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हिंदू विलेन, इस्लाम अच्छा… वामपंथी प्रोपेगेंडा वाले फिल्म स्कूल के ‘अनुभव’ से निकला है ‘IC814’, इसलिए लव स्टोरी वाला बॉलीवुड प्रेम कहानी खत्म करने वाले आतंकियों से भी निभाता है मोहब्बतें

बॉलीवुड में प्रेम कहानियाँ दिखाने का चलन रहा है। विषय कोई भी, कितना ही गंभीर हो, बॉलीवुड वाले कहीं न कहीं से प्रेम कहानी को खोज लाते हैं और फिर फिल्म का अंत उसी कहानी के ईर्द-गिर्द करते हैं। हाल में नेटफ्लिक्स पर एक सीरिज आई- ‘आईसी 814- द कंधार हाईजैक।’ इसमें भी फिल्म निर्देशक अनुभव सिन्हा ने एक लव स्टोरी डाली लेकिन निर्देशकों ने इस सीरिज में इस लव स्टोरी को तवज्जों देना जरूरी नहीं समझा, शायद इसलिए क्योंकि उनका ध्यान इस्लामी आतंकियों की पहचान को ढाँकने में ज्यादा था जिन्होंने प्रेम कहानी का अंत किया।

अगर वो इस फिल्म में दिखाई गई प्रेम कहानी को मुख्य तौर पर दिखाते तो न उनका हिंदूफोबिक नैरेटिव चल पाता और न ही वो आतंकियों के कुकर्मों को धो पोंछने में सफल हो पाते। ये कहानी जिसे दिखाने से फिल्म के निर्देशकों ने परहेज किया वो रुपिन कात्याल और रचना कात्याल की थी।

हाईजैक के दौरान आतंकियों ने अपनी शर्त मनवाने के लिए एक नवयुवक की बर्बरता से गला रेतकर हत्या की थी। शायद संख्या के सुनने में ये ज्यादा भयावह न लगे कि 174 यात्रियों में से आतंकियों ने 1 को मार डाला, लेकिन अगर रचना की नजर से देखेंगे तो उनके लिए वो 1 व्यक्ति ही उनकी दुनिया था।

रचना कात्याल और रुपिन की कहानी

हाईजैक के समय रुपिन और रचना अपने हनीमून पर जा रहे थे। मात्र 22 दिन पहले ही उनकी शादी हुई थी। जाहिर है दोनों ने आगे जीवन के लिए कई सपने देखे होंगे, लेकिन उन आतंकियों ने रचना-रुपिन के सारे सपनों को चकनाचूर कर दिया। हाईजैक के बाद पहले रुपिन को अलग ले जाया गया और उसके बाद अपनी बात मनवाने के लिए उन्हें मौत के घाट उतार दिया गया। रचना बदहवास हालत में बार-बार अपने पति से मिलने के लिए मिन्नतें करती रहीं लेकिन वो आतंकी जिन्हें IC814 में दयालु और बार बार ये कहते दिखाया गया है- ‘हमें आपसे निजी दुश्मनी नहीं है’, उन्होंने एक भी बार रचना की ओर देखा तक नहीं। किसी आतंकी ने उनकी कोई बात नहीं सुनी।

7 दिन बाद जब सारे यात्री विमान से बाहर आए तब रचना बेसुध हो चुकी थीं। उन्हें बाकी कुछ याद नहीं था वो सिर्फ अपने पति को खोज रही थीं। विमान से उतरने के बहुत देर बाद तक उन्हें नहीं बताया गया था कि उनके पति अब दुनिया में नहीं हैं। सबको डर था कि कहीं रचना सदमे में न चली जाएँ। लोगों का डर सही था रचना को जब अपने पति की हत्या का पता चला तो वो एकदम शांत हो गईं। उन्हें कुछ समझ ही नहीं आया कि हुआ क्या। आखिर में रचना को अवसाद से निकालने में उनके सास-ससुर ने उनकी मदद की।

क्यों छिपाए गए फिल्म में आतंकियों के नाम

अब बॉलीवुड फिल्म निर्माता अनुभव सिन्हा चाहते तो इस कहानी को प्रमुखता से दिखाकर बता सकते थे कि उस समय यात्रियों पर क्या बीती होगी, रचना कैसे दर्द से उभरी होंगी, लेकिन हुआ क्या? इस कहानी को कुछ मिनटों में समेटकर उन्होंने पूरी ताकत इस्लामी आतंकियों के बर्बर चेहरे को धो पोंछने में लगा दी। अनुभव सिन्हा ने अपनी फिल्म में आतंकियों के असली नाम तक छिपाए जबकि गृह मंत्रालय की साइट से लेकर सामान्य मीडिया रिपोर्ट तक में उनके नाम का उल्लेख था। सवाल उठने पर तर्क दे दिया गया कि सीरिज में सब असलियत दिखाई गई इसलिए वही कोडनेम इस्तेमाल हुए जो आतंकियों ने रखे थे।

अब ये बात अगर मान भी ली जाए कि फिल्म में भोला-शंकर जैसे नाम सिर्फ हकीकत दिखाने के लिए रखे गए थे, तो क्या ये प्रश्न नहीं उठता कि अगर निर्देशक ने कोडनेम फिल्म में इतनी प्रमुखता से बार-बार दिखाए तो वो ये भी दिखाएँ कि उन आतंकियों का असली नाम क्या था? एक तो अनुभव सिन्हा ने ऐसा किया नहीं, ऊपर से जब लोगों ने सवाल खड़े किए तो उन्होंने अपने ऊपर लगे आरोपों का जवाब देना तक नहीं समझा।

खैर! अनुभव सिन्हा ने कुछ नया नहीं किया है। बॉलीवुड में हिंदूफोबिक कंटेंट दिखाने का काम और इस्लाम मजहब का महिमामंडन दशकों से होता रहा है। फिल्मों में भगवा पहनने वाले, टीका लगाने वाले को बलात्कारी, किडनैपर दिखाना और इस्लाम मानने वालों को इंसानियत का पहरेदार दिखाना बॉलीवुड का पुराना प्लॉट रहा है।

इस सीरिज में भी इसके अलावा और कुछ नहीं हुआ है। तत्कालीन विदेश मंत्री जसवंत सिंह ने अपनी किताब- अ कॉल टू ऑनर- इन सर्विस ऑफ इमरजेंस इंडिया में साफ कहा था कि इस मामले में आईएसआई का सीधा हाथ था। उन्होंने उन लोगों को कंधार में भेजा था जिनके दोस्त या रिश्तेदार भारत में बंद थे। बावजूद इस तथ्य के अनुभव सिन्हा ने इन बातों को सीरिज में दिखाना जरूरी तक नहीं समझा। उन्होंने इन बातों को छोटे-छोटे दृश्यों में समेटा और अपना कैमरा आतंकियों के उन चेहरों को दिखाने पर फोकस किया जहाँ वो परेशान थे, भावुक थे, यात्रियों से हँसी-मजाक कर रहे थे, अपने अपनों की याद में गुमसुम थे, इंसानियत दिखा रहे थे।

यात्रियों के दर्द को दिखाने में विफल हुई IC814

आतंकियों को इंसान दिखाने के प्रयास में और भारतीय सरकार को घेरने की कोशिश में वो न तो यात्रियों द्वारा झेले गए ट्रॉमा को समझा पाए और न ही उस महिला के दर्द को ढंग से दिखा पाए जिसने इस्लामी बर्बरता के कारण अपने जीवनसाथी को खो दिया।

दिलचस्प बात ये है कि ये बॉलीवुड वही है जो कश्मीरी पंडितों के दर्द को दिखाने के नाम पर एक प्रेम कहानी को परोस देता है और बड़ी चालाकी से महिलाओं के साथ हुए गैंगरेप और शरीर को चीरकर तीन हिस्सों में फेंकने वाली बर्बरता को छुपा लेता है। ये वही बॉलीवुड है जो राजी फिल्म में हिंदुस्तानी-पाकिस्तानी की लव स्टोरी दिखाने लगता है और एक नायिका को इतना लाचार बता देता है जैसे उसे हिंदुस्तान से होने का पछतावा हो।

इसके अलावा फिल्म से तिरंगे गायब करके वहाँ पाकिस्तानी झंडे दिखाने में बॉलीवुड गुरेज नहीं करता लेकिन जब आतंकी घटना में आतंकी का असली नाम बताने पर बात आए तो उन्हें सरकारी दस्तावेज जैसी बातें याद आ जाती हैं।

न दर्द दिखाया, न क्रूरता

क्या आईसी814 को बनाते समय एक भी बात पीड़ित से उनका दर्द नहीं पूछा गया? शायद नहीं। क्योंकि अगर पूछा गया होता तो निर्माताओं को पता होता उस समय किस डर से लोग गुजर रहे थे। वो डर इतना भयानक था कि घटना के 24 साल बीत जाने के बाद वो लोग इस मुद्दे पर बनी फिल्म भी नहीं देखना चाहते।

पूजा उन्हीं लोगों में से एक हैं। उस प्लेन में उस दिन पूजा भी थीं। उनकी शादी राकेश से हुई थी। दोनों नेपाल हनीमून पर गए थे। पूजा ने मीडिया को साफ बताया कि प्लेन के अंदर मौजूद हाईजैकर्स मुसलमान थे, लेकिन वे एक दूसरे को बर्गर, डॉक्टर, भोला, शंकर और चीफ नाम से बुला रहे थे।

अब पूजा जिन्हें प्लेन के भीतर बाहर का कुछ भी नहीं पता था उन्हें भी समझ आ गया था कि आतंकी मुसलमान हैं, लेकिन इस घटना पर 24 साल बाद फिल्म बनाने वाले अनुभव सिन्हा को ये जरूरी नहीं लगा।

पूजा ने बताया कि वो 7 दिन उन लोगों के जीवन के सबसे खौफनाक दिन थे। लोगों को प्लेन में पैनिक अटैक पड़ रहा था। एक डॉक्टर नाम का हाईजैकर पूरे दिन लोगों को इस्लाम को लेकर स्पीच देता था। वह सबसे बस यही कहता था इस्लाम मजहब सबसे अच्छा है और सबको उसे कबूल लेना चाहिए।

अब जिस किसी ने इस सीरिज को देखा है वो बता सकता है कि कहीं भी आतंकी को प्लेन में इस तरह की कोई बातचीत करते नहीं दिखाया गया है उलटा दिखाने की कोशिश ये हुई है कि वो हाईजैकर्स अपने अपनों को छुड़ाने के लिए मजबूर थे और उन्होंने इसीलिए प्लेन हाईजैक किया। उस प्लेन में जिन्होंने वो खौफनाक दिन गुजारे वो मानते हैं कि फिल्म उस खौफ को दिखाने में विफल हुई है।

प्रयागराज के जिस मदरसे में छपते थे जाली नोट, उसे तुर्की-अरब से करोड़ों की फंडिंग: फर्जी आधार कार्ड का भी धंधा, 630 छात्रों की तलाश

उत्तर प्रदेश के प्रयागराज जिले के जिस मदरसे में नकली नोट छापने की मशीन पकड़ी गई थी वहाँ के बारे में जाँच में लगातार नए खुलासे हो रहे हैं। जाँच एजेंसियों को अब उन 630 छात्रों की तलाश है जो यहाँ से पढ़ाई कर के निकले हैं। आशंका जताई जा रही है कि मौलवी तफसीरुल इन इन सभी का ब्रेनवॉश किया होगा। इस मदरसे को हर साल लगभग 48 लाख रुपए विदेशों में फंडिंग मिलने की भी जानकारी सामने आई है। मामले की पड़ताल में पुलिस के अलावा ATS और IB की टीमें भी जुट गईं हैं।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, जिस मदरसे में नकली नोट छापने के साथ RSS को आतंकी संगठन बताया जाता था वहाँ से अब तक लगभग 630 छात्र पढ़ाई कर के निकल चुके हैं। मौलवी तफसीरुल मदरसे में लगभग 6 साल से पढ़ा रहा था। प्रतिवर्ष औसतन 105 छात्र मदरसे से पढ़ाई कर के निकले हैं। जाँच एजेंसियों को आशंका है कि मौलवी तफसीरुल ने इन्हें भी कट्टरपंथ का पाठ पढ़ाया होगा। ये छात्र देश के अलग-अलग राज्यों में हैं। ऐसे में स्थानीय पुलिस के साथ ATS और IB की टीमें भी इनकी खोज में 6 प्रदेशों में गईं हैं।

ATS ने बुधवार (4 सितंबर, 2024) को प्रयागराज पहुँच कर जाँच शुरू की है। इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) की टीम 28 अगस्त को ही प्रयागराज पहुँच चुकी थी। अब तक हुई जाँच में यह सामने आया है कि मदरसे में हर साल विदेशों से लाखों रुपए भेजे जाते थे। तुर्की और सऊदी अरब मिला कर प्रतिवर्ष 48 लाख रुपए भेजे जाने के प्रमाण भी मिले हैं। अब तक हुई कुल फंडिंग 2 करोड़ रुपए से अधिक बताई जा रही है। मदरसा कमिटी के मैनेजर शाहिद के मुताबिक, ये पैसे दूसरे देशों से मदद के तौर पर भेजी जाती है।

इसी से मदरसे में पढ़ने वाले बच्चों की तालीम से ले कर उनके रहने आदि के खर्च व मेंटेनेंस का हिसाब-किताब किया जाता है।

जाँच एजेंसियों ने पैसे भेजने वालों की पहचान उजागर नहीं की है लेकिन उनके पाकिस्तान ने कनेक्शन खंगाले जा रहे हैं। ATS और IB की टीमें यह पता लगाने में भी जुटी हैं कि जिस खाते में विदेशों से पैसे आते थे उन्हें हैंडल कौन करता था। विदेशों से पैसे मँगाने के मामले में अब तक 12 बैंक खाते रडार पर हैं। मदरसे के प्रिंसिपल मौलवी तफसीरुल के परिजनों और रिश्तेदारों के भी खातों की डिटेल तलब की गई है। अन्य खातेदारों में अधिकतर मदरसा कमेटी से जुड़े हुए लोग हैं। इस बावत संबंधित बैंकों से भी लेन-देन का ब्यौरा तलब किया गया है।

इसी केस में मौलवी के साथ पकड़े गए ओडिशा के अब्दुल जहीर के पास मिला आधार कार्ड फर्जी बताया जा रहा है। उसे नकली नोट की ही तरह जाली आधार कार्ड बनाने का एक्सपर्ट माना जा रहा। IB की पूछताछ में अब्दुल जहीर ने कबूल किया है कि फर्जी आधार कार्ड बनाने के रैकेट में ओडिशा में मौजूद उसका भाई भी शामिल है। मदरसे से जुड़े कुछ लोगों का पिछले 5 वर्षों से अलग-अलग देशों में आना-जाना लगा हुआ है। इनके साथ कुछ अन्य राज्यों से भी मदरसे का कनेक्शन पाया गया है। जाँच एजेंसियाँ इन सभी लोगों की पड़ताल में जुटी हैं।

केरल के 6 चर्च पर होगा सरकार का कंट्रोल, हाई कोर्ट ने दिया आदेश: जानिए क्या है ऑर्थोडॉक्स और जैकोबाइट गुट के बीच का विवाद जो इस मोड़ तक पहुँचा

हाल ही में केरल हाई कोर्ट ने एर्नाकुलम और पलक्कड़ के जिला कलेक्टरों को मलंकारा ईसाई के 6 चर्चों को अपने कब्जे में लेने का निर्देश दिया है। दरअसल, मलंकारा ईसाई के दो गुटों- जैकोबाइट और ऑर्थोडॉक्स, के बीच इनको लेकर लंबे समय से विवाद चल रहा था। हाई कोर्ट ने यह आदेश ऑर्थोडॉक्स गुट के दो पादरियों (याचिकाकर्ता) द्वारा दायर अवमानना ​​याचिका पर दी।

केरल हाई कोर्ट के जज वीजी अरुण ने न्यायालय के 2022 के निर्देशों की घोर अवज्ञा की आलोचना की। इन निर्देशों में मलंकारा ऑर्थोडॉक्स चर्च (ऑथोडॉक्स गुट) के सदस्यों को इन चर्चों में प्रवेश करने और उन्हें शांतिपूर्वक ढंग से प्रार्थना करने की अनुमति दी गई थी। जैकोबाइट ईसाइयों ने ऑर्थोडॉक्स ईसाइयों को चर्च में घुसने से रोक देते थे।

न्यायाधीश ने कहा कि उनके पास जिला कलेक्टरों को इन चर्चों का कब्ज़ा अपने हाथ में लेने को कहने के सिवाय कोई विकल्प नहीं है। अदालत ने कहा, “आधिकारिक प्रतिवादियों के अड़ियल रवैए और पार्टी प्रतिवादियों (जैकबाइट गुट) द्वारा निर्देशों की अवहेलना के कारण इस अदालत के पास अवमाननापूर्ण कृत्यों को रोकने के लिए निर्देश जारी करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है।”

राज्य सरकार ने कोर्ट को बताया कि बुजुर्ग पुरुषों, महिलाओं और बच्चों सहित जैकोबाइट गुट के ईसाइयों का एक बड़ा समूह चर्च में घुसने से रोकता है। सरकार ने कहा कि उसने कोर्ट के निर्देशों को लागू करने के लिए ईमानदारी से प्रयास किए थे। हालाँकि, जैकोबाइट्स के बड़े आंदोलन के कारण उसे पीछे हटना पड़ा। कोर्ट को बताया गया कि सरकार के हस्तक्षेप से जानमाल का नुकसान हो सकता है।

जैकोबाइट गुट के सदस्यों ने कोर्ट से कहा कि चर्च को ऑर्थोडॉक्स गुट को नहीं सौंपा जा सकता है। कोर्ट ने उनकी आपत्तियों को खारिज कर दिया और एर्नाकुलम के जिला कलेक्टर को तीन चर्चों- ओडक्कली स्थित सेंट मैरी ऑर्थोडॉक्स चर्च, पुलिंथानम स्थित सेंट जॉन्स बेस्फैज ऑर्थोडॉक्स सीरियन चर्च और मझुवन्नूर स्थित सेंट थॉमस ऑर्थोडॉक्स सीरियन चर्च का कब्जा अपने हाथ में लेने का आदेश दिया।

वहीं, पलक्कड़ के जिलाधिकारी को मंगलम डैम स्थित सेंट मैरी ऑर्थोडॉक्स चर्च, एरिकिनचिरा स्थित सेंट मैरी ऑर्थोडॉक्स सीरियन चर्च और चेरुकुन्नम स्थित सेंट थॉमस ऑर्थोडॉक्स सीरियन चर्च की कमान अपने हाथ में लेने को कहा। दोनों कलेक्टरों को 30 सितंबर 2024 तक इसकी अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करने का आदेश दिया गया है। इसी दिन मामले की अगली सुनवाई होगी।

केरल हाई कोर्ट ने इस इन चर्चों को कब्जा में लेने के दौरान कानून-व्यवस्था को लेकर दोनों जिलों के पुलिस प्रमुखों को भी निर्देश दिए हैं। कोर्ट ने इन दोनों जिलों के पुलिस प्रमुखों को कहा गया है कि वे अधिग्रहण में सहायता के लिए पर्याप्त संख्या में पुलिस बल तैनात करें, ताकि कोर्ट के आदेशों को बिना देरी के लागू किया जा सके।

क्या है ऑर्थोडॉक्स एवं जैकोबाइट गुट के बीच विवाद

दरअसल, ऑर्थोडॉक्स और जैकोबाइट गुट शुरू में एक ही चर्च का हिस्सा थे, लेकिन चर्च की निष्ठा को लेकर दोनों के बीच मतभेद हो गया और दोनों अलग हो गए। ऑर्थोडॉक्स गुट ने केरल के एक बिशप (मलंकरा मेट्रोपोलिटन) के प्रति अपनी निष्ठा की प्रतिज्ञा की, जबकि जैकोबाइट गुट एंटिओक के पैट्रिआर्क को अपना धार्मिक प्रमुख मानता है।

मतभेद के बाद दोनों गुटों में इस बात पर विवाद शुरू हो गया कि केरल में विभिन्न चर्चों का प्रशासन किस गुट को सौंपा जाना चाहिए। मतभेद आखिरकार विभाजन में बदल गया और यह विवाद अंततः सुप्रीम कोर्ट तक पहुँच गया। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कुछ निर्देश भी दिए थे। यह केस के.एस. वर्गीस बनाम सेंट पीटर्स एंड पॉल्स सीरियन ऑर्थोडॉक्स चर्च के नाम से जाना जाता है।

साल 2017 में के.एस. वर्गीस बनाम सेंट पीटर्स एंड पॉल्स सीरियन ऑर्थोडॉक्स चर्च एवं अन्य मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कई विवादित मुद्दों पर ऑर्थोडॉक्स चर्च के पक्ष में फैसला दिया था। इसके लिए सुप्रीम कोर्ट ने साल 1934 में तैयार किए गए एक दस्तावेज़ (1934 का संविधान) पर भरोसा किया और अपने फैसले का आधार इसे बनाया।

अपने फैसले में शीर्ष अदालत ने यह भी कहा था कि जैकोबाइट गुट द्वारा तैयार किए गए साल 2002 के दस्तावेज़ द्वारा चर्चों को चलाने की समानांतर प्रणाली स्थापित नहीं की जा सकती थी। हालाँकि, ऑर्थोडॉक्स गुट ने तब से सुप्रीम कोर्ट के साल 2017 के आदेश को लागू करने में विफलता की बार-बार शिकायत की।

ऐसी ही एक याचिका पर साल 2022 में केरल हाई कोर्ट के सिंगल बेंच जज ने पुलिस को निर्देश दिया कि वह याचिकाकर्ताओं (ऑर्थोडॉक्स गुट) को इन चर्चों में शांतिपूर्वक प्रवेश कराने और उनकी धार्मिक सेवाएँ संचालित करने के लिए जरूरी सहायता करे। इसके बावजूद जैकोबाइट गुट द्वार उन्हें चर्चों में नहीं घुसने दिया जा रहा था। इसलिए ऑर्थोडॉक्स याचिकाकर्ताओं ने हाई कोर्ट का रूख किया।

न टास्क फोर्स, न पॉक्सो अदालतों का गठन, पत्र भेजती रही मोदी सरकार… जब महिलाओं को देनी थी ‘सुरक्षा’ तब सोई रही बंगाल सरकार, अब बिल वाला दिखावा

RG Kar मेडिकल कॉलेज एवं हॉस्पिटल में 9 अगस्त, 2024 को एक महिला डॉक्टर की लाश मिली। उक्त महिला डॉक्टर के साथ क्रूरता से बलात्कार किया गया था और फिर मार डाला गया था। परिवार का आरोप है कि काफी बातें छिपाई गईं, जैसे इसे आत्महत्या बताने की कोशिश हुई। आनन-फानन में अंतिम संस्कार किया गया। वहाँ पहले भी ऐसी संदिग्ध मौतें हो चुकी हैं, ऐसे में ड्रग्स-सेक्स रैकेट चलने की अटकलें भी लगीं। जिस तरह से प्रिंसिपल को बचाने की कोशिश हुई उसे लेकर सुप्रीम कोर्ट तक ने फटकार लगाई।

पश्चिम बंगाल में इस बलात्कार और हत्या की वारदात के बाद जम कर विरोध प्रदर्शन हुए। ममता बनर्जी, जो कि मुख्यमंत्री होने के साथ-साथ राज्य की गृह और स्वास्थ्य मंत्री भी हैं – उन्होंने भी अपनी पार्टी की महिलाओं के साथ एक मार्च निकाला पीड़िता को न्याय दिलाने की माँग करते हुए। ये इतर बात है कि राज्य की सत्ता खुद के हाथ में होने के बावजूद वो किससे न्याय माँग रही रहीं, ये लोगों को समझ नहीं आया। खैर, इस ‘पैदल मार्च’ के जरिए उन्होंने खुद को महिला अधिकारों के लिए लड़ने वाला दिखाया।

अब विरोध प्रदर्शन को शांत करने के लिए पश्चिम बंगाल सरकार ने एक नया कानून पारित किया है। इसे ‘अपराजिता वुमन एन्ड चाइल्ड बिल (वेस्ट बंगाल क्रिमिनल लॉज अमेंडमेंट) बिल 2024’ नाम दिया गया है। इसमें बलात्कार के दोषी के लिए उसके जीवित रहने तक जेल या फिर फाँसी का प्रावधान किया गया है। गैंगरेप के केस में भी उम्रकैद तक की सज़ा है। पीड़िता की मौत होने या फिर उसके अंग कार्य करना बंद कर दें तो दोषी को फाँसी तक हो सकती है। सबसे बड़ी बात ये है कि FIR दर्ज किए जाने के 21 दिन के भीतर जाँच पूरी किए जाने का प्रावधान है।

हालाँकि, केंद्र सरकार द्वारा लागू किए गए ‘भारतीय न्याय संहिता’ (BNS) में भी बलात्कार के मामलों में 2 महीने के भीतर जाँच पूरी किए जाने का प्रावधान किया गया है। वहीं सुनवाई के लिए BNS में 2 महीने तो ममता बनर्जी वाले कानून में 1 महीने की समय-सीमा है। 2 दिवसीय विधानसभा सत्र बुला कर इस कानून को पारित कराया गया। BNS में भी बलात्कार के मामले में उम्रकैद तक का प्रावधान है, जिसे इसमें बढ़ा कर फाँसी तक किया गया है। इस तरह दोनों कानूनों में बहुत अधिक अंतर नहीं है।

भारत में फाँसी की सज़ा सुनाई तो जाती है, लेकिन सामान्यतः फाँसी दी नहीं जाती है। हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट और फिर राष्ट्रपति तक याचिका व दया याचिका घूमती रहती है। 2012 में ‘निर्भया’ के 4 बलात्कारियों को 2020 में फाँसी दी गई थी। उससे पहले कोलकाता में 1990 में हुए बलात्कार-हत्या के एक मामले को लेकर 2004 में एक व्यक्ति को फाँसी दी गई थी। इस तरह हमने देखा कि पिछले 2 दशक में सिर्फ रेप-हत्या के 3 मामलों में ही फाँसी दी गई है। जो मामले हाई-प्रोफ़ाइल नहीं बन पाते, उसमें भी बलात्कार तो बलात्कार ही होता है।

अब एक पत्र सामने आया है, जिसे 2021 में केंद्र में तत्कालीन कानून मंत्री किरेन रिजिजू ने पश्चिम बंगाल सरकार को भेजा था। इससे पहले 2019-2021 के बीच 3 बार ऐसे पत्र भेजे जा चुके थे। इसमें पॉक्सो एक्ट, यानी बच्चों के साथ यौन शोषण के मामलों की जाँच के लिए FTSC, यानी ‘फ़ास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट्स’ की स्थापना और संचालन की सलाह दी गई थी। 2028 में केंद्र सरकार ने इससे संबंधित कानून बनाया था, सुप्रीम कोर्ट ने भी इसकी सलाह दी थी।

इसके तहत जिस भी जिले में POCSO से संबंधित लंबित मामलों की संख्या 100 से अधिक थी, वहाँ-वहाँ एक्सक्लूसिव पॉक्सो अदालतों की स्थापना का निर्णय लिया गया था। पश्चिम बंगाल में ऐसे 123 FTSC का प्रावधान किया गया था, जिनमें 20 ePOCSO अदालतें थीं। मुख्य सचिव तक इस मामले को ले जाया गया, लेकिन इसके बावजूद पश्चिम बंगाल सरकार ने इस दिशा में कदम नहीं उठाया। मोदी सरकार बार-बार आग्रह करती रह गई, याद दिलाती रह गई।

इस पत्र में आँकड़ा भी बताया गया था कि मई 2021 तक ही पश्चिम बंगाल में बलात्कार के 28,559 मामले दर्ज थे। केंद्र और राज्य, दोनों के लिए महिला सुरक्षा को सर्वाधिक चिंता का विषय बताते हुए इस पत्र में लिखा गया था कि ऐसे टास्क फोर्सेज और अदालतों की स्थापना के जरिए इन मामलों में सज़ा दिलाने के लिए मजबूत मशीनरी की आवश्यकता है। इस मामले में केंद्र सरकार ने पूर्ण सहयोग का भी आश्वासन दिया था। अब पश्चिम बंगाल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष शुभेंदु अधिकारी ने भी इस पत्र को साझा किया है।

उन्होंने इसके जरिए ये बताने की कोशिश की है कि महिला सुरक्षा को लेकर ममता बनर्जी कितनी सजग हैं। उन्होंने बताया है कि जब यौन शोषण से पीड़ित महिलाओं-बच्चों को न्याय दिलाने का मौका था तब ममता बनर्जी ने केंद्र सरकार की एक न सुनी। उन्होंने कहा कि ममता बनर्जी आज जो भी कर रही हैं वो सिर्फ दिखावा है। उन्होंने चेताया कि एक सही में काम करने का समय है। खैर, इस प्रकरण से कम से कम ममता बनर्जी के ड्रामे की तो पोल खुलती ही है और साथ ही उनकी इस जनता की आँखों में धूल झोंकने वाली राजनीति की भी।

अगर ममता बनर्जी सचमुच महिलाओं और बच्चों के अधिकारों को लेकर सजग होतीं तो चुनाव के समय जो भाजपा कार्यकर्ताओं पर हमले होते हैं और कई महिलाओं-बच्चों को पलायन के लिए मजबूर होना पड़ता है उन मामलों में न्याय होता। भाजपा के दफ्तर में जो लोग शरण लेते हैं कई-कई दिनों तक रहने को मजबूर होते हैं उनमें महिलाएँ-बच्चे भी होते हैं। भाजपा ने अपनी कई महिला कार्यकर्ताओं के यौन शोषण का भी आरोप लगाया था। उन मामलों में TMC सरकार ने क्या कार्रवाई की?

अगर ममता बनर्जी महिलाओं के खिलाफ अपराध को लेकर सजग होतीं तो संदेशखली में जिस शाहजहाँ शेख और उसके गुर्गों ने जनजातीय समाज की महिलाओं का यौन शोषण किया उन लोगों को गिरफ्तार करने में देरी नहीं की जाती। चोपरा में ताजेमुल लड़कियों को बाँध कर उनकी पिटाई करता था, वीडियो आने के बाद TMC विधायक हमीदुल रहमान ने पश्चिम बंगाल को ‘मुस्लिम राष्ट्र’ बताते हुए इसे जायज ठहराया। ममता बनर्जी ने इस विधायक के खिलाफ कोई कार्रवाई की? नहीं।

और अब भी क्या हो रहा है। प्रदर्शनकारी डॉक्टरों को ही धमकाया जा रहा है। सांसद अरूप चक्रवर्ती ने कहा कि अगर कोई मरीज हड़ताल की वजह से मरता है कि इन डॉक्टरों को जनाक्रोश का सामना करना पड़ेगा, फिर हम आपको नहीं बचाएँगे। TMC नेता उदयन गुहा ने कहा था कि ममता बनर्जी की तरफ जो लोग उँगलियाँ उठा रहे हैं, उनकी उँगलियाँ तोड़ दी जाएँगी। इन सब पर कार्रवाई हुई? नहीं। फिर ममता बनर्जी द्वारा पीड़ित महिलाओं को न्याय दिलाने की बातों को कोरा न माना जाए तो और क्या?

बजरंग पुनिया और विनेश फोगाट की राजनीति को मिला अखाड़ा, हरियाणा के दंगल में टीम कॉन्ग्रेस की ओर लगाएँगे दाँव: रिपोर्ट में दावा- विधानसभा चुनाव लड़ने की सीट फाइनल

पहलवान बजरंग पूनिया और विनेश फोगाट हरियाणा में विधानसभा चुनाव लड़ने जा रहे हैं। दोनों कॉन्ग्रेस के टिकट से विधानसभा चुनाव में उम्मीदवारी ठोकेंगे। दोनों के चुनाव लड़ने की बात कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी से मुलाकात के बाद तय हुई है। दोनों की सीटों पर भी फैसला हो गया है।

लाइवहिंदुस्तान की एक रिपोर्ट के अनुसार, बुधवार (4 सितम्बर, 2024) को दिल्ली में राहुल गाँधी से मुलाक़ात के बाद बजरंग पूनिया को बादली सीट से टिकट दिया जाएगा। यह झज्जर जिले में स्थित है। इसके अलावा विनेश फोगाट को जुलाना सीट से टिकट दिया जाएगा, यह जींद जिले में पड़ती है। इस बात का आधिकारिक ऐलान नहीं हुआ है।

दोनों पहलवानों ने राहुल गाँधी के अलावा कॉन्ग्रेस के संगठन महासचिव से भी मुलाकात की है। इसके बाद दोनों के टिकट पर बात फाइनल हुई है। विनेश के जिस सीट से लड़ने की बात मीडिया रिपोर्ट्स में कही गई है, उसके अंतर्गत उनका ससुराल पड़ता है। इस सीट पर अच्छी खासी संख्या जाट मतदाताओं की बताई जाती है।

वहीं बादली सीट झज्जर जिले में है जो बजरंग पूनिया का गृह जनपद है। वर्तमान में जहाँ बादली सीट पर कॉन्ग्रेस तो वहीं जुलाना सीट पर जजपा का कब्जा है। बादली सीट पर कॉन्ग्रेस सीट के कुलदीप वत्स विधायक हैं, वह हरियाणा के बड़े ब्राम्हण नेताओं में शुमार किए जाते है। ऐसे में बादली सीट पर टिकट के लिए कॉन्ग्रेस को यह सीट खाली करवानी होगी।

इससे राज्य में उसके वोटों का अंकगणित बिगड़ सकता है। वहीं जुलाना सीट पर उसे लड़ाई में आना होगा। 2019 में वह इस सीट पर तीसरे नम्बर पर रही थी। उसे इस सीट पर मात्र 10% वोट ही हासिल हुए थे। ऐसे में यहाँ से विनेश फोगाट की लड़ाई मुश्किल हो सकती है।

विनेश फोगाट और बजरंग पूनिया लगातार केंद्र सरकार का विरोध करते आए हैं। दोनों पहलवान कुश्ती संघ के पूर्व अध्यक्ष बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ प्रदर्शन के नेता रहे हैं। दोनों के प्रदर्शन और उनके रुख को कॉन्ग्रेस नेता भूपिंदर सिंह हुड्डा का खुला समर्थन रहा है।

विनेश फोगाट हाल ही में पेरिस ओलम्पिक से वजन अधिक होने के कारण बाहर हो गईं थी। विनेश फोगाट बिना मेडल के देश लौटी थीं। हालाँकि खापों ने उन्हें एक मेडल दिया था। उनकी वापसी पर उनका स्वागत भी भूपिंदर हुड्डा के बेटे और सांसद दीपेंदर हुड्डा ने किया था।

MCD कमेटियों का चुनाव लटका रही थी AAP की मेयर, राष्ट्रपति ने दिल्ली के LG की ताकत बढ़ा दी: अब बोर्ड-आयोग गठन और नियुक्तियों का भी होगा अधिकार

दिल्ली में एमसीडी की वार्ड समितियों के चुनाव को लटकाने की कोशिश पर केंद्र सरकार ने पानी फेर दिया। ये चुनाव आज (4 सितंबर 2024) को हो रहे हैं, जिसके लिए पीठासीन अधिकारियों की नियुक्ति एलजी को करनी पड़ी। इस नियुक्ति के लिए दिल्ली के एलजी को अधिकार सीधे राष्ट्रपति से मिले। जिसके बाद बुधवार (4 सितंबर 2024) को एमसीडी की 12 वार्ड समितियों का चुनाव कराया जा रहा है। समाचार लिखे जाने तक 7 वार्डों के चुनाव हो गए थे, जिसमें 3 पर बीजेपी तो 4 पर आम आदमी पार्टी ने जीत दर्ज की।

आखिर राष्ट्रपति को क्यों देनी पड़ी एलजी को ज्यादा ताकत?

दरअसल, मंगलवार (3 सितंबर 2024) को देर शाम मेयर शैली ओबेरॉय ने एमसीडी की समितियों के चुनाव को लटकाने के लिए आखिरी समय में पैंतरा चलते हुए कहा कि वो पीठासीन अधिकारियों की नियुक्ति ही नहीं करेंगी, क्योंकि चुनाव कराने के लिए समय ही नहीं है। ऐसे में उन्होंने पीठासीन अधिकारियों की नियुक्ति करने से इनकार कर दिया। शैली का कहना था कि उनकी अंतरात्मा उन्हें ‘अलोकतांत्रिक चुनाव प्रक्रिया’ में हिस्सा लेने की अनुमति नहीं देती है। इसके बाद मामले में राष्ट्रपति ने हस्तक्षेप किया और एलजी को पीठासीन अधिकारियों की नियुक्ति के अधिकार दे दिए।

केंद्र सरकार की सलाह पर राष्ट्रपति ने दिल्ली के उपराज्यपाल की शक्तियाँ बढ़ा दी और इसका नोटिफिकेशन जारी कर दिया गया। दिल्ली के उप-राज्यपाल के पास अब दिल्ली महिला आयोग, दिल्ली विद्युत नियामक आयोग जैसे किसी भी प्राधिकरण, बोर्ड और आयोग के गठन का पूर्ण अधिकार आ गया है। गजट ​नोटिफिकेशन के मुताबिक, “राष्ट्रपति ने संसद द्वारा अधिनियमित कानूनों के तहत दिल्ली के लिए किसी भी प्राधिकरण, बोर्ड, आयोग या वैधानिक निकाय का गठन और सदस्यों की नियुक्ति करने की शक्ति उपराज्यपाल को सौंपी है।”

राष्ट्रपति द्वारा जारी अधिसूचना राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली शासन अधिनियम, 1991 (1992 का 1) की धारा 45डी के साथ संविधान के अनुच्छेद 239 के खंड (1) के तहत जारी की गई है। अधिसूचना में कहा गया है, राष्ट्रपति निर्देश देती हैं कि राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली के उपराज्यपाल, राष्ट्रपति के नियंत्रण के अधीन रहते हुए तथा अगले आदेश तक उक्त अधिनियम की धारा 45डी के खंड (क) के अधीन राष्ट्रपति की शक्तियों का प्रयोग किसी प्राधिकरण, बोर्ड, आयोग या किसी वैधानिक निकाय के गठन के लिए करेंगे। चाहे उसे किसी भी नाम से जाना जाता हो या ऐसे प्राधिकरण, बोर्ड, आयोग या किसी वैधानिक निकाय में किसी सरकारी अधिकारी या पदेन सदस्य की नियुक्ति के लिए करेंगे।

इसके बाद दिल्ली के उपराज्यपाल वीके सक्सेना ने एमसीडी की वार्ड समितियों के चुनाव के लिए पीठासीन अधिकारियों की नियुक्ति करते हुए आदेश जारी किया और कहा कि अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और स्थायी समिति के सदस्यों के पदों के लिए चुनाव निर्धारित कार्यक्रम (4 सितंबर) के अनुसार ही होंगे। इसके बाद बुधवार को चुनावी प्रक्रिया शुरू हो गई।

समाचार लिखे जाने तक, 7 वार्ड समितियों के चुनाव नतीजे आ चुके हैं, जिसमें सिटी सदर-पहाड़ गंज, करोलबाग और रोहिणी जोन में आम आदमी पार्टी को और केशवपुरम, नजफगढ़ और शाहदरा में बीजेपी को जीत मिली है।

  • शाहदरा साउथ जोन से संदीप कपूर चेयरमैन पद पर निर्वाचित हुए हैं, जबकि डिप्टी चेयरमैन पद पर संजीव सिंह और स्थायी समिति के सदस्य के तौर पर नीमा भगत निर्वाचित हुए हैं। संदीप कपूर को 211, संजीव सिंह को 190 और नीमा भगत को 133 वोट मिले।
  • नजफगढ़ जोन में चेयरमैन के पद पर अमित खरखरी, डिप्टी चेयरमैन तिलोत्मा चौधरी और स्थायी समिति के सदस्य के तौर पर पूनम भारद्वाज निर्वाचित हुई हैं। अमित खरखरी को 127, तिलोत्मा चौधरी को 130 और पूनम भारद्वाज को 133 वोट मिले।
  • रोहणी जोन पर आप की ओर से चेयरमैन पद पर सुमन अनिल राणा, डिप्टी चेयरमैन धर्म रक्षक, स्थायी समिति सदस्य पर दौलत राम की जीत हुई है। सुमन अनिल राणा को 22, धर्म रक्षक को 49 और दौलत राम को 44 वोट मिले।
  • केशवपुरम जोन के चेयरमैन पद पर बीजेपी के योगेश वर्मा, डिप्टी चेयरमैन पद पर बीजेपी के सुशील और स्टैंडिंग कमेटी मेंबर शिखा भारद्वाज जीतीं। योगेश वर्मा को 64, सुशील को 67 और शिखा भारद्वाज को 58 वोट मिले।
  • करोल बाग में आम आदमी पार्टी के राकेश जोशी को चेयरमैन, ज्योति गौतम को डिप्टी चेयरमैन पद पर जीत मिली, सदस्यों में अंकुर नारंग को जीत मिली। राकेश जोशी को 89, ज्योति गौतम को 140 और अंकुर नारंग को 87 वोट मिले।
  • सिटी सदर-पहाड़ गंज जोन से मोहम्मद सादिक चेयरमैन, डिप्टी चेयरमैन पर किरण बाला जीतीं। स्थायी समिति मेंबर पौरदीप सिंह की जीत हुई है। मोहम्मद सादिक को 79, किरण बाला को 77 और पौरदीप सिंह को 74 वोट मिले।
  • वेस्ट जोन में चेयरमैन पद पर आप उम्मीदवार शाहिब कुमार, डिप्टी चेयरमैन पद पर मंजू सेतिया और स्थायी समिति के सदस्य के तौर पर परवीन कुमार ने जीत दर्ज की है।

दिल्ली सरकार ने किया विरोध

राष्ट्रपति मुर्मू द्वारा दिल्ली के एलजी को दिल्ली में बोर्ड और पैनल बनाने और सदस्यों की नियुक्ति का अधिकार दिए जाने पर आप नेता और दिल्ली के मंत्री सौरभ भारद्वाज ने कहा, “जब जिम्मेदारी और जवाबदेही की बात आती है, तो एलजी साहब काम नहीं कर रहे हैं। हजारों डॉक्टरों की भर्ती करनी है। अस्पतालों में पद सृजित करने हैं। हजारों बेचारे बस मार्शल बेरोजगार हो गए हैं। एलजी साहब ने यह सब बंद कर दिया है। और जब अधिकार प्राप्त करने की बात आती है, तो वे अधिक से अधिक अधिकार ले रहे हैं। वे क्यों ले रहे हैं? ताकि वे अधिकारों का दुरुपयोग कर सकें।”

सौरभ भारद्वाज ने आगे कहा, “वे (एलजी) सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर के माध्यम से प्रसिद्ध होने के लिए सालाना 1.5 करोड़ रुपये में एक सोशल मीडिया कंपनी को काम पर रख रहे हैं। चुनी हुई सरकार की शक्तियाँ छीनी जा रही हैं और नियुक्त लोगों को शक्तियाँ दी जा रही हैं। जहाँ तक ​​केंद्र सरकार का सवाल है, वो चाहती है कि पूरी दिल्ली एलजी द्वारा चलाई जाए। क्योंकि भाजपा चुनाव जीतने में सक्षम नहीं है। इसलिए भाजपा पिछले दरवाजे से दिल्ली पर नियंत्रण करना चाहती है, लेकिन ऐसा नहीं होगा…”

आपको बता दें कि बुधवार यानि 4 सितंबर को सुबह 10:00 बजे से शाम 4:00 बजे तक 12 वार्ड कमेटियों का चुनाव होना था इसके लिए निगम प्रशासन ने दिशा निर्देश जारी किए थे। दिल्ली नगर निगम के 12 जोन में से 7 जोन में बीजेपी तो 5 जोन में आम आदमी पार्टी को बहुमत है। अभी तक के चुनाव में 3-4 वार्ड में दोनों पार्टियों ने जीत हासिल की है। बाकी बचे वार्ड में कड़ी टक्कर होने की उम्मीद है।

‘गर्मी की छुट्टियों की सैलरी लेते हुए मुझे बहुत बुरा लगता है’: सुप्रीम कोर्ट की न्यायाधीश BV नागरत्ना ने क्यों कहा ऐसा, जानिए डिटेल

सर्वोच्च न्यायालय की न्यायाधीश बी.वी. नागरत्ना ने मंगलवार (3 सितंबर 2024) को कहा कि कोर्ट की ग्रीष्मकालीन छुट्टियों के दौरान वेतन लेने में वह असहज महसूस करती हैं। उन्होंने इसका कारण बताते हुए कहा कि अवकाश के दौरान जज कोर्ट की कार्यवाही में उपस्थित नहीं होते हैं। उन्होंने यह टिप्पणी बर्खास्त की गई 6 महिला जजों के वेतन से संबंधित सुनवाई के दौरान की।

दरअसल, यह मामला मध्य प्रदेश के कई सिविल न्यायाधीशों को उनका पिछला वेतन देने से इनकार करने के संबंध में अदालती चर्चा से संबंधित था। इन जजों को मध्य प्रदेश सरकार ने बर्खास्त कर दिया था। बाद में सर्वोच्च न्यायालय के हस्तक्षेप के बाद उन्हें बहाल कर दिया गया था। हालाँकि, बहाली के बाद बर्खास्तगी के दौरान का उनका वेतन नहीं दिया जा रहा था।

सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता गौरव अग्रवाल ने न्यायमूर्ति नागरत्ना और न्यायमूर्ति एन कोटिश्वर सिंह की बेंच को बताया कि चार जजों की बर्खास्तगी को मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने पलट दिया है, जबकि दो अन्य की बर्खास्तगी को पूर्ण न्यायालय ने बरकरार रखा है। इसके बाद वरिष्ठ अधिवक्ता आर बसंत ने सुप्रीम कोर्ट से अपील की कि जजों के सेवा में न रहने की अवधि का बकाया वेतन उन्हें दिया जाए।

न्यायमूर्ति नागरत्ना ने तर्क दिया कि चूँकि न्यायाधीशों ने अपनी बर्खास्तगी के दौरान काम नहीं किया था, इसलिए उन्हें पिछले वेतन की उम्मीद नहीं करनी चाहिए। उन्होंने कहा, “आप हमारे काम की प्रकृति जानते हैं। जिन्हें बहाल किया जा रहा है, वे उस समय के वेतन की उम्मीद नहीं कर सकते, जब वे जज के रूप में काम नहीं कर रहे थे।”

न्यायाधीश नागरत्ना ने आगे कहा कि इस तरह का भुगतान उनके विवेक के खिलाफ है। उन्होंने कहा, “मुझे गर्मी की छुट्टियों के दौरान का अपना वेतन लेने में बहुत बुरा लगता है, क्योंकि मैं जानती हूँ कि हमने उस दौरान काम नहीं किया है।” बता दें कि 6 महिला जजों में से सरिता चौधरी और अदिति कुमार शर्मा को बहाल नहीं किया गया है।

उन्होंने कहा कि ‘काम नहीं तो वेतन नहीं’ का नियम फॉलो किया जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने निर्देश दिया कि बहाल किए गए चारों न्यायिक अधिकारियों को उनकी मूल वरिष्ठता और सेवा की निरंतरता तथा लाभों के साथ बहाल किया जाए, सिवाय उस अवधि के बकाया वेतन के।

दरअसल, यह मामला मध्य प्रदेश राज्य की न्यायिक सेवाओं में नियुक्त 6 महिला न्यायाधीशों से संबंधित है। इन जजों को पिछले साल मध्य प्रदेश सरकार ने सेवा से बर्खास्त कर दिया था। राज्य सरकार के इस फैसले से पहले हाई कोर्ट की प्रशासनिक समिति की बैठक में इनकी बर्खास्त करने की सिफारिश की गई थी। बर्खास्तगी आदेश में प्रोबेशन अवधि में इनके द्वारा किया गया असंतोषजनक कार्य शामिल था।

स्मार्टफोन सुन रहा आपकी हर बातचीत, फेसबुक और गूगल की पार्टनर कंपनी ने माना: फोन के माइक से सुनते हैं हर जानकारी, एड दिखाने में करते हैं इस्तेमाल

मार्केटिंग फर्म कॉक्स मीडिया ग्रुप ने माना है कि वह लोगों के स्मार्टफोन माइक्रोफोन से उनकी बातें सुनती है। यह कंपनी फेसबुक और गूगल के साथ काम करती है। CMG ने कहा है कि वह माइक्रोफोन से सुनी गई जानकारी का उपयोग लोगों को विज्ञापन दिखाने के लिए करेगा। उन्हें उनकी बातचीत के आधार पर विज्ञापन दिखाए जाते हैं।

यह खुलासा 26 अगस्त, 2024 को हुआ है। इस दिन CMG ने अपने निवेशकों को बताया कि वह बातचीत को सुनता है। CMG ने पिच डेक के दौरान बताया कि वह आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का उपयोग अपने एक सॉफ्टवेयर पर करती है जो लाइव बातचीत को सुनता है और इसमें से अपने लिए डाटा जुटाता है।

कंपनी ने बताया है कि इससे लोगों की आदतों का पता चलता है और फिर इसी आधार पर उन्हें विज्ञापन दिखाए जाते हैं। CMG ने कहा कि लोग ‘अपनी बातचीत और ऑनलाइन व्यवहार के आधार पर एक डेटा ट्रेल छोड़ते हैं’ जिसे AI से चलने वाले सॉफ़्टवेयर द्वारा एकत्र करके उसका विश्लेषण किया जाता है।

कंपनी ने बताया है कि यह डाटा 470 से अधिक चैनलों से प्राप्त किया जाता है। फिर इसका उपयोग एड बनाने में किया जाता है। इस खुलासे के बाद, Google ने कथित तौर पर CMG को अपनी ‘पार्टनर प्रोग्राम’ वेबसाइट से हटा दिया है।

Google के प्रवक्ता ने एक बयान में कहा, “सभी विज्ञापनदाताओं को सभी कानूनों और वनियमों के साथ-साथ हमारी Google विज्ञापन नीतियों का पालन करना होता है, इन नीतियों का उल्लंघन करने वाले विज्ञापनों या विज्ञापनदाताओं की पहचान करेंगे तो हम उन पर कार्रवाई करेंगे।

इसके अलावा, फेसबुक की मूल कंपनी मेटा ने कहा कि वह CMG के इस बयान के बाद समीक्षा कर रही है कि क्या इस कंपनी ने किसी नियम का उल्लंघन किया है। मेटा के प्रवक्ता ने कहा, “मेटा विज्ञापनों के लिए आपके फ़ोन के माइक का उपयोग नहीं करता है और हम इस बारे में सालों से सार्वजनिक रूप से बता रहे हैं।”

मेटा के प्रवक्ता ने कहा कि हम कॉक्स मीडिया ग्रुप से संपर्क कर रहे हैं ताकि वे साफ़ कर सकें कि उनका प्रोग्राम मेटा के डाटा पर आधारित नहीं है। दिलचस्प बात यह है कि अब हटा दिए गए ब्लॉग पोस्ट में, CMG ने यह बताया कि लोगों की बातचीत सुनने की कानूनी वैधता पर सवाल भी उठे हैं।

इस पोस्ट में कहा गया, “फ़ोन और डिवाइस के लिए आपकी बात सुनना पूरी तरह से कानूनी है। जब कोई नया ऐप डाउनलोड या अपडेट लोगों को उपयोग के समझौते दिखाता है तो उसमें कहीं ना कहीं उनकी बातचीत सुनने की शर्त अक्सर शामिल होती है।”

इससे पहले भी ऐसी कई रिपोर्टें आई हैं, जिनमें यूजर्स ने आरोप लगाया है कि उन्हें यात्रा और इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों से लेकर कई चीजों के बारे में बातचीत करने के बाद तुरंत उसके विज्ञापन दिखाई देते हैं। ये विज्ञापन तब भी दिखाई देते हैं, जब उन्होंने इन चीजों के बारे में इन्टरनेट पर खोज नहीं की होती है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या माइक से लैस डिवाइस यूजर्स की बात सुन रहे हैं।

विभव कुमार को बेल से CM अरविंद केजरीवाल की पत्नी को मिला ‘सुकून’, फोटो देख भड़कीं स्वाति मालीवाल: बताया- जब मुझे पीटा गया, तब सुनीता भी घर पर ही थीं

राज्यसभा सांसद स्वाति मालीवाल से मारपीट मामले में सुप्रीम कोर्ट से बेल मिलने के बाद बिभव कुमार की एक तस्वीर सामने आई है। इस तस्वीर में बिभव आराम से सोफे पर बैठे दिख रहे हैं। फोटो को शेयर करते हुए सुनीता केजरीवाल ने लिखा- “सुकून भरा दिन।” अब उनके इसी ट्वीट पर स्वाति मालीवाल ने अपनी तीखी प्रतिक्रिया दी।

स्वाति मालीवाल ने ट्वीट का स्क्रीनशॉट साझा करते हुए लिखा- “मुख्यमंत्री जी की पत्नी, जो मेरी पिटाई के दौरान घर पे ही थीं, उनको बड़ा ‘सुकून’ महसूस हो रहा है।” स्वाति ने अपनी नाराजगी जाहिर करते हुए कहा कि सुनीता केजरीवाल को बिभव को देख सुकून इसलिए मिल रहा है क्योंकि बिभव शर्तिया जेल पर बाहर आया है जिसने उन्हें (स्वाति मालीवाल) को उनके (सुनीता केजरीवाल) घर में पीटा और अभद्रता की।

उन्होंने कहा, “सबको ये साफ़ संदेश है, महिलाओं को मारो पीटो, उसके बाद हम पहले गंदी ट्रोलिंग करवा देंगे, पीड़िता को पूरी तरह से बर्बाद करेंगे और कोर्ट में उस आदमी को बचाने के लिए देश के सबसे महँगे वकीलों की फ़ौज खड़ी कर देंगे!”

स्वाति मालीवाल ने आगे अपने ट्वीट में लिखा- “जिनको ऐसे लोगों को देखकर सुकून मिलता है उनसे बहन बेटियों की इज़्ज़त की क्या उम्मीद रखनी। प्रभु सब देख रहे हैं, इंसाफ़ होकर रहेगा।”

बिभव कुमार को सशर्त बेल

गौरतलब है कि 3 सितंबर को बिभव कुमार को सुप्रीम कोर्ट ने 4 शर्तों पर रिहा किया था। कोर्ट ने कहा था कि बिभव कुमार के जेल से रिहा होने के बाद उनको मुख्यमंत्री के निजी सचिव या किसी आधिकारिक पद पर बहाल नहीं किया जाएगा, बिभव तब तक मुख्यमंत्री आवास नहीं जाएँगे जब तक गवाहों की जाँच पूरी नहीं हो जाती, वो इस मामले को लेकर कोई सार्वजनिक टिप्पणी नहीं करेंगे और इस मामले में सबसे पहले उन गवाहों के बयान दर्ज होंगे जो डरे हुए हैं। इन चार शर्तों पर सुप्रीम कोर्ट ने बिभव को रिहा किया था।

बिभव कुमार ने मुख्यमंत्री आवास पर की थी मारपीट

बता दें कि बिभव की रिहाई जेल में 100 दिन बिताने के बाद हुई है। उनपर आरोप था कि उन्होंने 13 मई, 2024 को CM केजरीवाल से मिलने आई AAP की राज्यसभा सांसद से मारपीट की। स्वाति मालीवाल ने आरोप लगाया था कि उन पर बिभव कुमार ने हमला किया और उनको जमीन पर गिरा कर मारा। स्वाति मालीवाल ने कहा कि उनकी पिटाई के दौरान CM केजरीवाल के आवास में मौजूद लोगों ने उनकी मदद नहीं की।

ब्रुनेई के सुल्तान बोल्‍किया से मिले PM मोदी, बताया ‘एक्ट ईस्ट पॉलिसी’ का महत्वपूर्ण हिस्सा: कहा- सांस्कृतिक परम्पराएँ हमारे मजबूत संबंधों का आधार

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपनी तीन दिवसीय विदेश यात्रा के पहले चरण में दक्षिणपूर्वी एशिया के देश ब्रुनेई पहुँचे है। प्रधानमंत्री इसके बाद सिंगापुर जाएँगे। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी 3 सितम्बर, 2024 को ब्रुनेई पहुँचे हैं, जहाँ उनका स्वागत राज्य के राजकुमार ने किया। पीएम मोदी ने अपने दौरे के दूसरे दिन ब्रुनेई के सुल्तान हसनल बोल्किया से भी मुलाक़ात की है।

पीएम मोदी और सुल्तान बोल्किया की मुलाक़ात 4 सितम्बर, 2024 को यहाँ के राजमहल में हुई है। पीएम मोदी ने इस मुलाक़ात के बाद सुल्तान हसन बोल्किया का शुक्रिया भी जताया और दोनों देशों के सम्बन्धों पर बात की। पीएम मोदी ने कहा, “आपके भावपूर्ण शब्द, गर्मजोशी भरे स्वागत और आतिथ्य के लिए आपको और पूरे शाही परिवार का आभार व्यक्त करता हूँ।”

पीएम मोदी ने कहा, “पीएम मोदी ने कहा, “मैं आपको और ब्रुनेई के लोगों को आजादी की 40वीं वर्षगाँठ पर 140 करोड़ भारतीयों की तरफ से बधाई देता हूँ। हमारे सदियों पुराने सांस्कृतिक संबंध हैं। हमारी मित्रता का आधार हमारी महान सांस्कृतिक परंपरा है। आपके नेतृत्व में हमारे संबंध दिनोंदिन प्रगाढ़ होते रहे हैं।”

पीएम मोदी ने आगे कहा, “मुझे अत्यंत ख़ुशी है कि अपने तीसरे कार्यकाल के शुरुआत में ही आपसे मिलने और भविष्य के विषय में बात करने का अवसर मिला। यह सुख संयोग है कि हम द्विपक्षीय साझेदारी की 40वीं वर्षगांठ मना रहे हैं। भारत की एक्ट ईस्ट नीति और इंडो पैसिफिक विजन में ब्रुनेई एक महत्वपूर्ण साझेदार है, जो हमारे लिए उज्ज्वल भविष्य की गारंटी है।”

इससे पहले अपने दौरे के पहले दिन पीएम मोदी कई कार्यक्रमों में शामिल हुए। पीएम मोदी 3 सितम्बर, 2024 को यहाँ भारत के दूतावास में बनी नई बिल्डिंग का उद्घाटन किया। पीएम मोदी ने ब्रुनेई में रहने वाले भारतीय समुदाय से भी मुलाक़ात की।

ब्रुनेई में वर्तमान में लगभग 14,000 भारतीय रहते हैं। पीएम मोदी ने कहा कि यहाँ रहने वाले भारतीय दोनों देशों के रिश्तों के बीच एक सेतु का काम करते हैं। इसी दिन पीएम मोदी ब्रुनेई की राजधानी बन्दर सेरी बागवान में स्थित उमर अली सैफुद्दीन मस्जिद भी पहुँचे। 1958 में बनी मस्जिद काफी बड़ी है और वास्तुकला का एक नायाब नमूना है।

पीएम मोदी 4 सितम्बर को ब्रुनेई से सिंगापुर जाएँगे। यहाँ वह सिंगापुर के नेतृत्व से बातचीत में शामिल होंगे। सिंगापुर भारत का पुराना साझीदार रहा है और बड़ी संख्या में भारतीय यहाँ रहते हैं। पीएम मोदी का यह दौरा 5 सितम्बर, 2024 को खत्म होगा