जयपुर में पुलिस ने 12 बांग्लादेशी घुसपैठियों को पकड़ा है। यह सभी फर्जी कागजों के आधार पर भारत में रह रहे थे। इनके पास से भारत और बांग्लादेश, दोनों देशों के पासपोर्ट बरामद हुए हैं। बांग्लादेश से आने वाले इन घुसपैठियों ने फर्जी कागज के आधार पर सरकारी फ़्लैट तक ले लिया था। इन बांग्लादेशी घुसपैठियों की मदद करने वाले एक व्यक्ति को भी पुलिस ने पकड़ा है।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, जयपुर पुलिस की एक टीम ने गुप्त सूचना पर काम करते हुए JDA कॉलोनी जयसिंहपुरा से 12 बांग्लादेशी पकड़े हैं। इनमें से 6 को गिरफ्तार कर लिया गया है जबकि बाकी 6 को नाबालिग होने के चलते बाल संरक्षण केंद्र भेजा गया है।
पुलिस को इनके पास से बांग्लादेशी और भारतीय पासपोर्ट बरामद हुए हैं। इनके पास पासपोर्ट के अलावा भारतीय ड्राइविंग लाइसेंस, आधार कार्ड, राशन कार्ड और बाकी दस्तावेज भी बरामद हुए हैं। यह सभी जाली तरीके से बनाए गए थे।
इन्होने यहाँ तक कि फर्जी कागजों के आधार पर जयपुर विकास प्राधिकरण (JDA) से एक फ्लैट तक आवंटित करवा लिया था। गिरफ्तार किए गए बांग्लादेशियों के नाम सोहाग खान, पत्नी नसरीन खानम, बेटा मोईन खान, शबनम, शीबा खान और शबनूर हैं।
इन अवैध बांग्लादेशियों के साथ ही उस्मान नाम का एक आदमी पकड़ा गया है। उस्मान ने ही इन सबको भारत में बसने में मदद की थी। उस्मान से सोहाग खान ने अपनी बेटी का निकाह भी करवा दिया था। उस्मान से पुलिस पूछताछ कर रही है कि उसने आखिर यह फर्जी कागज कैसे बनवाए। उस्मान के घर से भी कई फर्जी कागज मिले हैं।
पुलिस को यह भी पता लगा है कि सोहाग खान दिसम्बर, 2023 में ही भारत आया है। हालाँकि, सोहाग खान ने दावा किया कि वह 20 साल पहले भारत आया था। उसके यात्रा रिकॉर्ड से उसके दिसम्बर, 2023 में भारत आने की पुष्टि हुई है। पुलिस ने सोहाग समेत 6 लोगों को जेल भेज दिया है।
इस मामले की जानकारी देते हुए जयपुर के DCP अमित कुमार ने बताया, “कुछ दिन पहले एक बांग्लादेशी महिला के भांकरोटा थाना में रहने का इनपुट मिला था। उसके साथ यहाँ रहने बालों ने धोखाधड़ी की थी। महिला ने बांग्लादेश जाकर पुलिस के पास शिकायत दर्ज करवाई थी। इसके बाद हमें इस विषय में तकनीकी इनपुट मिला।”
जयपुर पश्चिम के भांकरोटा थाना और साइबर सैल ने संयुक्त कार्रवाई करते हुए 12 संदिग्ध बांग्लादेशी नागरिकों की पहचान की। इनमें से 6 को गिरफ्तार किया गया है और 1 भारतीय सहयोगी को भी हिरासत में लिया गया। 6 नाबालिग और दिव्यांग व्यक्तियों को देखभाल हेतु CWC और शिशुगृह भेजा गया। pic.twitter.com/4ipNgHvVFs
अमित कुमार ने आगे बताया, “इसके बाद जब और जाँच की गई तो पता चला कि सोहाग खान और उससे जुड़े कई बांग्लादेशी लोग यहाँ भारतीय दस्तावेज बना कर रह रहे हैं। जब इस मामले में छापेमारी हुई तो कई फर्जी कागज मिले। इसके बाद इनको पकड़ कर जेल भेज दिया गया है।”
अमित कुमार ने बताया कि इनका एक साथी उस्मान भी गिरफ्तार किया गया है। उस्मान के पास से इन बांग्लादेशियों के और भी कागज मिले हैं। अमित कुमार ने बताया कि इस मामले में पुलिस ने गृह मंत्रालय को रिपोर्ट भेज दी है और पुलिस इनसे पूछताछ कर दी है।
सोवियत संघ (USSR) के विघटन (1991) के बाद संयुक्त राज्य अमेरिका खुद को दुनिया की इकलौती महाशक्ति के तौर पर पेश करता है। अमेरिका खुद को मानवाधिकार का चैंपियन, न्याय का रक्षक और अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्थाओं को लागू करने के नेता के तौर पर दिखाता है, जिसमें नैतिकता और अंतर्राष्ट्रीय कानूनों को सबसे ऊपर बताता है। वो अपने साथियों जैसे इजरायल, यूएई और भारत को भी नैतिकता पर चलने की दुहाई देता है।
अमेरिका खुद को ‘बड़ा भाई’ दिखाने के लिए अपनी ताकत का इस्तेमाल करने से नहीं चूकता, चाहे वो ओसामा बिन लादेन जैसे दुश्मन को दूसरे देश में घुसकर मारने की बात हो, या खुली व्यापारिक व्यवस्था की दुहाई देकर समंदर में निगाहबानी करने की बात हो। वो खुद तो ऐसा करता है, लेकिन भारत जैसे उभरते देश जब अपने खिलाफ खतरे को कम करने के लिए कोई कदम उठाते हैं, तो ‘ज्ञान’ देने चला आता है। ये उसके दोहरे रवैये को दिखाता है।
चीन और भारत इस समय एशिया की दो महाशक्तियों के तौर पर उभर रहे हैं। जिसमें अमेरिका भारत का सहयोगी होने का दिखावा करता है और कहता है कि दोनों देशों के समान लोकतांत्रिक मूल्य हैं। दोनों देशों के आदर्श एक जैसे हैं, तो दूसरी तरफ वो चीन की राजनीतिक व्यवस्था को कम्युनिष्ट बताकर उसका विरोध करता है। चीन और अमेरिका एक-दूसरे के कट्टर दुश्मन बन चुके हैं। दोनों एक-दूसरे के खेमे वाले देशों में अपना दबदबा बनाने की भी कोशिश करते हैं।
ऐसी ही एक जगह है पैसिफिक आईलैंड्स.. यानी प्रशांत महासागर का द्वीपीय इलाका। जहाँ कई सारे छोटे-छोटे द्वीप समूहों वाले देश बसे हुए हैं। पैसिफिक आईलैंड्स में अमेरिका के सामने चीन खड़ा हो रहा है। ये वही देश या द्वीपीय जगह हैं, जहाँ से द्वितीय विश्व युद्ध में अमेरिका ने जापान पर शिकंजा कसा था। लेकिन अब चीन वहाँ अपना प्रभाव बढ़ा रहा है, ताकि ताईवान जैसे मुद्दे पर वो अमेरिकी युद्धक नीति की काट तैयार कर सके। ये बात अमेरिका को बिल्कुल भी पसंद नहीं आ रही, क्योंकि उसकी दादागिरी को चुनौती मिल रही है।
पैसिफिक आईलैंड्स कहाँ पर स्थित हैं? क्यों ये महत्वपूर्ण हैं…
सबसे पहले ये जानिए कि प्रशांत द्वीपीय इलाका क्या है? क्योंकि इस इलाके को जाने-बगैर पूरे विवाद की जड़ को समझ पाना बड़ी चुनौती होगी। पैसिफिक आईलैंड्स प्रशांत महासागर के इलाकों में फैले द्वीपों के समूह हैं, जिन्हें मूल रूप से मेलानेशिया, माइक्रोनेशिया और पोलिनेशिया में बाँटा जाता है। ये पूरा इलाका 8 लाख वर्ग किमी से अधिक का है। इसका 9वाँ-दसवाँ हिस्सा न्यूजीलैंड और न्यू गिनी द्वीप समूह के अंदर भी आता है। इस इलाके में कई देश हैं, तो कई ऐसे द्वीप समूह हैं, जिनपर यूरोपीय देशों, अमेरिका या अन्य किसी का कब्जा है।
पैसिफिक आईलैंड्स का इलाका (फोटो साभार: InfoPlease)
इस इलाके को बेहतर तरीके से समझने के लिए सबसे पहले हमें ऑस्ट्रेलिया की तरफ नजर डालनी होगी। ऑस्ट्रेलिया के मुख्य भूभाग से पूर्व और उत्तर की तरफ, पूर्वी दिशा में विस्तार लिए सैकड़ों-हजारों द्वीप हैं। इन्हें न्यू गिनी आईलैंड, बिस्मार्क द्वीप समूह (आईलैंड्स), सोलोमन आईलैंड्स, वानुअतु देश, न्यू कैलेडोनिया हैं। जिन्होंने मोटा-मोटी मेलानेशिया की पहचान दी जाती है। इसके बगल में माइक्रोनेशिया का इलाका है, जिसमें पलाऊ, गुआम से लेकर कैरोलन आईलैंड्स, नौरू, मार्शल द्वीप समूह और किरिबाती जैसे देश आते हैं।
वहीं, पोलिनेशाई इलाके में हवाई आईलैंड्स (अमेरिका का नौसैनिक अड्डा, जिसपर जापान ने आक्रमण किया था), उसके दक्षिण पश्चिम में न्यूजीलैंड, तुवालु, वालिस, समाओ, अमेरिकन समोआ, टोंगा, फ्रेंच पॉलिनेशिया (फ्रांस द्वारा शासित) देश या इलाके आते हैं। इस पूरे में स्थानीय निवासियों के साथ यूरोपीय मूल के लोगों की संख्या अधिक है, साथ ही ईसाईयत मुख्य धर्म है। अधिकतर देशों में अंग्रेजी या फ्रेंच भाषा इस्तेमाल की जाती है, इसके बावजूद इस इलाके में सैकड़ों स्वतंत्र बोलियाँ-भाषाएँ हैं। इसी इलाके के बीच में माइक्रोनेशियाई पहचान वाले इलाके में जो मार्शल द्वीप समूह हैं, उसी पर हुई ज्यादतियों को सामने लाने के लिए ये लेख लिखा गया है।
अमेरिका के परमाणु धमाकों की विभीषिका से अब तक कराह रहे मार्शल आईलैंड्स के निवासी
चीन इस इलाके में अमेरिकी दबदबे को चुनौती दे रहा है, उसकी काट खोजने के लिए अब अमेरिका ने उस इलाके पर ध्यान देना शुरू किया है। इसके लिए उसने सितंबर में एक कानून बनाया। जिसमें अमेरिका और इस इलाके के इतिहास की दुहाई दी गई है। ये अलग बात है कि अमेरिका ने इस इलाके को वैसे ही भुला दिया था, जैसे अफगानिस्तान से निकलने के बाद पूरे देश को छोड़ दिया। ये पूरा मामला अमेरिकी नीतियों के विश्वासघात को भी सामने लाता है।
अमेरिका ने किए थे 67 परमाणु परीक्षण, हिरोशिमा पर गिराए गए बम से 1000 ज्यादा ताकतवर बम भी फोड़ा
द डिप्लोमैट की रिपोर्ट के अनुसार, संयुक्त राज्य अमेरिका ने मार्शल द्वीप पर 67 परमाणु और थर्मो न्यूक्लियर परीक्षण किए, जो 12 साल के दौरान हर दिन हिरोशिमा में हुए परमाणु बम विस्फोट से 1.6 गुना ज्यादा बड़े धमाके के बराबर रहे। यह ध्यान देने योग्य बात ये है कि किसी भी देश ने अमेरिका से अधिक परमाणु परीक्षण नहीं किए हैं, लेकिन अमेरिका के इन परमाणु परीक्षणों ने पूरे इलाके की विनाशलीला की दर्दभरी कहानियों को अनदेखा कर दिया।
मार्शल आईलैंड्स के लोग उन परमाणु परीक्षणों की वजह से आज भी कैंसर, परमाणु विकिरण जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं, लेकिन अमेरिका ने जो गलतियाँ अतीत में की, उन्हें सुलझाने की जगह, पीड़ितों से माफी माँगने की जगह, उन लोगों को उनके हाल पर छोड़ दिया है। मार्शल आईलैंड्स के निवासी आज भी अमेरिका से न्याय और नुकसान की भरपाई की माँग कर रहे हैं, लेकिन अमेरिका को इन सबसे कोई असर नहीं पड़ रहा, वो आँख-कान बंद कर अपने हितों की रक्षा करने में व्यस्त है।
फोटो साभार: प्रशांत आईलैंड्स बुलेटिन
हालाँकि अगस्त में अमेरिका की नींद तब खुली, जब प्रशांत आईलैंड्स के देशों के एक मंच से चीन की तरफ झुकाव वाले कदम उठाए गए। इसके तुरंत बाद पश्चिमी देशों की मीडिया की भी नींद खुल गई और वो उन देशों (ओशिनियाई देशों) की बुराई में जुट गया। इसके बाद ही अमेरिका की भी नींद खुली और सितंबर 2024 वाला कानून बनाया। इसके बाद अमेरिका ने मार्शल आईलैंड्स को ‘उचित’ सहायता की बात कही।
इस बीच, मार्च 2024 में अमेरिका के अब तक के सबसे बड़े परमाणु बम विस्फोट की 70वीं वर्षगाँठ भी वहाँ मनाई गई, जिसमें प्रशांत द्वीपीय देशों के संघ के महासचिव हेनरी पूना भी पहुँचे। अमेरिका ने 1945 में यहाँ ‘कैसल ब्रावो’ नाम के परमाणु बम का परीक्षण किया था, जो जापान के हिरोशिमा पर गिराए गए परमाणु बम से 1000 गुना ज्यादा ताकतवर था। इस वर्षगाँठ के मौके पर हेनरी पूना ने भाषण दिया और अमेरिका समेत उन पश्चिमी ताकतों को मार्शल आईलैंड्स की तबाही का जिम्मेदार ठहराया, जिन्होंने मार्शल आईलैंड्स पर परमाणु धमाके तो किए, लेकिन स्थानीय लोगों को मरने के लिए छोड़ दिया।
यही नहीं, अमेरिका ने अपने वैज्ञानिकों को वहाँ स्थानीय लोगों पर हो रहे परमाणु विकिरणों के अध्ययन के लिए भी भेजा, लेकिन परमाणु विकिरण से मर रहे लोगों को राहत देने के लिए कोई कदम नहीं उठाया। उन्होंने अमेरिकी कदमों को अपर्याप्त बताते हुए कहा कि इस क्षेत्र को अमेरिका ने ‘लगभग’ अनदेखा ही किया है।
वाशिंगटन डीसी के अनुसार, किसी विशेष क्षेत्र में लगातार परमाणु परीक्षण और उससे होने वाले नुकसान, पर्यावरण और भूविज्ञान के लिए ‘पूर्ण और अंतिम निपटान’ 150 मिलियन डॉलर है। यह राशि मार्शल द्वीप समूह को 1986 में अमेरिका से अलग होने पर कॉम्पैक्ट ऑफ फ्री एसोसिएशन की शर्तों के तहत दी गई थी। मुद्रास्फीति को ध्यान में रकें, तो ये समझौता आज की तारीख में 430 मिलियन डॉलर का है।
हालाँकि प्रशांत आईलैंड्स देशों का मंच और मार्शल आईलैंड्स की सरकार इस मुआवजे को अपर्याप्त बताते हैं। उनका कहना है कि एक परमाणु दावा न्यायाधिकरण ने मार्शल आईलैंड्स के लिए मुआवजे की कीमत 2.3 बिलियन डॉलर रखी थी, जिसकी वैल्यू मौजूदा समय में 3 बिलियन डॉलर से अधिक है। उन्हें इसी निर्णय के आधार पर मुआवजा चाहिए।
चूँकि परमाणु परीक्षणों से हुई तबाही का सही अनुमान तक नहीं लगाया जा सकता और न ही उसकी सही भरपाई की जा सकती है, ऐसे में अमेरिका भी अपनी जिम्मेदारी लेने की जगह राहत के ‘टुकड़े’ देकर पीड़ितों को अपमानित ही कर रहा है। मार्शल आईलैंड्स का ये भी कहना है कि वो 1986 तक अमेरिका की ही गुलामी में था, ऐेसे में मुआवजा तय करते समय अमेरिकी हितों को वरीयता दी गई।
मार्शल आईलैंड्स के लोगों पर बिना बताए अमेरिका ने किए वैज्ञानिक परीक्षण
अमेरिका ने मार्शल आईलैंड्स पर 67 परमाणु बमों के धमाके के लिए, लेकिन इसके बाद भी उसकी कारगुजारियाँ रुकी नहीं। अमेरिका ने चुपके-चुपके अपने वैज्ञानिक यहाँ भेजे और रिसर्च का काम करता रहा। खासकर परमाणु धमाके के बाद पड़ने वाले प्रभावों को लेकर। मार्शल आइलैंड्स जर्नल के संपादक और परमाणु ऊर्जा विरासत के विशेषज्ञ गिफ जॉनसन ने कहा, “प्रशांत द्वीप के नेता इस बात को अच्छे से जानते हैं कि अमेरिका ने इन धमाकों की वजह से हुए नुकसान का मुआवजा बहुत कम दिया है और न ही धमाकों की वजह से हुई समस्याओं पर ध्यान दिया है। ये सीधे तौर पर अमेरिका द्वारा मार्शल आईलैंड्स के प्रति वादाखिलाफी है।”
अमेरिका पर मार्शल आईलैंड्स ही नहीं, इस पूरे इलाके की अनदेखी के आरोप लगते रहे हैं, लेकिन अमेरिका ने चुप्पी साधे रखी। और अब जब चीन सक्रिय हो गया, तो फिर से अमेरिका की नींद खुली है। जो ये बताती है कि वो सिर्फ अपने हित-स्वार्थ के लिए ही काम करता है। चूँकि अमेरिका अब जाग गया है, तो वो कोशिश कर रहा है कि प्रशांत महासागर में स्थित ये देश चीन के पाले में न चले जाएँ। ऐसे में उन्हें खुश करने के लिए बड़ी ‘बयानबाजियाँ’ भी करने लगा है।
मार्शल आईलैंड्स में अमेरिका के राजदूत ने अगस्त 2024 में इस देश को अमेरिका का ‘सबसे करीबी साथी’ बताया। साथ ही कहा कि अमेरिका इन देशों की प्राथमिकताओं को सुन रहा है और उन्हें संतुष्ट करने वाले जवाब भी दे रहा है। यहाँ भी वो स्थिर क्षेत्र और सुरक्षित क्षेत्र की गाथा गाना नहीं भूले। ये अलग बात है कि अमेरिका अब भी परमाणु धमाकों की वजह से हुए नुकसान का पूरा मुआवजा भरने को तैयार नहीं है, ऐसे में अमेरिकी राजदूत की थोथी दलीलें मार्शल आईलैंड्स के निवासियों के लिए किसी काम की नहीं।
बेनेटिक कबुआ मैडिसन ने तो अमेरिका की ‘लेटो’ नाम के स्थानीय लोक कहानियों में प्रलचित ऐसे ‘गॉड’ से तुलना की, जो सबसे ज्यादा ‘चालाक’ और दुष्ट होता है। बेनेटिक कबुआ मैडिसिन मार्शल एजुकेशनल इनिशिएटिव के कार्यकारी निदेशक हैं जो अमेरिका में मार्शल आईलैंड्स से आए लोगों के कल्याण के लिए कहता है। उन्होंने जोर देकर कहा, “प्रशांत इलाके के लोग ऐसी जगह चाहते हैं, जो परमाणु बमों के धमाकों से मुक्त हो और चीन-अमेरिका की दादागिरी-प्रभाव की लड़ाई का हिस्सा न रहे।”
वैसे, साल 2022 में यूएन ने एक प्रस्ताव दिया, जिसमें मार्शल आईलैंड्स में परमाणु धमाकों की वजह से इंसानों पर पड़े प्रभावों पर एक रिपोर्च तैयार की जानी थी, लेकिन अमेरिका ने इस प्रस्ताव का ये कहते हुए विरोध किया कि अमेरिका अपने कर्तव्यों को स्वीकार कर उन पर काम कर रहा है। हालाँकि ये रिपोर्ट सितंबर में आई, जिसमें यूएन ने अमेरिका से मार्शल आईलैंड्स के लोगों से ‘औपचारिक माफी और पूर्ण मुआवजा’ देने का आग्रह किया।
मार्शल आईलैंड्स की राष्ट्रपति हिल्डा हेन ने भी यूएनजीए (संयुक्त राष्ट्र महासभा) में अमेरिकी अत्याचारों की याद दिलाई और कहा, “अमेरिका ने हमारे ऊपर गहरी तबाही के निशान छोड़े हैं। हमारे लोग अपने घरों से विस्थापित हैं। मुआवजे की माँग अभी तक मानी नहीं गई। मार्शल आईलैंड्स में तबाही के निशान हर तरफ हैं।” वो मार्शल आईलैंड्स में फैले परमाणु कचरे की भयावहता के बारे में दुनिया को बता रही थी।
उन्होंने कहा कि अमेरिका ने अभी तक कोई बीच का रास्ता तक नहीं निकाला और न ही पीड़ितों से कोई माफी माँगी। उन्होंने जोर देकर कहा कि मार्शल आईलैंड्स के लोगों के भोलेपन का फायदा उठाया गया। परमाणु धमाकों की वजह से उन्हें विस्थापित होना पड़ा। यही नहीं, अमेरिका ने बिना लोगों से पूछे वहाँ पर वैज्ञानिक रिसर्च भी किए।
हालाँकि अभी तक अमेरिका ने इस दिशा में जो कुछ भी किया है, वो सिर्फ बयानबाजी तक ही सीमित है। उनका लक्ष्य सिर्फ इस इलाके में चीन का प्रभाव बढ़ने से रोकने का है, ऐसे में वो परमाणु धमाकों की वजह से हुई बर्बादियों का मुआवजा देने की तरफ बात तक नहीं करता है।
मार्शल आईलैंड्स पर परमाणु धमाकों का काला इतिहास
मार्शल आइलैंड्स, प्रशांत महासागर में स्थित 29 कोरल एटोल्स (उथले द्वीपों) का एक समूह है। यह द्वीपसमूह हवाई और ऑस्ट्रेलिया के बीच स्थित है। मार्शली लोग हजारों सालों से यहाँ रहते आए हैं, लेकिन 20वीं शताब्दी में उनकी जिंदगी और इन आईलैंड्स की शांति हमेशा के लिए छिन गई। पहले जापानी सेना और फिर अमेरिकी सेना ने इन आईलैंड्स पर कब्जा जमाया। इसके बाद संयुक्त राज्य अमेरिका ने मार्शल आईलैंड्स में शक्तिशाली परमाणु हथियारों का परीक्षण करने का इरादा किया, क्योंकि वे अलग-थलग स्थिति, छोटी आबादी और अन्य अमेरिकी सैन्य प्रतिष्ठानों से निकटता में थे। अंततः यहाँ परमाणु परीक्षणों का एक भयानक दौर शुरू हुआ जिसने इस पूरे क्षेत्र को बदल कर रख दिया।
1944 में अमेरिका ने द्वीपों को जापानी कब्जे से मुक्त कराकर यहाँ सैन्य अड्डे स्थापित किए। द्वितीय विश्व युद्ध के अंत में अमेरिका ने अपनी सैन्य और परमाणु शक्तियों का विस्तार करना शुरू किया। 1946 में, संयुक्त राष्ट्र ने मार्शल द्वीपों को प्रशांत द्वीपसमूह ट्रस्ट क्षेत्र के तहत अमेरिकी प्रशासन के अधीन कर दिया। यह तब की बात है जब द्वीपों की आबादी लगभग 52,000 थी।
1946 और 1958 के बीच, अमेरिका ने मार्शल द्वीपों में 67 परमाणु परीक्षण किए, जो धीरे-धीरे मार्शल आइलैंड्स के पर्यावरण, स्वास्थ्य और समुदायों के लिए एक बड़ी त्रासदी साबित हुए। सबसे महत्वपूर्ण परीक्षणों में से एक था ‘कैसल ब्रावो’ जो 1 मार्च 1954 को बिकिनी एटोल में हुआ था। यह अमेरिकी इतिहास में सबसे बड़ा और भयानक परमाणु विस्फोट था जिसने मार्शल द्वीपों के निवासियों के लिए अकल्पनीय विनाश और पीड़ा का दौर शुरू किया।
फोटो साभार: द डिप्लोमैट
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमेरिका ने अपनी परमाणु क्षमताओं को तेजी से बढ़ाने की दिशा में कदम उठाए। अमेरिकी सरकार ने परमाणु ऊर्जा आयोग (Atomic Energy Commission) की स्थापना की, जिसका उद्देश्य परमाणु विज्ञान और प्रौद्योगिकी के विकास को बढ़ावा देना था। उस समय, अमेरिका और सोवियत संघ के बीच बढ़ती परमाणु होड़ के कारण अमेरिका के लिए अधिक परमाणु हथियार विकसित करना बेहद महत्वपूर्ण माना जाता था।
“ऑपरेशन क्रॉसरोड्स” के तहत मार्शल द्वीपों में पहला परीक्षण हुआ। इसका मुख्य उद्देश्य परमाणु विस्फोटों के नौसैनिक युद्धपोतों पर प्रभाव का अध्ययन करना था। 1 जुलाई 1946 को “शॉट एबल” नामक परीक्षण बिकिनी एटोल में किया गया, जिसने परीक्षणों के दौर की शुरुआत की। इस परीक्षण ने वैश्विक परमाणु वैज्ञानिकों को यह प्रमाणित किया कि इन हथियारों की क्षमता बेहद घातक है, जिसमें एक मील दूर तक मौजूद सैनिकों को तुरंत मारने की शक्ति थी। इसके बाद 25 जुलाई को दूसरा परीक्षण हुआ।
अमेरिका के पहले परमाणु परीक्षण, जिसे “ट्रिनिटी टेस्ट” कहा गया, 1945 में किया गया था। इसके बाद हिरोशिमा और नागासाकी पर “लिटिल बॉय” और “फैट मैन” नामक बम गिराए गए थे, लेकिन इन घटनाओं के बाद यह पहला बड़ा परीक्षण था। हालाँकि, 10 अगस्त 1946 को ऑपरेशन क्रॉसरोड्स को रेडिएशन संबंधित चिंताओं के कारण बंद कर दिया गया, विशेष रूप से उन सैनिकों के लिए जो परीक्षणों में शामिल थे। 1969 में बिकिनी एटोल को साफ करने के लिए अमेरिका ने लंबे समय तक चलने वाले प्रयास शुरू किए।
साल 1950 में राष्ट्रपति हैरी एस ट्रूमैन ने अमेरिका की थर्मोन्यूक्लियर हथियारों पर शोध को बढ़ावा देने का फैसला लिया, जिससे मार्शल द्वीपों में और अधिक परीक्षणों की पूरी सीरीज शुरू हुई। 1951 में “ऑपरेशन ग्रीनहाउस” के तहत ईनेवेटक एटोल में कई परमाणु परीक्षण किए गए। इन परीक्षणों का उद्देश्य परमाणु बमों की विनाशकारी शक्ति को बढ़ाना और उनके आकार को कम करना था।
मार्शल आईलैंड्स को दिए गए चोट पर चोट
इसके बाद ‘ऑपरेशन आइवी’ नामक परीक्षणों की श्रृंखला 1952 में की गई, जिसमें पहला सफल हाइड्रोजन बम परीक्षण भी शामिल था। इसे “शॉट माइक” के नाम से जाना गया। इस परीक्षण के कुछ ही सालों बाद, 1954 में, अमेरिका ने ‘कैसल ब्रावो’ नामक परीक्षण किया, जो अब तक का सबसे बड़ा परमाणु विस्फोट था। इस विस्फोट ने ‘लिटिल बॉय’ से लगभग 1,000 गुना अधिक विनाशकारी प्रभाव डाला। इस परीक्षण से अत्यधिक मात्रा में रेडियोधर्मी पदार्थ वातावरण में फैल गए, जिससे पूरे क्षेत्र में भयावह असर हुआ।
ब्रावो परमाणु धमाका (फोटो साभार: अमेरिकी ऊर्जा विभाग)
इस परीक्षण के बाद, कई द्वीपों पर रेडियोधर्मी विकिरण फैल गया, जिसमें रंगेलप और अइलिंगिनाए जैसे एटोल भी शामिल थे, जो परीक्षण स्थल से मात्र 100 मील दूर थे। अमेरिकी सेना ने इन द्वीपों को समय पर खाली नहीं किया था, जिससे वहाँ रहने वाले लोग और विशेष रूप से बच्चे, खतरनाक रेडियोधर्मी सामग्री के संपर्क में आ गए। रेडियोधर्मी धूल के बीच खेल रहे बच्चों के कई मामलों ने इस त्रासदी की भयावहता को और बढ़ा दिया।
मार्शल आइलैंड्स के लोगों को शुरू में यह विश्वास दिलाया गया था कि ये परीक्षण अस्थायी होंगे और उनकी भूमि का प्रयोग ‘मानवता की भलाई’ के लिए किया जाएगा। बिकिनी एटोल के 167 निवासियों को उनके घरों से विस्थापित कर रोंगेरिक एटोल भेजा गया, जहाँ पर्याप्त संसाधन नहीं थे। 1948 तक लोग वहाँ भुखमरी की स्थिति में पहुँच चुके थे। इसके बाद उन्हें किली नामक द्वीप पर बसाया गया, लेकिन वहाँ भी हालात बहुत बेहतर नहीं थे।
1969 में बिकिनी एटोल के निवासियों को पुनः उनके द्वीपों में बसाने की कोशिश की गई, लेकिन 1978 में उन्हें फिर से हटा दिया गया क्योंकि रेडियोधर्मी स्तर बहुत अधिक था। बिकिनी एटोल आज भी इंसानों के रहने के लिए सुरक्षित नहीं है, और द्वीपवासी अपने घर लौटने के अमेरिकी वादे का इंतजार कर रहे हैं।
परमाणु परीक्षणों के कारण मार्शल आइलैंड्स के निवासियों के स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव पड़े। इन परीक्षणों के परिणामस्वरूप गर्भपात, मृत बच्चों का जन्म, थायरॉइड कैंसर और अन्य बीमारियों के मामलों में भारी वृद्धि हुई। विशेष रूप से रंगेलप के निवासियों को इसका भारी खामियाजा भुगतना पड़ा। बच्चों में बाल झड़ने, जलने और शरीर पर फफोलों जैसे लक्षण देखे गए, लेकिन अमेरिकी अधिकारियों ने यह दावा किया कि वे विकिरण के संपर्क में नहीं आए थे। ‘जेलीफ़िश बेबीज़’ नाम से जाने जाने वाले बिना हड्डी वाले बच्चों का जन्म भी विकिरण का दुष्परिणाम था। 1956 में परमाणु ऊर्जा आयोग के स्वास्थ्य और सुरक्षा निदेशक मेरिल ईसेनबड ने रंगेलप को ‘दुनिया में सबसे प्रदूषित जगह’ करार दिया था
अमेरिकी सरकार ने ‘प्रोजेक्ट 4.1‘ नाम का भयावह प्रोजेक्ट शुरू किया, जिसमें परमाणु विकिरण के प्रभावों का अध्ययन किया गया। इसे लेकर सबसे चिंताजनक बात यह थी कि मार्शल आइलैंड्स के निवासियों को बिना उनकी जानकारी या सहमति के इस परियोजना का हिस्सा बनाया गया। उनके स्वास्थ्य के साथ खुलेआम प्रयोग किए गए, और यह कई दशकों तक चला।
मार्शल आईलैंड्स के नेता टोनी डेब्रम ने 1996 में अमेरिकी कॉन्ग्रेस को बताया कि अमेरिकी डॉक्टरों ने शोध के नाम पर लोगों के स्वस्थ और अस्वस्थ दोनों तरह के दाँत निकाल दिए थे। मार्शल की महिलाओं को अमेरिकी वैज्ञानिकों के सामने कपड़े उतारने के लिए मजबूर किया गया। यह परियोजना कई दशकों तक चली।
मार्शल आईलैंड्स की तबाही आधुनिक उपनिवेशवाद का दुखद उदाहरण
मार्शल आइलैंड्स की कहानी एक छोटे, शांत द्वीपसमूह की है जिसे आधुनिक विश्व की शक्ति-सियासत और परमाणु हथियारों की होड़ ने तबाह कर दिया। यह कहानी आधुनिक समय के उपनिवेशवाद का एक दुखद उदाहरण है, जहाँ एक महाशक्ति ने एक छोटे से द्वीप समूह को अपने सैन्य और वैज्ञानिक प्रयोगों के लिए कुर्बान कर दिया। इन परीक्षणों ने न केवल द्वीपों के पर्यावरण को नष्ट किया, बल्कि वहाँ के निवासियों के स्वास्थ्य और जीवन को भी अपूरणीय क्षति पहुँचाई। यह एक भूला हुआ अध्याय है जिसमें अमेरिका की महाशक्ति बनने की चाहत और परमाणु शक्ति के परीक्षणों ने एक समूची सभ्यता को बर्बाद कर दिया। यह एक ऐसा उदाहरण है, जहाँ वैश्विक राजनीति और वैज्ञानिक प्रयोगों ने मानवाधिकारों की खुलेआम अनदेखी की।
आज तक, अमेरिका ने मार्शल आइलैंड्स के लोगों से माफी नहीं माँगी है। यहाँ तक कि जब अमेरिकी सरकारी समितियों ने 1994 में यह निष्कर्ष निकाला कि मार्शल आइलैंड्स के लोगों का विकिरण के संपर्क में आना रिसर्च के उद्देश्यों से जुड़ा नहीं था, तब भी इस तथ्य को न्यायोचित ठहराने का प्रयास किया गया। मार्शल आइलैंड्स के लोग आज भी अपनी खोई हुई भूमि, स्वास्थ्य और भविष्य को पुनः प्राप्त करने की लड़ाई लड़ रहे हैं। अमेरिका ने इन परीक्षणों के दीर्घकालिक प्रभावों को नकारने का प्रयास किया। विकिरण के फैलने का क्षेत्र इतना विशाल था कि इसके अंश यूरोप, जापान, भारत और ऑस्ट्रेलिया तक पाए गए। इसने वैश्विक स्तर पर परमाणु परीक्षणों के खिलाफ एक आंदोलन को भी जन्म दिया।
अमेरिका की यह तथाकथित “नियम-आधारित अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था” वास्तव में उसके अपने हितों को पूरा करने के लिए बनाई गई व्यवस्था है, जो दुनिया के अन्य देशों, विशेष रूप से स्वतंत्र फैसले लेने वाले देशों को दबाव में लेकर अपने साथ लाने का प्रयास करती है। मार्शल आइलैंड्स के मामले में यह पूरी तरह से साफ है कि अमेरिका ने अपनी ताकत और सत्ता को बनाए रखने के लिए इंसानी जिंदगियों और इंसानी अधिकारों की पूरी तरह से अनदेखी की है।
मूल रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित की गई है, मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।
वस्तु एवं सेवा कर (GST) खुफिया विभाग ने एक बड़ी कार्रवाई के तहत केरल के त्रिशूर में सोने के आभूषण निर्माताओं के यहाँ से 120 किलोग्राम से अधिक (कुछ रिपोर्ट में 100Kg और कुछ में 105Kg) बेहिसाबी सोना जब्त किया है। GST विभाग के लगभग 700 अधिकारियों ने 78 केंद्रों और दुकानों पर छापेमारी की। जाँचकर्ताओं ने पाँच साल की कर चोरी के सबूतों का खुलासा किया है।
GST विभाग ने छापेमारी की यह कार्रवाई बुधवार (23 अक्टूबर 2024) की शाम को शुरू की, जो अगले दिन भी जारी रही। इस छापेमारी अब तक 35 आभूषण निर्माताओं एवं दुकान मालिकों के 78 परिसरों (कुछ रिपोर्ट में 75 और कुछ में 73) को कवर किया गया है। छापे राज्य जीएसटी विभाग के त्रिशूर स्थित खुफिया और प्रवर्तन विंग द्वारा महीनों तक की गई जाँच के आधार पर शुरू किए गए।
यह कार्रवाई राज्य में जीएसटी विभाग द्वारा की गई अब तक की गई सबसे बड़ी छापेमारियों में से एक है। इसमें करीब 700 अधिकारी शामिल हैं। छापेमारी गुरुवार की दोपहर खबर लिखे जाने तक जारी थी। छापेमारी में आभूषण कारखानों की तलाशी ली गई, जहाँ सोना पिघलाया और तैयार किया जाता है। इसके साथ ही कारोबारी मालिकों के घरों की भी तलाशी ली गई।
जीएसटी के विशेष आयुक्त रेन अब्राहम इस रेड की निगरानी कर रहे हैं, जो शहर भर में चल रहा है। गोपनीयता को बनाए रखने के लिए अधिकारियों को घूमने, जीएसटी प्रशिक्षण या स्थानीय मंदिरों के दर्शन के बहाने बसों और कारों सहित विभिन्न साधनों से त्रिशूर लाया गया। छापे का नाम ‘टोरे डेल ओरो’ रखा गया है, जो स्पेन के एक प्रसिद्ध ऐतिहासिक स्मारक ‘द गोल्डन टॉवर’ के नाम से जाना जाता है।
अब्राहम रेन ने कहा, “इसका मुख्य उद्देश्य पाँच वर्षों की अवधि में आभूषण निर्माताओं और आभूषण मालिकों के बीच हुए बेहिसाब लेन-देन का पता लगाना था।” अधिकारियों के अनुसार, जाँच से पता चला है कि कई निर्माता बिना कर चुकाए सोने के लेन-देन में लगे हुए हैं। कुछ मालिकों ने कर चोरी की है। अधिकारियों ने बताया कि छापेमारी में कर चोरी के सबूत मिले हैं।
त्रिशूर में लगभग 3,000 स्वर्ण आभूषण बनाने वाली इकाइयाँ हैं। त्रिशूर का सोने से जुड़ाव तब शुरू हुआ जब रोमन और अरब व्यापारी कोडुंगल्लूर के अब लुप्त हो चुके बंदरगाह शहर मुजिरिस में अक्सर आते थे। हालाँकि, आर्थिक उदारीकरण, स्वर्ण नियंत्रण अधिनियम को निरस्त करने और अनिवासी भारतीयों को 5 किलोग्राम तक सोना लाने की अनुमति देने से स्वर्णकारों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा।
दिल्ली मेट्रो में छपे एक विज्ञापन पर विवाद हो गया है। विज्ञापन कथिततौर पर ब्रेस्ट कैंसर पर जागरूकता फैलाने के लिए युवराज सिंह के एनजीओ ‘YouWeCan फाउंडेशन’ का था। इस विज्ञापन में महिलाओं की ब्रेस्ट के लिए संतरा शब्द इस्तेमाल हुआ है। इसमें कहा गया है- महीने में एक बार अपने संतरों को चेक करते रहे। इससे जिंदगी बच सकती है।
नीचे पोस्टर का स्क्रीनशॉट लगा है। देख सकते हैं कि तस्वीर AI द्वारा निर्मित है और हर महिला को ब्रेस्ट कैंसर से सचेत करने के लिए संतरे दिखाए गए हैं। फोटो देखने के बाद अब हर कोई इस विज्ञापन की आलोचना कर रहा है।
लोगों का कहना है कि आखिर कैसे कोई ब्रेस्ट कैंसर पर जागरूकता फैलाने के नाम पर ऐसी अभद्रता कर सकता है। ये भी पूछा जा रहा है कि अगर पोस्टर ब्रेस्ट कैंसर पर था तो संतरे दिखाने की जरूरत क्या थी। क्या स्तन को स्तन कह सकें हमारा समाज इतना भी नहीं सहज है। दिल्ली मेट्रो से सवाल हो रहा है कि किस मानसिक रोगी ने ऐसे विज्ञापन लगाए और किसने इसे लगाने की अनमुति दी? ब्रेस्ट कैंसर घातक है जिसने 2022 में 670000 महिलाओं की जान लेली और ये लोग मजाक बनाने पर लगे हैं।
Shame on @OfficialDMRC. Which Psycho- sexist- sicko designed this ad and then which “metro official” approved it ? Your marketing head should be sacked for this cheap thrill sexist ad approval ! The creative agency must be named and shamed too ! Breast cancer is deadly, it… pic.twitter.com/ZxfnzyqVau
एक यूजर ने इस विज्ञापन को लेकर दिखाई गई असंवेदनशीलता पर आपत्ति जताते हुए कहा कि वो इस तरह ब्रेस्ट कैंसर के मुद्दे को सेक्सुलाइज करने के खिलाफ हैं। उनकी माँ का इस बीमारी से देहांत हुआ ता और वह जानते हैं कि ये कितना गंभीर मामला है।
I hv a problem with this ad at Delhi Metro. My own loving dear mother died of Breast Cancer, which was Stage 4 at diagnosis. The irony was her son(me) ws a Breast Surgeon at that time, & out of modesty, she did not even tell her own son, when it ws a small lump, that ws… pic.twitter.com/U32P2euu6Z
इतनी आलोचनाओं के बाद दिल्ली मेट्रो ने अपनी प्रतिक्रिया दी और कहा कि वो लोग विज्ञापन देने वाले के साथ संपर्क में हैं। ऐसे विज्ञापन मेट्रो परिसर से हटवाने के लिए एक्शन लिया जा रहा है। उन्होंने ये भी बताया कि जिस विज्ञापन को लेकर विवाद हुआ है वो विज्ञापन येलो लाइन की सिर्फ एक ट्रेन पर लगा था जिसे अब हटवा दिया गया है।
वहीं यूवीकैन फाउंडेशन की ट्रस्टी पूनम नंदा का कहना है कि हमने 300000 महिलाओं को इसे लेकर शिक्षित किया है। अगर संतरा के इस्तेमाल से लोगों के स्वास्थ्य पर बात हो सकती है तो इसका इस्तेमाल एकदम सही है। भारत में ब्रेस्ट के बारे में बात करना संवेदनशील हो सकता है। इसलिए ऐसे विजुअल बनाए जाते हैं कि बात भी रखी जा सके और लोगों को आपत्ति भी न हो।
बांग्लादेश में प्रधानमंत्री शेख हसीना का तख्ता पलटने के बाद वहाँ के छात्रों ने राष्ट्रपति मोहम्मद शहाबुद्दीन के खिलाफ़ विरोध प्रदर्शन शुरू किया है। मंगलवार (22 अक्टूबर 2024) को सैकड़ों प्रदर्शनकारियों ने बंगभवन पर कब्जा करने की कोशिश की। हालाँकि, पुलिस ने उन्हें खदेड़ दिया। वहीं, छात्रों के दवाब में बांग्लादेश की अंतरिम सरकार ने शेख हसीना से जुड़ी ‘बांग्लादेश छात्र लीग’ पर प्रतिबंध लगा दिया है।
यह विरोध उस समय शुरू हुआ, जब इस सप्ताह की शुरुआत में राष्ट्रपति मोहम्मद शहाबुद्दीन ने कहा कि उनके पास शेख हसीना की इस्तीफा वाला पत्र नहीं है। 20 अक्टूबर 2024 को प्रकाशित एक साक्षात्कार में राष्ट्रपति ने कहा कि उन्होंने सुना है कि शेख हसीना ने इस्तीफा दे दिया है, लेकिन उनके पास इसका कोई दस्तावेजी सबूत नहीं है।
साक्षात्कार में राष्ट्रपति ने कहा कि 5 अगस्त को सुबह 10:30 बजे प्रधानमंत्री कार्यालय से फोन आया कि शेख हसीना राष्ट्रपति से मिलने राष्ट्रपति भवन बंगभवन आएँगी, लेकिन एक घंटे बाद फिर फोन आया कि वह नहीं आएँगी। राष्ट्रपति शहाबुद्दीन ने कहा कि वह प्रधानमंत्री का इंतजार कर रहे थे। उन्हें नहीं पता था कि देश में क्या हो रहा है।
राष्ट्रपति शहाबुद्दीन ने कहा, “एक बार मैंने सुना कि वह देश छोड़कर चली गई हैं। उन्होंने मुझे कुछ नहीं बताया। मैंने आपको वही बताया जो सच है। वैसे, जब सेना प्रमुख जनरल वकार बंगभवन आए तो मैंने जानना चाहा कि क्या प्रधानमंत्री ने इस्तीफा दे दिया है। उन्होंने मुझे वही जवाब दिया- मैंने सुना है कि उन्होंने इस्तीफा दे दिया है।”
‘जनतार चोख’ पत्रिका के मुख्य संपादक मतिउर रहमान चौधरी को साक्षात्कार देते हुए राष्ट्रपति ने कहा कि उन्होंने त्यागपत्र लेने की कोशिश की, लेकिन ऐसा नहीं कर पाए। उन्होंने आगे कहा, “शायद उन्हें समय नहीं मिला। जब चीजें नियंत्रण में आ गईं तो एक दिन कैबिनेट सचिव त्यागपत्र की प्रति लेने आए। मैंने उनसे कहा कि मैं भी इसकी प्रति ढूंढ रहा हूँ।”
हालाँकि, उस समय यह खबर आई थी कि शेख हसीना भारत रवाना होने से पहले राष्ट्रपति भवन गईं और अपना इस्तीफा सौंप दिया। उनके जाने के बाद राष्ट्रपति ने घोषणा की थी कि हसीना ने इस्तीफा दे दिया है। राष्ट्रपति मोहम्मद शहाबुद्दीन ने राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में कहा, “आप जानते हैं कि प्रधानमंत्री शेख हसीना ने राष्ट्रपति को अपना इस्तीफा सौंप दिया है और मैंने इसे स्वीकार कर लिया है।”
राष्ट्रपति ने यह भी कहा कि कानूनी तौर पर सुनिश्चित होने के लिए उन्होंने मुख्य सलाहकार की नियुक्ति से पहले सुप्रीम कोर्ट की राय ली थी। सुप्रीम कोर्ट ने 8 अगस्त को इस मामले पर अपनी राय देते हुए कहा था कि राष्ट्रपति अंतरिम सरकार के मुख्य सलाहकार और अन्य सलाहकारों की नियुक्ति कर सकते हैं, ताकि कार्यपालिका का सुचारू संचालन सुनिश्चित हो सके।
अब शेख हसीना के त्याग पत्र दिए बिना अंतरिम सरकार के गठन को लेकर सवाल उठ रहे हैं। बांग्लादेश की निर्वासित लेखिका तस्लीमा नासरीन ने भी इसको लेकर सवाल उठाया है। उन्होंने अपने सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए कहा, “शेख हसीना ने अपने प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा नहीं दिया है और वह अभी भी जीवित हैं। इसलिए, यूनुस सरकार अवैध है।”
Sheikh Hasina did not resign from her prime Minister post and she is still alive. Therefore,Yunus govt is illegal.
कानून सलाहकार आसिफ नजरूल ने बुधवार (23 अक्टूबर 2024) को मीडिया के सामने अदालत की राय पेश की, जिसमें अदालत ने कहा कि प्रधानमंत्री ने इस्तीफा दे दिया है और राष्ट्रपति के पास मुख्य सलाहकार और अन्य सलाहकारों की नियुक्ति का अधिकार है। इसलिए, अब सवाल अंतरिम सरकार की वैधता के बारे में कम और इस्तीफे के पत्र को लेकर राष्ट्रपति के यू-टर्न के बारे में ज़्यादा है।
विधि सलाहकार आसिफ नजरुल ने राष्ट्रपति पर झूठ बोलने का आरोप लगाते हुए कहा, “यदि आप पूरे देश के सामने कही गई किसी बात का खंडन करते हैं तो यह कदाचार के समान है। फिर सवाल उठता है कि क्या आपमें राष्ट्रपति के रूप में सेवा करने की मानसिक क्षमता है। ये सवाल उठ सकते हैं… आपने इसके लिए गुंजाइश बनाई है।” अब छात्र राष्ट्रपति से इस्तीफे की माँग कर रहे हैं।
छात्रों के दबाव के बीच मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार ने शेख हसीना की पार्टी ‘बांग्लादेश अवामी लीग’ की छात्र शाखा ‘बांग्लादेश छात्र लीग’ पर प्रतिबंध लगा दिया है। बांग्लादेश के गृह मंत्रालय ने एक आधिकारिक आदेश में कहा कि सरकार ने ‘आतंकवाद विरोधी अधिनियम 2009’ की धारा 18 की उपधारा (1) में प्रदत्त शक्तियों के तहत ‘बांग्लादेश छात्र लीग’ पर प्रतिबंध लगा दिया है।
आंदोलनकारी छात्रों ने 22 अक्टूबर को अंतरिम सरकार के सामने पाँच सूत्री माँग रखी थी, जिसमें बांग्लादेश के राष्ट्रपति मोहम्मद शहाबुद्दीन का इस्तीफा भी शामिल है। इन माँगों में अवामी लीग के छात्र संगठन ‘बांग्लादेश छात्र लीग’ पर प्रतिबंध लगाना भी शामिल था। माना जा रहा है कि अंतरिम सरकार छात्रों के दबाव में राष्ट्रपति शहाबुद्दीन का इस्तीफा ले सकती है।
कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो की मुश्किलें बढ़ती जा रही हैं। उनकी कुर्सी पर भी अब संकट गहरा गया है। विपक्षियों के हमले के बीच उनकी खुद की ही पार्टी के सांसदों ने उन्हें इस्तीफा देने का अल्टीमेटम थमा दिया है। इस्तीफा ना देने पर उनके खुलाफ विद्रोह की चेतावनी भी दी गई है।
कनाडाई मीडिया के अनुसार, जस्टिन ट्रूडो का विरोध करने वाले लिबरल पार्टी के सांसदों ने उन्हें 28 अक्टूबर, 2024 तक पद छोड़ देने को कहा है। पद ना छोड़ने पर इन सांसदों ने खुली बगावत की चुनौती दी है। ट्रूडो के खिलाफ इस मुहिम में कम से कम 30 सांसद शामिल हैं।
ट्रूडो को हटाने को लेकर एक पत्र भी यह सांसद अपने साथियों को थमा रहे हैं। इस पत्र पर कई सांसदों के हस्ताक्षर भी करवाए गए हैं। बुधवार (23 अक्टूबर, 2024) को कनाडाई संसद के भीतर हुई एक बैठक में विरोध करने वाले सांसदों ने जस्टिन ट्रूडो को इस्तीफा देने को कह दिया। उनके सामने विरोध वाला पत्र भी पढ़ा गया।
लिबरल पार्टी के सांसद सीन केसी ने कहा कि यह कनाडा के हित में होगा कि जस्टिन ट्रूडो अपना इस्तीफा सौंप दें। उन्होंने कहा कि इसी से लिबरल पार्टी की सरकार बच सकती है। उन्होंने कहा कि अगर ऐसा नहीं होता होता तो कंजर्वेटिव पार्टी आसानी से जीत दर्ज कर लेगी।
लिबरल पार्टी के सांसदों ने कहा है कि ट्रूडो के इस्तीफे के बाद नए नेता की तलाश की जाएगी, इससे पार्टी के खिलाफ देश में बने माहौल को ठंडा करने में मदद मिलेगी। एक सांसद केन मैकडोनाल्ड ने कहा है कि ट्रूडो को अब लोगों की बात सुननी ही पड़ेगी।
कनाडा की संसद में लिबरल पार्टी के लगभग 150 सांसद हैं और इनमें से लगभग 30 खुले तौर पर ट्रूडो के विरोध में उतर आए हैं। यदि यह संख्या बढ़ती है तो ट्रूडो को कुर्सी छोड़नी पड़ सकती है। ट्रूडो की सरकार पहले बैसाखियों के सहारे चल रही है।
वहीं दूसरी तरफ ट्रूडो के कई कैबिनेट मंत्रियों ने भी दोबारा चुनाव ना लड़ने का मन बना लिया है। उनके चुनाव ना लड़ने के पीछे ट्रूडो के चलते लिबरल पार्टी की अलोकप्रियता कारण बताई जा रही है। कनाडा के सर्वे भी ट्रूडो और उनकी पार्टी की बुरी हालत बयाँ कर रहे हैं।
कनाडा के सरकारी चैनल CBC के सर्वे में लगातार एक वर्ष से कंजर्वेटिव नेतृत्व, लिबरल पार्टी से 19% आगे चल रहा है। जहाँ 42% लोग कंजर्वेटिव पार्टी और पियरे पोलिवर को पसंद कर रहे हैं तो वहीं मात्र 23% की पसंद लिबरल पार्टी और ट्रूडो हैं। सर्वे से यह भी पता चल रहा है कि आगामी चुनावों में 95% संभावना है कि वह कंजर्वेटिव पार्टी बहुमत हासिल कर लेगी।
इसके उलट इस बात की केवल 1% संभावना है कि लिबरल पार्टी सत्ता में आए। प्रधानमंत्री के तौर पर भी ट्रूडो की अप्रूवल रेटिंग रसातल को जा रही हैं। ट्रूडो को वर्तमान में कनाडा के प्रधानमंत्री के तौर 65% लोग पसंद नहीं करते हैं। इसमें सुधार भी नहीं हो रहा है।
प्रधानमंत्री ट्रूडो की यह मुश्किलें भारत से राजनयिक झगड़ा मोल लेने के बाद और बढ़ गई हैं। उन्होंने हाल ही में अपने पुराने आरोप दोहराए थे कि भारत ने खालिस्तानी आतंकी हरदीप सिंह निज्जर की हत्या करवाई। इसको लेकर भारत ने अपने राजनयिक भी कनाडा से वापस बुला लिए थे और कनाडाई राजनयिकों को देश से निकलने को कहा था।
प्रधानमंत्री ट्रूडो ने यह आरोप लगाने के बाद संसद की एक कमिटी की सुनवाई में खुद कबूला था कि उनके पास भारत के खिलाफ कोई सबूत मौजूद नहीं हैं। इस बीच कनाडा में इस मामले में सबूत दिखाने की माँग भी उठ चुकी है। ऐसे में ट्रूडो के लिए यह नया राजनीतिक संकट और बड़ी चुनौती है और अगर वह इससे पार नहीं पाते तो उनके राजनीतिक करियर का अंत भी हो सकता है।
शिमला की अवैध संजौली मस्जिद को तोड़ने का काम फिर एक बार रुक गया है। मस्जिद कमिटी के मुखिया ने तोड़ने का काम चालू करने के बाद रोकने को लेकर पैसे की कमी का हवाला दिया है। वहीं दूसरी तरफ स्थानीय संगठनों ने बिना पैसे लिए ही अवैध ढाँचा तोड़ने के लिए कारसेवा का ऑफ़र दिया है।
संजौली की अवैध मस्जिद तोड़ने का काम सोमवार (21 अक्टूबर, 2024) से चालू हुआ था। इस दौरान मस्जिद की छत हटाई जा रही थी लेकिन यह काम अब अधर में लटक गया है। मंगलवार आते-आते यह काम ठप ही हो गया। मंगलवार को मात्र दो-तीन मजदूर ही मस्जिद तोड़ने का काम करते दिखे जो कि इसके आकार के हिसाब से पर्याप्त नहीं है।
इसके बाद मस्जिद तोड़ने का यह काम पूरी तरीके से रुक गया। मस्जिद कमिटी के मुखिया मोहम्मद लतीफ़ ने इस बारे में पूछे जाने पर मीडिया को बताया कि उन्होंने पैसे की कमी के चलते यह काम रोका है। उन्होंने कहा कि जब फिर से फंड इकट्ठा हो जाएगा तो मस्जिद को तोड़ने की कार्रवाई की जाएगी।
मोहम्मद लतीफ़ ने कहा कि जब मस्जिद का अवैध निर्माण किया जा रहा था तब सभी मुस्लिम आगे बढ़ चढ़ कर पैसा दे रहे थे लेकिन जब इस अवैध निर्माण को तोड़ने का काम चालू हुआ तो कोई भी पैसा देने को तैयार नहीं है। मोहम्मद लतीफ़ ने कहा है कि मस्जिद तोड़ने में ₹10-15 लाख का खर्च आने वाला है। उन्होंने मजदूरों की कमी भी एक कारण बताया है।
वहीं अवैध ढाँचा गिराने के लिए पैसे की कमी वाली बात पर हिमाचल के संगठन भी आगे आए हैं। हिमाचल प्रदेश में अवैध मस्जिदों को लेकर आंदोलन कर रहे संगठनों ने बिना पैसे लिए मस्जिद तोड़ने का ऑफर दिया है। देवभूमि संघर्ष समिति के लोगों ने कहा है कि मस्जिद तोड़ने के नाम पर खानापूर्ति की जा रही है।
संजौली सिविल सोसायटी ने कहा है कि यदि मस्जिद कमिटी के पास पैसे की कमी है तो वह सहयोग देने को तैयार हैं। कमिटी ने कहा कि वह मस्जिद तोड़ने के लिए कारसेवा करेंगे और इसके लिए कोई पैसा भी नहीं लेंगे। उन्होंने यहाँ तक कहा कि वह इसे तोड़ने के दौरान खाना भी घर से ही लाएँगे।
स्थानीय लोगों ने आरोप लगाया कि मस्जिद कमिटी नगर निगम कोर्ट के आदेश का सही से पालन नहीं कर रही है। उन्होंने इसको लेकर चेतावनी भी दी है। उन्होंने कहा है कि हाई कोर्ट ने भी मस्जिद को लेकर जल्द निर्णय की बात कही है।
हिमाचल प्रदेश सरकार में मंत्री अनिरुद्ध सिंह ने भी यही ऑफर दिया है। उन्होंने कहा है कि यदि मस्जिद कमिटी उनसे मिलने आती है तो वह आर्थिक सहयोग और श्रमदान दोनों ही देंगे। उन्होंने कहा कि कॉन्ग्रेस सबकी मदद करने के लिए ही जानी जाती है और वह इस मामले में भी मदद देंगे। हिमाचल सरकार में मंत्री विक्रमादित्य सिंह ने भी निगम से सहायता लेने की बात कही थी।
गौरतलब है कि मस्जिद तोड़ने का आदेश मस्जिद कमिटी के आवेदन पर ही दिया था। इस मस्जिद का निर्माण 2010 से हो रहा था। तब से लगातार नगर निगम शिमला इसे नोटिस भेज रहा था लेकिन इसका निर्माण नहीं रोका गया और पाँच मंजिले खड़ी कर दी गईं। सितम्बर, 2024 में मस्जिद को लेकर विवाद चालू होने से पहले तक इस मस्जिद को 38 नोटिस भेजे जा चुके थे।
जब सितम्बर, 2024 में एक स्थानीय युवक के साथ मारपीट की खबर के बाद संजौली मस्जिद के विरुद्ध प्रदर्शन चालू हुए तो सब पिटारा बाहर आया। इसके बाद मस्जिद कमिटी ने विरोध प्रदर्शन बढ़ता देख इसे गिराने की बात कह दी। इसको लेकर उन्होंने खुद ही आवेदन दिया।
संजौली मस्जिद को जल्दी गिराए जाने को लेकर मुस्लिमों में दो फाड़ भी हो चुका है। 9 अक्टूबर, 2024 को मुस्लिमों के एक संगठन ने बैठक कर मस्जिद गिराए जाने के खिलाफ हाई कोर्ट जाने की बात कही थी। हालाँकि, संजौली मस्जिद कमिटी ने ऐसी किसी बात से इनकार किया था।
राष्ट्र की पहचान और भविष्य की दिशा के बारे में गहन चर्चा और बहस भारत के संविधान के निर्माण की आधारशिला थी। भारत की स्वतंत्रता के बाद कई वर्षों तक चले इस वृहत् कार्य में कुछ सबसे उल्लेखनीय प्रमुख बहसें शामिल थीं। ऐसी ही एक बहस प्रस्तावना में ‘धर्मनिरपेक्ष’ और ‘समाजवादी’ शब्दों को शामिल करने को लेकर थी।
प्रोफेसर केटी शाह ने 15 नवंबर 1948 को भारतीय संविधान के मसौदे में एक संशोधन का एक प्रस्ताव रखा, जिसमें भारत को ‘धर्मनिरपेक्ष, संघीय, समाजवादी राज्यों का संघ’ के रूप में लेबल करने की माँग की गई। हालाँकि, मसौदा समिति के अध्यक्ष डॉक्टर भीमराव अंबेडकर ने इस प्रस्ताव को दृढ़ता से खारिज कर दिया।
केटी शाह द्वारा रखे गए उस स समय रखे गए प्रस्ताव पर डॉक्टर अंबेडकर को दो आपत्तियाँ थीं, जो भारत के बारे में उनकी दृष्टि की समझ का आधार बनीं। उनकी दृष्टि लोकतंत्र और देश के लोगों की इच्छा को निश्चित वैचारिक पदों से ऊपर रखती थी।
पहली आपत्ति: संविधान को कोई विचारधारा नहीं थोपनी चाहिए
डॉक्टर अंबेडकर का मुख्य तर्क लोकतंत्र के प्रति उनकी प्रतिबद्धता में निहित था। उनका दृढ़ विश्वास था कि संविधान राज्य के कामकाज को विनियमित करने का एक तंत्र है। अंबेडकर ने स्पष्ट रूप से कहा कि संविधान को ऐसे दस्तावेज़ के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए जो देश की भावी पीढ़ियों पर एक विशेष सामाजिक या आर्थिक विचारधारा थोपता हो।
केटी शाह के प्रस्ताव पर प्रतिक्रिया देते हुए अंबेडकर ने कहा था, “राज्य की नीति क्या होनी चाहिए, समाज को उसके सामाजिक और आर्थिक पक्ष में कैसे संगठित किया जाना चाहिए, ये ऐसे मामले हैं जिनका निर्णय लोगों को समय और परिस्थितियों के अनुसार स्वयं करना चाहिए।”
अंबेडकर के अनुसार, भारत के संविधान में समाजवाद जैसी विचारधारा को संहिताबद्ध करने में एक बुनियादी विरोधाभास था। उन्होंने तर्क दिया कि अगर समाजवाद को प्रस्तावना में जोड़ दिया गया तो यह भविष्य की पीढ़ियों को अपना रास्ता चुनने की स्वतंत्रता को प्रतिबंधित करेगा। उन्होंने कहा, “इसे संविधान में नहीं रखा जा सकता, क्योंकि यह लोकतंत्र को पूरी तरह से नष्ट कर देगा।”
उन्होंने पहले ही इस बात को समझ लिया था कि अलग-अलग कालखंड नई चुनौतियाँ आ सकती हैं। वे देश की भावी पीढ़ियों को किसी निर्दिष्ट प्रणाली से बांधने के लिए तैयार नहीं थे। इतिहास में एक समय समाजवाद लोकप्रिय था। जिस समय संविधान तैयार किया गया था, तब यह विकसित हो रहा था। इसे संविधान में जोड़ने से इनकार करना प्रासंगिक हो गया।
दूसरी आपत्ति: संविधान में पहले से ही समाजवादी सिद्धांत मौजूद
प्रस्ताव को खारिज करते हुए अंबेडकर ने दूसरा तर्क दिया कि संविधान के मसौदे में पहले से ही ऐसे प्रावधान हैं, जिन्हें राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों के माध्यम से समाजवादी सिद्धांतों के रूप में देखा जा सकता है। उन्होंने मसौदे के अनुच्छेद 31 की ओर इशारा किया और कहा कि इसमें धन के संकेन्द्रण को रोकने और समान काम के लिए समान वेतन जैसे उपायों की रूपरेखा दी गई है, जो एक समाजवादी प्रावधान है।
उन्होंने व्यंग्यात्मक लहजे में पूछा, “यदि ये निर्देशक सिद्धांत… अपनी दिशा और विषय-वस्तु में समाजवादी नहीं हैं तो मैं यह नहीं समझ पा रहा हूँ कि समाजवाद और क्या हो सकता है।” उन्होंने आगे तर्क दिया कि समाजवादी आदर्श पहले से ही निर्देशक सिद्धांतों में अंतर्निहित हैं, जिससे संवैधानिक रूप से भारत को अधिक समतापूर्ण समाज की ओर ले जाना संभव हो गया।
अंबेडकर के अनुसार, प्रस्तावना में स्पष्ट रूप से ‘समाजवादी’ शब्द जोड़ना निरर्थक होगा, क्योंकि सामाजिक और आर्थिक न्याय के सिद्धांत पहले से ही मसौदा पाठ का हिस्सा हैं। इसके अलावा, उनका मानना था कि नीति निर्देशक तत्वों में शामिल समाजवादी शब्द सरकार को देश को अधिक लचीलेपन के साथ चलाने की अनुमति देंगे।
उनका मानना था कि यह सरकार को समय के साथ बदलती आर्थिक और सामाजिक परिस्थितियों के अनुकूल होने में सक्षम बनाएगा। इस विचार के विपरीत, यदि प्रस्तावना में ‘समाजवादी’ शब्द जोड़ा गया तो यह देश की भावी पीढ़ियों को अधिक कठोर वैचारिक ढाँचे में बाँध देगा, जिससे कई तरह की बाधाएँ पैदा होंगी।
धर्मनिरपेक्षता पर बहस: एक सूक्ष्म दृष्टिकोण
डॉक्टर भीमराव अंबेडकर धर्म को राजनीति से दूर रखने के प्रबल समर्थक थे। सिर्फ़ वे ही नहीं, बल्कि भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू भी यही मानते थे। उन दोनों ने तर्क दिया कि प्रस्तावना में ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्द का स्पष्ट रूप से उल्लेख करने की आवश्यकता नहीं है। अंबेडकर ने तर्क दिया कि संविधान ने पहले ही स्पष्ट कर दिया है कि भारत एक ऐसा देश होगा, जो किसी भी धर्म को मान्यता नहीं देगा।
डॉक्टर भीमराव अंबेडकर का कहना था कि धर्मनिरपेक्षता के विचारों को विभिन्न अनुच्छेदों में लागू किया गया है, जो धार्मिक स्वतंत्रता और राज्य के किसी विशेष धर्म के साथ गैर-संरेखण (Non-alignment) से संबंधित थे, जैसे अनुच्छेद 19 और अनुच्छेद 16। ये अनुच्छेद धर्म के आधार पर किसी भी व्यक्ति के साथ भेदभाव को प्रतिबंधित करते हैं।
दूसरी ओर, नेहरू का मानना था कि भारत में धर्मनिरपेक्षता अपने पश्चिमी समकक्षों से अलग है। पश्चिम में धर्मनिरपेक्षता मुख्य रूप से चर्च और यूरोप के देशों के बीच ऐतिहासिक संघर्ष को संबोधित करती है। नेहरू का मानना था कि इसके विपरीत भारत का धार्मिक परिदृश्य राजनीति से अधिक जुड़ा हुआ है। इस प्रकार धर्मनिरपेक्षता को अधिक लचीली और कार्यात्मक अवधारणा के रूप में समझा जाना चाहिए।
इंदिरा गाँधी का 42वाँ संविधान संशोधन और ‘समाजवादी’ और ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्दों का समावेश
आपातकाल के दौरान 1976 में भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने संविधान में 42वें संशोधन के माध्यम से भारत की प्रस्तावना में ‘समाजवादी’ और ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्द जोड़ दिए। प्रस्तावना में इतना बड़ा बदलाव करने के लिए इंदिरा गाँधी की बार-बार आलोचना की गई। इसे गाँधी की शक्ति को मजबूत करने के उद्देश्य से एक राजनीतिक रूप में देखा गया।
किए गए बदलावों को अगर हम भीमराव अंबेडकर के दृष्टिकोण से देखें तो वे लोकतंत्र और स्वतंत्रता की उस भावना के विपरीत हैं, जिसकी वे रक्षा करना चाहते थे। अंबेडकर का मानना था कि समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता के बारे में फैसले लोगों की इच्छा को दर्शाने वाले होने चाहिए। ये किसी सत्तारूढ़ सरकार की वैचारिक प्राथमिकताएँ नहीं होनी चाहिए।
हाल में इसे भारतीय मूल्यों के प्रतिबिंब करने वाले के बजाय एक असुरक्षित सरकार का प्रतिबिंब माना गया। सितंबर 2024 में तमिलनाडु के राज्यपाल आरएन रवि ने कहा कि धर्मनिरपेक्षता एक यूरोपीय अवधारणा है, न कि भारतीय। उन्होंने कहा कि यह चर्च और यूरोप के राजा के बीच संघर्ष को समाप्त करने के लिए अस्तित्व में आया था।
भारत में ‘धर्मनिरपेक्षता’ को गैर-जरूरी बताते हुए उन्होंने बताया कि संविधान के मूल निर्माताओं ने इसे दस्तावेज़ में शामिल नहीं किया था। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी का जिक्र करते हुए आरएन रवि ने उन्हें ‘एक सुरक्षित प्रधानमंत्री’ कहा था, जिन्होंने संविधान में ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्द जोड़ा था।
अंबेडकर का दीर्घकालिक दृष्टिकोण: विचारधारा से ऊपर लोकतंत्र
संविधान की प्रस्तावना में ‘धर्मनिरपेक्ष’ और ‘समाजवादी’ शब्दों को शामिल करने के बारे में अंबेडकर के विचार और अनिच्छा लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को दर्शाती है। उनका मानना था कि अगर इन आदर्शों को संविधान के ज़रिए लागू किया गया तो यह लोगों की स्वतंत्रता के लिए प्रतिकूल होगा। उन्होंने तर्क दिया कि संविधान एक लचीला दस्तावेज़ होना चाहिए, जो समाज की बदलती ज़रूरतों के हिसाब से ढलने में सक्षम हो।
उनके अनुसार, एक लोकतांत्रिक देश को अपने नागरिकों को देश की परिस्थितियों के आधार पर अपनी सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था चुनने की स्वतंत्रता प्रदान करनी चाहिए। धर्मनिरपेक्षता और समाजवाद कठोर आदर्श हैं, जो लोगों की स्वतंत्रता को सीमित करते हैं। लोकतंत्र, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और राज्य की अनुकूलनशीलता के प्रति अंबेडकर की प्रतिबद्धता ने उन्हें इन शब्दों को शामिल करने का विरोध करने के लिए प्रेरित किया।
(इस लेख को मूल रूप से अंग्रेजी में अनुराग ने लिखा है। आप इस लिंक पर क्लिक करके इसे पढ़ सकते हैं।)
गुजरात के गाँधीनगर जिले के सादरा गाँव में एक मुस्लिम नाबालिग द्वारा भगवान राम और माता सीता पर की गई अभद्र टिप्पणी से पूरे गाँव में आक्रोश फैल गया। इस घटना के विरोध में सैकड़ों ग्रामीण सड़कों पर उतर आए और पुलिस स्टेशन तक रैली निकाली। पुलिस ने भी तत्परता दिखाते हुए आरोपित नाबालिग को हिरासत में ले लिया है। इस विवाद के बाद गाँव में पूर्ण बंद की घोषणा की गई है।
बजरंग दल के प्रमुख गणपत सिंह ने ऑपइंडिया से बातचीत में पूरे घटनाक्रम की जानकारी दी। उन्होंने बताया, “यह घटना रविवार (22 अक्टूबर 2024) को हुई, जब सादरा गाँव के 16 वर्षीय मुस्लिम लड़के (नाबालिग की पहचान कानूनी कारणों से छिपाई गई) ने इंस्टाग्राम पर भगवान राम और माता सीता के खिलाफ बेहद आपत्तिजनक और अश्लील टिप्पणी की। इसका स्क्रीनशॉट गाँव में वायरल हो गया, जिससे पूरे हिंदू समाज में गुस्सा फैल गया।” गणपत सिंह ने कहा कि बजरंग दल और अन्य संगठनों के कार्यकर्ता लोगों को शांत करने के लिए तुरंत मौके पर पहुँचे और कानूनी रास्ता अपनाने का सुझाव दिया।
आपत्तिजनक स्क्रीनशॉट
घटना के बाद गाँव के लगभग 200 से 300 लोग चिलोडा पुलिस स्टेशन पहुँचे और आरोपित के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की माँग की। पुलिस को स्क्रीनशॉट्स और अन्य सबूत सौंपे गए। गाँव के एक निवासी राजेश पटेल ने कहा, “इस घटना ने हमारे धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाई है। हम चाहते हैं कि दोषी के खिलाफ सख्त से सख्त कार्रवाई की जाए ताकि भविष्य में कोई इस तरह की हरकत न कर सके।”
चिलोडा पुलिस स्टेशन के निरीक्षक, PI परमार ने कहा, “हमने स्थिति को गंभीरता से लिया और तुरंत आरोपित नाबालिग को हिरासत में लिया। गाँव में स्थिति नियंत्रण में है, और हम शांति बनाए रखने के लिए सभी जरूरी कदम उठा रहे हैं।” पुलिस ने गाँव में शांति व्यवस्था कायम रखने के लिए सुरक्षा बढ़ा दी है और ग्रामीणों से शांति बनाए रखने की अपील की है।
गाँव में बंद और रैली का आयोजन
घटना के बाद 23 अक्टूबर को बजरंग दल के आह्वान पर सादरा गाँव में एक दिन का बंद रखा गया। गाँव के व्यापारी संघ के अध्यक्ष, रमेश चौधरी ने कहा, “हमारे धर्म का अपमान हुआ है, इसलिए हमने स्वेच्छा से अपनी दुकानें बंद रखी हैं। यह विरोध प्रदर्शन धर्म और आस्था की रक्षा के लिए है।” इसके अलावा, गाँव में हिंदू संगठनों द्वारा एक रैली भी निकाली गई, जिसमें ‘जय श्रीराम’ और ‘जय शिवाजी’ के नारे लगाए गए।
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घटना के बाद आरोपित नाबालिग के माता-पिता ने गाँव के सरपंच और हिंदू संगठनों से माफी की अपील की। उन्होंने कहा कि उनका बेटा कम उम्र का है और यह हरकत उसने अनजाने में की है। सरपंच रमेश भाई चौहान ने बताया, “मुस्लिम नाबालिग के माता-पिता ने माफी माँगी है और आश्वासन दिया है कि ऐसी गलती दोबारा नहीं होगी। हम इस पर विचार कर रहे हैं।” हिंदू और मुस्लिम समुदाय के बीच शांति बनाए रखने के लिए पुलिस की मध्यस्थता में एक शांति समिति की बैठक आयोजित की गई। बजरंग दल के गणपत सिंह ने कहा, “यदि मुस्लिम समुदाय आश्वासन देता है कि भविष्य में ऐसी घटनाएँ नहीं होंगी, तो हम भी कार्रवाई को रोकने के लिए तैयार हैं। शांति बनाए रखना हमारी प्राथमिकता है।”
पिछले 6 महीनों से गाँव में बढ़ी आक्रामकता
हिंदू संगठनों ने दावा किया है कि सादरा गाँव में पिछले 6 महीनों से स्थिति तनावपूर्ण हो रही है। गणपत सिंह ने बताया, “गाँव में एक मस्जिद है जहाँ लाउडस्पीकर से अज़ान 5 बार की जाती है, जिससे पहले कभी ऐसा नहीं होता था। इससे गाँव में तनाव बढ़ा है।” उन्होंने यह भी कहा कि घटना के बाद से गाँव में तनाव की स्थिति बनी हुई है और शांति समिति की बैठक के बाद आगे की कार्रवाई तय की जाएगी। बताया जा रहा है कि इस गाँव में 8000 घर हैं, लेकिन मुस्लिमों के घरों की संख्या महज 250 के आसपास ही है। इसके बावजूद ऐसी हरकतें की जा रही हैं।
PI परमार ने कहा, “हम स्थिति पर नजर रखे हुए हैं और किसी भी प्रकार की अशांति या हिंसा को रोकने के लिए सभी आवश्यक कदम उठा रहे हैं। गाँव में शांति बनाए रखने के लिए सुरक्षा बलों की तैनाती की गई है, और हम सुनिश्चित करेंगे कि किसी भी समुदाय के साथ अन्याय न हो।” फिलहाल, शांति बनाए रखने की कोशिश की जा रही है, और गाँव में सुरक्षा कड़ी कर दी गई है। शांति समिति की बैठक के बाद आगे की दिशा तय की जाएगी।
मूल रूप से ये रिपोर्ट गुजराती में प्रकाशित की गई है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।
इजरायल ने खुलासा किया है कि क़तर के पैसे से चलें वाले अल जजीरा के 6 पत्रकार असल में आतंकी हैं। इजरायल ने बताया है कि यह 6 पत्रकार इस्लामी आतंकी संगठन हमास और फिलिस्तीनी इस्लामिक जिहाद (PIJ) के आतंकी है। इजरायल को इससे जुड़े दस्तावेज भी मिले हैं।
इजरायली सुरक्षा बल (IDF) ने बुधवार को एक्स (पहले ट्विटर) पर यह जानकारी दी है। IDF ने बताया, “IDF ने गाजा में मिली खुफिया जानकारी और अनेक दस्तावेजों का खुलासा किया है कि अल जजीरा के छह पत्रकार हमास और इस्लामिक जिहाद आतंकवादी संगठनों के साथ जुड़े हुए हैं। उनके टेबलेट्स, आतंकी ट्रेनिंग कोर्स और उनकी तनख्वाह के कागज इसकी पुष्टि करते हैं।”
EXPOSED: 6 Al Jazeera journalists have been exposed as Hamas and Islamic Jihad terrorists.
The IDF has disclosed intelligence information and numerous documents found in Gaza confirming military affiliation of six Al Jazeera journalists in Gaza with Hamas and the Islamic Jihad… pic.twitter.com/quVmr2zE8B
IDF ने आगे बताया, “ये दस्तावेज कतरी अल जजीरा मीडिया नेटवर्क के हमास आतंकियों के साथ गठजोड़ का सबूत हैं। IDF ने हमास की हथियारबंद गतिविधियों में शामिल होने वाले कई पत्रकारों को उजागर किया है, ये लोग गाजा में हमास का प्रचार करते घूमते हैं।”
IDF ने कहा कि उसके दस्तावेज साफ तौर पर साबित करते हैं कि यह पत्रकार हमास और इस्लामिक जिहाद के संबंधित हथियारबंद विंग के सदस्य थे। इन आतंकी पत्रकारों की पहचान अनस जमाल महमूद अल-शरीफ, अला अब्दुल अजीज मुहम्मद सलामा, होसम बसल अब्दुल करीम शबात, अशरफ सामी अहसूर सराज, इस्माइल फरीद मुहम्मद अबू अमर और तलाल महमूद अब्दुल रहमान अरुकी के तौर पर हुई है।
IDF ने बताया कि अनस अल-शरीफ रॉकेट लॉन्चिंग स्क्वॉड का प्रमुख था और हमास की नुसीरत बटालियन में नुखबा फोर्स कंपनी का आतंकी था। वहीं अला सलामा इस्लामिक जिहाद की शाबूरा बटालियन की प्रोपेगेंडा इकाई का काम देखता था । शाबत हमास की बेत हनून बटालियन में स्नाइपर था और अशरफ सराज इस्लामिक जिहाद की बुरीज बटालियन का आतंकी था।
अबू अमर खान यूनिस बटालियन में ट्रेनिंग कंपनी कमांडर के तौर पर काम करता था। एक और पत्रकार अब्दुल रहमान अरुकी हमास की नुसीरत बटालियन में टीम कमांडर था। अल जजीरा का ही पत्रकार इस्माइल अबू अमर इस साल फरवरी में गाजा में इजरायली ऑपरेशन में घायल हो गया था।
इजरायल के ऑपरेशन में घायल होने पर अल जजीरा ने दावा किया था कि उसके पत्रकार का आंतकी संगठनों से कोई संबंध नहीं है। लेकिन अब IDF को इस बारे में दस्तावेज मिले हैं। अल जजीरा लगातार इजरायल को लेकर दुष्प्रचार करता रहा है।
अल जजीरा इस साल मई में बेंजामिन नेतन्याहू सरकार ने हमास का प्रोपेगेंडा चलाने के कारण इजरायल के भीतर अल जजीरा को बंद कर दिया था। सितम्बर, 2024 में इजरायल सरकार ने वेस्ट बैंक के रामल्लाह में अल जजीरा ब्यूरो को भी बंद कर दिया था।