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इस्लामी आतंकियों और बुरहान वानी को हीरो मानने वालों को कितने वोट: जम्मू-कश्मीर की जनता का लिटमस टेस्ट होगा विधानसभा चुनाव, अब्दुल्ला-मुफ्ती के लिए सिरदर्दी

जम्मू-कश्मीर में आगामी विधानसभा चुनाव एक महत्वपूर्ण मोड़ पर हैं, जहाँ पारंपरिक राजनीतिक दलों के लिए कई चुनौतियाँ उभर कर सामने आ रही हैं। खासतौर पर नेशनल कॉन्फ्रेंस (एनसी) और पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) जैसी पार्टियों के लिए यह चुनाव उनके राजनीतिक भविष्य का लिटमस टेस्ट साबित हो सकता है। इन चुनावों में इस्लामी आतंकियों और बुरहान वानी जैसे आतंकवादियों को हीरो मानने वाले सरजन बरकती जैसों के प्रभाव का आकलन भी किया जाएगा, जो कि राज्य की जनता और राजनीतिक दलों दोनों के लिए एक गंभीर चुनौती बन सकता है।

गांदरबल, जिसे अब्दुल्ला परिवार का पारंपरिक गढ़ माना जाता है, इस बार चुनावी संघर्ष का केंद्र बन गया है। इस क्षेत्र में उमर अब्दुल्ला को न केवल बाहरी दलों बल्कि स्थानीय नेताओं से भी कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। जहाँ एक ओर यह क्षेत्र हमेशा से नेशनल कॉन्फ्रेंस का मजबूत किला रहा है, वहीं दूसरी ओर इस बार के चुनावी समीकरण पहले से काफी जटिल हो गए हैं। स्थानीय मुद्दों पर जनता की बढ़ती असंतुष्टि और नई राजनीतिक धारणाओं ने उमर अब्दुल्ला के लिए इस बार की लड़ाई को और कठिन बना दिया है।

इस्लामी आतंकियों और बुरहान वानी जैसे चरमपंथियों का प्रभाव भी इन चुनावों में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। 2016 के बाद से, जब बुरहान वानी को सुरक्षा बलों ने मार गिराया था, जम्मू-कश्मीर की राजनीति में एक बड़ा परिवर्तन देखने को मिला। वानी को हीरो के रूप में प्रस्तुत करने वालों और इस्लामी आतंकवाद को समर्थन देने वाले तत्वों का प्रभाव चुनावी राजनीति पर भी पड़ सकता है। इस परिस्थिति में, अब्दुल्ला और मुफ्ती परिवारों के लिए यह चुनौती और भी गंभीर हो जाती है, क्योंकि उन्हें न केवल अपने पारंपरिक वोट बैंक को बनाए रखना है, बल्कि इन नए उभरते तत्वों से भी मुकाबला करना है।

सरजन अहमद वागे, जिसे “सरजन बरकती” के नाम से जाना जाता है, का राजनीति में प्रवेश भी इस चुनाव को और रोचक बना रहा है। बुरहान वानी के मारे जाने के बाद साल 2016 घाटी 3 माह तक सुलगती रही थी और विरोध प्रदर्शन चलता रहा था। उस आंदोलन के दौरान अपने “आजादी” के नारे के लिए मशहूर सरजन बरकती ने अब चुनावी मैदान में कदम रखा है। उसने पहले जैनपोरा विधानसभा सीट से नामांकन कराया था, जो 28 अगस्त को खारिज हो गया।

जैनपोरा से नामांकन खारिज होने के बाद बरकती ने गांदरबल से चुनाव लड़ने की घोषणा की है। जेल में रहते हुए ही उसके नामांकन से ये साफ हो गया है कि इस सीट पर इस्लामिक आतंकवादियों के कितने समर्थक हैं और आतंकवादियों से सहानुभूति कितने लोग रखते हैं, ये भी सामने आ जाएगा। वैसे, बरकती का चुनावी राजनीति में प्रवेश, नेशनल कांफ्रेंस और पीडीपी के लिए एक और सिरदर्द बन सकता है, खासकर जब वह उन लोगों का समर्थन पा सकता है, जो जो चरमपंथी विचारधाराओं के करीब हैं।

उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती के लिए इन चुनावों में सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वे कैसे अपने पारंपरिक वोट बैंक को बनाए रखें और साथ ही उन नए वोटरों को भी आकर्षित करें जो चरमपंथी विचारधाराओं या स्थानीय मुद्दों पर अधिक जोर दे रहे हैं। अनुच्छेद 370 के हटाए जाने के बाद से जम्मू-कश्मीर की राजनीति में काफी बदलाव आया है, और इस बदलाव का सीधा असर इन चुनावों पर पड़ेगा।

राजनीतिक मामलों के जानकार बिलाल बशीर ने कहा कि गांदरबल विधानसभा क्षेत्र मे कुल 1.30 लाख मतदाताओं में 90 प्रतिशत ग्रामीण है। इस इलाके में गुज्जर-बक्करवाल समुदाय भी हैं। शेख अब्दुल्ला और उसके बाद फारूक से जुड़े रहे उम्रदराज मतदाताओं का अभी भी पार्टी से जुड़ाव हो सकता है पर युवाओं की सोच अलग है। वे अन्य दलों में भी रुचि लेते हैं। पाँच अगस्त 2019 के बाद स्थिति काफी बदल चुकी है।

सुरक्षा स्थिति भी एक बड़ा मुद्दा बनी हुई है। क्षेत्र में बढ़ती अशांति और हिंसा ने लोगों के बीच निराशा पैदा की है, जिससे अब्दुल्ला और मुफ्ती परिवारों के लिए अपने पारंपरिक वोट बैंक को बनाए रखना और भी कठिन हो गया है। इसके अलावा, चुनावी मैदान में बढ़ती प्रतिस्पर्धा और स्थानीय मुद्दों पर जनता की नाराजगी ने इन दोनों नेताओं के लिए चुनावी संघर्ष को और भी चुनौतीपूर्ण बना दिया है।

इस चुनाव में जीत या हार का सीधा असर जम्मू-कश्मीर की राजनीति पर पड़ेगा, और यह देखना दिलचस्प होगा कि इस बार की चुनावी जंग में किसका पलड़ा भारी रहेगा। क्या अब्दुल्ला और मुफ्ती परिवार अपने पारंपरिक गढ़ों को बचा पाएँगे, या फिर नए राजनीतिक चेहरे और विचारधाराएँ इन किलों को ध्वस्त कर देंगी? यह चुनाव न केवल राज्य की जनता के विचारों का लिटमस टेस्ट होगा, बल्कि जम्मू-कश्मीर की राजनीति में एक नया अध्याय भी जोड़ सकता है।

UP के 57000 ग्राम पंचायतों में खेल का मैदान, 18 कमिश्नरियों में एक-एक फुटबॉल मैदान: CM योगी ने ‘खेलो इंडिया’ का रखा लक्ष्य, 825 विकास खंडों में मिनी स्टेडियम

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने खेलों को बढ़ावा देने के लिए राज्य में 18 नए फुटबॉल स्टेडियम बनाने की घोषणा की है। ये सभी स्टेडियम शुरुआती तौर पर राज्य के कमिश्नरेट में बनेंगे। इसके बाद प्रदेश के सभी 827 ब्लॉक में फुटबॉल स्टेडियम बनेंगे। उन्होंने यह घोषणा 2 सितंबर को लखनऊ में मोहन बागान और ईस्ट बंगाल के बीच हुए डर्बी मैच से पहले की।

सोमवार (2 सितंबर 2024) की शाम लखनऊ के KD सिंह बाबू स्टेडियम में मोहन बागान और ईस्ट बंगाल के बीच फुटबॉल मैच का आयोजन था। इस मैच में योगी आदित्यनाथ बतौर मुख्य अतिथि शामिल हुए थे। मैच की शुरुआत से पहले उन्होंने उत्तर प्रदेश में फुटबॉल को बढ़ावा देने और खेल प्रतिभाओं को और निखारने का ऐलान किया।

अपने सम्बोधन में सीएम योगी ने कहा कि उत्तर प्रदेश के लिए पिछले 10 वर्षों में देश में खेलों और खेल प्रतिभाओं को काफी बढ़वा मिला है। इस दौरान उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तारीफ करते हुए उनके द्वारा चलाए गए ‘खेलो इंडिया’ और ‘सांसद खेलकूद प्रतियोगिता’ जैसे अभियानों की भी चर्चा की।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने आगे कहा कि है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ही प्रेरणा से ही उत्तर प्रदेश में खेल और खिलाड़ियों को नई दिशा मिली है। उन्होंने दावा किया कि उत्तर प्रदेश सरकार वर्तमान समय में 57,000 ग्राम पंचायतों में एक-एक खेल का मैदान बना रही है।

अपने सम्बोधन में CM योगी ने आगे कहा कि UP के 825 विकास खंडों में एक-एक मिनी स्टेडियम बनाए जा रहे हैं। इसके साथ सभी 75 जिलों में एक-एक स्टेडियम बनाने की भी दिशा में काम चल रहा है। मुख्यमंत्री योगी ने विश्वास दिलाया कि फुटबॉल संघ की अपेक्षाओं पर उत्तर प्रदेश सरकार उम्मीदों से जायदा खरी उतरेगी।

यूपी के मुख्यमंत्री योगी के मुताबिक, शुरुआती तौर 18 कमिश्नरियों में एक-एक फुटबॉल स्टेडियम बनेंगे। भविष्य में ब्लॉक स्तर पर 827 फुटबॉल स्टेडियम बनाने की दिशा में भी काम किया जाएगा। उन्होंने वैश्विक स्तर पर उत्तर प्रदेश का नाम रोशन करने वाले खिलाडियों की भी तारीफ की।

नॉर्थ ईस्ट को भारत से काट कर अलग करना चाहता था जो शरजील इमाम, उसकी एक और जमानत याचिका खारिज: दलील में कहा था- लंबा चलेगा केस

हाईकोर्ट ने बुधवार (4 सितंबर 2024) को दिल्ली दंगों के मुख्य आरोपित शरजील इमाम की जमानत याचिका पर जल्द सुनवाई से इनकार दिया। अदालत ने कहा कि इस केस में सुनवाई के लिए पहले से ही 7 अक्टूबर 2024 की तारीख तय है। याचिकाकर्ता ने तर्क किया था कि जमानत याचिका की सुनवाई 2 साल से अधिक समय से पेंडिंग है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, शरजील इमाम की तरफ से तर्क दिया गया था कि 29 अप्रैल 2022 से उसकी जमानत याचिका पर सुनवाई लंबित है। यह याचिका 7 अलग-अलग पीठों के सामने 62 बार लिस्टिंग हो चुकी है। हालाँकि, बेंचों की संरचना में कई बार बदलाव, रोस्टर में फेरबदल, न्यायाधीशों के अवकाश पर रहने आदि की वजह से इन सवा दो वर्षों में इस पर सुनवाई नहीं हो सकी।

याचिका में आगे तर्क दिया गया है कि सुनवाई लंबित रही और अगली डेट पड़ती रही। इसके कारण हर बार नए सिरे से सुनवाई करनी पड़ी। शरजील के वकील ने हाईकोर्ट को यह भी बताया कि अभी यह केस जल्दी खत्म नहीं होने वाला है, क्योंकि पुलिस की जाँच जारी है। इस केस में 1 लाख से अधिक पन्नों के दस्तावेजों की जाँच करने का काम अभी बाकी है।

इन सभी के अलावा 1,000 से अधिक गवाहों की गवाही भी होनी है। इस याचिका की सुनवाई न्यायमूर्ति सुरेश कुमार कैत और न्यायमूर्ति गिरीश कठपालिया की बेंच में हुई। सरकारी वकील ने शरजील की इस याचिका का विरोध किया। आखिरकार अदालत ने शरजील इमाम द्वारा दायर जल्द सुनवाई की याचिका ख़ारिज कर दी।

बताते चलें कि 2020 में देश की राजधानी दिल्ली में हिन्दू विरोधी दंगे हुए थे। इन दंगों में न सिर्फ हिन्दुओं बल्कि आईबी अधिकारी की भी हत्या कर दी गई थी। हिन्दुओं के घरों को लूटकर जला दिया गया था। उसने नॉर्थ ईस्ट को भारत की भी बात कही थी। पुलिस इन दंगों का मुख्य आरोपित शरजील इमाम को बनाया था और उसे गिरफ्तार कर लिया गया था।

हिन्दू छात्रों के कलावा और तिलक पर बैन, मुस्लिमों को नमाज़ के लिए छुट्टी: कॉलेज प्रिंसिपल मोहसिन अली के खिलाफ प्रदर्शन, ‘जय श्री राम’ और ‘वन्दे मातरम्’ के नारे

उत्तर प्रदेश के अमरोहा जिले में एक इंटर कॉलेज के अंदर हिन्दू छात्रों ने अपने प्रिंसिपल पर गंभीर आरोप लगाए हैं। छात्रों का आरोप है कि प्रिंसिपल मोहसिन अली ने उन्हें कलावा बाँधने और तिलक लगाने से रोका है। इन्ही छात्रों के मुताबिक कॉलेज के अंदर मुस्लिम छात्रों को जुमे की नमाज़ के लिए 12 बजे छुट्टी कर दी जाती है। मामले की जानकारी मिलने पर ‘अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद’ (ABVP) से जुड़े छात्रों ने हंगामा करते हुए मोहसिन पर कार्रवाई की माँग की है। घटना बुधवार (4 सितंबर, 2024) की है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, घटना अमरोहा जिले के थाना क्षेत्र गजरौला की है। यहाँ मंडी समिति मार्ग पर पियर्स चड्ढा इंटर कॉलेज में आसपास के कई छात्र-छात्राएँ पढ़ाई करते हैं। बुधवार को यहाँ ABVP से जुड़े छात्र हंगामा शुरू कर दिए। इनके साथ ‘बजरंग दल’ के सदस्य भी शामिल हो गए। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि प्रिंसिपल मोहसिन अली हिन्दू और मुस्लिम छात्रों में भेदभाव करता है। उन्होंने बताया कि मोहसिन अली हिन्दू छात्रों को तिलक और कलावा बाँधने पर रोकता-टोकता है।

इन्हीं छात्रों ने आगे बताया कि मोहसिन का व्यवहार मुस्लिम छात्रों के लिए एकदम अलग है। प्रार्थना के दौरान मुस्लिम छात्रों से हाथ न जोड़ने के लिए कहा जाता है। साथ ही जुमे के दिन (शुक्रवार) को उनकी छुट्टी कर दी जाती है। इन छात्रों ने मोहसिन अली पर कड़ी कार्रवाई की माँग की। कॉलेज के गेट पर भारत माता की जय, जय श्री राम और ‘वन्दे मातरम्’ के नारे लगे। इस दौरान छात्रों ने मनमानी नहीं चलने देने का एलान किया। हंगामे की सूचना पर पुलिस फ़ौरन ही कॉलेज पहुँच गई। प्रदर्शनकारी छात्रों को समझा कर शांत किया गया।

इस हंगामे का वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। प्रिंसिपल मोहसिन अली से भी बातचीत की गई। इस पूरे मामले में मोहसिन अली का भी बयान सामने आया है। मोहसिन ने बताया कि अभी हाल में ही उन्होंने कॉलेज का संचालन सँभाला है। जो भी नियम पालन करवाए जा रहे थे वो सब पहले के बने थे। प्रशासन की मौजूदगी में इन नियमों के सुधार करने का समझौता हुआ। इस समझौते का लिखित प्रमाण भी बनाया गया। आखिरकार मामले का काफी जद्दोजहद के बाद मामले का पटाक्षेप हुआ।

बहराइच में कहाँ से आ गए आदमखोर भेड़िए, जिन्होंने 55 गाँवों में मचाया आतंक: जानिए – कैसे 28 साल पहले यूपी के 3 जिलों में गई थी 30 बच्चों की जान

उत्तर प्रदेश के सीमावर्ती जिले बहराइच में भेड़ियों का आतंक है। मार्च 2024 से शुरू हुए भेड़ियों के खूनी हमलों में अब तक 9 बच्चों समेत 10 लोगों की मौत हो चुकी है, तो 34 से अधिक लोग घायल हो चुके हैं, जिसमें अधिकाँश बच्चे हैं। इन घटनाओं के बाद प्रशासन की ओर से 32 राजस्व विभाग की टीम और 25 वन विभाग की टीम तैनात की गई है। ड्रोन समेत तमाम सर्विलांस उपकरणों की मदद से अब तक 4 भेड़ियों को पकड़ा जा चुका है। इसके बावजूद अभी तक 2 नरभक्षी पकड़े नहीं जा सके हैं। बहराइच में भेड़ियों के हमले की खबरें लगातार सुर्खियों में हैं। ऐसे में ये जानना जरूरी हो गया है कि ये समस्या आखिर आई क्यों? क्या ऐसे मामले पहले भी आ चुके हैं?

दरअसल, भेड़िये तेजी से विलुप्त होते वन्यजीवों की श्रेणी में हैं। पूरे देश में खासकर उत्तर भारत में इनकी संख्या महज 2000 से 3000 के बीच ही बची है। हालाँकि अतीत में भारत में भेड़ियों की संख्या बहुत ज्यादा हुआ करती थी। अंग्रेजों के समय में भेड़ियों को मारने का बड़ा अभियान चला था, जिसमें 40 सालों में 1 लाख से अधिक भेड़ियों को शिकारियों ने मार डाला था और ब्रिटिश राज से ईनाम भी हासिल किया था। इस लेख में भेड़ियों से जुड़े ऐसे ही तथ्यों को शामिल किया गया है।

लोककथाओं में भेड़ियों का अहम स्थान, महाभारत काल में भीम से जुड़ाव

भेड़ियों ने मानव संस्कृति में एक जटिल स्थान प्राप्त किया है, जहाँ वे कभी खतरनाक शिकारी के रूप में तो कभी ताकत के प्रतीक के रूप में उभरे हैं। भारतीय महाकाव्य महाभारत में, भीम को “वृकोदर” नाम से जाना जाता है, जिसका अर्थ है “भेड़िये का पेट,” जो उनकी अतृप्त भूख को दर्शाता है। इसी तरह, अंग्रेजी में “hungry as a wolf” और “wolfing down food” जैसे मुहावरे भेड़िये की भूख की प्रतीकात्मकता को प्रकट करते हैं।

पश्चिमी लोककथाओं में भेड़िये अक्सर खलनायक की भूमिका में नजर आते हैं, जैसे कि “Big Bad Wolf” और “Werewolf” की कहानियों में। हालाँकि, उन्हें सम्मान के प्रतीक के रूप में भी देखा गया है, जैसे कि ग्रीक देवता अपोलो और रोमन देवता मार्स के साथ उनका संबंध। रोमन मिथक में, एक मादा भेड़िया ने रोम के संस्थापक रोमुलस और रेमुस को पाला था। वहीं, मशहूर लेखक रुडयार्ड किपलिंग की “द जंगल बुक” में, “सीओनी भेड़िया” दल, जिसका नेतृत्व नेकदिल अकैला करता है, एक हीरो के तौर पर है। वहीं, शेर खान नाम का बाघ विलैन के रूप में है।

भेड़ियों के हमलों का अतीत

भारत में भेड़ियों का इंसानों पर हमला करना कोई नई बात नहीं है। 19वीं शताब्दी में ब्रिटिश राज के समय, भेड़ियों के हमलों से कई लोगों की जान गई थी। 1866 में, कैप्टन बी. रोजर्स ने निचले बंगाल में भेड़ियों द्वारा 4,287 लोगों की मौत दर्ज की, जो उस समय बाघों द्वारा की गई 4,218 मौतों से भी थोड़ी ज्यादा ही थी। इसी प्रकार, 1875 में सर्जन जनरल जोसेफ फायरर के अनुसार, उत्तर भारत में भेड़ियों ने 1,018 लोगों की जान ली थी, जो बाघों द्वारा मारे गए 828 लोगों से भी अधिक थी।

ध्यान देने वाली बात यह है कि पंजाब, राजस्थान, गुजरात और दक्कन पठार जैसे क्षेत्रों में भेड़िये के हमलों से इंसानी मौत के मामले बेहद कम थे, जबकि इन क्षेत्रों में भेड़ियों की संख्या अधिक थी। ब्रिटिश सरकार ने इस खतरे का मुकाबला करने और भेड़ियों के हमलों को नियंत्रित करने के लिए इनाम की घोषणा की गई, जिसके परिणामस्वरूप 1871 से 1916 के बीच उत्तर-पश्चिम प्रांतों और अवध में 1 लाख से अधिक भेड़ियों को मार दिया गया। इसके बावजूद, भारतीय भेड़िए अपने जीवित रहने के लिए संघर्ष करते रहे और आज उनकी आबादी महज 3,000 के करीब ही रह गई है।

बीते कुछ दशकों में भेड़ियों के हमलों में काफी मौतें

भारत में भेड़ियों के हमलों का एक लंबा और भयावह इतिहास है। 1985-86 में, मध्य प्रदेश के आष्ठा में चार भेड़ियों के एक समूह ने 17 बच्चों की हत्या कर दी, जिससे क्षेत्र में व्यापक दहशत फैल गई। इसी तरह, 1993 से 1995 के बीच, बिहार के हजारीबाग पश्चिम, कोडरमा और लेटेहर वन मंडलों में भेड़िया दलों द्वारा 60 बच्चों की मौत के मामले सामने आए। इन हमलों की वजह भी प्राकृतिक शिकार की कमी और भेड़िया-कुत्ता संकरों की वृद्धि को माना गया है।

वाई.वी. झाला और डी.के. शर्मा द्वारा साल 1996 में किए गए एक रिसर्च में, पूर्वी उत्तर प्रदेश में 76 बच्चों पर हुए हमलों का विश्लेषण किया गया। उनके अध्ययन में बताया गया कि इन हमलों में एक ही अल्फा मेल भेड़िया या उसके ग्रुप की भूमिका थी, न कि कई ग्रुपों ने। पूर्वी यूपी के तीन जिलों प्रतापगढ़, सुल्तानपुर और जौनपुर में साल 1996 के मार्च से अक्टूबर महीने तक भेड़िये का आतंक था। तीनों जिलों में 30 बच्चों की मौत हुई थी। हर तीसरे दिन भेड़िया हमला करता था। हर पाँचवें दिन एक बच्चे की मौत हो रही थी। हर हमले वाली जगह में कम से कम 13 किमी का अंतर होता था।

उस समय इन तीनों में जिलों में भेड़िये को वेयरवुल्फ माना गया (इंसानी भेड़िया- ट्विलाइट सागा सीरीज में ऐसे किरदार दिखे और बॉलीवुड फिल्म भेड़िया में भी)। उसे मनई (Manai) कहा जा रहा था। मनई आम तौर पर इंसान के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला अवधी बोली का शब्द है। ऐसे में उस दौर में कोई अंजान आदमी प्रभावित इलाके के किसी गाँव में दिख जाता था, तो लोग उसे ‘मनई’ समझ कर मारने की कोशिश करते थे। ऐसे में लोगों का घरों से बाहर निकलना भी बंद हो गया था। इस मामले में सामने आया कि शिकारी भेड़िया बेहद ताकतवर था और अपने ग्रुप के मुखिया के जैसा था। ऐसे ग्रुप के मुखिया को ‘अल्फा मेल’ भी कहा जाता है। बाद में उस भेड़िये को शिकारियों ने मार गिराया था।

भेड़ियों से जुड़ी समस्या सुलझाने के लिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण

भेड़ियों के हमलों को नियंत्रित करने के लिए एक लक्षित और सबूत-आधारित दृष्टिकोण की आवश्यकता है। पीड़ितों के लार के नमूनों का डीएनए परीक्षण, चोटों के पैटर्न का विश्लेषण, और स्थानीय मांडवों का सर्वेक्षण जिम्मेदार जानवरों की पहचान में मदद कर सकते हैं। जब एक भेड़िया मानवों पर हमला करने की आदत डाल लेता है, तो उसे तुरंत हटाना आवश्यक हो जाता है। इससे न केवल मानव जीवन की सुरक्षा सुनिश्चित होगी, बल्कि वन्यजीव संरक्षण के प्रयासों को भी समर्थन मिलेगा।

भेड़ियों के हमले कैसे हो सकते हैं कम

हालाँकि, यह समस्या तब तक पूरी तरह से हल नहीं हो सकती जब तक कि भेड़ियों को उनके प्राकृतिक आवास और शिकार का पर्याप्त हिस्सा नहीं दिया जाता। मानव-भेड़िया संघर्ष की समस्या को हल करने के लिए दीर्घकालिक योजनाओं की आवश्यकता है। इसमें जंगली क्षेत्रों का संरक्षण, भेड़ियों के प्राकृतिक शिकार की सुरक्षा, और स्थानीय समुदायों के साथ सहयोग शामिल है। साथ ही, जनता के बीच जागरूकता फैलाने और भेड़ियों के साथ सह-अस्तित्व के उपायों को अपनाने की भी आवश्यकता है।

इस तरह बहराइच में भेड़ियों के हमलों ने न केवल तत्काल हस्तक्षेप की आवश्यकता को उजागर किया है, बल्कि यह भी दिखाया है कि कैसे मानव गतिविधियों का वन्यजीवों पर गहरा प्रभाव पड़ता है। यदि हम इस समस्या का समाधान करना चाहते हैं, तो हमें भेड़ियों को उनके प्राकृतिक अधिकारों का हिस्सा देना होगा, और साथ ही उन्हें हमारे समाज के लिए खतरा बनने से रोकने के उपाय करने होंगे।

‘औक़ात है कि मेरे स्टूडियो में पाकिस्तानी झंडा फहराओगे?’: कभी जो DD यासीन मलिक को करता था कवर, अब वहीं से लताड़ कर भगाए जा रहे पाकिस्तान-परस्त

पत्रकार अशोक श्रीवास्तव ‘DD न्यूज़’ पर ‘दो टूक’ कार्यक्रम लेकर आते हैं। बुधवार (28 अगस्त, 2024) को उनके शो में कुछ ऐसा हुआ कि वो अपना आपा खो बैठे। असल में इस शो में जम्मू कश्मीर में हो रहे विधानसभा चुनावों के मद्देनज़र बहस चल रही थी। इसमें फारूक अब्दुल्लाह की ‘जम्मू कश्मीर नेशनल कॉन्फ्रेंस’ (JKNC) के प्रवक्ता के रूप में नासिर लोन थे। इस दौरान नासिर लोन ने कुछ ऐसा कह दिया जो अशोक श्रीवास्तव को बुरा लगा और उन्होंने ऑन-कैमरा कड़ा विरोध दर्ज कराया।

असल में नासिर लोन ने भारत के राष्ट्रध्वज तिरंगा का अपमान करते हुए जम्मू कश्मीर का पुराना झंडा वापस लाने की बात कही, न्यूज़ चैनल के स्टूडियो में पाकिस्तानी झंडा फहराने की बात की। इस पर शो के एंकर अशोक श्रीवास्तव ने कहा, “हिम्मत है तो चढ़ा कर दिखाइए। अरे, आपका क्या, आपके बाप में दम नहीं है कि पाकिस्तान का झंडा यहाँ लेकर आ जाइए। आप जैसे गद्दार पाकिस्तानी झंडा लेकर आएँ, यहाँ से जूता मार-मार कर निकालूँगा। आपकी औक़ात है, हिम्मत है पाकिस्तान का झंडा लेकर आने की?”

अशोक श्रीवास्तव ने आगे नासिर लोन को फटकारते हुए कहा, “मेरे स्टूडियो में पाकिस्तान का झंडा लेकर आएँगे? किसी की औक़ात है? अगर लगाएँगे न, तो आपके पिछवाड़े में भी वहाँ पता चलेगा। ये अनुच्छेद-370 वाली आपकी सरकार नहीं है कि आप पाकिस्तान का झंडा लहराएँगे यहाँ।” इसके बाद उन्होंने नासिर लोन की आवाज़ बंद करने के लिए टेक्नीशियन को कहा। असल में पूरा मामला JKNC के घोषणा-पत्र से शुरू हुआ। अशोक श्रीवास्तव के अनुसार, इसमें लिखा है कि पाकिस्तान झंडा फहराने वालों और पत्थरबाजों पर से मुक़दमे हटाए जाएँगे।

इस पर नासिर लोन पूछने लगे कि अगर कोई पागल आपके स्टूडियो में आकर पाकिस्तान का झंडा फहरा दे तो क्या आप पाकिस्तानी साबित हो जाएँगे? अशोक श्रीवास्तव इसी चीज को बर्दाश्त नहीं कर सके और उन्होंने लताड़ लगा दी। बता दें कि जम्मू कश्मीर विधानसभा चुनाव के लिए फारूक अब्दुल्ला और उनके बेटे उमर अब्दुल्लाह की पार्टी ने कॉन्ग्रेस पार्टी के साथ गठबंधन किया है। जब कश्मीरी पंडितों का नरसंहार शुरू हुआ था तब फारूक अब्दुल्लाह मुख्यमंत्री थे बाद में वो लंदन में छुट्टियाँ मनाने चले गए थे।

कई लोगों को ‘DD न्यूज़’ का बदला हुआ रूप पसंद नहीं आ रहा है। अशोक श्रीवास्तव ने बाद में अपने एक ‘X’ पोस्ट में स्पष्टीकरण देते हुए लिखा भी कि उन्होंने बहस तीखी होने के दौरान एक पैनलिस्ट के साथ ऐसे शब्दों का प्रयोग कर दिया जो उन्हें नहीं करनी चाहिए थी। उन्होंने इस पर अफ़सोस जताते हुए बताया कि कैसे उनके स्टूडियो में पाकिस्तानी झंडा फहराने की बात की गई थी। अशोक श्रीवास्तव ने लिखा कि एक पत्रकार और पब्लिक ब्रॉडकास्टर से जुड़ा एंकर होने के नाते उन्हें अपने गुस्से और भाषा पर नियंत्रण रखनी चाहिए थी।

हालाँकि, अधिकतर लोगों ने इस पोस्ट की रिप्लाई में अशोक श्रीवास्तव का समर्थन किया और कहा कि पाकिस्तान की तरफदारी करने वालों को ऐसे ही जवाब दिया जाना चाहिए। याद कीजिए, ये वही ‘DD न्यूज़’ है कभी जिसके पत्रकार जम्मू कश्मीर के आतंकी यासीन मलिक और तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की PMO में मुलाकात को कवर करते होंगे, उन्हें उस यासीन मलिक के खिलाफ चुप रहने को कहा जाता होगा। उस समय डीडी न्यूज़ के पत्रकारों को मजबूरी में एक आतंकी को नेता की तरह पेश करना होता था, आज पाकिस्तान की पैरवी करने वाले भगाए जाते हैं।

बछिया को काटने जा रहे थे महफूज और महमूद: UP पुलिस ने रोका तो करने लगे फायरिंग, पाँव में लगी यूपी पुलिस की गोली, गिरफ्तार

उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जिले में मंगलवार (3 सितंबर 2024) को पुलिस और गो-हत्यारों के बीच मुठभेड़ हुई। महफूज़ और महमूद नाम के 2 सगे भाइयों द्वारा चलाई गोली में पुलिसकर्मी बाल-बाल बच गए। हालाँकि, जवाबी कार्रवाई में दोनों भाई घायल हो गए और पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया है। पुलिस ने इनके पास से एक जिन्दा गोवंश, तमंचे, गोलियाँ और धारदार हथियार बरामद किए हैं।

यह घटना फतेहपुर जिले के थाना क्षेत्र सुल्तानपुर घोष की है। यहाँ के थाना प्रभारी राजेंद्र कुमार त्रिपाठी ने मंगलवार को अपने ही थाने में शिकायत दर्ज करवाई है। शिकायत में उन्होंने बताया कि 3 सितंबर को वे अपनी टीम के साथ गश्त कर रहे थे। इसी दौरान उन्हें एक मुखबिर ने बताया कि बाइक सवार 2 लोग भट्ठे के पीछे एक बछिया (गोवंश) को काटने जा रहे हैं।

पुलिस टीम मौके पर पहुँची तो देखा कि बछिया पेड़ से बँधी हुई है और आरोपित उसे काटने की तैयारी कर रहे थे। पुलिस ने तलाशी देने के लिए कहा। पुलिस को देखते ही दोनों आरोपितों ने टीम पर गोलियाँ बरसानी शुरू कर दीं। गोली एक पुलिसकर्मी को छूती हुई निकल गई, जिसमें वह जवान बाल-बाल बच गए। जवाबी कार्रवाई में थाना प्रभारी ने भी गोलियाँ चलाईं।

इस कार्रवाई में दोनों आरोपित घायल हो गए। गोलियाँ उनके पैर में लगीं। घायलों की पहचान 44 वर्षीय महफूज़ और 42 वर्षीय महमूद के तौर पर हुई है। दोनों सगे भाई हैं और फतेहपुर जिले के ही मूल निवासी हैं। तलाशी के दौरान इन दोनों के पास से तमंचे, कारतूस, गाय काटने के लिए धारदार हथियार बरामद हुए। पुलिस ने दोनों आरोपितों से मिली बाइक भी सीज कर ली है।

पुलिस ने गोवंश को जीवित बचा लिया है। दोनों आरोपित भाइयों को इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती कारवाया गया है। इन सभी पर भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 109 के अलावा आर्म्स एक्ट व गोवध अधिनियम के तहत कार्रवाई की गई है। ऑपइंडिया के पास FIR कॉपी मौजूद है। पुलिस मामले की जाँच व अन्य जरूरी कार्रवाई कर रही है।

6 सितंबर को रिलीज नहीं होगी ‘इमरजेंसी’, बॉम्बे हाई कोर्ट ने सुनवाई टाली: बोलीं कंगना रनौत- मैं सबका पसंदीदा निशाना, देश को जगाने की वसूल रहे ‘कीमत’

बॉलीवुड अभिनेत्री और भाजपा सांसद कंगना रनौत ने सोशल मीडिया पर पोस्ट करके अपनी चिंताएँ जाहिर की हैं। उन्होंने यह पोस्ट अपनी फिल्म इमरजेंसी के मामले में बॉम्बे हाई कोर्ट से कोई राहत ना मिलने के बाद किया है। इसमें कंगना रनौत ने बताया है कि वह आजकल सबके निशाने पर हैं और यह कीमत उन्हें देश को जगाने के नाम पर मिली है।

कंगना रनौत ने एक्स (पहले ट्विटर) पर लिखा, “आज मैं सबका पसंदीदा निशाना बन गई हूँ, इस सोए हुए देश को जगाने के लिए आपको यही कीमत चुकानी पड़ती है। वे नहीं जानते कि मैं किस बारे में बात कर रही हूँ, उन्हें इस बात का कोई अंदाज़ा नहीं है कि मैं इतनी चिंतित क्यों हूँ, क्योंकि वो लोग शांति चाहते हैं, वो किसी के साथ खड़े नहीं होना चाहते। वो कूल हैं, चिल हैं।”

उन्होंने आगे कहा, “काश सीमा पर खड़े उस बेचारे सैनिक को भी शांत रहने का यही विशेषाधिकार मिलता होता, काश उसे किसी का पक्ष ना लेना पड़ता, और पाकिस्तानियों/चीनियों को अपना दुश्मन ना मानना ​​पड़ता। वह आपकी रक्षा कर रहा है जबकि आप आतंकवादियों या देशद्रोहियों को लेकर अच्छी बातें कर सकते हैं।”

कंगना ने इसके आगे भी लिखा, “काश वो युवती जिसका अपराध सिर्फ़ इतना था कि वो सड़क पर अकेली थी और उसके साथ बलात्कार हुआ, वो शायद एक शांत और दयालु इंसान थी जो मानवता में विश्वास करती थी लेकिन क्या उसकी मानवता का मोल उसे मिला? काश सभी लुटेरे और अपराधी भी इस शांत और सोई हुई पीढ़ी की तरह ही प्यार और स्नेह रखते लेकिन जिन्दगी की सच्चाई और है। चिंता मत करिए लेकिन वो आपके भी पीछे आ रहे हैं, हम अगर शांत हुए तो वो आपको भी निशाना बनाएँगे, और तब तुम्हे हमारी याद आएगी।”

कंगना रनौत का यह पोस्ट वर्तमान में चल IC814: द कंधार हाइजैक पर चल रहे विवाद और उनकी फिल्म इमरजेंसी की रिलीज रुकने के बाद आई है। उन्होंने इसमें किसी का नाम नहीं लिया है लेकिन उनका निशाना उनको माना जा रहा है जो इस हाइजैक के आतंकियों को लेकर मानवतावादी बातें कर रहे हैं।

इस बीच उनकी फिल्म इमरजेंसी को बॉम्बे हाई कोर्ट से भी राहत नहीं मिली है। बॉम्बे हाई कोर्ट में इस फिल्म के निर्माताओं ने केन्द्रीय फिल्म सेंसर बोर्ड (CBFC) के विरुद्ध याचिका दायर की है। इमरजेंसी के निमाताओं ने कहा है कि सेंसर बोर्ड ने उनकी फिल्म का सर्टिफिकेट दे दिया है लेकिन इसे जारी नहीं कर रहे।

इमरजेंसी फिल्म निर्माताओं ने इस फिल्म को तुंरत सर्टिफिकेट दिए जाने की माँग की है। बुधवार (4 सितम्बर) को बॉम्बे हाई कोर्ट ने इस मामले में सुनवाई की। हालाँकि, इमरजेंसी की रिलीज को इससे कोई राहत नहीं मिली और कोर्ट ने इस मामले में सेंसर बोर्ड 18 सितम्बर, 2024 को तक निर्णय करने का समय दिया है।

इस मामले की सुनवाई करते हुए कहा, “हम इसके चलते कोई निर्देश पारित करने में नहीं कर पा रहे कि इस मामले में मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने जबलपुर सिख संगत के एतराजों पर ध्यान देने का आदेश CBFC को दिया है। अगर हम CBFC को प्रमाण सर्टिफिकेट जारी करने का निर्देश देते हैं, तो हम मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के निर्देश का उल्लंघन करेंगे।”

हाई कोर्ट ने कहा,”न्यायिक अवधारणा की माँग है कि ऐसे आदेश पारित नहीं किए जाने चाहिए। इसलिए, हम याचिकाकर्ता द्वारा मांगे गए प्रमाण सर्टिफिकेट जारी करने के लिए CBFC को निर्देश देने में असमर्थ हैं। हालाँकि, हम वर्तमान याचिका का निर्णय नहीं कर रहे। हम CBFC को 18 अगस्त तक समय दे रहे हैं।”

कंगना रनौत ने बॉम्बे हाई कोर्ट के सवालों को लेकर भी एक पोस्ट किया। उन्होंने कहा कि CBFC को हाई कोर्ट ने लताड़ दिया है।

गौरतलब है कि कंगना रनौत की फिल्म इमरजेंसी पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी द्वारा लगाए गए आपातकाल के समय पर बनाई गई है। इस फिल्म में इंदिरा गाँधी का रोल कंगना रनौत ने स्वयं निभाया है। इस फिल्म को CBFC से सर्टिफिकेट जारी नहीं किया गया है। ऐसे में यह अब पूर्व में निर्धारित 6 सितम्बर, 2024 को नहीं रिलीज हो पाएगी।

स्वास्थ्य जाँच करने बच्चियों के स्कूल में जाता था डॉक्टर डेनियल, करता था अश्लील हरकतें: उसकी प्रिंसिपल माँ क्राइम को छिपाती थी, दोनों गिरफ्तार

तमिलनाडु के त्रिची में मंगलवार (3 सितंबर 2024) को पुलिस ने नाबालिग लड़कियों के यौन शोषण के आरोप में एक सरकारी डॉक्टर को गिरफ्तार किया है। पीड़ित छात्राएँ सरकारी सहायता प्राप्त एक स्कूल के हॉस्टल में रहती थीं। आरोपित डॉक्टर की माँ इस स्कूल की प्रिंसिपल थी, जिसने मामले को दबाने की बहुत कोशिश की। पुलिस ने डॉक्टर की माँ को भी गिरफ्तार कर लिया है।

रिपोर्ट के मुताबिक, घटना त्रिची जिले के पलक्कराई इलाके की है। यहाँ का रहने वाला 31 वर्षीय सैमसन डेनियल एक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में डॉक्टर के पद पर तैनात है। वह अक्सर शहर में ही मौजूद सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त एक प्राइमरी स्कूल के हॉस्टल में जाया करता था। डेनियल वहाँ रहने वाली छात्राओं का हेल्थ चेक किया करता था।

आरोप है कि चेकअप के बहाने वह 5 से 10 साल के उम्र की बच्चियों को बदनीयती से छूता था और उनके साथ अश्लील हरकतें करता था। इन बच्चियों में से कुछ ने डॉक्टर की इन हरकतों की जानकारी अपने अभिभावकों को दी। अभिभावकों ने चाइल्ड हेल्पलाइन 1098 पर कॉल किया और डेनियल की शिकायत की।

चाइल्ड हेल्पलाइन की एक टीम ने सोमवार (2 सितंबर) को हॉस्टल का दौरा किया। टीम ने 42 नाबालिग छात्राओं एवं छात्रों के बयान लिए, जिसमें डॉक्टर डेनियल पर लगे आरोपों की पुष्टि हुई। चाइल्ड हेल्पलाइन की रिपोर्ट पर डॉक्टर डेनियल के खिलाफ FIR दर्ज कर ली गई। मंगलवार (3 सितंबर) को पुलिस ने आरोपित डॉक्टर को गिरफ्तार कर लिया है।

जाँच के दौरान पुलिस को पता चला कि आरोपित की 54 वर्षीया माँ ग्रेस सगायारानी इस स्कूल की प्रिंसिपल है। उन्होंने अपने बेटे को बचाने और मामले को दबाने की तमाम कोशिशें की। पुलिस ने डॉक्टर की माँ को भी गिरफ्तार कर लिया है। आरोपितों पर यौन शोषण सहित अन्य धाराओं में कार्रवाई की गई है।

हिंदू विलेन, इस्लाम अच्छा… वामपंथी प्रोपेगेंडा वाले फिल्म स्कूल के ‘अनुभव’ से निकला है ‘IC814’, इसलिए लव स्टोरी वाला बॉलीवुड प्रेम कहानी खत्म करने वाले आतंकियों से भी निभाता है मोहब्बतें

बॉलीवुड में प्रेम कहानियाँ दिखाने का चलन रहा है। विषय कोई भी, कितना ही गंभीर हो, बॉलीवुड वाले कहीं न कहीं से प्रेम कहानी को खोज लाते हैं और फिर फिल्म का अंत उसी कहानी के ईर्द-गिर्द करते हैं। हाल में नेटफ्लिक्स पर एक सीरिज आई- ‘आईसी 814- द कंधार हाईजैक।’ इसमें भी फिल्म निर्देशक अनुभव सिन्हा ने एक लव स्टोरी डाली लेकिन निर्देशकों ने इस सीरिज में इस लव स्टोरी को तवज्जों देना जरूरी नहीं समझा, शायद इसलिए क्योंकि उनका ध्यान इस्लामी आतंकियों की पहचान को ढाँकने में ज्यादा था जिन्होंने प्रेम कहानी का अंत किया।

अगर वो इस फिल्म में दिखाई गई प्रेम कहानी को मुख्य तौर पर दिखाते तो न उनका हिंदूफोबिक नैरेटिव चल पाता और न ही वो आतंकियों के कुकर्मों को धो पोंछने में सफल हो पाते। ये कहानी जिसे दिखाने से फिल्म के निर्देशकों ने परहेज किया वो रुपिन कात्याल और रचना कात्याल की थी।

हाईजैक के दौरान आतंकियों ने अपनी शर्त मनवाने के लिए एक नवयुवक की बर्बरता से गला रेतकर हत्या की थी। शायद संख्या के सुनने में ये ज्यादा भयावह न लगे कि 174 यात्रियों में से आतंकियों ने 1 को मार डाला, लेकिन अगर रचना की नजर से देखेंगे तो उनके लिए वो 1 व्यक्ति ही उनकी दुनिया था।

रचना कात्याल और रुपिन की कहानी

हाईजैक के समय रुपिन और रचना अपने हनीमून पर जा रहे थे। मात्र 22 दिन पहले ही उनकी शादी हुई थी। जाहिर है दोनों ने आगे जीवन के लिए कई सपने देखे होंगे, लेकिन उन आतंकियों ने रचना-रुपिन के सारे सपनों को चकनाचूर कर दिया। हाईजैक के बाद पहले रुपिन को अलग ले जाया गया और उसके बाद अपनी बात मनवाने के लिए उन्हें मौत के घाट उतार दिया गया। रचना बदहवास हालत में बार-बार अपने पति से मिलने के लिए मिन्नतें करती रहीं लेकिन वो आतंकी जिन्हें IC814 में दयालु और बार बार ये कहते दिखाया गया है- ‘हमें आपसे निजी दुश्मनी नहीं है’, उन्होंने एक भी बार रचना की ओर देखा तक नहीं। किसी आतंकी ने उनकी कोई बात नहीं सुनी।

7 दिन बाद जब सारे यात्री विमान से बाहर आए तब रचना बेसुध हो चुकी थीं। उन्हें बाकी कुछ याद नहीं था वो सिर्फ अपने पति को खोज रही थीं। विमान से उतरने के बहुत देर बाद तक उन्हें नहीं बताया गया था कि उनके पति अब दुनिया में नहीं हैं। सबको डर था कि कहीं रचना सदमे में न चली जाएँ। लोगों का डर सही था रचना को जब अपने पति की हत्या का पता चला तो वो एकदम शांत हो गईं। उन्हें कुछ समझ ही नहीं आया कि हुआ क्या। आखिर में रचना को अवसाद से निकालने में उनके सास-ससुर ने उनकी मदद की।

क्यों छिपाए गए फिल्म में आतंकियों के नाम

अब बॉलीवुड फिल्म निर्माता अनुभव सिन्हा चाहते तो इस कहानी को प्रमुखता से दिखाकर बता सकते थे कि उस समय यात्रियों पर क्या बीती होगी, रचना कैसे दर्द से उभरी होंगी, लेकिन हुआ क्या? इस कहानी को कुछ मिनटों में समेटकर उन्होंने पूरी ताकत इस्लामी आतंकियों के बर्बर चेहरे को धो पोंछने में लगा दी। अनुभव सिन्हा ने अपनी फिल्म में आतंकियों के असली नाम तक छिपाए जबकि गृह मंत्रालय की साइट से लेकर सामान्य मीडिया रिपोर्ट तक में उनके नाम का उल्लेख था। सवाल उठने पर तर्क दे दिया गया कि सीरिज में सब असलियत दिखाई गई इसलिए वही कोडनेम इस्तेमाल हुए जो आतंकियों ने रखे थे।

अब ये बात अगर मान भी ली जाए कि फिल्म में भोला-शंकर जैसे नाम सिर्फ हकीकत दिखाने के लिए रखे गए थे, तो क्या ये प्रश्न नहीं उठता कि अगर निर्देशक ने कोडनेम फिल्म में इतनी प्रमुखता से बार-बार दिखाए तो वो ये भी दिखाएँ कि उन आतंकियों का असली नाम क्या था? एक तो अनुभव सिन्हा ने ऐसा किया नहीं, ऊपर से जब लोगों ने सवाल खड़े किए तो उन्होंने अपने ऊपर लगे आरोपों का जवाब देना तक नहीं समझा।

खैर! अनुभव सिन्हा ने कुछ नया नहीं किया है। बॉलीवुड में हिंदूफोबिक कंटेंट दिखाने का काम और इस्लाम मजहब का महिमामंडन दशकों से होता रहा है। फिल्मों में भगवा पहनने वाले, टीका लगाने वाले को बलात्कारी, किडनैपर दिखाना और इस्लाम मानने वालों को इंसानियत का पहरेदार दिखाना बॉलीवुड का पुराना प्लॉट रहा है।

इस सीरिज में भी इसके अलावा और कुछ नहीं हुआ है। तत्कालीन विदेश मंत्री जसवंत सिंह ने अपनी किताब- अ कॉल टू ऑनर- इन सर्विस ऑफ इमरजेंस इंडिया में साफ कहा था कि इस मामले में आईएसआई का सीधा हाथ था। उन्होंने उन लोगों को कंधार में भेजा था जिनके दोस्त या रिश्तेदार भारत में बंद थे। बावजूद इस तथ्य के अनुभव सिन्हा ने इन बातों को सीरिज में दिखाना जरूरी तक नहीं समझा। उन्होंने इन बातों को छोटे-छोटे दृश्यों में समेटा और अपना कैमरा आतंकियों के उन चेहरों को दिखाने पर फोकस किया जहाँ वो परेशान थे, भावुक थे, यात्रियों से हँसी-मजाक कर रहे थे, अपने अपनों की याद में गुमसुम थे, इंसानियत दिखा रहे थे।

यात्रियों के दर्द को दिखाने में विफल हुई IC814

आतंकियों को इंसान दिखाने के प्रयास में और भारतीय सरकार को घेरने की कोशिश में वो न तो यात्रियों द्वारा झेले गए ट्रॉमा को समझा पाए और न ही उस महिला के दर्द को ढंग से दिखा पाए जिसने इस्लामी बर्बरता के कारण अपने जीवनसाथी को खो दिया।

दिलचस्प बात ये है कि ये बॉलीवुड वही है जो कश्मीरी पंडितों के दर्द को दिखाने के नाम पर एक प्रेम कहानी को परोस देता है और बड़ी चालाकी से महिलाओं के साथ हुए गैंगरेप और शरीर को चीरकर तीन हिस्सों में फेंकने वाली बर्बरता को छुपा लेता है। ये वही बॉलीवुड है जो राजी फिल्म में हिंदुस्तानी-पाकिस्तानी की लव स्टोरी दिखाने लगता है और एक नायिका को इतना लाचार बता देता है जैसे उसे हिंदुस्तान से होने का पछतावा हो।

इसके अलावा फिल्म से तिरंगे गायब करके वहाँ पाकिस्तानी झंडे दिखाने में बॉलीवुड गुरेज नहीं करता लेकिन जब आतंकी घटना में आतंकी का असली नाम बताने पर बात आए तो उन्हें सरकारी दस्तावेज जैसी बातें याद आ जाती हैं।

न दर्द दिखाया, न क्रूरता

क्या आईसी814 को बनाते समय एक भी बात पीड़ित से उनका दर्द नहीं पूछा गया? शायद नहीं। क्योंकि अगर पूछा गया होता तो निर्माताओं को पता होता उस समय किस डर से लोग गुजर रहे थे। वो डर इतना भयानक था कि घटना के 24 साल बीत जाने के बाद वो लोग इस मुद्दे पर बनी फिल्म भी नहीं देखना चाहते।

पूजा उन्हीं लोगों में से एक हैं। उस प्लेन में उस दिन पूजा भी थीं। उनकी शादी राकेश से हुई थी। दोनों नेपाल हनीमून पर गए थे। पूजा ने मीडिया को साफ बताया कि प्लेन के अंदर मौजूद हाईजैकर्स मुसलमान थे, लेकिन वे एक दूसरे को बर्गर, डॉक्टर, भोला, शंकर और चीफ नाम से बुला रहे थे।

अब पूजा जिन्हें प्लेन के भीतर बाहर का कुछ भी नहीं पता था उन्हें भी समझ आ गया था कि आतंकी मुसलमान हैं, लेकिन इस घटना पर 24 साल बाद फिल्म बनाने वाले अनुभव सिन्हा को ये जरूरी नहीं लगा।

पूजा ने बताया कि वो 7 दिन उन लोगों के जीवन के सबसे खौफनाक दिन थे। लोगों को प्लेन में पैनिक अटैक पड़ रहा था। एक डॉक्टर नाम का हाईजैकर पूरे दिन लोगों को इस्लाम को लेकर स्पीच देता था। वह सबसे बस यही कहता था इस्लाम मजहब सबसे अच्छा है और सबको उसे कबूल लेना चाहिए।

अब जिस किसी ने इस सीरिज को देखा है वो बता सकता है कि कहीं भी आतंकी को प्लेन में इस तरह की कोई बातचीत करते नहीं दिखाया गया है उलटा दिखाने की कोशिश ये हुई है कि वो हाईजैकर्स अपने अपनों को छुड़ाने के लिए मजबूर थे और उन्होंने इसीलिए प्लेन हाईजैक किया। उस प्लेन में जिन्होंने वो खौफनाक दिन गुजारे वो मानते हैं कि फिल्म उस खौफ को दिखाने में विफल हुई है।