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‘टुकड़े-टुकड़े कर रामगोपाल मिश्रा के शव को कर देते गायब’: फायरिंग के बीच हिंदू युवक को बचाने जो अब्दुल हमीद की छत पर पहुँचा, उसने बताया बहराइच के मुस्लिमों का प्लान

उत्तर प्रदेश के बहराइच जिले में रामगोपाल मिश्रा को रविवार (13 अक्टूबर 2024) को मुस्लिम भीड़ ने पुलिस की मौजूदगी में मार डाला था। यह हत्या तब हुई थी जब रामगोपाल मिश्रा माँ दुर्गा के विसर्जन यात्रा में शामिल हुए थे। आरोप है कि अब्दुल हमीद के घर में हुई उनकी हत्या के बाद मुस्लिम भीड़ शव को घर के अंदर खींच ले गई थी। वायरल हुए एक वीडियो में कुछ लोग बरसते पत्थर और गोलियों के बीच से छत से रामगोपाल की लाश को नीचे लाने की कोशिश कर रहे हैं। ऑपइंडिया ने रामगोपाल का शव लेकर बाहर लाने वाले व्यक्ति से बात की।

रामगोपाल का शव बाहर लाने वाले युवक का नाम किशन मिश्रा है। किशन रामगोपाल के चचेरे भाई हैं। दोनों एक साथ बचपन से ही खेलकूद कर बड़े हुए और एक ही साथ पढ़े-लिखे हैं। शव बाहर निकालने में किशन का सहयोग राजन मिश्रा ने किया था। किशन से हमारी मुलाकात गुरुवार (17 अक्टूबर 2024) को उनके गाँव रेहुआ में हुई। तब पूरे गाँव में पुलिस का कड़ा पहरा था। किशन खुद ही जैसे-तैसे बाहर निकल कर हमसे बात कर पाए। हमने किशन की इच्छा के मुताबिक अँधेरे में बात की।

एक तरफ से मुस्लिमों की पत्थरबाजी, दूसरी तरफ से पुलिस का लाठीचार्ज

किशन मिश्रा ने हमें बताया कि शुरुआत में हंगामा हुआ और उसी समय पुलिस ने विसर्जन जुलूस पर लाठीचार्ज कर दिया। इसी लाठीचार्ज के बाद एकजुट होकर चल रहा हिन्दू समाज तितर-बितर हो गया और मुस्लिम भीड़ ने रामगोपाल मिश्रा को घर के अंदर खींच लिया। जब किशन मिश्रा अपने चचेरे भाई को छुड़वाने के लिए वापस लौटे तो उनको 2 तरफा प्रतिरोध का सामना करना पड़ा। पहले गोलियों और पत्थर बरसा रही मुस्लिम भीड़ का तो दूसरा लाठीचार्ज कर रहे पुलिस बल का।

किशन का दावा है कि वो कई बार पुलिस वालों से ये कह कर मदद माँगते रहे कि रामगोपाल को अंदर खींच लिया गया और उसे बाहर निकालने में सहयोग किया जाए। इस गुहार का कोई फर्क नहीं पड़ा। जब पुलिस से कोई सहयोग नहीं मिला तब किशन मिश्रा ने खुद ही अपने 2 सहयोगियों के साथ मुस्लिम भीड़ से रामगोपाल को बचा कर लाने का संकल्प लिया। इन 2 सहयोगियों में एक किशन के ही घर के सदस्य राजन मिश्रा थे। किशन दावा करते हैं कि अगर पुलिस ने हिन्दुओं पर ही जोर दिखाने के बजाय मदद की होती तो शायद रामगोपाल आज जीवित होते।

पड़ोसी हिन्दू का घर खुलवा कर पहुँचे अब्दुल की छत पर

किशन मिश्रा ने हमें आगे बताया कि रामगोपाल की हत्या अब्दुल हमीद के छत पर हुई थी। उसकी छत पर पहुँचना आसान नहीं था। रास्ते में लाठीचार्ज से भाग रही भीड़ थी। सामने पुलिसकर्मी खड़े थे और पीछे से मुस्लिम भीड़ पत्थर और गोलियाँ चला रही थी। ऐसे में उन्होंने सड़क मार्ग के बजाय छतों से रामगोपाल तक पहुँचने का निर्णय लिया। अब्दुल हमीद के घर के पास ही एक हिन्दू का घर था। उसे बड़ी मिन्नत करके खुलवाया गया। फिर उनकी छत से दूसरी छत होते हुए अब्दुल की छत पर किशन और राजन पहुँच गए।

किशन ने बताया कि इतने छोटे से ही रास्ते में उनको व राजन को कई बार गोलियों और पत्थरों से खुद को बचाना पड़ा। पर किशन अब्दुल हमीद की छत पर पहुँचे तब वहाँ रामगोपाल अचेत हालत में पड़े थे। जैसे ही उन्होंने राजन मिश्रा के साथ मिल कर रामगोपाल को हाथ और पैर पकड़ कर उठाया वैसे ही मुस्लिम भीड़ ने उन पर हमला कर दिया। इस हमले को अब्दुल हमीद का बेटा सरफराज लीड कर रहा था। उसने दीवाल की आड़ में छिप कर राजन और किशन के साथ रामगोपाल के अचेत शरीर को भी निशाना साध कर गोलियाँ मारी।

ईंट फेंक कर गिराई सरफराज की बंदूक

किशन मिश्रा ने बताया कि सरफराज द्वारा दागी गई पहली गोली निशाने पर नहीं लगी वर्ना शायद उनका भी शव रामगोपाल की ही तरह अब्दुल हमीद के घर में मिलता। पहली गोली चलने के बाद किशन और राजन ने रामगोपाल की अचेत देह को नीचे रखा और छत से एक ईंट लेकर सरफराज की तरफ फेंकी। यह ईंट निशाने पर लगी और सरफराज के हाथों से बंदूक छूट कर नीचे गिर गई। जब तक सरफराज संभल कर फिर से गोलियाँ बरसाने की हालत में आता तब तक किशन और राजन मिल कर रामगोपाल को बाहर निकाल चुके थे।

किशन मिश्रा के अनुसार सरफराज के साथ उसके अब्बा अब्दुल हमीद और भाई तालिब और फहीम भी हिंसा में पूरी तरह से एक्टिव थे। जब सरफराज गोली चला रहा था तब ये सब अन्य मुस्लिम भीड़ के साथ मिल कर पत्थरबाजी कर रहे थे। बकौल किशन घर के बाहर हिन्दू श्रद्धालुओं द्वारा मच रहे शोर से भी मुस्लिम भीड़ का ध्यान भंग हो रहा था वर्ना वो और राजन भी रामगोपाल की ही तरह अब्दुल हमीद और उसके साथियों के हाथों मारे जाते।

लाश को गायब करने की थी साजिश

किशन मिश्रा दावा करते हैं कि अब्दुल हमीद और उसके गिरोह द्वारा रामगोपाल के शव को गायब करने की थी तैयारी। उन्होंने बताया कि अगर वो और राजन मिल कर अब्दुल हमीद के घर से रामगोपाल का अचेत शरीर बाहर न लाते तो शायद यह केस हत्या नहीं बल्कि गुमशुदगी का चल रहा होता। बकौल किशन तब पुलिस भी यही कुतर्क देती कि रामगोपाल की हत्या नहीं हुई बल्कि वो कहीं लापता हो गया है और सभी कातिल कानून के दायरे में आने से बच जाते।

किशन मिश्रा हमें आगे बताते हैं कि अब्दुल हमीद ही नहीं बल्कि महराजगंज में रहने वाले मुस्लिम समुदाय के तमाम घरों में न सिर्फ धारदार हथियारों बल्कि अवैध बंदूकों का जखीरा मौजूद है। उन्हें लगता है कि रामगोपाल की लाश को टुकड़ों-टुकड़ों में काट कर कहीं ठिकाने लगा दिया जाता। इसके बाद रामगोपाल दुनिया के लिए एक रहस्य हो जाते और घोषणा की जाती कि हिंसा में नाम आने की वजह से वो कहीं फरार हो गए जो वापस लौट कर नहीं आए।

पैदल ही अचेत देह को लेकर दौड़ते रहे लोग

किशन का दावा है कि जब वो रामगोपाल के अचेत शरीर को निकाल कर बाहर आए तब उन्हें लाख मिन्नत के बावजूद पुलिस वालों ने कोई गाड़ी अस्पताल ले जाने के लिए नहीं दी। लाठी खाया हिन्दू श्रद्धालु काफी दूर तक रामगोपाल को लेकर सड़क पर अस्पताल की तरफ दौड़ता रहा। ऑपइंडिया के पास इस मौके का वीडियो मौजूद है जिसमें एक पुलिसकर्मी भी दिख रहा। जैसे-तैसे वो रामगोपाल को अस्पताल पहुँचा पाए जहाँ डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया।

किशन का मानना है कि अगर पुलिस ने तत्काल वाहन अपने वाहन को साथ भेजा होता तो शायद रामगोपाल की जान बच सकती थी। किशन ने हमें यह भी बताया कि पुलिसकर्मियों की इन करतूतों की शिकायत उन्होंने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ तक पहुँचा दी है। हमसे बात करते हुए किशन मिश्रा भावुक हो गए। उन्होंने अंत में कहा कि कातिलों ने न सिर्फ उनका चचेरा भाई बल्कि सबसे अच्छा दोस्त भी छीन लिया। किशन ने यह भी कहा कि रामगोपाल के साथ अगर उनके प्राण भी निकल जाते तो उसका कोई अफ़सोस न होता। रामगोपाल और किशन मिश्रा एक ही साथ कैटरिंग में खाना बनाने का काम करते थे।

‘शंकर भगवान ल*@’: हिंदू देवता को गाली देते कॉन्ग्रेस MLA का वीडियो वायरल, भाजपा नेता बोले- यह सनातन खत्म करने वाली मानसिकता

मध्य प्रदेश के एक कॉन्ग्रेस विधायक ने हिन्दुओं के आराध्य भगवान शिव को लेकर गालियाँ बकीं। उन्होंने भगवान शिव का नाम लेते हुए अश्लील संदर्भ दिए। कॉन्ग्रेस विधायक बाबू जंडेल का यह करते एक वीडियो वायरल हो रहा है। विश्व हिन्दू परिषद् ने उनके खिलाफ FIR दर्ज करवाई है। विधायक का दावा है कि वीडियो के साथ छेड़छाड़ हुई है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, मध्य प्रदेश के श्योपुर से कॉन्ग्रेस के विधायक बाबू मीणा जंडेल ने भगवान शिव को लेकर अभद्र टिप्पणियाँ की। उनका ऐसा करते हुए एक वीडियो भाजपा मध्य प्रदेश ने एक्स (पहले ट्विटर) पर साझा किया है। इस वीडियो में बाबू जंडेल किसी को कुछ समझा रहे हैं।

संभवतः वह नशे में हैं और कुछ बोल रहे हैं। वीडियो में वह तीन चार बार ‘भगवान शंकर’ शब्द बोलते हैं और उसके साथ गालियाँ बकते हैं। वह इस दौरान अपने हाथों से कुछ अश्लील इशारे भी करते हैं। उनका यह 11 सेकंड का वीडियो अब वायरल है। भाजपा ने कहा है कि कॉन्ग्रेस नेता हिन्दू विरोधी हैं।

बाबू जंडेल का यह वीडियो वायरल होने के बाद उनके खिलाफ विश्व हिन्दू परिषद ने श्योपुर में FIR दर्ज करवाई है। विश्व हिन्दू परिषद ने कहा है कि बाबू जंडेल के बयान से हिन्दुओं की भावनाएँ आहत हुई हैं। उन्होंने इस मामले में बाबू जंडेल के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई की माँग की है।

बाबू जंडेल के खिलाफ श्योपुर में इसके बाद कई धारों में मामला दर्ज हुआ है। भाजपा इंदौर के कार्यकर्ताओं ने उनका पुतला भी फूँका है। बाबू जंडेल का मुंह काला करने की बात भी हिन्दू कार्यकर्ताओं ने कही है। उनके खिलाफ कार्रवाई की माँग उज्जैन के महाकाल मंदिर के पुजारी महेश शर्मा ने भी की है।

मध्य प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष और खजुराहो से सांसद वीडी शर्मा ने भी बाबू जंडेल के इस बयान की निंदा की है। उन्होंने कहा, “कॉन्ग्रेस विधायक बाबू जंडेल का भगवन शंकर को गाली देना सनातन को खत्म करने वाली मानसिकता दिखाता है। मैं राहुल गाँधी और मल्लिकार्जुन खरगे से पोछना चाहता हूँ कि यह कॉन्ग्रेस की मोहब्बत की दुकान है या गाली की दुकान है।”

वीडी शर्मा ने इस मामले में कॉन्ग्रेस से पूछा है कि वह क्या कार्रवाई कर रहे हैं। उन्होंने मध्य प्रदेश के डीजीपी से इस मामले में संज्ञान लेने को कहा है। भाजपा के अन्य कई नेताओं ने भी बाबू जंडेल के खिलाफ कार्रवाई की माँग की है।

वहीं विधायक बाबू जंडेल ने कह है कि यह वीडियो पुराना है और इसे उन्हें बदनाम करने के लिए छेड़छड के बाद वायरल किया गया है। बाबू जंडेल ने कहा है कि वह ऐसी बात कभी नहीं कह सकते। वहीं कॉन्ग्रेस ने दावा किया कि यह वीडियो पाँच साल पुराना है।

बांग्लादेश को दिए गौरव के कई क्षण, पर अब अपने ही मुल्क नहीं लौट पा रहे शाकिब अल हसन: अंतिम टेस्ट पर भी संशय, जानिए वजह

बांग्लादेश के दिग्गज क्रिकेटर शाकिब अल हसन ने अपने देश लौटने से इनकार कर दिया है। उन्हें ढाका में दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ अपने टेस्ट करियर का आखिरी मैच खेलना था, लेकिन उनके खिलाफ हो रहे विरोध प्रदर्शनों के कारण वे दुबई में रुक गए। दरअसल, ढाका में उनके खेलने के खिलाफ इस्लामी कट्टरपंथी प्रदर्शन कर रहे थे, क्योंकि वो शेख हसीना की सरकार के समय सांसद थे।

बांग्लादेश के युवा और खेल मामलों के सलाहकार ने भी उन्हें सलाह दी कि वे देश न लौटें, ताकि कोई अप्रिय स्थिति उत्पन्न न हो। इसके अलावा, ढाका में स्टेडियम के बाहर उनके खिलाफ प्रदर्शन हो रहा था, जिससे उनकी सुरक्षा को खतरा माना जा रहा था। शाकिब के अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट करियर का अंत अब बिना आखिरी टेस्ट खेले ही हो सकता है। उनके देश वापसी को लेकर फिलहाल कोई स्पष्टता नहीं है, और वे दुबई से अमेरिका लौट सकते हैं।

बता दें कि बांग्लादेश के सबसे अनुभवी और प्रतिष्ठित क्रिकेटरों में से एक, शाकिब ने हाल ही में टी-20 अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट से संन्यास लिया था और भारत के खिलाफ दो टेस्ट मैचों की सीरीज के बाद अपना आखिरी मैच बांग्लादेश में खेलने के लिए बोर्ड से गुहार लगाई थी।

साकिब ने ESPNcricinfo को एक संदेश में यह स्पष्ट किया कि वे फिलहाल अपने देश वापस नहीं आ रहे हैं। शाकिब ने कहा, “मुझे नहीं पता कि मैं अब आगे कहाँ जाऊँगा, लेकिन यह लगभग तय है कि मैं घर नहीं जाऊँगा।” उन्होंने बताया कि वे बांग्लादेश में जारी विरोध प्रदर्शनों के चलते अपने देश वापस जाने से कतरा रहे हैं, जहाँ उन्हें एक हत्या के मामले में आरोपित बनाया गया है। इस हत्या का आरोप उनपर आदाबोर पुलिस स्टेशन द्वारा दर्ज की गई एक एफआईआर के तहत लगाया गया है, जो हाल ही के राजनीतिक विरोध प्रदर्शनों से संबंधित है।

शाकिब बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना की पार्टी आवामी लीग की तरफ से सांसद थे। शेख हसीना को सत्ता से इस्लामी कट्टरपंथियों ने आंदोलनों की आड़ में सत्ता से हटा दिया, जिसके बाद से वो भारत में हैं। इसके बाद से अवामी लीग के नेताओं, कार्यकर्ताओं के खिलाफ बड़े पैमाने पर अभियान चलाया गया और हिंदुओं को भी निशाना बनाया गया। इन घटनाओं के पहले से ही साकिब बांग्लादेश में ही नहीं थे, फिर भी उनके खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज किया गया है।

हालाँकि बांग्लादेश क्रिकेट बोर्ड (BCB) ने अभी तक उन्हें राष्ट्रीय टीम के लिए खेलने की अनुमति दी है, जब तक कि उनके खिलाफ आरोप सिद्ध नहीं होते। लेकिन बांग्लादेश के युवा और खेल मामलों के सलाहकार असिफ महमूद ने साकिब को सलाह दी थी कि वे देश न लौटें। महमूद ने AFP को बताया, “मैंने शाकिब को सुझाव दिया है कि वे बांग्लादेश न आएँ, ताकि कोई अप्रिय स्थिति न पैदा हो। यह फैसला खिलाड़ियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने और देश की छवि को बचाने के लिए लिया गया है।”

अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में साकिब की उपलब्धियाँ रही हैं शानदार

शाकिब अल हसन का क्रिकेट करियर बेहद शानदार रहा है। वे दुनिया के बेहतरीन ऑलराउंडरों में से एक माने जाते हैं। उन्होंने बांग्लादेश के लिए टेस्ट, वनडे और टी-20 तीनों प्रारूपों में जबरदस्त प्रदर्शन किया है।

  • टेस्ट क्रिकेट में शाकिब ने 71 मैच खेले हैं, जिसमें उन्होंने 4609 रन बनाए हैं और 246 विकेट लिए हैं। उनके नाम पर टेस्ट में 5 शतक और 31 अर्धशतक दर्ज हैं। गेंदबाजी में उन्होंने 19 बार 5 विकेट लिए हैं, तो मैच में 10 विकेट लेने का कारनामा भी 2 बार कर चुके हैं।
  • वनडे क्रिकेट में शाकिब ने 247 मैचों में 7,570 रन बनाए हैं और 317 विकेट लिए हैं। उन्होंने वनडे में 9 शतक और 56 अर्धशतक बनाए हैं। गेंदबाजी में उन्होंने वनडे में 10 बार पारी में 4 विकेट और 4 बार पारी में 5 विकेट लेने का कारनामा भी किया है।
  • टी-20 अंतरराष्ट्रीय में साकिब ने 129 मैचों में 2,551 रन बनाए और 149 विकेट लिए हैं, जो उन्हें इस प्रारूप का भी एक बेहतरीन खिलाड़ी साबित करते हैं। उनका 17 साल से ज्यादा का करियर दुनिया के किसी भी खिलाड़ी की तुलना में अधिक है। वो अभी मौजूदा समय में सबसे ज्यादा विकेट लेने वाले खिलाड़ी भी हैं।

शाकिब का बल्लेबाजी और गेंदबाजी दोनों में जबरदस्त प्रदर्शन उन्हें शानदार खिलाड़ी बनाता है। वे कई बार आईसीसी की रैंकिंग में नंबर 1 ऑलराउंडर रह चुके हैं और बांग्लादेश को कई मैच जिताने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

करियर का आखिरी मैच खेलने की मिली थी अनुमति

शाकिब को बांग्लादेश की टेस्ट टीम में दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ होने वाले आगामी टेस्ट के लिए शामिल किया गया है, जो उनके करियर का आखिरी टेस्ट हो सकता है। हालाँकि, उनके देश लौटने की संभावना काफी कम है। चयन समिति के प्रमुख गाजी अशरफ हुसैन ने कहा कि BCB ने शाकिब को चुनने के लिए “ग्रीन सिग्नल” दिया था, लेकिन अब तक उन्हें बोर्ड से कोई नई जानकारी नहीं मिली है।

शाकिब को बांग्लादेश में सुरक्षित वापसी का भरोसा दिया गया था, लेकिन छात्रों के एक समूह ने उनके खिलाफ विरोध प्रदर्शन की चेतावनी दी है। ‘मीरपुर छात्र जनता’ नाम के ग्रुप ने ऐलान किया है कि वो साकिब की देश वापसी का विरोध करेगा। इसके चलते शाकिब को दुबई में रुकने के लिए कहा गया है, जहाँ वे न्यूयॉर्क से लौटते हुए ट्रांजिट में थे। भले ही शाकिब की फ्लाइट गुरुवार (17 अक्टूबर 2024) शाम को ढाका के लिए थी, लेकिन वो नहीं पहुँचे। यहाँ से उनके वापस अमेरिका जाने की उम्मीद है।

शाकिब अल हसन के खिलाफ बांग्लादेश में प्रदर्शन, फोटो साभार: ESPNCricinfo

इन घटनाक्रमों को देखते हुए शाकिब अल हसन के लिए अब आगे की राह मुश्किल नजर आ रही है। उनके खिलाफ हत्या का मामला और देश में चल रही राजनीतिक अस्थिरता ने उनकी वापसी पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। बांग्लादेश के युवाओं और खेल मामलों के सलाहकार असिफ महमूद ने शाकिब को पहले ही यह सलाह दे दी है कि वे बांग्लादेश न लौटें। शाकिब का बांग्लादेश के क्रिकेट में योगदान अमूल्य है, लेकिन वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए यह कहना मुश्किल है कि वे कब और कैसे अपने देश लौटेंगे।

हैदराबाद के मंदिर में तोड़फोड़ करने के लिए मुनव्वर जमा ने मुस्लिमों को उकसाया, खुद को कहता है मोटिवेशनल स्पीकर: 2 अन्य पर भी FIR

हैदराबाद पुलिस ने मुत्यालम्मा मंदिर में हुई तोड़फोड़ की घटना मुंबई के मोटिवेशनल स्पीकर मुनव्वर ज़मा और दो अन्य लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया है। इन पर नफरत फैलाने और धार्मिक भावनाएँ भड़काने का आरोप है। इस मामले में अब्दुल रशीद बशीर अहमद और रेजिमेंटल बाज़ार में मेट्रोपोलिस होटल के प्रबंधक एवं मालिक रहमान को गिरफ्तार किया गया है।

अधिकारियों ने बताया कि पर्सनालिटी डेवलपमेंट पर एक महीने तक चलने वाले सत्र के बहाने मुनव्वर जमा प्रतिभागियों के बीच हिंदुओं के खिलाफ नफरत को बढ़ावा दे रहा था। उसने दंगे भड़काने के लिए भी वह लोगों को उकसाया था। गोपालपुरम थाने के सब-इंस्पेक्टर एल सुरेश ने कहा, “उसने सलमान को मुत्यालम्मा मंदिर में मूर्ति को नुकसान पहुँचाने के लिए भी उकसाया।”

मुनव्वर जमा ने अपनी कार्यशाला आयोजित करने के लिए जरूरी अनुमति नहीं ली थी। इसे आयोजित करने में बशीर और रहमान ने मदद की थी। मुनव्वर जमा इंग्लिश हाउस एकेडमी का संस्थापक है और वह खुद को एक मोटिवेशनल स्पीकर और पर्सनालिटी डेवलपमेंट ट्रेनर बताता है। होटल में आयोजित कार्यशाला में कुल 151 लोग शामिल थे।

इनमें से मुत्यलम्मा मंदिर में देवी की प्रतिमा को लात मारकर खंडित करने का एक आरोपित सलीम सलमान भी था। पुलिस के अनुसार, इस कार्यशाला में शामिल लोग भारत के अलग-अलग हिस्सों से आए थे। आरोपित सलीम सलमान भी मुंबई से आया था। पेशे से कंप्यूटर इंजीनियर सलीम सलमान ने 14 अक्टूबर को मंदिर में घुसकर देवी दुर्गा की मूर्ति को क्षतिग्रस्त कर दिया था।

पुलिस फिलहाल ज़मा और प्रतिभागियों की पृष्ठभूमि की जाँच कर रही है। जाँच की निगरानी कर रहे शहर के एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने बताया, “हम कॉन्फ्रेंस की रिकॉर्डिंग, प्रतिभागियों को वितरित की गई सामग्री और कई अन्य विवरणों की भी जाँच कर रहे हैं।” उन्होंने कहा कि होटल के सभी 49 कमरे उपस्थित लोगों के लिए आरक्षित थे।

सलीम सलमान वह भगोड़े जाकिर नाइक सहित अनय इस्लामी कट्टरपंथियों का वीडियो देखता रहता था। इसके बाद वह कट्टरपंथी बन गया था। पुलिस ने मंदिर में मूर्ति को खंडित करने के आरोप में उसे 16 अक्टूबर को गिरफ्तार कर लिया था। इससे पहले वह साल 2022 में मुंबई के गणेश पूजा में तोड़फोड़ और श्रद्धालुओं से मारपीट कर चुका था।

दरअसल, सलीम सलमान मस्जिद जाते समय मंदिर को निशाना बनाया था। आरोपित ने पूछताछ में पुलिस को बताया कि वह सिकंदराबाद के ‘सिने पुलिस होटल’ में ठहरा हुआ था। आरोपित की जानकारी के आधार पर पुलिस ने 50 कमरों वाले होटल पर छापा मारा, जहाँ पता चला कि यह होटल ज्यादातर चोरों द्वारा किराए पर लिया जाता था।

पुलिस ने आगे बताया कि सलीम सलमान के साथ और भी असामाजिक तत्व मंदिर पर हमला कर रहे थे, लेकिन बाकी सभी भाग गए। बता दें कि सोमवार (14 सितंबर 2024) को तेलंगाना के कुर्मागुड़ा क्षेत्र में मुत्यालम्मा मंदिर की मूर्ति तोड़े जाने के बाद सिकंदराबाद में तनाव पैदा हो गया, जिससे स्थानीय हिंदू निवासियों में गुस्सा और विरोध भड़क गया।

यह घटना पास के पासपोर्ट कार्यालय के पास की है। घटना के दौरान लोगों ने इस कट्टरपंथी को स्थानीय लोगों ने तुरंत पकड़ लिया। बाद में उसे मार्केट पुलिस स्टेशन की हद में पुलिस को सौंप दिया गया। घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से फैल रहा है। घटना के बाद अधिकारियों ने सुरक्षा कड़ी कर दी और शांति बहाल करने के प्रयास कर रहे हैं।

इस बीच, स्थानीय लोगों ने मंदिर के पास प्रदर्शन किया और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की माँग की। प्रदर्शन में बीजेपी नेता भी शामिल हुए। इस प्रदर्शन के दौरान हैदराबाद लोकसभा सीट से बीजेपी की उम्मीदवार माधवी लता समेत कई बीजेपी कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार भी कर लिया गया। वहीं, केंद्रीय मंत्री जी किशन रेड्डी भी मंदिर पहुँचे थे।।

उन्होंने इस घटना को ‘शर्मनाक‘ करार दिया और कुछ लोगों पर जानबूझकर सांप्रदायिक तनाव भड़काने का आरोप लगाया। इस बीच, घटना का सीसीटीवी फुटेज सामने आया, जिसमें एक युवक सफेद कुर्ता और काली इस्लामिक टोपी पहने देवी की मूर्ति पर लात मारते हुए दिख रहा है। उसने मूर्ति को बेरहमी से तोड़ा और उसके टुकड़े ज़मीन पर फेंक दिए।

गुजरात के गिर-सोमनाथ में तोड़े जो इस्लामिक ढाँचे (दरगाह+मस्जिद) वे अवैध: सुप्रीम कोर्ट को प्रशासन ने बताया क्यों चला बुलडोजर, मुस्लिम बता रहे थे अवमानना

गुजरात के गिर सोमनाथ जिले के कलेक्टर दिग्विजयसिंह जडेजा ने सुप्रीम कोर्ट को बताया है कि उन्होंने दरगाह-मस्जिद को जमीन कब्जा खाली करने को गिराई है। कलेक्टर ने सुप्रीम कोर्ट को बताया है कि यह सभी निर्माण अवैध थे। कलेक्टर के खिलाफ मुस्लिम पक्ष ने सुप्रीम कोर्ट ने अवमानना का मुकदमा किया है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, बुधवार (16 अक्टूबर, 2024) को सुप्रीम कोर्ट में अवमानना मामले में गिर-सोमनाथ जिले के कलेक्टर जडेजा ने अपना जवाब दाखिल किया। कलेक्टर जडेजा ने बताया कि उनके जिले इस्लामी ढांचों को तोड़ने में सुप्रीम कोर्ट के आदेश का उल्लंघन नहीं किया गया है। उन्होंने इस आरोप को नकार दिया है।

कलेक्टर जडेजा ने कहा कि उन्होंने जो भी इस्लामी ढाँचे तोड़े वह सार्वजनिक जमीन पर कब्जा करके बनाए गए थे। उन्होंने यह अतिक्रमण खाली करने के विरुद्ध ही यह कार्रवाई की थी। ऐसे में उनको तोड़ने में किसी भी अनुमति की जरूरत नहीं थी। ऐसे में इसे सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवमानना करार नहीं दिया जा सकता।

कलेक्टर जडेजा ने यह भी कहा जडेजा ने कहा कि वह सुप्रीम कोर्ट का सम्मान करते हैं और किसी भी तरह से उसकी गरिमा को ठेस नहीं पहुँचाना चाहते। कलेक्टर जडेजा ने कहा कि वह इसके बाद भी अगर अवमानना लगती है तो वह सुप्रीम कोर्ट से माफ़ी माँगते है। उनकी तरफ से यह भी बताया गया कि जिस जमीन से अतिक्रमण हटाया गया वह अरब सागर तट पर है।

गिर सोमनाथ जिले के कलेक्टर ने यह जवाब मुस्लिम पक्ष द्वारा दायर एक अवमानना याचिका पर दाखिल किया है। मुस्लिम पक्ष ने सितम्बर माह में प्रशासन की अतिक्रमण के खिलाफ की गई कार्रवाई पर सुप्रीम कोर्ट में याचिका डाली थी। मुस्लिम पक्ष ने कहा था कि यह कार्रवाई करके प्रशासन ने सुप्रीम कोर्ट के बुलडोजर एक्शन पर लगाई गई रोक का उल्लंघन किया है।

सुप्रीम कोर्ट ने 17 सितम्बर, 2024 को देश भर में सार्वजनिक जगहों पर अतिक्रमण को छोड़ कर बाकी जगह निर्माण गिराने पर प्रतिबन्ध लगा दिया था। दूसरी तरफ गिर सोमनाथ में 27 सितम्बर, 2024 को हाजी मंगरोलीशा पीर दरगाह, हजरत माईपुरी, सीपे सालार और मस्तानशा बापू जैसी प्रमुख दरगाह समेत तमाम अवैध ढांचों को गिरा दिया था।

यह कार्रवाई काफी बड़े स्तर पर की गई थी। इस दौरान मुस्लिमों ने हंगामा भी किया था। हालाँकि, पुलिस ने इस दौरान कार्रवाई को शांतिपूर्ण तरीके से सम्पन्न करवा दिया था और लगभग 70 लोगों को हिरासत में ले लिया गया था।

‘बहराइच के दरिंदों का हो गया इलाज’: जिस अब्दुल हमीद के घर हुई रामगोपाल मिश्रा की हत्या, उसके 2 बेटों का नेपाल बॉर्डर पर यूपी STF ने किया एनकाउंटर; कॉन्ग्रेस का विलाप शुरू

उत्तर प्रदेश के बहराइच में दुर्गा पूजा के मूर्ति विसर्जन के दौरान रामगोपाल मिश्रा की गोली मारकर हत्या करने के आरोपित रिंकू उर्फ सरफराज खान और तालिब उर्फ सबलू का एनकाउंटर कर दिया गया है। एनकाउंटर में दोनों आरोपितों के पैरों में गोली लगी है। इससे वे घायल हो गए हैं। सूत्रों के अनुसार, यह मुठभेड़ नानपारा कोतवाली के बाइपास में हुई है। 

घायल आरोपियों को इलाज के लिए नानपारा सीएचसी में भर्ती किया गया है। सीएचसी के बाहर पुलिस का पहरा बढ़ा दिया गया है। सीएचसी ने दोनों आरोपितों को बहराइच मेडिकल कॉलेज रेफर कर दिया है। कहा जाता है कि गोपाल मिश्रा पर गोली सरफराज ने ही चलाई थी। तालिब और सरफराज भाई बताए जा रहे हैं। दोनों आरोपित नेपाल भागने की फिराक में थे।

उत्तर प्रदेश के ADG (Law & Order) अमिताभ यश ने बताया कि पुलिस ने पाँच आरोपित पकड़े हैं। वहीं, एनकाउंटर में दो को गोली लगी है। रिपोर्ट के मुताबिक, आरोपितों के नेपाल भागने की की सटीक सूचना मिलने पर दोपहर करीब 2 बजे STF और बहराइच पुलिस ने नानपारा कोतवाली क्षेत्र में हांडा बसेहरी नहर के पास आरोपितों को घेर लिया।

पुलिस ने आरोपितों को सरेंडर करने के लिए कहा तो वे पुलिस पर फायरिंग की। इसके बाद पुलिस और STF ने भी जवाबी कार्रवाई की, जिसमें सरफराज और तालिब को पैरों में गोली लगी। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को बहराइच हिंसा के आरोपियों के पुलिस मुठभेड़ में घायल होने की जानकारी दी गई है।

बहराइच की एसपी वृंदा शुक्ला का कहना है, “जब पुलिस टीम हत्या में इस्तेमाल हथियार की बरामदगी के लिए नानपारा इलाके में गई थी तो मोहम्मद सरफराज उर्फ ​​रिंकू और मोहम्मद तालिब उर्फ ​​सबलू ने हत्या में इस्तेमाल हथियार को वहाँ लोड करके रखा रखा हुआ था, जिसका इस्तेमाल उन्होंने पुलिस पर फायरिंग करने के लिए किया।”

उन्होंने आगे कहा, “आत्मरक्षा में पुलिस ने जवाबी फायरिंग की, जिसमें दोनों घायल हो गए। उनका इलाज चल रहा है और वे जीवित हैं। हमने अन्य तीन आरोपियों को भी गिरफ्तार कर लिया है। सभी 5 को आधिकारिक तौर पर गिरफ्तार कर लिया गया है। उन सभी के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी… अन्य आरोपियों की तलाश जारी है।”

पुलिस ने सरफराज के भाई फहीम, पिता अब्दुल हमीद और एक अन्य को भी पकड़ा है। इससे एक दिन पहले सरफराज की गोली चलाते हुए तस्वीर सामने आई थी। इससे पहले राम गोपाल मिश्रा की हत्या मामले में पहली गिरफ्तारी भी आज गुरुवार (17 अक्टूबर 2024) को ही हुई। आरोपित की पहचान राजा उर्फ मोहम्मद दानिश उर्फ जहीर/सहीर खान के तौर पर हुई है।

बताया जा रहा है कि जहीर नेपाल जाने की फिराक में था, लेकिन उसे माहसी खंड में राजी क्रॉसिंग पर गिरफ्तार कर लिया गया। बहराइच हिंसा मामले में अब तक 11 एफआईआर दर्ज हुई हैं, इसमें 6 नामजद और 1304 अज्ञात लोगों को आरोपित बनाया गया है। वहीं, राम गोपाल की हत्या मामले में 10 लोगों के खिलाफ केस दर्ज हुआ है। ​

मोहम्मद दानिश उर्फ ​​साहिर/जहीर खान इन्हीं आरोपितों में से एक था। उसके अलावा अब्दुल हामिद, सरफराज, फहीम भी इस मामले में आरोपित हैं। गौरतलब है कि 13 अक्टूबर को दुर्गा विसर्जन के दौरान हुई हिंसा मामले में अब तक 55 लोगों को गिरफ्तार किया गया है। इन लोगों की पहचान सीसीटीवी फुटेज के आधार पर हुई है।

उत्तर प्रदेश कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष अजय राय ने एनकाउंटर पर सवाल उठाया है। उन्होंने कहा कि सरकार शुरू से ही फर्जी एनकाउंटर करा रही है। वे सिर्फ अपनी विफलता को छिपाने की कोशिश कर रहे हैं। मृतक रामगोपाल मिश्रा के पैर के नाखूनों को उखाड़ने के सवाल पर राय ने कहा कि उत्तर प्रदेश सरकार दंगा कराना चाहती है।

अजमेर दरगाह के सरवर चिश्ती ने रामगोपाल मिश्रा की हत्या को ठहराया जायज, कहा- फूल नहीं बरसेंगे, जो हुआ वही होना था: बहराइच में दुर्गा विसर्जन जुलूस पर हुआ था हमला

बहराइच में रामगोपाल मिश्रा की निर्मम हत्या को जायज ठहराने की कोशिश की गई है। अजमेर में खादिमों की संस्था ‘अंजुमन सैयद जादगान’ के सचिव सरवर चिश्ती ने कहा है कि जो हुआ, वो होना ही था। अगर मुस्लिमों को गालियाँ बकी जाएँगी तो फूल नहीं बरसेंगे।

सरवर चिश्ती का यह बयान दैनिक भास्क समेत तमाम मीडिया रिपोर्टों पर प्रकाशित है। इसके अनुसार सरवर चिश्ती ने कहा, “घर पर चढ़कर हरा झंडा उतारकर धर्म विशेष का झंडा लहराया जा रहा है। तो फिर फूल तो बरसेंगे नहीं, जो हुआ यही होना था।”

सरवर चिश्ती ने इस घटना में रामगोपाल मिश्रा की हत्या की निंदा करने की जगह कहा- “अब तो ये आए दिन का हो गया है। हमारे मजहबी उलेमाओं की शान में गुस्ताखी की जाती है। कोई आज तक नहीं पकड़ा गया। हमारे जुलूस निकलते हैं हम तो किसी को गाली नहीं देते। शांति से जुलूस निकालते हैं ये सब सिर्फ एक तरफ से हो रहा है।”

अपने बयान में सरवर ने बाबा सिद्दीकी और सिद्धू मूसेवाला की हत्या को लेकर सरकार पर सवाल खड़े किए और कहा कि यहाँ नामचीन मुस्लिमों का मारा जा रहा, कभी सिखों को मारा जा रहा। इसमें सरकार का हाथ नहीं तो ऐसे कैसे हो सकता है।

सरवर चिश्ती के विवादित बयान

बता दें कि सरवर चिश्ती का ये पहला विवादित बयान नहीं है। सरवर चिश्ती वक्फ एक्ट में संशोधन की बात पर मुस्लिमों को भड़का चुके हैं।

उन्होंने कहा था कि भारत के अंदर पिछले कुछ साल से ऐसा सिस्टम चलाया जा रहा है, जिसके जरिए मुसलमान और इस्लाम के प्रति नफरत फैलाई जा रही है। कभी लव जिहाद, लैंड जिहाद, यूपीएससी जिहाद तो कभी हमारे पैगंबर मोहम्मद की शान में गुस्ताखी हो रही है। मदरसे और मस्जिद शहीद की जा रही है, जो कि नाकाबिले बर्दाश्त हो गई है।

इससे पहले सरवर चिश्ती ने अजमेर-92 फिल्म को लेकर विवादित बयान दिया था। रिपोर्टों के अनुसार, सरवर ने कहा था, “लड़की चीज ही ऐसी है… बड़े से बड़ा फिसल जाता है। आदमी पैसों से करप्ट नहीं हो सकता, मूल्यों से करप्ट नहीं हो सकता। लड़की चीज ही ऐसी है कि बड़े से बड़ा फिसल जाता है। वो थे ना जिनका नाम क्या था। जो पेड़ के नीचे बैठे थे, विश्वामित्र जैसे भटक सकते हैं। अच्छा जितने बाबा लोग जेल में हैं। ये सिर्फ वो हैं, जो लड़की के मामले में फंसे। यह ऐसा सब्जेक्ट है कि बड़े से बड़ा फिसल जाता है।”

इसी तरह 2022 में एक बार सरवर चिश्ती ने कहा था जब मुस्लिम समाज ने नुपूर शर्मा की गिरफ्तारी को लेकर जुलूस निकाला तो फिर हिंदू समाज ने जुलूस क्यों निकाला?इससे भावनाएँ आहत पहुई। मुसलमान ये कतई बर्दाश्त नहीं करेगा। सके अलावा सरवर ये भी कह चुके हैं कि नबी की शान में गुस्ताखी हुई तो हिंदुस्तान हिल जाएगा। उनका ये भी मानना है कि भारत सरकार ने जिस पीएफआई को देश में बैन किया है वो मुस्लिमों की आवाज उठाने वाला संगठन है।

क्या है ‘असम एकॉर्ड’, क्यों सुप्रीम कोर्ट ने बरकरार रखी नागरिकता अधिनियम की धारा 6ए की संवैधानिक वैधता: फैसले का ‘बांग्लादेशी घुसपैठियों’ पर सीधा असर

सुप्रीम कोर्ट ने नागरिकता कानून, 1955 के भाग 6A को सही ठहराया है। सुप्रीम कोर्ट की संविधान बेंच ने 4:1 के निर्णय से यह फैसला दिया है। नागरिकता कानून का भाग 6A असम के भीतर बांग्लादेश से आने वाले अवैध बांग्लादेशी घुसपैठियों को लेकर लाया गया कानून असम समझौते के तहत बनाया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 1971 के बाद जो भी लोग असम में बांग्लादेश से घुसे हैं, उनको अवैध प्रवासी घोषित माना जाएगा।

सुप्रीम कोर्ट चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस MM सुन्दरेश, जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस जेबी पारदीवाला की बेंच ने बुधवार (17 अक्टूबर, 2024) को यह निर्णय सुनाया। जस्टिस जेबी पारदीवाला ने फैसले से असहमति जताई है।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय में कहा कि असम आंदोलन और राजीव गाँधी की सरकार के बीच हुआ समझौता ‘असम एकॉर्ड’ एक समस्या का समाधान था। उन्होंने कहा कि अवैध शरणार्थियों का आना एक राजनीतिक समस्या बन चुकी थी।

असम एकॉर्ड के बाद संसद ने कानून बनाया था कि 1966 से पहले बांग्लादेश (तब पूर्वी पाकिस्तान) से आए भारतीय मूल के सभी लोग भारतीय नागरिक होंगे जबकि 1966 से 25 मार्च, 1971 के बीच आए लोग नागरिकता लेने के लिए आवेदन कर सकेंगे। इसे 1955 के नागरिकता कानून में 6A के तौर पर जोड़ा गया था।

चीफ जस्टिस चंद्रचूड़ के साथ बाकी तीन जजों ने पाया कि राजनीतिक समस्या का इस तरह कानूनी समाधान कर दिया गया था और संसद को इस तरह का क़ानून बनाने का अधिकार था। कोर्ट ने उन आपत्तियों को नकार दिया कि संसद को इस तरह का विशेष कानून बनाने का अधिकार नहीं था।

याचिकाकर्ताओं ने कहा था कि इस कानून के जरिए असम को बाकी सीमाई प्रदेशों से अलग रखा था, जो कि ठीक नहीं था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि असम में इस समस्या का प्रभाव कहीं ज्यादा था क्योंकि यहाँ की जनसंख्या अधिक प्रभावित हो रही थी।

बेंच ने पाया कि असम की बांग्लादेश से लगने वाली सीमा पश्चिम बंगाल से कहीं छोटी है, ऐसे में उसके लिए विशेष कानून बनाना ठीक था। बेंच ने याचिकाकर्ताओं का यह ऐतराज भी नकार दिया कि इस क़ानून से संविधान की प्रस्तावना में बताए गए भाईचारे को खतरा होता है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा, “ऐसे में जब लाखों लोगों को नागरिकता से वंचित करने या किसी समुदाय की जीवन शैली की रक्षा करने के बीच में एक चुनने की दुविधा आती है तो कोर्ट निश्चित रूप से भाईचारे के सिद्धांतों के अंतर्गत नागरिकता देने को प्राथमिकता देगा। अतः याचिकाकर्ताओं की यह दलील खारिज की जाती है।”

सुप्रीम कोर्ट में याचिकर्ताओं ने यह भी दलील दी थी कि बाकी देश में 1951 से पहले आ गए लोगों को नागरिकता दी गई है जबकि असम में यह तारीख 1971 तक बढ़ा दी गई जो कि ठीक नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 1971 की तारीख रखना सही है क्योंकि तभी बांग्लादेश में मुक्ति संग्राम खत्म हुआ था।

इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस कानून की वजह से असमिया संस्कृति पर कोई प्रभाव पड़ा, ऐसा याचिकाकर्ता नहीं दिखा पाए, अतः यह अनुच्छेद 29 का उल्लंघन भी नहीं करता। (यह अनुच्छेद संस्कृति के संरक्षण से सम्बन्धित है)सुप्रीम कोर्ट ने इसी के साथ नागरिकता कानून, 1955 के भाग 6A को सही ठहराया और याचिकाकर्ताओं कि दलीलों को खारिज कर दिया।

क्या है नागरिकता कानून का हिस्सा 6A?

वर्ष 1971 से पहले पाकिस्तान ने बांग्लादेश (तब पूर्वी पाकिस्तान) में पाकिस्तान की सरकार ने अत्याचार करना चालू कर दिया था। पकिस्तान, पूर्वी पाकिस्तान में हिन्दुओं और बांग्ला भाषियों को निशाना बना रहा था। 1970-71 आते-आते यह स्थिति और भी गंभीर हो गई थी।

इसके बाद लाखों की संख्या में शरणार्थी भारत भागकर असम, पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा जैसे राज्यों में आ गए गए थे। असम इससे काफी प्रभावित हुआ था। 1971 में युद्ध के खत्म होने के साथ बांग्लादेश नया राष्ट्र बन गया था। हालाँकि, इसके बाद भी बड़ी संख्या में शरणार्थी वापस नहीं गए।

असम के कई जिलों की जनसांख्यिकी इन शरणार्थियों की वजह से बदल गई। इसके बाद 1980 से असम में आंदोलन चालू हुआ। यह आंदोलन कई बार उग्र भी हुआ। इसके बाद समस्या बढ़ती देख असमिया आंदोलनकारियों और राजीव गाँधी सरकार में 1985 में एक समझौता हुआ। इसे ‘असम एकॉर्ड’ का नाम दिया गया। इसके तहत 1966 से पहले असम के भीतर आए भारतीय मूल के लोग (वह लोग जो अविभाजित भारत का हिस्सा थे) को भारतीय नागरिक माना गया।

इसके अलावा 1966 से 1971 के बीच आए लोगों को वैध रूप से नागरिकता के लिए आवेदन का अधिकार दिया गया। हालाँकि, 1971 के बाद आए लोगों को अवैध माना गया। यह बातें 1955 के नागरिकता क़ानून में एक संशोधन के जरिए जोड़ी गईं। इसे ही नागरिकता कानून, 1955 के भाग 6A का नाम दिया गया। इसी के खिलाफ कई लोगों ने याचिका डाली थी।

इस कानून का विरोध करने वाले कौन?

सुप्रीम कोर्ट में असम एकॉर्ड के तहत नागरिकता कानून में जोड़े गए इस हिस्से 6A को असम संमिलता महासंघ नाम की एक संस्था ने 2012 में चुनौती दी थी। उन्होंने कहा कि यह कानून संविधान के अनुच्छेद 6, 7, 14, 29 और 355 का उल्लंघन करता है। याचिका में माँग की गई कि असम में नागरिकता देने की तारीख 1971 की जगह 1951 की जाए। याचिकाकर्ताओं ने यह भी दलील दी थी कि संसद ऐसा कानून नहीं बना सकती थी। उन्होने इस कानून को राजनीतिक अधिकारों में दखल भी बताया था।

याचिकाकर्ताओं ने माँग की थी कि 1951 के बाद असम में आए शरणार्थियों को देश के सभी हिस्सों में आनुपातिक रूप से बांटा जाए। इसके अलावा याचिकाकर्ताओं ने माँग की थी कि असम सीमा की पूरी तरह से बाड़बंदी की जाए और अवैध प्रवासियों को बाहर किया जाए। हालाँकि, उनकी दलीलें कोर्ट में नहीं मानी गई।

अवैध बांग्लादेशियों को निकाला जाए बाहर

सुप्रीम कोर्ट ने नागरिकता अधिनियम के 6A को सही ठहराने के साथ ही असम से अवैध प्रवासियों को वापस भेजने को लेकर बात की। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 1 जनवरी,1966 से पहले असम में प्रवेश करने वाले लोगों को नागरिकता दी जाएगी जबकि 1966 से 1971 के बीच आने वालों को कुछ शर्तों के साथ नागरिकता दी जाएगी।

लेकिन 25 मार्च, 1971 को या उसके बाद असम में प्रवेश करने वाले अवैध लोगों नागरिकता नहीं दी जाएगी और और उन्हें अवैध अप्रवासी घो/षित कर दिया जाता है, जिन्हें पहचान कर बाहर निकाला जाना चाहिए।

वक्फ प्रॉपर्टी है नई संसद: AIUDF चीफ बदरुद्दीन अजमल ने मुस्लिमों को भड़काया, कहा- 9.7 लाख बीघा जमीन ह़ड़पना चाहती है सरकार, वसंत विहार पर भी दावा

असम के धुबरी से पूर्व सांसद और ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (AIUDF) के अध्यक्ष बदरुद्दीन अजमल का दावा है कि नया संसद भवन वक्फ की जमीन पर बना हुआ है। उन्होंने हाल में वक्फ बोर्ड संशोधन बिल का विरोध करते हुए इस मुद्दे पर अपना बयान दिया।

उन्होंने मुस्लिमों को भड़काते हुए कहा कि सरकार वक्फ की 9.7 लाख बीघा जमीन ह़ड़पना चाहती है। उन्होंने ये भी माँग की कि अब इस जमीन को सरकार को मुस्लिम समाज को सौंप देना चाहिए। उन्होंने कहा कि सरकार को वक्फ की सारी जमीन मुसलमानों को वापस कर देनी चाहिए। उनके मुताबिक, अगर सरकार उन्हें जमीन दे देगी तो मुस्लिम समाज के लिए शिक्षा, हेल्थ और अनाथालय का इंतजाम वो लोग खुद कर लेंगे उन्हें सरकार का एहसान नहीं चाहिए।

समाचार एजेंसी एएनआई द्वारा साझा की गई वीडियो में अजमल कहते दिखते हैं- “अगर आप लोग रिसर्च करेंगे तो पता चलेगा नया संसद भवन भी वक्फ की प्रॉपर्टी पर है। इसके अलावा वसंत विहार के आसपास का इलाका और शायद एयरपोर्ट भी वक्फ का है।” उन्होंने कहा कि जो लोग बिन अनुमति के वक्फ प्रॉपर्टी का इस्तेमाल करते हैं वो लोग इन सबके ऊपर मुसीबत आएगी। वो लोग खुद देखेंगे। सबकी सरकार जाएगी। छोटे-मोटे लोगों से मजाक करना अलग बात है। पीर-फकीर वो लोग हैं जिन्हें दुनिया रहने तक हिंदू-मुसलमान सब मानेंगे। वक्फ बोर्ड मामले पर इनकी पूरी मिनिस्ट्री चली जाएगी।”

उनके इसी बयान के बाद अब केंद्रीय मंत्री किरण रिजिजू ने इस पर प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने सभी सांसदों से वक्फ (संशोधन) विधेयक, 2024 का समर्थन करने की अपील करते हुए कहा कि भारत में सबसे बड़ी वक्फ संपत्तियाँ हैं और उनका उपयोग महिलाओं, बच्चों, पिछड़ा वर्ग और मुस्लिम समुदाय के कल्याण के लिए किया जाना चाहिए।

इसके अलावा भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता प्रदीप भंडारी ने कहा कि बदरुद्दीन अजमल तुष्टिकरण की राजनीति कर रहे हैं, क्योंकि उनके पूरे वोट बैंक ने लोकसभा चुनाव में कॉन्ग्रेस का समर्थन किया था, जिसके कारण उनकी हार हुई।

संविधान, मुकुट, साड़ी… न्याय की देवी का नूतन अवतार: जानिए आँखों पर पट्टी वाली ‘लेडी ऑफ जस्टिस’ कहाँ से आई, CJI चंद्रचूड़ ने क्यों बदलवाई तलवार वाली मूर्ति

भारत में ‘न्याय की देवी’ (Lady of Justice) आँखों पर बँधी पट्टी हटा दी गई है। उनके हाथ में तलवार की जगह संविधान की प्रति दे दी गई है। गाउन को हटाकर साड़़ी पहना दिया गया है। सिर पर मुकुट और गले में हार आदि से अलंकृत कर दिया गया है। इस प्रतिमा को न्याय की यूनानी देवी से न्याय की भारतीय देवी का अवतार कहा जा सकता है।

भारत के मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने न्याय की देवी की एक नई प्रतिमा का अनावरण किया है। आँखों पर पट्टी होने का अर्थ कानून का अंधा होने का संकेत देता था। वहीं, तलवार सजा को प्रदर्शित करता था। अब परिवर्तनकारी प्रतीक संवैधानिक मूल्यों और कानून के समक्ष समानता के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाता है।

सुप्रीम कोर्ट के जजों की लाइब्रेरी में लगाई गई नई मूर्ति को CJI डीवाई चंद्रचूड़ ने ऑर्डर देकर बनवाया है। इसका उद्देश्य यह संदेश देना है कि देश में कानून अँधा नहीं है और यह सजा का प्रतीक नहीं है। मूर्ति के दाएँ हाथ में तराजू को बनाए रखा है, जो दोनों पक्षों के तथ्यों और तर्कों को देखने और सुनने के बाद न्याय करने का प्रतीक है।

यह बदलाव उपनिवेश के निशानियों से आगे बढ़ने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। हाल ही में भारत सरकार ने ब्रिटिश कानून इंडियन पीनल कोड (IPC) की जगह भारतीय न्याय संहिता (BNS) कानून लागू किया था। लेडी ऑफ जस्टिस की मूर्ति में यह बदलाव भी इसी कड़ी के तहत उठाया कदम माना जा रहा है।

मिस्र की न्याय की देवी मात (साभार: egyptianmuseum/britannica)

एक न्यायिक अधिकारी ने बताया, “न्याय की देवी का रूप हमारे संवैधानिक प्रतिबद्धताओं को प्रतिबिंबित करने के लिए बदलना आवश्यक था। तलवार के बजाय संविधान थामने से यह संदेश जाता है कि न्याय लोकतांत्रिक मूल्यों और मौलिक अधिकारों के अनुरूप होना चाहिए।”

कई सभ्यताओं से जुड़ी है लेडी ऑफ जस्टिस की कहानी

न्याय की देवी का इतिहास बहुत पुराना है। इसकी सबसे शुरुआती मूर्ति प्राचीन मिस्र में पाई जाती है। कहा जाता है कि यह देवी मात (Ma’at) की थी। मात सत्य, व्यवस्था और संतुलन का प्रतीक थीं। उन्हें अक्सर एक पंख पकड़े हुए दिखाया जाता था, जिसका उपयोग मृत्यु के बाद आत्मा के न्याय के लिए किया जाता था।

ग्रीक न्याय की देवी थेमिस (साभार: ब्रिटानिका)

बाद में यूनानी और रोमन सभ्यताओं ने अपनी न्याय की देवी की मूर्ति बनाई। ग्रीक देवी थेमिस कानून और व्यवस्था का प्रतिनिधित्व करती थीं। उनकी बेटी डाइक, जिन्हें एस्ट्राया के नाम से भी जाना जाता है, न्याय और नैतिक व्यवस्था का प्रतीक थीं। थेमिस को तराजू पकड़े हुए दिखाया गया था। इन्हें ही न्याय की देवी का शुरुआती रूप माना जाता है।

रोमन की पौराणिक कथाओं में थेमिस को जस्टिशिया के साथ जोड़ा गया था, जो रोमन साम्राज्य में न्याय की देवी थीं। जस्टिशिया की छवि आज की न्याय व्यवस्था को दिखाने के लिए इस्तेमाल की जाती है। रोमन सम्राट टिबेरियस ने रोम में जस्टीशिया का एक मंदिर बनवाया था। जस्टीशिया न्याय के उस गुण का प्रतीक बन गईं। इनके साथ हर सम्राट खुद को जोड़ता था।

रोमन साम्राज्य में न्याय की देवी जस्टिशिया (साभार: ThoughtCo)

आगे चलकर रोमन सम्राट वेस्पाशियन ने जस्टिशिया की छवि के साथ सिक्के बनाए। इन सिक्कों में वह एक सिंहासन पर बैठी हैं, जिसे ‘जस्टीशिया ऑगस्टा’ कहा जाता था। उनके बाद कई सम्राटों ने खुद को न्याय का संरक्षक घोषित करने के लिए इस देवी की छवि का उपयोग किया। दुनिया के कई देशों में न्याय की देवी की यह मूर्ति देखी जा सकती है।

यूनानी सभ्यता से न्याय की देवी यूरोप और अमेरिका पहुँची। औपनिवेशिक काल में ब्रिटेन के एक अंग्रेज न्यायिक अधिकारी 17वीं सदी में इन्हें भारत लेकर आया था। ब्रिटिश काल में 18वीं शताब्दी के दौरान न्याय की देवी की मूर्ति का सार्वजनिक इस्तेमाल किया जाने लगा। भारत की आजादी के बाद न्याय की देवी को उसके प्रतीकों के साथ भारतीय लोकतंत्र में स्वीकार किया गया।