर में पंद्रह से भी अधिक बड़े धार्मिक पर्व मनाए जाते हैं, जो जीवन में नई ऊर्जा भरते हैं। इस धर्म-काल की शुरुआत सावन के महीने से होती है, जो पूरी तरह से भगवान शिव की आराधना और उनकी कृपा पाने के लिए समर्पित है। इस महीने में भक्त बड़ी श्रद्धा के साथ शिवजी का जलाभिषेक, रुद्राभिषेक और कांवड़ यात्रा करते हैं।

सावन के बाद भाद्रपद का महीना आता है, जिसे भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव यानी जन्माष्टमी और प्रथम पूज्य विघ्नहर्ता श्री गणेश की स्थापना यानी गणेश चतुर्थी के उल्लास के लिए जाना जाता है। इसके बाद आश्विन महीने की शुरुआत में पितरों की शांति और उनके प्रति कृतज्ञता प्रकट करने के लिए पंद्रह दिनों का पितृ पक्ष या श्राद्ध पक्ष आता है।

इसके तुरंत बाद शक्ति की देवी माँ दुर्गा की उपासना का सबसे बड़ा पर्व शारदीय नवरात्रि आता है, जिसका समापन बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक दशहरे के साथ होता है।

अंत में कार्तिक का महीना आता है, जो दीपों और उल्लास का महीना है। इस दौरान करवा चौथ, धनतेरस, दीपावली, गोवर्धन पूजा, भाई दूज और सूर्य उपासना का महापर्व छठ पूजा बड़े ही धूमधाम से मनाए जाते हैं। अंततः कार्तिक शुक्ल एकादशी यानी देवउठनी एकादशी के साथ चातुर्मास का समापन होता है और सभी रुके हुए मांगलिक कार्य फिर से शुरू हो जाते हैं।

भक्ति में छुपा सेहत का राज: आयुर्वेद और शास्त्र अनुसार क्या खाएँ, क्या त्यागें?

चातुर्मास का समय केवल आध्यात्मिक उन्नति तक सीमित नहीं है, बल्कि आयुर्वेद और स्वास्थ्य विज्ञान के दृष्टिकोण से भी यह अवधि हमारे शरीर के लिए बहुत संवेदनशील मानी गई है। मानसून या वर्षा ऋतु के समय मनुष्य के शरीर की जठराग्नि यानी पाचन शक्ति काफी मंद पड़ जाती है।

इसके साथ ही नमी के कारण वातावरण में बैक्टीरिया, कीड़े-मकोड़े और संक्रमण का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। इसलिए हमारे शास्त्रों में इन चार महीनों के दौरान खान-पान के कुछ बहुत ही कड़े और विशेष नियम बताए गए हैं, ताकि शरीर बीमारियों से बचा रहे। सबसे पहला नियम यह है कि इस पूरी अवधि में तामसिक भोजन का पूरी तरह से त्याग कर देना चाहिए।

किसी भी व्यक्ति को प्याज, लहसुन, मांस, मदिरा और बासी भोजन का सेवन बिल्कुल नहीं करना चाहिए। इसके अलावा महीनों के अनुसार भी कुछ खास चीजों का परहेज बताया गया है। जैसे सावन के महीने में हरी पत्तेदार सब्जियाँ, पालक या साग आदि खाने से बचना चाहिए, क्योंकि बारिश में इन पत्तों में सूक्ष्म जीव अत्यधिक पनपते हैं जो बीमारियों का कारण बनते हैं।

इसी तरह भाद्रपद के महीने में दही और दही से बने पदार्थों का सेवन वर्जित माना गया है, क्योंकि आयुर्वेद के अनुसार, इस मौसम में शरीर में वात दोष बढ़ता है और दही इसे और बिगाड़ सकता है। आश्विन के महीने में दूध का सेवन करने से बचने की सलाह दी जाती है, जबकि कार्तिक के महीने में मूली, बैंगन, उड़द और चने की दाल खाने से परहेज रखना चाहिए।

एक नियम यह भी है कि चातुर्मास के दौरान बिना किसी विशेष और अनिवार्य कारण के दूसरों के घर का अन्न ग्रहण करने से बचना चाहिए। सात्विक और सुपाच्य भोजन करने से हमारा स्वास्थ्य तो बेहतर होता ही है, साथ ही ध्यान और पूजा में भी मन लगता है।

मन, वाणी और शरीर का शोधन: चातुर्मास में कैसा हो आपका आचरण?

चातुर्मास मुख्य रूप से अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण रखने, संयम बरतने और आत्मचिंतन करने का समय है। इस दौरान जो साधक और व्रती नियम-धर्म का पालन करते हैं, उनके लिए आचरण संबंधी कई विशेष दिशा-निर्देश बनाए गए हैं। इन नियमों का पालन करने से अपार मानसिक शांति और आध्यात्मिक ऊर्जा की प्राप्ति होती है।

जो लोग चातुर्मास में विशेष व्रत, उपवास और साधना करते हैं, उन्हें शय्या त्याग का नियम अपनाना चाहिए। इसका अर्थ है कि उन्हें आरामदायक पलंग या गद्दे पर सोने के बजाय जमीन पर चटाई बिछाकर सोना चाहिए। इससे शरीर में अनुशासन आता है और अहंकार का नाश होता है।

इन चार महीनों तक ब्रह्मचर्य का पालन करना भी अत्यंत शुभ और जीवनदायी माना गया है। इसके अलावा सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इंसान को अपनी वाणी और अपने विचारों पर पूरा नियंत्रण रखना चाहिए। इस पवित्र समय में किसी पर भी अकारण गुस्सा करना, झूठ बोलना, किसी की बुराई करना या किसी का अपमान करना महापाप की श्रेणी में रखा गया है।

प्राचीन काल में वर्षा ऋतु में रास्ते खराब होने और नदियों के उफान पर होने के कारण साधु-संतों का भ्रमण करना संभव नहीं हो पाता था। इसलिए वे एक ही स्थान पर ठहरकर अपनी साधना करते थे और आम जनता को धर्मोपदेश देते थे।

आज भी उसी प्राचीन परंपरा का निर्वहन करते हुए लोगों को घरों और मंदिरों में रामायण, श्रीमद्भागवत कथा, भगवद्गीता का नियमित अध्ययन और सत्संग करना चाहिए, ताकि मन बुरे विचारों से दूर रहे।

अक्षय पुण्य की चाबी: छोटे-छोटे उपायों से बदलें अपना भाग्य

चातुर्मास का समय केवल परहेज करने या खाली बैठने का नहीं है, बल्कि यह अपने जीवन को एक नई और सकारात्मक दिशा देने का बेहतरीन अवसर है। इस दौरान किए गए छोटे-छोटे धार्मिक और परोपकारी कार्य भी मनुष्य को अक्षय पुण्य प्रदान करते हैं, जिनका फल जन्म-जन्मांतर तक मिलता है।

आपको इस अवधि में नियमित रूप से अपने इष्टदेव की आराधना करनी चाहिए और भगवान विष्णु तथा भगवान शिव के चमत्कारी मंत्रों का जाप करना चाहिए। इस समय आने वाले एकादशी, प्रदोष, शिवरात्रि, गणेश चतुर्थी और तीज आदि के व्रत पूरी निष्ठा और श्रद्धा के साथ रखने चाहिए।

भगवान की पूजा के साथ-साथ सेवा और दान-पुण्य का इस अवधि में विशेष महत्व बताया गया है। आपको अपनी क्षमता के अनुसार भूखे को अन्न, प्यासे को जल, जरूरतमंदों को वस्त्र और मौसम के अनुसार ताज़े फलों का दान करना चाहिए। शास्त्रों के अनुसार, इस समय किए गए दान से जीवन के सभी पापों का नाश होता है और घर में सुख-समृद्धि आती है।

इसके अलावा अपने शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को दुरुस्त रखने के लिए आपको नियमित रूप से योग, प्राणायाम और ध्यान का अभ्यास करना चाहिए।

जब आप एक सात्विक और अनुशासित जीवन शैली अपनाकर दूसरों की सेवा करते हैं और ईश्वर का ध्यान करते हैं, तो आपके भीतर एक नई आध्यात्मिक चेतना का विकास होता है। इसी चेतना और निस्वार्थ सेवा भाव के कारण मनुष्य सच्चे अर्थों में ईश्वरीय कृपा का पात्र बनता है।

चातुर्मास का यह लंबा समय ईश्वर की भक्ति, शरीर की शुद्धि और मन के संयम का एक बहुत ही दुर्लभ और अद्भुत संगम है, जिसे पूरी पवित्रता के साथ जीना चाहिए।

शाकिर हुसैन ने 3 महीने तक माँ-बेटी को बनाया बंधक, बार-बार रेप कर किया प्रेग्नेंट: मुस्लिम बनने का बनाया दबाव, बदायूँ कोर्ट ने सुनाई 10 साल की सजा; जानें पूरा मामला

उत्तर प्रदेश के बदायूँ में बेटे के इलाज का दावा कर एक परिवार का भरोसा जीतने वाले मौलाना शाकिर हुसैन को अदालत ने एक महिला और उसकी नाबालिग बेटी को अगवा कर तीन महीने तक बंधक बनाकर रखने, महिला से बार-बार दुष्कर्म करने और दोनों पर जबरन धर्म परिवर्तन का दबाव बनाने के मामले में दोषी ठहराया है। विशेष फास्ट ट्रैक कोर्ट (महिलाओं के विरुद्ध अपराध) की न्यायाधीश नेहा गर्ग ने दोषी को विभिन्न धाराओं में 10 वर्ष की सजा सुनाई है। यह बदायूँ में उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम के तहत सजा का पहला मामला है।

अदालत ने 20 जुलाई 2026 को सुनाए गए अपने फैसले में शाकिर हुसैन को धर्मांतरण कानून के तहत 5 वर्ष के कठोर कारावास और ₹50,000 जुर्माने की सजा दी। इसके अलावा अपहरण, अवैध बंधक बनाकर रखने, दुष्कर्म और अन्य अपराधों में भी उसे दोषी ठहराया गया। दुष्कर्म के मामले में उसे 10 वर्ष के कठोर कारावास और ₹50,000 जुर्माने की सजा सुनाई गई। अदालत ने निर्देश दिया कि सभी सजाएँ साथ-साथ चलेंगी। जुर्माना अदा न करने पर अतिरिक्त कारावास भी भुगतना होगा।

क्या है पूरा मामला?

मामले के अनुसार, पीड़िता 21 मार्च 2025 की सुबह करीब 9 बजे अपनी 10 वर्षीय बेटी के साथ घर से निकली थीं। इसके बाद दोनों वापस नहीं लौटीं। परिवार ने कई दिनों तक दोनों की तलाश की लेकिन उनका कोई पता नहीं चला। इसके बाद 27 मार्च 2025 को पीड़िता के पति ने बिल्सी थाने में पत्नी और बेटी की गुमशुदगी दर्ज कराई। इसके बाद भी वह खुद दोनों की तलाश करते रहे।

तलाश के दौरान उन्हें शक हुआ कि गाँव गढ़ी रिसौली का रहने वाला शाकिर हुसैन मौलाना उनकी पत्नी और बेटी को बहला-फुसलाकर अपने साथ ले गया है। इसी आधार पर उन्होंने पुलिस को तहरीर दी। इसके बाद 27 मई 2025 को शाकिर हुसैन के खिलाफ केस दर्ज किया गया।

पीड़िता और उनकी बेटी के अनुसार, परिवार का सबसे बड़ा बेटा राजकुमार मंदबुद्धि थ और उसके इलाज के लिए उन्होंने कई डॉक्टरों को दिखाया था लेकिन कोई खास फायदा नहीं हुआ।

इसी दौरान उन्हें जानकारी मिली कि रिसौली में शाकिर हुसैन नाम का एक मौलवी इलाज करता है। इसके बाद महिला अपने बेटे को लेकर उसके पास गईं। इलाज के बहाने शाकिर हुसैन का उनके घर आना-जाना शुरू हो गया और इसी दौरान उसने परिवार का विश्वास जीत लिया।

21 मार्च 2025 को जब पीड़िता अपनी बेटी के साथ मायके जाने के लिए निकलीं तब रास्ते में बिसौली मोड़ पर शाकिर हुसैन मिला। आरोप है कि उसने दोनों को बहला-फुसलाकर अपनी मोटरसाइकिल पर बैठाया और सीधे कासगंज जिले के सिढ़पुरा ले गया।

अभियोजन और पीड़िता के बयान के अनुसार, सिढ़पुरा पहुँचने के बाद शाकिर हुसैन ने माँ-बेटी को एक घर में बंद कर दिया। इसके बाद उसने पीड़िता पर मुस्लिम धर्म अपनाने का दबाव बनाना शुरू कर दिया। पीड़िता ने अदालत को बताया कि शाकिर ने कई बार उसके साथ रेप किया। जब उसने विरोध किया तो शाकिर ने उसकी बेटी को जान से मारने की धमकी दी।

पीड़िता के अनुसार, करीब तीन महीने तक दोनों को उसी घर में बंद रखा गया। इस दौरान उन्हें जबरन नमाज पढ़ाई जाती थी। बेटी को शाकिर को ‘अब्बू’ और माँ को ‘अम्मी’ कहने के लिए मजबूर किया जाता था। विरोध करने पर उनके साथ मारपीट तक की जाती थी।

पीड़िता ने यह भी बताया कि उसके हाथ पर उसका और उसके भाई का नाम गुदा हुआ था। शाकिर ने उस टैटू को मिटाने के लिए उस पर जहरीली दवा लगा दी और इससे हाथ की खाल उधड़ गई और वहाँ घाव हो गया। आरोपित लगातार उस पर निकाह करने का दबाव भी बनाता रहा। पीड़िता ने बताया कि जब भी शाकिर हुसैन घर से बाहर जाता था तो वह बाहर से ताला लगाकर जाता था ताकि माँ-बेटी वहाँ से भाग न सकें।

आखिरकार एक दिन वह माँ-बेटी को बस में बैठाकर कहीं और ले जा रहा था। इसी दौरान पुलिस दिखाई दी तो वह दोनों को छोड़कर मौके से भाग गया। इसके बाद पुलिस माँ-बेटी को अपने साथ थाने ले आई।

पुलिस जाँच में क्या सामने आया?

मामले की जाँच उपनिरीक्षक रामेहर सिंह ने की। उन्होंने वादी, पीड़िता और अन्य लोगों के बयान दर्ज किए। घटनास्थल का निरीक्षण किया गया और मेडिकल रिपोर्ट सहित अन्य साक्ष्य जुटाए गए। पीड़िता और उसकी बेटी के बयान धारा 164 सीआरपीसी के तहत दर्ज किए गए।

जांच के दौरान मामले में धारा 351(3), 127(4), 64(2)(m) बीएनएस और उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम की धारा 3/5(3) भी जोड़ी गई। 27 जून 2025 को माँ-बेटी को बरामद कर उनका मेडिकल परीक्षण कराया गया। इसके अगले दिन यानी 28 जून 2025 को शाकिर हुसैन को गिरफ्तार कर लिया गया।

विवेचना पूरी होने के बाद चार्जशीट अदालत में दाखिल की गई। बाद में 2 सितंबर 2025 को अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट न्यायालय संख्या-2, बदायूँ ने मामले का संज्ञान लिया और इसे सत्र न्यायालय भेज दिया। 18 नवंबर 2025 को आरोपित के खिलाफ आरोप तय किए गए लेकिन उसने खुद को निर्दोष बताते हुए मुकदमे का सामना करने की बात कही।

मेडिकल जाँच में क्या मिला?

पीड़िता का मेडिकल करने वाली डॉक्टर ने अदालत को बताया कि पीड़िता के दाहिने हाथ पर कोहनी और कलाई के बीच लगभग 6×4 सेंटीमीटर का घाव था। मेडिकल जाँच में हाइमन अनुपस्थित मिला और योनि मार्ग से सफेद स्राव भी पाया गया।

DNA जाँच के लिए सैंपल लिए गए और गर्भावस्था की जाँच कराने की सलाह दी गई। बाद में यूपीटी (यूरिन प्रेगनेंसी टेस्ट) रिपोर्ट पॉजिटिव आई।

इसके बाद डॉ. इंद्रकांत वर्मा ने अल्ट्रासाउंड किया जिसमें पता चला कि पीड़िता करीब छह सप्ताह 5 दिन की गर्भवती थी। रिपोर्ट में यह भी दर्ज था कि भ्रूण में अभी धड़कन शुरू नहीं हुई थी। वहीं, नाबालिग बेटी के मेडिकल परीक्षण में हाइमन सुरक्षित मिला और उसके शरीर पर किसी तरह की चोट नहीं पाई गई।

अदालत ने क्या कहा?

कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि सभी गवाहों और साक्ष्यों पर विचार करने के बाद अदालत ने कहा कि पीड़िता, उसकी बेटी और वादी के बयानों में पूरी तरह समानता है। जिरह के दौरान भी ऐसा कोई विरोधाभास सामने नहीं आया जिससे उनकी बातों पर संदेह किया जा सके।

अदालत ने कहा कि यदि दुष्कर्म पीड़िता का बयान भरोसेमंद है तो केवल उसी के आधार पर भी दोषसिद्धि की जा सकती है और हर मामले में अतिरिक्त पुष्टि जरूरी नहीं होती। अदालत ने यह भी माना कि पीड़िता की गर्भावस्था की अवधि उसी समय से मेल खाती है, जब वह आरोपित की अवैध हिरासत में थी।

20 जुलाई 2026 को सजा के बिंदु पर सुनवाई हुई। अदालत ने शाकिर हुसैन को विभिन्न धाराओं में दोषी ठहराते हुए यह सजा सुनाई है। धारा 137(2) बीएनएस के तहत 5 वर्ष, धारा 87 बीएनएस के तहत 7 वर्ष, धारा 351(3) बीएनएस के तहत 5 वर्ष, धारा 127(4) बीएनएस के तहत 3 वर्ष, धारा 64(2)(m) बीएनएस (रेप) के तहत 10 वर्ष और उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम की धारा 3/5(1) के तहत 5 वर्ष की सजा सुनाई गई है।

अदालत ने यह भी आदेश दिया कि यदि दोषी जुर्माना जमा नहीं करता है तो उसे अतिरिक्त साधारण कारावास भुगतना होगा। साथ ही, सभी सजाएँ एक साथ चलेंगी और जेल में पहले से बिताई गई अवधि को सजा में समायोजित किया जाएगा। अदालत ने दोषी को बदायूँ जेल भेजने के निर्देश दे दिए हैं।

‘धर्मेंद्र प्रधान को बर्खास्त करो’: माँग जब जिद में बदल जाए, प्रदर्शन जब राजनीति की टूल बन जाए तो भीड़तंत्र को लोकतंत्र पर हावी होने देना खतरनाक

  • भारतीय लोकतंत्र में विरोध-प्रदर्शन वैध है?
  • क्या भारतीय नागरिक विरोध-प्रदर्शन कर सकते हैं?
  • क्या भीड़ एक जगह इकट्ठा होकर अपनी बात रख सकती है?
  • भारतीय संविधान में नागरिकों को अपनी राय प्रकट करने की आजादी है?

NEET की परीक्षा देने वाले विद्यार्थी 10वीं कक्षा तक नागरिक शास्त्र की पढ़ाई करते हैं। यह ऐच्छिक विषय नहीं है, अनिवार्य होता है। इसमें मोटा-मोटी तौर पर नागरिकों के कर्तव्य-अधिकार, लोकतंत्र की परिभाषा, सरकार के कर्तव्य-अधिकार, सरकारी अंगों की मूलभूत बातें आदि-इत्यादि पढ़ाई जाती है। ऊपर के तमाम प्रश्नों का उत्तर पढ़ाई करके 10वीं पास किया कोई भी विद्यार्थी ‘हाँ’ में देगा।

इसी ‘हाँ’ के कारण NEET पेपर लीक मामले को लेकर दिल्ली के जंतर-मंतर पर विरोध-प्रदर्शन शुरू हुए। शुरुआती दिनों में जमीन पर संख्या दहाई से लेकर सैकड़ा तक रही होगी। लेकिन ऑनलाइन हलचल थी, इसको नकारा नहीं जा सकता। CJP मतलब कॉकरोच जनता पार्टी ने ऑनलाइन मुजस्समा गढ़ने में सफलता तो पाई थी। कुछ दिन ऐसे ही चला। विरोध-प्रदर्शन के दिन तो बढ़ रहे थे लेकिन जमीनी जोश थमा हुआ सा था। फिर एंट्री होती है सोनम वांगचुक की।

जंतर-मंतर की कॉन्क्रिट-तारकोल वाली जमीन को इसी सोनम वांगचुक की उपस्थिति से खाद-पानी मिलनी शुरू होती है। इस शख्स के जुड़ने से पहले क्या दिल्ली, क्या लखनऊ और जयपुर – हर जगह कॉकरोच जनता पार्टी के साथ कॉकरोच और पार्टी तो थी, नदारद थी तो जनता। भ्रम ही सही लेकिन सोनम वांगचुक की कायदे से गढ़ी गई छवि का फायदा कॉकरोच पार्टी को मिला। इस शख्स के आमरण अनशन ने विरोध-प्रदर्शन में जान फूँक दी। जैसे-जैसे दिन बीतते गए, जनता इससे खुद को कनेक्ट करती गई।

अब आते हैं मूल प्रश्न पर। आखिर यह विरोध-प्रदर्शन किया क्यों गया? क्योंकि NEET की परीक्षा का प्रश्न-पत्र लीक हो गया था। जिन विद्यार्थियों के पेपर अच्छे गए होंगे, निश्चित तौर पर वो और उनके सगे-संबंधी गुस्से में होंगे। मेरा तो मानना है कि सिर्फ सगे-संबंधी ही क्यों? तंत्र में अगर खामी है तो गुस्सा पूरे लोक को होना चाहिए, उससे जुड़े सवाल भी सामूहिक लोक स्तर पर पूछे जाने चाहिए। नागरिक शास्त्र की किताबों में भी यही पढ़ाया गया है। संविधान में ऐसा करने की आजादी भी दी गई है।

कॉकरोच पार्टी ने बिल्कुल सही किया। विद्यार्थियों के लिए सरकारी तंत्र सही से काम करे, सोनम वांगचुक ने कॉकरोच मंच से आमरण अनशन करके कुछ भी गलत नहीं किया। भारतीय नागरिकों को विरोध-प्रदर्शन करने के लिए किसी दूसरे देश से सीखने की आवश्यकता नहीं। सविनय अवज्ञा आंदोलन, असहयोग आंदोलन, नमक सत्याग्रह, दांडी मार्च – तमाम ऐसे उदाहरण हमारी ही धरा पर पुष्पित-पल्लवित हुए हैं।

जब किसी ने कुछ गलत ही नहीं किया, तो गलती हुई कहाँ? विरोध-प्रदर्शन NEET के परीक्षार्थियों के हित में की जा रही थी, फिर हिंसा-पत्थरबाजी-महिलाओं से बदसलूकी-अश्लील गालियाँ-नारेबाजी की खबरें क्यों?

कॉकरोच मंच पर आमरण अनशन कर रहे सोनम वांगचुक के रहते हुए विरोध-प्रदर्शन नियंत्रित था, दिशा-निर्देशित था। लेकिन उनके बिगड़ते स्वास्थ्य को देखते हुए जब उन्हें अस्पताल ले जाया गया तो चीजें धीरे-धीरे भीड़तंत्र में बदल गई। फिर शुरू हुआ भीड़ के राजनीतिकरण की प्रक्रिया। कॉकरोचों को पता ही नहीं चला कि कब उनके नीचे की जमीन पर बैटिंग कोई और कर रहा है, और वो भी उस खेल में शामिल हो गए।

सोनम वांगचुक को अस्पताल में एकांत मिला। वो सोच-समझ पा रहे थे। राजनीतिक कुचक्र से दूर थे। इसके विपरीत कॉकरोच जिस शोरगुल को अपनी जीत समझ रहे थे, वही उनका सबसे बड़ा मेंटल ब्लॉक था। दोनों की सोच का अंतर आप नीचे देख सकते हैं:

  • वांगचुक ने NEET परीक्षा-तंत्र को लीक-प्रूफ बनाने, पेपर लीक की घटना के कारण आत्महत्या किए बच्चों को उचित मुआवजा देने, जंतर-मंतर पर शांतिपूर्ण विरोध कर रहे छात्र-छात्राओं के खिलाफ कोई कानूनी कार्रवाई या FIR नहीं आदि के आश्वासन पर अपना अनशन तोड़ा। उनको मनाने के लिए सिर्फ सरकार नहीं बल्कि अलग-अलग राजनीतिक दलों के लगभग 65 सांसद गए थे। यह है भारत का लोकतंत्र और इसमें विश्वास करने वालों की कहानी।
  • कॉकरोच जिसकी न कोई पार्टी है, न जनता का साथ है – उनका स्टैंड बहुत क्लियर है – शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा। सरकार NEET परीक्षार्थियों के हित के लिए चाहे जो भी फैसले ले, उन फैसलों पर आपके अगुआ रहे वांगचुक की सहमति भी आ गई है – लेकिन शिक्षा मंत्री का इस्तीफा लेकर रहेंगे। यह तंत्र को सही करने की माँग के बजाय जिद की बैटिंग है, जिसकी पिच तैयार की है राहुल गाँधी ने, आम आदमी पार्टी ने, अखिलेश यादव ने… और उन सबने, जिसे भारतीय लोकतंत्र पर विश्वास नहीं।

इस पूरे घटनाक्रम के बाद घाटे में कौन रहेगा? राहुल गाँधी या केजरीवाल? समाजवादी पार्टी या कॉन्ग्रेस? या कॉकरोच पार्टी? सरकार का एक तंत्र इस विषय पर काम कर रहा होगा कि आने वाले समय में राष्ट्रीय स्तर की परीक्षा को कैसे और लीकप्रूफ/व्यवस्थित बनाया जाए। लेकिन उसी समय सरकार का दूसरा तंत्र इस पर काम कर रहा होगा कि विरोध-प्रदर्शन के नाम पर किन-किन ने हिंसा की। जरा सोचिए, लंबे कानूनी पचड़ों में कौन फँसेगा?

ऊपर के दोनों वाक्यों में धागे भर का फर्क है। धागे के इधर और उधर का फर्क हम सबको पता है।

जौहर यूनिवर्सिटी के फायदे के लिए बना ₹150 करोड़ का फ्लाईओवर, आजम खान ने कौड़ियों के भाव जमीनें हड़पीं: रामपुर के ग्रामीणों ने ऑपइंडिया से बयां किया दर्द, पढ़ें ग्राउंड रिपोर्ट

रामपुर विकास प्राधिकरण द्वारा जौहर यूनिवर्सिटी के 38 भवनों को अवैध बताए जाने के बाद आजम खान की चर्चा एक बार फिर लोगों की जुबान पर है। आजम खान पर सपा सरकार में मंत्री रहते हुए सरकारी धन के दुरुपयोग के आरोप लगते रहे हैं। इनमें एक आरोप है कि आजम खान ने व्यक्तिगत लाभ के लिए जौहर यूनिवर्सिटी तक करीब ₹150 करोड़ की लागत से फ्लाइओवर का निर्माण कराया था।  

यहाँ तक कि इसके लिए गाँव की गरीब किसानों और मजदूरों से आजम खान ने कम दामों में जमीन लेकर उनसे जबरन रजिस्ट्री कराईं थीं। इसी की सच्चाई जानने के लिए ऑपइंडिया के रिपोर्टर केशव मालान रामपुर के उस एकता तिराहे पर पहुँचे, जहाँ से शुरू हुआ 5 किलोमीटर लंबा फ्लाईओवर जौहर यूनिवर्सिटी के पिछले गेट पर जाकर समाप्त होता है। इसी एकता तिराहे से कुछ दूरी पर ही आजम खान का शहर में अपना पैतृक मकान है। यह बात अलग है कि इसी पैतृक मकान के सामने बनी रामपुर की जेल में वह कई वर्षों से बंद है।

बहरहाल, हम फ्लाईओवर से जौहर यूनिवर्सिटी तक पहुँचे। इस बीच हमने देखा कि फ्लाईओवर के दोनों और घने जंगल है और आम के बाग हैं, जिसे देखकर लगता है कि फ्लाइओवर के निर्माण के लिए हजारों बड़े पेड़ों को काटकर लाखों छोटे पेड़ों को कुचला गया होगा। रामपुर की व्यस्त सड़कों के उलट इस फ्लाईओवर पर सन्नाटा पसरा हुआ है। हैरानी इस बात की है कि यह फ्लाइओवर न तो किसी रेलवे लाइन को क्रॉस करता है न किसी नदी-नाले को और ना ही किसी सिक्स लाइन-फोर लाइन हाईवे या फिर ये किसी 2 लाइन रोड को भी क्रॉस नहीं करता।

यह फ्लाईओवर किसी बड़ी सड़क, गाँव या शहर को भी नहीं जोड़ता और न ही यह फ्लाईओवर रामपुर शहर के किसी ट्रैफिक को कंट्रोल करता है। इसके नीचे से सिर्फ दो छोटे लिंक रोड क्रॉस करते हैं, जो उन गाँवों को जाते हैं, जिन गाँवों के लोगों ने इस फ्लाईओवर के लिए आजम खान को अपनी जमीन दी थी। फ्लाईओवर पर खड़े एक व्यक्ति ने बताया कि इस फ्लाईओवर पर वाहनों की कोई भीड़ नहीं रहती है, बस यूनिवर्सिटी वाले छात्र ही यहाँ से होकर जाते हैं। इससे ज्यादातर लोगों को कोई फायदा नहीं है।

कौड़ियों के भाव ले ली हमारी जमीन: ग्रामीण

फ्लाइओवर से नीचे उतरने के बाद गाँव से पहले एक आम के बाग में काम कर रही कुछ महिलाओं से जब हमने आजम खान के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा हम उन्हें जानते तो हैं, लेकिन उन्हें कभी देखा नहीं है क्योंकि वह हमारे गाँव कभी नहीं आए। कमलेश नाम की महिला ने बताया कि हमारे पास सिर्फ चार बीघा ही जमीन थी। उसमें भी होकर पुल का निर्माण हो गया। अब वह किसी काम के लायक नहीं है। हमारी कीमती जमीन को कौड़ियों के भाव ले लिया गया। उन्होंने कहा कि हम अपनी जमीन नहीं देना चाहते थे, लेकिन हम गरीब लोग हैं। आखिर क्या करते?

उसी बाग में काम कर रहे भगवान दास बताते हैं कि इस पुल को जबरन बनाया गया था। हमने मजबूरी में अपनी जमीन दी। नहीं तो वह (आजम खान) हमें जेल में बंद करवा देते। उनसे फ्लाईओवर के निकलने से लाभ के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा कि इस फ्लाईओवर से हमें कोई लाभ नहीं हुआ। अगर फ्लाईओवर की जगह नीचे से रोड़ बनाया गया होता तो शायद हमारे गाँव, क्षेत्र का विकास होता और हमें वहाँ पर मकान, दुकान या फिर कोई व्यवसाय करने का मौका मिलता, लेकिन सच्चाई यही है कि आजम खान ने इसे सिर्फ अपने लाभ के लिए बनवाया था।

वह आगे कहते हैं कि उस समय आजम खान का लठ्ठ (दबदबा) चल रहा था, लेकिन अब उनकी दादागिरी बंद हो गई। उन्होंने जैसा किया वैसा ही वह भुगत रहे हैं। कुछ लोगों ने ऑफ कैमरा हमें बताया कि आजम खान ने इस फ्लाईओवर का निर्माण सिर्फ इसलिए कराया था, ताकि वह अपने घर से निकलकर बिना किसी जाम में फंसे सीधे ‘अपनी’ यूनिवर्सिटी तक पहुँच सकें।

जबरन कराई गई थी रजिस्ट्री: पीड़ित ग्रामीण

ऑपइंडिया की ग्राउंड रिपोर्ट टीम इस पुल के नीचे मौजूद किशनपुर गाँव पहुँची। फ्लाईओवर बनने से लाभ के बारे में पूछने पर दिनेश नाम के व्यक्ति कहते हैं कि हमारी जमीन तो इसमें नहीं गई, लेकिन इस फ्लाईओवर के बगल में हमारा मकान है। इसके बनने से हमें आज तक कोई लाभ नहीं हुआ बल्कि नुकसान ही हुआ है। नीचे रोड बनता तो शायद हमें कुछ इसका लाभ मिलता।

ग्रामीणों के मुताबिक, उस समय लोगों से कहा गया था कि पुल के नीचे भी रोड बनेगा, जिससे ग्रामीण खुश थे लेकिन आज तक ऐसा नहीं हो सका। उन्होंने यह बहुत गलत काम किया। इस बीच घूँघट लगाकर रास्ते से गुजर रहीं दो महिलाओं ने भी इसी बात को आगे बढ़ाते हुए कहा कि उन्होंने कोई अच्छा काम नहीं किया।

गाँव के ही उम्मेद सिंह बताते हैं कि हमारी जमीन फ्लाईओवर के निर्माण में गई थी, लेकिन इससे हमें कोई लाभ नहीं मिला। हमसे जबरन रजिस्ट्री कराई गई थी। उन्होंने कहा कि कानूनगो और तहसीलदार घर पर आ गए थे। इसके बाद हमें रजिस्ट्री ‘करनी’ पड़ी। स्कूल को आजम खान ने अपनी यूनिवर्सिटी के लिए बनवाया था और इसमें निर्माण के नाम पर करोड़ों रुपए का घोटाला किया गया।

उम्मेद सिंह कहते हैं कि मैं उस समय ऑटो चलाता था। आरटीओ में मौजूद एक यादव समाज के अधिकारी हमसे मोटी रकम वसूलते थे। पूछने पर रहते थे कि इसका 40% पैसा हिस्सा जौहर यूनिवर्सिटी को जाता है। यह सब आजम खान के इशारे पर होता था। आजम खान ने सपा सरकार में हमारे ऊपर बहुत जुल्म किए हैं और हमेशा ही रामपुर की जनता को सताया है, लेकिन आज उनको किए की सजा मिल रही है। योगी सरकार में सभी सही काम हो रहा है।  

आपको बता दें कि रामपुर के जौहर यूनिवर्सिटी से जुड़े इस 5 किलोमीटर लंबे फ्लाईओवर का निर्माण साल 2013-14 में करीब ₹150 करोड़ की लागत से कराया गया था। ये फ्लाईओवर अपने निर्माण के समय से ही विवादों के घेरे में है। लोगों का साफ कहना है कि ये फ्लाईओवर सिर्फ और सिर्फ आजम खान की खुदगर्जी की वजह से बना, जिसका फायदा स्थानीय लोगों को शायद ही हुआ हो। उन्हें तो सिर्फ नुकसान हुआ, क्योंकि उनकी जमीनें भी कौड़ियों के दाम ले ली गई और उन्हें इसके इस्तेमाल का कुछ खास फायदा भी नहीं है, क्योंकि इसका इस्तेमाल भी सिर्फ यूनिवर्सिटी आने-जाने के लिए ही होता है।