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‘आस्था हो तो भगवान निकाल देते हैं रास्ता’: CJI चंद्रचूड़ ने बताया रामजन्मभूमि विवाद के समय कैसे खोजा समाधान, बोले- मैं रोज करता हूँ पूजा

चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा है कि अयोध्या राम जन्मभूमि पर चले मुकदमे में रास्ता निकालने के लिए उन्होंने भगवान का सहारा लिया। चीफ जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि अगर किसी को आस्था है भगवान रास्ता निकाल ही देते हैं। चीफ जस्टिस चंद्रचूड़ उस बेंच में शामिल थे, जिसने अयोध्या के रामजन्मभूमि विवाद पर फैसला दिया था।

चीफ जस्टिस चंद्रचूड़ ने एक कार्यक्रम के दौरान कहा, “कई बार हमारे पास निर्णय के लिए मामले होते हैं, लेकिन हम समाधान पर नहीं पहुँच पाते। अयोध्या के राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद के दौरान भी कुछ ऐसा ही हुआ, यह मामला तीन महीने तक हमारे सामने रहा। इसके बाद मैं भगवान के सामने बैठा और उनसे कहा कि उन्हें ही अब इसका समाधान खोजना होगा।”

चीफ जस्टिस चंद्रचूड़ ने बताया कि वह रोज पूजा करते हैं। उन्होंने बताया, “मेरा विश्वास करें, अगर आपमें आस्था है, तो भगवान हमेशा कोई ना कोई रास्ता निकाल देंगे।” यह सारी बातें जस्टिस चंद्रचूड़ ने महाराष्ट्र के कन्हेरसर गाँव में कहीं। यह उनका पैतृक गाँव है, यहाँ वह अपने लोगों से बात कर रहे थे।

जस्टिस चंद्रचूड़ उस बेंच का हिस्सा थे जिसने रामजन्मभूमि पर अधिकार को लेकर मुकदमे में फैसला दिया था। 9 नवम्बर, 2019 को यह फैसला चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की बेंच ने दिया था। पाँच जजों की इस बेंच में वर्तमान चीफ जस्टिस चंद्रचूड़ भी शामिल थे।

इस बेंच ने फैसला दिया था कि विवादित बाबरी मस्जिद की पूरी जमीन हिन्दू पक्ष को दे दी जाए। इस मुकदमे में रामलला विराजमान और हिन्दू पक्ष की जीत हुई थी। इसके बाद यहाँ राम मंदिर का निर्माण चालू हो गया था। राम मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा 22 जनवरी, 2024 को हुई थी। वर्तमान में मंदिर के बाकी हिस्से पर निर्माण चल रहा है।

सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिम पक्ष को भी अयोध्या में 5 एकड़ जमीन देने का आदेश दिया था। चीफ जस्टिस चंद्रचूड़ आगामी 10 नवम्बर, 2024 को सेवानिवृत्त होने वाले हैं। वह 9 नवम्बर, 2022 को देश के 51वें चीफ जस्टिस बने थे। उन्होंने जस्टिस संजीव खन्ना को देश के अगले चीफ जस्टिस के रूप में नामित किया है।

सिर फोड़ा, जबड़ा फाड़ा: बहराइच में सुधाकर तिवारी पर भी टूटी थी इस्लामी भीड़, भाई ने बताया- मस्जिद के पास बेहोश मिले थे, सबसे ज्यादा हमले यहीं हुए

उत्तर प्रदेश के बहराइच जिले में रविवार (13 अक्टूबर 2024) को भड़की हिंसा में रामगोपाल मिश्रा नाम के युवक की मुस्लिम भीड़ द्वारा हत्या कर दी गई थी। इस हत्याकांड के बाद देश की वामपंथी व इस्लामी मीडिया ने एक प्रोपोगेंडा चलाया जिसमें माँ दुर्गा के विसर्जन में जा रहे श्रद्धालुओं को ही खलनायक दिखाया जाने लगा। जोर-शोर से प्रचार किया जाने लगा कि माँ दुर्गा के भक्तों ने एकजुट हो कर मुस्लिमों के घरों और दुकानों पर हमले किए। बहराइच पुलिस ने भी तब तक सबूत नहीं माँगे। ऑपइंडिया ने इन आरोपों की पड़ताल घटनास्थल पर जाकर की तो मामला उलटा निकला। यहाँ मुस्लिम भीड़ के हमले में हिन्दू ही प्रताड़ित मिले।

रामगोपाल की हत्या करने के साथ मुस्लिम भीड़ ने कई हिन्दुओं को अधमरा कर दिया था। उन्हीं में से एक पीड़ित हैं सुधाकर तिवारी। सुधाकर तिवारी हरदी थानाक्षेत्र के ही रहने वाले हैं। वो खेती-किसानी करके परिवार पालते हैं। उनकी 3 बेटियाँ व एक छोटा बेटा है। सबसे बड़ी बेटी की की शादी इसी साल होने वाली है। धारदार हथियारों से गंभीर रूप से घायल सुधाकर तिवारी को बहराइच से लखनऊ रेफर किया गया था। डॉक्टरों के अथक प्रयास से सुधाकर तिवारी की जान बच तो गई लेकिन गहरे घाव देह पर अभी भी देखे जा सकते हैं।

पुलिस के लाठीचार्ज से भटक गए थे राह

ऑपइंडिया ने सुधाकर तिवारी के भाई प्रभाकर से बात की। प्रभाकर ने हमें बताया कि उनके भाई माँ दुर्गा के विसर्जन जुलूस में शामिल थे। उनके पास एक वीडियो भी है जब वो शांतिपूर्वक विसर्जन यात्रा में आगे बढ़ रहे थे। इसी दौरान विसर्जन यात्रा पर पुलिस का लाठीचार्ज हुआ जिसमें सुधाकर तिवारी रास्ता भटक गए। प्रभाकर बताते हैं कि उनके भाई लाठीचार्ज से बचने के लिए जिस गली में गलती से चले गए वो मुस्लिम बहुल थी। इस गली में मांस बेचने वालों की दुकानें हैं।

प्रभाकर बताते हैं कि जब उनके भाई उस मुस्लिम बहुल गली में पहुँचे तब वहाँ कुछ हमलावरों ने रोक लिया। सुधाकर के सिर और जबड़े पर धारदार हथियार और लाठी-डंडों से वार किया गया। लहूलुहान सुधाकर जमीन पर गिर गए और बेहोश हो गए। दावा है कि सुधाकर को हमलावर भीड़ ने मरा जानकर वहीं छोड़ दिया और आगे बढ़ गई। मस्जिद के पास बेहोशी की हालत में मिले सुधाकर को सरकारी एम्बुलेंस ने स्थानीय अस्पताल पहुँचाया। एक लाइन में प्रभाकर ने स्वीकारा, “मस्जिद के पास से ही ज्यादा हमले हुए।”

हालत थी गंभीर, पहले बहराइच फिर लखनऊ रेफर

प्रभाकर तिवारी ने ऑपइंडिया को आगे बताया कि उनके भाई को इतनी बेरहमी से मारा गया था कि स्थानीय अस्पताल ने इलाज के लिए बहराइच मेडिकल कॉलेज रेफर कर दिया था। यहाँ पहुँचने के बाद मेडिकल कॉलेज के डॉक्टरों ने भी स्थिति को गंभीर बताते हुए लखनऊ रेफर किया। लखनऊ जाते समय एम्बुलेंस में कोई पुलिस स्टाफ मौजूद नहीं था। लखनऊ मेडिकल कॉलेज में लगभग 5 दिनों तक सुधाकर तिवारी का इलाज चला तब जाकर उनकी जान बच पाई।

एम्बुलेंस से अस्पताल जाते सुधाकर तिवारी की कुछ तस्वीरें भी ऑपइंडिया के पास मौजूद हैं। इन तस्वीरों में सुधाकर का जबड़ा फटा हुआ है जिससे खून बह रहा है। CT स्कैन सहित इलाज में लगे कई शुरुआती ख़र्च सुधाकर के परिजनों ने किए। बाद में कुछ इलाज सरकारी खर्चे पर हुआ। रविवार (20 अक्टूबर) को सुधाकर तिवारी को वापस घर लाया गया है। उनके तमाम घाव और उन पर बँधी पट्टियाँ अभी भी साफ़ देखी जा सकती हैं। जबड़ा फट जाने की वजह से सुधाकर तिवारी बोलने में असहज हैं।

धार्मिक माहौल वाले घर में मच गई चीख पुकार

प्रभाकर तिवारी हमें आगे बताते हैं कि उनका पूरा परिवार धार्मिक है जो माँ दुर्गा की पूरी नवरात्रि व्रत रखता है। विसर्जन के दिन जैसे ही उनके परिजनों को पता चला कि सुधाकर हमले के शिकार हो गए तो घर में चीख-पुकार मच गई। औरतें परिवार में रो रहीं थीं तो पुरुष सुधाकर की तलाश में निकल पड़े थे। आखिरकार अपना खून आदि देकर जैसे-तैसे सुधाकर तिवारी की जान बच पाई। प्रभाकर को आशंका है कि घटना के दिन सिर पर लाल गमछा देख कर ही भीड़ में हमलावरों ने उनके भाई को टारगेट पर लिया होगा।

मुस्लिम बहुल हो जाए तो भविष्य में प्रदेश देश भी छोड़ दें?

प्रभाकर तिवारी का कहना है कि जिस रास्ते से इस बार माँ दुर्गा की विसर्जन यात्रा इस्लामी भीड़ के हमले का शिकार बनी उसे मुस्लिम बहुल जैसा क्षेत्र कहना बेतुकी बात है। उन्होंने रास्ते को मुस्लिम इलाका कहने वालों से सवाल कर डाला। प्रभाकर ने कहा, “जिस रास्ते पर हमला हुआ वहीं से विसर्जन यात्रा हर साल निकलती है। अब मुस्लिम बहुल जैसे कुतर्क देना कहीं से उचित नहीं। क्या भविष्य में मुस्लिम बहुल हो जाए तो प्रदेश और देश भी छोड़ना पड़ेगा ?” प्रभाकर ने ऐसे बातें करने वालों को भी सोच-समझकर बोलने की सलाह दी।

उन्नाव के एक गाँव में शिव मंदिर का जीर्णोद्धार नहीं कर सकते हिंदू, क्योंकि मुस्लिम बहुसंख्यक हैं-पास में ही है मस्जिद: ऑपइंडिया ने पूछा सवाल तो जवाब देने में आनाकानी करने लगा SHO

उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के रानीपुर गाँव में स्थित मंदिर के जीर्णोद्धार को इस्लामी कट्टरपंथियों ने रोकने का प्रयास किया है। बीघापुर कोतवाली की निबई चौकी के अंतर्गत आने वाले इस गाँव में निहाल, अनीस खान, असगर खान, शोएब, सलीम, यूनुस, अच्छे, रईस जैसे स्थानीय कट्टरपंथियों का कहना है कि मंदिर के निर्माण से मस्जिद में नमाज़ के समय बाधा उत्पन्न होगी, क्योंकि मस्जिद केवल 100 मीटर की दूरी पर स्थित है।

रानीपुर गाँव मुस्लिम बहुल है, जहाँ सवा सौ से अधिक मुस्लिम परिवार और केवल 25-30 हिंदू परिवार रहते हैं। इस गाँव में एक शिव मंदिर है, जो 70 वर्ष से भी अधिक पुराना है। इस मंदिर के चबूतरे पर हिंदू परिवार अपने धार्मिक कार्य जैसे मुंडन, छेदन और शादी-विवाह संपन्न करते हैं। मंदिर के चबूतरे पर चारों ओर दीवारें और खंभे खड़े हैं, लेकिन छत डालने का कार्य अभी लंबित है, क्योंकि गाँव के निहाल, अनीस खान, असगर खान, शोएब, सलीम, यूनुस, अच्छे, रईस जैसे बहुसंख्यक इस्लामी कट्टरपंथियों को ये पसंद नहीं है। इस्लामी कट्टरपंथियों का कहना है मंदिर से सिर्फ 100 मीटर दूर मस्जिद है। मंदिर बन जाने से उनकी नमाज में दिक्कत आएगी।

यह विवाद 7-8 अक्टूबर 2024 को पुलिस की चौकी से बीघापुर कोतवाली तक पहुँचा। पुलिस ने तात्कालिक रूप से 26 मुस्लिमों और 6 हिंदुओं को पाबंद किया, ताकि मामला ठंडा पड़ जाए। हालाँकि मामला शांत होता नहीं दिखा, और 20 अक्टूबर 2024 को यह विवाद सोशल मीडिया पर छा गया।

इस पर स्थानीय दैनिक जागरण अखबार ने रिपोर्ट बनाई। जागरण की टीम ने मामले में सीओ से भी बात की और फिर सोमवार (21 अक्टूबर 2024) को एक न्यूज पब्लिश की है। इस न्यूज रिपोर्ट में बीघापुर कोतवाली क्षेत्र के सीओ ऋषिकांत शुक्ल का बयान है। जिसमें उन्होंने कहा है कि धार्मिक स्थल बनाने से पहले प्रशासन से अनुमति लेनी पड़ती है। ग्रामीणों (हिंदुओं) को प्रशासन से अनुमति लेने के लिए कहा गया है। प्रशासन से अनुमति (अगर) मिल गई, तो मंदिर का निर्माण कार्य पूरा हो सकता है। इस पूरे मामले की रिपोर्ट एसडीएम को भेजी जा चुकी है।

इतना तो ठीक है। सीओ ने बयान दे दिया, आधिकारिक कार्रवाई चल रही है। चूँकि मामले में पाबंदी की गई है, ऐसे में ये मामला स्थानीय कोतवाल (कोतवाली के SHO अब कोतवाल ही हुए) को भी पता ही होगा, लेकिन जब ऑपइंडिया ने SHO राजपाल से फोन पर संपर्क काटा, तो उन्होंने साफ तौर पर मामले से ही इनकार कर दिया, लेकिन जब मामले की मीडिया रिपोर्ट्स के हवाले से सीओ के बयान की जानकारी दी गई, तो उन्होंने पूरे मामले में सफाई देने के अंदाज में आ गए।

जो SHO अभी तक ये कह रहे थे कि कोई विवाद ही नहीं है, वो मामले को घुमाते दिखे। बीघापुर के SHO राजपाल ने कहा, “कोई विवाद नहीं है। ये मामला 7-8 अक्टूबर का है। दोनों तरफ से लोगों को पाबंद कर दिया गया है।” ये पूछने पर, कि क्या पाबंदी बिना किसी विवाद के ही हो गई? इसका भी उन्होंने बचाव किया और कहा, “मामले को बढ़ने से रोकने के लिए पाबंदी की गई।” मतलब साफ है, विवाद है।

ये मामला मीडिया में न उठ जाए, शायद SHO साहब इस बात की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन उन्नव पुलिस का हैंडल संभालने वाले तो उससे भी 20 कदम पीछे निकले। उन्नाव पुलिस की सोशल मीडिया टीम तो मामले की जानकारी ले रहे युवक से ही पूछ लिया, “थाना कौन सा है?”

दरअसल अविरल नाम के युवक ने उन्नाव पुलिस और यूपी पुलिस को टैग करते हुए लिखा था, “उत्तर प्रदेश से चौंकाने वाली खबर! 90% आबादी हम मुसलमानों की है, हम मंदिर बनने नहीं देंगे! मुस्लिम बाहुल्य गाँव में हिन्दुओं को मंदिर बनाने से मुस्लिम भीड़ ने रोका! उन्नाव के रानीपुर गाँव में कट्टरपंथी मुसलमानों की मनमानी! @unnaopolice @Uppolice मामले का सच क्या है?” इसके जवाब में उन्नाव पुलिस ने ही पूछ लिया, “कृपया, थाना क्षेत्र अवगत कराएँ।”

यह जवाब पुलिस की निष्क्रियता और समस्या को टालने का एक स्पष्ट संकेत था। अविरल द्वारा उठाए गए इस मामले को लेकर पुलिस का ध्यान हटाने की कोशिश साफ नजर आती है। यह मुद्दा हिंदुओं के धार्मिक अधिकारों के हनन और उत्पीड़न का है, लेकिन पुलिस प्रशासन ने इसे गंभीरता से नहीं लिया।

यह स्पष्ट है कि इस्लामी कट्टरपंथियों का दबदबा गाँव में लंबे समय से बना हुआ है और पुलिस-प्रशासन ने इस पर अंकुश लगाने के बजाय घुटने टेक दिए हैं। मंदिर के जीर्णोद्धार को प्रशासनिक अनुमति के पेंच में फँसाकर लटकाया जा रहा है। यह देखना बाकी है कि यह अनुमति कब मिलती है, लेकिन उन्नाव पुलिस द्वारा इसे विवाद न मानने की कोशिशें स्पष्ट रूप से दिखाई देती हैं। यदि यह मामला मस्जिद से जुड़ा होता, तो प्रशासन तत्काल कार्यवाही करता, परंतु इस मामले में हिंदुओं के धार्मिक अधिकारों के हनन को गंभीरता से नहीं लिया गया है। ऐसे में लगता है मानों पुलिस-प्रशासन ने घुटने टेक रखे हो।

CSIS के लिए काम करते हैं खालिस्तानी आतंकी, निज्जर पर जस्टिन ट्रूडो सरकार ने नहीं दिए कोई सबूत: संजय वर्मा ने खोली कनाडा की पोल

कनाडा के भारत पर आरोपों के बीच पूर्व हाई कमिश्नर संजय वर्मा ने अंदर की बात बताई है। उन्होंने कहा है कि खालिस्तानी आतंकी कनाडा की खुफिया एजेंसी की कठपुतली हैं और उनके लिए काम करते हैं। उन्होंने यह भी कहा है कि कनाडा खालिस्तानी आतंकियों को प्रत्यर्पित करने में लगातार आनाकानी कर रहा है।

पूर्व हाई कमिश्नर संजय वर्मा ने यह बातें कनाडा के CTV चैनल को दिए गए 26 मिनट लम्बे इंटरव्यू में कही हैं। उन्होंने इस दौरान निज्जर की हत्या में भारत का रोल होने की बात सिरे से नकार दी है। उन्होंने इसके साथ इस मामले का राजनीतिक लाभ लेने का आरोप कनाडा के प्रधानमंत्री और उनकी सरकार पर लगाया है।

इंटरव्यू के दौरान संजय वर्मा ने कहा, “खालिस्तानी आतंकियों को यहाँ प्रश्रय दिया जाता है, खालिस्तानी आतंकी यहाँ की ख़ुफ़िया एजेंसी CSIS के एसेट हैं। यह आरोप मैं बिना कोई सबूत दिए हुए लगा रहा हूँ… यही काम ट्रूडो ने किया है।”

संजय वर्मा ने निज्जर की हत्या पर आगे बताया,”हमें इस बारे में कोई भी सबूत नहीं पेश किया गया है। अगर ट्रूडो और उनके साथी इस बारे में जानते थे और वह कोर्ट नहीं जा रहे थे तो क्या यह एक अपराध नहीं है… आखिर किस आधार पर वह मुझसे पूछताछ करना चाहते हैं। अगर कोई छोटे अपराध के लिए पकड़ा जाता है तो सबूत दिए जाते हैं, इस मामले में नहीं दिए जा रहे।”

उन्होंने पश्चिमी देशों पर निशाना भी साधा। संजय वर्मा ने कहा कि अब वह समय नहीं रहा जब पश्चिमी देश किसी देश को कुछ करने को कहते और वह करने लगते। सने संजय वर्मा ने कहा कि भारत एक कानून के राज वाला देश है, आखिर ऐसे में कनाडा सबूत क्यों नहीं पेश कर रहा।” यह इंटरव्यू आप नीचे लगे लिंक पर देख सकते हैं।

संजय वर्मा ने कहा कि उनको और ट्रूडो और उनकी सरकार पर भरोसा नहीं है। संजय वर्मा ने बताया कि उनकी जगह पर कोई नया आएगा या नहीं, यह बातचीत के बाद तय होगा। संजय वर्मा ने कहा है कि ट्रूडो ने सिर्फ ख़ुफ़िया जानकारी के आधार पर ही भारत पर आरोप जड़ दिए और बाद में खुद कबूल किया कि उनके पास कोई पक्का सबूत नहीं है।

कनाडा में बैठ कर भारत तोड़ने वालों को लेकर बात करते हुए संजय वर्मा ने कहा, “भारत में क्या होता है, वह भारतीय तय होंगे। कनाडा में रहने वाली खालिस्तानी आतंकी और चरमपंथी भारती नहीं बल्कि कनाडा के नागरिक हैं, और हमें लगता है कि किसी भी देश को अपने नागरिकों को दूसरे देश को तोड़ने का प्रयास नहीं करने देना चाहिए।”

हाई कमिश्नर संजय वर्मा ने यह भी कहा कि भारत और कनाडा के बीच का यह विवाद सांस्कृतिक और व्यापारिक सम्बन्धों को ख़ास नुकसान नहीं पहुँचाएगा। उन्होंने कहा कि इससे कुछ असर जरूर पड़ सकता है। संजय वर्मा ने कनाडा से भारत की चिंताओं पर एक्शन लेने को भी कहा है।

गौरतलब है कि निज्जर की हत्या में भारत सरकार के शामिल होने के आरोप ट्रूडो के लगाने के बाद विवाद हाल ही में काफी बढ़ गया था। इसके बाद भारत ने संजय वर्मा को वापस बुला लिया था और कनाडा के हाई कमिश्नर को देश से निकल जाने को कहा था। संजय वर्मा ने इसके बाद इन आरोपों पर जवाब दिया है।

कैंप में कर रहे थे आराम, TRF आतंकियों ने भून डाला: डॉक्टर समेत 7 की मौत, उमर अब्दुल्ला की सरकार बनने के बाद J&K में दूसरा अटैक

जम्मू-कश्मीर के गांदरबल के गगनगीर इलाके में आतंकी हमला हुआ है। खबर है कि वहाँ आतंकियों ने एक सुरंग में काम कर रहे लोगों के कैंप पर अंधाधुंध गोलियाँ चलाईं जिसके बाद 7 लोगों की मौत हो गई। इन 7 लोगों में 6 सुरंग में काम करने वाले लोग और 1 डॉक्टर की हत्या की गई है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, मरने वालों में मैकेनिकल कर्मचारी अनिल शुक्ला थे जो मध्य प्रदेश के रहने वाले थे। वहीं बिहार के फहीम नासिर, मोहम्मद हारिफ और कलीम को निर्ममता से मौत के घाट उतार दिया गया और पंजाब के गुरमीत को भी गोलियों से भून डाला गया। इनके अलावा इस सूची में जम्मू कश्मीर के रहने वाले शशि अब्रोल और डॉ शहनवाज भी शामिल हैं।

वहीं घायल लोगों में इंदर यादव, मोहन लाल, मुश्ताक अहमद लोन और इश्फाक अहमद भट और जगतार सिंह हैं। घटना रात के करीब 8:30 बजे हुई। एक चश्मदीदों ने बताया कि आतंकियों ने हमला उस समय बोला जब खाने की तैयारी चल रही थी तभी अचानक 3 हथियारबंद आतंकी मेस में पहुँचे और वहाँ मौजूद वर्कर्स पर अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी। गोलियाँ इतनी मारी गई कि दो गाड़ियाँ भी जलकर खाक हो गई।

अभी तक सामने आई जानकारी के अनुसार, हमले की जिम्मेदारी आतंकी संगठन ‘द रेजिस्टेंट फ्रंट’ ने ली है। उन्होंने जम्मू-कश्मीर में ये हमला नई सरकार बनने के मात्र 4 दिन बाद ही किया है। इससे पहले भी उमर अब्दुल्ला की सरकार बनने के बाद पहली बार हमला 18 अक्तूबर को हुआ था। हमले में गैर स्थानीय व्यक्ति अशोक चौहान को गोली मारी गई थी

इन हमलों के बाद बता दें कि सेना ने भी संयुक्त टीम बनाकर आतंकियों को निशाना बनाया। ये कार्रवाई सेना ने बारामुला में की। वहाँ संयुक्त टीम ने हथियारों से लैस आतंकी को मार गिराया। इसके साथ एक बड़ी आतंकी साजिश नाकाम हुई। सेना ने छानबीन में उसके पास से हथियारों का एक बड़ा जखीरा बरामद किया है। कहा जा रहा है कि ये हथियार ऐसे थे जैसे वो किसी युद्ध कि तैयारी के लिए सामान जुटा रहा हो। उसके पास एके 47, दो एके मैग्जीन, 57 एके राउंड, दो पिस्टल के अलावा कई खतरनाक हथियार मिले हैं।

जिस हिंदू बुजुर्ग पर मुस्लिम भीड़ ने किया हमला, वे चीख-चीखकर कह रहे- मस्जिद से ऐलान हुआ… लेकिन जाँच की जगह मोहम्मद जुबैर की लाइन पकड़ रही बहराइच पुलिस

बहराइच के महाराजगंज में 13 अक्तूबर 2024 को दुर्गा विसर्जन जुलूस को इस्लामी भीड़ ने निशाना बनाया था। इस हमले में 23 साल के युवक रामगोपाल मिश्रा की हत्या कर दी गई थी। कई अन्य हिंदू घायल हुए थे। इनमें से एक 70 साल के बुजुर्ग विनोद मिश्रा भी हैं।

रिटायर शिक्षक विनोद मिश्रा ने मीडिया संस्थानों को विस्तार से बताया है कि उस दिन कैसे हिंसा भड़की थी। उनका कहना है कि पहले मूर्ति पर पत्थर मारी गई, फिर डीजे वाले के साथ मारपीट की गई। कथित तौर पर इसके बाद मस्जिद से ऐलान कर उकसाया गया, जिसके बाद मुस्लिम भीड़ हथियारों संग सड़क पर आ गई और हमला कर दिया।

मस्जिद से मुस्लिमों को उकसाने की बात उन्होंने आजतक के साथ बातचीत में कही। ऑपइंडिया के रिपोर्टर राहुल पाण्डेय से बातचीत में भी कैमरे पर यही दावे दोहराए। उनके इस बयान को लेकर दैनिक जागरण समेत कई अन्य मीडिया संस्थानों ने भी रिपोर्ट की है।

राहुल पाण्डेय को इस घटना का विवरण देते हुए विनोद मिश्रा ने कहा;

“पुलिस ने लाठीचार्ज किया तो हिंदू तितर-बितर होगए। तब, मस्जिद से अल्लाह-हू-अकबर करके बोला गया और उसके बाद आवाज आई कि जो जहाँ मिले उसे मार दो काट दो।”

वीडियो में विनोद मिश्रा की यह बात आप साफ तौर पर 1 मिनट से पहले ही सुन सकते हैं और बाद में राहुल पाण्डेय को पूछते भी सुना जा सकता है कि क्या आपने ये खुद सुना?

इस पर विनोद मिश्रा ने हाँ, बिल्कुल सुना में जवाब देते हुए कहा,

“उधर से 200-300 की संख्या में भीड़ बाँस बल्लम, अवैध असलहे, तमंचे जैसे औजार लेके दौड़ी। सामने हमारी गाड़ी थी। उसे हम इस पार लेकर आने। हमने गाड़ी स्टार्ट की हुई थी ये सोचकर ये सब लोग हमें जानते-पहचानते हैं हमें कुछ नहीं करेंगे। लेकिन वो 5-7 की संख्या में आए और फरसा से वार कर दिया। हमने हाथ उठाया तो वहाँ गहरा घाव हो गया और कुर्ता खून से सराबोर हो गया। हम लहूलुहान थे और उन्होंने तब तक गाड़ी का तार काट दिया। हम इतने में वहाँ से भागने लगे। जब भागे तो उन्होंने लाठी चला दी। हमारी पीठ पर काफी चोट के निशान हैं और हाथ भी टूट गया। बाद में पता चला कि गाड़ी में भी आग लगा दी गई है।”

विनोद मिश्रा ने इसी तरह की बातें आजतक के रिपोर्टर को भी बताई। इसके बाद जी न्यूज और अन्य समाचार पोर्टलों ने भी उनके बयान को कवर किया।

आजतक की रिपोर्ट का स्क्रीनशॉट

विनोद मिश्रा का यह बयान जैसे ही ऑपइंडिया ने सार्वजनिक किया तो मोहम्मद जुबैर जैसे लोग एक्टिव हो गए। उन्होंने हिंदू पीड़ित के पूरे बयान को खारिज कर इसे तथ्यहीन बता दिया और बहराइच पुलिस को टैग कर दिया। आश्चर्यजनक तौर पर बहराइच पुलिस ने भी यही लाइन पकड़ी और बयान को ‘भ्रामक तथ्य’ करार दिया। साथ ही अपरोक्ष तौर पर मीडिया को धमकाते हुए कहा जिन घटना के संबंध में साक्ष्य उपलब्ध नहीं है, उन्हें बिन जानकारी प्रसारित न करें।

इस संबंध में दैनिक जागरण की खबर का स्क्रीनशॉट साझा किए जाने पर तो बहराइच पुलिस ने मीडिया संस्थान को नोटिस जारी करने की धमकी तक दे दी।

मोहम्मद जुबैर जैसे लोग जो बहराइच में हिंदुओं पर हमले के बाद से रामगोपाल मिश्रा की हत्या को जायज ठहराने की कोशिश कर रहे हैं, एक हिंदू पीड़ित के बयान को फेक बताना तो समझ में आता है। लेकिन बहराइच पुलिस का यह रवैया समझ से परे है।

विनोद मिश्रा इस घटना के चश्मदीद हैं। इस हमले में घायल हुए लोगों में से हैं। उनका बयान एक तरह से पूरे घटनाक्रम का साक्ष्य है। लेकिन उनके बयान को जाँच का आधार बनाने की जगह पुलिस मीडिया संस्थानों को अपरोक्ष तौर पर धमकाते हुए यह बताने की कोशिश करती दिख रही है कि हिंदू पीड़ितों के विवरण प्रकाशित प्रसारित न किए जाएँ।

इसके क्या कारण हो सकते हैं? आखिर बहराइच पुलिस पीड़ितों की आँखों देखी और कानों सुनी तथ्यों को क्यों बाहर नहीं आने देना चाहती है? वैसे इस हिंसा को लेकर बहराइच का पुलिस-प्रशासन शुरू से ही सवालों के घेरे में है। योगी सरकार ने कई अधिकारियों पर कार्रवाई भी की है। हिंसा के चश्मदीदों का भी कहना है कि यदि पुलिस ने सक्रियता दिखाई होती तो शायद रामगोपाल जिंदा होते…।

यह भी माना जा सकता है कि तनावपूर्ण माहौल में पुलिस-प्रशासन की कोशिश होती है कि ऐसे ‘कटु सत्य’ बाहर न आए जिससे तनाव बढ़े। लेकिन इसका मतलब यह नहीं होता कि पीड़ितों की रिपोर्टिंग ही न की जाए। या फिर कोई तथ्य सामने आ जाए तो पुलिस मीडिया को ही धमकाने पर उतारू हो जाए। ऐसे तथ्य सामने आने के बाद यह पुलिस का दायित्व बन जाता है कि वे इसे अपनी जाँच का बिंदु बनाए और समुचित कार्रवाई करे।

बहराइच पुलिस का ‘दायित्व बोध’ तो 13 अक्टूबर की घटना के बाद से ही कठघरे में है। लेकिन उसके बाद भी वह जिस तरह का रवैया दिखा रही है, उस पर योगी सरकार को गंभीरता से गौर करना चाहिए। बहराइच पुलिस की पीड़ितों के पक्ष को सोशल मीडिया पर भ्रामक करार देने की सक्रियता, मोहम्मद जुबैर जैसे इस्लामी कट्टरपंथियों के सुर में सुर मिलाते नजर आना, यूपी पुलिस की ‘छवि’ पीड़ित हिंदुओं की नजर में पश्चिम बंगाल पुलिस जैसा गढ़ सकती है। यदि ऐसा होता है तो यह मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के उस इकबाल को मलिन करने का कार्य करेगा जो उन्होंने प्रदेश में अपराधियों और कट्टरपंथियों पर कार्रवाई कर अर्जित की है।

सेंसर वाली जिस सीट पर बैठ पैखाना करते थे अरविंद केजरीवाल वह ‘शीशमहल’ से गायब, अमित मालवीय का दावा: PWD ने जारी की दिल्ली CM आवास के शाही सामानों की लिस्ट

लोक निर्माण विभाग (PwD) ने दिल्ली के 6 फ्लैगस्टाफ रोड पर स्थित ‘शीश महल’ में मौजूद सामानों की विस्तृत सूची जारी की है। यह शीशमहल दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल का 9 साल तक आधिकारिक आवास था। दिल्ली सीएमओ (मुख्यमंत्री कार्यालय) द्वारा मौजूदा मुख्यमंत्री आतिशी को बंगला आवंटित करने के लिए कहने के बाद पीडब्ल्यूडी ने सामानों की यह सूची तैयार की है।

इस शीशमहल को लेकर अरविंद केजरीवाल पहली बार मई 2023 में सवालों के घेरे में आए थे। उस समय मीडिया ने केजरीवाल द्वारा करदाताओं के पैसे को अपनी विलासिता पर खर्च करने डिटेल जारी किया था। इसको लेकर आम आदमी पार्टी के मुखिया और दिल्ली के तत्कालीन मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की खूब आलोचना हुई थी।

अब PWD द्वारा अरविंद केजरीवाल के आवास में स्थित समानों की सूची भाजपा नेता अमित मालवीय ने अपने सोशल मीडिया हैंडल पर डाला है। अमित मालवीय ने सोशल मीडिया X के पोस्ट में कहा है, “अरविंद केजरीवाल के ‘शीशमहल’ में लगाए गए बिजली के उपकरणों और गैजेट्स की सूची यहाँ दी गई है।”

उन्होंने दावा किया, “आश्चर्य की बात है कि अरविंद केजरीवाल के आराम के लिए लगाए गए पूरी तरह से स्वचालित, सेंसर से लैस TOTO स्मार्ट टॉयलेट सीट, जिसमें ऑटोमैटिक ओपन-क्लोज सीट, हीटेड सीट, वायरलेस रिमोट डियोडोराइज़र और ऑटोमैटिक फ्लशिंग जैसी सुविधाएँ हैं, गायब हैं। ऐसी एक टॉयलेट सीट की कीमत 10-12 लाख रुपए के बीच है!”

अरविंद केजरीवाल के ‘शीश महल’ में मौजूद सामान की पूरी सूची नीचे दी गई है:

  • 16 अल्ट्रा स्लिम स्मार्ट 4K टीवी, वॉयस कंट्रोल्ड- ₹64 लाख
  • स्मार्ट एलईडी – ₹19.5 लाख
  • फ्रीस्टैंडिंग ल्यूमिनरी – ₹9.2 लाख
  • ओसाडा फुल बॉडी मसाज चेयर- ₹4 लाख
  • रेक्लाइनर सोफा – ₹10 लाख
  • 8 मोटराइज्ड रेक्लाइनर सोफा: ₹10 लाख
  • बोस लाउडस्पीकर – ₹4.5 लाख
  • इनबिल्ट टीवी और एआई विजन स्क्रीन के साथ 2 स्मार्ट रेफ्रिजरेटर – ₹9 लाख
  • 73-लीटर स्टीम ओवन – ₹9 लाख
  • 50-लीटर माइक्रोवेव ओवन – ₹6 लाख
  • 2 माउंटेड हुड 140 सेमी स्टेनलेस स्टील चिमनी – ₹6 लाख
  • बॉश सीरीज 8 बिल्ट-इन कॉफी मशीन – ₹2.5 लाख
  • 3 हॉट वाटर जेनरेटर (एयर टू वॉटर हीट पंप) – ₹22.5 लाख
  • सुपीरियर वाटर सप्लाई और सैनिटरी इंस्टॉलेशन – ₹15 करोड़
  • एलजी 12 किलोग्राम फ्रंट लोड ऑटोमैटिक वॉशिंग मशीन + ड्रायर – ₹2.1 लाख
  • एसएस रेलिंग, सीढ़ी कवरिंग (पीतल, शॉवर एनक्लोजर, आदि) – ₹1.2 करोड़
  • 20 ग्रैंड एज्ड ब्रास एंट्रेंस स्कॉन्स आउटडोर लाइट्स – ₹10 लाख
  • ऑटोमैटिक स्लाइडिंग सेंसर के साथ लकड़ी और कांच के दरवाजे – ₹70 लाख
  • 24 सजावटी खंभे: ₹36 लाख
  • 80 खिड़की के पर्दे – ₹4 करोड़ से ₹5.6 करोड़ के बीच
  • बेहतरीन जलापूर्ति – ₹15 करोड़

साल 2013 में अरविंद केजरीवाल ने कहा था कि वह और उनकी आम आदमी पार्टी की सरकार के मंत्री सरकारी बंगलों में नहीं रहेंगे, बल्कि छोटे सरकारी फ्लैटों में रहेंगे। उनके द्वारा किए गए बड़े-बड़े वादे और दावे 11 साल बाद भी उनके राजनीतिक दिखावे के अलावा और कुछ नहीं लगते।

अपने आवास के जीर्णोद्धार पर केजरीवाल ने खर्च किए ₹45 करोड़

अरविंद केजरीवाल का पुराना ‘शीश महल’ 13000 वर्ग फीट क्षेत्र में फैला हुआ है। इस आवास में 399 वर्ग फीट का लॉन क्षेत्र है और यह सभी आधुनिक सुविधाओं से सुसज्जित है। टाइम्स नाउ नवभारत ने पिछले साल बताया था कि अरविंद केजरीवाल अपने परिवार के साथ पहली मंजिल पर रहते थे। ग्राउंड फ्लोर पर एक बड़ा मीटिंग हॉल और एक विजिटर रूम है।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया था कि तत्कालीन मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल का यह बंगला बहुत बड़ा है और इसमें अत्याधुनिक इंटीरियर डिज़ाइन, फ़्लोरिंग और उच्च श्रेणी के फ़र्नीचर लगे हैं। मई 2023 में सोशल मीडिया पर सामने आए वीडियो में देखा जा सकता है कि अरविंद केजरीवाल के आवास के सभी कमरों में सेंसर युक्त स्वचालित दरवाजे लगे हैं।

टाइम्स नाउ नवभारत की रिपोर्ट में कहा गया था कि सिविल लाइंस में केजरीवाल के सरकारी बंगले का करीब 45 करोड़ रुपए लगाकर नवीनीकरण किया गया था। ‘ऑपरेशन शीश महल’ नाम के रिपोर्ट में कहा गया था कि नवीनीकरण के लिए करदाताओं के 44.78 करोड़ रुपए का इस्तेमाल किया गया, जिससे आम आदमी पार्टी की मितव्ययिता को बढ़ावा देने की प्रतिबद्धता पर सवाल उठ रहे हैं।

खालिस्तानी वोटों के लिए अपने ही लोगों के साथ ही ‘खेल’ रहा है कनाडा, अब पुलिस ने बयान जारी कर कहा- भारत से तत्काल खतरा नहीं

कनाडाई पुलिस ने शनिवार (20 अक्टूबर 2024) को एक बार फिर खालिस्तानी वोटों को साधने के लिए भारत पर निशाना साधा। कनाडा पुलिस ने एक बयान जारी कर कहा कि भारत से जनता को कोई ‘तात्कालिक खतरा’ नहीं है। ये बयान उस समय आया है, जब कनाडा की रॉयल कैनेडियन माउंटेड पुलिस (RCMP),ने सार्वजनिक रूप से ‘भारत सरकार के एजेंटों’ पर कनाडाई धरती पर हिंसक घटनाओं में शामिल होने का आरोप लगाया था, जिनमें हत्याएँ भी शामिल हैं।

RCMP के शीर्ष अधिकारियों ने भारतीय मीडिया पर भी ‘झूठी’ रिपोर्ट्स फैलाने का आरोप लगाया और कहा कि कनाडाई पुलिस ‘तथ्यों को सही करने’ की कोशिश कर रही है। RCMP के ये बयान तब आए जब कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो ने भारत सरकार पर खालिस्तानी आतंकी हरदीप सिंह निज्जर की हत्या में शामिल होने का आरोप लगाया था।

RCMP की असिस्टेंट कमिश्नर ब्रिजिट गॉविन ने कनाडाई ब्रॉडकास्टिंग कॉर्पोरेशन (CBC) न्यूज को दिए बयान में कहा, “इस घोषणा के पीछे कोई तात्कालिक खतरा नहीं था।” RCMP ने दावा किया है कि वे ‘विस्तृत हिंसक घटनाओं’ की जाँच कर रहे हैं, जिनमें निज्जर की हत्या भी शामिल है। सितंबर 2023 में ट्रूडो ने भारतीय एजेंटों पर निज्जर की हत्या का आरोप लगाया था, जिसके बाद से भारत और कनाडा के बीच कूटनीतिक संबंध बिगड़ते जा रहे हैं और उनके सुधार का कोई संकेत नहीं है।

CBC को दिए इंटरव्यू में गॉविन ने दावा किया कि भारत के खिलाफ सार्वजनिक रूप से जाने से पहले कई प्रयास किए गए थे, जिनमें भारतीय कानून प्रवर्तन एजेंसियों को सबूत दिए गए। साथ ही कनाडा और भारत सरकार के सीनियर अधिकारियों के बीच बैठकें भी हुई, लेकिन ये प्रयास ‘असफल’ रहे।

गौरतलब है कि हाल ही में भारत ने खालिस्तानी आतंकियों की सूची में एक कनाडाई बॉर्डर सर्विस एजेंसी (CBSA) के अधिकारी का नाम भी शामिल किया, जिसे भारत से प्रत्यर्पित करने की माँग की गई है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, संदीप सिंह सिद्धू प्रतिबंधित इंटरनेशनल सिख यूथ फेडरेशन (ISYF) का सदस्य है और CBSA के साथ काम करता है, वो पंजाब में आतंकवाद को बढ़ावा देने में शामिल रहा है।

भारत ने यह सूची तब जारी की जब RCMP ने भारतीय उच्चायुक्त संजय कुमार वर्मा और अन्य राजनयिकों को खालिस्तानी आतंकी हरदीप सिंह निज्जर की हत्या में ‘रुचि रखने वाले’ व्यक्तियों के रूप में नामित किया। RCMP ने यह भी दावा किया है कि भारतीय सरकार ने कनाडा में आपराधिक गतिविधियों के लिए लॉरेंस बिश्नोई गैंग का इस्तेमाल किया है।

साध्वी को दिखाए पोर्न, कर्नल को नंगा कर पीटा, मेजर को बेटी से रेप की धमकी… क्या सुशील शिंदे के कबूलनामे से भरेंगे वे जख्म जो कॉन्ग्रेस ने ‘भगवा आतंकवाद’ साबित करने को दिए

‘भगवा आतंकवाद’…. ये एक ऐसा शब्द था जिसने भारतीय राजनीति की रूख को मोड़ दिया। बलिदान, त्याग और भारतीय परंपरा से संबंधित केसरिया रंग को बदनाम करने के कारण कॉन्ग्रेस बर्बादी के कगार पर पहुँच गई। राजनीति में इस शब्द के इस्तेमाल का परिणाम ये हुआ कि पिछले 10 सालों से कॉन्ग्रेस सत्ता में लौटने के लिए संघर्ष कर रही है, लेकिन नजदीकी भविष्य में इसकी संभावना नहीं दिख रही है।

कॉन्ग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए-2 सरकार में केंद्रीय गृहमंत्री रहे सुशील कुमार शिंदे ने भी इस बात को मान लिया है कि इस शब्द का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए था। उन्होंने माना कि उनकी पार्टी कॉन्ग्रेस ने इस शब्द का इस्तेमाल करने के लिए कहा था। उन्होंने कहा कि आतंकवाद भगवा या रेड या सफेद नहीं होता। आतंकवाद… आतंकवाद होता है।

सुशील कुमार शिंदे ने कहा कि उस वक्त रिकॉर्ड पर जो आया था, उन्होंने वही कहा था। ये उनकी पार्टी कॉन्ग्रेस ने बताया था कि भगवा आतंकवाद हो रहा है। उन्होंने कहा कि उस वक्त पूछा गया था तो उस बारे में उन्होंने बोल दिया था भगवा आतंकवाद। बस इतना ही है। दरअसल, शिंदे से पहले गृहमंत्री रहने के दौरान कॉन्ग्रेस नेता पी. चिदंबरम ने भगवा आतंकवाद शब्द का इस्तेमाल किया था।

राजनीति से रिटायरमेंट ले चुके सुशील कुमार शिंदे ने कहा, “आतंकवाद शब्द लगाया, लेकिन सही बोले तो क्यों आतंकवाद शब्द लगाया मुझे पता नहीं है। लगाना नहीं चाहिए। ये गलत था। भगवा टेररिस्ट… ऐसा नहीं बोलना चाहिए। ये उस पार्टी की विचारधारा होती है। ये चाहे भगवा हो या रेड हो या सफेद हो। ऐसा कोई आतंकवाद नहीं होता है।”

दरअसल, भारत के गृहमंत्री रहते हुए सुशील कुमार शिंदे ने 20 जनवरी 2013 को जयपुर में आयोजित कॉन्ग्रेस के चिंतन शिविर के दौरान कहा था कि भाजपा और आरएसएस के कैंपों में ‘हिंदू आंतकवादियों’ को प्रशिक्षण दिया जाता है। आलोचना के बाद शिंदे ने कहा था, “ये सब इतनी बार अख़बार में आ गया है। ये कोई नई चीज़ नहीं है जो मैंने आज कही है। ये भगवा आतंकवाद की ही बात मैंने की है।”

कॉन्ग्रेस ने तुष्टिकरण के लिए अपनाया ‘भगवा आतंकवाद’

दरअसल,  अपने बयान के पीछे शिंदे एक कथित रिपोर्ट का हवाला दिया था। उन्होंने कहा था, “हमारे पास रिपोर्ट आ गई है। जाँच में भाजपा हो या आरएसएस के ट्रेनिंग कैंप, हिंदू आतंकवाद बढ़ाने का काम देख रहे हैं।समझौता एक्सप्रेस रेलगाड़ी का धमाका हो, मक्का मस्जिद ब्लास्ट हो या फिर मालेगाँव, हिंदू चरमपंथियों ने वहाँ जाकर बम धमाके करवाए और फिर कह दिया कि ये धमाके अल्पसंख्यकों ने करवाए।”

सुशील कुमार शिंदे ने कहा था कि ऐसी कोशिशों से देश को सतर्क रहना चाहिए। शिंदे के इस बयान पर कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता मणिशंकर अय्यर ने उन्हें मुबारकवाद दी थी। इससे पहले गृहमंत्री रहते हुए कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता पी. चिदंबरम ने साल 2010 में सबसे पहले भगवा आतंकवाद शब्द का प्रयोग किया था।

केंद्रीय गृहमंत्री के रूप में 25 अगस्त 2010 को डीजीपी और आईजी के वार्षिक सम्मेलन को संबोधित करते हुए चिदंबरम ने कहा था, “मैं आपको सावधान करना चाहता हूँ कि भारत में युवा पुरुषों एवं महिलाओं को कट्टरपंथी बनाने के प्रयासों में कोई कमी नहीं आयी है। इसके अलावा हाल में ‘भगवा आतंकवाद’ सामने आया है, जो अतीत में कई बम विस्फोटों में पाया गया है..।”

भगवा आतंक शब्द का सबसे पहले उपयोग

Saffron Terrorism जिसे हिंदी में भगवा आतंकवाद कहा जाता है, का सबसे पहले उपयोग कॉन्ग्रेस के प्रति हमदर्दी रखने वाले अंग्रेजी के पत्रकार प्रवीण स्वामी ने किया था। साल 2002 के गुजरात दंगों के दौरान रिपोर्टिंग करते हुए प्रवीण स्वामी ने ‘Saffron Terror’ नाम के हेडलाइन से एक रिपोर्ट लिखी थी। इसमें स्वामी ने बताया था कि हिंदुओं ने मुस्लिमों पर अत्याचार किए थे।

स्वामी ने अपनी रिपोर्ट में लिखा था, “स्कूल शिक्षक नजीर खान पठान 28 फरवरी (2002) को सुबह 9 बजे नरौरा में स्टेट ट्रांसपोर्ट वर्कशॉप के पीछे अपने घर से टहलने के लिए निकले थे। वे याद करते हैं कि नटराज होटल के सामने मुख्य चौक पर पहले से ही भीड़ जमा थी। वे सभी भगवा दुपट्टा और खाकी शॉर्ट्स पहने हुए थे। उनमें से ज़्यादातर के हाथों में तलवारें थीं।”

अपनी रिपोर्ट में उन्होंने आगे लिखा, “वहाँ दो पुलिस जीप खड़ी थीं और दो सफ़ेद एंबेसडर कारें थीं, जिन पर लाल बत्ती लगी हुई थी। मैं वहाँ से लगभग 100 मीटर दूर था। वहाँ खड़े लोगों में से एक विश्व हिंदू परिषद के नेता प्रवीण तोगड़िया थे। थोड़ी देर बाद वे चले गए और भीड़ ने गाली-गलौज वाले नारे लगाने शुरू कर दिए। हमलावरों ने हम पर पत्थर फेंके और हमने भी उसी तरह जवाब दिया।”

अपनी रिपोर्ट उन्होंने आगे लिखा, “गोलीबारी में चार मुस्लिम लोग मारे गए, जिससे पड़ोस की रक्षा करने वालों को पीछे हटना पड़ा। स्थानीय नूरानी मस्जिद को आग लगा दी गई और उसके गुंबद पर भगवा झंडा फहराया गया। फातिमा बी उन सैकड़ों लोगों में से एक थीं जिन्होंने राज्य परिवहन कर्मचारी कॉलोनी में छिपने की कोशिश की थी।…”

कॉन्ग्रेस ने लपक लिया मौका

कॉन्ग्रेस गुजरात दंगों को लेकर भाजपा, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर हमलावर रही है। उन्हें फँसाने के लिए तरह-तरह के जतन किए गए, लेकिन आखिरकार सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें बाइज्जत बरी कर दिया और कहा कि इसमें तत्कालीन गुजरात सरकार एवं वहाँ के मुख्यमंत्री नरेेंद्र मोदी की इसमें कोई भूमिका नहीं है। भाजपा नेता का कहना था कि इसके बावजूद कॉन्ग्रेस उन्हें तरह-तरह से प्रताड़ित करती रही।

कॉन्ग्रेस ने अपने वोटबैंक मुस्लिमों को साधने के लिए इस शब्द को अपना लिया और इसका जमकर प्रचार किया। परिणाम ये हुआ कि कॉन्ग्रेस के खिलाफ आक्रोश बढ़ता गया। पी. चिदंबरम ने इसे खूब उछाला। उस समय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह थे और यूपीए की चेयरपर्सन सोनिया गाँधी थी। सत्ता के गलियारे में कहा जाता था कि सोनिया गाँधी ही अप्रत्यक्ष रूप से सत्ता चलाती थी।

उस समय कॉन्ग्रेस में जनार्दन द्विवेदी, सीपी जोशी, मणिशंकर अय्यर, अहमद पटेल जैसे नेता सोनिया गाँधी के सबसे करीबी नेताओं में शामिल थे। कहा जाता है कि सोनिया गाँधी से इन नेताओं से सलाह लिए बिना कोई कदम नहीं उठाती थी। जिस समय भगवा आतंकवाद शब्द को राष्ट्रीय मीडिया में कॉन्ग्रेस में हवा दी गई, उस समय केंद्रीय गृहमंत्री आरके सिंह थे।

इन नेताओं ने भगवा आतंकवाद शब्द को मजबूत करने के लिए अंतिम समय तक प्रयास किया। समझौता एक्सप्रेस ब्लास्ट, मक्का मस्जिद ब्लास्ट, मालेगाँव ब्लास्ट जैसे कई आतंकवादी हमलों में हिंदुओं के नामों को आगे किया गया। मालेगाँव धमाका साल 2008 में हुआ था, लेकिन इससे काफी पहले ही कॉन्ग्रेस सरकार देश की बहुसंख्यक आबादी को विलेन बनाने के लिए काम पर लग चुकी थी।

महाराष्ट्र के मालेगाँव में 29 सितम्बर 2008 को एक मोटरसाइकिल में धमाका हुआ, जिसमें 6 लोग मारे गए। इसी मालेगाँव धमाका मामले के बाद कॉन्ग्रेस ने हिन्दू आतंकवाद की थ्योरी को आगे बढ़ाना चालू कर दिया। इस मामले में कई ऐसे लोगों को पकड़ा गया जो कि हिन्दू संगठनों से जुड़े हुए थे। कई ऐसे गवाह लाए गए, जिनसे जबरदस्ती बयान दिलवाए गए।

RSS और VHP नेताओं को इस मामले में फँसाने की साजिश भी रची गई। यह अब काम तब की महाराष्ट्र ATS ने किया। मालेगाँव धमाके में साध्वी प्रज्ञा, कर्नल पुरोहित, स्वामी असीमानंद समेत कई हिन्दू व्यक्ति आरोपित बनाए गए। कर्नल पुरोहित को इस मामले में RDX देने का आरोपित बताया गया। साध्वी प्रज्ञा पर धमाके के लिए बाइक देने का आरोप लगा।

इस धमाके में आरोपित बनाए गए कई लोगों को समझौता एक्सप्रेस और मक्का मस्जिद ब्लास्ट मामले में भी आरोपित बनाया गया था। इसी के बाद पूरा नैरेटिव बुना जाने लगा कि देश में हिन्दू आंतकवाद भी है। इन लोगों से मनवाफिक बयान दिलवाने के लिए इन लोगों। को तरह-तरह से प्रताड़ित किया गया। इन पर थर्ड डिग्री का इस्तेमाल किया गया।

कर्नल पुरोहित को नंगा करके पीटा गया। उनकी टाँग तोड़ी दी गई। उनसे कहा गया कि मालेगाँव मामले में तत्कालीन सांसद योगी आदित्यनाथ और RSS और VHP के नेताओं का नाम लें और यह बात स्वीकार कर लें कि धमाका उन्हीं ने किया था। इसके अलावा साध्वी प्रज्ञा को इतना मारा गया कि उनकी रीढ़ की हड्डी में तक समस्या आ गई और उन्हें वेंटीलेटर पर भर्ती होना पड़ा। उन्हें पोर्न दिखाया गया।

इतना ही नहीं, साल 2013 में भगवा आतंकवाद को स्थापित करने के लिए 10 हिंदुओं को नाम जारी किया। NIA द्वारा जारी लिस्ट में उन लोगों के नाम जारी किए गए, जिनके तार संघ या अन्य हिंदुत्ववादी संगठनों से जुड़े थे। इनमें सुनील जोशी, लोकेश शर्मा, संदीप डांगे, स्वामी असीमानंद, देवेंद्र गुप्ता, राजेंद्र, चंद्रशेखर लेवे, रामजी कालसांगरा, कमल चौहान, मुकेश वासानी के नाम थे।

ये सभी समझौता एक्सप्रेस ब्लास्ट, मक्का मस्जिद ब्लास्ट, अजमेर ब्लास्ट में वांछित बताए गए थे। हालाँकि, बाद में कोर्ट ने असीमानंद को बरी कर दिया। कर्नल पुरोहित और साध्वी प्रज्ञा को बेल दे दिया। इसके अलावा भी अधिकांश आरोपित बरी हो गए। इन मामलों में गवाह बनाए गए 17 लोग अपने बयान से मुकर गए और कहा कि उनसे जबरन गवाही दिलवाई गई थी।

इस तरह कॉन्ग्रेस ने एक नैरेटिव बुना था। इसमें सोनिया गाँधी और उनके सलाहकारों की महती भूमिका बताई जाती है। हालाँकि, धीरे-धीरे यह नैरेटिव ध्वस्त हो गया और इसका खामियाजा कॉन्ग्रेस को भुगतना पड़ा। भगवा आतंकवाद शब्द कॉन्ग्रेस की ताबूत में एक मजबूत कील साबित हुआ। इसके बाद संसाधनों पर पहला अधिकार मुस्लिमों का और विवादास्पद सांप्रदायिक बिल जैसे कारनामों ने कॉन्ग्रेस को गर्त में पहुँचा दिया।

इसका ये परिणाम हुआ कि साल 2014 में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा की भारी जीत हुई और वे प्रधानमंत्री बने। इसके बाद साल 2019 और साल 2024 में भी भाजपा अपनी जीत को लगातार दोहरा कर एक इतिहास रच दिया। कॉन्ग्रेस को जब तक इसका अहसास होता, तब तक उसकी नैया डूब चुकी थी। इस तरह कॉन्ग्रेस ने अपनी अस्तित्व को मिटाने की दिशा में कदम बढ़ा दिया।

आखिरकार यह कदम कितना घातक सिद्ध हुआ, यह सुशील कुमार शिंदे के बयान से सिद्ध हो गया। उनकी आवाज में इस बात का स्पष्ट दर्द है कि कॉन्ग्रेस को भगवा के साथ आतंकवाद शब्द का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए था। भगवा सिर्फ शब्द नहीं है, यह भारतीय संस्कृति का रंग है। यह बलिदान और गर्व का प्रतीक है।

कॉन्ग्रेस के दरबारी नेताओं ने इसे कलंकित करके भारतीय संस्कृति को बदनाम करने का जो खेल रचा, उसमें सोनिया गाँधी जैसी असली भारत से अनजान नेत्री फँस गईं और लगभग 140 साल अपनी पुरानी पार्टी को इस मुकाम पर लाकर खड़ा कर दिया, जहाँ अस्तित्व की लड़ाई लड़नी पड़ रही है।

टेंट में महिला, 5 दिन घर नहीं जा सकती क्योंकि चल रही माहवारी: जानिए सुप्रीम कोर्ट के जज ने क्यों दिखाई 2023 की तस्वीर, क्यों कहा- सिर्फ दिल्ली-मुंबई ही भारत नहीं

सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस संजय करोल ने शनिवार (19 अक्टूबर 2024) को एक ऐसी महिला की दर्दनाक कहानी का खुलासा किया, जिसे अपने मासिक धर्म के दौरान घर से बाहर रहना पड़ता है। जज ने साल 2023 में खींची गई एक तस्वीर भी दिखाई, जिसमें महिला को एक टेंट के नीचे रहते हुए दिखाया गया है।

बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश करोल ने कहा, “यह तस्वीर मैंने एक सुदूर गाँव में ली थी। यह तस्वीर एक महिला की है, जिसे उन पाँच दिनों के लिए अपने घर में प्रवेश करने की मनाही कर दी गई थी, जब वह शारीरिक परिवर्तन से गुज़र रही होती है। यह वह भारत है, जिसमें हम रह रहे हैं। हमें इन लोगों तक पहुँचना होगा।”

दरअसल, न्यायाधीश संजय करोल ने यह बात इंटरनेशनल सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स ऑन रिकॉर्ड (SCAORA) लीगल कॉन्फ्रेंस में कही। हालाँकि, जज ने यह नहीं बताया कि यह तस्वीर कहाँ ली गई थी। घटना का जिक्र करते हुए उन्होंने बिहार और त्रिपुरा के दूरदराज के इलाकों का जिक्र किया, जहाँ अभी तक अदालती व्यवस्था नहीं पहुँच पाई है।

सामाजिक न्याय और महिला अधिकारों के संदर्भ में बोलते हुए न्यायाधीश ने कहा कि ये उदाहरण ऐसे लोगों के हैं, जिनकी न्याय तक पहुँच थी, जो मुख्य रूप से शिक्षित थे और महानगरों में रहते थे। न्याय प्रणाली के ‘महानगर-केंद्रित’ दृष्टिकोण की ओर इशारा करते हुए जज ने कहा, “भारत दिल्ली नहीं है। भारत बॉम्बे नहीं है। हम भारत के संविधान के रक्षक और संरक्षक हैं।”

जस्टिस संजय करोल ने कहा, “हम लोगों को उन लोगों तक पहुँचने में एक प्रमुख भूमिका निभानी है, जिनके पास न्याय तक पहुँच नहीं है या जो वास्तव में नहीं जानते कि न्याय क्या है। क्या आपने कभी भारत के ग्रामीण इलाकों में रहने वाले लाखों लोगों के बारे में सोचा है? क्या आपने उनकी भाषा बोली है? क्या आप उन तक पहुँचे हैं? क्या आप उन्हें समझ पाए हैं?”

न्यायाधीश ने कहा कि सामाजिक और आर्थिक न्याय एक दूसरे से अभिन्न रूप से जुड़े हुए हैं और एक दूसरे पर निर्भर हैं। उन्होंने कहा, “असमानता केवल संसाधनों की कमी नहीं है, बल्कि दूसरों के सापेक्ष अभाव का एक गहरा अनुभव है।” उन्होंने संविधान को एक जीवंत दस्तावेज बताया और कहा कि यह सामाजिक और आर्थिक न्याय दोनों को आगे बढ़ाने में एक महत्वपूर्ण साधन के रूप में कार्य करता है।