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अजमेर के सरकारी स्कूल में नमाज पढ़ती थीं मुस्लिम टीचर, बच्चों को भी उकसाती थीं: असमा परवीन निलंबित, शगुफ्ता पर कार्रवाई के लिए शिक्षा विभाग को चिट्ठी

राजस्थान के अजमेर जिले के एक सरकारी स्कूल में नमाज पढ़ने और बच्चों को नमाज पढ़ने के लिए उकसाने के आरोप में एक मुस्लिम शिक्षिका को निलंबित कर दिया गया है। वहीं, एक अन्य मुस्लिम शिक्षिका के खिलाफ कार्रवाई के लिए शिक्षा विभाग को लिखा गया है। जिन शिक्षिकाओं पर कार्रवाई की गई है, उनके नाम हैं- असमा परवीन और शगुफ्ता। यह मामला ब्यावर खास सीनियर सेकेंडरी स्कूल का है।

ब्यावर के माध्यमिक शिक्षा अधिकारी अजय कुमार गुप्ता ने बताया, “पिछले लंबे समय से ब्यावर खास स्कूल में दो शिक्षिकाएँ विद्यार्थियों को नमाज पढ़ने के लिए उकसाती थीं। इसकी शिकायत भी शिक्षा विभाग को मिली थी। जाँच के बाद आरोप सही पाया गया। इसकी वजह से शिक्षिका असमा परवीन को सस्पेंड कर दिया गया।”  

उन्होंने आगे कहा, “दूसरी शिक्षिका शगुफ्ता सेकंड ग्रेड में होने की वजह से अपने स्तर पर सस्पेंड नहीं किया जा सकता था। इसलिए शगुफ्ता पर कार्रवाई के लिए संयुक्त निदेशक कार्यालय को रिपोर्ट भेज दिया गया है।” कहा जा रहा है कि दोनों शिक्षिकाओं को स्कूल प्रशासन ने कई बार इसको लेकर हिदायत भी दी थी, लेकिन दोनों शिक्षिकाओं पर कोई असर नहीं पड़ा।

आखिरकार, स्कूल प्रशासन और गाँव वालों ने इसकी शिकायत जिला शिक्षा अधिकारी से की। जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) अजय कुमार गुप्ता ने शिकायत मिलने पर एक जाँच कमिटी बनाई थी। इसमें अतीत मंड स्कूल की प्रिंसिपल विमला चौहान और गणेशपुरा स्कूल के प्रधानाचार्य सुनील व्यास को जाँच सौंपा गया था। जाँच में आरोप सही पाए गए हैं।

आसमा परवीन का ट्रांसफर सीबीईओ कार्यालय में किया गया है। इन्हें नियमानुसार 50 प्रतिशत निर्वाह भत्ता दिया जाएगा। ब्यावर खास के कार्यवाहक प्रधानाचार्य महेंद्र माली ने बताया कि DEO के निर्देशानुसार शिक्षिका असमा परवीन को कार्यमुक्त कर दिया गया है। जबकि शिक्षिका शगुफ्ता अभी इसी स्कूल में ही कार्यरत है। इनके बारे में जो भी निर्देश मिलेंगे उसका पालन किया जाएगा।

बता दें कि राजस्थान के शिक्षा मंत्री मदन दिलावर ने कहा था कि शिक्षक स्कूल छोड़कर नमाज पढ़ने नहीं जा सकते। उन्होंने कहा था कि नमाज और पूजा-पाठ के नाम पर स्कूल से गायब रहने वाले शिक्षकों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। यदि कोई शिक्षक धार्मिक कार्यक्रम में शामिल होना चाहता है तो वह छुट्टी लेकर जा सकता है। 

मानहानि में संजय राउत को 15 दिन की जेल-जुर्माना भी, कहा था- किरीट सोमैया ने किया ₹100 करोड़ का घोटाला: जानिए सजा सुनाए जाने के बाद भी क्यों नहीं हुई कैद

शिवसेना (उद्धव) के राज्यसभा सांसद संजय राउत को भाजपा नेता किरीट सोमैया और उनकी पत्नी के बारे में झूठ फ़ैलाने पर कोर्ट ने सजा दी है। संजय राउत को मानहानि का दोषी मानते हुए कोर्ट ने जुर्माना भी लगाया है। कोर्ट ने यह फैसला किरीट सोमैया की पत्नी के दायर किए गए मुकदमे में सुनाया है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, मुंबई के मझगाँव मेट्रोपोलिटन कोर्ट ने गुरुवार (26 सितम्बर, 2024) को किरीट सोमैया की पत्नी मेधा सोमैया द्वारा दायर इस मुकदमे में सजा का ऐलान किया। कोर्ट ने संजय राउत पर झूठ फ़ैलाने और किरीट सोमैया और उनकी पत्नी की छवि खराब करने के आरोप सही पाए और उन्हें 15 दिन की जेल की सजा सुनाई।

कोर्ट ने संजय राउत पर ₹25,000 का जुर्माना भी ठोंका है। हालाँकि, संजय राउत को अभी इस मामले में जेल नहीं जाना पड़ेगा। उन्होंने सजा सुनाए जाने के बाद इस मामले में जमानत याचिका लगाई। इसे कोर्ट ने स्वीकार कर लिया और साथ ही उनको दी गई सजा को भी 30 दिन के लिए निलंबित कर दिया।

मेधा सोमैया ने संजय राउत के खिलाफ यह मुकदमा 2022 में किया था। मेधा ने संजय राउत पर आरोप लगाया कि उन्होंने उनके पति किरीट सोमैया और उनके खुद के खिलाफ भ्रष्टाचार सम्बन्धी झूठे दावे किए, इससे उनकी दशकों की बनाई छवि धूमिल हुई। उन्होंने कहा कि यह फर्जी आरोप इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया में भी खूब चले।

गौरतलब है कि संजय राउत ने 2022 में किरीट सोमैया और उनकी पत्नी मेधा सोमैया पर मुंबई में शौचालयों के निर्माण में भ्रष्टाचार का आरोप लगाया था। संजय राउत ने कहा था कि मीरा भायंदर इलाके में बनाए गए इन शौचालयों के निर्माण ₹100 करोड़ का घोटाला किया गया है, जिसमें सोमैया दंपती शामिल हैं।

इस बात को लेकर संजय राउत के खिलाफ मेधा सोमैया ने मामला दर्ज करवाया था। सोमैया ने इस संबंध में कोर्ट के सामने संजय राउत के वह वीडियो भी पेश किए थे जिनमें वह उन पर आरोप लगा रहे थे। कोर्ट ने इन वीडियो और बाकी सबूतों को देखते हुए राउत को दोषी माना और उन्हें सजा सुनाई।

संजय राउत को सजा दिए जाने पर किरीट सोमैया ने कहा, “संजय राउत को 15 दिन की सजा सुनाई गई, उसको हिरासत में लिया गया। ₹25000 का जुर्माना उन्हें मेधा सोमैया को देना पड़ेगा। संजय राउत की तरफ से इस मामले में अभी कोई प्रतिक्रया नहीं आई है।

जो जाली दस्तावेजों पर बन गई IAS, जिसके फ्रॉड को UPSC ने भी माना, उस पूजा खेडकर की गिरफ्तारी पर रोक हाई कोर्ट ने फिर बढ़ाई: 5 बार मिल चुकी है राहत

पुणे की बर्खास्त ट्रेनी आईएस पूजा खेडकर को दिल्ली हाईकोर्ट से लगातार पाँचवी बार राहत मिली है। जानकारी के मुताबिक जस्टिस चंद्र धारी सिंह ने पूजा के वकील के अनुरोध के बाद उनकी अग्रिम जमानत याचिका को मंजूरी दे दी। अब मामले की सुनवाई 4 अक्टूबर को होनी है।

बताया जा रहा है कि इस मामले में खेडकर के वकीलों ने कोर्ट के सामने अपना पक्ष रखने के लिए समय माँगा था। इसी कारण से पूजा खेडकर को गिरफ्तारी में मिली छूट को जारी रखा गया।

पाँच बार मिली राहत

पूजा खेडकर पर सिविल सेवा में ओबीसी एवं दिव्यांगता कोटा का अनुचित ढंग से लाभ लेने का आरोप है। दिल्ली पुलिस हाई कोर्ट को बता चुकी है कि पूजा खेडकर की तरफ से जमा कराए गए 2 विकलांगता के प्रमाण पत्र फर्जी होने का शक है। इसके अलावा यूपीएससी ने भी पूजा खेडकर के खिलाफ झूठे दस्तावेज दाखिल करने का आरोप लगाकर कार्रवाई की थी।

हालाँकि मामले की जाँच और सवालों के जवाब दाखिल करने और उन्हें पढ़ने के क्रम में खेडकर को अदालत से राहत मिलती गई। कोर्ट से उन्हें सबसे पहले राहत 12 अगस्त को मिली थी। हाई कोर्ट ने इस मामले में सुनवाई करते हुए पूजा खेडकर को 21 अगस्त तक गिरफ्तारी से राहत दी थी। साथ ही दिल्ली पुलिस और यूपीएससी से जवाब माँगा कि पूजा खेडकर की हिरासत क्यों जरूरी है।

इसके बाद 21 अगस्त को फिर सुनवाई हुई। यूपीएससी ने अपील की कि पूजा को राहत न दी जाए, लेकिन सुनवाई के बाद फिर अदालत ने पूजा को गिरफ्तारी से राहत दी और अगली सुनवाई की तारीख 29 अगस्त रखी गई। इसके बाद 6 सितंबर से 25 सितंबर पूजा को चौथी बाहर राहत मिली और फिर आज 26 सितंबर को मामला अगली सुनवाई तक के लिए टाल दिया गया। वहीं पूजा को मिली छूट जारी रखी गई।

पूजा खेडकर का मामला

बता दें कि पूजा खेडकर का मामला इस वर्ष जुलाई में प्रकाश में आया था। पुणे कलेक्टर ने पूजा की माँगों से तंग आकर उनके व्यवहार की रिपोर्ट एडिशनल चीफ सेक्रेट्री को भेजी थी। 8 जुलाई पूजा खेडकर का ट्रांसफर वाशिम भेजा गया। 11 जुलाई को केंद्र सरकार ने पूजा पर लगे आरोपों की जाँच के लिए कमेटी बनाई। 16 जुलाई को वाशिम में चल रही उनकी ट्रेनिंग रोक दी गई। 23 जुलाई तक मसूरी स्थित LBSNAA में रिपोर्ट करने को कहा गया।

धीरे-धीरे पूजा खेडकर के माता-पिता से जुड़ी खबरें सामने आने लगीं। 18 जुलाई को पूजा की माँ गिरफ्तार हुई। 19 जुलाई को पूजा के खिलाफ यूपीएससी ने एफआईआर दर्ज कराई। 31 जुलाई को पूजा के खिलाफ पटियाला हाउस में अग्रिम जमानत याचिका लगाई गई। 1 अगस्त को कोर्ट ने याचिका खारिज की। 5 अगस्त को पूर्व ट्रेनी आईएस दिल्ली हाईकोर्ट पहुँची और उसके बाद से ये मामला वहाँ सुना जा रहा है।

गणपत विश्वविद्यालय में मुस्लिमों ने खुले में पढ़ी नमाज, हिन्दू संगठनों ने किया विरोध: हनुमान चालीसा का पाठ, गंगाजल से हुई धुलाई

मेहसाणा के गणपत विश्वविद्यालय में मुस्लिम छात्रों ने खुले में नमाज पढ़ी। इस पर विवाद हो गया है। इस घटना का वीडियो भी वायरल हो गया। वीडियो वायरल होने के बाद मेहसाणा के हिंदू संगठनों में गुस्सा है। इस घटना का विरोध करने के लिए हिन्दू संगठनों ने इकट्ठा होकर विश्वविद्यालय में जाकर विरोध प्रदर्शन किया है।

हिन्दू संगठनों ने यहाँ अखंड हनुमान चालीसा का पाठ भी किया। बजरंग दल-विश्व हिन्दू परिषद ने कॉलेज परिसर में गंगाजल और गोमूत्र छिड़ककर शुद्धिकरण भी किया। विश्वविद्यालय प्रशासन ने ने यह आश्वासन दिया है कि दोबारा खुले में नमाज नहीं पढ़ी जाएगी। मामले को शांत करने की कोशिश की कि ऐसा दोबारा नहीं होगा।

जानकारी के अनुसार, गणपत विश्वविद्यालय मेहसाणा तालुका के खेरवा गाँव के पास स्थित है, यहाँ हाल ही में मुस्लिम छात्रों ने परिसर के भीतर खुले में नमाज पढ़ी। इसका किसी ने वीडियो भी बनाया। यह वीडियो इसके बाद वायरल हो गया। इसके बाद स्थानीय हिन्दू संगठनों के लोग यहाँ इकट्ठा हो गए।

गणपत विश्वविद्यालय में सार्वजनिक रूप से नमाज पढ़ने के विवाद के बाद यहाँ के प्रवक्ता भीकेश भट्ट का बयान भी सामने आया। उन्होंने कहा, “कॉलेज में हुई घटना का वीडियो सामने आने के बाद बजरंग दल ने विरोध प्रदर्शन किया। वहीं, हिंदू संगठनों ने विश्वविद्यालय से आश्वासन माँगा कि ऐसी घटना दोबारा नहीं होगी।”

भीकेश भट्ट ने आगे बताया, ” हमने विश्वविद्यालय की ओर से यह वादा किया है कि ऐसी घटना दोबारा नहीं होगी। नमाज पढ़ने वाले छात्र नए थे, इसलिए उन्हें नियमों के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। अब यह पूरा मामला सुलझ गया है।”

ऑपइंडिया ने घटना के बारे में अधिक जानकारी के लिए विश्वविद्यालय प्रशासन से संपर्क भी किया। हालांकी, इस जघन्य घटना से शर्मिंदा होने के कारण थोड़ी ही जानकारी दी। उन्होंने कहा, “हमें इस मामले की कोई जानकारी नहीं है।” जब ऑपइंडिया ने दूसरी बार इस विषय सम्पर्क करने का प्रयास किया तो नम्बर बंद मिला। जैसे ही इस विषय में अन्य जानकारियाँ सामने आएँगी, रिपोर्ट को अपडेट कर दिया जाएगा।

अंसारी लड़की से अब्बासी लड़के ने कर लिया इश्क वाला निकाह, लड़के के छोटे भाई को जंजीरों से बाँधकर पीटा-दिए बिजली के झटके: कौन कहता है मुस्लिमों में नहीं है ऊँच-नीच?

उत्तर प्रदेश के बदायूँ में आमिर नाम के एक मुस्लिम लड़के ने अपने ही संप्रदाय की ऊँची जाति की लड़की से प्रेम विवाह कर ने लिया तो उसके भाई को अपहरण कर लिया गया। लड़की पक्ष के लोगों ने आमिर के छोटे भाई अरशद को अगवा कर लिया उसे बंधक बनाकर ना सिर्फ बेल्ट, लाठी-डंडों और जंजीरों से पीटा, बल्कि करंट भी लगाया। उसे रात भर पीट-पीट कर मौत के करीब पहुँचा दिया।

यह घटना दातागंज कोतवाली क्षेत्र की है। मोहल्ला नालापार निवासी आमिर नाम का एक युवक अपने ही संप्रदाय की युवती से प्रेम करता था। यह बात लड़की पक्ष को पसंद नहीं थी। ‘अंसारी’ जाति से आने वाले लड़की पक्ष का कहना था कि आमिर उनसे नीची ‘अब्बासी’ जाति का है। लड़की के घरवालों के विरोध के बाद दोनों एक दिन घर से फरार हो गए और प्रेम विवाह कर लिए।

इस मामले को लेकर इरशाद हुसैन ने अपनी शिकायत में बताया कि उनका छोटा भाई अरशद मंगलवार (24 सितंबर 2024) की रात करीब 11:30 बजे दुर्गा देवी मंदिर चौराहा पर गया था। इसी दौरान मोहल्ला अरेला निवासी लल्ला बाबू, जमील, जुल्फिकार, आफताब, नदीम, अरशद, तस्लीम, मुबीन, मुन्ने का लड़का और आफताब वहाँ पहुँचे।

अपनी शिकायत में इरशाद हुसैन ने आगे कहा, “उनके भाई अरशद का अपहरण करके जमील के घर ले गए। वहाँ उसे बंधक बनाकर कहा कि ‘नीची जाति का होने के बाद भी तेरे भाई ने हमारे परिवार की बेटी से शादी की है। अब उसका परिणाम भुगत। इसके बाद उन सभी ने मिल कर अरशद को करंट लगाया, लाठी डंडे व बेल्टों से बेरहमी से पीटा। जान से मारने के लिए धारदार हथियारों से भी प्रहार किया।” 

इरशाद ने आरोप लगाया कि चोर बताकर सरे राह पीटते, घसीटते और उल्टा टाँग कर रास्ते के किनारे मरा हुआ समझ कर छोड़कर फरार हो गए। इससे उनके भाई को गंभीर चोट आई हैं। उन्होंने कहा कि इन नामजद आरोपियों के साथ आठ से दस अज्ञात लोग भी थे। वह सभी धमकी देकर गए हैं कि उनकी बेटी के साथ शादी करने का यह ट्रेलर है, आगे और झेलना पड़ेगा। 

इस मामले का एक वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हुआ है। पुलिस ने शिकायती पत्र के आधार पर पीड़ित अरशद को चिकित्सकीय परीक्षण के लिए भेज दिया है। इस मामले में कुछ कुल 9 नामजद सहित कुल 19 आरोपितों के खिलाफ इसके बाद हत्या के लिए अपहरण, हत्या का प्रयास, बंधक बनाने, धारदार हथियार से चोट पहुँचाने, धमकी देने और अपमान करने की धाराओं में प्राथमिकी दर्ज कर ली।

एफआईआर दर्ज करने के बाद पुलिस ने लल्ला बाबू, जमील और जुल्फिकार को गिरफ्तार कर लिया है। दातागंज इंस्पेक्टर अरिहंत कुमार सिद्धार्थ ने बताया कि अन्य आरोपियों की तलाश की जा रही है। जल्द ही गिरफ्तार कर सभी को जेल भेजा जाएगा। बता दें कि मुस्लिमों के मजहबी गुरु या नेता अक्सर ये दावा करते हैं कि इस्लाम में जाति प्रथा नहीं है, लेकिन यह हकीकत से कोसों दूर है।

‘भारत माता की जय’ के नारे को सुन भड़के स्कूल प्रिंसिपल फादर एडमंड, 3 छात्रों को बेरहमी से पीटा: VHP ने ऑपइंडिया को बताया- स्टाफ से लेकर पीड़ित के माता-पिता तक में फादर का डर

केंद्र शासित प्रदेश दीव के एक अंग्रेजी स्कूल में ‘भारत माता की जय’ और ‘जय हिंद’ बोलने पर स्कूल प्रिंसिपल द्वारा कुछ छात्रों की पिटाई का मामला सामने आया है। जानकारी होने के बाद से हिंदू संगठन सक्रिय हैं।

प्रिंसिपल का नाम फादर एडमंड मैस्करेनियस है। बताया जा रहा है कि उन्होंने प्रार्थना सभा के दौरान बच्चों को इसलिए मारा क्योंकि वे ‘भारत माता की जय’ और ‘जय हिंद’ कह रहे थे। मामला उठने के बाद प्रिंसिपल के खिलाफ शिकायत भी हो गई है।

शिक्षक दिवस पर प्रिंसिपल ने बच्चों को पीटा

जानकारी के मुताबिक, घटना 5 सितंबर की है। स्कूल में शिक्षक दिवस मनाया जा रहा था। प्रार्थना के दौरान राष्ट्रगान हुआ और उसके बाद कुछ बच्चों ने मिलकर ‘भारत माता की जय’ के नारे लगाए। इन्हीं नारों की आवाज सुन प्रिंसिपल नाराज हो गए।

उन्होंने तीनों बच्चों को एक पंक्ति में खड़ा किया और फिर उन्हें बेरहमी से पीटा। अजीब बात ये है कि प्रिंसिपल को पता तक नहीं था वो नारेबाजी किसने की है, लेकिन फिर भी उन्होंने उन तीनों को पकड़कर मारा।

कहा जा रहा है कि अन्य बच्चे प्रिंसिपल से इतना डरते थे कि कोई भी उन्हें रोकने आगे नहीं आया। बच्चों के माता-पिता भी इस घटना पर डर से चुप्पी साधे रहे कि अगर उन्होंने आवाज उठाई तो इसका असर आगे चलकर उनके बच्चों पर पड़ेगा।

हिंदू संगठनों के कारण उठा मामल

बाद में इस घटना की जानकारी विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल जैसे संगठनों को सोशल मीडिया के जरिए हुई। उन्होंने ये मामला उठाया और जिला कलेक्टर को शिकायत पत्र भेजकर हेडमास्टर के खिलाफ शिकायत की, जिसकी प्रति ऑपइंडिया के पास मौजूद है।

मामले के संबंध में जब ऑपइंडिया को सूचना मिली तो हमने हिंदू संगठन के जिला समन्वयक भरतभाई सोलंकी से बात की। उन्होंने बताया कि निर्मला माता इंग्लिश स्कल दीव में है। नियमानुसार स्कूल में राष्ट्रगान बजाया जाता है, लेकिन समापन के बाद कोई ‘भारत माता की जय’ या कोई अन्य जयकार नहीं होती। पिछली 5 तारीख को जब स्कूल में शिक्षक दिवस मनाया जा रहा था तो कुछ स्कूली बच्चों ने भारत माता के नाम का जयकारा लगाया।

उन्होंने कहा, ”राष्ट्रगान खत्म होते ही एक बच्चे ने ‘भारत माता की जय’ चिल्लाया तो फादर तीन बच्चों को शेड में ले गए और बेरहमी से उनकी पिटाई की। बच्चे कहते रहे कि उन्होंने कुछ नहीं किया, लेकिन फिर भी उन्हें पीटा गया। घटना के बाद दो अन्य बच्चों को भी पीटा गया। इस तरह तीन बच्चों की पिटाई हुई।

जिला कलेक्टर को शिकायत देकर कार्रवाई की माँग

सोलंकी ने बताया कि उन लोगों को इस मामले की सूचना सोशल मीडिया के जरिए मिली थी। पूछताछ करने पर पता चला कि स्थानीय लोग फादर से डरते हैं। कारण यही है कि ज्यादातर आबादी गरीब और अशिक्षित है। उन्हें लगता है कि अगर कुछ कहा तो बच्चे को स्कूल से निकाल दिया जाएगा। फादर के खिलाफ स्टाफ तक मुँह नहीं खोलता।

हिंदू संगठनों ने इस मामले को सक्रियता से उठाया है। जिसके बाद दीव पुलिस ने आरोपित प्रिंसिपल एडमंड मैस्करेनियस के खिलाफ केस दर्ज किया। उसके खिलाफ बीएनएस की धारा 115 (2) और किशोर न्याय अधिनियम की धारा 82 (1) के तहत एनसी (असंज्ञेय अपराध) शिकायत दर्ज की गई है। ऑपइंडिया ने मामले पर अधिक जानकारी पाने के लिए दीव पुलिस से संपर्क करने की कोशिश की लेकिन नहीं हो सका। अधिक जानकारी प्राप्त होने पर लेख को अपडेट किया जाएगा।

पैसा दो, मुस्लिम बनो या फिर घर छोड़ दो… इस्लामी आतंकियों का ईसाइयों को अल्टीमेटम, रिपोर्ट्स में बताया- माली की 71 लाख जनता पीड़ित

पश्चिम अफ्रीका के देश माली में इस्लामी आतंकी समूहों ने ईसाई नागरिकों को इस्लाम कबूल कर लड़ने और पैसे देने या फिर घर छोड़ने का अल्टीमेटम दिया है। इस्लामी आतंकवाद के कारण अब माली में ईसाइयों के अस्तित्व पर प्रश्न खड़े हो गए हैं। इस्लामी आतंकवादी ईसाइयों को उनका देश की सेना के खिलाफ साथ देने के लिए धमका रहे हैं।

ईसाइयों के उत्पीड़न पर नज़र रखने वाले संगठन ‘ओपन डोर्स’ के अनुसार, इस्लामी आतंकियों ने माली मध्य क्षेत्र में रहने वाले ईसाइयों को धमकी दी है कि वह इस्लाम अपना लें और साथ ही अपना पैसा-रुपया भी आतंकवाद के लिए लड़ने को दें या फिर इलाका छोड़ दें।

इस क्षेत्र के ईसाई पादरियों को यह धमकी दी गई है। ईसाइयों को धमकियाँ देने वाले इस संगठन का नाम जमात नुसरत अल-इस्लाम वाल मुस्लिमीन (JNIM) है। JNIM आतंकवादियों ने ईसाई पादिरयों से बताया कि उन्हें सेना के खिलाफ लड़ने के लिए अपने लोग देने होंगे।

यह ऐसा अकेला मामला नहीं है। इस इलाके में इस्लामी आतंकी ईसाइयों, मुसलमानों और जनजातीय लोगों से ‘ज़कात’ वसूल रहे हैं। ओपन डोर से बात करते हुए, यहाँ के पादरी याबागा डायरा ने कहा, “उनलोगों ने इस जमीन पर कब्जा कर लिया है, उन्हें लगता है कि यह जमीन उनकी है। इसीलिए वह ईसाइयों से ज़कात देने के लिए कह रहे हैं जो मुस्लिमों को देना होता है। मुस्लिम गैर-ईसाई जनजातियाँ पहले से ही इसे अदा कर रही हैं।”

इस्लामी आतंकियों ने 2012 में माली में हमले चालू किए थे। इस दौरान आतंकियों ने सेना पर हमला करके उत्तरी हिस्सा कब्जा लिया था। उन्होंने इस इलाके में शरिया शासन की घोषणा कर दी थी। इस्लामी आतंकियों ने चर्चों, अन्य ईसाई संपत्तियों, स्कूलों और स्वास्थ्य केन्द्रों को भी तबाह कर दिया था।

एक अंतरराष्ट्रीय संगठन के अनुसार, माली में 71 लाख से अधिक लोग वर्तमान में सहायता चाहते हैं। इनमें से 40 लाख ऐसे हैं जिन्हें अपना घर बार छोड़ कर भागना पड़ा है। इस्लामी आतंकी समूह सरकारी कर्मचारियों और संयुक्त की शांति सेना के लोगों को भी मार रहे हैं। माली की सेना अब तक इन इस्लामी आतंकियों से अपना इलाका नहीं वापस छुड़वा सकी है।

2023 में, अमेरिकी विदेश विभाग ने माली पर हमला करने वाले आतंकी संगठनों के बारे में जानकारी दी थी। अमेरिका ने बताया था कि यहाँ मगरेब इलाके में में अल-कायदा और उसके साथअंसार अल-दीन, मैकिना लिबरेशन फ्रंट और अल-मौराबितौने शामिल थे। यह सभी JNIM के बैनर तले इकट्ठा हैं।

इस संगठन में अफ्रीका के सहेल क्षेत्र में ISIS भी शामिल था। यह आतंकी संगठन ऐसे लोगों को निशाना बनाते हैं जिन्हें वह अपनी परिभाषा के अनुसार इस्लाम ना मानने वाला समझते है। इनके पास अफ्रीका का उत्तरी और मध्य क्षेत्र के बड़े हिस्से का नियंत्रण है।

ओपन डोर्स की रिपोर्ट कहती है कि इस्लामी जिहादी अपने नियंत्रण वाले क्षेत्रों में ईसाईयों का अस्तित्व लगातार खत्म कर रहे हैं। ईसाइयों की मिशनरी और खास तौर पर महिलाएँ इस्लामी आतंकियों के निशाने पर हैं। ऐसी ही एक घटना में टिम्बकटू में स्विस ईसाई मिशनरी बीट्राइस स्टॉकली का 2016 में आतंकवादियों ने अपहरण करके मार दिया था।

माली के इस्लामी नियंत्रण वाले इलाके में क्षेत्र में गैर-मुस्लिम समुदाय अगर ईसाइयत अपनाता है तो उस पर अत्याचार किए जाते हैं। इसका शक भी होने पर हत्या कर दी जाती है। ईसाइयों को यहाँ उनके खेत और पानी से भी वंचित कर दिया जाता है। यहाँ मुस्लिमों ने जब स्कूल की माँग की तो आतंकियों ने इसमें कुरान और अरबी शिक्षा अनिवार्य कर दी।

इसके अलावा, इस्लाम को फैलाने के लिए इस्लामी आतंकी लड़कियों और कभी-कभी विवाहित महिलाओं का तक अपहरण करते हैं और फिर उनका अपने सदस्यों से निकाह करवा देते हैं। इन महिलाओं को इन आतंकियों का सेक्स स्लेव बन कर रहना पड़ता है।

ईसाई पुरुषों और लड़कों को तक उत्पीड़न का शिकार होना पड़ता है। उन्हें इस्लाम कबूल करने और हथियार उठाने के लिए मजबूर किया जाता है। माली के ईसाइयों को मजहबी कारणों सेयात्रा करने में भी कई प्रतिबंधों का सामना करना पड़ता है, उन्हें राजधानी के शहर बमाको के बाहर तक निकलने में दिक्कतें आती हैं।

कॉन्ग्रेस MLA की फोन टैप रिकॉर्डिंग सुनते थे अशोक गहलोत: राजस्थान के पूर्व CM की पोल उनके ही OSD रहे लोकेश शर्मा ने खोली, बताया- क्लिप लीक करने के दिए थे ऑर्डर

फोन टैपिंग के मुद्दे पर लोकेश शर्मा ने दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच की पूछताछ में राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री एवं कॉन्ग्रेस नेता अशोक गहलोत पर आरोप लगाए हैं। अपने लिखित बयान में शर्मा ने फोन टैपिंग में अपनी भूमिका से इनकार किया और गहलोत से पूछताछ करने की माँग की। अशोक गहलोत के मुख्यमंत्री रहने के दौरान शर्मा उनके OSD थे। उन्होंने तत्कालीन DGP, गृह विभाग के प्रिंसिपल सेक्रेटरी और सीएम के प्रमुख सचिव पर भी गंभीर आरोप लगाए।

अशोक गहलोत के मीडिया संबंधों को सँभालने वाले शर्मा ने सात पन्नों के अपने बयान में कहा कि 16 जुलाई 2020 को अशोक गहलोत ने उन्हें एक पेन ड्राइव दी और इसे मीडिया में लीक करने के लिए कहा था। अशोक गहलोत ने ये सब उस समय किया था, जब सचिन पायलट के नेतृत्व में कॉन्ग्रेस विधायकों का एक समूह उनकी सरकार के खिलाफ बगावत कर दी थी।

शर्मा ने कहा कि उन्होंने पेन ड्राइव ले ली और उसे घर ले जाकर उसके कंटेंट को अपने लैपटॉप पर डाउनलोड किया। इसके बाद उसे अपने फोन में ट्रांसफर कर लिया। इसके बाद सीएम अशोक गहलोत के निर्देशानुसार सारी क्लिप मीडिया को भेज दी। उन्होंने कहा कि जब रिकॉर्डिंग वायरल हुई तो उन्हें पता चला कि वे बागी विधायकों और कुछ भाजपा नेताओं के बीच टैप की गई बातचीत की क्लिप थीं।

अपने बयान में शर्मा ने कहा, “अशोक गहलोत ने मुझे एक क्लिप मीडिया को भेजने को कहा था। मुझे नहीं था कि इस पेन ड्राइव में क्या है? गहलोत के निर्देश थे कि क्राइम ब्रांच में जाकर यह कहना है कि यह ऑडियो क्लिप सोशल मीडिया से मिली। गहलोत कॉन्ग्रेस विधायकों की फोन टैप की रिकॉर्डिंग सुनते थे। ये ऑडियो क्लिप कहाँ से आई, इसके लिए अशोक गहलोत से पूछताछ की जानी चाहिए।”

उन्होंने आरोप लगाया कि साल 2020 में राजस्थान सरकार पर छाए संकट के दौरान उनके समर्थक और बागी, दोनों पक्ष के विधायकों के फोन टैप किए गए थे। शर्मा ने अपनी जान को भी खतरा बताया है और अपने तथा अपने परिवार के लिए सुरक्षा की माँग की है। बता दें कि दिल्ली पुलिस ने लोकेश शर्मा पर गैरकानूनी तरीके से टेलीफोन पर बातचीत को रोकने का आरोप लगाया है।

लोकेश शर्मा ने कहा, “कहा जाता है कि मैंने फोन टैपिंग की। मुझ पर जो एफआईआर केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने करवाई है, उसमें लिखा हुआ है कि उनके फोन को गैरकानूनी तरीके से इंटरसेप्ट करके उसकी रिकॉर्डिंग को वायरल किया गया। हालाँकि, मैंने हमेशा यही कहा है कि फोन टैपिंग से मेरा कोई लेना-देना नहीं है।” शर्मा ने कहा कि उन्होंने वही किया, जो उनके बॉस अशोक गहलोत आदेश दे रहे थे।

दरअसल, राजस्थान में अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच साल 2020 के राजनीतिक संकट के दौरान कुछ ऑडियो रिकॉर्डिंग वायरल हुई थीं। इन क्लिप में ऐसा लग रहा था कि भाजपा नेता अशोक गहलोत की सरकार को गिराने के लिए सचिन पायलट के खेमे के कॉन्ग्रेस विधायकों से बात कर रहे थे। ऑडियो वायरल होने के बाद राजनीतिक बवाल हो गया।

मामले की जाँच के लिए अशोक गहलोत ने राजस्थान पुलिस के विशेष अभियान समूह को सौंप दिया। इसमें भाजपा नेता और केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत से आवाज का नमूना देने के लिए कहा गया। ऑडियो में सुनाई दे रही एक आवाज को उनकी आवाज बताई गई थी। इसके बाद गजेंद्र सिंह शेखावत ने साल 2021 में दिल्ली पुलिस के क्राइम ब्रांच में लोकेश शर्मा के खिलाफ FIR दर्ज कराई।

क्या भारतीय नहीं हैं राहुल गाँधी? जानिए इलाहाबाद हाई कोर्ट ने गृह मंत्रालय से क्यों माँगा जवाब, कॉन्ग्रेस नेता की नागरिकता पर विवाद क्यों

राहुल गाँधी की नागरिकता का मामला बढ़ता चला जा रहा है। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इस मामले दायर की गई याचिका केंद्र सरकार से जवाब तलब किया है। हाई कोर्ट ने गृह मंत्रालय से राहुल गाँधी की नागरिकता पर उठे सवालों का जवाब देने को कहा है। राहुल गाँधी की नागरिकता पर पहले भी विवाद हो चुका है। इस मामले में अन्य लोगों ने भी देश की अलग-अलग कोर्ट में याचिकाएँ दायर की हुई हैं। सुप्रीम कोर्ट भी इस मामले में याचिका पर सुनवाई कर चुकी है।

इलाहबाद हाई कोर्ट ने क्या कहा?

इलाहाबाद हाई कोर्ट की जस्टिस राजन रॉय और जस्टिस ओम प्रकाश शुक्ला की बेंच ने बुधवार (25 सितम्बर, 2024) को एस विग्नेश शिशिर की याचिका पर सुनवाई की। शिशिर ने हाई कोर्ट के सामने दावा किया है कि राहुल गाँधी के पास ब्रिटेन की नागरिकता है। शिशिर ने इस मामले में CBI जाँच की माँग की है।

याचिकाकर्ता शिशिर ने हाई कोर्ट को बताया कि उन्होंने केंद्र सरकार के गृह मंत्रालय के सामने राहुल गाँधी की याचिका को लेकर दो आवेदन दिए हैं। यह आवेदन नागरिकता कानूनों के तहत दिए गए हैं। याचिकाकर्ता शिशिर ने गृह मंत्रालय में दिए गए आवेदनों पर कार्रवाई के लिए इलाहाबाद हाई कोर्ट का रास्ता लिया है।

हाई कोर्ट ने इस पर सुनवाई करते हुए गृह मंत्रालय से पूछा है कि उसने इन आवेदनों पर क्या एक्शन लिया है। हाई कोर्ट ने एडिशनल सॉलिसिटर जनरल सूर्यभान पाण्डेय को आदेश दिया है कि वह गृह मंत्रालय की कार्रवाई का ब्यौरा कोर्ट के सामने रखें।

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा कि वह अभी राहुल गाँधी की नागरिकता का परीक्षण नहीं कर रहा बल्कि वह यह जानना चाहता है कि आखिर गृह मंत्रालय इस मामले पर क्या कार्रवाई कर रहा है। हाई कोर्ट ने इससे पहले इसी मामले में डाली गई याचिका वापस लेने की अनुमति दी थी। यह याचिका भी शिशिर ने ही लगाई थी।

केंद्र सरकार के गृह मंत्रालय के पास नागरिकता कानून के तहत यह शक्ति है कि वह किसी भारतीय नागरिक की विदेशी नागरिकता अपनाने के कारण और समय की जानकारी जुटा सके। शिशिर का आवेदन गृह मंत्रालय से राहुल की नागरिकता रद्द करने की माँग करता है।

याचिकाकर्ता शिशिर का दावा है कि राहुल गाँधी ब्रिटिश नागरिक हैं और ब्रिटिश सरकार ने 2022 में भेजे गए इमेल में इस बात के संकेत दिए हैं। यह भी बताया गया है कि ब्रिटिश सरकार राहुल गाँधी की नागरिकता पर तब तक जानकारी सार्वजनिक रूप से नहीं देगी जब तक गाँधी स्वयं इस बात के लिए आवेदन पर हस्ताक्षर ना कर दें।

सुब्रमण्यम स्वामी की याचिका पर भी सुनवाई

सुब्रमण्यम स्वामी ने राहुल गाँधी की नागरिकता को इससे पहले दिल्ली हाई कोर्ट में याचिका डाली थी। 20 अगस्त, 2024 को दिल्ली हाई कोर्ट ने इस मामले में सुनवाई की थी। दिल्ली हाई कोर्ट ने इस याचिका को जनहित याचिका (PIL) बेंच को स्थानांतरित कर दिया था।

सुब्रमण्यम स्वामी ने अपनी याचिका में दावा किया था कि राहुल गाँधी एक ब्रिटिश नागरिक हैं और इस संबंध में अपनी जानकारी छुपाई है। स्वामी का कहना है कि राहुल गाँधी ने इस संबंध में जानकारी छुपाई है। स्वामी ने इस संबंध में कहा था कि उन्होंने गृह मंत्रालय में आवेदन दिया है लेकिन इस पर कोई कार्रवाई नहीं हुई है। वह इस याचिका पर कार्रवाई की माँग कर रहे थे। इस याचिका पर गुरुवार (26 सितम्बर, 2024) को होनी है।

राहुल गाँधी की नागरिकता पर लगातार विवाद

राहुल गाँधी की नागरिकता को लेकर विवाद पहली बार नहीं हो रहा है। राहुल गाँधी की नागरिकता का विवाद सुप्रीम कोर्ट तक जा चुका है। इससे पहले दिल्ली के दो लोगों ने राहुल गाँधी की नागरिकता पर प्रश्न उठाए थे। उन्होंने दावा किया था कि एक कम्पनी के 2005-06 के रिकॉर्ड में राहुल गाँधी को ब्रिटिश नागरिक बताया गया था। याचिका में दावा किया गया था कि राहुल गाँधी ने स्वेच्छा से ब्रिटिश नागरिकता ली है और इसकी जानकारी नहीं दी है। उन्होंने कहा था कि यह जनप्रतिनिधित्व अधिनियम का उल्लंघन है।

सुप्रीम कोर्ट में भी हो चुकी सुनवाई

राहुल गाँधी का मामला जब सुप्रीम कोर्ट पहुँचा था तो उसने इस याचिका को रद्द कर दिया था। 2019 में सुप्रीम कोर्ट की एक बेंच सुनवाई करते हुए कहा था कि यदि कोई कम्पनी अपने कागजों में किसी को ब्रिटिश नागरिक बता देती है तो इससे वह वहाँ का नागरिक नहीं हो जाता। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा था कि याचिकाकर्ता समाजसेवा करने की राजनीति कर रहे हैं।

कोर्ट ने सवाल उठाए थे कि आखिर याचिकाकर्ताओं ने 2019 का इन्तजार राहुल गाँधी की नागरिकता पर याचिका डालने के लिए क्यों किया। इस दौरान गृह मंत्रालय ने भी राहुल गाँधी से उनकी नागरिकता पर स्थिति साफ़ करने को कहा था। गृह मंत्रालय ने राहुल गाँधी को नोटिस जारी करके तथ्य देने को कहा था। इसको लेकर काफी बवाल हुआ था।

सिर्फ 2019 में ही नहीं बल्कि 2015 में भी सुप्रीम कोर्ट ने ऐसी ही याचिका को ‘अजीब‘ करार दिया था। कोर्ट ने इस दौरान राहुल गाँधी को ब्रिटिश बताने के दावे के आधार वाले दस्तावेज पर भी प्रश्न उठाए थे। तब भी सुप्रीम कोर्ट के सामने यही दावे किए गए थे कि राहुल गाँधी ब्रिटिश नागरिक हैं और यह बात कम्पनी रिकॉर्ड से सामने आई है।

राहुल गाँधी की नागरिकता को लेकर लड़ाई मात्र कोर्ट में ही नहीं बल्कि संसद तक पहुँच चुकी है। भाजपा सांसद महेश गिरी ने ऐसे ही आरोप राहुल गाँधी के खिलाफ संसद की एथिक्स कमिटी के सामने लगाए थे। एथिक्स कमिटी ने भी राहुल गाँधी से जवाब माँगा था।

कॉन्ग्रेस का क्या है जवाब

राहुल गाँधी ने इस मामले में संसद कि एथिक्स कमिटी के नोटिस पर जवाब दिया था। राहुल ने एथिक्स कमिटी की नोटिस के सवाल पर बताया था कि उन्होंने कभी भी ब्रिटिश नागरिकता के लिए आवेदन ही नहीं दिया। उन्होंने कहा था कि नागरिकता को लेकर प्रश्न उनकी छवि धूमिल करने के उद्देश्य सेउठाए जा रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा था कि वह एथिक्स कमिटी को अपने तरीके से निपट लेंगे। राहुल गाँधी की बहन और कॉन्ग्रेस नेता प्रियंका गाँधी ने इन दावों को हास्यास्पद करार दिया था।

प्रियंका गाँधी ने कहा था कि राहुल गाँधी इस देश में पैदा हुए और यहीं के लोगों के सामने पले बढ़े हैं। प्रियंका गाँधी ने कहा था कि उनके भाई की नागरिकता पर उठाए गए सवालों को आधारहीन करार दिया था। प्रियंका गाँधी ने कहा था कि नागरिकता के विषय में पूरा देश जानता है।

क्या शिव मंदिर को तोड़कर बनाई गई है मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह? कोर्ट में याचिका, जानिए अजमेर में हिंदुओं के पवित्र स्थलों में गोमांस खाने वाले थे कौन

राजस्थान के अजमेर जिला न्यायालय में मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह के खिलाफ एक दीवानी वाद दायर किया गया है। इसमें कहा गया है कि अजमेर दरगाह एक शिव मंदिर है और इस पर कब्जा करके दरगाह बनाई गई है। कोर्ट में कहा गया है कि इस जगह को भगवान श्री संकटमोचन महादेव विराजमान मंदिर घोषित की जाए और मंदिर के पुनर्निर्माण के लिए केंद्र को निर्देश दी जाए।

याचिका में कोर्ट से दरगाह समिति को परिसर पर किए गए अनधिकृत और अवैध कब्जे को हटाने का निर्देश देने की माँग की गई है। याचिका में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) को दरगाह का सर्वेक्षण करने के निर्देश देने का आग्रह किया गया है। इसमें दावा किया गया है कि मुख्य प्रवेश द्वार की छत का डिज़ाइन हिंदू संरचना जैसी है, जो दर्शाता है कि यह स्थल मूल रूप से एक मंदिर था।

इस याचिका में आगे कहा गया है, “इन छतरियों की सामग्री और शैली स्पष्ट रूप से उनके हिंदू मूल को उजागर करती है। दुर्भाग्यवश, उनकी उत्कृष्ट नक्काशी रंगाई-पुताई और सफेदी के कारण छिपी हुई है। इसको हटाने के बाद उनकी असली पहचान और वास्तविकता को प्रदर्शित किया जा सकता है।” इसमें यह भी कहा गया है कि यहाँ के तहखाने में गर्भगृह होने के प्रमाण मौजूद हैं। 

हिंदू सेना के अध्यक्ष विष्णु गुप्ता ने अपनी याचिका में तर्क दिया है कि ऐसा कोई रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है, जो यह दर्शाता हो कि अजमेर दरगाह खाली ज़मीन पर बनाई गई है। इसके बजाय, ऐतिहासिक विवरण बताते हैं कि उस जगह पर महादेव मंदिर और जैन मंदिर थे, जहाँ हिंदू एवं जैन भक्त अपने देवताओं की पूजा करते थे। यहाँ पर हिंदू भगवान शिव का जलाभिषेक करते थे।

वाद में अजमेर निवासी हरविलास शारदा की साल 1911 में लिखी पुस्तक ‘हिस्टोरिकल एंड डिस्क्राप्टिव’ का हवाला दिया है और कहा है कि मौजूदा 75 फीट ऊँचे बुलंद दरवाजे के निर्माण में मंदिर के मलबे का इस्तेमाल किया गया है। हरविलास शारदा ‘रॉयल एशियाटिक ब्रिटेन एंड आयरलैंड’ के सदस्य थे। इसके साथ ही वे अजमेर में एडिशनल एक्स्ट्रा कमिश्नर भी रहे।

विष्णु गुप्ता ने अधिवक्ता शशि रंजन कुमार सिंह के माध्यम से यह वाद दायर किया है। इसकी सुनवाई 10 अक्टूबर को होने की संभावना है। दरअसल, मुस्लिमों का दावा है कि अजमेर दरगाह उनके सूफी संप्रदाय के संत ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की मजार है। यहाँ स्थित मोइनुद्दीन चिश्ती की कब्र पर हर साल बड़ी संख्या में मुस्लिम चादर चढ़ाने आते हैं।

अजमेर दरगाह के खादिमों ने जताई आपत्ति

हिंदू सेना की याचिका पर अजमेर दरगाह की ओर से आपत्ति जताई गई है। अखिल भारतीय सूफी सज्जापदानशीं परिषद के अध्यक्ष एवं दरगाह के दीवान सैयद जैनुल आबेदीन के उत्तराधिकारी नसीरूद्दीन चिश्ती और दरगाह के खादिमों की संस्था अंजुमन सैयद जागदान के सचिव सरवर चिश्ती ने इसे बेबुनियाद बताया है।

इन लोगों ने कहा कि अगर धार्मिक स्थलों पर झूठी और बेबुनियाद साजिश रची गई तो बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। इसमें आगे कहा कि इतिहास पर नजर डालें तो दरगाह ख्वाजा साहब को लेकर कभी आपत्ति नहीं जताई गई। मुगलों से लेकर खिलजी और तुगलक, हिंदू राजाओं और यहाँ तक कि मराठों ने भी दरगाह को बड़े सम्मान के साथ देखा और अपनी आस्था व्यक्त की।

मुख्यमंत्री भजन लाल को भी लिखी जा चुकी है चिट्ठी

इससे पहले इस साल जनवरी में ‘महाराणा प्रताप सेना’ के अध्यक्ष राष्ट्रीय अध्यक्ष राजवर्धन सिंह परमार ने इसके लिए पत्र लिखा है। राजवर्धन सिंह ने कहा था कि ये दरगाह हिंदू मंदिर को तोड़कर बनाया गया है, जिसकी ASI सर्वे बहुत जरूरी है। इस सर्वे से सारा स्पष्ट हो जाएगा। उन्होंने राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत से भी जाँच की माँग की थी और यही माँग भजनलाल शर्मा से भी की।

राजवर्धन सिंह परमार ने सोशल मीडिया पर एक पत्र और वीडियो शेयर करके कहा था, “अजमेर दरगाह कोई दरगाह नहीं बल्कि एक हिंदू मंदिर है।” उन्होंने दावा किया था कि ‘महाराणा प्रताप सेना’ ने पहले इसे राजस्थान में अशोक गहलोत के नेतृत्व वाली कॉन्ग्रेस सरकार के संज्ञान में लाया था। ये अलग बात है कि कॉन्ग्रेसी सरकार ने इस पर कोई कार्रवाई नहीं की।

राजवर्धन सिंह परमार ने कहा था कि इसके लिए उन्होंने राजस्थान के कई जिलों में ‘जन जागरण यात्रा’ निकाली थी और इस दौरान लोगों ने उनकी इस माँग का समर्थन किया था। उन्होंने सीएम भजनलाल से अनुरोध किया था कि वे आवश्यक निर्देश जारी करें और अयोध्या में बाबरी ढाँचे और वाराणसी में ज्ञानवापी ढाँचे की जाँच की तरह अजमेर के दरगाह की भी जाँच करवाएँ।

अजमेर दरगाह को लेकर क्या कहता है इतिहास

मोइनुद्दीन चिश्ती को लेकर इतिहासकार एमए खान ने अपनी पुस्तक ‘इस्लामिक जिहाद: एक जबरन धर्मांतरण, साम्राज्यवाद और दासता की विरासत’ (Islamic Jihad: A Legacy of Forced Conversion, Imperialism, and Slavery) में विस्तार से लिखा है। उन्होंने लिखा है कि मोइनुद्दीन चिश्ती, निज़ामुद्दीन औलिया, नसीरुद्दीन चिराग और शाह जलाल जैसे सूफी संत जब इस्लाम के मुख्य सिद्धांतों की बात करते थे तो वे वास्तव में रूढ़िवादी और असहिष्णु विचार रखते थे।

उदाहरण के लिए, सूफी संत मोईनुद्दीन चिश्ती और औलिया इस्लाम के कुछ पहलुओं जैसे- नाच (रक़) और संगीत (सामा) को लेकर उदार थे, जो कि उन्होंने रूढ़िवादी उलेमा के धर्मगुरु से अपनाया, लेकिन एक बार भी उन्होंने कभी हिंदुओं के उत्पीड़न के खिलाफ कोई कदम नहीं उठाया। औलिया ने अपने शिष्य शाह जलाल को बंगाल के हिंदू राजा के खिलाफ जिहाद छेड़ने के लिए 360 अन्य शागिर्दों के साथ बंगाल भेजा था।

इस पुस्तक में इस बात का भी जिक्र किया है गया है कि वास्तव में, हिंदुओं के उत्पीड़न का विरोध करने की बात तो दूर, इन सूफी संतों ने बलपूर्वक हिंदुओं के इस्लाम में धर्म परिवर्तन में भी बहुत बड़ी भूमिका निभाई थी। यही नहीं, ‘सूफी संत’ मोइनुद्दीन चिश्ती के शागिर्दों ने हिंदू रानियों का अपहरण किया और उन्हें मोईनुद्दीन चिश्ती को उपहार के रूप में प्रस्तुत किया।

यह भी एक ऐतिहासिक तथ्य है कि चिश्ती, शाह जलाल और औलिया जैसे सूफी ‘काफिरों’ के खिलाफ जिहाद छेड़ने के लिए भारत आए थे। उदाहरण के लिए- मोइनुद्दीन चिश्ती, मुइज़-दीन मुहम्मद ग़ोरी की सेना के साथ भारत आए और गोरी द्वारा अजमेर को जीतने से पहले वहाँ गोरी की तरफ से अजमेर के राजा पृथ्वीराज चौहान की जासूसी करने के लिए अजमेर में बस गए थे। यहाँ उन्होंने पुष्कर झील के पास अपने ठिकाने स्थापित किए।

मध्ययुगीन लेख ‘जवाहर-ए-फरीदी’ में इस बात का उल्लेख किया गया है कि किस तरह चिश्ती ने अजमेर की आना सागर झील, जो कि हिन्दुओं का एक पवित्र तीर्थ स्थल है, पर बड़ी संख्या में गायों का क़त्ल किया, और इस क्षेत्र में गायों के खून से मंदिरों को अपवित्र करने का काम किया था। मोइनुद्दीन चिश्ती के शागिर्द प्रतिदिन एक गाय का वध करते थे और मंदिर परिसर में बैठकर गोमांस खाते थे।

इस अना सागर झील का निर्माण ‘राजा अरणो रा आनाजी’ ने 1135 से 1150 के बीच करवाया था। ‘राजा अरणो रा आनाजी’ सम्राट पृथ्वीराज चौहान के पिता थे। आज इतिहास की किताबों में अजमेर को हिन्दू-मुस्लिम’ समन्वय के पाठ के रूप में तो पढ़ाया जाता है, लेकिन यह जिक्र नहीं किया जाता है कि यह सूफी संत भारत में जिहाद को बढ़ावा देने और इस्लाम के प्रचार के लिए आए थे।

इसके लिए उन्होंने हिन्दुओं के साथ हर प्रकार का उत्पीड़न स्वीकार किया। यहाँ तक कि आज भी इन सूफी संतों की वास्तविकता से उलट यह बताया जाता है कि ये क़व्वाली, समाख्वानी, और उपन्यासों द्वारा लोगों को ईश्वर के बारे में बताकर उन्हें मुक्ति मार्ग दर्शन करवाते थे। लेकिन तत्कालीन हिन्दू राजाओं के साथ इनकी झड़प और उनके कारणों का जिक्र शायद ही किसी इतिहास की किताब में मिलता हो।

खुद मोइनुद्दीन चिश्ती ने तराइन की लड़ाई में पृथ्वीराज चौहान को पकड़ लिया था और उन्हें ‘इस्लाम की सेना’ को सौंप दिया। लेख में इस बात का प्रमाण है कि चिश्ती ने चेतावनी भी जारी की थी, जिसमें उन्होंने दावा किया था – “हमने पिथौरा (पृथ्वीराज) को जिंदा पकड़ लिया है और उसे इस्लाम की सेना को सौंप दिया है।”