चीन में दुनिया का सबसे पुराना एम्बर मिला है जो अनुमान से 385 मिलियन साल पुराना है। इससे पहले 320 साल पुराना जीवाश्म कैप्सूल सबसे पुराना माना जाता था। नया कैप्सूल 65 मिलियन साल यानी 6.5 करोड़ वर्ष से ज्यादा पुराना है। एम्बर को अक्सर प्रकृति का ‘टाइम कैप्सूल’ कहा जाता है। दरअसल इसमें करोड़ों साल पहले के पेड़-पौधों, कीड़ों, परागकणों, फंगस, बैक्टीरिया और कभी-कभी छोटे जीवों के अवशेष लगभग उसी रूप में सुरक्षित रह जाते हैं। वैज्ञानिक इनका अध्ययन करके यह समझते हैं कि करोड़ों साल पहले पृथ्वी का वातावरण कैसा था, कौन कौन से जीव-जन्तु थे, कैसे थे। जंगल-जमीन और जलवायु कैसे थे।
क्या होता है एम्बर
दरअसल एम्बर वास्तव में जीवाश्म युक्त पेड़ की रेजिन (Resin) है। यह एक तरह से पेड़ का सुरक्षा कवच है यानी जब पेड़ की छाल निकल जाती है या उस पर कीड़े हमला करते हैं, तब पेड़ चिपचिपा रेजिन निकालता है। इससे फूलों के परागकण से लेकर छोटे छोटे कीड़े मकोड़े तक फँस जाते हैं। जब यह जमीन पर गिरता है, तो साल दर साल उस पर आवरण जमने लगता है।
लाखों सालों तक जमीन के नीचे दबने और रासायनिक बदलाव के बाद यह कठोर होकर एम्बर बन जाता है। दरअसल रेजिन पेड़ों के रस से अलग होता है क्योंकि रस पेड़ को पोषण देता है जबकि रेजिन पेड़ की रक्षा करता है। यह पुराने पेड़ों में चिपचिपा पदार्थ के रूप में पेड़ को चोट लगने पर बाहर निकलता है। चिपचिपा होने की वजह से ही इसमें परागकण, कीड़े, बीज आदि फँसते हैं। चूकिं इसके अंदर ऑक्सीजन नहीं पहुँचता, हवा-पानी नहीं लगता और किसी तरह का परिवर्तन नहीं होता है, तो वह जीवों के अवशेष के रूप में पूरी तरह सुरक्षित रहता है।
एम्बर को ‘टाइम कैप्सूल’ क्यों कहते हैं?
लाखों साल बाद भी कीड़ों-मकोड़ों, पेड़-पौधों के अवशेष अपने वास्तविक रूप में जब वैज्ञानिकों को मिलते हैं तो उन पर रिसर्च में कई बातों का पता चलता है। चूकि ये मानव निर्मित न होकर पूरी तरह प्राकृतिक तौर पर बनते हैं। मान लीजिए 5 करोड़ साल पहले कोई मच्छर किसी पेड़ के रेजिन में फँस गया।
रेजिन इतना चिपचिपा होता है कि मच्छर बाहर नहीं निकल पाया। वह वही जम कर मर गया। धीरे धीरे रेजिन कड़ा होकर जमीन पर गिर गया। चूकि वहाँ ऑक्सीजन नहीं पहुँच पा रहा है। फंग्स या बैक्टीरिया भी उसका नुकसान नहीं कर पा रहा। लाखों साल बाद यह मच्छर का अवशेष बता देंगा कि उसकी प्रजाति क्या थी, किस पेड़ का रेजिन है। उस वक्त जलवायु कैसी थी। उसके साथ अगर पराणकण भी मौजूद है तो ये भी पता चल जाएगा कि किस तरह के पौधे उस वक्त होते थे और सबसे अहम की ये कितना साल पुराना है। इसलिए एम्बर को प्राकृतिक ‘टाइम कैप्सूल’ कहा जाता है।
वैज्ञानिकों को इसी तरह के टाइम कैप्सूल से डायनासोर का भी पता चला। वैज्ञानिकों को एम्बर में डायनासोर के पंख, छिपकली की पूंछ, छोटे मेंढक, मकड़ियाँ, चींटियाँ, मधुमक्खियाँ, फूलों के बीज और परागकण, फूलों के पंखुड़ी, फलों के बीज आदि मिलते रहे हैं। इससे लाखों साल पुरानी पृथ्वी की पारिस्थितिकी तंत्र को समझने में बड़ी मदद मिली है।
चीन में मिला 385 मिलियन साल पुराना एम्बर
अब तक पेड़ों के रेजिन के बने कैप्सूल से एम्बर मिले थे, लेकिन साइंस एडवासेंज में प्रकाशित नए रिसर्च में पता चला है कि चीन में 385 मिलियन साल पुराने चट्टानों के अंदर से जीवाश्म युक्त रेजिन मिले हैं। ‘द अर्लियेस्ट एम्बर फ्रॉम द मिडिल देवोनियन ऑप चीन’ शीर्षक से छपे इस रिसर्च में बताया गया है कि पृथ्वी के शुरुआत में कुछ पौधों ने रेजिन उत्पादन करने वाला सिस्टम विकसित कर लिया था जिससे पौधों को लेकर नया दृष्टिकोण मिलता है कि पृथ्वी पर पौधों का विकास किस तरह हुआ है। यह एम्बर अब तक खोजा गया सबसे पुराना एम्बर है। वैज्ञानिकों को अब लगता है कि पृथ्वी पर रेज़िन बनाने वाले पेड़ पहले सोचे गए समय से भी बहुत पहले मौजूद थे। यह बदलाव पृथ्वी के जंगलों के विकास का इतिहास बदल सकता है।
हाल ही में चीन के शिनजियांग में मध्य देवोनियन काल के सैकड़ों एम्बर कोयले के खदानों में मिले। अधिकांश का आकार 0.1-0.5 मिलीमीटर के बीच था, लेकिन इसका सबसे बड़ा एम्बर 1.5 मिलीमीटर का था, हालाँकि ये अब तक मिले एम्बर की तुलना में काफी छोटा था।
हाल के कुछ शोधों में वैज्ञानिकों ने पाया कि रेजिन बनाने वाले जंगलों (Amber forests) का इतिहास पहले की तुलना में कहीं अधिक पुराना है। पहले माना जाता था कि बड़े पैमाने पर एम्बर बनने की शुरुआत लगभग 320–300 मिलियन वर्ष पहले (Late Carboniferous) हुई। नई खोजों से पता चलता है कि रेजिन उत्पादन और एम्बर बनने की शुरुआत का समय पहले की सोच से लगभग 65 मिलियन वर्ष पहले होता है।
रिपोर्ट के मुताबिक, देवोनियन चट्टानों से पहले जो रेजिन मिले थे, उस सेंपल में यह पुष्टि नहीं हो पाई थी ये वास्तविक एम्बर थे। लेकिन अब चट्टानों में मिले एम्बर से पता चला है कि ये वास्तविक एम्बर हैं यानी जितना सोचा था उससे करीब 65 मिलियन साल पुराना। इसलिए कहा जा रहा है कि एम्बर का 65 मिलियन साल टाइमलाइन शिफ्ट हो गया है।
लेट कार्बोनिफेरस पीरियड क्या है?
पृथ्वी पर लगभग 323 से 299 मिलियन साल पहले (Late Carboniferous Period) इतिहास का वह दौर था जब दलदली जंगल हुआ करते थे। पेड़ 30–40 मीटर तक ऊँचे होते थे। ऑक्सीजन की प्रचूरता ज्यादा थी। आज से करीब 30-35 फीसदी ज्यादा ऑक्सीजन धरती पर मौजूद थी। इसलिए कीड़े मकोड़े भी बड़े बड़े मिलते थे। घने और ऊँचे जंगलों के जमीन में दबने और हजारों सालों बाद कोयले में परिवर्तित होने की वजह से इस वक्त को कार्बोनिफेरस पीरियड कहा गया। इस वक्त दलदली जंगलों की वजह से सरीसृप प्राणी ज्यादा मिलते थे।
डेवोनियन पीरियड क्या है?
आज से लगभग 419 से 359 मिलियन वर्ष पहले (Devonian Period) पृथ्वी पर पेड़ विकसित हुए और घने जंगल बने। सामान्य बीज वाले पौधे आए और कुछ जीव पहली बार जमीन पर रहने लगे। यानी समुद्र से निकलकर दलदली इलाकों में रहने वाले एम्फीबियन यानी उभयचर विकसित हुए। इस वक्त समुद्रों में मछलियों की बहुत अधिक विविधता थी। इसलिए इसे अक्सर ‘Age of Fishes’ कहा जाता है। ये वह वक्त था जब बड़े बड़े पेड़ों की अधिकता से घने जंगलों का बड़े पैमाने पर विकास हुआ।
उस वक्त बार बार लगने वाले जंगलों की आग भी अहम थी। ऐसे में पारिस्थितकी तंत्र पर दबाव बना और इसमे बदलाव आए। माना जाता है कि इस वक्त ही पौधों में रेजिन जैसे पदार्थ का विकास हुआ जो उन्हें लगने वाले घावों से बचा सकें। आग में पौधों को क्षतिग्रस्त होने के बाद बनने वाले घावों को भरने में मदद मिली क्योंकि इस पर कीटों का वार होता था और वह पेड़ सड़ जाते थे। रेजिन इन सब से पेड़ों को बचाता था।
रेजिन इतना महत्वपूर्ण क्यों है?
रेज़िन केवल पेड़ के लिए ही सुरक्षा कवच नहीं है, बल्कि यह वैज्ञानिकों के लिए भी अनमोल धरोहर की तरह है। पेड़ की सुरक्षा करना, चोट लगने पर घाव भरना, कीड़ों को चोट वाले स्थान से दूर रखना, वायरस-बेक्टिरिया से बचाना इसका काम तो है ही। ये जीवाश्म संरक्षण में अहम योगदान देता है। अगर रेजिन नहीं हो, तो बड़े बड़े पेड़ सड़ जाएँगे। उनमें जरा सी खरोंच आने पर उनका बचना मुश्किल हो जाता।
वैज्ञानिकों को एम्बर नहीं मिल पाता क्योंकि कीड़े सड़ जाते, पराणकण और फूलों के हिस्से सड़ जाते, छोटे जीव के अवशेष नहीं बचते। रेजिन के कारण ही लाखों-करोड़ों साल पुराने छोटे जीव जन्तुओं और पौधों के अंश सुरक्षित रहते हैं। इससे पृथ्वी पर हुए विकासवाद (Evolution) को समझना आसान हो जाता है। एम्बर में सुरक्षित जीव बताते हैं कि कौन-सी प्रजातियाँ कब विकसित हुईं, उनका रूप समय के साथ कैसे बदला, किन पौधों और कीड़ों के बीच सह-विकास (co-evolution) हुआ।
एम्बर केवल एक सुंदर पीला अनमोल रत्न नहीं है, बल्कि पृथ्वी के करोड़ों वर्षों के इतिहास का प्राकृतिक अभिलेख है। पेड़ इसे अपनी सुरक्षा के लिए निकालते हैं और यह पारिस्थिति तंत्र को संरक्षित कर लेता है क्योंकि रेजिन समय के साथ जीवाश्म युक्त एम्बर बनता है और अपने भीतर उस वक्त के कीट, पौधे, परागकण, सूक्ष्मजीव और पर्यावरण की जानकारी सुरक्षित रह जाती है। इसी वजह से इसे ‘प्राकृतिक टाइम कैप्सूल’ कहा जाता है।
‘आपकी फ्लाइट का इंजन हवा में ही बंद हो सकता है।’… इस तरह की बातें सुनना कितना भयावह लग लग सकता है? लेकिन सोचिए भारत की जनता को यह डर राजनीति के नाम पर बेचा जा रहा है और ऐसा कर रहे हैं दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी (AAP) के मुखिया अरविंद केजरीवाल। इतना ही नहीं, वो लोगों से यहाँ तक अपील कर रहे हैं कि पेट्रोल और डीजल की नई गाड़ियाँ ना खरीदें। ऐसा होने पर ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री का क्या होगा, इसका आप अनुमान लगा लीजिए।
केजरीवाल ने गुरुवार (6 अगस्त 2026) सुबह X पर एक पोस्ट में लिखा, “सूत्रों के मुताबिक, मोदी सरकार एविएशन टर्बाइन फ्यूल यानी ATF में एथेनॉल मिलाने की योजना बना रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि इससे उड़ानों की सुरक्षा पर गंभीर असर पड़ सकता है।”
Sources indicate that Modi govt plans to mix ethanol in Aviation Turbine Fuel (ATF). Experts say that this cud seriously compromise the safety of flights
बस कुछ ही देर में केजरीवाल ने अपने इस प्रोपेगेंडा को आगे बढ़ाते हुए X पर एक आर्टिकल शेयर करते हुए लिखा, “यह आर्टिकल पढ़ें। आपकी फ्लाइट का इंजन हवा में ही बंद हो सकता है। क्या आप मिलावटी एविएशन फ्यूल से चलने वाले एयरक्राफ्ट में उड़ने का रिस्क लेंगे? एक पढ़ी-लिखी और काबिल सरकार का समय आ गया है भारत ने एविएशन फ्यूल में एथेनॉल मिलाने की इजाजत दी।”
Read this article. The engine of ur flight just might stop in the air. Will u risk flying in an aircraft running on adulterated aviation fuel?
हालाँकि, अगर अरविंद केजरीवाल ने शेयर करने से पहले अगर 23 अप्रैल 2026 का यह आर्टिकल खुद पढ़ लिया होता तो वह यह सब लिखने का जोखिम ना उठाते। खैर, हम यह समझने की कोशिश करते हैं कि क्या सचमुच विमान के टैंक में एथेनॉल मिलाकर यात्रियों की जान जोखिम में डालने की तैयारी हो रही है? जवाब जानने के लिए हमें राजनीति के शोर से थोड़ा बाहर निकलकर एविएशन फ्यूल को समझना होगा।
क्या है सस्टेनेबल एविएशन फ्यूल?
भारत में जिस बदलाव की बात हो रही है, उसका संबंध सस्टेनेबल एविएशन फ्यूल (Sustainable Aviation Fuel – SAF) से है। SAF कोई ऐसा ‘मिलावटी तेल’ नहीं है जिसे बिना जाँचे विमान में डाल दिया जाए। यह aviation-grade fuel है, जिसे निर्धारित तकनीकी और अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप इस्तेमाल किया जाता है और इसे ATF के साथ ब्लेंडिंग के लिए विकसित किया गया है।
अमेरिकी ऊर्जा विभाग की एक रिपोर्ट बताती है कि SAF से हवाई जहाजों से होने वाले वायु प्रदूषण को कम करने में मदद मिलती है। SAF को सामान्य विमान ईंधन के साथ अलग-अलग मात्रा में मिलाया जा सकता है। इसे आम तौर पर 10% से 50% तक मिलाने की सीमा होती है। यह सीमा इस बात पर निर्भर करती है कि SAF किस चीज से बनाया गया है और इसे बनाने का तरीका क्या है। अंतरराष्ट्रीय नागरिक उड्डयन संगठन (ICAO) के अनुसार, अब तक 46 अलग-अलग हवाई अड्डों से 3 लाख 60 हजार से ज्यादा व्यावसायिक उड़ानों में SAF का इस्तेमाल किया जा चुका है। इनमें ज्यादातर हवाई अड्डे अमेरिका और यूरोप में हैं।
केजरीवाल तो केवल एथेनॉल का रोना रो रहे हैं लेकिन यह रिपोर्ट बताती है कि SAF को पेट्रोलियम के बजाय दूसरे नवीकरणीय स्रोतों से बनाया जा सकता है। इसके लिए नगरों से निकलने वाला ठोस कचरा, जिसमें खाने और बगीचे का कचरा शामिल है, लकड़ी से मिलने वाला जैविक पदार्थ, पशु वसा, चिकनाई, तेल और ऐसे ही दूसरे स्रोतों का इस्तेमाल किया जा सकता है। SAF का उत्पादन अभी शुरुआती दौर में है।
कैसे होगा एथेनॉल का इस्तेमाल?
कई लोगों के मन में यह सवाल उठता है कि क्या एथेनॉल को सीधे हवाई जहाज के ईंधन टैंक में मिलाया जा सकता है? इसका सीधा जवाब है- नहीं। एथेनॉल में पानी को सोखने की प्रवृत्ति होती है, जिससे अत्यधिक ऊँचाई और कम तापमान पर विमान के ईंधन सिस्टम में ‘फेज सेपरेशन’ (ईंधन और पानी का अलग होना) या माइक्रोबियल ग्रोथ का खतरा बढ़ जाता है। इसके अलावा, कच्चे एथेनॉल की ऊर्जा क्षमता पारंपरिक जेट ईंधन से लगभग 34% तक कम होती है।
इसीलिए, एथेनॉल को अल्कोहल-टू-जेट (Alcohol-to-Jet या AtJ) तकनीक के माध्यम से चरणबद्ध तरीके से परिष्कृत (Refine) किया जाता है :-
डीहाइड्रेशन: एथेनॉल से पानी के कणों को पूरी तरह निकाल दिया जाता है। ओलिगोमेराइजेशन: इसके कार्बन मॉलिक्यूल्स को जोड़कर लंबी हाइड्रोकार्बन चेन बनाई जाती है। हाइड्रोजनेशन: अंत में हाइड्रोजन जोड़कर एक ऐसा ‘सिंथेटिक केरोसिन’ तैयार होता है जो रासायनिक संरचना में हुबहू पारंपरिक एटीएफ जैसा होता है।
इस प्रक्रिया के बाद तैयार ईंधन को मौजूदा विमान इंजनों या हवाई अड्डे के बुनियादी ढांचे में बिना किसी बदलाव के 50% तक सुरक्षित रूप से मिश्रित (Blend) किया जा सकता है।
भारत ने SAF पर क्या कहा था?
दुनिया भर में हो रहे बदलावों को देखते हुए ही भारत ने भी अप्रैल 2026 में एक ऐतिहासिक कदम उठाते हुए विमान ईंधन में एथेनॉल और सिंथेटिक हाइड्रोकार्बन के मिश्रण को कानूनी मंजूरी दे दी थी। यह जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों और कार्बन उत्सर्जन को कम करने के प्रयासों के बीच विमानन उद्योग में हो रहे वैश्विक बदलाव का ही एक हिस्सा था।
PIB द्वारा 23 अप्रैल 2026 को बताया गया था कि एविएशन टरबाइन फ्यूल (विपणन का विनियमन) आदेश 2001 में संशोधन कर SAF के साथ मिश्रित ATF को एटीएफ नियंत्रण आदेश के दायरे में लाया गया है।
केजरीवाल जो डर आज फैला रहें हैं उस पर तब ही PIB ने साफ कर दिया था कि SAF खास तौर से प्रसंस्कृत विमानन-ग्रेड हाइड्रोकार्बनों से बना होता है जो रासायनिक रूप से ATF के समान होते हैं और विमान इंजनों के साथ पूरी तरह अनुकूल होते हैं। SAF विमानन ईंधन की मूल स्वरूप, सुरक्षा या कार्य में कोई बदलाव नहीं करता है।
विमानन उपयोग के लिए SAF को शामिल करने से पहले, ICAO द्वारा मान्यता प्राप्त, ASTM इंटरनेशनल मानकों के अनुसार विमान इंजनों को कठोर परीक्षण प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। इसके बाद SAF को विमानन में उपयोग के लिए स्वीकार किया जाता है।
ICAO CORSIA यानी अंतरराष्ट्रीय विमानन के लिए कार्बन उत्सर्जन की भरपाई और कमी की योजना लागू कर रहा है। CORSIA का अनिवार्य चरण 2027 से शुरू होगा। इसके तहत अंतरराष्ट्रीय उड़ानों को एक तय आधार स्तर से अधिक हुए उत्सर्जन की भरपाई करनी होगी। SAF के इस्तेमाल से इस भरपाई की जरूरत को कम किया जा सकता है।
इसी वैश्विक जरूरत को ध्यान में रखते हुए भारत सरकार ने अंतरराष्ट्रीय उड़ानों में इस्तेमाल होने वाले ATF में SAF मिलाने के लिए शुरुआती लक्ष्य तय किए हैं। 2027 में 1%, 2028 में 2% और 2030 में 5% SAF मिलाने का लक्ष्य रखा गया है।
भारत में उड़ाई जा चुकी है SAF वाली फ्लाइट
यह कोई आसमानी ख्वाब नहीं है। भारत की पहली व्यावसायिक यात्री उड़ान देश में तैयार किए गए सस्टेनेबल एविएशन फ्यूल यानी SAF के मिश्रण से 2023 में ही सफलतापूर्वक उड़ाई जा चुकी है। 19 मई 2023 की TOI की रिपोर्ट बताती है कि एयरएशिया इंडिया की फ्लाइट i5-767 ने पुणे से नई दिल्ली के लिए उड़ान भरी थी। इस विमान में देश में तैयार SAF और सामान्य विमान ईंधन का मिश्रण इस्तेमाल किया गया था।
दुनियाभर में उठाए जा रहे इस तरह के कदम
दुनिया के दूसरे देश भी इसी दिशा में कदम उठा रहे हैं। यूरोपीय संघ और ब्रिटेन ने SAF मिलाने की अनिवार्य व्यवस्था शुरू की है। यूरोपीय संघ में 2025 में SAF मिलाने का लक्ष्य 2%, 2030 में 6% और 2050 तक 70% तक पहुँचने का लक्ष्य है। ब्रिटेन में यह लक्ष्य 2025 में 2%, 2030 में 10% और 2040 में 22% है।
अमेरिका SAF के उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए आर्थिक प्रोत्साहन दे रहा है। जापान ने भी 2030 तक 10% SAF इस्तेमाल करने का लक्ष्य रखा है। सिंगापुर में 2026 से अंतरराष्ट्रीय उड़ानों के लिए 1% SAF का इस्तेमाल जरूरी होगा और 2030 तक इस लक्ष्य को बढ़ाकर 3 से 5% किया जाएगा।
कुछ वर्ष आप पेट्रोल और डीजल की नई गाड़ियाँ ना खरीदें: केजरीवाल बेच रहे एक और डर
केजरीवाल ने केवल SAF को लेकर ही छूट नहीं बोला बल्कि लोगों ने नई गाड़ियाँ ना खरीदने की अपील कर कर दी। उन्होंने X पर एक पोस्ट में लिखा, “मोदी सरकार का क्या प्लान है? पता चल रहा है कि पेट्रोल में 50% से अधिक की मिलावट करेंगे। अभी बस माहौल शांत होने का इंतजार कर रहे हैं। पहले आपकी E0 और E10 गाड़ियों में जबरदस्ती E20 पेट्रोल डालकर कबाड़ा किया।”
उन्होंने आगे लिखा, “आज अगर आप E20 नई गाड़ी खरीदते हैं तो सरकार कुछ दिन बाद उसमे जबरदस्ती E50 पेट्रोल डालकर उसका कबाड़ा कर देगी। सरकार जल्द ही डीजल में भी मिलावट करने वाली है। इसलिए अभी कुछ वर्ष आप पेट्रोल और डीजल की नई गाड़ियाँ खरीदने से बचें।”
मोदी सरकार का क्या प्लान है? पता चल रहा है कि पेट्रोल में 50% से ज़्यादा की मिलावट करेंगे। अभी बस माहौल शांत होने का इंतज़ार कर रहे हैं। पहले आपकी E0 और E10 गाड़ियों में ज़बरदस्ती E20 पेट्रोल डालकर कबाड़ा किया। आज अगर आप E20 नई गाड़ी खरीदते हैं तो सरकार कुछ दिन बाद उसमे ज़बरदस्ती… https://t.co/UsYfMxVn4I
केजरीवाल के इस दावे पर बीजेपी की IT सेल के मुखिया अमित मालवीया ने भी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने लिखा, “फेक न्यूज़ फैलाना और बेवजह डर पैदा करना अरविंद केजरीवाल की पुरानी आदत है। अब नया झूठ यह फैलाया जा रहा है कि सरकार चुपके से पेट्रोल में 50% से अधिक एथेनॉल मिला देगी और लोगों की गाड़ियाँ कबाड़ हो जाएँगी।”
BJP नेता ने आगे लिखा, “भारत सरकार ने स्पष्ट किया है कि E20 से आगे पेट्रोल में एथेनॉल मिश्रण बढ़ाने का अभी कोई निर्णय नहीं लिया गया है। भविष्य में यदि कभी ऐसा प्रस्ताव आता भी है, तो वह व्यापक वैज्ञानिक अध्ययन, तकनीकी परीक्षण और वाहन निर्माताओं, ऑयल मार्केटिंग कंपनियों तथा अन्य हितधारकों से परामर्श के बाद ही होगा।”
फेक न्यूज़ फैलाना और बेवजह डर पैदा करना अरविंद केजरीवाल की पुरानी आदत है।
अब नया झूठ यह फैलाया जा रहा है कि सरकार चुपके से पेट्रोल में 50% से अधिक एथेनॉल मिला देगी और लोगों की गाड़ियाँ कबाड़ हो जाएँगी।
केजरीवाल की यह अपील कितनी खतरनाक हो सकती है, यह देखना भी जरूरी है। सवालों के नाम पर जो सनसनी फैलानी की कोशिश अरविंद केजरीवाल कर रहे हैं उससे बड़ा आर्थिक नुकसान भी हो सकता है। केजरीवाल ने जो 50% से ज्यादा एथनॉल वाली बात कही है उसके पीछे कोई तर्क नहीं है बस अपना मनगढ़ंत दावे हैं।
केजरीवाल राजनीति के नाम पर एक बेहद खतरनाक फॉर्मूला इस्तेमाल कर रहे हैं। पहले आशंका पैदा करो, फिर आशंका को संभावना बताओ और आखिर में संभावना को लगभग तय सरकारी योजना की तरह जनता के सामने रख दो। और इसका नुकसान सिर्फ राजनीतिक बहस तक सीमित नहीं रहता।
सोचिए, कोई मध्यमवर्गीय परिवार महीनों की बचत के बाद कार खरीदने की योजना बना रहा है। कोई व्यक्ति रोजी-रोटी के लिए बाइक खरीदना चाहता है। कोई छोटा कारोबारी नई गाड़ी से अपना काम बढ़ाना चाहता है। ऐसे में एक बड़ा राजनीतिक चेहरा सार्वजनिक रूप से कहता है कि अभी गाड़ी मत खरीदिए, आगे पेट्रोल ही बदलने वाला है। स्वाभाविक है कि आम आदमी के मन में डर पैदा होगा।
E20 को लेकर वास्तविक बहस हो सकती है। पुराने वाहनों पर प्रभाव, माइलेज, रखरखाव, ईंधन की गुणवत्ता और उपभोक्ताओं को मिलने वाले विकल्प जैसे सवाल बिल्कुल जायज हैं। सरकार से जवाब माँगना भी जायज है। लेकिन इन सवालों को उठाने और यह कह देने में जमीन-आसमान का अंतर है कि 50% से ज्यादा एथनॉल आने वाला है, इसलिए नई गाड़ी मत खरीदो।
अगर करोड़ों लोगों के मन में यह धारणा बैठा दी जाए कि आने वाले वर्षों में पेट्रोल गाड़ियाँ ही भरोसे लायक नहीं रहेंगी, तो इसका सीधा झटका भारत के ऑटोमोबाइल सेक्टर को लग सकता है। ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री केवल कार बनाने वाली कंपनियों का नाम नहीं है।
इसके पीछे हजारों कंपनियों की सप्लाई चेन, ऑटो पार्ट्स बनाने वाली यूनिट, डीलरशिप, सर्विस सेंटर, बीमा, फाइनेंस और लाखों प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रोजगार जुड़े हैं। एक कार की बिक्री कम होती है तो असर सिर्फ कार कंपनी के शोरूम तक नहीं रुकता।
और यह असर उस समय और गंभीर हो सकता है जब भारत का ऑटो सेक्टर एक बड़े तकनीकी बदलाव से गुजर रहा है और पेट्रोल-डीजल, हाइब्रिड, इलेक्ट्रिक और वैकल्पिक ईंधन वाली गाड़ियों के बीच बाजार अपना भविष्य तय कर रहा है। ऐसे वक्त में जब नेताओं को जनता को और भरोसा देने की जरूरत है केजरीवाल जैसे नेता केवल वोट बैंक के नाम पर फर्जी सनसनी फैला रहे हैं।
दिल्ली के एक आम घर की अलमारी में अक्सर ऐसे कपड़े दबे रहते हैं, जो समय के साथ छोटे हो गए हैं या जिन्हें अब पहना नहीं जाता है। ये कपड़े पूरी तरह से ठीक और पहनने योग्य होते हैं, लेकिन फैशन के बदलने या कम इस्तेमाल की वजह से वे किसी कोने में धूल फाँकते रहते हैं। आमतौर पर भारतीय घरों में इन पुराने कपड़ों का इस्तेमाल बहुत ही रचनात्मक और पारंपरिक तरीकों से किया जाता रहा है।
देश के आम नागरिक अपने घर के पुराने कपड़ों को संभाल कर रखते हैं और जरूरत पड़ने पर उनका बेहतरीन उपयोग करते हैं। कई लोग इन पुराने कपड़ों को अच्छी तरह नमक के पानी में धोकर साफ करते हैं, ताकि उनमें किसी तरह के कीटाणु न रहें। इसके बाद वे इन्हें बर्तन बेचने वाले या फेरी वाले को देकर अपने घर के लिए नए बर्तन या जरूरत का अन्य सामान ले लेते हैं।
इसके अलावा, हमारे देश में एक और लोकप्रिय तरीका पुराना कपड़ा प्रबंधन का रहा है, जिसे पारंपरिक रूप से खूब अपनाया जाता है। लोग पुराने सूती या अन्य मजबूत कपड़ों को लंबे समय तक सहेज कर रखते हैं और फिर उन्हें इकट्ठा करके किसी कुशल कारीगर के पास भेजते हैं। इन कपड़ों से घरों में बिछाने के लिए खूबसूरत और मजबूत दरियाँ, पायदान या अन्य घरेलू उपयोग की वस्तुएँ बनवाई जाती हैं। वहीं, समाज का एक बड़ा वर्ग ऐसा भी है जो इन पुराने और इस्तेमाल करने योग्य कपड़ों को सीधे तौर पर अपने आस-पास के जरूरतमंदों, गरीबों और बेघर लोगों को दान कर देता है। ऐसा करने से वे लोग कड़ाके की ठंड या अन्य मौसम में उन कपड़ों का पूरा इस्तेमाल कर पाते हैं और उनका जीवन थोड़ा आसान हो जाता है।
इसी भारतीय सांस्कृतिक परंपरा और जन-सहयोग की भावना को एक आधुनिक, बड़े और संगठित रूप में ढालने का काम अब दिल्ली सरकार ने किया है। दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने इसी सोच को आगे बढ़ाते हुए राजधानी में ‘अर्पण योजना’ की शुरुआत की है। यह योजना न केवल पुराने कपड़ों को कचरे में फेंकने से रोकती है, बल्कि उन्हें एक नया उद्देश्य और नया जीवन प्रदान करती है।
क्या है दिल्ली सरकार की ‘अर्पण योजना’?
दिल्ली सरकार ने शहर में बढ़ रहे कपड़ों के कचरे को रोकने के लिए ‘अर्पण योजना’ शुरू की है। इस योजना का मुख्य मकसद पुरानी चीजों को दोबारा इस्तेमाल में लाना है। इसे चक्रीय अर्थव्यवस्था या सर्कुलर इकोनॉमी भी कहा जाता है। इसके तहत लोग अपने घर के बेकार कपड़े तय किए गए केंद्रों पर आसानी से जमा करा सकते हैं। इस खास योजना की शुरुआत पूर्वी दिल्ली के मयूर विहार फेज-1 और पंजाबी बाग वेस्ट मेट्रो स्टेशन से की गई है।
दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने खुद आगे आकर इस अभियान की शुरुआत की है। उन्होंने पहले ‘अर्पण’ डोनेशन सेंटर का उद्घाटन किया और खुद अपने पुराने कपड़े दान किए। मुख्यमंत्री ने ऐसा करके आम जनता के सामने एक बहुत अच्छी मिसाल पेश की है। सरकार चाहती है कि लोग अपने पुराने कपड़ों को कूड़ेदान में न फेंकें। इन कपड़ों को सही जगह पहुँचाया जाए ताकि पर्यावरण की रक्षा हो सके और गरीबों की मदद की जा सके।
बहुत से लोग अपने पुराने और इस्तेमाल न होने वाले कपड़ों को यूँ ही फेंक देते हैं। इससे हमारे पर्यावरण पर बहुत बुरा असर पड़ता है और कचरा बढ़ता है। इसी समस्या को हल करने के लिए सरकार लोगों को जागरूक कर रही है। सरकार चाहती है कि नागरिक अपने साफ और पहनने योग्य कपड़े इन केंद्रों पर दान करें। इससे बेकार कपड़े कचरे में नहीं जाएँगे और उनका सही इस्तेमाल हो पाएगा।
इस योजना की सोच बहुत साफ है कि घरों में रखे अनचाहे कपड़ों को सही व्यक्ति तक पहुँचाया जाए। मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता का कहना है कि छोटी-छोटी कोशिशों से ही बड़ा बदलाव आता है। यह योजना सिर्फ कपड़ों का दान करने तक सीमित नहीं है। यह हमारे पर्यावरण को बचाने और समाज को जोड़ने का एक बड़ा तरीका है। जब हम मिलकर काम करेंगे, तभी हमारी दिल्ली साफ और सुंदर बनेगी।
इन केंद्रों पर जमा होने वाले कपड़ों को बहुत सावधानी से छांटा जाता है। वैज्ञानिक तरीकों से यह देखा जाता है कि कौन सा कपड़ा किसके काम आ सकता है। इस प्रक्रिया में यह ध्यान रखा जाता है कि कोई भी अच्छा कपड़ा बेकार न जाए। इन सभी प्रयासों से दिल्ली को स्वच्छ और पर्यावरण के प्रति जागरूक बनाने में मदद मिल रही है। यह योजना हम सबके लिए एक बेहतरीन मौका है।
अर्पण केंद्र किन मेट्रो स्टेशनों पर है?
दिल्ली सरकार ने पुरानी कपड़ों को दान करने के इस काम को बेहद आसान बना दिया है। इसके लिए सार्वजनिक मेट्रो नेटवर्क का इस्तेमाल किया गया है ताकि लोगों को किसी तरह की परेशानी न हो। पहले चरण में दिल्ली के कुल 10 प्रमुख मेट्रो स्टेशनों पर ‘अर्पण केंद्र’ बनाए जा रहे हैं। इन सभी 10 स्टेशनों पर यात्री अपने रोज आने-जाने के सफर के दौरान आसानी से पहुँच सकते हैं।
इन सभी 10 प्रमुख मेट्रो स्टेशनों के नाम बहुत साफ हैं। इनमें मयूर विहार फेज-1, पंजाबी बाग वेस्ट, शालीमार बाग और शाहदरा शामिल हैं। इसके अलावा रोहिणी वेस्ट, हौज खास, लाजपत नगर, मालवीय नगर, द्वारका और मोहन एस्टेट स्टेशन भी हैं। इन जगहों पर रोजाना लाखों लोग सफर करते हैं। इसलिए सरकार ने इन स्टेशनों को चुनकर कपड़ों को जमा करना बहुत आसान कर दिया है।
इन केंद्रों पर कपड़े दान करने की प्रक्रिया पूरी तरह डिजिटल और सरल है। केंद्र पर एक विशेष स्कैनर लगा होता है जिसे आपको अपने फोन से स्कैन करना होता है। इसके बाद आपके फोन पर एक छोटा सा फॉर्म खुल जाता है। उस फॉर्म में आपको अपना नाम और मोबाइल नंबर लिखना होता है।
साथ ही, आपको दान किए जाने वाले कपड़ों का वजन किलो में दर्ज करना होता है। आप सुबह 8 बजे से शाम 6 बजे तक अपने साफ और पहनने योग्य कपड़े यहाँ दे सकते हैं। DMRC के सहयोग से चल रही यह पहल बहुत ही व्यवस्थित है। यहाँ आने वाले कपड़ों की छंटनी करके अच्छे कपड़े जरूरतमंदों को दिए जाते हैं, और बाकी कपड़ों को रीसाइकिल किया जाता है।
अर्पण योजना का मुख्य उद्देश्य क्या?
दिल्ली सरकार की ‘अर्पण योजना’ का सबसे बड़ा उद्देश्य शहर के कचरे को सही तरीके से संभालना है। आज के समय में नए कपड़े बहुत ज्यादा खरीदे जा रहे हैं। लोग थोड़े दिन कपड़े पहनकर उन्हें बेकार समझकर फेंक देते हैं। इससे हमारे शहरों में कचरे के बड़े-बड़े पहाड़ बन जाते हैं। इस समस्या को टेक्सटाइल वेस्ट कहा जाता है। इसी बड़ी समस्या से निपटने के लिए सरकार यह योजना लेकर आई है।
पुराने कपड़ों को दोबारा इस्तेमाल करने से पर्यावरण पर पड़ने वाला बुरा असर कम होता है। इससे हमारी प्राकृतिक चीजें सुरक्षित रहती हैं। साथ ही, नए कपड़े बनाने में जो ऊर्जा खर्च होती है, उसकी भी बचत होती है। जब हम पुरानी चीजों का फिर से उपयोग करते हैं, तो प्रकृति को बहुत राहत मिलती है। यह योजना इसी सोच पर काम करती है।
इस योजना का एक और बहुत जरूरी मकसद लोगों में समझदारी बढ़ाना है। सरकार चाहती है कि लोग सामानों को यूँ ही न फेंके। लोगों को चीजों को दोबारा इस्तेमाल करने और रीसाइकिल करने की आदत डालनी चाहिए। मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने इस अभियान की शुरुआत करते समय एक बात बहुत साफ कही थी। उन्होंने कहा था कि जब तक आम जनता का साथ नहीं मिलेगा, तब तक कोई भी सरकारी योजना सफल नहीं हो सकती।
इसलिए सरकार इस काम को एक बड़ा जन-आंदोलन बनाना चाहती है। इसका मकसद हर नागरिक को पर्यावरण के प्रति जिम्मेदार बनाना है। यह योजना सिर्फ कचरा साफ करने तक सीमित नहीं है। यह लोगों के दिलों में समाज की सेवा और प्रकृति के प्रति प्यार जगाने का एक बहुत अच्छा तरीका भी है। जब सब लोग मिलकर साथ चलेंगे, तभी हमारी दिल्ली साफ और हरी-भरी बन पाएगी।
पुराने कपड़ों का क्या होता है? रीसायकल और अपसाइक्लिंग की पूरी प्रक्रिया
‘अर्पण योजना’ के तहत जब लोग अपने पुराने कपड़े जमा कराते हैं, तो सबके मन में यह सवाल आता है कि उन कपड़ों का आगे क्या किया जाएगा? इस बात का जवाब देते हुए सरकार ने साफ किया है कि इन कपड़ों को तीन मुख्य तरीकों से नया जीवन दिया जाएगा। ये तीन तरीके दोबारा इस्तेमाल करना, रीसाइकिल करना और अपसाइक्लिंग करना हैं। इस पूरी प्रक्रिया के जरिए यह पक्का किया जाता है कि कोई भी कपड़ा बेकार न जाए और उसका सही सदुपयोग हो सके।
सबसे पहले इन सभी कपड़ों की बहुत सावधानी से छंटनी की जाती है। छंटनी के बाद जो कपड़े पूरी तरह सुरक्षित और पहनने योग्य होते हैं, उन्हें ‘रीस्यू’ यानी दोबारा इस्तेमाल की श्रेणी में रखा जाता है। इन अच्छे और साफ कपड़ों को बिना किसी बदलाव के सीधे गरीबों और जरूरतमंद लोगों में बांट दिया जाता है। इससे समाज के गरीब लोगों को मुफ्त में अच्छे कपड़े मिल जाते हैं। सर्दियों के मौसम में या किसी भी मुश्किल समय में यह मदद उनके बहुत काम आती है। यह तरीका समाज में आपसी प्यार और इंसानी मदद की भावना को और ज्यादा मजबूत बनाता है।
जो कपड़े सीधे पहनने लायक नहीं बचते हैं, उन्हें दूसरे चरण में रीसाइक्लिंग इकाइयों में भेजा जाता है। वहाँ आधुनिक मशीनों की मदद से इन कपड़ों के रेशों को अलग किया जाता है। इन पुराने रेशों से नए धागे या कारखानों में काम आने वाले अन्य उत्पाद बनाए जाते हैं। इसके अलावा, अपसाइक्लिंग की प्रक्रिया भी बहुत खास होती है। इसमें पुराने और कटे-फटे कपड़ों को रचनात्मक तरीके से काटकर नई और सुंदर चीजें बनाई जाती हैं।
इस अपसाइक्लिंग प्रक्रिया के जरिए पुराने कपड़ों से डिजाइनर बैग, सुंदर कुशन कवर और घर की सजावट का सामान तैयार किया जाता है। इसके अलावा और भी कई उपयोगी वस्तुएँ बनाई जाती हैं जो रोजमर्रा के काम आती हैं। यह पूरी वैज्ञानिक प्रक्रिया यह पक्का करती है कि कपड़े का छोटे से छोटा टुकड़ा भी बेकार न फेंका जाए। इस तरह पुराने कपड़ों को रीसाइकिल करके प्रकृति को बचाया जाता है और उनका अधिकतम उपयोग किया जाता है।
महिलाओं के लिए रोजगार के नए अवसर
दिल्ली सरकार की ‘अर्पण योजना’ सिर्फ पर्यावरण को साफ रखने या कपड़े दान करने तक सीमित नहीं है। इस योजना का एक बहुत ही मजबूत और अच्छा सामाजिक पहलू भी है। इस योजना के जरिए दिल्ली की महिलाओं के लिए रोजगार के नए और सुनहरे रास्ते खोले जा रहे हैं। जब लोग मेट्रो स्टेशनों पर बने केंद्रों पर कपड़े दान करते हैं, तो वे कपड़े आगे प्रोसेसिंग यूनिट्स में जाते हैं। इन जगहों पर काम करने के लिए बहुत सारे लोगों की जरूरत होती है।
इन कपड़ों की छंटनी करने, उन्हें धोने और अलग-अलग भागों में बांटने का काम किया जाता है। इसके अलावा पुराने कपड़ों से नई चीजें यानी अपसाइक्लिंग करने के कामों में भी महिलाओं को जोड़ा जा रहा है। सरकार का यह कदम महिलाओं को आगे बढ़ाने और उन्हें मजबूत बनाने की दिशा में एक बहुत बड़ी और अच्छी सोच है। इससे महिलाओं को किसी पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा और वे अपने पैरों पर खड़ी हो सकेंगी।
इस व्यवस्था की मदद से महिलाएँ अपने घर के पास ही इन केंद्रों या जुड़ी हुई फैक्ट्रियों में काम कर सकती हैं। वे वहाँ काम करके अपनी आजीविका चला सकती हैं और अपने परिवार को आर्थिक रूप से मजबूत बना सकती हैं। सरकार का सोचना है कि जब महिलाएँ ऐसे पर्यावरण और समाज से जुड़े कामों में हिस्सा लेती हैं, तो देश और समाज का विकास बहुत तेजी से होता है।
इससे महिलाओं का आत्मविश्वास भी काफी बढ़ता है और वे शहर की तरक्की में अपनी अहम भूमिका निभाती हैं। इस तरह ‘अर्पण योजना’ एक साथ कई अच्छे काम कर रही है। एक तरफ जहाँ इससे हमारा पर्यावरण साफ हो रहा है, वहीं दूसरी तरफ गरीबों की मदद भी हो रही है। साथ ही साथ, इससे महिलाओं का आर्थिक विकास भी पूरी तरह सुरक्षित हो रहा है।
अमेरिकी प्रतिनिधि राइली एम. मूर ने प्रस्तावित विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 (FCRA Amendment Bill) की आलोचना करते हुए दावा किया है कि यह विधेयक भारत सरकार को ‘चर्चों और धार्मिक चैरिटी संस्थाओं पर कब्जा करने’ की अनुमति देता है। अपने पहले कार्यकाल के इस रिपब्लिकन सांसद ने इसे ‘ईसाइयों पर सीधा हमला’ करार दिया।
4 अगस्त को सोशल मीडिया मंच X पर लिखते हुए मूर ने कहा,
“हमारे प्रभु यीशु मसीह के पुनरुत्थान के कुछ ही दशकों बाद संत थॉमस भारत के मालाबार तट पर आए थे, लेकिन ईसाइयों के इस लंबे इतिहास के बावजूद भारत की संसद विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम (FCRA) में ऐसे संशोधन पर विचार कर रही है, जिससे सरकार चर्चों और धार्मिक चैरिटी संस्थाओं पर कब्जा कर सके।”
उन्होंने आगे लिखा,
“यह ईसाइयों पर स्पष्ट हमला है। यदि यह विधेयक इसी रूप में आगे बढ़ा, तो यह भारत-अमेरिका द्विपक्षीय संबंधों के लिए गंभीर चिंता का विषय होगा।”
विडंबना यह है कि चर्चों पर ‘सरकारी कब्जे’ का उनका दावा उतना ही भ्रामक है, जितना पहली शताब्दी में संत थॉमस के दक्षिण भारत आने का दावा।
FCRA संशोधन विधेयक को लेकर अमेरिकी सांसद ने जो भ्रम और भय के माहौल तैयार करने की कोशिश की है, उसकी पड़ताल आवश्यक है।
मार्च 2026 में पेश किया गया FCRA संशोधन विधेयक मुख्य रूप से उन संस्थाओं से संबंधित है, जिनका FCRA पंजीकरण रद्द हो चुका है, जिन्होंने स्वयं लाइसेंस सरेंडर कर दिया है या जिनका नवीनीकरण नहीं हुआ। यह विधेयक केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त प्राधिकारी को ऐसी संस्थाओं की विदेशी फंडिंग और उस विदेशी धन से निर्मित परिसंपत्तियों के प्रबंधन का अधिकार देता है। इसका मकसद उनके दुरुपयोग, अवैध हस्तांतरण को रोकना है।
इसके अलावा, गृह मंत्रालय ने 22 जून 2026 को अधिसूचना के माध्यम से विदेशी अंशदान (विनियमन) नियम, 2011 में संशोधन करते हुए धार्मिक समुदाय के कई वर्गों के लिए धर्मांतरण (Proselytisation) को नियमों के दायरे से बाहर रखा।
दिलचस्प बात यह है कि राइली मूर पहले अमेरिकी सांसद नहीं हैं, जिन्होंने भारत के FCRA संशोधन विधेयक को लेकर आपत्ति जताई है। इससे पहले अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो की मई 2026 की भारत यात्रा से पूर्व अमेरिकी सांसद क्रिस स्मिथ ने मदर टेरेसा की मिशनरीज ऑफ चैरिटी का FCRA लाइसेंस निलंबित किए जाने का मुद्दा भारत के सामने उठाने की अपील की थी।
भय का माहौल बनाते हुए स्मिथ ने दावा किया था कि यदि यह विधेयक पारित हो गया, तो ‘सभी चर्चों और डायोसीज की संपत्तियाँ भारत के कब्जे में जा सकती हैं।’
राइली मूर की तरह स्मिथ ने भी चेतावनी दी थी कि यदि इस विधेयक को रोका नहीं गया, तो इससे भारत-अमेरिका संबंधों को दीर्घकालिक नुकसान हो सकता है।
सिर्फ विदेशी राजनेता ही नहीं, बल्कि भारत के कुछ मीडिया संस्थान भी इस विधेयक को धार्मिक अल्पसंख्यकों और नागरिकों पर हमले के रूप में दिखाने की कोशिश कर रहे हैं।
FCRA विदेशी फंडिंग को नियंत्रित करने वाला कानून है, धार्मिक कानून नहीं
राइली मूर ने इस मामले में भारतीय वामपंथी उदारवादी वर्ग से भी आगे बढ़कर भय और पीड़ित होने का नैरेटिव गढ़ा है। उनका यह दावा कि FCRA संशोधन विधेयक सरकार को मनमाने ढंग से चर्चों पर कब्जा करने का अधिकार देता है, पूरी तरह भ्रामक है।
सरकार न तो किसी पूजा स्थल का अधिग्रहण कर सकती है और न ही उसके धार्मिक स्वरूप में कोई बदलाव कर सकती है।
नियमों के अनुसार, सरकार की शक्तियाँ केवल उन विदेशी फंड से निर्मित परिसंपत्तियों तक सीमित हैं, जिन पर FCRA लाइसेंस समाप्त होने जैसी विशेष परिस्थितियाँ लागू होती हैं। इतना ही नहीं, ऐसे आदेशों की समीक्षा करने और अपील का अधिकार भी दिया गया है।
यह भी उल्लेखनीय है कि राइली मूर और कई भारतीय NGO केवल ईसाइयों का उल्लेख कर रहे हैं, जबकि यह कानून पूरी तरह धर्म-निरपेक्ष है और सभी FCRA पंजीकृत संस्थाओं पर समान रूप से लागू होता है। मौजूदा FCRA कानून और प्रस्तावित संशोधन दोनों ही विदेशी फंडिंग को नियंत्रित करने वाले कानून हैं, न कि धार्मिक कानून।
दुनिया के अन्य लोकतांत्रिक देशों में भी विदेशी फंडिंग को नियंत्रित करने वाले ऐसे कानून मौजूद हैं। अमेरिका में विदेशी एजेंट्स पंजीकरण अधिनियम (FARA), ब्रिटेन में विदेशी प्रभाव पंजीकरण स्कीम (FIRS) और ऑस्ट्रेलिया में विदेशी प्रभाव पारदर्शिता और जवाबदेही अधिनियम (FITAA) जैसे कानून इसी उद्देश्य से बनाए गए हैं।
भारत के FCRA की सबसे बड़ी खासियत है कि राष्ट्रीय सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए यह पूर्व अनुमति (Pre-approval) और अनुमति-आधारित व्यवस्था पर काम करता है।
अब प्रश्न उठता है कि अमेरिका भारत के FCRA संशोधन विधेयक का विरोध क्यों कर रहा है और भारत-अमेरिका संबंधों को नुकसान पहुँचने की चेतावनी क्यों दे रहा है?
इसका उत्तर भूराजनीतिक हितों और धार्मिक महत्वाकांक्षाओं में छिपा है।
अमेरिकी मिशनरी नेटवर्क, World Vision, USAID और FCRA संशोधन विधेयक का विरोध
दशकों से अमेरिका स्थित अनेक इंजीलवादी (Evangelical) और मिशनरी नेटवर्क भारत में चर्च स्थापित करने, गरीबों, विशेषकर जनजातीय और दलितों के बीच धर्मांतरण अभियान चलाने तथा उससे जुड़ी गतिविधियों के लिए फंडिंग करते रहे हैं। Compassion International, World Vision India, Joshua Project समेत कई विदेशी ईसाई संगठन आज भी भारत में सक्रिय हैं और धार्मिक गतिविधियों के साथ-साथ अपने मूल देशों के रणनीतिक हितों को भी आगे बढ़ाने का काम करते हैं।
OpIndia लगातार अमेरिका स्थित वर्ल्ड विजन इंटरनेशनल की गतिविधियों को लेकर चेतावनी देता रहा है। इस ईसाई NGO को अब बंद हो चुकी अमेरिकी एजेंसी USAID से भी फंडिंग मिलती रही, जिस पर भारत-विरोधी और हिंदू-विरोधी संगठनों तथा व्यक्तियों को वित्तीय सहायता देने के आरोप लगते रहे हैं।
वर्ल्ड विजन का असर पूर्वोत्तर तक ही सीमित नहीं है। संगठन स्वयं को एक मानवीय संगठन (Humanitarian Organisation) के रूप में दिखाता है, जबकि वास्तविकता में यह कट्टर ईसाई मिशनरी संगठन है। पिछले लगभग सात दशकों से इसने अन्य मिशनरी समूहों के साथ मिलकर हिंदुओं का धर्मांतरण करने के लिए अभियान चलाए। इनमें विशेष रूप से महिलाओं और बच्चों शामिल हैं। यह उस दौर में हुआ जब नेहरू सरकार ने इस संगठन को भारत में खुलकर काम करने की छूट दी।
वर्ष 1972 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी की सरकार ने World Vision के संस्थापक बिली ग्राहम को नागालैंड जाने की अनुमति भी दी थी। उस समय राज्य में अस्थिरता के कारण विदेशियों को जाने की अनुमति भी नहीं दी जाती थी। स्वयं ग्राहम ने भी इस अनुमति पर आश्चर्य व्यक्त किया था। इसके बाद World Vision ने नागालैंड और दूसरे क्षेत्रों में अपने धर्मांतरण अभियानों को आगे बढ़ाया।
वर्ष 2024 में मोदी सरकार ने World Vision का FCRA लाइसेंस रद्द कर दिया, जिससे भारत में उसकी गतिविधियों को बड़ा झटका लगा। OpIndia पहले भी रिपोर्ट कर चुका है कि World Council of Churches, World Evangelical Alliance और World Vision जैसे विदेशी ईसाई संगठन भारत के धर्मांतरण-रोधी कानूनों का लगातार विरोध करते रहे हैं।
अब यही विदेशी और भारतीय मिशनरी संगठन FCRA संशोधन विधेयक का भी विरोध कर रहे हैं, क्योंकि उनका मानना है कि इससे उन संस्थाओं तक विदेशी धन का बिना रुकावट के प्रवाह रुक जाएगा, जो भारत की धार्मिक जनसांख्यिकी बदलने तथा राष्ट्रीय सुरक्षा को प्रभावित करने वाले एजेंडे पर काम करती हैं।
सिर्फ मिशनरी संगठन ही नहीं, बल्कि कई NGO और वामपंथी विचारधारा से जुड़े नेटवर्क भी लंबे समय से विकास परियोजनाओं के विरोध, आंदोलन भड़काने और भारत-विरोधी प्रचार के आरोपों के चलते जाँच एजेंसियों के रडार पर रहे हैं।
सरकार ने पहले भी विकास परियोजनाओं का विरोध, हिंसक या उग्र प्रदर्शन भड़काना तथा जबरन धर्मांतरण जैसी गतिविधियों की वजह से FCRA लाइसेंस रद्द किया था।
कुडनकुलम परमाणु परियोजना: विदेशी फंडिंग और आंदोलन
विदेशी फंडिंग के प्रभाव का सबसे चर्चित उदाहरण कुडनकुलम परमाणु ऊर्जा परियोजना (KKNPP) है, जिसे वर्षों तक वामपंथी दलों और विदेशी धन प्राप्त NGO के विरोध का सामना करना पड़ा।
तमिलनाडु के तिरुनेलवेली जिले में स्थित इस परियोजना की परिकल्पना भारत के सबसे बड़े परमाणु ऊर्जा संयंत्र के रूप में की गई थी, जिसकी कुल क्षमता 6,000 मेगावाट निर्धारित थी। इसका निर्माण 2002 में शुरू हुआ, लेकिन लगातार प्रदर्शन और राजनीतिक विरोध के कारण यह परियोजना लंबे समय तक बाधित रही।
इन विरोध प्रदर्शनों का चरम वर्ष 2011 में देखने को मिला, जब जापान के फुकुशिमा परमाणु हादसे के बाद लोगों में भय का माहौल बनाया गया कि कुडनकुलम में भी वैसी ही त्रासदी हो सकती है।
पीपुल्स मूवमेंट अगेंस्ट न्यूक्लियर एनर्जी (PMANE) के नेता एस. पी. उदयकुमार इस आंदोलन का प्रमुख चेहरा बनकर उभरे।
वर्ष 2012 में कई अंतरराष्ट्रीय ईसाई प्रकाशनों ने खुलकर लिखा था कि चर्च और कैथोलिक संगठन इस आंदोलन का नेतृत्व कर रहे हैं। इडिंथाकराई स्थित ‘लेडी ऑफ लूर्ड्स कैथोलिक चर्च‘ तथा दो कैथोलिक पादरी PMANE की समन्वय समिति का हिस्सा थे।
बाद में परमाणु परियोजना का विरोध करने वाले कई प्रमुख कार्यकर्ता, जिनमें एस. पी. उदयकुमार और जी. सुंदरराजन शामिल थे, आम आदमी पार्टी (AAP) से जुड़ गए। सुंदरराजन ने तो वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में AAP के उम्मीदवार के रूप में चुनाव भी लड़ा।
इसी प्रकार हाल में दिल्ली में हुए Cockroach Janta Party (CJP) के छात्र आंदोलन का नेतृत्व करने वाले अभिजीत दिपके भी अतीत में आम आदमी पार्टी से जुड़े रहे हैं।
इस पूरे विवाद के दौरान भारत के पूर्व राष्ट्रपति और प्रसिद्ध वैज्ञानिक डॉ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम ने स्वयं सार्वजनिक रूप से कहा था कि कुडनकुलम परियोजना पूरी तरह सुरक्षित है और लोगों को घबराने की कोई आवश्यकता नहीं है, क्योंकि इसमें विश्वस्तरीय सुरक्षा व्यवस्था मौजूद है।
फिर भी विरोध प्रदर्शन और न्यायालयों में याचिकाओं का सिलसिला वर्षों तक चलता रहा।
मनमोहन सिंह का बयान, IB रिपोर्ट और विदेशी फंडेड NGO का नेटवर्क
कुडनकुलम परमाणु ऊर्जा परियोजना को लेकर लगातार चल रहे विरोध के बीच तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने भी सार्वजनिक रूप से विदेशी फंड प्राप्त गैर-सरकारी संगठनों (NGO) की भूमिका पर सवाल उठाए थे।
उन्होंने फरवरी 2012 में प्रतिष्ठित विज्ञान पत्रिका Science को दिए एक साक्षात्कार में कहा था कि कई NGO, विशेषकर अमेरिका और स्कैंडिनेवियाई देशों से वित्तीय सहायता प्राप्त संगठन, भारत की विकास संबंधी चुनौतियों को समझने के बजाय देश की प्रगति में बाधा उत्पन्न कर रहे हैं।
“कई NGO, जिन्हें अक्सर अमेरिका और स्कैंडिनेवियाई देशों से धन मिलता है, हमारे देश की विकास संबंधी आवश्यकताओं को समझने के बजाय परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम और कृषि में जेनेटिक इंजीनियरिंग जैसी परियोजनाओं का विरोध कर रहे हैं। परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम को जिन कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है, उसके पीछे ऐसे NGO हैं, जो यह नहीं समझते कि भारत को अपनी ऊर्जा क्षमता बढ़ाने की आवश्यकता है।”
यानी, उस समय स्वयं कॉन्ग्रेस सरकार के प्रधानमंत्री ने स्वीकार किया था कि विदेशी फंड प्राप्त संगठन भारत की रणनीतिक और विकास संबंधी परियोजनाओं को प्रभावित करने की कोशिश कर रहे थे।
मानवाधिकार और लोकतंत्र की आड़ में विदेशी फंडिंग
मानवाधिकार, लोकतांत्रिक स्वतंत्रता, आर्थिक न्याय, सरकारी जवाबदेही, शिक्षा के प्रसार और आदिवासी अधिकार जैसे आकर्षक नारों के साथ भारत में अनेक NGO विदेशी वित्तीय सहायता प्राप्त करते हैं। लेकिन समय-समय पर आरोप लगते रहे हैं कि इनमें से कई संगठनों का वास्तविक उद्देश्य विकास परियोजनाओं को रोकना, अराजकता फैलाना और भारत की आर्थिक प्रगति को बाधित करना रहा है।
इसी संदर्भ में वर्ष 2014 में इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) की एक रिपोर्ट सामने आई थी, जिसमें विदेशी फंड प्राप्त NGO के कामकाज और उनके तौर-तरीकों का विस्तृत उल्लेख किया गया था।
रिपोर्ट के अनुसार, ब्रिटेन, अमेरिका, जर्मनी, नीदरलैंड सहित कई देशों से वित्तीय सहायता प्राप्त भारतीय NGO ऐसे मुद्दों को चुनते थे, जिनके माध्यम से बड़े विकास कार्यों के विरुद्ध जनमत तैयार किया जा सके।
IB रिपोर्ट में कहा गया था कि ऐसे संगठन परमाणु ऊर्जा संयंत्रों, यूरेनियम खदानों, कोयला आधारित ताप विद्युत परियोजनाओं, आनुवंशिक रूप से संशोधित फसलों (GMO), POSCO और वेदांता जैसी औद्योगिक परियोजनाओं, नर्मदा और अरुणाचल प्रदेश की जलविद्युत परियोजनाओं तथा पूर्वोत्तर भारत में तेल और खनन गतिविधियों के विरुद्ध आंदोलन खड़े कर रहे थे।
रिपोर्ट के अनुसार, इन गतिविधियों का भारत की आर्थिक वृद्धि पर प्रतिवर्ष 2 से 3 प्रतिशत GDP तक का नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता था।
विदेशी दानदाताओं की कार्यप्रणाली
IB रिपोर्ट में यह भी कहा गया था कि विदेशी दानदाता अपने वास्तविक उद्देश्य को छिपाने के लिए मानवाधिकारों की रक्षा, विस्थापितों के पुनर्वास, आदिवासी आजीविका की सुरक्षा, धार्मिक स्वतंत्रता और सुशासन जैसे विषयों के नाम पर धन उपलब्ध कराते थे।
इसके बाद स्थानीय NGO उन विषयों पर रिपोर्ट तैयार करते थे, जिन्हें अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत के विरुद्ध इस्तेमाल किया जाता था और जो पश्चिमी देशों की विदेश नीति के रणनीतिक हितों को आगे बढ़ाने का माध्यम बनती थीं।
रिपोर्ट में Greenpeace International और CORDAID जैसे संगठनों का विशेष उल्लेख किया गया, जिन पर ऐसे अभियानों पर विशेष रूप से ध्यान केंद्रित करने का आरोप लगाया गया। वहीं ActionAid और Amnesty International जैसे संगठनों के बारे में कहा गया कि वे अपनी कुल फंडिंग का एक हिस्सा इसी प्रकार की गतिविधियों में लगाते हैं।
IB रिपोर्ट ने कुडनकुलम परमाणु परियोजना, प्रस्तावित कोयला आधारित बिजली परियोजनाओं, GMO के विरोध, POSCO और वेदांता जैसी औद्योगिक परियोजनाओं के खिलाफ अभियानों को उदाहरण के रूप में बताते हुए निष्कर्ष निकाला है कि विदेशी संस्थाएँ भारतीय NGO का उपयोग भारत की विकास परियोजनाओं को रोकने और उसकी अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने के लिए कर रही थीं।
USAID और भारत विरोधी नेटवर्क
लेख के अनुसार, बाद के वर्षों में यह भी सामने आया कि United States Agency for International Development (USAID) भारत में कई विवादास्पद NGO को वित्तीय सहायता दे रही थी।
OpIndia ने पहले भी रिपोर्ट किया है कि USAID पर भारत और बांग्लादेश में शासन परिवर्तन (Regime Change) जैसे अभियानों को समर्थन देने के आरोप लगे। लेख में यह भी उल्लेख है कि बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना ने सार्वजनिक रूप से कहा था कि अमेरिका बांग्लादेश, म्यांमार और भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र के कुछ हिस्सों को मिलाकर एक अलग ईसाई राष्ट्र बनाने की कोशिशों का समर्थन कर रहा है।
इन सभी घटनाओं को आधार बनाते हुए लेख में तर्क दिया गया है कि विदेशी फंडिंग को लेकर भारत सरकार की सतर्कता केवल प्रशासनिक या वित्तीय मामला नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और संप्रभुता से जुड़ा विषय है।
ईसाइयत नैरेटिव या विदेशी फंडिंग पर कार्रवाई?
लेख के अनुसार, भारत और विदेशों के अनेक ईसाई संगठनों तथा उनके समर्थकों द्वारा प्रचारित “ईसाइयों पर हमले” का नैरेटिव वास्तविक मुद्दे से ध्यान भटकाने का प्रयास है। वास्तविक चिंता चर्चों या धार्मिक स्वतंत्रता को लेकर नहीं, बल्कि उन विदेशी फंडिंग नेटवर्क पर बढ़ती निगरानी को लेकर है, जिनका उपयोग वर्षों से धर्मांतरण और भारत-विरोधी गतिविधियों के लिए किया जाता रहा है।
लेख का तर्क है कि मोदी सरकार ने न केवल धर्मांतरण के नेटवर्क पर कार्रवाई तेज की है, बल्कि FCRA संशोधन विधेयक के माध्यम से यह भी सुनिश्चित करने का प्रयास किया है कि जिन संस्थाओं का FCRA लाइसेंस रद्द हो चुका है, उनके खिलाफ की गई कार्रवाई केवल कागजों तक सीमित न रह जाए।
लाइसेंस रद्द होने के बाद अब क्या बदलेगा?
वर्तमान व्यवस्था में यदि किसी संस्था का FCRA लाइसेंस रद्द हो जाता है, तब भी उसके पास विदेशी धन से खरीदी गई जमीन, भवन, अस्पताल, स्कूल और अन्य परिसंपत्तियां बनी रहती हैं। ऐसे मामलों में वर्षों तक मुकदमे चलते रहते हैं और कई बार संबंधित संस्थाएँ व्यावहारिक रूप से अपना संचालन जारी रखती हैं।
लेख के अनुसार, प्रस्तावित संशोधन इस स्थिति को बदलने का प्रयास करता है। यदि किसी संस्था का लाइसेंस रद्द हो जाता है, तो उसकी विदेशी धन से निर्मित परिसंपत्तियां सरकार द्वारा नियुक्त डिज़िग्नेटेड अथॉरिटी की निगरानी में आ जाएँगी। आवश्यकता पड़ने पर इन परिसंपत्तियों का प्रबंधन या निस्तारण किया जा सकेगा और उससे प्राप्त राशि भारत की संचित निधि (Consolidated Fund of India) में जमा होगी।
लेख के अनुसार, इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि FCRA लाइसेंस रद्द होने के बाद भी विदेशी धन से निर्मित परिसंपत्तियों का उपयोग पूर्ववत जारी न रह सके।
किन संगठनों को आपत्ति है?
लेख में कहा गया है कि यही कारण है कि भारत और विदेशों के अनेक ईसाई संगठन इस विधेयक का विरोध कर रहे हैं ।इनमें Catholic Bishops’ Conference of India (CBCI), All India Christian Council तथा आर्चबिशप जोसेफ डी’सूज़ा का उल्लेख किया गया है। लेख के अनुसार, आर्चबिशप डी’सूज़ा ने FCRA संशोधन को ईसाई संस्थाओं की संपत्तियों की ‘लूट’ तक बताया है।
भारत के बाहर भी National Hispanic Christian Leadership Conference सहित कई अमेरिकी ईसाई संगठनों ने इस विधेयक को वापस लेने की माँग की है।
इसके अलावा Christianity Today, International Christian Concern जैसी ईसाई पत्रिकाओं और पोर्टलों पर भी ऐसे लेख प्रकाशित हुए, जिनमें यह दावा किया गया कि भारत की ‘हिंदू राष्ट्रवादी सरकार’ ईसाइयों को निशाना बना रही है।
दिल्ली के CJP आंदोलन और चर्च की भागीदारी
लेख में यह भी दावा किया गया है कि हाल में दिल्ली में हुए कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के आंदोलन में कई कैथोलिक पादरी भी प्रदर्शनकारियों के साथ मार्च करते दिखाई दिए। साथ ही यह भी उल्लेख किया गया है कि दिल्ली पुलिस ने इस आंदोलन से जुड़े कुछ NGO और व्यक्तियों की भूमिका की जाँच शुरू की है।
लेख का निष्कर्ष है कि FCRA संशोधन विधेयक से विदेशी फंडिंग के उन स्रोतों पर प्रभाव पड़ने वाला है, जिनका उपयोग धार्मिक धर्मांतरण, राजनीतिक सक्रियता और भारत-विरोधी अभियानों के लिए किया जाता रहा है। यही कारण है कि विदेशी राजनीतिक नेता और मिशनरी संगठन इस कानून के विरुद्ध सक्रिय अभियान चला रहे हैं।
कॉन्ग्रेस के विदेशी फंडिंग का इतिहास पुराना
पूरे विवाद का राजनीतिक पक्ष भी है। कॉन्ग्रेस पार्टी इस विधेयक के विरोध का नेतृत्व कर रही है, जबकि उसका अपना इतिहास विदेशी फंड प्राप्त संस्थाओं से जुड़ा रहा है।
लेख में राजीव गाँधी फाउंडेशन का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि इस संस्था की अध्यक्ष सोनिया गाँधी और ट्रस्टी राहुल गाँधी रहे हैं। इस संस्था को चीन सहित विदेशी स्रोतों से धन प्राप्त हुआ था। बाद में जाँच के दौरान कथित अनियमितताएँ सामने आई और उसका FCRA लाइसेंस रद्द कर दिया गया।
लेख में यह भी दावा किया गया है कि राहुल गाँधी कई अवसरों पर विदेशों में भारत के लोकतंत्र को लेकर चिंता व्यक्त करते रहे हैं और विदेशी हस्तक्षेप की माँग जैसे बयान देते रहे हैं। ऐसे माहौल में अमेरिकी सांसदों द्वारा भारत की नीतियों की आलोचना उसी अभियान का विस्तार प्रतीत होती है।
लेख के अनुसार, FCRA संशोधन विधेयक का मूल उद्देश्य चर्चों या धार्मिक संस्थाओं पर कब्जा करना नहीं, बल्कि विदेशी फंडिंग के उन नेटवर्क को नियंत्रित करना है, जिनका उपयोग धर्मांतरण, डेमोग्राफी के बदलाव, विरोध प्रदर्शनों, अराजक गतिविधियों या ऐसे सिस्टम को खड़ा करने के लिए किया जाता रहा है।
इसलिए लेख में निष्कर्ष के तौर पर कहा जा सकता है कि अमेरिकी सांसद राइली मूर सहित कई विदेशी राजनीतिक और धार्मिक संगठन इस विधेयक को ‘ईसाइयों पर हमले’ के रूप में दिखा कर धार्मिक भावनाएँ भड़काने की कोशिश कर रहे हैं, जबकि उनके अनुसार वास्तविक मुद्दा विदेशी धन के उपयोग और उस पर भारत सरकार की बढ़ती निगरानी है।
(मूलरूप से यह लेख अंग्रेजी में लिखा गया है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)
संभल हिंसा 2024 सुनियोजित साजिश का परिणाम था। इसमें समाजवादी पार्टी सांसद जियाउर रहमान बर्क और सपा के ही विधायक इकबाल महमूद के बेटे सुहैल इकबाल की अहम भूमिका थी। हिंसा की जाँच के लिए गठित न्यायिक रिपोर्ट में ये दावा किया गया है। संभल हिंसा को लेकर आयोग ने सरकार को 857 पेज की विस्तृत रिपोर्ट सौंपी है।
जामा मस्जिद बनाम हरिहर मंदिर विवाद में 24 नवंबर 2024 को सर्वे के दौरान संभल जल उठा था। इसकी जाँच रिपोर्ट बुधवार (5 जुलाई 2026) को उत्तर प्रदेश विधानसभा में पेश की गई। जानकारी के मुताबिक, इसमें कहा गया है कि सर्वे को लेकर मुस्लिमों में गलत सूचना फैलाई गई।
रिपोर्ट में कहा गया है कि जिन गोलियों से मौतें हुई, वह पुलिस ने नहीं चलाई थी बल्कि पुलिस के हथियार लूटने की कोशिश की गई थी। आयोग ने हिंसा और आगजनी की घटना पर तत्परता से काबू पाने के लिए जिला प्रशासन की तारीफ की है।
सर्वे से पहले ही तैयार हो गई थी हिंसा की जमीन
आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, 24 नवंबर 2024 की हिंसा पूर्व नियोजित थी। रिपोर्ट में हिंसा के लिए प्रमुख रूप से सपा सांसद जिया-उर-रहमान बर्क, संभल विधायक पुत्र सोहेल इकबाल था।
इसके अलावा इंतजामिया कमेटी जामा मस्जिद संभल के सदर जफर अली, एडवोकेट कासिम जमाल, इंतजामिया कमेटी के सचिव मशहूद अली फारूकी एडवोकेट, इंतजामिया कमेटी के उपसदर लहदन खान और इंतजामिया समिति के अन्य सदस्यों ने मिलकर साजिश रची थी।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि इन लोगों में 19 नवंबर 2024 को सिविल जज (सीनियर डिवीजन) द्वारा पारित जामा मस्जिद सर्वे आदेश को लेकर नाराजगी थी। ये लोग मस्जिद की गतिविधियों में किसी तरह के हस्तक्षेप के पक्ष में नहीं थे।
19 नवंबर के सर्वे आदेश के बाद रची गई बड़ी साजिश
घटना के बाद गठित किए गए तीन-सदस्यीय न्यायिक जाँच आयोग की रिपोर्ट ने पुष्टि की है कि हिंसा सुनियोजित साजिश का परिणाम थी। पूरे मामले की गहराई से छानबीन करने और तमाम साक्ष्यों के आधार पर यह रिपोर्ट तैयार की गई है। रिपोर्ट के मुताबिक, हिंसा किसी तात्कालिक विवाद की वजह से नहीं हुई थी, बल्कि इसकी पटकथा पहले ही रची जा चुकी थी।
हिंसा के दौरान पुलिस-प्रशासन पर पथराव, फायरिंग, हथियार लूट ली गई। इतना ही नहीं वाहनों और संपत्ति को आग के हवाले कर दिया गया। रिपोर्ट में लोगों को उकसाने एवं भड़काने में सपा सांसद जिया-उर-रहमान बर्क समेत कई लोग शामिल थे। ये हिंसा 24 नवंबर 2024 को शाही जामा मस्जिद के पास शुरू हुई थी। इसमें 4 लोगों की मौत हुई थी जबकि कई लोग घायल हुए थे।
वीडियो के जरिए फैलाया गया भ्रम, फिर भड़काई गई हिंसा
न्यायिक जाँच रिपोर्ट के मुताबिक, कुछ असामाजिक तत्वों ने वीडियो बना कर लोगों को उकसाया और भड़काऊ संदेश दिए। इनलोगों ने मुस्लिम समुदाय को यह विश्वास दिलाने की कोशिश की कि सर्वे के बहाने जामा मस्जिद को हड़पने का प्रयास किया जा रहा है।
इसके बाद 24 नवंबर को सर्वे के दौरान माहौल बिगड़ गया और हिंसक घटनाएँ हुईं। रिपोर्ट में मस्जिद में दिए गए कथित भड़काऊ भाषणों के बाद नारेबाजी, पथराव, आगजनी और गोलीबारी का भी विस्तार से उल्लेख किया गया है।
पुलिस पर पथराव, गोलीबारी और वाहनों में आगजनी
आयोग की रिपोर्ट में कहा गया है कि भीड़ ने सुनियोजित तरीके से पुलिस पर पथराव और गोलीबारी की। इसके साथ ही हथियार और दंगा नियंत्रण सामग्री लूटने, वाहनों व संपत्ति को आग के हवाले करने की घटनाएँ भी हुईं। इस दौरान 28 पुलिस और प्रशासनिक अधिकारी-कर्मचारी घायल हुए। वहीं घटना में चार लोगों की मौत का भी रिपोर्ट में जिक्र है।
आयोग के अनुसार, 24 नवंबर की हिंसा में हुई मौतों के लिए मुस्लिम पक्ष की ओर से की गई सुनियोजित साजिश जिम्मेदार है। मरने वालों में कोट कुर्वी इलाके के रहने वाला नईम, सराय तरीन निवासी बिलाल, संभल के हयात नगर का नुमान और एक 19 साल के लड़के के तौर पर हुई।
चारों मृतकों के रिश्तेदारों ने जो FIR दर्ज कराई थी, उनमें अनजान लोगों के नाम थे और उन्होंने अपनी शिकायतों या पैनल के सामने अपने बयानों में पुलिस पर हत्या का आरोप नहीं लगाया था।
रिपोर्ट में आगे लिखा था, “जिन डॉक्टरों ने ऑटोप्सी की… उनकी राय थी कि उनकी मौत गोली लगने से हुई थी। स्थानीय पुलिस अधिकारी ने अपने एडिशनल एफिडेविट के साथ बैलिस्टिक रिपोर्ट भी फाइल की थी। इसके मुताबिक मरने वाले के शरीर पर मिली चोटें .315 बोर के हथियारों से लगी होंगी। लेकिन रिकॉर्ड में किसी भी पुलिस वाले के पास .315 बोर का कोई हथियार था, इसके कोई सबूत नहीं हैं।” वहीं रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि सात पुलिस वालों को ‘हिंसक भीड़ की फायरिंग’ की वजह से गोली लगी।
बर्क और सोहेल इकबाल के राजनीतिक वर्चस्व में उग्र हुई हिंसा
आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक जिया-उर-रहमान बर्क, सोहेल इकबाल, जफर अली, कासिम जमाल और मशहूद अली फारूकी आदि ने मुकदमा संख्या 182/2024 के तथ्यों को छिपाकर ऐसा भ्रामक प्रचार किया कि हिंदू मस्जिद को ढहाना चाहते हैं। रिपोर्ट में कहा गया कि बर्क और सोहेल इकबाल राजनीतिक वर्चस्व बनाए रखने और सरकार-पुलिस को बदनाम करने के लिए लोगों को उकसाना चाहते थे।
दोनों के बीच पुरानी राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता भी थी। जिले में मुस्लिमों के तुर्क और पठान गुटों के बीच वर्चस्व की लड़ाई भी हिंसा का कारण बनी। जाँच में सामने आया कि घटनास्थल से 12-बोर के कारतूस मिले थे। ये बात भी सामने आया है कि हिंसा में स्थानीय और बाहरी उपद्रवी दोनों शामिल थे।
हिंसा की जाँच के लिए तीन सदस्यीय आयोग का हुआ था गठन
हिंसा की जाँच के लिए योगी सरकार ने 28 नवंबर 2024 को इलाहाबाद हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति देवेंद्र कुमार अरोड़ा की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय न्यायिक जाँच आयोग गठित किया। आयोग का मकसद 24 नवंबर की हिंसक घटना के कारणों और उससे जुड़े पहलुओं की पड़ताल करना था।
रिपोर्ट में हिंसा की पृष्ठभूमि से लेकर भीड़ के व्यवहार, पुलिस पर हमले, आगजनी, गोलीबारी और मौतों से जुड़े पहलुओं को सामने रखा गया है। आयोग के निष्कर्षों ने 24 नवंबर की घटना को अचानक हुई हिंसा के बजाय पूर्व नियोजित साजिश और सुनियोजित उकसावे की कार्रवाई से जोड़ते हुए पूरे घटनाक्रम पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
पुलिस प्रशासन की भूमिका सराहनीय- आयोग
हिंसा के दौरान पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों के घायल होने के बावजूद जिला प्रशासन और पुलिस ने स्थिति को नियंत्रित करने के लिए तत्परता से कार्रवाई की। इस प्रभावी कार्रवाई के लिए जाँच आयोग ने जिला प्रशासन की भूमिका की तारीफ की है। उनका कहना है कि मृतकों के परिजनों ने भी पुलिस फायरिंग से मौत का दावा नहीं किया। एफएसएल और सीन री-क्रिएशन रिपोर्ट में भी यही पता चलता है कि सभी चार लोगों की मौत पुलिस की गोली से नहीं हुई थी।
कौन है जियाउर रहमान बर्क
समाजवादी पार्टी के टिकट पर संभल से लोकसभा चुनाव 2024 में जीत दर्ज करने वाले जियाउर रहमान बर्क की पृष्ठभूमि भी राजनीतिक रही है। उसके दादा शफीकुर रहमान बर्क संभल से पूर्व सांसद थे। बर्क का जन्म 13 जुलाई 1988 को संभल में ही हुआ था।
लोकसभा चुनाव 2024 के दौरान उन्होंने जो हलफनामा प्रस्तुत किया, उसके अनुसार, उन्होंने मेरठ के चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय और अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा प्राप्त की। उनके पास कानून में स्नातक और कला में स्नातक की दो डिग्रियां हैं। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में अध्ययन के दौरान वे छात्र राजनीति में सक्रिय रूप से शामिल रहे और 2005-06 में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय छात्र संघ (AMUSU) से जुड़े रहे।
शुरुआत में, बर्क 2017 तक असदुद्दीन ओवैसी के नेतृत्व वाली ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) से जुड़े रहे। बाद में, वे अखिलेश यादव के नेतृत्व वाली समाजवादी पार्टी (एसपी) में शामिल हो गए और उत्तर प्रदेश विधानसभा के 18वें सत्र में विधायक चुने गए। उन्होंने 1 मार्च 2022 से 4 जून 2024 तक कुंदरकी निर्वाचन क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया। इसके बाद उन्होंने लोकसभा चुनाव 2024 लड़ा और संभल निर्वाचन क्षेत्र से सांसद चुने गए।
संभल हिंसा के बाद जो एफआईआर दर्ज हुई थी उसमें कहा गया था 22 नवंबर को जियाउर रहमान बर्क जामा मस्जिद गए। नमाज अदा करने के बाद उन्होंने प्रशासनिक अनुमति के बिना भीड़ इकट्ठा की और भड़काऊ बयान दिए। राजनीतिक लाभ के लिए उन्होंने भीड़ को सांप्रदायिक सद्भाव बिगाड़ने के लिए उकसाया।
इसके अलावा एफआईआर में विधायक इकबाल महमूद के बेटे सुहैल इकबाल का भी जिक्र था, जो हिंसा भड़कने वाले दिन भीड़ में मौजूद था। एफआईआर में कहा गया था कि सुहैल इकबाल ने भीड़ को उकसाते हुए कहा था कि जियाउर रहमान बर्क हमारे साथ है, हम भी तुम्हारे साथ हैं। हम तुम्हें कुछ नहीं होने देंगे। अपने इरादे पूरे करो। इसके बाद भीड़ हिंसक हो गई।
न्यायिक रिपोर्ट ने भी दोनों को हिंसा की साजिश रचने का दोषी माना है। इससे पहले सीएम योगी ने भी कहा था कि न्यायिक रिपोर्ट आने पर पता चल जाएगा कि संभल हिंसा में कौन कौन दोषी है।
दुनिया के प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में भले ही पाकिस्तान भारत से चार पायदान ऊपर दिखाई देता हो, लेकिन जमीन पर तस्वीर बिल्कुल अलग नजर आती है। बलूचिस्तान में पत्रकारों की हत्याएँ, जबरन गायब किए जाने के आरोप, POK में मीडिया पर कार्रवाई और अब विदेशी पत्रकारों के लिए सख्त एनओसी व्यवस्था ने पाकिस्तान की प्रेस की आजादी पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
इसी बीच बलूचिस्तान के जाफराबाद जिले में स्थानीय पत्रकार नजर मुहम्मद कनरानी की हालिया गोली मारकर हत्या कर दी, जिसके बाद बहस और तेज हो गई है कि पाकिस्तान में पत्रकारों की सुरक्षा और स्वतंत्र रिपोर्टिंग कितनी गंभीर चुनौती बन चुकी है।
अब इस्लामाबाद, लाहौर और कराची को छोड़कर पाकिस्तान के किसी भी दूसरे हिस्से में रिपोर्टिंग करने से पहले विदेशी पत्रकारों को सरकार से नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट (NOC) लेना होगा।
ऐसे समय में यह फैसला आया है जब पाकिस्तान पहले से ही बलूचिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (POK) में मानवाधिकार उल्लंघन, इंटरनेट बंदी, प्रदर्शनकारियों पर कार्रवाई और पत्रकारों पर हमलों को लेकर अंतरराष्ट्रीय आलोचना झेल रहा है।
आलोचकों का कहना है कि यह कदम सुरक्षा के नाम पर नहीं, बल्कि उन इलाकों की सच्चाई दुनिया से छिपाने के लिए उठाया गया है।
विदेशी पत्रकारों के लिए क्या बदले नए नियम?
पाकिस्तान के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने फॉरेन मीडिया फैसिलिटेशन गुइडेलीनेस 2026 जारी की हैं। इन नियमों के तहत अब विदेशी मीडिया संस्थानों, पत्रकारों, फ्रीलांसरों, डॉक्यूमेंट्री बनाने वालों, प्रोडक्शन हाउस, फिक्सर, अनुवादकों और विदेशी मीडिया के लिए काम करने वाले पाकिस्तानी नागरिकों तक को सरकारी पंजीकरण कराना होगा।
सबसे बड़ा बदलाव यह है कि विदेशी पत्रकार अब केवल इस्लामाबाद, लाहौर और कराची में बिना अतिरिक्त अनुमति के काम कर सकेंगे। यदि उन्हें बलूचिस्तान, खैबर पख्तूनख्वा, सिंध के दूरदराज इलाकों या पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में जाना है तो पहले सरकार से NOC लेना होगा।
यह नियम केवल न्यूज रिपोर्टिंग तक सीमित नहीं है। किसी भी तरह की वीडियो शूटिंग, डॉक्यूमेंट्री, सोशल मीडिया कंटेंट या किसी विशेष इलाके में जाकर जानकारी जुटाने के लिए भी सरकारी मंजूरी जरूरी होगी। यहाँ तक कि विदेशी पत्रकार यदि एबटाबाद या मुरी घूमने भी जाना चाहें तो उन्हें पहले सरकार से अनुमति लेनी पड़ेगी।
नई व्यवस्था में दो तरह की मान्यताएँ भी तय की गई हैं। एक स्थायी वार्षिक मान्यता, जो पाकिस्तान में लगातार काम करने वाले विदेशी पत्रकारों के लिए होगी, जबकि दूसरी तीन महीने तक की अस्थायी मान्यता होगी, जो बाहर से आने वाले पत्रकारों को दी जाएगी।
सबसे विवादित बात यह है कि सरकार किसी भी समय किसी पत्रकार की मान्यता रद्द कर सकती है यदि उसे लगे कि उसकी रिपोर्टिंग पाकिस्तान की विचारधारा, संप्रभुता, सुरक्षा या सार्वजनिक व्यवस्था के खिलाफ है। इन शब्दों की स्पष्ट कानूनी परिभाषा भी नहीं दी गई है, जिससे अधिकारियों को व्यापक अधिकार मिल जाते हैं।
बलूचिस्तान में पत्रकारिता बन चुकी है जान जोखिम में डालने जैसा काम
पाकिस्तान का बलूचिस्तान लंबे समय से हिंसा, जबरन गायब किए जाने, सुरक्षा बलों की कार्रवाई और अलगाववादी संगठनों की गतिविधियों का केंद्र रहा है। यहाँ पत्रकारों के लिए सच्चाई सामने लाना किसी युद्ध क्षेत्र में काम करने से कम नहीं माना जाता।
बलूचिस्तान यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स (BUJ) के अनुसार साल 2008 से 2026 के बीच 42 पत्रकारों की हत्या हो चुकी है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि इन मामलों में किसी भी आरोपित को सजा नहीं मिली।
कई पत्रकारों ने अपनी पहचान छिपाकर बताया कि उन्हें लगातार धमकियाँ मिलती रहती हैं। एक पत्रकार ने बताया कि उसे फोन पर कहा गया, “अगर तुम पत्रकारिता में नए हो तो शायद तुम्हें ताबूत की जरूरत पड़ेगी। बता दो, हम पहले ही भेज देते हैं।”
ऐसी धमकियों के बाद कई पत्रकार पुलिस तक भी नहीं जाते क्योंकि उन्हें भरोसा नहीं कि उनकी सुरक्षा होगी। कई मामलों में पत्रकारों की हत्या के बाद FIR तक दर्ज नहीं हुई।
पत्रकार अब्दुल लतीफ बलोच का मामला इसका बड़ा उदाहरण है। मई 2025 में कुछ हथियारबंद लोग आधी रात उनके घर पहुँचे। परिवार ने उन्हें बाहर जाने से रोका, लेकिन हमलावरों ने वहीं गोलियाँ चलाकर उनकी हत्या कर दी। एक साल से ज्यादा समय गुजरने के बाद भी इस मामले में कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।
बलूचिस्तान के कई जिलों में पत्रकारों को केवल सुरक्षा बलों या सरकार से ही नहीं, बल्कि उग्रवादी संगठनों और स्थानीय प्रभावशाली लोगों से भी खतरा रहता है। ऐसे माहौल में स्वतंत्र पत्रकारिता लगभग असंभव हो जाती है।
जबरन गायब करना, इंटरनेट बंदी और सेंसरशिप से दबाई जा रही आवाजें
बलूचिस्तान में लोगों को जबरन उठाकर गायब कर देना सालों से सबसे बड़ा मानवाधिकार मुद्दा रहा है। मानवाधिकार संगठनों का आरोप है कि कई नागरिकों को सुरक्षा एजेंसियाँ हिरासत में ले जाती हैं और परिवारों को महीनों या वर्षों तक उनकी कोई जानकारी नहीं मिलती।
कुछ लोग लंबे समय बाद गंभीर शारीरिक यातना के निशानों के साथ वापस लौटते हैं, जबकि कई लोगों के शव सुनसान इलाकों में मिलते हैं। इन शवों पर गोली और यातना के निशान होने के आरोप भी बार-बार सामने आते रहे हैं।
इन्हीं मुद्दों को उठाने वाली डॉक्टर महरंग बलोच और उनकी संस्था बलोच यकजेहती कमेटी (BYC) अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में रही हैं। उन्होंने जबरन गायब किए गए लोगों और मानवाधिकार उल्लंघनों के खिलाफ शांतिपूर्ण प्रदर्शन आयोजित किए।
उनके परिवार पर भी पहले हमला हुआ था और उनके पिता की मौत भी ऐसे ही एक मामले से जुड़ी बताई जाती है। अब उन्हें भी कानूनी कार्रवाई का सामना करना पड़ रहा है, जिसे लेकर लगातार सवाल उठा रहे हैं।
सेंसरशिप केवल धमकियों तक सीमित नहीं है। कई इलाकों में सालों से इंटरनेट सेवाएँ बंद हैं। पंजगुर में मोबाइल इंटरनेट लंबे समय से प्रभावित रहा, जबकि डेरा बुगती में भी 3जी और 4जी सेवाएँ लंबे समय तक बंद रहने की खबरें सामने आती रही हैं। इंटरनेट बंद होने का सबसे बड़ा असर पत्रकारों पर पड़ता है क्योंकि वे अपनी रिपोर्ट समय पर भेज ही नहीं पाते।
कई स्थानीय मीडिया संस्थान सरकारी विज्ञापनों पर निर्भर हैं। ऐसे में सरकार के खिलाफ खबरें प्रकाशित करना उनके लिए आर्थिक जोखिम भी बन जाता है। यही कारण है कि कई पत्रकार केवल सरकारी प्रेस विज्ञप्तियाँ प्रकाशित करने तक सीमित रहने को मजबूर हो जाते हैं।
POK में विरोध प्रदर्शनों के बाद बढ़ी सख्ती, दुनिया उठा रही सवाल
विश्लेषकों का मानना है कि विदेशी मीडिया पर नई पाबंदियों का समय बेहद महत्वपूर्ण है। हाल के महीनों में पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (POK) में चुनाव, प्रदर्शन और सुरक्षा बलों की कार्रवाई को लेकर कई अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थानों ने रिपोर्ट प्रकाशित की थीं।
मानवाधिकार संगठनों ने आरोप लगाया कि प्रदर्शनकारियों के खिलाफ बल प्रयोग किया गया, कई जगह इंटरनेट सेवाएँ बंद की गईं और पत्रकारों की रिपोर्टिंग में बाधाएँ डाली गईं। इन्हीं घटनाओं के बाद पाकिस्तान ने विदेशी मीडिया की गतिविधियों पर और ज्यादा नियंत्रण स्थापित कर दिया।
कई अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थानों और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर कार्रवाई भी हुई। पाकिस्तान ने कुछ रिपोर्टों को एंटी-स्टेट प्रोपेगेंडा और येलो जर्नलिज्म बताते हुए उनके प्रसारण पर रोक लगाने जैसे कदम उठाए।
एमनेस्टी इंटरनेशनल, कमेटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट्स (CPJ) और रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स (RSF) जैसे अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने बार-बार पाकिस्तान से प्रेस की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने, पत्रकारों की सुरक्षा बढ़ाने और मानवाधिकार उल्लंघनों की निष्पक्ष जाँच कराने की माँग की है।
रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स का कहना है कि पाकिस्तान दुनिया के उन देशों में शामिल है जहाँ स्वतंत्र पत्रकारिता करना सबसे अधिक जोखिम भरा है। संगठन के अनुसार जो पत्रकार सेना या सुरक्षा प्रतिष्ठान की आधिकारिक लाइन से अलग रिपोर्टिंग करते हैं, उन्हें निगरानी, हिरासत, धमकी और हमलों का सामना करना पड़ सकता है।
इसी वजह से विशेषज्ञ मानते हैं कि विदेशी पत्रकारों के लिए नई NOC व्यवस्था केवल प्रशासनिक बदलाव नहीं है, बल्कि यह उन इलाकों तक स्वतंत्र मीडिया की पहुँच सीमित करने वाला कदम भी साबित हो सकता है, जहाँ पहले से मानवाधिकार और प्रेस की स्वतंत्रता को लेकर गंभीर सवाल उठते रहे हैं।
पाकिस्तान सरकार इन नियमों को प्रशासनिक व्यवस्था और सुरक्षा के लिए जरूरी बता रही है, लेकिन जिस समय इन्हें लागू किया गया है और जिस तरह विदेशी पत्रकारों की गतिविधियों को सरकारी अनुमति से जोड़ दिया गया है, उससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह बहस तेज हो गई है कि क्या पाकिस्तान संवेदनशील क्षेत्रों की वास्तविक स्थिति दुनिया से छिपाने की कोशिश कर रहा है।
देश की स्वतंत्र और निष्पक्ष पत्रकारिता का दम भरने वाले यूट्यूबर रवीश कुमार एक बार फिर अपने पुराने और चुनिंदा एजेंडे के साथ कैमरे के सामने प्रकट हो गए है। मंगलवार (4 अगस्त) को ही ऑपइंडिया ने एक रवीश कुमार को लेकर आर्टिकल प्रकाशित किया था। इस लेख में ऑपइंडिया ने सीधे तौर पर सवाल उठाया था कि झारखंड में छात्रों का भविष्य दांव पर लगा है, जेपीएससी (JPSC) और जेएसएससी (JSSC) पेपर लीक को लेकर युवा सड़कों पर उतरकर प्रदर्शन कर रहे हैं, लेकिन खुद को निष्पक्ष कहने वाले रवीश कुमार झारखंड की हेमंत सोरेन सरकार और कॉन्ग्रेस से सवाल पूछने से क्यों बच रहे हैं?
अपनी घिरती साख को बचाने और सफाई देने के लिए, रवीश कुमार यूट्यूब पर लगभग 30 मिनट का एक वीडियो अपलोड करते हैं। इस वीडियो का टाइटल रखा गया था ‘झारखंड JPSC: पेपर लीक, अनशन और गोदी मीडिया से सवाल’।
लेकिन जब इस पूरे वीडियो को देखे और ध्यान से सुने, तो यह साफ हो जाता है कि झारखंड पेपर लीक केवल एक बहाना था, असली मकसद अपनी राजनीति चमकाना था… हेमंत सोरेन सरकार को बचाना और केंद्र की मोदी सरकार व बीजेपी पर निशाना साधना था। रवीश कुमार ने इस वीडियो के जरिए अपनी झेंप मिटाने की पूरी कोशिश की, लेकिन उनका यह प्रयास पूरी तरह से एकतरफा और प्रोपेगेंडा से भरा नजर आया।
रवीश कुमार की वीडियो में झारखंड का मुद्दा कम, मोदी से नफरत ज्यादा
रवीश कुमार ने अपने इस 30 मिनट के लंबे भाषण में झारखंड के छात्रों के दर्द को भुनाने की कोशिश तो की, लेकिन उनका पूरा जोर हेमंत सोरेन सरकार की खिंचाई करने के बजाय पुरानी बीजेपी सरकारों को घेरने पर रहा। जहाँ एक ओर झारखंड में जेएमएम (JMM) और कॉन्ग्रेस गठबंधन की सरकार है और उन्हीं के राज में पेपर लीक की घटनाएँ हो रही हैं, वहीं रवीश कुमार यह कहते नजर आए कि बीजेपी के पिछले शासनकाल से सबक लेना चाहिए था। यानी गलती चाहे मौजूदा सरकार की हो, लेकिन ज्ञान हमेशा बीजेपी के खिलाफ ही दिया जाएगा।
नीट (NEET) परीक्षा विवाद के दौरान केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के लिए ताबड़तोड़ वीडियो, रील और ट्वीट बनाने वाले रवीश कुमार झारखंड मामले में पूरी तरह से चुप्पी साध गए। झारखंड में जिस तरह से परीक्षाएँ बर्बाद हो रही हैं, वहाँ किसी मंत्री के इस्तीफे की माँग उनके मुँह से एक बार भी नहीं निकली। इसके बजाय वे यह ज्ञान बाँटते नजर आए कि सरकार को ‘कैसे काम करना चाहिए’।
इस पूरे मामले में रवीश कुमार का दोहरा रवैया साफ झलकता है। जब केंद्र में बीजेपी की सरकार होती है, तो वे हर छोटी-बड़ी बात पर इस्तीफे की माँग करते हैं, मंत्रियों के खिलाफ मुहिम चलाते हैं और युवाओं को भड़काने का कोई मौका नहीं छोड़ते। लेकिन जब झारखंड में उनकी पसंद की INDI गठबंधन वाली सरकार है, तो वे मंत्रियों से सवाल पूछने की बजाय सिर्फ यह सलाह देते हैं कि ‘सिस्टम को कैसे सुधारा जाना चाहिए’। यह इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि उनके लिए छात्र और शिक्षा कभी मुद्दा नहीं रहे, बल्कि उनका एकमात्र लक्ष्य हर हाल में बीजेपी और केंद्र सरकार को घेरना है।
पुराना राग: पीके जोशी पर निशाना और कॉन्ग्रेस से दूरी
झारखंड के छात्रों के अनशन और प्रदर्शन पर बात करते-करते अचानक रवीश कुमार का रुख केंद्र सरकार की तरफ मुड़ जाता है। वे विषयांतर करते हुए पीके जोशी (PK Joshi) का जिक्र करने लगते हैं। रवीश कुमार ने बड़े विस्तार से बताया कि कैसे पीके जोशी मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग के चेयरमैन रहे और बाद में यूपीएससी (UPSC) और एनटीए (NTA) से जुड़े। उन्होंने यह साबित करने की कोशिश की कि इन नियुक्तियों के पीछे RSS या बीजेपी का हाथ था।
जब झारखंड में कॉन्ग्रेस और झामुमो (झारखंड मुक्ति मोर्चा) की सरकार है, तो रवीश कुमार ने अपनी Video में सीधे तौर पर हेमंत सोरेन या राहुल गाँधी से तीखे सवाल क्यों नहीं पूछे? वे यह कहते नजर आए कि राहुल गाँधी तो कोटा और देहरादून में रैलियाँ कर रहे हैं, लेकिन झारखंड के छात्रों को भी उनसे सवाल पूछना चाहिए। यानी उन्होंने खुद सीधे सवाल पूछने के बजाय गेंद दूसरों के पाले में डाल दी।
इसके अलावा, जब आम आदमी पार्टी के सांसद संजय सिंह से झारखंड पेपर लीक पर सवाल पूछा गया, तो उन्होंने झारखंड पर बात करने से बचते हुए मध्य प्रदेश और गुजरात की बात की। रवीश कुमार ने भी इस बात को ऐसे घुमाया कि जैसे केवल बीजेपी शासित राज्यों में ही सब कुछ गलत हो रहा है।
रवीश कुमार का यह अंदाज साबित करता है कि वे जानबूझकर कॉन्ग्रेस और उसके सहयोगियों को बचाने का ठेका लेकर बैठे हैं। झारखंड में जब युवा सड़कों पर हैं, तो वहाँ की सरकार से जवाब माँगने के बजाय वे मध्य प्रदेश, गुजरात और संघ परिवार की पुरानी नियुक्तियों का कच्चा-चिट्ठा खोलने बैठ जाते हैं। संजय सिंह जैसे नेताओं के बयानों का बचाव करते हुए वे यह भूल जाते हैं कि जनता सब देख रही है कि कैसे एक सोची-समझी रणनीति के तहत अपने राजनीतिक आकाओं को बचाने के लिए मुख्य मुद्दों से ध्यान भटकाया जा रहा है।
बार-बार… हर बार, ‘गोदी मीडिया’ का रोना रोकर खुद को बेबस बताते
रवीश कुमार हर बार की तरह इस वीडियो में भी अपनी पुरानी आदत से बाज नहीं आए और बार-बार ‘गोदी मीडिया’ का जाप करने लगे। एक तरफ वे कहते हैं कि वे हर राज्य के पेपर लीक और छात्र आंदोलन को कवर नहीं कर सकते, क्योंकि वे एक अकेले यूट्यूबर हैं और उनकी अपनी सीमाएँ हैं। लेकिन दूसरी तरफ, वे यह उपदेश देना नहीं भूलते कि मुख्यधारा की मीडिया को हर राज्य की खबर दिखानी चाहिए।
रवीश कुमार चाहे जितना भी कहें कि वे सभी मुद्दों को कवर नहीं कर सकते, लेकिन सच यह है कि सीजेपी (CJP) और तथाकथित छात्र प्रदर्शनों को उन्होंने अपने स्टूडियो में बैठकर बहुत शानदार और लंबी कवरेज दी है। सीजेपी का एक भी ऐसा मुद्दा नहीं होगा जिसे रवीश कुमार ने अपनी प्लेलिस्ट या वीडियो में छोड़ा हो। जब एजेंडे की बात आती है, तो संसाधन अपने-आप मिल जाते हैं, लेकिन जब विपक्ष की सरकारों से सवाल पूछने की बारी आती है, तो यूट्यूबर होने की लाचारी याद आ जाती है। इसके अलावा, रवीश कुमार ने गाजा-फिलिस्तीन वाले मुद्दे पर भी खूब रोटियाँ सेंकी थी, तब इनका ‘अकेले यूट्यूबर’ वाला बहाना नहीं चला था।
रवीश कुमार का यह रोना कि ‘हम अकेले यूट्यूबर हैं और सब कुछ कवर नहीं कर सकते’, पूरी तरह से एक बहानेबाजी है। जब देश में कहीं भी ऐसा मुद्दा मिल जाए जिसे घुमा-फिराकर केंद्र सरकार के खिलाफ इस्तेमाल किया जा सके, तब उनकी लाचारी गायब हो जाती है और वे लंबी-लंबी वीडियो बनाने लगते हैं। लेकिन जब झारखंड जैसी जगहों पर कॉन्ग्रेस समर्थित सरकार कटघरे में होती है, तो वे अपनी सीमाएँ गिनाने लगते हैं। यह दोहरी मानसिकता उनकी पत्रकारिता की पोल खोलने के लिए काफी है।
इसके अलावा, जब CJP का प्रदर्शन चल रहा था और प्रधानमंत्री ने इंस्टाग्राम पर युवाओं से वादा किया था, कि पेपर लीक से जुड़े अपराधियों और माफियाओं को सख्त सजा दी जाएगी और फास्ट ट्रैक कोर्ट का गठन किया जाएगा, जिससे इंसाफ जल्दी मिले। लेकिन… लेकिन… रवीश कुमार ने हेमंत सोरेन को इस बात के लिए सराहा कि उन्होंने कार्रवाई का भरोसा दिलाया है। पीएम मोदी के लिए अगर ये एक शब्द अच्छे बोल देंगे तो शायद इनको मिलने वाली ‘मदद’ कही बंद ना हो जाए।
छात्र आंदोलन का फर्जी तुलना और धर्म का तड़का
प्रोपेगेंडाई पत्रकार रवीश कुमार की जब आप वीडियो सुनते-सुनते आगे बढ़ेगे तब उनका विषय फिर झारखंड पेपर लीक से भटकर धर्म को टारगेट करने पर अटक जाएगा। रवीश कुमार ने अपनी वीडियो में यह तारीफ की कि झारखंड के छात्रों ने शांतिपूर्ण आंदोलन किया और हेमंत सोरेन सरकार ने उनके साथ ‘दिल्ली पुलिस जैसी बर्बरता’ नहीं की। लेकिन वे यह बताना भूल गए कि दिल्ली के जंतर-मंतर या अन्य जगहों पर जो तथाकथित प्रदर्शन हुए थे, उनमें वे लोग शामिल हुए थे, जिनका पढ़ाई-लिखाई से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं होता, केवल अपना चेहरा चमकाने के लिए और PM मोदी को गाली देने के लिए उस प्रदर्शन में आ खड़े होते हैं। CJP के प्रदर्शन में NEET छात्र कम, रीलबाज ज्यादा घूमते नजर आए थे। इसके अलावा, CJP प्रदर्शन में यदि किसी छात्र से पेपर लीक मुद्दे को लेकर या NEET की फुल-फॉर्म भी पूछ ली जाए, तो उनका मुँह नीला पड़ जाता था। जबकि झारखंड पेपर लीक मामले में असल पीड़ित और जेपीएससी/परीक्षा देने वाले छात्र मौजूद है, जो रीलबाजी करने नहीं आए है, अपने हक की लड़ाई लड़ने आए है और CJP के एजेंडे की तरह PM मोदी को गाली देने नहीं आए है।
बात जब झारखंड के प्रशासनिक सिस्टम और पेपर लीक की हो रही थी, तो अचानक बीच में रवीश कुमार ने धर्म और मुसलमानों की राजनीति का जिक्र छेड़ दिया। उन्होंने यह कहना शुरू कर दिया कि हिंदी प्रदेशों के छात्र चुनाव के समय धर्म और मुसलमानों की नफरत में अपने असली मुद्दों (रोजगार और पेपर लीक) को भूल जाते हैं। सवाल यह उठता है कि झारखंड के पेपर लीक में अचानक धर्म और मजहब का यह तड़का लगाने की क्या जरूरत थी? साफ है कि प्रोपेगेंडा पत्रकारों को हर मुद्दे को अंततः सांप्रदायिक रंग देकर अपनी वैचारिक रोटी सेकनी होती है।
रवीश कुमार की यह आदत बन चुकी है कि वे हर गंभीर मुद्दे में जबरन धर्म और राजनीति का एंगल ले आते हैं। झारखंड के युवा न्याय माँग रहे हैं, लेकिन रवीश कुमार को उसमें भी हिंदी प्रदेशों के छात्रों को यह ताना मारने का मौका मिल जाता है कि वे चुनाव के दौरान धर्म के नाम पर वोट देते हैं। इस तरह की बयानबाजी से साफ जाहिर होता है कि वे छात्रों के हमदर्द कम और एक खास वैचारिक एजेंडे के प्रचारक ज्यादा हैं, जो हर बात को अपनी राजनीतिक चश्मे से ही देखते हैं।
पिछली सदी तक किसी देश की ताकत उसकी सेना, हथियारों के जखीरे और तेल के भंडार से तय होती थी। लेकिन AI के दौर में युद्ध और ताकत का पैमाना बदल रहा है। अब किसी देश की शक्ति सिर्फ सैनिकों और लड़ाकू विमानों में नहीं बल्कि उसके डेटा, क्लाउड इंफ्रास्ट्रक्चर और AI को चलाने वाली कंप्यूटिंग क्षमता में भी छिपी है।
हालिया ईरान-अमेरिका संघर्ष ने इस बदलती तस्वीर की एक झलक दिखा दी। इस बार निशाने पर सिर्फ सैन्य अड्डे, तेल रिफाइनरियाँ या बंदरगाह नहीं थे, बल्कि वे विशाल डेटा सेंटर्स भी थे जिन पर Amazon, Google, Microsoft जैसी टेक कंपनियों की क्लाउड सेवाएँ टिकी हैं।
यह घटनाक्रम एक बड़े बदलाव का संकेत है कि भविष्य के युद्ध में डेटा सेंटर भी एयरबेस या मिसाइल लॉन्च साइट जितना अहम लक्ष्य हो सकता है। ईरान भी लंबे समय से जानता है कि पारंपरिक सैन्य ताकत में अमेरिका से सीधी टक्कर मुश्किल है। इसलिए उसकी रणनीति कम लागत में दुश्मन को ज्यादा से ज्यादा आर्थिक, तकनीकी और मनोवैज्ञानिक नुकसान पहुँचाने की रही है।
पहले यह रणनीति तेल उत्पादन, ऊर्जा आपूर्ति और समुद्री व्यापार पर दबाव बनाने तक सीमित थी, लेकिन अब इसमें AI डेटा सेंटर्स को भी शामिल कर लिया गया है। यही कारण है कि विशेषज्ञ इसे आधुनिक युद्ध का एक नया अध्याय मान रहे हैं।
इस रणनीति की चर्चा 2026 में तब तेज हुई, जब 30 अप्रैल 2026 को मिडिल ईस्ट में स्थित एक प्रमुख AI डेटा सेंटर पर हमला हुआ। इसके बाद 21 जुलाई 2026 को ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने 29 क्षेत्रीय टेक कंपनियों और AI इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़े ठिकानों की एक सूची जारी की है।
इन घटनाओं ने पहली बार यह संकेत दिया कि ईरान अब केवल सैन्य ठिकानों या तेल प्रतिष्ठानों तक सीमित नहीं है, बल्कि AI डेटा सेंटर्स को भी अपनी रणनीति का हिस्सा बना रहा है।
क्या होता है डेटा सेंटर और AI की दुनिया में इनकी भूमिका इतनी महत्वपूर्ण क्यों है?
जब हम Google पर सर्च करते हैं, ChatGPT से सवाल पूछते हैं, Amazon से खरीदारी करते हैं, बैंकिंग ऐप चलाते हैं या किसी कंपनी का क्लाउड सर्वर इस्तेमाल करते हैं, तो इसके पीछे दुनिया भर में बने हजारों डेटा सेंटर काम करते हैं।
साधारण भाषा में डेटा सेंटर हाई-टेक इमारतें हैं, जहाँ लाखों सर्वर, स्टोरेज सिस्टम, नेटवर्किंग उपकरण, बैकअप बिजली और तापमान नियंत्रित करने की व्यवस्था होती है। इंटरनेट की लगभग हर डिजिटल सेवा इन्हीं पर निर्भर है।
AI के दौर में इनकी अहमियत और बढ़ गई है। ChatGPT जैसे AI मॉडल, इमेज जनरेशन, सैन्य AI, ड्रोन कंट्रोल, सैटेलाइट डेटा और रियल-टाइम इंटेलिजेंस के लिए भारी कंप्यूटिंग क्षमता चाहिए, जो NVIDIA जैसे निर्माताओं के हाई-एंड GPU और बड़े क्लाउड इंफ्रास्ट्रक्चर से मिलती है।
यानी डेटा सेंटर अब सिर्फ इंटरनेट चलाने वाली इमारतें नहीं हैं। वे डिजिटल अर्थव्यवस्था, राष्ट्रीय सुरक्षा और सैन्य क्षमता की रीढ़ बन चुके हैं। किसी बड़े डेटा सेंटर को नुकसान पहुँचने पर बैंकिंग, सरकारी नेटवर्क, उद्योग, AI मॉडल, क्लाउड सेवाएँ और मिलिट्री कम्युनिकेशन तक प्रभावित हो सकते हैं।
इसीलिए डेटा सेंटर आधुनिक युद्ध का नया रणनीतिक लक्ष्य बन रहे हैं। अब सवाल है कि ईरान ने इन्हें निशाना क्यों बनाया और इसके पीछे उसकी असली रणनीति क्या है?
ईरान ने AI डेटा सेंटर्स को ही क्यों चुना? समझिए उसकी असमान ताकत वाले युद्ध की रणनीति
ईरान और अमेरिका की सैन्य ताकत में बड़ा अंतर है। अमेरिका के पास आधुनिक वायुसेना, नौसेना, लंबी दूरी की मिसाइलें, निगरानी प्रणालियाँ और दुनिया भर में सैन्य ठिकाने हैं जबकि ईरान के संसाधन सीमित हैं। ऐसे में ईरान की रणनीति सीधे मुकाबले के बजाय अमेरिका की कमजोर कड़ियों को निशाना बनाने की रही है। इसे असमान ताकत वाले देशों की युद्ध रणनीति कहा जाता है।
पिछले दो दशकों में ईरान ने तेल रिफाइनरियों, समुद्री व्यापार मार्गों और ऊर्जा ढाँचे पर दबाव बनाने की कोशिश की है। अब AI के दौर में उसकी नजर डेटा सेंटर्स पर है।
मध्य पूर्व में अमेरिका और उसके सहयोगी तेजी से AI इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित कर रहे हैं। ईरान का मानना है कि इन पर असर डालने से सिर्फ क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था नहीं, बल्कि अमेरिकी टेक कंपनियों की क्लाउड सेवाएँ, AI रिसर्च और उसकी तकनीकी बढ़त भी प्रभावित हो सकती है।
डेटा सेंटर पर हमला बैंकिंग, सरकारी एजेंसियों, रक्षा संस्थानों और डिजिटल सेवाओं तक असर डाल सकता है। इसलिए यह रणनीति सैन्य नुकसान के साथ आर्थिक और मनोवैज्ञानिक दबाव भी बना सकती है।
जब एक ही डेटा सेंटर पर चलते हैं बैंक, अस्पताल और सेना, तब पैदा होती है चुनौती
AI डेटा सेंटर्स को लेकर सबसे बड़ी बहस इस बात पर है कि आखिर इन्हें सैन्य लक्ष्य माना जाना चाहिए या नहीं। पहली नजर में ये सामान्य व्यावसायिक इमारतें दिखाई देती हैं, जहाँ सर्वर लगे होते हैं और इंटरनेट सेवाएँ संचालित होती हैं। लेकिन वास्तविकता इससे कहीं अधिक मुस्किल होता है।
आज अमेजन वेब सर्विसेज (AWS), माइक्रोसॉफ्ट एज्योर, गूगल क्लाउड और ओरेकल जैसी क्लाउड कंपनियाँ केवल निजी कंपनियों को ही सर्वर उपलब्ध नहीं करातीं।
इन्हीं प्लेटफॉर्म्स पर कई सरकारी एजेंसियाँ, रक्षा मंत्रालय, खुफिया संगठन और सुरक्षा संस्थान भी अपने डिजिटल सिस्टम संचालित करते हैं। इसका मतलब यह है कि एक ही डेटा सेंटर के भीतर किसी कंपनी का ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म भी चल सकता है, किसी अस्पताल का डिजिटल रिकॉर्ड भी सुरक्षित हो सकता है और उसी समय किसी सैन्य एजेंसी का संवेदनशील डेटा भी स्टोर हो सकता है।
यही स्थिति ड्यूल यूज इन्फ्रास्ट्रक्चर कहलाती है। यानी एक ऐसा ढाँचा, जिसका इस्तेमाल नागरिक और सैन्य दोनों उद्देश्यों के लिए किया जाता है। इसी कारण ईरान ने दावा किया कि AWS जैसे डेटा सेंटर्स अमेरिकी सैन्य गतिविधियों का हिस्सा हैं।
उसका कहना था कि जब कोई क्लाउड कंपनी अमेरिकी रक्षा परियोजनाओं को सेवाएँ देती है, तो उसका इंफ्रास्ट्रक्चर केवल व्यावसायिक नहीं रह जाता। हालाँकि अंतरराष्ट्रीय कानून के जानकार इस विषय पर अलग-अलग राय रखते हैं, क्योंकि किसी डेटा सेंटर पर हमला करने से बड़ी संख्या में नागरिक सेवाएँ भी प्रभावित हो सकती हैं।
यही आधुनिक युद्ध की सबसे बड़ी दुविधा है। पहले किसी एयरबेस और अस्पताल में स्पष्ट अंतर होता था, लेकिन अब डिजिटल दुनिया में वही सर्वर नागरिक और सैन्य दोनों कामों के लिए इस्तेमाल हो सकता है। ऐसे में यह तय करना मुश्किल हो जाता है कि किसी डेटा सेंटर को पूरी तरह नागरिक माना जाए या सैन्य।
AWS, गूगल, माइक्रोसॉफ्ट और अमेरिकी रक्षा तंत्र का क्या संबंध है?
CNN की रिपोर्ट के अनुसार, बहरीन में मौजूद AWS इंफ्रास्ट्रक्चर को लेकर भी ईरान ने सवाल उठाए क्योंकि उसका दावा था कि यह केवल व्यावसायिक क्लाउड नेटवर्क नहीं बल्कि अमेरिकी रक्षा परियोजनाओं से भी जुड़ा हुआ है। इसी वजह से AWS जैसे डेटा सेंटर्स आधुनिक युद्ध में ‘Dual-Use Infrastructure’ की बहस के केंद्र में आ गए हैं।
ईरान ने जिन डेटा सेंटर्स को निशाना बनाया, उनमें सबसे अधिक चर्चा अमेजन वेब सर्विसेज यानी AWS की हुई। अमेरिका ने पिछले कुछ वर्षों में अपनी रक्षा और खुफिया एजेंसियों के डिजिटल सिस्टम को आधुनिक बनाने के लिए जॉइंट वार फाइटिंग क्लाउड कैपेबिलिटी(JWCC) नामक परियोजना शुरू की।
अरबों डॉलर की इस परियोजना का उद्देश्य रक्षा विभाग, सैन्य कमांड और अलग-अलग सरकारी एजेंसियों को सुरक्षित क्लाउड नेटवर्क उपलब्ध कराना है। इस परियोजना में AWS के अलावा माइक्रोसॉफ्ट, गूगल और ओरेकल जैसी कंपनियाँ भी शामिल हैं।
यानी जिन क्लाउड प्लेटफॉर्म्स का इस्तेमाल दुनिया भर की कंपनियाँ अपनी वेबसाइट और एप्लिकेशन चलाने के लिए करती हैं, वही प्लेटफॉर्म अमेरिकी रक्षा नेटवर्क का भी हिस्सा हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि आधुनिक युद्ध में निजी टेक कंपनियों और राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच की दूरी पहले जैसी नहीं रही।
इसी कड़ी में पलान्टिर जैसी कंपनियों का नाम भी सामने आता है। पलान्टिर ऐसे AI प्लेटफॉर्म विकसित करती है, जिनका इस्तेमाल युद्ध क्षेत्र का विश्लेषण, उपग्रह चित्रों की जाँच, खुफिया सूचनाओं को जोड़ने और सैन्य निर्णय लेने में किया जाता है।
यही कारण है कि AI कंपनियाँ अब केवल तकनीकी उद्योग का हिस्सा नहीं मानी जातीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा की रणनीति का भी महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी हैं।
कंप्यूट पावर क्यों बन गई रणनीतिक ताकत?
आज दुनिया में AI की सबसे बड़ी होड़ केवल बेहतर एल्गोरिद्म बनाने की नहीं है, बल्कि अधिक कंप्यूटिंग क्षमता हासिल करने की है। किसी बड़े AI मॉडल को तैयार करने के लिए लाखों GPU, भारी मात्रा में बिजली, विशाल स्टोरेज और अत्यधिक तेज नेटवर्किंग की आवश्यकता होती है। यही पूरी व्यवस्था डेटा सेंटर्स में मौजूद रहती है।
यदि किसी देश के डेटा सेंटर्स पर हमला होता है, तो इसका असर केवल उस इमारत तक सीमित नहीं रहता। AI मॉडल की ट्रेनिंग धीमी हो सकती है, क्लाउड सेवाओं में बाधा आ सकता है, रक्षा एजेंसियों की डेटा प्रोसेसिंग प्रभावित हो सकती है और बड़ी टेक कंपनियों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ सकता है।
इसलिए आज कंप्यूट पावर को कई विशेषज्ञ उसी तरह देख रहे हैं, जैसे पिछली सदी में तेल को देखा जाता था। इसी कारण अमेरिका, चीन और खाड़ी देशों के बीच AI इंफ्रास्ट्रक्चर को लेकर कॉम्पिटिशन लगातार तेज हो रही है। जो देश अधिक कंप्यूटिंग क्षमता, बेहतर चिप्स और सुरक्षित डेटा सेंटर्स विकसित करेगा, वही भविष्य की तकनीकी दौड़ में बढ़त हासिल करेगा।
खाड़ी देशों का AI सपना और क्यों बढ़ गया सुरक्षा का सबसे बड़ा खतरा
मिडिल ईस्ट के सऊदी अरब, UAE, कतर, बहरीन, ओमान और कुवैत अब सिर्फ तेल और गैस पर निर्भर नहीं रहना चाहते। उन्हें समझ आ गया है कि आने वाले समय में AI, क्लाउड कंप्यूटिंग, सेमीकंडक्टर, डेटा सेंटर और हाई-परफॉर्मेंस कंप्यूटिंग आर्थिक ताकत के नए आधार होंगे। इसलिए इन देशों ने इन क्षेत्रों में बड़े निवेश शुरू किए हैं।
सऊदी अरब अपने Vision 2030 के तहत AI और डिजिटल इकोनॉमी पर भारी निवेश कर रहा है। UAE खुद को दुनिया का बड़ा AI हब बनाने की कोशिश कर रहा है। करीब 500 अरब डॉलर की एक परियोजना के तहत मिडिल ईस्ट में दुनिया के सबसे बड़े AI डेटा सेंटर नेटवर्क में से एक बनाने की योजना है। UAE और ट्रंप प्रशासन के बीच हुए समझौते का भी यही लक्ष्य है।
खाड़ी देशों ने अमेरिका के साथ AI क्षेत्र में करीब 2 ट्रिलियन डॉलर निवेश की प्रतिबद्धता जताई है। सऊदी अरब अपने 1 ट्रिलियन डॉलर के सरकारी निवेश कोष का बड़ा हिस्सा AI और क्लाउड कंप्यूटिंग में लगाने की तैयारी कर रहा है। इसी रणनीति में Stargate AI Data Center Project भी शामिल है, जिसमें OpenAI, Oracle, Nvidia और Cisco जैसी कंपनियाँ साझेदार हैं।
इन समझौतों ने AI को सीधे जियोपॉलिटिक्स से जोड़ दिया है। ईरान के लिए यही कमजोरी है। डेटा सेंटर पर हमला केवल इमारत को नुकसान नहीं बल्कि खाड़ी देशों की भविष्य की डिजिटल अर्थव्यवस्था और बड़े निवेश पर दबाव बनाने का तरीका भी हो सकता है।
बहरीन में AWS डेटा सेंटर पर हुए हमले को पूरी दुनिया के लिए क्यों माना जा रहा है चेतावनी?
ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव के दौरान बहरीन स्थित अमेजन वेब सर्विस (AWS) डेटा सेंटर पर हुए हमले ने पूरी टेक इंडस्ट्री का ध्यान अपनी ओर खींचा। AWS दुनिया का सबसे बड़ा क्लाउड सर्विस प्रोवाइडर है और लाखों कंपनियाँ अपनी वेबसाइट, एप्लिकेशन, बैंकिंग सिस्टम, क्लाउड स्टोरेज और AI सेवाओं के लिए इसी प्लेटफॉर्म पर निर्भर हैं।
यदि किसी सामान्य फैक्ट्री पर हमला होता है, तो उसका असर मुख्य रूप से उसी उद्योग तक सीमित रहता है। लेकिन किसी बड़े क्लाउड डेटा सेंटर पर हमला हजारों कंपनियों और करोड़ों उपयोगकर्ताओं को एक साथ प्रभावित कर सकता है।
क्लाउड सर्वर इंटरप्ट होने से वेबसाइट बंद हो सकती हैं, डिजिटल भुगतान प्रभावित हो सकते हैं, ऑनलाइन सेवाओं में रुकावट आ सकता है और AI मॉडल तक अस्थायी रूप से प्रभावित हो सकते हैं। यही वजह है कि इस तरह की घटनाओं को केवल सैन्य नहीं, बल्कि वैश्विक आर्थिक सुरक्षा का मुद्दा भी माना जा रहा है।
ईरान ने दावा किया कि AWS अमेरिकी रक्षा और खुफिया नेटवर्क को क्लाउड सेवाएँ उपलब्ध कराता है, इसलिए वह उसकी नजर में एक वैध सैन्य लक्ष्य है। हालाँकि इस दावे को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बहस जारी है लेकिन इस घटना ने इतना जरूर साबित कर दिया कि भविष्य में निजी टेक कंपनियाँ भी किसी क्षेत्रीय संघर्ष से पूरी तरह अलग नहीं रह पाएँगी।
डेटा सेंटर्स की सुरक्षा क्यों बन गई है सबसे बड़ी चुनौती?
सामान्य धारणा यह है कि डेटा सेंटर अत्यधिक सुरक्षित होते हैं, लेकिन वास्तविकता यह है कि उनकी सुरक्षा मुख्य रूप से साइबर हमलों को ध्यान में रखकर तैयार की जाती है। फायरवॉल, एन्क्रिप्शन, मल्टी-लेयर नेटवर्क सुरक्षा और लगातार निगरानी जैसी व्यवस्थाएँ हैकिंग और डिजिटल हमलों से बचाने के लिए बनाई जाती हैं।
लेकिन मिसाइल, ड्रोन और अन्य हमलों के सामने स्थिति पूरी तरह बदल जाती है। डेटा सेंटर विशाल वेयरहाउस जैसे भवन होते हैं, जिनमें हजारों सर्वर रैक, बिजली की व्यवस्था, कूलिंग सिस्टम और नेटवर्किंग उपकरण लगे होते हैं। इन इमारतों को पूरी तरह सैन्य बंकर की तरह सुरक्षित बनाना व्यावहारिक भी नहीं है और आर्थिक रूप से भी बेहद महंगा साबित हो सकता है।
इसी वजह से टेक कंपनियाँ बैकअप व्यवस्था की रणनीति अपनाती हैं। इसका मतलब यह है कि एक ही डेटा की अलग-अलग कॉपी देशों या शहरों में मौजूद अन्य डेटा सेंटर्स में भी रखी जाती हैं।
यदि एक सेंटर प्रभावित हो जाए, तो दूसरा सेंटर सेवाएँ जारी रख सके। हालाँकि विशेषज्ञों का कहना है कि यदि किसी क्षेत्र में लगातार कई डेटा सेंटर्स पर हमले हों, तो केवल बैकअप व्यवस्था भी पर्याप्त साबित नहीं होगी।
यही कारण है कि अब डेटा सेंटर सुरक्षा में केवल साइबर सुरक्षा विशेषज्ञ ही नहीं बल्कि रक्षा रणनीतिकार, बीमा कंपनियाँ और राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसियाँ भी सक्रिय भूमिका निभाने लगी हैं।
क्या दुनिया सामान्य युद्ध से आगे बढ़कर कंप्यूट युद्ध के दौर में प्रवेश कर चुकी है?
बीसवीं सदी के अधिकांश बड़े संघर्ष ऊर्जा संसाधनों, तेल आपूर्ति और समुद्री व्यापार मार्गों के इर्द-गिर्द घूमते रहे। तेल पर नियंत्रण का अर्थ आर्थिक और राजनीतिक शक्ति पर नियंत्रण माना जाता था। लेकिन इक्कीसवीं सदी के तीसरे दशक में यह परिभाषा बदलती दिखाई दे रही है।
आज AI, क्लाउड कंप्यूटिंग और डेटा प्रोसेसिंग किसी भी विकसित अर्थव्यवस्था की रीढ़ बन चुके हैं। जिस देश के पास अधिक कंप्यूटिंग क्षमता, बेहतर AI मॉडल, आधुनिक सेमीकंडक्टर और सुरक्षित डेटा सेंटर्स होंगे, वह न केवल तकनीकी बल्कि आर्थिक और सामरिक बढ़त भी हासिल करेगा।
इसीलिए अब विशेषज्ञ कंप्यूट युद्ध को नए दौर का रणनीतिक संसाधन मान रहे हैं। जिस तरह कभी तेल के भंडार किसी देश की ताकत का प्रतीक थे, उसी तरह भविष्य में AI इंफ्रास्ट्रक्चर और डेटा सेंटर्स किसी देश की वास्तविक तकनीकी शक्ति का पैमाना बन सकते हैं।
ईरान द्वारा डेटा सेंटर्स को निशाना बनाए जाने की रणनीति इसी बदलाव की ओर संकेत करती है। यह केवल वर्तमान संघर्ष की कहानी नहीं है बल्कि आने वाले दशकों के युद्धों की दिशा भी दिखाती है।
प्रधानमंत्री मोदी के वीडियो को फेसबुक से कुछ दिनों के लिए हटाए जाने पर संसदीय समिति ने मेटा के मालिक मार्क जुकरबर्ग को 3 दिन में माफ माँगने को कहा है। समिति ने कहा है कि अगर जुकरबर्ग माफी तय वक्त में नहीं माँगते हैं तो फेसबुक अपनी सेफ हार्बर सुरक्षा रद्द किया जा सकता है।
दरअसल अब मेटा, गुगल जैसे प्लेटफॉम सिर्फ मध्यस्थ ही भूमिका में ही नहीं रहे हैं, ये इससे आगे बढ़ कर कंटेंट को रोकने, बढ़ावा देने जैसे काम भी करने लगे हैं। ऐसे में इनकी जवाबदेही भी बढ़ जाती है।
पीएम मोदी के वीडियो का मामला
सूचना और आईटी समिति ने चेतावनी दी है कि अगर 3 दिनों के अंदर उसकी बात पर अमल नहीं किया गया तो फेसबुक की सेफ हार्बर सुरक्षा को रद्द करने पर सरकार विचार कर सकती है। इससे फेसबुक के अधिकारियों को आपराधिक अभियोजन का सामना करना पड़ सकता है, क्योंकि ऐसा करने पर कंपनी के अधिकारियों पर एफआईआर दर्ज किया जा सकता है।
यह विवाद पीएम मोदी के 23 जुलाई 2026 के देर रात जारी किए गए वीडियो को लेकर शुरू हुआ है। इसे पीएम मोदी ने इंस्टाग्राम पर पोस्ट किया था और बाद में फेसबुक पर इसे शेयर किया गया। ये वीडियो सेल्फी शैली में बनाई गई थी। इसे फेसबुक पर 5 घंटे के लिए ‘गायब’ कर दिया गया था।
इस मामले में बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे की अध्यक्षता में सूचना और आईटी समिति बनाई गई जिसने मेटा, एक्स, गुगल और दूसरे डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के अधिकारियों के साथ बैठक की। इसमें मेटा के अधिकारियों ने माना की ये तकनीकी गड़बड़ी की वजह से पीएम मोदी का वीडियो प्लेटफॉर्म से कुछ देर के लिए हट गया था। अधिकारियों ने इसके लिए खेद जताया, लेकिन समिति और सरकार ने खेद जताने को नाकाफी माना।
सूचना प्रौद्योगिकी और संचार समिति ने पीएम के वीडियो को हटाए जाने को ‘लोकतंत्र पर हमला’ करार दिया और कहा है कि मेटा इसके लिए जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई करे। इसके अलावा जुकरबर्ग खुद माफी माँगें और वह भी 3 दिनों के भीतर।
सेफ हार्बर क्या है?
सेफ हार्बर सुरक्षा एक ऐसा कानूनी संरक्षण है, जिसके तहत इंटरनेट प्लेटफॉर्म (Intermediaries) अपने यूजर्स द्वारा पोस्ट किए गए कंटेंट या उनकी गतिविधियों के लिए स्वतः जिम्मेदार नहीं माने जाते। भारत में यह सुरक्षा आईटी एक्ट 2000 की धारा 79 के तहत दी गई है।
इसका मतलब यह नहीं कि प्लेटफॉर्म कानून से ऊपर हैं, बल्कि इसका मतलब है कि यदि वे केवल प्लेटफॉर्म हैं और कानून का पालन करते हैं, तो उन्हें हर यूजर के हर काम के लिए दोषी नहीं ठहराया जा सकता। यानी सेफ हार्बर कानूनी रूप से वेबसाइटों और प्लेटफॉर्म्स को कानूनी दायित्वों से बचाती है, ताकि यूजर के साझा किए गए कंटेंट के लिए उसे उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सके।
दरअसल यह ऑनलाइन नेविगेशन को प्रोत्साहित करने के लिए इंटरनेट के शुरुआती सालों में शुरू किया गया था, जिससे प्लेटफॉर्म्स बेवजह की कानूनी पचड़ों से बच सकें। इस ख्याल से सेफ हार्बर सुरक्षा काफी अहम है, क्योंकि इसकी वजह से साइटों पर यूजर के द्वारा पोस्ट की गई सामग्री के मामले में आपराधिक कार्रवाई नहीं हो सकती।
अमेरिका में सेफ हार्बर को संचार अधिनियम 1934 की धारा 230 के तहत शामिल किया गया। इसे 1996 में नए प्रावधान के साथ जोड़ा गया, जबकि भारत में इसे सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम 2000 की धारा 79 के तहत जोड़ा गया है।
इसके मुताबिक, यदि कंपनियाँ भारत सरकार और कोर्ट के तय नियमों का पालन करती हैं, तो यूजर के गैरकानूनी पोस्ट के लिए उन्हें उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता और उन पर कोई केस नहीं होता है। हालाँकि भारत नए आईटी अधिनियम 2021 के संशोधन के जरिए आपत्तिजनक और डीपफेक कंटेंट को हटाने को लेकर सख्त है और इसके लिए 36 घंटे का वक्त मुकर्र की जाती है।
प्रकाशक और मध्यस्थ में क्या अंतर है?
पब्लिशर यानी प्रकाशक वह होता है जो कंटेंट का चयन करता है, उसका संपादन करता है और उसका प्रकाशन करता है। जैसे कोई न्यूज चैनल या अखबार अपनी खबरें खुद बनाते हैं, संपादन करते हैं और दिखाते या छापते हैं। ऐसे स्थिति में उस कंटेंट के लिए वह खुद जिम्मेदार है। इसलिए झूठी खबर छपती या दिखाई जाती है तो उसकी जिम्मेदारी पब्लिशर की होती है।
वहीं Intermediary यानी मध्यस्थ की भूमिका अलग होती है। वह केवल प्लेटफॉर्म उपलब्ध कराता है, जैसे- इंस्टाग्राम, फेसबुक, गुगल, एक्स, यूट्यूब, टेलीग्राम आदि के प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल यूजर करते हैं यानी मध्यस्थ कंटेंट बनाते नहीं हैं, बल्कि यूजर्स द्वारा अपलोड किए गए कंटेंट को होस्ट करते हैं। इसी कारण इन्हें सेफ हार्बर मिलता है।
अब सवाल ये उठता है कि कंपनियाँ जब एग्लोरिदम के जरिए खास कंटेंट को तवज्जो देती है उसे आगे बढ़ाती है और पैसे कमाती है तो उनकी भूमिका सिर्फ मध्यस्थ की रहती है या वह प्रकाशक की तरह हो जाती है।
भारत में क्या नियम हैं?
भारत में सेफ हार्बर को हटाया भी जा सकता है। यदि कोई प्लेटफॉर्म गैरकानूनी गतिविधि की जानकारी मिलने के बाद भी कार्रवाई नहीं करता है, तो उसका सेफ हार्बर सुरक्षा हटाया जा सकता है। कोर्ट या सरकार के आदेश का पालन नहीं करता या साइबर अपराध को बढ़ावा देता है तो उसका सेफ हार्बर सुरक्षा खत्म किया जा सकता है।
इसका निर्णय सरकार या कोर्ट के आदेश पर हो सकता है। इसके अलावा अगर कोई प्लेटफॉर्म खुद कंटेंट को इस तरह नियंत्रित करने लगे और पैसे कमाने लगे जैसा पब्लिशर करते हैं, तो उसकी सेफ हार्बर सुरक्षा खत्म की जा सकती है। ऐसे में उस प्लेटफॉर्म की ‘कानूनी सुरक्षा कवच’ खत्म हो सकती है।
भारत में आईटी रूल्स 2021 के तहत बड़े सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को कई जिम्मेदारियाँ दी गई हैं। प्लेटफॉर्म्स को गवर्नेंस अफसर नियुक्त करना जरूरी है। अगर कोई शिकायत की गई है तो उसे समय पर निपटाना जरूरी है। कानून लागू करने वाली एजेंसियों के साथ सहयोग करते हुए अगर जरूरत पड़े तो कंटेंट हटाना जरूरी है। बड़े साइबर क्राइम से जुड़ी जानकारी देना भी जरूरी है।
सिर्फ इसलिए नहीं कि अपराध इंस्टाग्राम, फेसबुक या दूसरे प्लेटफॉर्म पर शुरू हुआ। इसे दोषी नहीं ठहराया जा सकता। जैसे किसी व्यक्ति ने इंस्टाग्राम पर दोस्ती की और बाद में ऑफलाइन जाकर धोखाधड़ी की, तो प्राथमिक जिम्मेदारी आरोपित की ही होगी। लेकिन यदि शिकायत मिलने के बाद भी प्लेटफॉर्म कार्रवाई न करे, फर्जी अकाउंट बार-बार चलने दे। कोर्ट के आदेश की अनदेखी करे, तो उसके खिलाफ कानूनी एक्शन हो सकता है।
ये पहला मौका नहीं है जब भारत सरकार और किसी डिजिटल प्लेटफॉर्म के बीच विवाद हुआ हो। इससे पहले भी एक्स, व्हाट्सएप, गुगल और मेटा के साथ कई बार विवाद हुए हैं। आपत्तिजनक कंटेंट हटाने के आदेश से लेकर फेक न्यूज, राष्ट्रीय सुरक्षा के मामलों में भी कई बार विवाद सामने आए। शाहीन बाग से लेकर किसान आंदोलन में कंटेंट पर सवाल उठे। सरकार द्वारा आईटी नियमों का पालन करने को लेकर कई विवाद सामने आए।
प्रधानमंत्री मोदी के कथित एआई जनरेटेड और मॉर्फ्ड वीडियो सोशल मीडिया पर फैलाए जाने के मामले में जुलाई 2026 में हैदराबाद साइबर क्राइम पुलिस ने मेटा इंडिया के हेड अरुण श्रीनिवास और कई सोशल मीडिया यूजर्स के खिलाफ एफआईआर दर्ज की थी। पुलिस अब यह जाँच कर रही है कि ऐसे डीपफेक और भ्रामक कंटेंट को रोकने के लिए मेटा ने क्या किया। प्लेटफॉर्म के पास कंटेंट मॉडरेशन सिस्टम क्यों मौजूद नहीं था।
इसी तरह केन्द्रीय मंत्री नितिन गडकरी के मामले में भी हुआ। उनके परिवार पर E-20 पेट्रोल की वजह से लाभान्वित होने वाला डीपफेक एआई जेनरेटेड वीडियो बनाए गए। इसको लेकर उन्होंने बॉम्बे हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। बॉम्बे हाईकोर्ट ने गडकरी को मेटा, एक्स गुगल समेत उन सभी प्लेटफॉर्म्स के खिलाफ मुकदमा दायर करने की अनुमति दी। साथ ही इन प्लेटफॉर्म्स को सभी ऐसे लिंक हटाने का आदेश दिया।
कई मामलों में कंपनियों ने अदालत का रुख किया, जबकि सरकार ने कहा कि भारत में काम करने के लिए यहां के कानूनों का पालन करना सभी प्लेटफॉर्म के लिए जरूरी है।
सेफ हार्बर को लेकर दुनियाभर में कई विवाद
दुनिया भर में सेफ हार्बर को लेकर विवाद बढ़े हैं। अमेरिकी कानून के तहत सेक्शन 230 के तहत इंटरनेट कंपनियों को सेफ हार्बर सुरक्षा देता है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में मेटा, गुगल और एक्स पर फेक न्यूज फैलने देने, चुनावों को प्रभावित करने वाले कंटेंट को नहीं रोकने और हेट स्पीच मामले में पर्याप्त कार्रवाई नहीं करने के आरोप लगे। इसकी वजह से रिपब्लिकन और डेमोक्रेट दोनों ने अलग-अलग कारणों से सेक्शन 230 में बदलाव की माँग की।
यूरोपियन यूनियन ने डिजिटल सर्विस एक्ट लागू किया था। इसके जरिए बड़े प्लेटफॉर्म को एल्गोरिद्म में पारदर्शिता रखना, गलत कंटेंट को फटाफट हटाना, बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करना जैसे जिम्मेदारियाँ दी गई थी, यानी सेफ हार्बर के साथ-साथ उनकी जिम्मेदारियाँ भी काफी हैं।
अमेरिका और यूरोपीय संघ के बीच सेफ हार्बर समझौते के तहत डेटा ट्रांसफर को कंट्रोल करने का विवाद भी सामने आया। दरअसल यूरोपीय देशों की आपत्ति थी अमेरिकी एजेंसियाँ आसानी से यूरोप के नागरिकों के डेटा तक पहुँच सकती है यानी उनकी जासूसी हो सकती है। इस पर यूरोपीय संघ की कोर्ट में केस भी दर्ज हुए और इस दौरान कोर्ट ने भी माना कि अमेरिकी कानून यूरोप के नागरिकों की निजी जानकारियों के दुरुपयोग से सुरक्षा प्रदान नहीं करती हैं। इन विवादों के बाद 2015 में यूरोप ने सेफ हार्बर समझौते को रद्द कर दिया था।
ऑस्ट्रेलिया ने मेटा और गुगल से कहा कि यदि वे न्यूज कंटेंट से कमाई करते हैं, तो मीडिया संस्थानों को इसके लिए भुगतान करें। इसके बाद मेटा ने कुछ समय के लिए फेसबुक पर न्यूज शेयरिंग बंद कर दी थी। ये विवाद इसलिए सामने आया क्योंकि जब प्लेटफॉर्म मध्यस्थ की भूमिका में है तो वह प्रकाशक की तरह कंटेंट से कमाई कैसे कर सकता है।
इसके बाद ऑस्ट्रेलिया ने न्यूज कंटेंट के एवज में स्थानीय मीडिया संस्थान को भुगतान करने या डिजिटल विज्ञापन पर 2.5 फीसदी टेक्स चुकाने का प्रस्ताव दिया। कंपनियों को इससे बचने के लिए कम से कम 6 स्थानीय पब्लिशर के साथ बिजनेस समझौते करने होंगे। ये नियम उन प्लेटफॉर्म पर लागू होगा, जिसकी सालाना आय 250 मिलियन ऑस्ट्रेलियाई डॉलर से अधिक है।
कनाडा ने ऑनलाइन न्यूज एक्ट 2023 लागू कर दिया। 22 जून 2023 को लागू होने के बाद मेटा ने फेसबुक और इंस्टाग्राम पर न्यूज उपलब्ध कराना काफी हद तक बंद कर दिया। दरअसल इस कानून के माध्यम से मेटा, गुगल जैसे प्लेटफॉर्म को शेयर किए जाने वाले न्यूज कंटेंट के लिए मीडिया आउटलेट्स को भुगतान करना अनिवार्य कर दिया गया।
इसके बाद इन प्लेटफॉर्म्स ने न्यूज कंटेंट शेयर करना ही बंद कर दिया। हालाँकि गुगल ने कनाडाई सरकार से समझौता कर पैसे देने की बात मानी, जिसके बाद गुगल पर प्रतिबंध टल गया, लेकिन मेटा पर कनाडा में बैन लगा हुआ है।
ऐसे में पूरी दुनिया इस सवाल से जूझ रही है कि इन प्लेटफॉर्म्स को सेफ हार्बर मिलना चाहिए या नहीं। अब सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म अपने एल्गोरिद्म और कंटेंट रिकमेंडेशन की वजह से सिर्फ मध्यस्थ की भूमिका में ही नहीं रहीं हैं। ये इससे कहीं आगे बढ़ कर पब्लिशर की भूमिका भी निभाने लगी हैं।
अगर ये सिर्फ मध्यस्थ रहें तो उन्हें सेफ हार्बर मिलना चाहिए। लेकिन जब कौन-सा कंटेंट दिखेगा, किसे दिखेगा, किसे बढ़ावा मिलेगा और किससे कमाई होगी जैसी चीजें जुड़ जाती है, तो उनकी जिम्मेदारी भी बढ़नी चाहिए। पीएम मोदी के वीडियो का कुछ घंटों के लिए फेसबुक से हटना-हटाना भी इस तरह का ही मामला है।
लाल किला ब्लास्ट के बाद चर्चा में आए अल-फलाह समूह से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग मामले में आरोपित जवाद अहमद सिद्दीकी को दिल्ली की साकेत कोर्ट से झटका लगा है। कोर्ट ने उनके द्वारा दाखिल की गईं दो अलग-अलग अर्जियाँ खारिज कर दी हैं।
पहली अर्जी में सिद्दीकी ने अपने कुछ ऐसे दस्तावेजों को अदालत के रिकॉर्ड पर लेने की अनुमति माँगी थी जिन्हें उन्होंने ‘बेहद विश्वसनीय’ और ‘निर्विवाद प्रकृति’ का बताया था। जावेद का कहना था कि इन दस्तावेजों को देखना न्यायसंगत निर्णय के लिए अत्यंत आवश्यक है। दूसरी अर्जी में उन्होंने ED से जाँच के दौरान जुटाए गए उन दस्तावेजों की सूची देने की माँग की थी जिन पर एजेंसी अपने मामले के लिए भरोसा नहीं (unrelied documents) कर रही है।
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश शीतल चौधरी प्रधान ने 4 अगस्त 2026 को दिए 48 पन्नों के आदेश में दोनों अर्जियों को खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि जिस चरण पर मामला अभी लंबित है, वहाँ अदालत को मुख्य रूप से ED की अभियोजन शिकायत और उसके साथ पेश की गई सामग्री को देखना है और यह तय करना है कि आरोपित के खिलाफ प्रथम दृष्टया मामला बनता है या नहीं।
समझिए, मामला किस स्टेज पर है
यह मामला PMLA की धारा 3 और 4 के तहत चल रहा है। ED ने PMLA की धारा 44(1)(b) के तहत शिकायत दाखिल की है। लेकिन अभी अदालत ने इस शिकायत पर संज्ञान (cognizance) नहीं लिया है। आसान शब्दों में कहें तो, अभी यह तय होना बाकी है कि ED की शिकायत और उसके साथ रखी गई सामग्री को देखकर अदालत आरोपित के खिलाफ आगे की आपराधिक प्रक्रिया शुरू करने लायक मामला पाती है या नहीं।
मौजूदा 4 अगस्त 2026 का आदेश मुख्य रूप से इस बात पर है कि संज्ञान लेने से पहले आरोपित को किस तरह और कितनी सीमा तक सुना जा सकता है। कोर्ट का यह भी कहना कि संज्ञान के सवाल पर ED की ओर से दलीलें पहले ही पूरी हो चुकी थीं और आरोपित की ओर से दलीलें होनी बाकी थीं। इसी बीच ये दोनों अर्जियाँ दाखिल की गईं और इन्हें पहले तय करना जरूरी था।
सिद्दीकी पर प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (PMLA) के तहत करीब 415 करोड़ रुपए के मामले को लेकर केस चल रहा है। उनके संस्थान पर 2025 के नवंबर में हुए लाल किला विस्फोट के आरोपितों को शरण देने का भी आरोप है।
जवाद अहमद सिद्दीकी ने क्या की थी माँग?
सिद्दीकी की दोनों अर्जियों का आधार BNS की धारा 223(1) में मौजूद उस प्रावधान को लेकर था जिसके तहत आरोपित को सुने बिना अदालत किसी अपराध का संज्ञान नहीं ले सकती।
पहली अर्जी में सिद्दीकी ने अदालत से कहा कि उनके कारोबार से जुड़े कुछ दस्तावेज ऐसे हैं जो ऑफिशियल स्रोतों से आए हैं। इनमें अलग-अलग भारतीय सरकारी प्राधिकरणों और बैंकों से जुड़े दस्तावेज शामिल होने की बात कही गई है। सिद्दीकी ने इन्हें ‘बेहद विश्वसनीय’ (sterling quality) और ‘निर्विवाद प्रकृति’ (unimpeachable character) वाला बताया और कोर्ट से उन्हें रिकॉर्ड पर लेने को कहा था।
सिद्दीकी का कहना था कि इन दस्तावेजों को देखने से अदालत को ED के आरोपों में मौजूद कथित विरोधाभासों को समझने में मदद मिलेगी और इससे संज्ञान से पहले होने वाली सुनवाई अधिक प्रभावी और सार्थक बनेगी।
सिद्दीकी की दूसरी माँग थी कि ED को निर्देश दिया जाए कि वह unrelied documents यानी ऐसे दस्तावेजों की सूची दे, जिन्हें जाँच एजेंसी ने जाँच के दौरान हासिल तो किया है लेकिन अपने मामले में उन पर भरोसा नहीं किया है।
दूसरी अर्जी में सिद्दीकी ने BNSS की धारा 436 के तहत मामले से जुड़े महत्वपूर्ण कानूनी सवालों को उच्च न्यायालय के पास भेजने की माँग की थी। उनका मुख्य तर्क था कि धारा 223(1) का पहला ‘परंतुक’ नया प्रावधान है जो आरोपित को संज्ञान लेने से पहले सुनवाई का अधिकार देता है लेकिन इस सुनवाई की ‘सीमा, स्वरूप और दायरा’ अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है।
कोर्ट के आदेश में कहा गया है, “इस मामले के रिकॉर्ड से सामने आए तथ्यों को देखते हुए जनहित, कानून और संविधान से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण सवाल उठते हैं। इन सवालों का सीधा संबंध इस बात से है कि मामले का संज्ञान लेने से पहले के चरण में प्रस्तावित आरोपी को किस तरह और कितनी सीमा तक सुनवाई का अवसर दिया जाना चाहिए।”
इसमें आगे कह गया है, “क्योंकि ये मुद्दे जटिल प्रकृति के हैं और अब तक देश के किसी भी उच्च न्यायालय या माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा इन पर निर्णय नहीं दिया गया है, इसलिए यह बेहद महत्वपूर्ण है कि संज्ञान से पहले होने वाली सुनवाई से पहले किसी संवैधानिक न्यायालय द्वारा इन सवालों का समाधान किया जाए। या कम से कम, जब यह माननीय न्यायालय आवेदक को सुनवाई का अवसर दे तब इन महत्वपूर्ण सवालों को ध्यान में रखा जाए।”
क्या हैं रिलाइड, अनरिलाइड और स्टर्लिंग दस्तावेज?
जब कोई जाँच एजेंसी छापे मारकर या तलाशी के दौरान भारी मात्रा में दस्तावेज, डिवाइस, बैंक रिकॉर्ड आदि जब्त करती है तो उनमें से सिर्फ कुछ को ही वह अपनी शिकायत/चार्जशीट के साथ अदालत में पेश करती है और इन्हें ‘रिलाइड डॉक्यूमेंट्स’ (relied upon documents) कहा जाता है यानी जिन पर अभियोजन भरोसा कर रहा है।
बाकी बचे दस्तावेज जिन्हें एजेंसी शिकायत के साथ पेश नहीं करती ‘अनरिलाइड डॉक्यूमेंट्स’ (unrelied upon documents) कहलाते हैं। अभियुक्त पक्ष का हमेशा यह तर्क रहता है कि इन ‘अनरिलाइड’ दस्तावेजों में ऐसी चीजें भी हो सकती हैं जो अभियुक्त के बचाव में मददगार हों और इसीलिए कम-से-कम उनकी एक सूची अभियुक्त को मिलनी चाहिए।
वहीं, ‘स्टर्लिंग क्वालिटी दस्तावेज’ से अभियुक्त का मतलब उन दस्तावेजों से था, जो खुद अभियुक्त के पास मौजूद हैं और जिन्हें वह खुद कोर्ट के सामने रखना चाहता था।
जवाद अहमद सिद्दीकी ने दीं क्या दलीलें?
ऑपइंडिया के पास मौजूद कोर्ट के आदेश के मुताबिक, बचाव पक्ष ने शुरुआत में यह दावा किया कि सिद्दीकी पूरी तरह निराधार, द्वेषपूर्ण और असंगत कारणों से गंभीर उत्पीड़न व प्रताड़ना झेल रहे हैं और उन्हें भरोसा है कि आगे की कार्यवाही में वे मामले की खोखली बुनियाद उजागर कर देंगे।
इस अर्जी के माध्यम से एक महत्वपूर्ण कानूनी सवाल भी उठाया गया है कि अदालत द्वारा अपराध का संज्ञान लेने से पहले आरोपी को दी जाने वाली सुनवाई का स्वरूप, संदर्भ, दायरा और सीमा आखिर क्या होगी।
कोर्ट के आदेश का एक हिस्सा
सिद्दीकी की ओर से तर्क दिया गया कि आरोपित को सुनवाई का अवसर दिए बिना दंडाधिकारी किसी अपराध का संज्ञान नहीं ले सकता। बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि सुप्रीम कोर्ट और देश के विभिन्न उच्च न्यायालय इस प्रावधान की व्याख्या कर चुके हैं और अब यह स्थापित कानूनी स्थिति है कि सुनवाई का अवसर केवल औपचारिकता नहीं हो सकता। आरोपित को अपना पक्ष रखने के लिए प्रभावी, उद्देश्यपूर्ण और सार्थक अवसर मिलना चाहिए।
बचाव पक्ष ने यह भी कहा कि जब कानून आरोपित को सुनवाई का अवसर देता है तो इसका अर्थ केवल इतना नहीं हो सकता कि आरोपित को अदालत में उपस्थित होने दिया जाए और उसकी बात सुन ली जाए। उसका कहना था कि न्याय के हित में अदालत को ऐसी प्रक्रिया अपनानी चाहिए जिससे आरोपी को वास्तविक और प्रभावी तरीके से अपना पक्ष रखने का अवसर मिले।
दलील दी गई कि जब तक अभियुक्त को यह पता नहीं होगा कि कितनी और किस तरह की सामग्री जाँच एजेंसी ने रोक रखी है, तब तक वह अपना बचाव ठीक से तैयार नहीं कर सकता। यह भी कहा गया कि इन रोकी गई सामग्रियों में ऐसे सबूत भी हो सकते हैं जो अभियुक्त के पक्ष में हों और आरोपों को सीधे प्रभावित या कमजोर कर सकते हों। अभियोजन को यह छूट नहीं दी जा सकती कि वह केवल अभियुक्त को दोषी साबित करने वाली सामग्री चुने और बचाव में मदद करने वाली सामग्री को अपने पास दबाकर रखे।
ED ने कहा- कार्यवाही को लंबा खींचने की कोशिश
ED ने अदालत में सिद्दीकी की माँगों का कड़ा विरोध किया। ED ने इस पूरी अर्जी को कार्यवाही में जानबूझकर देरी कराने की एक सोची-समझी कोशिश करार दिया। ED के अनुसार, आरोपित अदालत को ऐसी जाँच करने के लिए मजबूर करना चाहता है जो संज्ञान से पहले की सुनवाई के दायरे से बिल्कुल बाहर है।
ED का तर्क था कि संज्ञान लेने और प्रोसेस (समन) जारी करने के चरण में कोर्ट को सिर्फ इतना देखना होता है कि शिकायत और अभियोजन द्वारा साथ में दाखिल सामग्री के आधार पर प्रथम दृष्टया (prima facie) मामला बनता है या नहीं। इस स्तर पर अभियुक्त को यह अधिकार नहीं है कि वह अपनी बचाव सामग्री पर विचार की माँग करे।
कोर्ट के आदेश का एक हिस्सा
ED ने कोर्ट को यह भी बताया कि 27 मार्च 2026 को इसी मामले में अनरिलाइड डॉक्यूमेंट्स को लेकर सिद्दीकी की माँग पर विस्तृत आदेश आ चुका है। उस आदेश में अदालत ने कहा था कि संज्ञान से पहले के चरण पर अनरिलाइड डॉक्यूमेंट्स की सूची देना जरूरी नहीं है। कोर्ट ने यह भी माना था कि उस समय जाँच जारी थी और ऐसी सूची देने से चल रही जाँच पर असर पड़ सकता है। इसी आधार पर वह आवेदन खारिज कर दिया गया था।
ED ने कहा कि इस मामले को हाई कोर्ट रेफर करने की कोई जरूरत नहीं है। ED ने धारा 436 की इस माँग को भी गलत और समय से पहले बताया। एजेंसी का कहना था कि सिद्दीकी जिन सवालों को हाई कोर्ट भेजना चाहते हैं, वे इस मामले में cognizance तय करने के लिए जरूरी नहीं हैं। वे व्यापक कानूनी सवाल हैं और अभी की सीमित सुनवाई से उनका सीधा संबंध नहीं है।
कोर्ट के आदेश में ED के दलीलों को लेकर कह गया है, “यह आवेदन कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग है और इसका एकमात्र उद्देश्य मामले का संज्ञान लेने पर होने वाले विचार में देरी करना है। इसके लिए कार्यवाही को ऐसे दूसरे मुद्दों की ओर मोड़ा जा रहा है, जिनका इस न्यायालय द्वारा संज्ञान लेने से पहले के चरण में की जाने वाली सीमित कार्यवाही से कोई संबंध नहीं है।”
ED ने कहा कि BNSS की धारा 223(1) के प्रावधान के तहत होने वाली सुनवाई का दायरा सीमित है। इस सुनवाई का उद्देश्य मामले के गुण-दोष की विस्तार से जाँच करना, तथ्यों से जुड़े विवादित सवालों पर फैसला करना, बचाव पक्ष की दलीलों की जाँच करना या कानूनी सवालों पर अंतिम निर्णय देना नहीं है।
ED ने तर्क दिया कि अनुच्छेद 228 किसी अधीनस्थ न्यायालय को यह अधिकार नहीं देता कि वह इस प्रावधान का इस्तेमाल करे या माननीय उच्च न्यायालय को इसके तहत अपने अधिकार क्षेत्र का प्रयोग करने का निर्देश दे। अनुच्छेद 228 के तहत अधिकार का इस्तेमाल करने की शक्ति केवल माननीय उच्च न्यायालय में निहित है। इसका इस्तेमाल पूरी तरह इस बात पर निर्भर करता है कि उच्च न्यायालय इस बात से संतुष्ट है या नहीं कि कोई महत्वपूर्ण संवैधानिक सवाल मौजूद है, जिसका फैसला किया जाना जरूरी है।
ED के मुताबिक, BNSS की धारा 436 के तहत मामले को भेजने या भारत के संविधान के अनुच्छेद 228 को लागू करने का कोई आधार नहीं बनता है। अनुच्छेद 228 अधीनस्थ न्यायालय को यह अधिकार नहीं देता कि वह किसी मामले को उच्च न्यायालय के पास भेजे या उच्च न्यायालय को उसके तहत अपनी संवैधानिक शक्तियों का इस्तेमाल करने का निर्देश दे।
कोर्ट ने अपने आदेश में क्या कहा?
न्यायाधीश शीतल चौधरी प्रधान ने अपने आदेश में कहा है, “आरोपित की ओर से unrelied documents की सूची देने की जो माँग की गई है, उस पर कोर्ट द्वारा 27 मार्च के विस्तृत आदेश में पहले ही फैसला किया जा चुका है। आरोपित को ऐसे दस्तावेज कब और किस चरण में दिए जाने चाहिए इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दे दिया है। आरोपित द्वारा की गई यह माँग बिना किसी कानूनी आधार के है और स्वीकार करने योग्य नहीं है।”
आदेश में आगे कहा गया है, “संज्ञान लेने के चरण में न्यायालय को केवल शिकायतकर्ता द्वारा पेश की गई सामग्री को ही देखना होता है। इसका उद्देश्य केवल यह पता लगाना है कि प्रथम दृष्टया मामला बनता है या नहीं, जिसके आधार पर आरोपित को अदालत में बुलाने की प्रक्रिया जारी की जा सके। आरोपित के पास मौजूद दस्तावेजों को रिकॉर्ड पर लेने की अनुमति देने की माँग में कोई कानूनी आधार नहीं है।”
सिद्दीकी की दोनों अर्जियों को खारिज करते हुए कोर्ट ने कहा, “BNSS की धारा 436(2) में कहा गया है कि किसी मामले की सुनवाई कर रही सेशन कोर्ट, यदि उसे उचित लगे और वह मामला उपधारा (1) के तहत नहीं आता हो, तो उस मामले की सुनवाई के दौरान उठने वाले किसी भी कानूनी सवाल को उच्च न्यायालय के फैसले के लिए भेज सकती है। लेकिन वर्तमान मामले के तथ्यों और परिस्थितियों में आरोपित द्वारा सामने रखे गए कानून से जुड़े कथित सवाल न तो अमान्य हैं और न ही प्रभावहीन।”
कोर्ट ने कहा, “इन प्रावधानों की व्याख्या उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय के कई फैसलों में पहले ही की जा चुकी है। इसलिए वर्तमान न्यायालय द्वारा इन सवालों पर माननीय उच्च न्यायालय से राय लेने के लिए मामला भेजने की जरूरत नहीं है। इसलिए, आरोपित की ओर से दाखिल इस आवेदन में भी कोई कानूनी आधार नहीं है।”