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डॉक्टर बिटिया की रेप के बाद कर दी हत्या, बंगाल पुलिस दे रही थी ‘घूस’: पीड़ित पिता का दावा, परिजन बोले- सफेद कागज पर साइन करने को कहा

आरजी कर अस्पताल में रेप महिला डॉक्टर के रेप-हत्या मामले में परिजनों की ओर से चौंकाने वाला दावा सामने आया है। तमाम मीडिया रिपोर्ट्स बताती हैं कि महिला डॉक्टर के परिवार ने कोलकाता पुलिस पर रिश्वत देने का आरोप लगाया है। इसके अलावा उन्होंने ये भी कहा है कि पुलिस ने जल्दी-जल्दी में उनकी बेटी के शव का अंतिम संस्कार कराया।

महिला डॉक्टर के पिता बोले, “पुलिस एकदम शुरुआत से ही केस को निपटाने का प्रयास कर रही है। हमें बॉडी को देखने की इजाजत भी नहीं थी। हमें उस समय भी थाने के बाहर इंतजार करना पड़ा जब शव को पोस्टमार्टम के लिए ले जाया जा रहा था। बाद में जब शव मिला तो एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने हमें पैसे देने की बात कही, जो हमने फौरन नकार दी।”

पीड़िता के माता-पिता ने कहा, “कोलकाता पुलिस के डीसी नॉर्थ ने मुझे पैसे देने की कोशिश की. हमने मना कर दिया, जबकि इस मामले में डीसी सेंट्रल हर दिन झूठ बोल रहा है मुझे कौन जवाब देगा… हमारी बेटी इस अस्पताल में खत्म हो गई। हम चाहते थे कि वह डॉक्टर बने, हमारे पास कई सवाल हैं। सुबह 11 बजे उन्होंने मुझे बताया कि उसने आत्महत्या कर ली है। हमें उसे देखने में 3 घंटे लग गए। हमने पुलिस से उसे देखने के लिए विनती की। उन्हें पोस्टमार्टम करने में देरी क्यों हुई? पीड़िता के पिता ने कहा कि शाम 6.40 से 7 बजे तक मैंने एफआईआर दर्ज की, उन्होंने एफआईआर देर से क्यों दर्ज की? उन्होंने अप्राकृतिक मौत क्यों दर्ज की?

वहीं पीड़िता के चाचा ने बताया कि पुलिस ने उनसे सफेद कागज पर साइन करने को कहा था, लेकिन परिवार ने इससे मना कर दिया और कागजों को फाड़ दिया। उन्होंने कहा कि बेटी को गए एक महीना होने वाला है लेकिन अभी तक इस मामले में कोई खुलासा नहीं हुआ।

रिपोर्ट्स के अलावा इस बाबत भाजपा नेता अमित मालवीय ने भी ट्वीट किया है। अपने ट्वीट में उन्होंने मृतिका के पिता के हवाले से बताया कि घटना के बाद परिजन फौरन शव का दाह-संस्कार करने को तैयार नहीं थे, लेकिन पुलिस ने उनपर दबाव बनाया। परिवार को करीबन 3 घंटे तक सेमिनार हॉल के बाहर इंतजार करवाया गया। न उन्हें अंदर जाने दिया जा रहा था और न ही बाहर। परिवार ने शिकायत 6-7 बजे करनी चाही, लेकिन मामला दर्ज हुआ रात के पौने 12 बजे।

उन्होंने सवाल किया कि अगर ये सारी बात सच है तो मतलब ममता सरकार और कपिल सिब्बल सुप्रीम कोर्ट में झूठ बोल रहे हैं। उन्होंने कहा कि अगर डीसी नॉर्थ द्वारा मृतिका के पिता को पैसे लेकर केस वापस लेने का दबाव बनाया गया तो पूछा जाना चाहिए कि उन्होंने ये पैसे किसके कहने पर ऑफर किए। क्यों परिवार को शांत कराने की कोशिश की गई। कौन है जो ममता बनर्जी को बचाने के प्रयास कर रहा है।

ट्वीट के मुताबिक परिवार को ये तक नहीं पता कि किसने उनकी बेटी का अंतिम संस्कार किया। वो बस ये पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं किसने ये सब अंतिम संस्कार करवाने की अनुमति और पैसे दिए। मालवीय ने आरोप लगाया कि जिस समय ये सब हो रहा था उस वक्त एक टीएमसी विधायक और 2 पार्षद वहीं श्मशान के आसपास घूम रहे थे।

भाजपा नेता ने ये भी कहा कि इस मामले में डीसी सेंट्रल इंदिरा मुखर्जी और अन्य केवल झूठ बोल रहे हैं। उन्होंने मामला उठाया कि ममता बनर्जी और विनीत गोयल जब तक इस केस में इस्तीफा नहीं देते तब तक कोई सफल जाँच नहीं हो पाएगी। उनके हिसाब से ज्यादातक सबूत पहले ही नष्ट किए जा चुके हैं। उन्होंने माँग की है कोलकाता कमीशनर और सीएम के बीच घटना के 72 घटना में जो बात हुई उसका ब्यौरा पब्लिक डोमेन में आना चाहिए। उनकी बातचीत की जाँच होनी चाहिए। उन्होंने मुख्यमंत्री और कोलकाता कमीशनर का पॉलीग्राफ टेस्ट कराने की भी माँग की।

जिन्होंने हिजाब पर लगाई रोक उन शिक्षक को टीचर्स डे पर मिलना था ‘बेस्ट प्रिंसिपल’अवॉर्ड, कर्नाटक की कॉन्ग्रेस सरकार ने ‘तकनीकी दिक्कत’ बता रोकी: इस्लामी कट्टरपंथी कर रहे थे विरोध

कर्नाटक की कॉन्ग्रेस सरकार ने राज्य के एक प्रिंसिपल को बेस्ट प्रिंसिपल अवार्ड देने पर रोक लगा दी है। पहले उन्हें इस सम्मान के लिए चुना गया था, लेकिन प्रतिबंधित कट्टरपंथी इस्लामी संगठन PFI की राजनीतिक विंग SDPI के विरोध के बाद इस पर रोक लगा दी गई। SDPI ने प्रिंसिपल के खिलाफ हिजाब पहनने से रोकने की बात कही है।

कर्नाटक के शिक्षा विभाग ने मंगलवार (3 सितम्बर, 2024) को बेस्ट प्रिंसिपल अवार्ड देने की घोषणा की थी। इसके लिए राज्य के दो प्रिंसिपल का नाम चुना गया था। इनमें से एक BG रामकृष्णा हैं। रामकृष्णा उडुपी के सरकारी स्कूल में प्रिंसिपल हैं। रामकृष्णा के अलावा एक और शिक्षक का नाम चुना गया था।

इन दोंनो को शिक्षक दिवस के दिन यह अवार्ड दिया जाना था। हालाँकि, कर्नाटक सरकार का यह फैसला कट्टरपंथियों को रास नहीं आया। प्रतिबंधित कट्टरपंथी इस्लामी संगठन PFI की राजनीतिक विंग SDPI ने इसको लेकर विरोध जता दिया। SDPI ने तर्क दिया कि रामकृष्णा ने अपने कॉलेज में मुस्लिम छात्राओं को हिजाब पहन कर आने से रोका था।

SDPI ने कहा कि जिस स्कूल में रामकृष्णा प्रिंसिपल हैं, वहाँ छात्राओं को हिजाब पहने के कारण कक्षा में नहीं घुसने दिया गया था, ऐसे में रामकृष्णा को यह अवार्ड नहीं दिया जाना चाहिए। SDPI के अलावा भी कई कथित एक्टिविस्टों ने इस पर बवाल मचाया।

दक्षिण कन्नड़ा के SDPI अध्यक्ष अनवर सादात ने एक्स (पहले ट्विटर) पर लिखा, “कुंडापुर सरकारी कॉलेज के प्रिंसिपल रामकृष्ण ने मुस्लिम छात्राओं को हिजाब पहनने पर गेट से बाहर रखा और महीनों तक धूप में रखा। वह मुस्लिम विरोधी हैं और प्रोफ़ेसर होने के बाद भी साम्प्रदायिक हैं, ऐसे व्यक्ति को कॉन्ग्रेस सरकार अवार्ड दे रही है।”

SDPI के बवाल के बाद कर्नाटक की कॉन्ग्रेस सरकार इस पर झुक गई। कर्नाटक के शिक्षा विभाग ने BG रामकृष्णा को दिए जाने वाले अवार्ड को अभी के लिए रोक दिया है। शिक्षा विभाग ने इसके पीछे के कारण स्पष्ट नहीं किए हैं। उसने कहा है कि यह फैसला तकनीकी कारणों से लिया गया है।

कर्नाटक में मुस्लिम छात्राओं का क्लास में हिजाब पहनने की जिद को लेकर यह बवाल काफी लंबा चला था। 2022 में चालू हुआ यह बवाल 2023 तक जारी रहा था। इसकी शुरुआत एक कॉलेज में 6 छात्राओं को हिजाब पहन कर कक्षा में बैठने से रोकने पर हुई थी। इसके बाद छात्राएँ अड़ गई थीं।

विवाद बढ़ने पर कर्नाटक सरकार ने स्कूलों में ड्रेस लागू करने के नियम बनाए थे। इसमें कहा गया था कि हिजाब ड्रेस का अनिवार्य हिस्सा नहीं हो सकता। इसके विरोध में हिजाब पक्ष हाई कोर्ट तक पहुँच गया था। हाई कोर्ट ने भी कर्नाटक सरकार के फैसले को सही बताया था।

राज्य में 2023 में कॉन्ग्रेस की सरकार आने के बाद मुख्यमंत्री सिद्दारमैया ने ऐलान किया था कि अब स्कूलों में हिजाब पहनने पर कोई रोक नहीं रहेगी। भाजपा ने इसे कट्टरपंथियों को खुश करने के लिए उठाया गया कदम बताया था। अब इसी विवाद के जिन्न के बोतल से बाहर आने पर एक शिक्षक का अवार्ड रोक दिया गया है।

10 साल की दलित लड़की को दुकान में खींच रहा था 70 साल का अनवर: सामान खरीदने उसके दुकान पर गई थी नाबालिग, पुलिस ने किया गिरफ्तार

उत्तर प्रदेश के सीतापुर जिले में दलित समुदाय की 7 वर्षीया नाबालिग हिन्दू बच्ची से 70 वर्षीय अनवर खाँ ने अश्लील हरकत की है। पुलिस ने आरोपित अनवर को गिरफ्तार कर लिया है। दरअसल, पीड़िता अनवर की दुकान पर सामान लेने गई थी। अनवर उसे टॉफी देने के बहाने उसे अंदर खींच लिया। इसका वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। घटना मंगलवार (3 सितंबर 2024) की है।

यह घटना सीतापुर जिले के थाना क्षेत्र हरगाँव की है। हिन्दू बच्ची के पिता ने पुलिस में शिकायत दर्ज करवाई है। 10 साल की पीड़िता ने बताया कि वो 3 सितंबर (मंगलवार) की शाम 6 बजे कुछ सामान लेने अनवर की दुकान पर गई थी। उसकी दुकान का नाम वारिस परचून है। उस दौरान अनवर ने बच्ची को टॉफी दिया और उसका हाथ पकड़ कर दुकान के अंदर खींचने लगा।

अनवर खाँ ने बच्ची पर कई बार अंदर चलने का दबाव बनाया। जब बच्ची ने नहीं माना तो अनवर उसे जबरन अंदर ले गया। वहाँ वह बच्ची से छेड़खानी करने लगा। इससे डरकर बच्ची जोर-जोर से चीखने लगी। बच्ची ने बताया कि उसका शोर सुनकर आसपास के लोग जमा हो गए। लोगों को जुटता देखकर मोहम्मद अनवर ने पीड़िता को छोड़ दिया।

बच्ची ने घर आकर अपने परिजनों को इसकी जानकारी दी। पीड़िता के चाचा ने बताया कि जब उसकी बेटी रोते हुए घर आई तो उसने मामले की तहरीर पुलिस में दी। पुलिस ने इस मामले में केस दर्ज करके आरोपित अनवर को गिरफ्तार कर लिया है। आरोपित को जेल भेज दिया गया है। इस घटना का वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है।

सीतापुर जिले के एडिशनल एसपी ने बताया कि अनवर खाँ पर भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 74 के साथ पॉक्सो एक्ट व SC/ST एक्ट की धाराओं में कार्रवाई की जाएगी। उन्होंने कहा कि अनवर खाँ के खिलाफ फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट में केस चलाकर जल्द से जल्द सजा दिलाने का प्रयास किया जाएगा। फ़िलहाल पुलिस द्वारा मामले में जाँच व अन्य जरूरी कानूनी कार्रवाई की जा रही है।

राष्ट्रीय मेडिकल कमीशन ने मेडिकल पाठ्यक्रम में ‘सोडोमी’ और ‘लेस्बियनिज्म’ को फिर से अनैतिक यौन अपराधों में किया शामिल, हाइमन और वर्जिनिटी की महत्ता को भी लाई वापस

राष्ट्रीय मेडिकल कमीशन (NMC) ने मेडिकल छात्रों के लिए फोरेंसिक मेडिसिन और टॉक्सिकोलॉजी के पाठ्यक्रम में ‘सोडोमी’ और ‘लेस्बियनिज़्म’ को अनैतिक यौन अपराध के रूप में फिर से शामिल किया है। इस संशोधित पाठ्यक्रम में हाइमन का महत्व, वर्जिनिटी और डिफ्लोरेशन की परिभाषा और इसकी वैधता और चिकित्सीय-कानूनी महत्व जैसे विषयों को भी वापस लाया गया है, जिन्हें 2022 में मद्रास हाई कोर्ट के निर्देशों के अनुसार मॉड्यूल को संशोधित करते समय हटा दिया गया था।

इसके अलावा, नए पाठ्यक्रम में “भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS)”, “भारतीय न्याय संहिता (BNS)”, और “भारतीय साक्ष्य अधिनियम (BSA)” जैसे कानूनी विषय भी शामिल किए गए हैं। इसमें “प्रीवेंटिव चिल्ड्रन फ्रॉम सेक्शुअल ऑफेंस एक्ट (POCSO)”, सिविल और क्रिमिनल केस, इंक्वेस्ट (पुलिस और मजिस्ट्रेट इंक्वेस्ट), संज्ञेय और असंज्ञेय अपराधों पर चर्चा की जाएगी। नए पाठ्यक्रम में यौन विकृतियों, फेटिशिज़्म, ट्रांसवेस्टिज़्म, वॉयरिज़्म, सैडीज़्म, नेक्रोफेजिया, मसोकिज़्म, एक्सीबिशनिज़्म, फ्रोटेयरिज़्म, और नेक्रोफिलिया पर भी चर्चा की जाएगी।

सभी के लिए समान पाठ्यक्रम की जगह, NMC ने 2022 में LGBTQ+ समुदाय को ध्यान में रखते हुए पाठ्यक्रम में बदलाव किए थे, लेकिन अब एक बार फिर से पारंपरिक दृष्टिकोण को लागू किया गया है। नए पाठ्यक्रम में विकलांगता पर सात घंटे का प्रशिक्षण भी हटा दिया गया है। अब यह पाठ्यक्रम मेडिकल प्रैक्टिस के चिकित्सा-कानूनी ढांचे, आचार संहिता, चिकित्सा नैतिकता, पेशेवर दुराचार और चिकित्सा लापरवाही के बिंदुओं को समझने पर जोर देगा।

NMC ने अपनी “कंपिटेंसी-बेस्ड मेडिकल एजुकेशन (CBME)” गाइडलाइन्स, 2024 में कहा कि यह समय था कि मौजूदा नियमों और दिशानिर्देशों के सभी पहलुओं पर पुनर्विचार किया जाए और इन्हें बदलते जनसांख्यिकी, सामाजिक-आर्थिक संदर्भ, धारणा, मान्यताओं, चिकित्सा शिक्षा में प्रगति और स्टेकहोल्डर्स की अपेक्षाओं के अनुरूप अनुकूलित किया जाए।

NMC ने कहा कि इस बदलाव का परिणाम एक ऐसा पाठ्यक्रम है जो वैश्विक प्रवृत्तियों के साथ मेल खाता है। उपचारात्मक चिकित्सा शिक्षा कार्यक्रम को एक “भारतीय मेडिकल ग्रेजुएट” (IMG) तैयार करने के लिए डिजाइन किया गया है, जो आवश्यक ज्ञान, कौशल, दृष्टिकोण, मान्यताएं और संवेदनशीलता के साथ प्राथमिक देखभाल चिकित्सक के रूप में प्रभावी ढंग से कार्य कर सके। NMC की वेबसाइट पर पाठ्यक्रम में किए गए बदलाव अपलोड कर दिए गए हैं।

जिस मदरसे में छपता था नकली नोट, उसे प्रशासन ने किया सील: निर्माण भी अवैध, प्रयागराज प्राधिकरण ने लगाया बोर्ड- जमीन पर किसी तरह की गतिविधि गैर-कानूनी

उत्तर प्रदेश के प्रयागराज जिले में जिस मदरसे में नकली नोट बनाने के रैकेट का पर्दाफाश हुआ था, उसे प्रशासन ने सील कर दिया है। इस मदरसे में फ़िलहाल 6 राज्यों के 70 बच्चे पढ़ाई कर रहे थे, जिन्हें उनके घर भेज दिया गया है। प्रयागराज विकास प्राधिकरण ने मदरसे को अवैध निर्माण घोषित कर दिया है। यह प्रशासनिक कार्रवाई बुधवार (4 सितंबर 2024) को हुई है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, 4 सितंबर की दोपहर में प्रयागराज पुलिस मदरसा कमेटी के साथ मदरसे पर पहुँची। यहाँ कानूनी प्रक्रियाओं के बाद मदरसे पर पुलिस ने ताला जड़ कर सीलिंग की कार्रवाई की। सील करने के दौरान मदरसे में उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, ओडिशा सहित 6 राज्यों के कुल 70 बच्चे मौजूद थे। इन्हें बाहर निकाला गया और उनके घरों के लिए रवाना कर दिया गया।

सीलिंग के लगभग आधे घंटे के बाद प्रयागराज विकास प्राधिकरण की टीम भी मदरसे पर पहुँची। प्राधिकरण ने वहाँ मदरसे के अवैध होने का बोर्ड लगा दिया। इस बोर्ड पर लिखा था, “अनधिकृत होने के कारण यह निर्माण सील किया गया है। इस निर्माण में सील को तोड़ना, पुनः निर्माण की कोशिश करना तथा किसी प्रकार का क्रय-विक्रय करना अवैधानिक एवं दंडनीय अपराध है।”

बताते चलें कि प्रयागराज पुलिस द्वारा मदरसे में नकली नोट छापने का खुलासा किया था। इसके बाद IB और ATS की टीम जाँच में शामिल हो गई है। मदरसे का मौलवी तफसीरुल पिछले 6 वर्षों से बच्चों को RSS विरोधी और मजहबी कट्टरपंथ का पाठ पठा रहा था। जाँच एजेंसियाँ यहाँ से पढ़ाई कर चुके 630 बच्चों की पड़ताल कर रही है।

जाँच के दौरान यह पता चला कि इस मदरसे को विभिन्न इस्लामी मुल्कों से फंडिंग की जा रही थी। जिन मुल्कों से इस मदरसे को फंडिंग मिल रही थी, उनमें तुर्किए, दुबई और अन्य अरब देश भी शामिल हैं। इन देशों से इस मदरसे को करोड़ों रुपए की फंडिंग की जा रही थी। पुलिस के रडार पर वो खातेदार भी हैं, जिनके एकाउंट में विदेशों से पैसे आते थे।

जब ‘सद्भावना’ दिखाने के लिए कॉन्ग्रेस सरकार ने 25 आतंकियों को छोड़ दिया… जिस शाहिद लतीफ़ को बॉर्डर पार कराया, फिर उसी ने पठानकोट में ख़ून बहाया

अनुभव सिन्हा की एक वेब सीरीज आई है ‘IC814’ नाम की, जो दिसंबर 1999 में आतंकियों द्वारा भारतीय विमान के अपहरण की घटना पर आधारित है। चूँकि तब केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री थे और भाजपा की सरकार थी, वामपंथी नज़रिए से बनी इस वेब सीरीज में चारों हाईजैकर्स के असली नाम ‘भोला’, ‘शंकर’, ‘बर्गर’, ‘डॉक्टर’ और ‘चीफ’ पर अधिक फोकस रखा गया है, जबकि उसके असली नाम इब्राहिम अतहर, सन्नी क़ाज़ी, शाहिद सैयद, मिस्त्री ज़हूर और शकीर को छिपा लिया गया है।

आइए, संक्षेप में जानते हैं कि हुआ क्या था। नेपाल के काठमांडू से नई दिल्ली आ रहे विमान को आतंकियों ने हाईजैक कर लिया। उसमें 179 यात्री और 11 क्रू मेंबर शामिल थे। इस एयरक्राफ्ट को पहले अमृतसर, फिर लाहौर और दुबई ले जाया गया। दुबई में 27 यात्रियों को छोड़ा गया, जिनमें एक घायल यात्री भी था जिसे कई बार चाकू घोंपा गया था। अंततः विमान अफगानिस्तान के कंधार में लैंड किया गया और फिर 3 आतंकियों अहमद उमर सईद शेख, मसूद अज़हर और मुस्ताक अहमद ज़रगर को मोलभाव के बाद छोड़ना पड़ा।

अब कॉन्ग्रेस तत्कालीन NDA सरकार पर निशाना साध रही है। खासकर कॉन्ग्रेस की प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत लगातार इस तरह के प्रपंच में लगी हुई हैं और भाजपा पर आतंकियों के समर्थन का आरोप लगा रही है। पठानकोट हमले के बाद ISI को सबूत दिखाने के लिए यहाँ बुलाया गया था, जिस पर उन्होंने निशाना साधा। साथ ही पीएम मोदी के लाहौर दौरे पर भी सवाल उठाया। साथ ही कहा कि आतंकवादियों के प्रति नरमी दिखाना ठीक नहीं है, कॉन्ग्रेस की सरकारों ने आतंकियों को पकड़ा और भाजपा सरकार ने छोड़ा।

1999 में स्थिति ही ऐसी पैदा हो गई थी भारत सरकार के लिए सबसे बड़ी प्राथमिकता थी अपने लोगों की जान बचाना। लेकिन, कॉन्ग्रेस ने तो ‘सद्भावना’ दिखाने के लिए आतंकियों को छोड़ दिया था। आइए, जानते हैं कि कॉन्ग्रेस पार्टी ने तब क्या किया था। सुप्रिया श्रीनेत ने पठानकोट हमले का नाम लिया। पठानकोट एयरबेस में जनवरी 2016 में 4 आतंकियों ने वेस्टर्न एयर कमांड के एयरबेस पर हमला कर 8 जवानों की हत्या कर दी थी। इस हमले में 4 आतंकी मारे गए थे।

आतंकी शाहिद लतीफ़ को UPA सरकार ने छोड़ दिया था

इस हमले के मास्टरमाइंड के रूप में शाहिद लतीफ का नाम सामने आया था। शाहिद लतीफ़, जो जैश-ए-मुहम्मद का आतंकी था। 26/11 की तरह ही पठानकोट हमले के बाद भी लाख सबूत दिए जाने के बावजूद पाकिस्तान ने अपनी भूमिका को नकार दिया। जबकि बाद में ये भी सामने आया था कि आतंकियों ने हमले का प्रशिक्षण रावलपिंडी के नूर खान एयरफोर्स बेस पर लिया था। साथ ही पाकिस्तान स्थित पंजाब प्रांत के बहावलपुर में भी इन्हें ट्रेनिंग दी गई थी। फिर भी पाकिस्तान ने अपना हाथ होना स्वीकार नहीं किया।

अब आपको बताते हैं उस शाहिद लतीफ़ के बारे में, जो इस हमले का मास्टरमाइंड था। 2010 में पाकिस्तान से संबंध सुधारने के नाम पर JeM के इसी आतंकी शाहिद लतीफ़ को छोड़ दिया गया था और इसे ‘सद्भावना का प्रदर्शन’ बताया गया था। उस खतरनाक आतंकी को पाकिस्तान को सौंप दिया गया। तब तो न कोई विमान हाईजैक हुआ था, न ही सरकार को मोलभाव कर के अपने नागरिकों की जान बचानी थी और न ही कोई अन्य मजबूरी थी। सत्ता थी, शौक से ये कार्य किया गया।

तब केंद्र में UPA-II की सरकार थी और मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री थे, लेकिन कॉन्ग्रेस अध्यक्ष और ‘राष्ट्रीय सलाहकार परिषद’ (NAC) की मुखिया सोनिया गाँधी के हाथों में सत्ता की असली चाबी थी। राहुल गाँधी लगातार दूसरी बार अमेठी से सांसद बन चुके थे। और हाँ, सिर्फ शाहिद लतीफ़ को ही नहीं छोड़ा गया था, बल्कि 25 आतंकियों को पाकिस्तान से संबंध सुधारने के लिए रिहा किया गया था। शाहिद लतीफ़ उससे पहले 16 वर्षों तक भारत की जेल में बंद था, अचानक से उसे छोड़ दिया गया।

अपने नागरिकों की जान बचाने के लिए 3 आतंकियों को छोड़ने जाने पर जो कॉन्ग्रेस आज हंगामा मचा रही है, कभी उसने सिर्फ ‘सद्भावना’ दिखाने के लिए 25 आतंकियों को खुला छोड़ दिया था। इन सबको जम्मू, श्रीनगर, आगरा, वाराणसी, नैनी और तिहाड़ जेलों में रखा गया था। इन सबको अटारी-वाघा सीमा के जरिए पाकिस्तान की सीमा में घुसाया गया था। एक और बात जान लीजिए, शाहिद लतीफ़ का कनेक्शन कंधार हाईजैक से भी है। हाईजैकर्स ने जिन आतंकियों को छोड़े जाने की सूची सौंपी थी, उसमें शाहिद लतीफ़ का भी नाम था।

कंधार हाईजैक में भी शाहिद लतीफ़ को छुड़ाना चाहते थे आतंकी

लेकिन, तत्कालीन राजग सरकार ने शाहिद लतीफ़ समेत 31 आतंकियों को छोड़ने से इनकार कर दिया था। बाद में उसे भारत में JeM आतंकियों का मुख्य हैंडलर बना दिया गया था। IC814 को हाईजैक किए जाने और 2001 में संसद भवन पर हमले के मद्देनज़र शाहिद लतीफ़ को जम्मू कश्मीर की जेल से उत्तर प्रदेश के वाराणसी स्थित जेल में शिफ्ट कर दिया गया था। आशंका थी कि उसे छुड़ाने के लिए आतंकी और भी प्रयास कर सकते हैं, इसीलिए उसे जम्मू कश्मीर जैसे संवेदनशील प्रदेश की जेल में नहीं रखा गया था।

शाहिद लतीफ़ पाकिस्तान के गुजराँवाला के अमीनाबाद स्थित मोरे का रहने वाला था। उसे सियालकोट क्षेत्र का प्रभार जैश द्वारा दिया गया था और भारत में आतंकी संगठन का कैडर तैयार करने का काम वही सँभालता था। साथ ही वो मसूद अज़हर का भी करीबी था। नासिर हुसैन, हाफिज अबू बकर, उमर फ़ारूक़ और अब्दुल कयूम – पठानकोट एयरबेस पर हमला करने वाले इन आतंकियों का हैंडलर भी यही शाहिद लतीफ़ था और इसीलिए NIA ने इसे अपनी ‘वॉन्टेड’ लिस्ट में रखा हुआ था

उसने इन आतंकियों के लिए हथियार से लेकर कपड़ों और जूतों तक की भी व्यवस्था की थी। साथ ही उसमे SOS इंजेक्शन, दवाओं और फ़ूड पैकेट्स समेत अन्य लॉजिस्टिक्स की भी व्यवस्था की थी। NIA ने पाकिस्तान से उसके परिजनों का DNA सैंपल भी माँगा था। इसके लिए 2 बार पाकिस्तान को भारतीय जाँच एजेंसी ने 5 महीने में ‘Letter Rogatory’ भेजा था। सोचिए, कितने खतरनाक आतंकी को भारत ने ‘सद्भावना’ के नाम पर उस मुल्क को सौंप दिया था, जो भारत को कई टुकड़ों में काटना चाहता है।

अब आपको सबसे रोचक बात जाननी चाहिए। अक्टूबर 2023 में यही शाहिद लतीफ़ मारा गया – पिछले ही साल। मारने वाले ‘अज्ञात’ थे। मोदी सरकार आने के बाद पाकिस्तान में इन ‘अज्ञातों’ के कारनामे काफी बढ़ गए हैं, एक के बाद एक कर के कई आतंकी काल के गाल में समा दिए गए। भारत में UAPA के आरोपित उस आतंकी को सियालकोट में एक मस्जिद में घुस कर ‘अज्ञात लोगों’ ने मौत की नींद सुला दिया। शायद कॉन्ग्रेस पार्टी इसका भी क्रेडिट ले ले।

1994 में शाहिद लतीफ़ को पकड़ा गया था। जम्मू की जेल में मसूद अज़हर को भी उसके साथ ही रखा गया था। आज उसे छोड़ने वाली कॉन्ग्रेस जम कर भाजपा को गाली दे रही है। उस भाजपा को जिसके शासनकाल में जम्मू कश्मीर में देश का संविधान लागू किया गया और पत्थरबाज़ी की घटनाएँ खत्म हुई। जम्मू कश्मीर में लगातार आतंकी मार गिराए जा रहे हैं। इन सबके बावजूद कॉन्ग्रेस पार्टी अपना इतिहास छिपाने में लगी है, जिसमें ये भी शामिल है कि कैसे भारतीय वायुसेना के जवानों के हत्यारे यासीन मलिक को PMO बुलाया गया था और प्रधानमंत्री ने उससे हाथ मिलाया था।

दिल्ली MCD में भाजपा का स्कोर 12 में 7, AAP को 5 से करना पड़ा संतोष: जोनल कमेटियों के चुनाव में BJP ने मारी बाजी

दिल्ली नगर निगम (MCD) में बुधवार (4 सितंबर 2024) को 12 वार्ड समितियों के चुनाव हुए, जिसके नतीजे आ गए। एमसीडी के 12 वार्ड समितियों के चुनाव में 7 पर बीजेपी के उम्मीदवारों ने जीत दर्ज की, तो आम आदमी पार्टी को 5 जोन में जीत मिली। उपराज्यपाल वीके सक्सेना ने एमसीडी के आयुक्त अश्वनी कुमार को चुनाव कराने के निर्देश दिए थे जिसके बाद उन्होंने एमसीडी के सभी जोन के उपायुक्तों को पीठासीन अधिकारी बनाया था।

इन चुनावी नतीजों से यह साफ हो गया है कि अब दिल्‍ली नगर निगम (एमसीडी) की स्टैंडिंग कमेटी पर बीजेपी का दबदबा रहेगा। एमसीडी की स्‍टैंडिंग कमेटी वो संस्‍था होती हो जो निगम से जुड़े सभी बड़े फैसले लेती है।

दिल्ली एमसीडी जोन कमेटियों के चुनावी नतीजे

  • शाहदरा साउथ जोन से संदीप कपूर चेयरमैन पद पर निर्वाचित हुए हैं, जबकि डिप्टी चेयरमैन पद पर संजीव सिंह और स्थायी समिति के सदस्य के तौर पर नीमा भगत निर्वाचित हुए हैं। संदीप कपूर को 211, संजीव सिंह को 190 और नीमा भगत को 133 वोट मिले।
  • शाहदरा नार्थ जोन में भाजपा की जीत हुई है। शाहदरा नार्थ जोन के पद पर चेयरमैन प्रमोद गुप्ता, डिप्टी चेयरमैन रितेश सूजी और स्थायी समिति के सदस्य के तौर पर सतपाल सिंह ने जीत दर्ज की है।
  • वेस्ट जोन में आम आदमी पार्टी ने कब्ज़ा किया है। वेस्ट जोन से चेयरमैन के पद पर साहिब कुमार, डिप्टी चेयरमैन के पद पर मंजू और स्थायी समिति के सदस्य के तौर पर प्रवीण कुमार ने निर्विरोध जीत हुई। मतदान से पहले भाजपा ने आंकड़ा कम होने की वजह नॉमिनेशन वापस ले लिया था।
  • नजफगढ़ जोन में चेयरमैन के पद पर अमित खरखरी, डिप्टी चेयरमैन तिलोत्मा चौधरी और स्थायी समिति के सदस्य के तौर पर पूनम भारद्वाज निर्वाचित हुई हैं। अमित खरखरी को 127, तिलोत्मा चौधरी को 130 और पूनम भारद्वाज को 133 वोट मिले।
  • रोहणी जोन पर आप की ओर से चेयरमैन पद पर सुमन अनिल राणा, डिप्टी चेयरमैन धर्म रक्षक, स्थायी समिति सदस्य पर दौलत राम की जीत हुई है। सुमन अनिल राणा को 22, धर्म रक्षक को 49 और दौलत राम को 44 वोट मिले।
  • केशवपुरम जोन के चेयरमैन पद पर बीजेपी के योगेश वर्मा, डिप्टी चेयरमैन पद पर बीजेपी के सुशील और स्टैंडिंग कमेटी मेंबर शिखा भारद्वाज जीतीं। योगेश वर्मा को 64, सुशील को 67 और शिखा भारद्वाज को 58 वोट मिले।
  • करोल बाग में आम आदमी पार्टी के राकेश जोशी को चेयरमैन, ज्योति गौतम को डिप्टी चेयरमैन पद पर जीत मिली, सदस्यों में अंकुर नारंग को जीत मिली। राकेश जोशी को 89, ज्योति गौतम को 140 और अंकुर नारंग को 87 वोट मिले।
  • सिटी सदर-पहाड़ गंज जोन से मोहम्मद सादिक चेयरमैन, डिप्टी चेयरमैन पर किरण बाला जीतीं। स्थायी समिति मेंबर पौरदीप सिंह की जीत हुई है। मोहम्मद सादिक को 79, किरण बाला को 77 और पौरदीप सिंह को 74 वोट मिले।
  • नरेला जोन वार्ड कमेटी चुनाव में भाजपा ने जीत दर्ज की। नरेला जोन में भाजपा के पवन कुमार (वार्ड नं. 30) अध्यक्ष चुने गए. उपाध्यक्ष पद पर भाजपा की बबीता (वार्ड नं. 31) ने जीत दर्ज की। वहीं, स्थायी समिति के लिए भाजपा की अंजू देवी (वार्ड नं. 29) को चुना गया।
  • सेंट्रल जोन में अध्यक्ष पद पर भाजपा की सुगंधा (वार्ड नं.178) ने जीत दर्ज की है। वहीं, शरद कपूर (वार्ड नं.146 ) उप अध्यक्ष चुने गए। स्थायी समिति के लिए भाजपा के ही राज पाल सिंह (वार्ड नं.174) चुने गए।
  • साउथ जोन में खास बात रही कि जोन अध्यक्ष पद पर पर्याप्त संख्या होने के बावजूद आप ने बीजेपी से टाई किया। यानी आप के 4 पार्षदों ने क्रॉस वोटिंग कर दी। इसके बाद लकी ड्रॉ के जरिए फैसला हुआ. इसमें आम आदमी पार्टी उम्मीदवार कृष्ण जाखड़ विजय घोषित किए गए।
  • भाजपा ने सिविल लाइन जोन में शानदार जीत दर्ज की। अनिल कुमार त्यागी (वार्ड नं. – 06) वार्ड कमेटी के चेयरमैन और रेखा (वार्ड नं. – 12) डिप्टी चेयरमैन चुनीं गई। वहीं, स्थायी समिति के लिए राजा इकबाल सिंह (वार्ड नं. -13) चुने गए हैं।

बता दें कि दिल्ली नगर निगम के इस चुनाव के लिए मेयर शैली ओबेरॉय ने पीठासीन अधिकारियों की नियुक्ति से इनकार कर दिया था, जिसके बाद राष्ट्रपति ने दिल्ली के उपराज्यपाल को विशेष शक्तियाँ देते हुए कमेटियों के गठन, पदों पर नियुक्ति के अधिकार का आदेश जारी किया था। इसके बाद एलजी वीके सक्सेना ने पीठासीन अधिकारियों की नियुक्ति की और चुनावी प्रक्रिया संपन्न हो गई।

इस्लामी आतंकियों और बुरहान वानी को हीरो मानने वालों को कितने वोट: जम्मू-कश्मीर की जनता का लिटमस टेस्ट होगा विधानसभा चुनाव, अब्दुल्ला-मुफ्ती के लिए सिरदर्दी

जम्मू-कश्मीर में आगामी विधानसभा चुनाव एक महत्वपूर्ण मोड़ पर हैं, जहाँ पारंपरिक राजनीतिक दलों के लिए कई चुनौतियाँ उभर कर सामने आ रही हैं। खासतौर पर नेशनल कॉन्फ्रेंस (एनसी) और पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) जैसी पार्टियों के लिए यह चुनाव उनके राजनीतिक भविष्य का लिटमस टेस्ट साबित हो सकता है। इन चुनावों में इस्लामी आतंकियों और बुरहान वानी जैसे आतंकवादियों को हीरो मानने वाले सरजन बरकती जैसों के प्रभाव का आकलन भी किया जाएगा, जो कि राज्य की जनता और राजनीतिक दलों दोनों के लिए एक गंभीर चुनौती बन सकता है।

गांदरबल, जिसे अब्दुल्ला परिवार का पारंपरिक गढ़ माना जाता है, इस बार चुनावी संघर्ष का केंद्र बन गया है। इस क्षेत्र में उमर अब्दुल्ला को न केवल बाहरी दलों बल्कि स्थानीय नेताओं से भी कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। जहाँ एक ओर यह क्षेत्र हमेशा से नेशनल कॉन्फ्रेंस का मजबूत किला रहा है, वहीं दूसरी ओर इस बार के चुनावी समीकरण पहले से काफी जटिल हो गए हैं। स्थानीय मुद्दों पर जनता की बढ़ती असंतुष्टि और नई राजनीतिक धारणाओं ने उमर अब्दुल्ला के लिए इस बार की लड़ाई को और कठिन बना दिया है।

इस्लामी आतंकियों और बुरहान वानी जैसे चरमपंथियों का प्रभाव भी इन चुनावों में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। 2016 के बाद से, जब बुरहान वानी को सुरक्षा बलों ने मार गिराया था, जम्मू-कश्मीर की राजनीति में एक बड़ा परिवर्तन देखने को मिला। वानी को हीरो के रूप में प्रस्तुत करने वालों और इस्लामी आतंकवाद को समर्थन देने वाले तत्वों का प्रभाव चुनावी राजनीति पर भी पड़ सकता है। इस परिस्थिति में, अब्दुल्ला और मुफ्ती परिवारों के लिए यह चुनौती और भी गंभीर हो जाती है, क्योंकि उन्हें न केवल अपने पारंपरिक वोट बैंक को बनाए रखना है, बल्कि इन नए उभरते तत्वों से भी मुकाबला करना है।

सरजन अहमद वागे, जिसे “सरजन बरकती” के नाम से जाना जाता है, का राजनीति में प्रवेश भी इस चुनाव को और रोचक बना रहा है। बुरहान वानी के मारे जाने के बाद साल 2016 घाटी 3 माह तक सुलगती रही थी और विरोध प्रदर्शन चलता रहा था। उस आंदोलन के दौरान अपने “आजादी” के नारे के लिए मशहूर सरजन बरकती ने अब चुनावी मैदान में कदम रखा है। उसने पहले जैनपोरा विधानसभा सीट से नामांकन कराया था, जो 28 अगस्त को खारिज हो गया।

जैनपोरा से नामांकन खारिज होने के बाद बरकती ने गांदरबल से चुनाव लड़ने की घोषणा की है। जेल में रहते हुए ही उसके नामांकन से ये साफ हो गया है कि इस सीट पर इस्लामिक आतंकवादियों के कितने समर्थक हैं और आतंकवादियों से सहानुभूति कितने लोग रखते हैं, ये भी सामने आ जाएगा। वैसे, बरकती का चुनावी राजनीति में प्रवेश, नेशनल कांफ्रेंस और पीडीपी के लिए एक और सिरदर्द बन सकता है, खासकर जब वह उन लोगों का समर्थन पा सकता है, जो जो चरमपंथी विचारधाराओं के करीब हैं।

उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती के लिए इन चुनावों में सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वे कैसे अपने पारंपरिक वोट बैंक को बनाए रखें और साथ ही उन नए वोटरों को भी आकर्षित करें जो चरमपंथी विचारधाराओं या स्थानीय मुद्दों पर अधिक जोर दे रहे हैं। अनुच्छेद 370 के हटाए जाने के बाद से जम्मू-कश्मीर की राजनीति में काफी बदलाव आया है, और इस बदलाव का सीधा असर इन चुनावों पर पड़ेगा।

राजनीतिक मामलों के जानकार बिलाल बशीर ने कहा कि गांदरबल विधानसभा क्षेत्र मे कुल 1.30 लाख मतदाताओं में 90 प्रतिशत ग्रामीण है। इस इलाके में गुज्जर-बक्करवाल समुदाय भी हैं। शेख अब्दुल्ला और उसके बाद फारूक से जुड़े रहे उम्रदराज मतदाताओं का अभी भी पार्टी से जुड़ाव हो सकता है पर युवाओं की सोच अलग है। वे अन्य दलों में भी रुचि लेते हैं। पाँच अगस्त 2019 के बाद स्थिति काफी बदल चुकी है।

सुरक्षा स्थिति भी एक बड़ा मुद्दा बनी हुई है। क्षेत्र में बढ़ती अशांति और हिंसा ने लोगों के बीच निराशा पैदा की है, जिससे अब्दुल्ला और मुफ्ती परिवारों के लिए अपने पारंपरिक वोट बैंक को बनाए रखना और भी कठिन हो गया है। इसके अलावा, चुनावी मैदान में बढ़ती प्रतिस्पर्धा और स्थानीय मुद्दों पर जनता की नाराजगी ने इन दोनों नेताओं के लिए चुनावी संघर्ष को और भी चुनौतीपूर्ण बना दिया है।

इस चुनाव में जीत या हार का सीधा असर जम्मू-कश्मीर की राजनीति पर पड़ेगा, और यह देखना दिलचस्प होगा कि इस बार की चुनावी जंग में किसका पलड़ा भारी रहेगा। क्या अब्दुल्ला और मुफ्ती परिवार अपने पारंपरिक गढ़ों को बचा पाएँगे, या फिर नए राजनीतिक चेहरे और विचारधाराएँ इन किलों को ध्वस्त कर देंगी? यह चुनाव न केवल राज्य की जनता के विचारों का लिटमस टेस्ट होगा, बल्कि जम्मू-कश्मीर की राजनीति में एक नया अध्याय भी जोड़ सकता है।

UP के 57000 ग्राम पंचायतों में खेल का मैदान, 18 कमिश्नरियों में एक-एक फुटबॉल मैदान: CM योगी ने ‘खेलो इंडिया’ का रखा लक्ष्य, 825 विकास खंडों में मिनी स्टेडियम

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने खेलों को बढ़ावा देने के लिए राज्य में 18 नए फुटबॉल स्टेडियम बनाने की घोषणा की है। ये सभी स्टेडियम शुरुआती तौर पर राज्य के कमिश्नरेट में बनेंगे। इसके बाद प्रदेश के सभी 827 ब्लॉक में फुटबॉल स्टेडियम बनेंगे। उन्होंने यह घोषणा 2 सितंबर को लखनऊ में मोहन बागान और ईस्ट बंगाल के बीच हुए डर्बी मैच से पहले की।

सोमवार (2 सितंबर 2024) की शाम लखनऊ के KD सिंह बाबू स्टेडियम में मोहन बागान और ईस्ट बंगाल के बीच फुटबॉल मैच का आयोजन था। इस मैच में योगी आदित्यनाथ बतौर मुख्य अतिथि शामिल हुए थे। मैच की शुरुआत से पहले उन्होंने उत्तर प्रदेश में फुटबॉल को बढ़ावा देने और खेल प्रतिभाओं को और निखारने का ऐलान किया।

अपने सम्बोधन में सीएम योगी ने कहा कि उत्तर प्रदेश के लिए पिछले 10 वर्षों में देश में खेलों और खेल प्रतिभाओं को काफी बढ़वा मिला है। इस दौरान उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तारीफ करते हुए उनके द्वारा चलाए गए ‘खेलो इंडिया’ और ‘सांसद खेलकूद प्रतियोगिता’ जैसे अभियानों की भी चर्चा की।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने आगे कहा कि है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ही प्रेरणा से ही उत्तर प्रदेश में खेल और खिलाड़ियों को नई दिशा मिली है। उन्होंने दावा किया कि उत्तर प्रदेश सरकार वर्तमान समय में 57,000 ग्राम पंचायतों में एक-एक खेल का मैदान बना रही है।

अपने सम्बोधन में CM योगी ने आगे कहा कि UP के 825 विकास खंडों में एक-एक मिनी स्टेडियम बनाए जा रहे हैं। इसके साथ सभी 75 जिलों में एक-एक स्टेडियम बनाने की भी दिशा में काम चल रहा है। मुख्यमंत्री योगी ने विश्वास दिलाया कि फुटबॉल संघ की अपेक्षाओं पर उत्तर प्रदेश सरकार उम्मीदों से जायदा खरी उतरेगी।

यूपी के मुख्यमंत्री योगी के मुताबिक, शुरुआती तौर 18 कमिश्नरियों में एक-एक फुटबॉल स्टेडियम बनेंगे। भविष्य में ब्लॉक स्तर पर 827 फुटबॉल स्टेडियम बनाने की दिशा में भी काम किया जाएगा। उन्होंने वैश्विक स्तर पर उत्तर प्रदेश का नाम रोशन करने वाले खिलाडियों की भी तारीफ की।

नॉर्थ ईस्ट को भारत से काट कर अलग करना चाहता था जो शरजील इमाम, उसकी एक और जमानत याचिका खारिज: दलील में कहा था- लंबा चलेगा केस

हाईकोर्ट ने बुधवार (4 सितंबर 2024) को दिल्ली दंगों के मुख्य आरोपित शरजील इमाम की जमानत याचिका पर जल्द सुनवाई से इनकार दिया। अदालत ने कहा कि इस केस में सुनवाई के लिए पहले से ही 7 अक्टूबर 2024 की तारीख तय है। याचिकाकर्ता ने तर्क किया था कि जमानत याचिका की सुनवाई 2 साल से अधिक समय से पेंडिंग है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, शरजील इमाम की तरफ से तर्क दिया गया था कि 29 अप्रैल 2022 से उसकी जमानत याचिका पर सुनवाई लंबित है। यह याचिका 7 अलग-अलग पीठों के सामने 62 बार लिस्टिंग हो चुकी है। हालाँकि, बेंचों की संरचना में कई बार बदलाव, रोस्टर में फेरबदल, न्यायाधीशों के अवकाश पर रहने आदि की वजह से इन सवा दो वर्षों में इस पर सुनवाई नहीं हो सकी।

याचिका में आगे तर्क दिया गया है कि सुनवाई लंबित रही और अगली डेट पड़ती रही। इसके कारण हर बार नए सिरे से सुनवाई करनी पड़ी। शरजील के वकील ने हाईकोर्ट को यह भी बताया कि अभी यह केस जल्दी खत्म नहीं होने वाला है, क्योंकि पुलिस की जाँच जारी है। इस केस में 1 लाख से अधिक पन्नों के दस्तावेजों की जाँच करने का काम अभी बाकी है।

इन सभी के अलावा 1,000 से अधिक गवाहों की गवाही भी होनी है। इस याचिका की सुनवाई न्यायमूर्ति सुरेश कुमार कैत और न्यायमूर्ति गिरीश कठपालिया की बेंच में हुई। सरकारी वकील ने शरजील की इस याचिका का विरोध किया। आखिरकार अदालत ने शरजील इमाम द्वारा दायर जल्द सुनवाई की याचिका ख़ारिज कर दी।

बताते चलें कि 2020 में देश की राजधानी दिल्ली में हिन्दू विरोधी दंगे हुए थे। इन दंगों में न सिर्फ हिन्दुओं बल्कि आईबी अधिकारी की भी हत्या कर दी गई थी। हिन्दुओं के घरों को लूटकर जला दिया गया था। उसने नॉर्थ ईस्ट को भारत की भी बात कही थी। पुलिस इन दंगों का मुख्य आरोपित शरजील इमाम को बनाया था और उसे गिरफ्तार कर लिया गया था।