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उस ओसामा के फिर से माई-बाप बने लालू यादव, जिसका अब्बा दूसरों के बेटों को तेजाब से नहला कर मार डालता था: बिहार में RJD के जंगलराज वाले कुनबों का ‘मिलन’

1990 से 2005 का बिहार। लालू प्रसाद यादव और राबड़ी देवी के शासनकाल वाला बिहार। वो बिहार जो बना जंगलराज का पर्याय। जंगलराज के इसी दौर में सीवान में एक गुंडा समानांतर सरकार चलाता था। नाम था- मोहम्मद शहाबुद्दीन।

आम आदमी से लेकर पुलिस वाले तक जो भी इस गुंडे का हुक्म बजाने से इनकार करते उन्हें वह सजा देता। वह खुद की कोर्ट लगाकर फरमान जारी करता था। इसी गुंडे ने रंगदारी देने से इनकार करने पर चंदा बाबू के दो बेटों को तेजाब से नहला कर मार डाला था। इस घटना के गवाह रहे उनके तीसरे बेटे की भी कोर्ट जाते समय हत्या कर दी गई थी।

इस गुंडे का कनेक्शन पाकिस्तान की कुख्यात खुफिया एजेंसी आईएसआई से थे। उसके घर से पाकिस्तान में बने हथियार मिले। जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्र संघ के अध्यक्ष रहे चंद्रशेखर को गोलियों से छलनी करने के उस पर आरोप लगे।

इन सबके बावजूद वह विधायक बना। सांसद बना। ‘कृपा’ रही लालू प्रसाद यादव की। इस ‘कृपा’ के बदले वह सुनिश्चित करता था कि मुस्लिमों का वोट लालू यादव की राष्ट्रीय जनता दल (RJD) को ही मिले। बिहार में लालू प्रसाद के राजपाट पर ‘ग्रहण’ न लगे।

वैसे तो बिहार में सुशासन की आमद के साथ ही इस गुंडे का कानून के राज से साक्षात्कार हो गया था। बिहार की जनता ने इस गुंडे और उसके राजनीतिक माई-बाप की एक साथ हनक निकाल दी थी। 2021 में यह गुंडा कोरोना की मौत मर गया। खुद को उसका राजनीतिक उत्तराधिकारी साबित करने के लिए उसकी बेवा हिना शहाब और बेटा ओसामा शहाब हाथ-पैर मारते रहे। कभी राजद के साथ तो कभी राजद को आँखें दिखाकर। लेकिन न तो इन्हें फिर से सीवान में राजनीतिक जमीन मिली, न राजद का शीर्ष परिवार बिहार का माई-बाप बन सका।

इन्हीं राजनीतिक मजबूरियों के बीच ​शहाबुद्दीन के परिवार ने फिर से अपने पुराने राजनीतिक माई-बाप लालू यादव की सदारत कबूल कर ली है। लालू और शहाबुद्दीन के परिवार के बीच यह इकरार ऐसे समय में हुआ है, जब 2025 में बिहार विधानसभा के चुनाव होने हैं। जब राजद प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी के हाथों अपना मुस्लिम वोट बैंक छिनने से भयाक्रांत है। 2020 के चुनावों में असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम ने भी किशनगंज जैसे इलाकों में लालटेन की रोशनी छीन ली थी।

ऐसे में हिना और ओसामा की वापसी को भले छपरा, सीवान और गोपालगंज में मुस्लिम वोटों के बिखराव रोकने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है, लेकिन यह एक तरह से उन कुनबों का ‘मिलन’ है जो जंगलराज के केंद्र में रहे हैं। इस ‘मिलन का उत्साह’ ही है कि दोनों के पार्टी में शामिल होने की तस्वीरें सोशल मीडिया में साझा करते हुए पूर्व उप मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव ने लिखा है- जीत रहे हैं हम…

यह मिलन, यह उत्साह बिहार के लिए निश्चित तौर पर चिंता के सबब होने चाहिए। यह उन तमाम चंदा बाबू से उनके पुत्र फिर से छीन सकता है जो किसी गुंडे का हुक्म मानने से इनकार कर देते हैं। वैसे भी सुशासन की हल्की बयार के बाद नीतीश कुमार ने जिस तरह राजनीतिक पलटियाँ ली है, विफलताओं को छिपाने के लिए जिस तरह ‘सुधारक’ की छवि ओढ़ने की कोशिश की है, उससे यह यकीनी तौर पर कहा भी नहीं जा सकता है बिहार जंगलराज के उस स्याह काल को काफी पीछे छोड़ आया है।

भगवा कुर्ता, शिखा… पैसे लेकर बना देता है IPS: मिथिलेश मांझी की जिस कहानी को बिहार पुलिस ने पाया फर्जी, उस पर बनी फिल्म में विलेन ‘चोटीवाला’

पिछले दिनों सोशल मीडिया पर एक मिथलेश मांझी नाम के लड़के के फर्जी आईपीएस बनकर घूमने का मामला का खूब वायरल हुआ था। मिथलेश मांझी आईपीएस की वर्दी पहन जगह-जगह घूमता था। जब एक दिन उसे पुलिस ने पकड़ा तो उसने थाने में बताया कि किसी ने उससे 2.5 लाख रुपए लिए थे और उसे ये कह दिया था कि वो अब आईपीएस बन गया है। शुरू में लोगों को उस लड़के पर दया आई कि किस तरह कोई गाँव के एक लड़के ठग सकता है। हालाँकि बाद में जब पुलिस ने इस मामले की छानबीन की तो पता चला कि मिथलेश मांझी ने पूरी कहानी फर्जी गढ़ी थी और वो खुद ही पुलिस की यूनिफॉर्म सिलवाकर घूमता था।

फर्जी आईपीएस की फर्जी कहानी पर छपी थी रिपोर्टें

इस घटना के बाद सोशल मीडिया पर तमाम तरह की प्रतिक्रिया देखने को मिलीं। पहले जहाँ लोग उसपर तरस खा रहे थे वहीं हकीकत सामने आने बाद में उसका मजाक उड़ने लगा। कायदे से मामला पूरी तरह फर्जीवाड़े का था जिसमें मिथलेश को पुलिस ने फटकार भी लगाई थी कि 420 करने के आरोप में अंदर डाल सकते हैं… उस समय शायद पुलिस से छूटने के लिए मिथलेश ने माफी भी माँगी हो या दोबारा ऐसा न करने की कसम भी खाई हो। लेकिन पुलिस से छूटने के बाद ही मिथलेश सोशल मीडिया पर कंटेंट बनाने वालों के लिए कंटेंट बन गया और उसके झूठ को मेकर्स ने खूब भुनाना शुरू कर दिया।

पुलिस की वर्दी पहन झूठी कहानी गढ़ने वाले मिथलेश को देखते ही देखते हीरो बना दिया गया। मिथलेश ने अपना यूट्यूब चैनल खोल लिया ‘Viral IPS Mithlesh’ के नाम से। इसके बाद पहले भोजपुरी इंडस्ट्री ने उसे ‘हीरो’ बनाते हुए उसपर गाना बनाया और फिर अब पता चला है कि उस लड़के की कहानी को यूट्यूब पर बाकायदा फिल्म बनाकर रिलीज किया जाने वाला है। फिल्म का टीजर भी आ गया है, जो इस समय खासी चर्चा में है। इसे विशाल म्यूजिक नाम के यूट्यूब चैनल रिलीज किया गया है।

अब आम दर्शकों को शायद लगे कि भोजपुरी गाने की तरह ये फिल्म सिर्फ मनोरंजन और पैसे के लिहाज से बनाई गई है, लेकिन हकीकत तो ये है इस फिल्म में चुपके से हिंदू घृणा फैलाने का भी काम हुआ है। कहाँ? आइए बताएँ…

दरअसल, शुरुआत में मिथलेश ने जो फर्जी कहानी सुनाई थी उसमें एक कैरेक्टर था जिसने उसे ठगा। पुलिस जाँच के बाद भले ही सामने आ गया कि ऐसा कोई व्यक्ति असल में था ही नहीं। मगर, फिल्म बनाने वावों ने इस फिल्म में वो किरदार जोड़ा है और इसे किसी ठग की वेशभूषा पहने नहीं दिखाया गया बल्कि इसे भगवा रंग के कुर्ते में और शिखा के साथ दिखाया गया है।

नीचे तस्वीर में आप फिल्म का दृश्य का स्क्रीनशॉट देख सकते हैं।

भगवा रंग और शिखा को फोकस में रखकर दिखाया गया है। मेकर्स ने ऐसा किस मंशा से किया इसका जवाब छिपा नहीं है। हिंदू घृणा से सनी मानसिकता के अलावा यूट्यूब के छोटे-छोटे कलाकार उस बॉलीवुड की कॉपी करने की पूरी कोशिश करते हैं जो साधु-संतों से जुड़ी इस वेशभूषा का मजाक दशकों से बनाता आया है।

बॉलीवुड फिल्मों में सनातन को किया गया बदनाम

आपको याद है पुरानी फिल्मों में किस तरह से फिल्मों में जब विलेन बनाए जाते थे तो उनकी माथे पर तिलक लगा दिया जाता था। धीरे-धीरे हिंदू धर्म का, हिंदू देवी-देवताओं का, धर्म के प्रतीकों का बॉलीवुड में मजाक बनने लगा और सब चुप रहे। किसी को समझ तक नहीं आता था कि इसका प्रभाव समाज पर क्या हो रहा है।

आमिर खान की ‘पीके’ फिल्म में हमने साफ तौर पर हिंदू देवी-देवताओं का मखौल उड़ते देखा, फिर अक्षय कुमार की भूल भुलैया फिल्म में छोटे पंडित के किरदार में ब्राह्मणों की ‘शिखा’ का मजाक उड़ाया गया… जहाँ मजाक उड़ाना संभव नहीं हुआ, वहाँ घृणा फैलाई गई। हिंदू संतों को धोखेबाज, ठग, अत्याचारी, दुराचारी और बलात्कारी तक दिखाया गया।

हिंदू संतों को मीट माँस खाते दिखाकर ऐसा चित्र गढ़ा गया कि एक लोगों के मन में छवि बैठ जाए कि संत बाहरी दुनिया में कुछ और निजी जीवन में कुछ होते हैं। ‘काली’ जैसी सीरिज में देवी को सिगरेट पीते दिखाया गया, अन्नापूर्णा माता के नाम पर बनाई गई फिल्म में लड़की को बिरयानी बनाते और नमाज पढ़ते दिखाया गया। सोशल मीडिया पर स्वास्तिक के निशान को नाजी का निशान बताया जाने लगा।

यहाँ तक क्रिएटिविटी के नाम पर हिंदू घृणा से सने विज्ञापन तैयार हो गए। ‘कन्यादान’ जैसी रीति को बदलने का प्रयास हुआ। बेलगामी में हिंदू संतों को बिरयानी का शौकीन दिखाया गया। कुंभ के मेले को ऐसी जगह दिखाई गई जहाँ बच्चे अपने माता-पिता को छोड़ चले जाते हैं। चाय से लेकर सर्फ बेचने के नाम पर ऐसे एड बनाए गए जिसमें हिंदुओं को असहिष्णु और मुस्लिमों को सौहार्द बनाए रखने वाला दिखाया गया।

इतना ही नहीं जिन फिल्मों में हिंदुओं को पॉजिटिव रूप में दिखाया गया उसमें जरा सा इस्लामी सोच का छौंक जरूर लगा दिया गया ताकि अगर कोई हिंदुत्व को लेकर अपनी सोच निर्मित करे तो किसी और समुदाय को कम न समझे…बजरंगी भाईजान, तानाजी, चक दे इंडिया जैसी फिल्मों में दिखाए गए किरदार इसके उदाहरण हैं।

बॉलीवुड के असर आम लोगों पर

बॉलीवुड की ऐसी हरकतों का असर आम लोगों पर क्या हुआ इसे सोच भी नहीं सकता। आम जीवन से लेकर राजनीति तक में इसका घटिया प्रभाव है। 2021 में टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा ने केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह को चोटीवाला राक्षस कहा था। आपको क्या लगता है कि ये ‘चोटीवाला राक्षस’ शब्द ने अचानक जन्म लिया होगा।

नहीं। बॉलीवुड के परोसे गंद का असर था कि ब्राह्मणों की शिखा का इस्तेमाल एक ठग को दिखाने के लिए किया गया।। अब इसी शिखा को लेकर मजाक सोशल मीडिया पर बनने लगा है। एक मनगढ़ंत विलेन को पर्दे पर दिखाने के लिए भगवा कुर्ते का प्रयोग किया जा रहा है। ऐसी रील बनाई जाती हैं जहाँ जनेऊधारी, तिलक धारी हँसी का पात्र बना दिए जाएँ या फिर समाज के लिए खतरा। वहीं दूसरे पक्ष को समाज के रक्षक के तौर पर पेश किया जाता है।

मुस्लिम भाइयों ने राम मंदिर में घुसकर पढ़ी नमाज, पुजारी बोले- रोका फिर भी मटके में रखे पानी से धोए हाथ-पैर, 20 मिनट तक परिसर में रहे: पुलिस ने नोटिस देकर छोड़ा

शाजापुर, मध्य प्रदेश: भगवान राम के मंदिर में तीन मुस्लिम व्यक्तियों द्वारा जबरन नमाज़ पढ़ने का मामला सामने आया है। आरोपितों के नाम रुस्तम, अकबर और बाबू खाँ हैं, जो आपस में सगे भाई हैं और जिनकी उम्र 65 से 85 वर्ष के बीच है। पुलिस ने इन तीनों के खिलाफ FIR दर्ज कर उन्हें हिरासत में लिया, हालाँकि बाद में नोटिस देकर छोड़ दिया गया। यह घटना शनिवार (26 अक्टूबर 2024) की है। स्थानीय हिंदू समुदाय ने इस कृत्य को अपनी धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने वाला बताते हुए कड़ी कार्रवाई की माँग की है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह घटना शाजापुर के सलसलाई थाना क्षेत्र के गाँव किलोदा में हुई, जहाँ भगवान राम का मंदिर क्षेत्रीय हिंदुओं के लिए आस्था का मुख्य केंद्र है। मंदिर के पुजारी ओमप्रकाश शर्मा ने पुलिस में तहरीर दी, जिसमें बताया गया कि शाम करीब 5:45 बजे 85 वर्षीय अकबर, 65 वर्षीय रुस्तम और 70 वर्षीय बाबू खाँ मंदिर आए थे। तहरीर में पुजारी ने बताया कि तीनों ने मंदिर में रखे मटके के पानी से हाथ-पैर धोए और मंदिर परिसर में बैठकर नमाज़ पढ़ने लगे।

ओमप्रकाश ने आगे बताया कि रुस्तम, अकबर और बाबू ने मंदिर में रखे मटके के पानी से हाथ पैर धोए। इसके बाद ये तीनों मंदिर परिसर में ही बैठ कर नमाज़ पढ़ने लगे। पुजारी के विरोध के बावजूद तीनों आरोपित लगभग 20 मिनट तक मंदिर परिसर में रुके और बाद में वहाँ से चले गए। पुलिस के मुताबिक तीनों भाई बैंक में कुछ काम कर के लौट रहे थे। तभी नमाज़ का समय हो गया और ये तीनों मंदिर परिसर में ही नमाज़ पढ़ने लगे।

घटना के बाद स्थानीय निवासियों में रोष व्याप्त हो गया। पुजारी ने अपनी तहरीर में आरोपितों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की माँग की है। पुलिस ने तुरंत मामले में केस दर्ज कर बाबू, रुस्तम और अकबर को हिरासत में लिया, और पूछताछ के दौरान आरोपितों ने अपनी गलती स्वीकार की। पुलिस ने FIR दर्ज कर इनका चालान किया, लेकिन 7 साल से कम की सजा का मामला होने के कारण इन्हें नोटिस देकर छोड़ दिया गया। मामले की जाँच और कानूनी कार्रवाई जारी है, और आगे इस पर कोर्ट में ट्रायल चलेगा।

गुजरात सरकार के पास ही रहेगी वह जमीन जिसे बुलडोजर से किया समतल, सुप्रीम कोर्ट ने नहीं मानी औलिया-ए-दीन की दलील: गिर-सोमनाथ में ढाह दिए थे अवैध मस्जिद-दरगाह

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार (25 अक्टूबर 2024) को गुजरात में चल रहे ध्वस्तीकरण अभियान पर यथास्थिति बनाए रखने का आदेश देने से इनकार कर दिया। वहीं, गुजरात सरकार ने कोर्ट कोर्ट को आश्वस्त किया कि ये जमीनें सरकार के पास रहेंगी, किसी तीसरे पक्ष को आवंटित नहीं की जाएगी। दरअसल, प्रशासन ने गिर सोमनाथ जिले में अवैध रूप से बनाए गए इस्लामी ढाँचों और मुस्लिमों के घरों को ध्वस्त किया था।

गुजरात सरकार की ओर से यह आश्वासन राज्य सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल (SG) तुषार मेहता ने सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति बीआर गवई और न्यायमूर्ति केवी विश्वनाथन की पीठ को दिया। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा, “इस मामले को देखते हुए हम कोई अंतरिम आदेश पारित करना आवश्यक नहीं समझते हैं।”

सुप्रीम कोर्ट औलिया-ए-दीन समिति की अपील पर सुनवाई कर रहा था। इसमें गुजरात हाई कोर्ट के 3 अक्टूबर के फैसले और अंतरिम आदेश को चुनौती दी गई थी। गुजरात हाई कोर्ट ने पिछले महीने सोमनाथ मंदिर के पास प्रभास पाटन गाँव में ध्वस्तीकरण पर यथास्थिति बनाए रखने का निर्देश देने से इनकार कर दिया गया था।

औलिया-ए-दीन समिति ने अपनी याचिका कहा है कि ध्वस्तीकरण अभियान में मुस्लिमों के लगभग 9 मजहबी स्थलों को ध्वस्त कर दिया गया है। इसके साथ ही कई कब्रों और दरगाहों एवं मस्जिदों को भी गिरा दिया गया है। ये सभी अवैध रूप से बनाए गए हैं। हालाँकि, मुस्लिम संस्था का कहना है कि ये सभी संरचनाएँ एक सदी से भी अधिक समय से वहाँ मौजूद थीं।

समिति की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने दावा किया कि अधिकारियों ने भूमि पर स्थित मंदिरों को छोड़ दिया और केवल इस्लामी संरचनाओं को निशाना बनाया। उन्होंने तर्क दिया, “विध्वंस का कारण यह बताया गया कि वे अरब सागर के पास हैं, जो कि एक जल निकाय के पास स्थित है। इन संरक्षित स्मारकों को जमीन पर गिरा दिया गया। क्या आप कल्पना कर सकते हैं?”

इस भूमि को किसी तीसरे पक्ष को हस्तांतरित करने का अंदेशा जताते हुए सिब्बल ने जिला कलेक्टर के साल 2015 के आदेश का हवाला दिया। उस आदेश में कहा गया था कि जिस भूमि पर ध्वस्तीकरण अभियान चलाया गया था, उसका उपयोग केवल सरकारी उद्देश्यों के लिए किया जा सकता है।

एक अन्य याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता हुजेफा अहमदी ने कहा कि उनके पास साल 1903 के भूमि आवंटन के दस्तावेज हैं और वह पंजीकृत वक्फ स्मारक को ध्वस्त कर दिया गया। उन्होंने कहा, “उन्होंने (अधिकारियों ने) मनमानी की है। अगर आवंटन या कब्जे में बदलाव होता है… तो इसे वापस पाना मुश्किल हो जाएगा।”

विरोधी पक्ष के दावों का विरोध करते हुए एसजी मेहता ने दस्तावेज पेश करते हुए कहा कि यह भूमि सोमनाथ मंदिर ट्रस्ट के कब्जे में थी। उन्होंने कहा कि केवल उन संरचनाओं को हटाया गया, जो सार्वजनिक भूमि पर अवैध रूप से अतिक्रमण कर रही थीं। उन्होंने अदालत को यह भी बताया कि प्रशासन केवल सिब्बल द्वारा संदर्भित जिला कलेक्टर के आदेश के अनुसार ही कार्य करेगा।

इसके बाद जस्टिस गवई ने कहा, “अगली तारीख तक कब्ज़ा सरकार के पास ही रहने दिया जाए”। सुप्रीम कोर्ट इस मामले की अगली सुनवाई 11 नवंबर को करेगा। इसके अलावा समस्त पटनी मुस्लिम जमात ट्रस्ट द्वारा दायर अवमानना ​​याचिका पर भी सुनवाई होगी। दोनों याचिकाओं में कहा गया है कि ध्वस्तीकरण अभियान सुप्रीम कोर्ट के 17 अक्टूबर को दिए गए आदेश का उल्लंघन है।

जिस महमूद फारूकी पर लगा था अमेरिकी महिला से रेप का आरोप, उसे IIT बॉम्बे ने दीपावली पर ‘महाभारत’ का मंचन करने बुलाया: विरोध के बाद रद्द करना पड़ा कार्यक्रम

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) बॉम्बे ने दिवाली के अवसर पर ‘महाभारत’ पर आधारित कार्यक्रम के लिए फिल्म निर्देशक महमूद फारूकी को आमंत्रित किया, जिसका तीखा विरोध छात्रों ने किया। यह कार्यक्रम ‘दास्तान-ए-कर्ण – एज़ महाभारत’ के नाम से 26 अक्टूबर की शाम को आयोजित होने वाला था।

हालाँकि एक अमेरिकी महिला के रेप के मामले में दोषी करार देने के बाद बरी किए गए महमूद फारूकी की मौजूदगी का छात्रों ने इतना तीखा विरोध किया, कि कार्यक्रम को ही रद्द करना पड़ा। छात्रों का कहना है कि रेप का आरोपित कोई व्यक्ति आईआईटी के मंच पर प्रस्तुति दे, ये आईआईटी का भी अपमान है।

IIT बॉम्बे में एक छात्र वालंटियर ग्रुप ‘IIT B फॉर भारत’ ने सबसे पहले इस आयोजन पर आपत्ति जताई। उन्होंने अपने बयान में कहा, “फारूकी को IIT बॉम्बे में बुलाने से संस्थान के सुरक्षा, सम्मान, और गरिमा के प्रति प्रतिबद्धता पर सवाल खड़े होते हैं। यौन उत्पीड़न से बचने वाले और उनके समर्थकों के लिए उनकी उपस्थिति एक असुविधाजनक और असुरक्षित माहौल बना सकती है।”

वालंटियर समूह ने आगे कहा कि IIT बॉम्बे जैसे प्रतिष्ठित संस्थान की ज़िम्मेदारी है कि वह एक ऐसा माहौल बनाए, जो सभी के प्रति सम्मान, व्यक्तिगत सीमाओं का आदर और नैतिक व्यवहार को बढ़ावा दे। इसके साथ ही, उन्होंने आयोजन को कैंसिल करने का भी अनुरोध किया। दिलचस्प बात यह है कि फारूकी को IIT परिसर के स्कूल और जूनियर कॉलेज में मुख्य अतिथि के रूप में भी आमंत्रित किया गया था, जिसने विवाद को और बढ़ा दिया।

फारूकी का नाम पहले भी विवादों में आ चुका है। उसने मुंबई हमलों में शामिल आतंकवादी अजमल कसाब के लिए दया याचिका पर हस्ताक्षर भी किए थे, जो 26/11 के हमलों में दोषी था। सोशल मीडिया पर विरोध बढ़ने के बाद, IIT बॉम्बे के प्रशासन ने इस कार्यक्रम को रद्द कर दिया।

महमूद फारूकी ने किया था अमेरिका महिला से रेप, सजा मिली, फिर बरी हो गया

आमिर खान के होम प्रोडक्शन की फिल्म ‘पीपली लाइव’ के सह निर्देशक महमूद फारूकी पर एक अमेरिकी शोधकर्ता ने यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया था। यह घटना 28 मार्च 2015 की है, जब पीड़िता फारूकी के बुलावे पर उनके घर गई थी। पीड़िता का कहना था कि जब वह वहाँ पहुँची, तो उसने फारूकी को नशे की हालत में पाया। पीड़िता के अनुसार, फारूकी ने उसके साथ जबरदस्ती की और उसकी इच्छा के खिलाफ उसके साथ ओरल सेक्स किया।

पीड़िता ने अदालत में अपनी गवाही में कहा, “उस समय उसने मुझे चूमने की कोशिश की, और मैंने ना कहा। मैंने उसे दूर धकेला, लेकिन वह नहीं रुका। उसने मेरे कपड़े उतारने की कोशिश की, और मैं उसे रोकने की कोशिश करती रही, लेकिन वह मुझसे शारीरिक रूप से अधिक ताकतवर था। मुझे समझ नहीं आया कि वह इतना ताकतवर कैसे था। उस समय मुझे निर्भया मामले की एक डॉक्यूमेंट्री का हिस्सा याद आया, जहाँ अपराधी ने कहा था कि अगर पीड़िता ने विरोध नहीं किया होता तो वह जिंदा होती। मैं उस स्थिति से बाहर निकलने की सोच रही थी, इसलिए मैंने उसका विरोध बंद कर दिया ताकि मैं बच सकूँ।”

घटना के बाद पीड़िता अपने घर लौटी और अपने एक दोस्त को फोन कर पूरी घटना बताई। इसके बाद उसने फारूकी को ईमेल भेजकर उसके अपराध के बारे में बताया। फारूकी ने इस पर प्रतिक्रिया देते हुए ‘मेरी सच्ची माफी’ लिखकर माफी माँगने का दिखावा किया था। ये पूरा मामला कोर्ट में गया और 4 अगस्त 2016 को दिल्ली की निचली अदालत ने फारूकी को दोषी करार देते हुए 7 साल की सजा सुनाई।

इस सजा के करीब एक साल बाद, दिल्ली हाई कोर्ट ने फारूकी को ‘शंका का लाभ‘ देते हुए निचली अदालत के फैसले को रद्द कर दिया। इस फैसले में एकल जज ने कहा कि फारूकी को यह नहीं समझ में आया कि पीड़िता की सहमति नहीं थी। कोर्ट ने सहमति की संकीर्ण परिभाषा दी और फारूकी का बैकग्राउंड देखते हुए कहा कि वह ऐसा अपराध करने में सक्षम नहीं हो सकते। जनवरी 2018 में, सुप्रीम कोर्ट ने भी दिल्ली हाई कोर्ट के इस फैसले को बरकरार रखा और कहा कि यह निर्णय ‘अच्छी तरह से सोचा-समझा’ था।

IIT बॉम्बे जैसे प्रतिष्ठित संस्थान में महमूद फारूकी को बुलाने को लेकर उठे इस विवाद ने कई सवाल खड़े कर दिए। वालंटियर ग्रुप ‘IIT B फॉर भारत’ जैसे समूहों ने कहा कि फारूकी की उपस्थिति से संस्थान के मानकों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है और इससे कैंपस में असुरक्षा का माहौल बन सकता है।

चंदोला झील को कचरे से भरकर बस गए बांग्लादेशी, हिंदू पहचान का कर रहे थे इस्तेमाल: गुजरात पुलिस का शिकंजा कसते ही 70% घुसपैठिए घर छोड़ भागे, नर्मदा का पानी भी रोका

गुजरात के अहमदाबाद में पकड़ाए अवैध बांग्लादेशी चंदोला झील को कचरे से भरकर अपने लिए घर बना रहे थे। अपनी जाँच में सिटी क्राइम ब्रांच ने इसका खुलासा किया है। बता दें कि शुक्रवार (25 अक्टूबर 2024) को अहमदाबाद पुलिस क्राइम ब्रांच ने 51 अवैध बांग्लादेशी अप्रवासियों को गिरफ्तार किया था। अब उन्हें वापस बांग्लादेश भेजा जाएगा। कार्रवाई के दौरान 250 व्यक्तियों से पूछताछ की गई थी।

इन अवैध बांग्लादेशियों ने झील को भरने के लिए ना सिर्फ उसमें कचरे डाल रहे थे, बल्कि झील में किसी तरह पानी ना पहुँचे इसका भी उन्होंने पूरा बंदोबस्त कर रखा था। घुसपैठियों ने झील में पानी ना जाए, इसके लिए पिराना डंपिंग साइट से कचरे लाकर नर्मदा पाइपलाइन को ब्लॉक कर दिया था। इसकी पुष्टि तब हुई जब क्राइम ब्रांच ने 1985, 2011 और 2024 की सैटेलाइट तस्वीरों की समीक्षा की।

देश गुजरात की रिपोर्ट के अनुसार, इन घुसपैठियों ने चंदोला झील के कुछ हिस्सों को भरकर उन पर अवैध घर भी बना लिए हैं। हालाँकि, चार महीनों की पुलिस कार्रवाई में इनमें से 60 से 70% घर खाली हो गए हैं। इनमें रहने वाले अधिकांश घुसपैठिए या तो भाग गए हैं या फिर पकड़े गए हैं। ये लोग नकली हिंदू नामों का इस्तेमाल करके यहाँ रह रहे थे और उस नाम से फर्जी दस्तावेज भी बना लिए थे।

पुलिस के सामने यह सबसे बड़ी समस्या ये पता लगाना है कि यहाँ से भागे आखिर कहाँ गए। क्या वे गुजरात के अन्य हिस्सों में चले या देश के अन्य हिस्सों में चले गए या फिर वापस अपने देश बांग्लादेश चले गए। पुलिस दूसरे राज्यों के साथ खुफिया सूचनाओं का आदान-प्रदान कर रही है और इसके बारे में उन्हें सूचित कर रही है। हालाँकि, भागे हुए बांग्लादेशियों के बारे में पता लगाना आसान नहीं है।

दरअसल, कुछ हफ्ते पहले फर्जी पहचान कागजात बनाने और बांग्लादेश से मानव तस्करी के जरिए महिलाओं को भारत लाने का मामला सामने आया था। इन महिलाओं से यहाँ वेश्यावृत्ति कराई जाती थी। सहायक पुलिस आयुक्त भरत पटेल ने बताया कि इन दो मामलों में 8 लोगों को गिरफ्तार किया गया है। इन लोगों के बयान पर ही पुलिस ने कार्रवाई की और 51 बांग्लादेशियों को पकड़ा।

पटेल ने बताया कि प्राथमिक जाँच में सामने आया कि ये लोग स्थानीय पहचान पत्र बनवा कर कारखानों में दिहाड़ी मजदूरी, बाँस से बनने वाले सामान बनाते और कुछ लोग भीम माँगने का काम करते थे। उन्होंने बताया कि कुछ लोग बांग्लादेश से विवाह करके युवतियों को यहाँ लाते हैं, और उनसे देह व्यापार कराते हैं। बड़े पैमाने पर राशि को हवाला से बांग्लादेश भेजने का भी पता चला है।

इससे पहले त्रिपुरा की राजधानी अगरतला रेलवे स्टेशन पर सुरक्षा एजेंसियों ने 22 अक्टूबर 2024 की सुबह तीन रोहिंग्या मुस्लिम और दो बांग्लादेशी नागरिकों को हिरासत में लिया था। राजकीय रेलवे पुलिस (GRP) के प्रभारी अधिकारी तपस दास ने कहा कि उन्हें सूचना मिली कि कुछ रोहिंग्या और बांग्लादेशी नागरिक त्रिपुरा से बाहर जाने के लिए अगरतला रेलवे स्टेशन पर आएँगे।

तपस दास ने आगे बताया कि पूछताछ में पता चला कि रोहिंग्या नागरिक हैदराबाद जाने वाले थे, जबकि बांग्लादेशी नागरिक मुंबई जाने की योजना बना रहे थे। उन्होंने कहा, “हमने उनके पास से बांग्लादेशी मुद्रा, दस्तावेज और कुछ मोबाइल फोन जब्त किए हैं।” इससे पहले पुणे से भी 21 बांग्लादेशियों को गिरफ्तार किया गया था।

महाराष्ट्र की पुणे पुलिस ने भी खुफिया सूचना के आधार पर रजनगाँव में 21 अक्टूबर 2024 को सर्च ऑपरेशन चलाकर 21 बांग्लादेशियों को गिरफ्तार किया था। पुलिस अधीक्षक पंकज देशमुख ने कहा था, “उनमें से नौ के पास फर्जी आधार कार्ड, पैन कार्ड थे और उनमें से एक के पास वोटर आईडी कार्ड भी था। बांग्लादेशी नागरिक के पास वोटर आईडी कार्ड था, उसने इसे गुजरात से हासिल किया था।”

एसपी ने कहा कि ये सभी या तो पैदल चलकर सीमा पार करते हुए पश्चिम बंगाल में यहाँ आए या फिर नावों से समुद्री मार्ग से अवैध रूप से यहाँ पहुँचे। उन्होंने कहा, “इनमें से कुछ के बच्चे भी हैं, जिनकी उम्र तीन साल से पाँच साल के बीच है। भारत में घुसने के बाद ये गुजरात और मुंबई चले गए। कुछ दिन पहले ये पुणे आए हैं।” लंबे समय रह रहे इन लोगों के पास से फर्जी भारतीय पहचान पत्र आदि भी बरामद किए गए थे।

बता दें कि पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा में भारत-बांग्लादेश सीमा पर मानव तस्करों का एक बड़ा गिरोह काम कर रहा है, जो सिर्फ कुछ हजार रुपए में बांग्लादेशी लोगों को भारत में घुसपैठ कराता है। घुसपैठ करने वालों में बांग्लादेशी के साथ-साथ रोहिंग्या मुस्लिम भी शामिल हैं। इसके बाद घुसपैठियों को फर्जी पहचान देकर जम्मू-कश्मीर, महाराष्ट्र, गुजरात, दिल्ली सहित देश के विभिन्न हिस्सों में बसाया जाता है।

हरियाणा का बदला UP में, UP का बदला महाराष्ट्र में… INDI गठबंधन में चल रहा एक-दूसरे को निपटाने का खेल: जो सीटें माँग रही सपा उन पर MVA ने उतारे उम्मीदवार, बोले अखिलेश यादव- कुर्बानी नहीं दूँगा

महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव नजदीक हैं, लेकिन महाविकास अघाड़ी (एमवीए) में सीट बंटवारे पर असहमति बढ़ती जा रही है। कॉन्ग्रेस की अगुवाई वाले इस गठबंधन में समाजवादी पार्टी (सपा) की माँगों को नजरअंदाज कर उसे ठेंगा दिखाया जा रहा है। सपा ने एमवीए से पाँच सीटों – धुले सिटी, भिवंडी पूर्व, भिवंडी पश्चिम, मालेगांव सेंट्रल और मानखुर्द – की माँग की थी।

हालाँकि, 26 अक्टूबर 2024 को एमवीए के प्रमुख दलों ने इन सीटों पर सपा की जगह अपने उम्मीदवारों की घोषणा कर दी, जिससे सपा नेतृत्व में नाराजगी फैल गई है। वैसे, इंडी गठबंधन में अखिलेश यादव को हरियाणा से लेकर मध्य प्रदेश तक कॉन्ग्रेस ने ठेंगा ही दिखाया है। ऐसे में अखिलेश यादव ने भी बयान दिया है कि वो कोई राजनीतिक बलिदान नहीं देने वाले। सहमति बनी तो ठीक, वर्ना अपने संगठन वाले इलाकों में सपा अकेले चुनाव लड़ेगी।

सपा की महाराष्ट्र इकाई के अध्यक्ष अबू आसिम आजमी ने एमवीए को पहले ही अल्टीमेटम दिया था कि अगर उनकी माँग नहीं मानी गई, तो सपा 25 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारेगी। एमवीए के नेताओं से बातचीत के बाद भी जब सीटों पर सहमति नहीं बन पाई, तो आजमी ने अपना गुस्सा जाहिर किया और एमवीए पर “विश्वासघात” का आरोप लगाया। अब सवाल उठता है कि सपा का यह कड़ा रुख गठबंधन को कितना प्रभावित करेगा और क्या इससे महाविकास अघाड़ी के चुनावी समीकरण बिगड़ सकते हैं।

सपा ने एमवीए में अनदेखी के बाद बढ़ाया दबाव

एमवीए में शिवसेना (यूबीटी), कॉन्ग्रेस और एनसीपी (शरद पवार गुट) जैसी तीन बड़ी पार्टियाँ शामिल हैं, जिन्होंने महाराष्ट्र चुनाव के लिए 85-85 सीटों पर लड़ने का निर्णय लिया है, जबकि सहयोगी दलों के लिए 15 सीटें रिजर्व रखी हैं। सपा ने इस आरक्षित कोटे में से अपनी हिस्सेदारी की माँग की, लेकिन इस पर अब तक कोई स्पष्ट निर्णय नहीं लिया गया है। एमवीए के शीर्ष नेताओं के साथ हुई बैठक में भी सपा को कोई आश्वासन नहीं दिया गया, जिसके बाद आजमी ने एमवीए से अलग चुनाव लड़ने का इरादा जाहिर किया।

अबू आजमी ने मीडिया से कहा, “हमने शरद पवार जी से बात की थी और अपनी माँग उनके सामने रखी थी। उन्होंने कहा था कि आज (26 अक्टूबर 2024) इस पर निर्णय लेंगे, लेकिन मुझे आज कोई फोन नहीं आया। एमवीए के सहयोगियों द्वारा हमारे माँग वाली सीटों पर उम्मीदवारों की घोषणा हो गई है। ऐसा लगता है कि एमवीए में शामिल दल सपा को सीटें नहीं देना चाहते।”

अखिलेश यादव बोले- गठबंधन हुआ तो ठीक, वर्ना ‘राजनीति में कोई बलिदान नहीं’

समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने भी इस मामले पर अपनी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा, “महाराष्ट्र में सपा का प्रदेश अध्यक्ष ही निर्णय करेगा – पहले हम गठबंधन में बने रहने की कोशिश करेंगे। लेकिन, अगर महाविकास अघाड़ी हमें गठबंधन में नहीं रखना चाहती, तो हम उन सीटों पर लड़ेंगे, जहाँ हमारा संगठन मजबूत है या हमें वोट मिल सकते हैं। हम उन सीटों पर चुनाव लड़ेंगे, जिनसे गठबंधन को नुकसान न हो। पर राजनीति में बलिदान की कोई जगह नहीं है।”

यादव के इस बयान से सपा की रणनीति साफ हो गई है। पार्टी पहले एमवीए का हिस्सा बने रहना चाहती है, परंतु सीटों की अनदेखी होने पर अपने दम पर चुनाव लड़ने का मन बना चुकी है। बता दें कि महाराष्ट्र में 20 नवंबर को वोटिंग होने वाली है, जिसमें अब बहुत कम समय बचा है। अधिकतर दलों ने अपने उम्मीदवारों की घोषणा कर दी है।

क्या एमवीए की चुनावी समीकरणों पर असर होगा?

अगर सपा एमवीए से अलग होकर अपने उम्मीदवार उतारती है, तो इससे गठबंधन के वोट बैंक पर असर पड़ सकता है। सपा का प्रभाव खासकर मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में है, जहाँ उसकी मजबूत पकड़ है। इसके अलावा, सपा का एमवीए से अलग होकर चुनाव लड़ना मुस्लिम वोटों के विभाजन का कारण बन सकता है, जिसका सीधा फायदा महायुति (बीजेपी और सहयोगी दलों) को हो सकता है। इससे महाविकास अघाड़ी के लिए चुनौती बढ़ सकती है, जो पहले से ही महायुति के खिलाफ संघर्ष में है।

एमवीए का नेतृत्व, विशेषकर कॉन्ग्रेस, अभी तक सपा की माँगों को लेकर कोई ठोस कदम नहीं उठा पाया है, जो सपा के लिए निराशाजनक है। वहीं, एमवीए के शीर्ष नेताओं के बीच भी इस मामले को लेकर कोई स्पष्ट स्थिति नहीं बन पाई है। अगर गठबंधन में यह असहमति बढ़ती है, तो एमवीए को इस चुनाव में कई जगहों पर नुकसान झेलना पड़ सकता है। अखिलेश यादव और अबू आजमी का कड़ा रुख और अपने दम पर चुनाव लड़ने की चेतावनी इस बात का संकेत है कि सपा अब इस मुद्दे पर कोई समझौता करने को तैयार नहीं है।

50 दुर्गा प्रतिमाओं का होता था विसर्जन, इस बार 20 ही आईं, क्योंकि इस्लामी कट्टरंपथियों ने राम गोपाल मिश्रा को मार डाला: पुजारी ने बताया- किसी मूर्ति के हाथ थे टूटे तो किसी के पैर

उत्तर प्रदेश के बहराइच जिले में 13 अक्टूबर को माँ दुर्गा की प्रतिमा विसर्जित करने जा रहे श्रद्धालुओं पर मुस्लिम भीड़ ने हमला किया था। इसमें रामगोपाल मिश्रा नाम के शख्स की हत्या कर दी गई थी। यह विसर्जन यात्रा पारम्परिक थी, जो दशकों से चली आ रही थी। यात्रा गौरिया घाट पर जाकर समाप्त होना था, जो आसपास के हिन्दुओं के लिए पौराणिक काल से आस्था का केंद्र है।

ऑपइंडिया की टीम इस गौरिया घाट पर पहुँची और यहाँ के पुजारी कृष्ण कुमार मिश्रा से बात की। उन्होंने हमें बताया कि हर साल के मुकाबले इस बार का विसर्जन न सिर्फ फीका, बल्कि निराशाजनक रहा। जिस महराजगंज बाज़ार में मुस्लिम भीड़ ने बवाल काटा था, वहाँ से गौरिया घाट की दूरी लगभग डेढ़ किलोमीटर है। आसपास के लगभग 18 गाँवों व कस्बों का मूर्ति विसर्जन यहीं होता है।

इस जगह पर सरयू नदी से फूटी एक जलधारा है, जिसके पास एक मंदिर बना है। इस मंदिर का नाम नागेश्वरनाथ बालाजी मंदिर है। प्रतिमा विसर्जन के बाद श्रद्धालु यहाँ स्नान करके मंदिर में दर्शन करते हैं और फिर अपने-अपने घर की ओर लौट जाते हैं। जब ऑपइंडिया की टीम यहाँ पहुँची तो देखा कि रास्ते के दोनों तरफ पुलिस तैनात है। हमें रोक कर पूछताछ भी की गई।

विसर्जन के दिन सूना रहा घाट

नागेश्वरनाथ बालाजी मंदिर के पुजारी कृष्ण कुमार मिश्रा ने हमें बताया कि सामान्य तौर पर हर साल यहाँ लगभग 50 मूर्तियाँ विसर्जित होती हैं। लेकिन, इस साल विसर्जन की तय तिथि 13 अक्टूबर को एक भी मूर्ति घाट पर नहीं आई। विसर्जन देखने के लिए आसपास के गाँवों के लोग भी जमा होते हैं। वो भी काफी देर तक इंतजार किए। इस बीच पता चला कि महराजगंज बाजार में हमला हो गया है तो सभी लोग अपने घरों को वापस लौट गए।

किसी मूर्ति का हाथ टूटा था तो किसी का सिर

पुजारी कृष्ण कुमार मिश्रा हमें बताते हैं कि तय तिथि के एक दिन बाद 14 अक्टूबर को माँ दुर्गा की मूर्तियाँ विसर्जित होने के लिए घाटों पर आईं। इस बार विसर्जित होने वाली प्रतिमाओं की संख्या 20-25 ही थी। उन्होंने दावा किया कि इनमें से कई प्रतिमाएँ क्षतिग्रस्त थीं। कुछ के हाथ टूटे हुए थे तो किसी के पैर। पुजारी ने कहा, “लोगों (हमलावरों) ने वहाँ (महराजगंज बाजार) में तोड़ा था।”

सुबह 5 बजे विसर्जित हुईं इन मूर्तियों के साथ बड़ी संख्या में पुलिस बल भी चल रहा था और श्रद्धालुओं की संख्या न के बराबर थी। विधि-विधान पूरा करने के लिए कुछ पुजारी जरूर आए थे। 55 वर्षीय पुजारी मिश्रा ने आगे बताया कि उन्होंने अपने पूरे जीवन में इतना नीरस विसर्जन कभी नहीं देखा था। उन्होंने कहा, “कोई उत्साह नहीं था। बस एक प्रक्रिया और औपचारिकता पूरी की गई।”

सात्विक खान-पान वाले हिन्दू पर उग्रता का आरोप निराधार

बहराइच में हुई हिंसा को वामपंथी व इस्लामी मीडिया संस्थानों द्वारा हिन्दुओं की उग्रता का परिणाम बताया। इन आरोपों को पुजारी मिश्रा ने निराधार बताया। उन्होंने कहा कि हिन्दुओं का खानपान सात्विक है। वो वो उग्र कैसे हो सकता है? बकौल पुजारी, कट्टरता दूसरे पक्ष द्वारा शुरू की गई जिसकी वजह से हिंसा भड़की। उन्होंने बुलडोजर की कार्रवाई का समर्थन किया।

पुजारी मिश्रा ने हमलावरों के खिलाफ और कठोर कदम उठाने की माँग की। अपने मंदिर के आसपास तैनात पुलिस फ़ोर्स को पुजारी ने प्रशासन द्वारा एहतियातन किया गया सुरक्षा प्रबंध बताया। जिस गौरिया घाट पर माँ दुर्गा की प्रतिमाओं का विसर्जन होना था, वहीं पर भगवान गणेश की भी मूर्तियाँ विसर्जित होती हैं। हर साल यहाँ मेला लगता है, जिसमें तमाम गाँवों के हिन्दू हिस्सा लेते हैं।

पुजारी कृष्ण कुमार बताते हैं कि साल 1992 में भी मुस्लिम पक्ष द्वारा विसर्जन यात्रा में खलल डालने की साजिश रची गई थी। हालाँकि, तब किसी प्रकार की जनहानि नहीं हुई थी। ऑपइंडिया से बातचीत में कुछ घायल बुजुर्ग श्रद्धालुओं ने भी साल 1992 में मुस्लिम पक्ष द्वारा तनाव फैलाने का आरोप लगाया गया। इस बार भी उन्होंने मुस्लिम पक्ष को ही जिम्मेवार माना।

जो वकील मुस्लिमों को हथियार चलाने की ट्रेनिंग देने का पैरोकार, उस पर लगा जुर्माना सुप्रीम कोर्ट ने रोका: हाई कोर्ट ने ‘व्यवहार’ में पाया था खोट

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार (25 अक्टूबर 2024) को अधिवक्ता महमूद प्राचा के खिलाफ दिए गए इलाहाबाद हाई कोर्ट के निर्देश पर रोक लगा दी। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने महमूद प्राचा पर फोरम शॉपिंग करने और व्यक्तिगत रूप से याचिकाकर्ता होने के बावजूद वकील की पोशाक और बैंड पहनकर इस मामले पर बहस करने पर 1 लाख रुपए का जुर्माना लगाने का निर्देश दिया था।

न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति उज्जल भुइयाँ की खंडपीठ ने कहा, “सीमित उद्देश्य के लिए नोटिस जारी करें कि याचिकाकर्ता के खिलाफ उच्च न्यायालय द्वारा की गई टिप्पणियों को क्यों न हटा दिया जाए और जुर्माना लगाने वाले आदेश को क्यों न रद्द कर दिया जाए। इस पर 09.12.2024 को जवाब दिया जाना चाहिए। इस बीच, जुर्माना लगाने की दिनांक 10.09.2024 के विवादित आदेश पर रोक रहेगी।”

दरअसल, प्राचा ने रामपुर लोकसभा सीट की पूरी चुनावी प्रक्रिया के वीडियो के सत्यापन की माँग करते हुए इलाहाबाद उच्च न्यायालय का रुख किया था। उन्होंने साल 2024 के आम चुनावों के दौरान एक निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा था। दिल्ली उच्च न्यायालय के समक्ष उनकी याचिका के आधार पर भारत के चुनाव आयोग द्वारा उन्हें ये वीडियो उपलब्ध कराए गए थे।

इस मामले पर 10 सितम्बर 2024 को इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस शेखर बी सर्राफ और जस्टिस मंजीव शुक्ला की बेंच ने प्राचा की एक याचिका पर सुनवाई की। हाई कोर्ट ने कहा था कि इसी मामले प्राचा दो याचिकाएँ दिल्ली हाई कोर्ट में पहले ही डाल चुके हैं और वहाँ उनकी इच्छा के अनुसार निर्देश भी कोर्ट दे चुका है। प्राचा ने दिल्ली हाई कोर्ट के निर्णयों से संतुष्टि भी जताई थी।

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा था कि इसके बावजूद प्राचा ने फिर इसी मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट में एक याचिका ठोंक दी। हाई कोर्ट ने कहा था कि जब उनकी समस्या दिल्ली हाई कोर्ट से हल हो चुकी है तो आखिर वह इलाहाबाद में वैसी ही याचिका लेकर क्यों आए। कोर्ट ने कहा कि वह इसके पीछे का कारण समझ नहीं पा रहा कि एक ही विषय पर दो अलग अलग हाई कोर्ट में याचिका क्यों डाली गई।

कोर्ट ने कहा था, “यह अदालत याचिकाकर्ता द्वारा किए जा रहे इस बदलाव को समझ नहीं पा रही, जब याचिकाकर्ता ने दिल्ली उच्च न्यायालय के समक्ष रिकॉर्ड में कहा था कि उसकी चिंता का समाधान हो चुका है। याचिकाकर्ता बीच रास्ते में कूद नहीं सकता नहीं ही अपना मन बदल सकता है, वह अपने मन से अपनी पसंद का मंच नहीं चुन सकता। अगर उन्हें समस्या थी तो वह एक बार फिर दिल्ली हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटा सकते थे क्योंकि मामला तो वही है।”

हाई कोर्ट ने समय खराब करने के अलावा प्राचा के व्यवहार पर भी सवाल उठाए। हाई कोर्ट ने कहा कि उसे फैसला सुनाने के बाद पता चला कि प्राचा खुद ही इस मामले में पेश हो रहे हैं। कोर्ट ने कहा कि उन्होंने अपने एक वकील के माध्यम से यह याचिका दायर की थी, ऐसे में वह खुद इस मामले में बहस नहीं कर सकते थे। इसके लिए उन्हें अपने वकील का नाम हटाना पड़ता, लेकिन उन्होंने ऐसा किए बिना ही बहस करना चालू कर दिया।

हाई कोर्ट ने कहा था कि प्राचा ने अपना कोट पर पहने जाने वाला बैंड बिना हटाए बहस की, जो सही नहीं है। कोर्ट ने कहा कि उन्हें डेकोरम बना कर रखना चाहिए था। हाई कोर्ट ने प्राचा की याचिका इस सुनवाई के बाद खारिज कर दी और उन पर ₹1 लाख का जुर्माना भी लगा दिया। प्राचा को आगे उनके व्यवहार के लिए चेतावनी भी दी गई है।

कौन है महमूद प्राचा?

महमूद प्राचा दिल्ली दंगा में ‘पीड़ितों’ का केस मुफ्त में लड़ने का दावा करता है और भारत में अघोषित आपातकाल के नैरेटिव को आगे बढ़ाता है। न सिर्फ कोर्ट में, बल्कि सोशल मीडिया के माध्यम से भी वो इस्लामी प्रोपेगंडा फैलाने में दक्ष है। दिल्ली दंगों में ये आरोपित मुस्लिम दंगाइयों का वकील है।

NDA के सत्ता में आने से पहले महमूद प्राचा की ऐसी तूती बोलती थी कि वो राष्ट्रीय महिला आयोग, राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग, दिल्ली सफाई कर्मचारी कमीशन और भारतीय खाद्य संरक्षा एवं मानक (FSSAI) जैसी सरकारी संस्थाओं के लिए कोर्ट में पेश को चुका है। वो सुप्रीम कोर्ट में हरियाणा का एडिशनल अधिवक्ता रहा है। साथ ही AIIMS दिल्ली का स्टैंडिंग काउंसल और दिल्ली लॉ स्कूल के छात्र संघ का अध्यक्ष रहा है।

जमात उलेमा-ए-हिन्द ने महमूद प्राचा को कई आतंकवादियों का केस लड़ने के लिए हायर किया था। वकील महमूद प्राचा ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के दिल्ली ब्रांच का सदस्य है। साउथ एशिया माइनॉरिटी लॉयर्स एसोसिएशन का वो अध्यक्ष है। जुलाई 2017 से वो अमेरिका के ‘ब्लैक लाइव्स मैटर्स’ की तर्ज पर भारत में ‘दलित, माइनॉरिटी एंड ट्राइबल लाइव्स मैटर्स’ नामक अभियान चला रहा है।

उसने 2004 में जम्मू कश्मीर के मसले में अमेरिका की मध्यस्तथा की माँग की थी, जबकि ये भारत का आंतरिक मामला है। महमूद प्राचा ‘भीम आर्मी’ से तो जुड़ा ही हुआ है, साथ ही ‘रावण’ को दरियागंज में हुई हिंसा के मामले में कोर्ट में डिफेंड भी कर चुका है। उसने मेवात के मुस्लिम बहुल इलाके में जाकर भड़काऊ भाषण दिया था और CAA विरोधी आंदोलन को हवा दी थी। उसने तब खुलासा किया था कि पूरे बिहार में 1500 शाहीन बाग़ चल रहे हैं और इसमें मुस्लिम महिलाओं का सबसे ज्यादा योगदान है।

दिल्ली हाईकोर्ट में कपिल मिश्रा सहित अन्य भाजपा व संघ नेताओं के खिलाफ केस करने में उसका सबसे बड़ा हाथ था। साथ ही उसे NPR के खिलाफ भी मुस्लिमों को भड़काया था। उसने दावा किया कि असम में ‘बाहरी’ मारवाड़ियों ने पूरे व्यापार पर कब्जा कर रखा था, इसीलिए NRC लाई गई। उसने बड़े उद्योगपतियों पर RSS को लोन देने का आरोप लगाया और यहाँ तक दावा कर बैठा कि जिनका नाम NRC में नहीं आएगा, उनके बैंक एकाउंट्स के रुपए सरकार खा जाएगी।

उसने मुस्लिम बहुल इलाकों में घूम-घूम कर लाइसेंसी हथियारों की खरीद-बिक्री करने की सलाह दी थी और उन्हें ‘आत्मरक्षा’ के लिए हथियार रखने को कहा था। उसने मुस्लिमों को यहाँ तक सलाह दी थी कि भले ही उनकी संपत्ति बिक जाए, वो बन्दूक जरूर रखें।

महमूद प्राचा ने विभिन्न मस्जिदों में मुस्लिमों को बंदूक चलाने की ट्रेनिंग देने के लिए कैंप लगाने की भी वकालत की थी। उसने मस्जिदों में मार्शल आर्ट्स से लेकर हर फिजिकल ट्रेनिंग की बात करते हुए कहा था कि आज देश के SC/ST और मुस्लिमों के पास यही एकमात्र विकल्प बचा है।

अब भी टीम इंडिया नंबर 1, पर टेस्ट में 1 और हार बदल देगा गणित: जानिए न्यूजीलैंड की लगातार 2 जीत से कितना बदला WTC पॉइंट्स टेबल, फाइनल में कैसे पहुँचेगा भारत

वर्ल्ड टेस्ट चैंपियनशिप (WTC) के 2023-25 सत्र में भारतीय टीम की उम्मीदों को लगातार दूसरे टेस्ट में मिली हार ने बड़ा झटका दिया है। भारतीय टीम ने न्यूज़ीलैंड के खिलाफ पुणे में हुए दूसरे टेस्ट मैच में 113 रनों से हार का सामना किया, जो टीम के लिए इस सीरीज में दूसरी हार थी। न्यूज़ीलैंड के ऑलराउंडर मिचेल सैंटनर ने इस मुकाबले में कुल 13 विकेट लेकर भारतीय बल्लेबाजों को परेशानी में डाल दिया। न्यूज़ीलैंड से लगातार दो हार के बाद अब भारत के लिए फाइनल में पहुँचना मुश्किल हो सकता है, और टीम को अब बचे हुए मैचों में जीत दर्ज करनी होगी।

अंक तालिका में भारत की स्थिति और आगे का रास्ता

मौजूदा समय में भारत WTC पॉइंट्स टेबल में 62.82 प्रतिशत अंकों (PCT%) के साथ पहले स्थान पर है, जबकि ऑस्ट्रेलिया 62.50% के साथ दूसरे स्थान पर है। हालाँकि भारत अभी टॉप पर बना हुआ है, लेकिन ऑस्ट्रेलिया के साथ अब उसका अंतर काफी कम हो गया है। भारत को फाइनल में अपनी जगह पक्की करने के लिए शेष छह में से चार टेस्ट मैच जीतने होंगे।

भारत के पास न्यूज़ीलैंड के खिलाफ एक घरेलू मैच और ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ पाँच विदेशी मैच बचे हैं। टीम को अगर फाइनल में पहुँचना है, तो उसे न्यूज़ीलैंड के खिलाफ अंतिम मैच जीतना ही होगा और ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ कम से कम 3-2 का जीत हासिल करनी होगी। इससे भारत का PCT% बढ़कर लगभग 64.04% हो सकता है, जिससे उसकी स्थिति फाइनल में पहुँचने के लिए मजबूत हो जाएगी। लेकिन अगर भारत न्यूज़ीलैंड के खिलाफ अंतिम मैच हारता है तो स्थिति और कठिन हो सकती है।

अन्य टीमों की स्थिति जानिए

वर्ल्ड टेस्ट चैंपियनशिप के फाइनल में पहुँचने की दौड़ में पाँच टीमें शामिल हैं, जिनमें भारत, ऑस्ट्रेलिया, श्रीलंका, न्यूज़ीलैंड और दक्षिण अफ्रीका प्रमुख हैं।

ऑस्ट्रेलिया: ऑस्ट्रेलिया अभी दूसरे स्थान पर है। अब ऑस्ट्रेलिया अगर श्रीलंका के खिलाफ अपने बचे हुए दो मैचों में 2-0 से जीतता है, तो उसका PCT% 60.53% तक पहुँच सकता है। अगर वह भारत को 3-2 से हरा दे, तो भी भारत को फाइनल में पहुँचने के लिए अन्य मैचों में अच्छा प्रदर्शन करना होगा।

न्यूज़ीलैंड: अगर न्यूज़ीलैंड भारत के खिलाफ अंतिम मैच हार जाता है और इंग्लैंड के खिलाफ 3-0 से जीत दर्ज करता है, तो उसका PCT% 57.14% तक जा सकता है। ऐसे में भारत के लिए न्यूज़ीलैंड के मुकाबले बेहतर प्रदर्शन करना महत्वपूर्ण होगा।

दक्षिण अफ्रीका: दक्षिण अफ्रीका इस समय पाँचवें स्थान पर है और उसे अपने शेष पाँच मैच जीतने होंगे ताकि उसका PCT% 61.11% तक पहुँच सके। अगर वह ऐसा करने में सफल होता है, तो वह भारत को चुनौती दे सकता है।

श्रीलंका: श्रीलंका भी अपनी स्थिति को मजबूत करने की कोशिश कर रहा है और उसके पास 55.56% PCT% है। हालाँकि, उसे भी कई जीतें दर्ज करनी होंगी ताकि वह फाइनल की दौड़ में बना रह सके।

फाइनल में पहुँचने के लिए भारत को क्या करना होगा?

भारत को न्यूज़ीलैंड के खिलाफ आखिरी टेस्ट जीतना अनिवार्य होगा। इसके बाद, ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ ऑस्ट्रेलिया में होने वाली टेस्ट सीरीज में भी कम से कम 3-2 से जीत दर्ज करनी होगी। यदि ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ भारत को 2-2 का परिणाम मिलता है, तो उसका PCT% 60.53% रहेगा, जो ऑस्ट्रेलिया के संभावित 62.28% से कम होगा।

हालाँकि, अगर अन्य टीमों के प्रदर्शन में कमी आती है, तो भारत के पास थोड़ी राहत मिल सकती है। उदाहरण के लिए, यदि न्यूज़ीलैंड इंग्लैंड के खिलाफ 2-0 से हारता है या दक्षिण अफ्रीका अपने बचे हुए मैचों में से एक मैच हारता है, तो भारत की फाइनल में पहुँचने की संभावना बढ़ जाएगी।

भारत के लिए वर्ल्ड टेस्ट चैंपियनशिप के फाइनल में पहुँचने की राह अब कठिन होती दिख रही है। टीम को अब अगले मैचों में लगातार जीत हासिल करनी होगी और अन्य टीमों के प्रदर्शन पर भी नजर रखनी होगी।