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वक्फ बिल पर JPC ने माँगे सुझाव, मुस्लिम संगठनों से भी पक्ष रखने को कहा: जानिए कौन-कैसे बन सकते हैं इस प्रक्रिया का हिस्सा

वक्फ बोर्ड की मनमानी पर लगाम कसने के लिए केंद्र की मोदी सरकार द्वारा लाए गए वक्फ (संशोधन) अधिनियम 2024 पर को चर्चा के लिए संयुक्त संसदीय समिति (JPC) के पास भेजा गया है। जेपीसी की इस पर शुक्रवार (30 अगस्त 2024) को दूसरी बैठक हुई। लोकसभा सचिवालय ने एक विज्ञापन निकालकर इस बिल पर अपना पक्ष रखने के लिए कहा है। साथ ही मुस्लिम संगठनों को भी आमंत्रित किया है।

ऑल इंडिया सुन्नी जमीयत-ए-उलेमा मुंबई, इंडियन मुस्लिम्स फॉर सिविल राइट्स नई दिल्ली, उत्तर प्रदेश सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड और राजस्थान मुस्लिम वक्फ बोर्ड के प्रतिनिधि शुक्रवार को जेपीसी की बैठक में बिल को लेकर अपना-अपना पक्ष रखे। इससे पहले 31 सदस्यीय जेपीसी की पहली बैठक 22 अगस्त को हुई थी, जो काफी हंगामेदार रही थी।

बैठक में भाजपा और विपक्षी सांसदों के बीच बिल के उद्देश्य और इसके प्रावधानों को लेकर तीखी बहस हुई थी। उसी बैठक में विपक्षी सांसदों की तरफ से यह कहा था कि इस बिल से जुड़े सभी हितधारकों के साथ व्यापक विचार-विमर्श के लिए अखबारों में विज्ञापन दिया जाना चाहिए और उनके सुझाव आमंत्रित करना चाहिए। इसे संसद में 8 अगस्त को पेश किया गया था।

भाजपा के सांसद जगदंबिका पाल की अध्यक्षता वाली इस समिति ने इस बिल से संबंधित लोगों के विचार एवं सुझाव माँगे हैं। इनमें आम लोग, गैर-सरकारी संगठन (NGO), विशेषज्ञ, हितधारी और संस्थान शामिल हैं। जो लोग समिति को अपना सुझाव भेजने के लिए इच्छुक हैं, वे हिंदी या अंग्रेजी में अपने सुझाव की दो कॉपी लोकसभा सचिवालय को भेज सकते हैं।

इसका पता है- जॉइंट सेक्रेटरी(JM), लोकसभा सेक्रेटेरियट, रूम नंबर 440, पार्लियामेंट हाऊस एनेक्सी, नई दिल्ली। इसका पिन कोड 110001 है। फैक्स के लिए नंबर 01123017709 भी जारी किया गया है। इसे [email protected] पर भी ईमेल किया जा सकता है। सुझाव अगले 15 दिनों के भीतर पहुँच जाने चाहिए। इसके बाद ही इस पर विचार किया जा सकेगा।

सुझाव के लिए  लोक सभा सचिवालय की ओर से जारी किए गए विज्ञापन में कहा गया है कि यह सुझाव समिति के रिकॉर्ड का हिस्सा होगा और इसे गोपनीय माना जाएगा। विज्ञापन में यह भी कहा गया है कि जो लोग अपना सुझाव भेजने के अलावा समिति के समक्ष प्रस्तुत होना चाहते हैं, वे इसके बारे में लिख सकते हैं। उन्हें इसका मौका दिया जाएगा।

वक्फ संशोधन विधेयक जेपीसी अध्यक्ष और भाजपा सांसद जगदंबिका पाल ने कहा, “हमने पहली बैठक में भी कहा था कि अगर सरकार ने वक्फ संशोधन 2024 को जेपीसी के पास भेजा है तो हम देश के सभी वक्फ बोर्ड को बुलाएँगे, जिससे सभी की राय को इसमें शामिल किया जा सके। सरकार का मानना ​​है कि एक बेहतर वक्फ संशोधन बिल आए।”

उन्होंने आगे कहा, “ऑल इंडिया सुन्नी जमीयत-उल, ऑल इंडिया मुस्लिम सिविल लिबर्टीज के पूर्व सांसद दीप साहब को बुलाया गया है, साथ ही यूपी और राजस्थान के दो सुन्नी वक्फ बोर्ड को भी बुलाया गया है। हम सभी सदस्य से मिलकर एक व्यापक बिल लाएँगे जो इस वक्फ संशोधन बिल के लिए और देश के लिए बेहतर हो।”

शेख हसीना को हटाने के नाम पर शुरू की जो हिंसा उससे बांग्लादेश में 400 हुए अंधे, 1000+ की हत्या: अंतरिम सरकार में भी नहीं थम रहा खून खराबा

बांग्लादेश में मोहम्मद युनुस की अंतरिम सरकार आने के बाद शेख हसीना की पार्टी के कार्यकर्ताओं से चुन चुन कर बदला लिया जा रहा है। बांग्लादेश के बड़े शहर चटगाँव में खुलेआम आवामी लीग के दो कार्यकर्ताओं की हत्या हमलावरों ने कर दी। इससे पहले हिन्दुओं को बड़े स्तर पर हिंसा का निशाना बनाने की खबर बांग्लादेश के अलग-अलग हिस्सों से आती रही हैं। वहीं अब सामने आया है कि हसीना सरकार का तख्तापलट करने के लिए की गई हिंसा में 1000 लोगों की मौत हुई है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, चटगाँव के हथाज़री उपजिला में गुरुवार (29 अगस्त, 2024) दो युवकों की हत्या कर दी गई। इनकी पहचान मसूद कैसर (32) और मोहम्मद अनीस (38) के तौर पर हुई है। यह दोनों अब सत्ता से बाहर हो चुकी शेख हसीना की पार्टी के सक्रिय कार्यकर्ता थे। इन दोनों की हत्या बाइक पर बैठ कर दो आए हमलावरों ने कर दी।

हमलावरों ने इन्हें गोली मार दी और फिर घटनास्थल से भाग गए। इनमें एक की मौके पर मौत हो गई जबकि दूसरा यहाँ से भागते हुए मारा गया। आवामी लीग कार्यकर्ताओं की हत्या करने वालों का अभी तक कोई सुराग नहीं लग पाया है। पुलिस इस मामले में अब जाँच कर रही है।

इस घटना ने बांग्लादेश में सत्ता परिवर्तन के बाद आवामी लीग के कार्यकर्ताओं को लेकर जताई जा रही चिंताओं को और गहरा कर दिया है। इससे पहले भी आवामी लीग के कई नेताओं और कार्यकर्ताओं को शेख हसीना के बांग्लादेश छोड़ने के बाद निशाना बनाया गया था। हिन्दुओं के खिलाफ भी बांग्लादेश में लगातार हिंसा हुई है।

हिंसा में मारे गए 1000 लोग

बांग्लादेश की अंतरिम सरकार में स्वास्थ्य महकमा संभाल रही नूरजहाँ बेगम ने कहा है कि बीते दिनों देश में हिंसा के कारण लगभग 1000 लोग मारे गए हैं। इसके अलावा 400 लोग इन प्रदर्शन में हुई हिंसा के कारण अंधे हो गए हैं। नूरजहाँ ने बताया है कि शेख हसीना को हटाने के लिए हुई हिंसा के दौरान बड़ी संक्या संख्या में पुलिसकर्मी भी निशाना बने हैं। वर्तमान में कई पुलिसकर्मियों का बांग्लादेश के अस्पतालों में इलाज चल रहा है।

अलग-अलग एजेंसियों ने इस दौरान देश में हुई मौतों का अलग-अलग अनुमान दिया है। सभी का आँकड़ा 600-1000 के बीच है। बांग्लादेश में जुलाई, 2024 में चालू हुई छात्रों का आरक्षण विरोधी आंदोलन जल्द ही शेख हसीना सरकार के विरोध में बदल गया था। इस आंदोलन को जमात-ए-इस्लामी और BNP ने हाइजैक कर लिया था। अगस्त के शुरूआती दिनों तक चले इस आन्दोलन के दौरान बांग्लादेश के भीतर बड़े पैमाने पर पुलिसकर्मियों पर हमला किया गया था। इस दौरान बाकी लोगों को भी निशाना बनाया गया था।

बढ़ती हिंसा के बाद 5 अगस्त,2024 को प्रधानमंत्री शेख हसीना ने इस्तीफ़ा दे दिया था और भारत चली आई थीं। इसके बाद मोहम्मद युनुस को बांग्लादेश की अंतरिम सरकार का प्रमुख बनाया गया था। हालाँकि, इस सरकार के आने के बाद भी बांग्लादेश में शान्ति बहाली नहीं हो पाई है। युनुस सरकार के सत्ता में आने के हफ़्तों बाद भी बांग्लादेश में अल्पसंख्यक हिन्दुओं के विरुद्ध लगातार हिंसा जारी है। इसके अलावा शेख हसीना की पार्टी मंत्री-कार्यकर्ता भी निशाने पर हैं।

सागरमाला की शान बनेगा पालघर, पैदा होंगे 12 लाख रोजगार, 17 हजार हेक्टेयर में होगा फैला: जिस वधावन बंदरगाह की PM मोदी ने रखी नींव, उसके बारे में जानिए सब कुछ

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी शुक्रवार (30 अगस्त, 2024) को महाराष्ट्र के दौरे पर हैं। यहाँ वह ग्लोबल फिनटेक समिट और वधावन पोर्ट के शिलान्यास में शामिल हुए हैं। पीएम मोदी ने पालघर में बनाए जाने वाले इस महत्वाकांक्षी पोर्ट का शिलान्यास किया है। यह परियोजना भारत की महत्वपूर्ण इन्फ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं में से एक है। इसके जरिए भारत समुद्री यातायात में लम्बी छलाँग लगाने की योजना बना रहा है। बड़ी लागत से बन रहा यह पोर्ट सागरमाला परियोजना का हिस्सा है। एक बार बन जाने पर यह देश के मालवहन के लिए सहायक होगा।

क्या है वधावन पोर्ट परियोजना?

भारत का विदेशी व्यापार बीते कुछ वर्षों में तेजी से बढ़ा है। इस कारण से आयात-निर्यात में भी तेज बढ़ोतरी हुई है। आयात निर्यात में होने वाली बढ़ोतरी से लगातार भारत में पहले से मौजूद बंदरगाहों पर दबाव बढ़ रहा है। साथ ही अब नए और बड़े बंदरगाहों की जरूरत भी महसूस की जा रही है। इसी क्रम में महाराष्ट्र में वधावन पोर्ट बनाने का निर्णय केंद्र सरकार ने लिया है। इस नए बंदरगाह को जून, 2024 में मोदी सरकार की कैबिनेट बैठक में मंजूरी मिली थी। इसे सागरमाला परियोजना के तहत विकसित किया जा रहा है।

वधावन पोर्ट को पालघर जिले में दहानू में बनाया जा रहा है। इसे बनाने में ₹76,000 करोड़ से अधिक लागत आने का अनुमान है। इसे भारत सरकार और महाराष्ट्र सरकार मिल कर बना रही हैं। भारत सरकार की तरफ से जवाहरलाल नेहरू पोर्ट अथॉरिटी और महाराष्ट्र सरकार मेरीटाइम बोर्ड के जरिए इसमें भागीदार बन रही है। इस पोर्ट में केंद्र सरकार की 76% हिस्सेदारी होगी। वधावन बंदरगाह को पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप (PPP) के अंतर्गत बनाया जा रहा है।

क्या है खासियत?

वधावन पोर्ट को 17,000 हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में विकसित किया जाएगा। यह भारत का 13वां और सबसे बड़ा पोर्ट होगा। इसके लिए समुद्र से भी 1448 हेक्टेयर जमीन का विकास किया जाएगा। वधावन पोर्ट में कुल 9 कंटेनर टर्मिनल होंगे। हर एक टर्मिनल 1000 मीटर लंबा होगा। इसके अलावा वधावन पोर्ट में गैस और लिक्विड पदार्थों के लिए अलग से बर्थ बनाई जाएगी। तटरक्षक बलों के लिए भी अलग से बर्थ की व्यवस्था होगी। इस पोर्ट पर एक बड़ा कार्गो भंडारण क्षेत्र बनाया जाएगा।

वधावन पोर्ट हर साल लगभग 300 मिलियन टन मालवहन क्षमता वाला होग। एक बार तैयार होने पर यह पोर्ट प्रति वर्ष 2.3 करोड़ से अधिक 25 फीट वाले कंटेनर को संभाल सकेगा। वधावन पोर्ट के बन जाने से मुंबई के न्हावा शेवा (JNPT) बंदरगाह पर दबाव कम हो सकेगा। वधावन पोर्ट भारत-मध्य पूर्व-यूरोप गलियारे का भी महत्वपूर्ण हिस्सा होगा। एक बार निर्मित होने पर यह बंदरगाह विश्व के दस सबसे बड़े बंदरगाहों में से एक होगा। अभी मुंद्रा पोर्ट भारत का सबसे बड़ा बंदरगाह है जो विश्व में 26वें नम्बर पर है।

क्या होगा इससे फायदा?

सरकार का अनुमान है कि वधावन पोर्ट के कारण लगभग 12 लाख रोजगार पैदा होंगे। साथ ही बड़ी संख्या में बड़े जहाज भारत आने के कारण समुद्री भाड़े की कीमतों में भी कमी आएगी। इसके अलावा क्षमता बढ़ जाने के कारण बड़े जहाज यहाँ आकर अपनी आपूर्तियाँ ले सकेंगे, इससे भी कमाई होगी। वधावन पोर्ट बन जाने से पालघर के इस इलाके का भी काफी विकास होगा और यहाँ की आबादी के लिए स्वरोजगार के नए मौके भी खुलेंगे। इस परियोजना के निर्माण के दौरान ही बड़ी संख्या में लोगों की जरूरत होगी।

क्या होता है ‘स्त्रीधन’, जिसे वापस नहीं माँग सकता पिता, जिस पर पति का नहीं होता अधिकार: सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा- महिला ही इसकी मालकिन

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि ‘स्त्रीधन’ महिला की विशिष्ट संपत्ति है और उसके पिता महिला की स्पष्ट अनुमति के बिना उसके ससुराल वालों से स्त्रीधन की वसूली का दावा नहीं कर सकते। जस्टिस जेके माहेश्वरी और जस्टिस संजय करोल की पीठ ने एक तलाकशुदा महिला के पिता द्वारा दर्ज कराई गई FIR को खारिज कर दिया। इसमें महिला के पूर्व ससुराल वालों से उसके ‘स्त्रीधन’ (उपहार और आभूषण) को वापस दिलाने की माँग की गई थी।

अदालत ने कहा, “इस न्यायालय द्वारा विकसित न्यायशास्त्र के तहत स्त्री (पत्नी या पूर्व पत्नी) ‘स्त्रीधन’ की एकमात्र स्वामी है। इसमें कहा गया है कि पति का इस पर कोई अधिकार नहीं है और इसी से यह निष्कर्ष निकाला जाना चाहिए कि जब तक बेटी जीवित, स्वस्थ और अपने ‘स्त्रीधन’ की वसूली के लिए कदम उठाने के फैसले लेने में पूरी तरह सक्षम हो, तब तक इस पर पिता का भी कोई अधिकार नहीं है।”

पीठ ने कहा, “हम पाते हैं कि कानून ऐसी स्थिति के लिए प्रावधान करता है जहाँ एक महिला कानूनी रूप से अपनी पसंद के व्यक्ति को कोई भी ऐसा कार्य करने के लिए अधिकार दे सकती है, जिसे वह स्वयं कर सकती है। पावर ऑफ अटॉर्नी अधिनियम, 1882 की धारा 5 के ‘विवाहित महिलाओं की पावर ऑफ अटॉर्नी’ का प्रावधान है।” कोर्ट ने माना कि पिता-पुत्री के बीच इस तरह का कोई एग्रीमेंट नहीं था।

सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि यह नहीं माना जा सकता कि विवाह के समय दिया जाने वाला दहेज और पारंपरिक उपहार दुल्हन के सास-ससुर को सौंप दिया जाता है और इस पर दहेज निषेध अधिनियम 1961 की धारा 6 के प्रावधान लागू होंगे। इस धारा में प्रावधान है कि विवाह के संदर्भ में किसी महिला के अलावा किसी अन्य व्यक्ति द्वारा प्राप्त किया गया कोई भी दहेज एक निश्चित अवधि के भीतर उस महिला को हस्तांतरित किया जाना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि ऐसा दहेज, जब तक हस्तांतरित नहीं किया जाता, महिला के लाभ के लिए ट्रस्ट के रूप में रखा जाएगा। इसे हस्तांतरित न करने की स्थिति में कारावास और/या जुर्माने का प्रावधान है। न्यायालय ने कहा, “बोब्बिली रामकृष्ण राजा यादाद एवं अन्य बनाम आंध्र प्रदेश राज्य मामले में इस न्यायालय ने माना है कि विवाह के समय दहेज और पारंपरिक उपहार देने से यह अनुमान नहीं लगाया जा सकता कि ऐसी वस्तुएँ माता-पिता-ससुर को सौंपी गई हैं, जिससे दहेज निषेध अधिनियम 1961 की धारा 6 के तत्व आकर्षित होते हैं।”

न्यायालय ने कहा कि महिला के तलाक के पाँच साल से अधिक समय के बाद और उसके दोबारा विवाह करने के तीन साल बाद दर्ज की गई एफआईआर में कोई दम नहीं है। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने पिता द्वारा दर्ज कराई गई FIR को रद्द कर दिया। दरअसल, शिकायतकर्ता ने अपनी बेटी के पूर्व ससुराल वालों के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई, जिसमें उन पर उसका ‘स्त्रीधन’ रोकने का आरोप लगाया था।

पिता ने आरोप लगाया था कि साल 1999 में उसकी बेटी की शादी के समय उसे 40 कसुला सोना और अन्य सामान शामिल दिया गया था। बेटी ने साल 2016 में अपने पति को तलाक दे दिया था और 2018 में संयुक्त राज्य अमेरिका में दोबारा शादी कर ली थी। पिता ने बेटी के पूर्व ससुराल वालों के खिलाफ जनवरी 2021 में मामला दर्ज करके इस स्त्रीधन को वापस दिलाने की माँग की थी।

स्त्रीधन को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने पहले भी दिया था निर्णय

विवाहित महिलाओं को मिलने वाले ‘स्त्रीधन’ को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि स्त्रीधन किसी दंपत्ति (पति एवं पत्नी) की संयुक्त संपत्ति नहीं बन सकता। यह पत्नी का धन होता है और पति का अपनी पत्नी की संपत्ति पर कोई अधिकार नहीं है। पति इस धन का इस्तेमाल संकट के समय कर सकता है, लेकिन उसे उसे वापस करना होगा।

स्त्रीधन से संबंधित एक वैवाहिक विवाद का निपटारा करते हुए सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस संजीव खन्ना और दीपांकर दत्ता की खंडपीठ ने कहा कि पूरे स्त्रीधन पर सिर्फ महिला का अधिकार है। कोर्ट ने कहा कि उसके विवाह से पहले, विवाह के दौरान या विवाह के बाद महिला को दिए गए उपहार जैसे कि पैसा, आभूषण, जमीन, बर्तन और माता-पिता, सास-ससुर, रिश्तेदारों और दोस्तों से मिले अन्य उपहार स्त्रीधन हैं।

पीठ ने कहा, “यह एक स्त्री की पूर्ण संपत्ति है, जिसे वह अपनी मर्जी से इस्तेमाल करने का पूरा अधिकार रखती है। पति का उसके स्त्रीधन पर कोई नियंत्रण नहीं है। वह अपने संकट के समय इसका इस्तेमाल कर सकता है, लेकिन उसका नैतिक दायित्व है कि वह इसे या इसके मूल्य को अपनी पत्नी को लौटाए। यह संयुक्त संपत्ति नहीं है। स्त्रीधन पर पति का मालिक के रूप में कोई अधिकार या स्वतंत्र प्रभुत्व नहीं है।”

अदालत ने कहा कि यदि स्त्रीधन का दुरुपयोग किया जाता है तो किसी व्यक्ति या उसके परिवार के सदस्यों पर IPC की धारा 406 के तहत आपराधिक विश्वासघात का मुकदमा चलाया जा सकता है। कोर्ट ने यह भी कहा कि ऐसे मामलों में विवाद का निबटारा आपराधिक मामलों की तरह उचित संदेह से परे सबूत के आधार पर नहीं, बल्कि संभावनाओं की अधिकता के आधार पर किया जाना चाहिए।

दरअसल, केरल की रहने वाली एक महिला ने आरोप लगाया था कि जब वह शादी करके ससुराल आई तो पहले ही दिन उसके पति ने उसके सारे गहने छीन लिए। जब दोनों के बीच रिश्ता खराब हो गया और अलग होने का फैसला लिया तो उसने पति से अपने गहने वापस माँगे, लेकिन पति ने वो गहने उसे नहीं दिए। इसके बाद इसे वापस पाने के लिए पारिवारिक न्यायालय का दरवाजा खटखटाया।

इस मामले में साल 2009 में एक पारिवारिक न्यायालय ने महिला के पक्ष में फैसला सुनाया और उसके पति को उसे 8.9 लाख रुपए देने का आदेश दिया। हालाँकि, इस फैसले के खिलाफ पति केरल उच्च न्यायालय चला गया। हाई कोर्ट ने पारिवारिक न्यायालय के आदेश को रद्द कर दिया और कहा कि पत्नी यह साबित करने में विफल रही कि उसका स्त्रीधन उसके पति ने छीन लिया था।

महिला ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। साक्ष्यों की जाँच के बाद सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पारिवारिक अदालत का फैसला सही था। हाई कोर्ट ने अदालत में देरी से आने के लिए महिला की ईमानदारी पर संदेह करके गलती की। शीर्ष न्यायालय ने निर्देश दिया कि पारिवारिक अदालत के फैसले के 15 साल बीत गए हैं। इसलिए पति अपने पत्नी को अब 25 लाख रुपए का भुगतान करे।

क्या होता है स्त्रीधन?

आधुनिक कानून बनने से पहले देश में महिलाओं को संपत्ति का अधिकार नहीं था। उसकी शादी-विवाह में जो दहेज दी जाती थी, उसे उसका हिस्सा मान लिया जाता था। अब महिलाओं को तमाम तरह के अधिकार दिए गए हैं। हालाँकि, महिलाएँ अपने पिता की संपत्ति में आज भी हिस्सा नहीं माँगती और दहेज के रूप में पिता से मिली रकम और शादी खर्च को ही अपना हिस्सा मान लेती हैं।

हालाँकि, समय के साथ सोच में बदलाव हुआ है। इसके पीछे कानून में बदलाव एक महत्वपूर्ण कारण है। अब बेटियों को अपने पिता की संपत्ति में भाइयों की तरह ही बराबर का अधिकार है। इसके साथ ही ससुराल के धन में भी उसके अधिकार निर्धारित किए गए हैं। इसके अलावा, कानून में उसे अन्य कई तरह के अधिकार दिए गए हैं। हिंदू कानूनों में इनकी विस्तृत चर्चा है।

इन्हीं में से एक है स्त्रीधन की अवधारणा। हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 के अधिनियम के तहत महिलाओं को ‘स्त्रीधन’ का पूर्ण मालिक बताया गया है। हिंदू कानून के तहत स्त्रीधन में चल या अचल, किसी तरह की संपत्ति हो सकती है। स्त्रीधन में महिला की शादी से पहले, शादी के दौरान और शादी के बाद मिली संपत्ति को शामिल किया गया है।

शादी से पहले अगर महिला को माता-पिता या किसी अन्य रिश्तेदार आदि से उपहार में मिली संपत्ति स्त्रीधन है। इसी तरह शादी के दौरान शादी के दौरान मिली संपत्ति एवं उपहार भी स्त्रीधन है। उसके बच्चे के जन्म के दौरान बच्चे को जो उपहार या संपत्ति मिलती है, वह स्त्रीधन मानी गई है। अगर शादी के बाद महिला के पति की मौत हो जाती है तो उसे विधवा के रूप में जो उपहार या संपत्ति मिलती है, वह स्त्रीधन है।

स्त्रीधन, दहेज एवं स्त्री की संपत्ति में अंतर

यहाँ स्त्रीधन और स्त्री की संपत्ति में अंतर है। स्त्रीधन वह संपत्ति है, जिसे महिला अपने अनुसार खर्च कर सकता है या अपनी इच्छा के अनुसार उसके स्वामित्व का हस्तांतरण कर सकती है। इसी तरह, जिस संपत्ति पर महिलाओं की सीमित शक्ति होती है, जिसका उपयोग तो किया जा सकता है, लेकिन उसकी इच्छानुसार उसका हस्तांतरण (अधिकार का बदलाव) नहीं किया जा सकता वह स्त्री संपत्ति है।

स्त्रीधन दहेज से अलग होता है। स्त्रीधन में महिला को उसके परिवार, उसके पति और उसके पति के परिवार द्वारा दिए जाने वाले स्वैच्छिक उपहार शामिल होते हैं। यह जोर-जबरदस्ती या किसी दबाव में नहीं दिया जाता है। यह कानून सम्मत है। दूसरी ओर, दहेज विशेष रूप से विवाह के लिए लेनदेन से जुड़ा हुआ है। दहेज भारत में दहेज निषेध अधिनियम 1961 के तहत निषिद्ध है।

प्रतिभा रानी बनाम सूरज कुमार के ऐतिहासिक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने दहेज और स्त्रीधन के बीच अंतर स्पष्ट किया है। इस मामले में याचिकाकर्ता महिला को दहेज के लिए परेशान किया गया और उसे ससुराल वालों ने घर से निकाल दिया। उसने धारा CrPC की धारा 125 के दायर की। इसे पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने खारिज कर दिया। हालाँकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस निर्णय को पलट दिया।

सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि 1. विवाह के दौरान अग्नि के समक्ष फेरे से पहले दिए गए उपहार। 2. बारात के दौरान दुल्हन के रूप में महिला को दिए गए उपहार। 3. ससुर और सास द्वारा प्यार के प्रतीक के रूप में दिए गए उपहार और दुल्हन द्वारा बड़ों के चरणों में प्रणाम करने के समय दिए गए उपहार। 4. दुल्हन के पिता, माता और भाई द्वारा दिए गए उपहार…. ये सभी स्त्रीधन हैं।

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा था कि स्त्रीधन का संयुक्त स्वामित्व पति का सह-स्वामित्व नहीं माना जा सकता है। एक महिला हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 की धारा 14 और हिंदू विवाह अधिनियम 1955 की धारा 27 के तहत स्त्रीधन की पाने के लिए अपने पति के खिलाफ मुकदमा दायर कर सकती है।

स्त्री की संपत्ति: हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 की धारा 14 के अनुसार, किसी महिला द्वारा निम्नलिखित स्रोतों से प्राप्त संपत्ति उसकी पूर्ण संपत्ति होती है, जब तक कि इस पर किसी उपहार, डिक्री, आदेश या पुरस्कार की शर्तों में अन्यथा उल्लेख न किया गया हो। ऐसी संपत्ति के अधिग्रहण के स्रोतों में निम्नलिखित शामिल हो सकते हैं:

विवाह से पहले, उसके दौरान और बाद में प्राप्त उपहार (चल और अचल संपत्ति दोनों)।

पारिवारिक संपत्ति के विभाजन के दौरान उसके हिस्से के रूप में प्राप्त संपत्ति।

किसी समझौते के लिए प्रतिफल के रूप में प्राप्त संपत्ति।

सेवा, पेशे, व्यवसाय आदि के माध्यम से अर्जित और संचित संपत्ति।

भरण-पोषण के बदले में प्राप्त संपत्ति।

अपने स्त्रीधन से खरीदी गई संपत्ति।

महिला को विरासत में मिली संपत्ति।

किसी अन्य तरीके से अर्जित संपत्ति, जैसे डिक्री या पुरस्कार के तहत या प्रतिकूल कब्जे के माध्यम से।

13 साल की उम्र में शादी, ददिया ससुर का ₹100 का कर्जा चुकाने के लिए राइस मिल में 10 साल करती रही बंधुआ मजदूरी: बेटी को नहीं दिया पढ़ने

इरुला जनजाति की एक युवा लड़की, जब महज 13 साल की थी, तब उसकी शादी 15 साल के एक रिश्तेदार से कर दी गई। उसे ये पता नहीं था कि शादी के बाद जिस हसीन जिंदगी के वो सपने देख रही है, वो सपने उसके दूल्हे के दादा द्वारा महज 100 रुपए की उधारी के लिए कुचल दिए जाएँगे और वो बंधुआ मजदूरी करने के लिए मजबूर कर दी जाएगी।

कुछ ऐसी ही कहानी है कुप्पाम्मल की। अब कुप्पाम्मल की उम्र 40 साल से ज्यादा हो चुकी है। वो इरुला जनजाति की हैं। करीब 2 दशक पहले उन्हें तमिलनाडु की एक चावल मिल से बंधुआ मजदूरी से मुक्ति मिली थी। उन्होंने गुरुवार (29 अगस्त 2024) को हैदराबाद में आयोजित एक सेमिनार में अपनी कहानी बताई।

हैदराबाद में आयोजित मानव तस्करी पर राष्ट्रीय तकनीकी परामर्श में ‘द न्यू इंडियन एक्सप्रेस’ से उन्होंने बताया, “हमें लगभग 24 घंटे काम करना पड़ता, सप्ताह के सातों दिन। मिल में काम करने वाले पुरुष सदस्य चावल और धान की बोरियों को इधर-उधर उठाकर रखते थे, तो महिलाएँ धान को साफ करती और चावल को साफ करती। हमें खाना बनाने का भी समय नहीं मिलता था।”

कुप्पाम्मल ने आगे बताया, “आप जानते हैं, हम रात 8 बजे के आसपास दलिया बनाना शुरू करते थे और रात 10 बजे तक हम खाना खाकर, सफाई करके अपना काम जारी रख लेते थे। रात के खाने में हम जो दलिया बनाते थे, वही अगले दिन का नाश्ता होता था। ऐसा 10 साल तक चलता रहा।”

चावल मिल में काम करने के 10 सालों के दौरान कुप्पाम्मल के एक बच्चे की भी मौत हो गई। इसके बाद उन्हें अपनी दो छोटी बेटियों को भी मिल में काम पर लगाना पड़ा। उन्होंने कहा, “मेरी सबसे बड़ी बेटी सात साल की हो गई और हम अभी भी मिल में थे और उसे पढ़ाई के लिए बाहर जाने की अनुमति नहीं थी। तभी हमने फैसला किया कि हमें बाहर जाना होगा और इंटरनेशनल जस्टिस मिशन ने हमें बचाने में मदद की।”

कुप्पाम्मल को उस नर्क से निकले अब 2 दशक का समय बीच चुका है। वो तिरुवल्लूर में मुक्त बंधुआ मजदूर एसोसिएशन (आरबीएलए) का हिस्सा है, मानव तस्करी से बचे अन्य लोगों के साथ मिलकर उनके जीवन को फिर से सँवारने का प्रयास कर रही है। आरबीएलए, जो तमिलनाडु के पाँच जिलों के लगभग 10,000 पीड़ितों का संगठन है, ने अपने समुदाय के लिए रोजगार के अवसर पैदा करने के लिए सरकार के साथ मिलकर काम किया है।

कुप्पाम्मल ने बताया, “सरकार ने अब समुदाय के लोगों के लिए काम करने और कमाने के लिए दो ईंट भट्टे बनवाए हैं। इसके अलावा ब्लॉक प्रिंटिंग की पहल भी चल रही है, जिसका मैं हिस्सा हूँ।”

कुप्पाम्मल की ये कहानी बंधुआ मजदूरी की दर्दनाक सच्चाई को सामने लाती है। बंधुआ मजदूरी पर भारत देश में कानूनी रोक है। इसके बावजूद ऐसी घटनाओं का होना समाज पर काले-धब्बे की तरह है।

जब तक घर-सड़कों पर न दिखे मगरमच्छ, मॉनसून लगता आधा-अधूरा: विश्वामित्र नदी है आशियाना, इसलिए बाढ़ आते ही वडोदरा भ्रमण पर निकल जाते हैं जलचर

गुजरात के वडोदरा में पिछले दिनों बाढ़ के कारण स्थिति बेहद खराब रही। लोग जहाँ अपने जान बचाने के लिए सड़कों पर निकलने से बच रहे थे वहीं सड़क पर मगरमच्छ दिख रहे थे। ये नजारा विश्वामित्र नदी में पानी कम होने के बाद देखने को मिला। इसके बाद इन मगरमच्छों को बचाने के लिए तुरंत अभियान चलाया गया और इन्हें इनके सुरक्षित स्थानों पर पहुँचाया गया।

जब ऑपइंडिया ने वडोदरा वन विभाग के रेंज फॉरेस्ट ऑफिसर करण सिंह राजपूत से संपर्क किया, तो उन्होंने कहा कि पिछले कुछ दिनों में बनी बाढ़ की स्थिति से लेकर 29 अगस्त, 2024 तक वडोदरा से 14 से अधिक मगरमच्छों को बचाया गया है। पानी घटते समय भी वन विभाग और स्थानीय गैर सरकारी संगठनों की मदद से आज अधिकतम 7 मगरमच्छों को बचाया गया।

चार दिन में 14 मगरमच्छों का रेस्क्यू

करण सिंह ने बताया इन 14 मगरमच्छों को 4 दिन के भीतर रेस्क्यू किया गया। सबसे लंबा मगरमच्छ कारेलीबाग का था, जो करीब 15 फीट लंबा था। उनसे जब पूछा गया कि कैसे ये मगरमच्छ और वडोदरावासी साथ रह लेते हैं और फर्क भी नहीं पड़ता। इस पर करण सिंह ने बताया- “वडोदरा में करुणा अभियान के साथ हमारे 1300 स्वयंसेवक पंजीकृत हैं, जो विभिन्न प्राणियों और वन्यजीवों के संरक्षण के लिए काम करते हैं। फिलहाल 15 से 20 ऐसे एनजीओ बाढ़ की स्थिति में ग्राउंड पर हैं। सभी एनजीओ में 50-60 लोग सेवा दे रहे हैं और वे सभी लोग हमारे साथ जुड़ गए हैं। आप कह सकते हैं कि वडोदरा के लोग मगरमच्छों के बारे में इतने जागरूक हैं कि इन दोनों प्रजातियों के बीच घर्षण नगण्य हो जाता है।

इसी तरह चारुण सिंह ने बताया कि सिर्फ मगरमच्छ ही नहीं, करीब 70 साँपों को भी सफलतापूर्वक रेस्क्यू किया गया है। उनके मुताबिक वडोदरा वन विभाग बाढ़ से पहले ही हर तरह की स्थिति से निपटने के लिए तैयार था। विभाग ने पर्याप्त मगरमच्छ पकड़ने वाले पिंजरे, परिवहन वाहन और अन्य सभी तैयारियाँ की थीं।

आगे ऑपइंडिया के जरिए उन्होंने वडोदरावासियों से भविष्य में सावधान रहने को भी कहा, क्योंकि जैसे-जैसे पानी घटेगा, मगरमच्छ बाहर आएँगे। उन्होंने मगरमच्छ या किसी वन्यजीव बचाव या आपातकालीन स्थिति के लिए 9429558883 या 9429558886 पर संपर्क करने को भी कहा।

विश्वामित्र नदी मगरमच्छों का घर क्यों है?

अब सवाल यह भी आता है कि विश्वामित्र नदी में ही इतने सारे मगरमच्छ क्यों हैं? गुजरात में और भी कई नदियाँ हैं, उनमें इतने मगरमच्छ क्यों नहीं? इस सवाल के जवाब में जिला वन विभाग के आरएफओ करण सिंह कहते हैं, “विश्वामित्र नदी को मगरमच्छों का गढ़ कहा जा सकता है। वडोदरा शहर की भौगोलिक स्थिति और मगरमच्छों के लिए विश्वामित्र नदी की उपयुक्तता भी इसके लिए जिम्मेदार है। शहर के बीच से बहने वाली नदी इतनी गहरी है कि यह मगरमच्छों के लिए आसान आश्रय बन जाती है। वहीं एक वजह मध्य गुजरात की जलवायु भी है, जो मगरमच्छों के प्रजनन के लिए काफी अनुकूल है। ये मीठे पानी के मगरमच्छ हैं और विश्वामित्र नदी का संरक्षित विस्तार उनके प्रजनन और अंडे देने के लिए अनुकूल वातावरण प्रदान करता है।”

विश्वामित्र नदी का विस्तार मगरमच्छों के लिए अनुकूल (साभार: BBC)

विश्वामित्र नदी में रहने वाले मगरमच्छों के बारे में बात करते हुए उन्होंने कहा, “नर और मादा मगरमच्छों का प्रजनन काल गर्मी के दिनों की शुरुआत के साथ शुरू होता है। मई में मादा मगरमच्छ जमीन में गड्ढा खोदती है और उसमें अपने अंडे देती है। गहरे पेड़ों और वनस्पतियों से आच्छादित नदी तल मगरमच्छ के अंडे बढ़ने के लिए अनुकूल वातावरण प्रदान करता है। दूसरी ओर, विश्वामित्री नदी गहरी होने के कारण मगरमच्छों के लिए पर्याप्त भोजन भी उपलब्ध कराती है। कुछ स्थानों के अलावा जहाँ नदी का पानी सूख जाता है, नदी के कई हिस्से ऐसे हैं जहाँ गहरा पानी है, जहाँ मगरमच्छ रहते हैं, जहाँ उन्हें पर्याप्त मात्रा में भोजन मिल सकता है। इस प्रकार विश्वामित्री नदी के विस्तार को जाल लगाकर प्रतिबंधित कर दिया गया है, लेकिन कभी-कभी यदि मवेशी इस क्षेत्र में प्रवेश कर जाते हैं, तो मगरमच्छ उन्हें भी मार देते हैं।”

विश्वामित्र नदी में कितने मगरमच्छ रहते हैं

जून में टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के अनुसार , वडोदरा शहर को दो भागों में बाँटने वाली विश्वामित्र नदी के 17 किलोमीटर के दायरे में 300 से अधिक मगरमच्छ रहते हैं। आखिरी बार मगरमच्छों की गिनती साल 2020 में की गई थी और उस वक्त इनकी संख्या 275 थी। यह जानकर आश्चर्य होता है कि एक शहर के बीच में इतने सारे मगरमच्छ रहते हैं।

वडोदरा के विश्वामित्री में एक मगरमच्छ की दलदली प्रजाति पाई गई

गौरतलब है कि ये सिर्फ विश्वामित्र नदी के बारे में है। बाकी भौगोलिक स्थिति के अनुसार, नदी को मुख्य रूप से अजवा झील से पानी मिलता है और झील बहुत सारे मगरमच्छों का घर भी है। इसके अलावा वडोदरा के आसपास जंबुवा और देव नदियों में भी मगरमच्छों की अच्छी संख्या है। हाल ही में वाघोडिया तालुका के गुटल गाँव में मगरमच्छ के हमले का मामला सामने आया था। विश्वामित्र नदी में सुलभता के कारण मगरमच्छों की संख्या लगातार बढ़ रही है। यह भी कहा जाता है कि विश्वामित्र नदी में हर एक किलोमीटर के दायरे में 6 से अधिक मगरमच्छ रहते हैं।

कुल प्रजातियाँ कितनी

दुनिया में मगरमच्छों की कुल 23 प्रजातियाँ हैं, जिनमें से तीन भारत में पाई जाती हैं। खारे पानी के मगरमच्छ और मीठे पानी के मगरमच्छ के बीच भी अंतर हैं। हमारे वडोदरा में पाई जाने वाली मगरमच्छ की प्रजाति को ‘मार्श मगरमच्छ’ कहा जाता है। इस प्रजाति के मगरमच्छों को खुर वाले शिकारी के रूप में जाना जाता है। उन्हें अपने पैरों से शिकार का पीछा करने और उसे पकड़ने की कला में महारत हासिल है। चूँकि दलदली मगरमच्छ के जबड़े उलटे व्यवस्थित होते हैं, एक बार जब शिकार इसके जबड़ों में फंस जाता है तो उसका बचना असंभव होता है। इस मगरमच्छ की काटने की शक्ति तीन टन है।

शिकार करते समय दलदली मगरमच्छ छोटी दूरी तक 8 मील प्रति घंटे की रफ़्तार से दौड़ सकते हैं। वह जितनी तेजी से दौड़ सकता है या चल सकता है, उतनी ही तेजी से वह तैर भी सकता है। दलदली मगरमच्छ 10 से 12 मील प्रति घंटे की गति से तैर सकते हैं, और कुछ मामलों में इससे भी तेज़। मार्श मगरमच्छ प्रजाति के मगरमच्छों को मध्यम आकार की प्रजाति माना जाता है। इन मगरमच्छों की लंबाई 8 से 15 फीट तक होती है।

अगर हम इनके जीवन काल की बात करें तो मगरमच्छों का जीवन काल आमतौर पर 50 से 80 साल तक होता है। इसका प्रजनन काल सर्दी की समाप्ति और गर्मियों में गर्मी की शुरुआत के साथ शुरू होता है। गर्मी की शुरुआत के साथ, वे नदी के तल और कुछ मामलों में बिलों में अपने अंडे देते हैं। मानसून की शुरुआत में अंडों से उनके बच्चे निकलते हैं और बड़ा आकार लेते हैं।

मलकीत सिंह को ‘बौना’ कह चिढ़ाता था निहंग, विरोध करने पर घर में घुसकर काट डाला: पंजाब के अमृतसर की घटना, हत्या के बाद से फरार

अमृतसर में मलकीत सिंह नाम के युवक की पड़ोसी निहंग ने इसलिए हत्या कर दी, क्योंकि मलकीत सिंह खुद को चिढ़ाने का विरोध करता था। दरअसल, मलकीत सिंह की लंबाई कम होने की वजह से निगंह सुखदेव सिंह समेत कई लोग उसे बौना कहकर चिढ़ाते थे। इसका वो विरोध करता था। इस बात को लेकर निहंग सुखदेव से मलकीत का झगड़ा भी हुआ था, जिसमें परिजनों ने सुलह करवाई थी, लेकिन बुधवार (28 अगस्त 2024) की रात सुखदेव ने मलकीत की जान ले ली।

अमर उजाला की रिपोर्ट के मुताबिक, ये वारदात कंबो थाना इलाके के जहाँगीर गाँव की है। जानकारी के मुताबिक, कद में छोटा होने की वजह से मलकीत को निहंग सुखदेव अक्सर चिढ़ाता था। इसी बात को लेकर हुए विवाद में बुधवार की देर रात निहंग सुखदेव मलकील के घर में घुस गया और धारदार हथियार से उसकी हत्या कर दी। उसने पहले भी मलकीत को जान से मारने की धमकी दी थी। बताया जा रहा है कि जब निहंग सुखदेव सिंह मलकीत के घर में घुसा, तब मलकीत अकेला ही था। वो मलकीत की हत्या के बाद से फरार है।

बताया जा रहा है कि बुधवार (28 अगस्त 2024) की रात में भी निहंग सुखदेव मलकीत को चिढ़ा रहा था। मलकीत ने विरोध किया, तो वह छत के जारिए घर के अंदर दाखिल हुआ और मलकीत को पीटने लगा, साथ ही धारदार हथियार से हमला कर दिया। मलकीत माता-पिता का इकलौता बेटा था। उसकी दो बहनें हैं। इस हमले में मलकीत ने दम तोड़ दिया।

इस मामले में थाना कंबो के इंचार्ज एस.आई. शमशेर सिंह ने कहा कि मृतक मलकीत सिंह के शव को कब्जे में ले पोस्टमार्टम की कार्रवाई के लिए भेज दिया गया है। वहीं दूसरी ओर निहंग सुखदेव सिंह के विरुद्ध हत्या का केस दर्ज कर उसकी धर पकड़ के लिए छापामारी की जा रही है।

हिंदुओं को चुन-चुनकर बनाया निशाना, पर बांग्लादेश में ‘क्रांति का कुत्ता’ बन भौंक रहा न्यूजलॉन्ड्री: कहा- भारतीय मीडिया ने हिंसा को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया

बांग्लादेश में हिंदुओं पर अत्याचार के अनगिनत मामले सामने आए। आधिकारिक तौर पर 270 से अधिक मामले हिंदुओं के खिलाफ हिंसा से ऐसे रहे, जो रिपोर्ट हुए, बाकियों का कुछ पता नहीं चल पाया। लेकिन पश्चिम मीडिया ने जिस तरह से हिंदुओं पर हिंसा के मामलों को लेकर गुमराह करने जैसी रिपोर्टिंग की, अब उसी रास्ते पर भारत की वापमंथी मीडिया भी चल पड़ी है।

दरअसल, बांग्लादेश की अंतरिम यूनुस सरकार ने भारत से चुनिंदा मीडिया संस्थानों को बांग्लादेश का दौरा करवाया, जिन्होंने विदेशी मीडिया की तरह यूनुस सरकार के पक्ष में रिपोर्टिंग करते हुए हिंदुओं के खिलाफ हिंसा को न सिर्फ बेहद कम करके बताया, बल्कि मामूली भी साबित करने की कोशिश की। ऐसी ही कोशिश न्यूजलॉन्ड्री जैसे संदिग्ध वामपंथी न्यूज पोर्टल की तरफ से भी की गई है।

न्यूज़लॉन्ड्री ने न सिर्फ बांग्लादेश में हिंदू विरोधी हिंसा को कमतर दिखाने का प्रयास किया, बल्कि उसने भारतीय मीडिया को ही निशाना बनाने की कोशिश की। इसी क्रम में न्यूज़लॉन्ड्री की पत्रकार स्मिता शर्मा ने 27 अगस्त को बांग्लादेश से एक ग्राउंड रिपोर्ट प्रकाशित किया, जिसमें उन्होंने हिंसा को कमतर बताने और भारतीय मीडिया को बदनाम करने का प्रयास किया।

रिपोर्ट में दावा किया गया कि बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों पर हुए हमले बढ़ा-चढ़ा कर पेश किए जा रहे हैं। रिपोर्ट में बांग्लादेशी युवाओं से बातचीत की गई, जिन्होंने देश को सुधारने की इच्छा जताई। हालाँकि, रिपोर्ट में कुछ हिंदू लड़कियों को मंदिर जाते हुए दिखाया गया, जिससे यह सुझाव दिया गया कि हिंदू और उनके मंदिर सुरक्षित हैं। लेकिन मंदिरों में देवी-देवताओं की मूर्तियों के सामने लगे लोहे के जाले बताते हैं कि स्थिति गंभीर है, खासकर 5 अगस्त के बाद से, जब कई मंदिरों को तोड़ा गया और मूर्तियों को खंडित किया गया।

मजेदार बात यह रही कि न्यूजलॉन्ड्री के रिपोर्टर ने एक हिंदू लड़की से ‘शायद’ हिंदू मंदिरों पर हमले की खबरों के बारे में पूछा, हालाँकि, इससे पहले कि छात्रा इस बारे में कुछ बोल पाती, प्रोपेगेंडा पोर्टल के रिपोर्टर ने अगला सवाल पूछ लिया। इसके अलावा, रिपोर्ट में स्टूडेंट्स अगेंस्ट डिस्क्रिमिनेशन की केंद्रीय संयोजक नुसरत तबस्सुम से बातचीत की गई, जिन्होंने दावा किया कि किसी भी अवामी लीग के नेता को भीड़ ने पीटा नहीं है।

हालाँकि, अवामी लीग के नेताओं पर हमले और भीड़ द्वारा मारे जाने की कई घटनाएँ सामने आई हैं, जिसमें आधिकारिक तौर पर एक ही शहर में 2 दर्जन से ज्यादा आवामी लीग के कार्यकर्ताओं की हत्या भी शामिल है। वीडियो में सामने आया था कि पोराहाटी यूनियन के अध्यक्ष और जेनेदाह सदर उपजिला अवामी लीग के महासचिव शाहिदुल इस्लाम हिरन को भीड़ ने पीट-पीट कर मार डाला और उनका शव जेनेदाह शहर के केंद्र में पैरा छतर में एक मूर्ति से लटका हुआ पाया गया।

आश्चर्य की बात नहीं है कि न्यूज़लॉन्ड्री के रिपोर्टर ने तबस्सुम के दावे का खंडन करने की जहमत नहीं उठाई, क्योंकि संभवतः इसका उद्देश्य असली जानकारी देना नहीं, बल्कि बांग्लादेश में जो कुछ हुआ, उसे छात्र आंदोलन की आड़ में दबाने की थी। न्यूजलॉन्ड्री ने पूरी कोशिश की है कि बांग्लादेश में जो कुछ हुआ, वह एक ‘क्रांति’ थी, छात्रों की क्रांति थी, और लोगों को हिंदुओं के जातीय सफाए के बजाय केवल इसे ही याद रखना चाहिए।

तबस्सुम ने हिंदू विरोधी हिंसा को क्रांति से जोड़कर घुमाते हुए कहा, “इसे पोस्ट-रिवोल्यूशन डिप्रेशन कहते हैं। ये पूरी दुनिया में होता है। हर क्रांति के बाद एक परीक्षा की घड़ी होती है। उसे बस यही समझिए।”

दरअसल, क्रांति के बाद का समय कठिन होता है, जिसमें हमलावरों ने शेख हसीना के आवास को लूटा, अंडरगारमेंट्स लहराए और शेख मुजीबुर रहमान की मूर्ति पर पेशाब किया। इस्लामी उग्रवादियों द्वारा निर्दोष हिंदू अल्पसंख्यकों पर हमला यह साबित करता है कि तथाकथित छात्र क्रांति सिर्फ एक छात्र क्रांति नहीं थी, बल्कि इसे बीएनपी और जमात-ए-इस्लामी जैसे जिहादी राजनीतिक संगठनों ने हाइजैक कर लिया था, जिन्होंने हिंदुओं को सिर्फ उनके अस्तित्व के कारण निशाना बनाया। लेकिन न्यूज़लॉन्ड्री की पत्रकार स्मिता शर्मा ने इस्लामी उग्रवाद का बचाव करते हुए नुसरत तबस्सुम से हिंदू विरोधी हिंसा को कमतर बताने पर कोई सवाल ही नहीं किया।

न्यूज़लॉन्ड्री ने बांग्लादेश में हिंदू विरोधी हिंसा पर रिपोर्टिंग के लिए भारतीय मीडिया को घेरा

न्यूजलॉन्ड्री के कामों को कुछ इस तरह से समझा जा सकता है कि न्यूज़लॉन्ड्री ने बांग्लादेश में हिंदुओं के खिलाफ इस्लामी अपराधों की अनदेखी की और यह दिखाने का प्रयास किया कि छात्र विरोध प्रदर्शन जिहादी पार्टियों जैसे बीएनपी और जमात-ए-इस्लामी द्वारा हाइजैक नहीं हुए थे। इसके विपरीत, इन पार्टियों ने हिंदुओं के खिलाफ हिंसा को बढ़ावा दिया।

न्यूज़लॉन्ड्री ने भारतीय मुख्यधारा की मीडिया की आलोचना की, यह आरोप लगाते हुए कि उन्होंने हिंदू विरोधी हिंसा को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया। स्मिता शर्मा ने एक बांग्लादेशी लड़की से बातचीत में कहा कि भारतीय टेलीविजन मीडिया सरकार के नैरेटिव और एजेंडे के साथ जुड़ा हुआ है। हालाँकि, कुछ स्वतंत्र आवाजें [जिन्हें ‘एंटी-बीजेपी’ माना जा सकता है] भी काम कर रही हैं। विडंबना यह है कि न्यूज़लॉन्ड्री, जो खुद एंटी-बीजेपी/आरएसएस और एंटी-मोदी प्रोपेगैंडा पर फलती-फूलती है, भारतीय टीवी मीडिया पर नैरेटिव सेट करने का आरोप लगा रही थी। यह उनके खुद के काम को भी सवालों के घेरे में लाता है।

इस मौके पर भी स्मिता शर्मा ने उत्तर भारतीयों को निशाना बनाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी। शर्मा ने उत्तर भारतीयों को बदनाम करते हुए कहा कि हिंदी भाषी लोग बांग्लादेश में अशांति की रिपोर्ट को अलग नजरिए से देखते हैं, क्योंकि वे ‘व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी’ और फर्जी खबरों के माध्यम से जानकारी प्राप्त करते हैं। वहीं दक्षिण भारत के लोग विभिन्न भाषाएं बोलते हैं और बांग्लादेश व अन्य देशों के प्रति उनकी सोच में कम पूर्वाग्रह होते हैं।

न्यूज़लॉन्ड्री की पत्रकार ने आरोप लगाया कि भारतीय मीडिया ने बांग्लादेश में हिंदू विरोधी हिंसा और सामान्य अशांति को “अत्यधिक बढ़ा-चढ़ाकर” पेश किया। हालाँकि कुछ सोशल मीडिया पोस्ट को छोड़ दें, तो कहीं भी घटनाओं को बढ़ा-चढ़ाकर नहीं बताया गया। अगर भारतीय मीडिया के काम करने के तरीके तो शर्मा अतिशयोक्ति कह रही हैं, तो यह हिंदू पीड़ितों के प्रति इस्लामिक हिंसा को लेकर उनकी असंवेदनशीलता दर्शाता है।

OpIndia अपनी रिपोर्ट में बता चुका है कि बांग्लादेश में किस तरह से हिंदुओं को निशाना बनाया गया। जिसमें जमात-ए-इस्लामी (JeI) ने हिंदू घरों की सूची तैयार की जिन्हें हमले के लिए चुना गया, और हिंदुओं को धमकी दी गई कि वे अपनी जान बचाने के लिए पैसे और अन्य कीमती चीजें दें। इस्लामियों ने हिंदू मंदिरों को तोड़ा और मूर्तियों को खंडित किया। 5 अगस्त के बाद से 200 से अधिक ऐसे हिंदू विरोधी हमले हुए हैं, जबकि भारतीय और पश्चिमी वामपंथी मीडिया इसे ‘राजनीतिक बदला’ कहकर खारिज कर रही थी।

न्यूजलॉन्ड्री दावा किया कि भारतीय मीडिया ने नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) के विरोधियों को “इस्लामिक ताकतें” करार दिया, जबकि यह सच्चाई को छिपाने का प्रयास था कि विरोध राजनीतिक और धार्मिक रूप से प्रेरित थे। CAA से भारतीय मुसलमानों को कोई नुकसान नहीं हुआ था, लेकिन विरोधियों ने हिंसक प्रदर्शनों को बढ़ावा दिया, जो 2020 के दिल्ली दंगों में बदल गए। शर्मा ने यह उल्लेख नहीं किया कि कैसे AAP विधायक अमानतुल्लाह खान ने मुस्लिम भीड़ को उकसाया, कैसे AAP पार्षद ताहिर हुसैन की इमारत में 3000 दंगाई इकट्ठा हुए थे, और पेट्रोल बम जमा किए गए थे। न्यूजलॉन्ड्री ने यह भी नहीं बताया कि कैसे मुस्लिम दंगाइयों ने बेरहमी से IB अधिकारी अंकित शर्मा, हिंदू युवक दिलबर नेगी और कई अन्य लोगों की हत्या की। यह केवल इस्लामिक ताकतें नहीं थीं, बल्कि राजनीतिक और वामपंथी मीडिया की ताकतें भी थीं जिन्होंने CAA का विरोध किया, जो केवल पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश से आए हिंदुओं और अन्य गैर-मुस्लिम अल्पसंख्यकों को नागरिकता प्रदान करता है।

इसके अलावा, न्यूज़लॉन्ड्री के पत्रकार ने यह भी आरोप लगाया कि 2020-21 के किसान आंदोलन में हिस्सा लेने वालों को ‘खालिस्तानी’ बताया गया, जबकि हकीकत ये थी कि खालिस्तानी तत्वों ने किसानों के आंदोलन को हाईजैक करने की कोशिश की, लेकिन न्यूजलॉन्ड्री ने ये तथ्य छिपा लिया। वहीं, ऑपइंडिया ने बताया था कि किसानों के विरोध प्रदर्शन के परिणामस्वरूप 60,000 करोड़ रुपये का व्यापार नुकसान हुआ, खालिस्तानी भावनाओं का फिर से उभार, बलात्कार, हत्या, दंगों आदि जैसी कई आपराधिक गतिविधियाँ हुईं।

न्यूजलॉन्ड्री की रिपोर्ट ये साबित करने के लिए काफी है कि क्यों मोहम्मद यूनुस की सरकार ने चुनिंदा भारतीय ‘पत्रकारों’ को ही बांग्लादेश बुलाया। ये साफ है कि उनकी कोशिश बीएनपी और जमात के आतंकियों द्वारा हिंदुओं के खिलाफ किए गए अत्याचारों को छिपाने की थी और दुनिया को ये बताने की भी कोशिश है कि हिंदुओं को निशाना बनाया जाना सिर्फ इस ‘क्रांति’ का कोलेटरल डैमेज था।

मोहम्मद यूनुस की सरकार तो यही चाहती है कि हिंदुओं के धार्मिक सफाए की चर्चा कहीं न हो और न ही इसकी रिपोर्टिंग हो और न ही विरोध, बल्कि इसे ‘कोलेटरल डैमेज’ यानी मामूली नुकसान मानकर चुप्पी साध ली जाए। क्या सरकारी दौरे पर गए भारतीय पत्रकारों को विदेशी धरती पर भारतीय लोगों और मीडिया को बदनाम करना चाहिए, खासकर तब जब वह देश-सरकार बेशर्मी से इस्लामी कट्टरपंथियों को हिंदू और अन्य अल्पसंख्यक समूहों पर अत्याचार करने दे रहा है?

मूल रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित की गई है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

ऑडिशन के नाम पर हीरो को होटल में नंगा करवाया, फोटो खींचकर हिरोइन को भेजी: यौन शोषण में मलयालम फिल्मों के डायरेक्टर रंजीत का भी आया नाम

केरल में फिल्ममेकर रंजीत के खिलाफ एक युवा अभिनेता ने शिकायत दर्ज कराई है। अभिनेता का आरोप है कि रंजीत ने साल 2012 उसका यौन उत्पीड़न किया था। इसके अलावा डायरेक्टर ने उसे जबरन नंगा भी कराया था।

अपनी शिकायत में अभिनेता ने दावा किया कि रंजीत ने उन्हें बेंगलुरु के होटल में ऑडिशन के लिए बुलाया था। वहीं उनके साथ इस घिनौनी हरकत को अंजाम दिया गया। शुरू में उन्हें लगा ये ऑडिशन का ही पार्ट है लेकिन रंजीत ने उनका यौन शोषण करने के बाद उन्हें पैसे ऑफर किए।

केरल पुलिस के अनुसार एक्टर ने ये शिकायत डीजीपी और एसआईटी को दी है। वहीं मीडिया से बात करते हुए बताया रंजीत जब उनका यौन शोषण कर रहा था उस समय एक्ट्रेस के साथ फोन पर था। उसकी नग्न तस्वीरें खींचने के बाद रंजीत ने वो फोटो रेवती को भी भेजी और एक्टर से कहा कि वो रेवती को पसंद आए।

एक्टर ने बताया, “जब रंजीत ने मुझे नग्न खड़े होने के लिए कहा, तो वह एक अभिनेत्री से बात कर रहे थे। मैंने पहले ही उस अभिनेत्री का नाम बता दिया है- रेवती। रंजीत ने मुझे बताया कि यह रेवती थी। मुझे नहीं पता कि रंजीत और रेवती के बीच कोई रिश्ता है या नहीं, लेकिन रंजीत ने मेरी तस्वीरें लीं और उन्हें रेवती को भेज दिया।”

अभिनेता ने कहा, “जब मैंने पूछा कि तस्वीरें किसे भेजी जा रही थीं, तो रंजीत ने कहा कि उन्हें रेवती को भेजा गया था, उन्होंने कहा कि उन्हें जो दिखाई दिया वह उन्हें पसंद आया। यह घटना फिल्म ‘बावुत्तियुडे नामथिल’ के लोकेशन पैक-अप के दौरान हुई। निर्देशक फिल्म के ऑडियो लॉन्च या किसी अन्य संबंधित कार्यक्रम के सिलसिले में वहाँ मौजूद थे।”

उल्लेखनीय है कि रंजीत पर हाल ही में बंगाली अभिनेत्री श्रीलेखा मित्रा ने भी यौन दुराचार का आरोप लगाया था। इसके बाद अभिनेता की शिकायत सामने आई है। अभिनेता ने बताया कि हेमा कमेटी की रिपोर्ट आने के बाद वह सामने आया है।

गौरतलब है कि हेमा कमेटी की रिपोर्ट आने के बाद मलयालम फिल्म इंडस्ट्री में तहलका मचा हुआ है। कई युवा कलाकार सामने आकर बता रहे हैं कि उनके साथ किस फिल्म मेकर ने क्या किया। पिछले दिनों एक्टर सिद्दीकी के ऊपर एक युवा अभिनेत्री ने रेप का आरोप लगाया था। इसके अलावा एक्टर जयसूर्या और सीपीआईएम के विधायक मुकेश पर भी अभिनेत्रियों ने यौन शोषण के इल्जाम लगाए थे।

काजी सिस्टम खत्म, निकाह-तलाक का रजिस्ट्रेशन जरूरी: 90 साल बाद असम ने बदला ‘मजहबी कानून’, इसके बारे में जानिए सब कुछ

असम विधानसभा ने गुरुवार (29 अगस्त 2024) को एक विधेयक पारित कर दिया, जिसके बाद मुस्लिम के निकाह और तलाक का सरकारी रजिस्ट्रेशन अनिवार्य हो गया है। असम मुस्लिम विवाह और तलाक का अनिवार्य पंजीकरण विधेयक, 2024 को राजस्व और आपदा प्रबंधन मंत्री जोगेन मोहन ने विधानसभा में पेश किया, जो मुस्लिम विवाह और तलाक अधिनियम 1935 की जगह लेगा। पुराना कानून बाल विवाह की अनुमति देता था और बहुविवाह पर रोक नहीं लगाता था। इसके साथ ही असम सरकार ने मुस्लिमों के निकाह-तलाक में काजियों की भूमिका भी खत्म कर दी है।

असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने इस विधेयक के पारित होने पर प्रतिक्रिया दी। उन्होंने गुरुवार के दिन को ऐतिहासिक बताया और कहा कि उनका अगला लक्ष्य बहुविवाह पर प्रतिबंध लगाना है।

असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने एक्स पर लिखा, “आज असम की बेटियों के लिए एक ऐतिहासिक दिन है। असम विधानसभा ने मुस्लिम विवाह पंजीकरण विधेयक 2024 को पारित कर दिया है। इस नए कानून के लागू होने के बाद नाबालिका से विवाह की पंजीकरण एक कानूनी अपराध माना जाएगा। इसके अलावा, मुस्लिम विवाह की पंजीकरण अब काज़ी नही, सरकार करेगी। हमारी सरकार का एक ही उद्देश्य है: बेटी चाहे मुस्लिम हो या हिंदू, उसके साथ अन्याय नहीं होना चाहिए। मैं असम की जनता से प्रार्थना करता हूँ कि हमारा साथ दीजिए और इस प्रथा को इतिहास के पन्नों तक सीमित रखिए। एक आधुनिक असम में इस प्रथा की कोई जगह नहीं है।”

नये कानून की खास बातें

  • असम मुस्लिम विवाह और तलाक का अनिवार्य पंजीकरण विधेयक, 2024 नाम के नए अधिनियम के अस्तित्व में आने के साथ ही मुस्लिमों के निकाह-तलाक में काजियों की भूमिका खत्म हो गई है। अब यह काम उप-रजिस्ट्रार करेगा।
  • नए कानून में निकाह के लिए 7 बातें मुख्य रूप से हैं-
  • 1-निकाह के दौरान लड़की की उम्र -18 साल, और लड़के की उम्र -21 साल होनी चाहिए।
  • 2-दोनों पक्षों की सहमति से ही निकाह होना चाहिए, अगर जोर-जबरदस्ती की बात आई, तो 1 माह के अंदर इसकी शिकायत की जा सकती है।
  • 3- जिस जिले में निकाह होना है, उस जिले में लड़की या लड़के का निवास कम से कम 30 दिनों से होना चाहिए। यानी बाहरी जिले के निवासी का उस जिले में सिर्फ निकाह के लिए आने का सिस्टम अब खत्म हो गया है। लड़का और लड़की दोनों गैर-जिले में जाकर निकाह नहीं कर सकते, इसके लिए उस जिले में लड़के या लड़की का 30 दिनों तक रहना जरूरी है।
  • 4- लड़के और लड़की- दोनों ही पक्षों को निकाह के रजिस्ट्रेशन से कम से कम 30 दिन पहले पहचान, उम्र और निवास स्थान से जुड़े कागजात पेश करने होंगे। यानी निकाह की सूचना 1 माह पहले देनी होगी, ये शर्त स्पेशल मैरिज एक्ट की तरह ही है।
  • 5- जोर-जबरदस्ती, कम उम्र, या बाहर के निवास जैसी किसी भी शर्त का उल्लंघन होने पर 30 दिनों के भीतर आपत्ति दर्ज कराई जा सकती है। इसकी जाँच रजिस्ट्रार करेंगे। अगर जाँच के बाद कोई गड़बड़ी पाई जाती है, तो निकाह को रिजेक्ट भी किया जा सकता है। ऐसी स्थिति में जिला रजिस्ट्रार या विवाह महापंजीयक (रजिस्ट्रार जनरल) के सामने अपील की जा सकती है।
  • 6- लड़की या लड़के के नाबालिग होने की सूचना अगर दस्तावेजों की जाँच के दौरान सामने आती है, तो अधिकारी को तुरंत ही इसकी सूचना उच्चाधिकारी (विवाह संरक्षण अधिकारी) को देनी होगी। ये कदम बाल-विवाह निषेध अधिनियम-2006 के तहत अनिवार्य है। इस मामले में सक्षम अधिकारी कानूनी कार्रवाई करेगा।
  • 7- अगर कोई अधिकारी ‘जान बूझकर’ किसी निकाह को गलत तरीके से मंजूरी देता है और उसका रजिस्ट्रेशन करता है, तो उसे 1 साल तक की जेल और 50 हजार रुपए का अर्थदंड भुगतना पड़ सकता है। यानी निकाह को गलत तरीके से मंजूरी देने वाला अधिकारी सीधे उत्तरदायी ठहराया जाएगा।

ये कानून मुस्लिम लॉ कानून से अलग है। उनका उल्लंघन नहीं करते। खास कर नाबालिग लड़कियों के निकाह से जुड़े मामले में। दरअसल, मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के तहत यौवन प्राप्त कर लेने वाली (जिनकी माहवारी शुरू हो गई हो) लड़कियों को शादी के लायक मान लिया जाता है। अगर माहवारी न शुरू हुई हो या इसकी जानकारी न हो, तो 15 साल की उम्र की लड़कियों को निकाह योग्य माना जाता है।

हालाँकि सुप्रीम कोर्ट इस मामले में सुनवाई कर रहा है। जिसमें विवाह के लिए कम से कम कानूनी उम्र को 18 साल करने को लेकर बहस जारी है। अगर सुप्रीम कोर्ट मुस्लिम पर्सनल लॉ पर बाल विवाह निषेध अधिनियम, 2006 को लागू (जिसमें 18 साल से कम उम्र की लड़की की शादी अवैध) का फैसला लेता है, तो कानून में बदलाव किया जाएगा और इस उम्र को कड़ाई से 18 वर्ष किया जा सकेगा। हालाँकि मुस्लिम लड़कियों की उम्र को लेकर अलग-अलग हाई कोर्ट ने अलग-अलग समय में अलग-अलग टिप्पणियाँ दी हैं।

विधानसभा में बहस

मनकाचर से एआईयूडीएफ के विधायक अमीनुल इस्लाम ने विधानसभा में कहा कि अगर इस कानून का उद्देश्य सिर्फ बाल-विवाह रोकना है, तो 1935 के अधिनियम को रद्द करने की जरूरत नहीं, बल्कि पुराने कानून में धारा 8 और 10 में संशोधन करके ही ये लक्ष्य प्राप्त किया जा सकता है। इस्लाम ने कहा कि 1935 के कानून में साल 2010 में बदलाव किया गया था, जिसमें निकाह का रजिस्ट्रेशन स्वैच्छिक था। इसे ही सिर्फ अनिवार्य कर देने की जरूरत थी बस।

इस मामले में मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने जवाब दिया कि ये संशोधन पर्याप्त नहीं होंगे, और सरकार का इरादा काज़ियों की भूमिका को भी समाप्त करना है। उन्होंने पिछले साल बाल विवाह के खिलाफ सरकार की कार्रवाई का जिक्र किया, जिसमें 4,000 से ज़्यादा लोगों को गिरफ़्तार किया गया था – ज़्यादातर वे पुरुष थे जिन्होंने कम उम्र की लड़कियों से शादी की थी, और उनके रिश्तेदार और धार्मिक पदाधिकारियों ने इन शादियों को संपन्न कराया था।

मुख्यमंत्री ने कहा, “हमने पाया कि काजी बाल विवाह पंजीकृत करते हैं। जब मामले हाई कोर्ट में आए, तो उन्होंने कहा कि उनके पास बाल विवाह पंजीकृत करने का अधिकार है। ऐसे में हाई कोर्ट ने उन्हें जमानत दे दी क्योंकि काजियों के पास मुस्लिम विवाह और तलाक पंजीकरण अधिनियम के तहत बाल विवाह पंजीकृत करने का अधिकार है। इसका मतलब है कि वे (काजी) सैद्धांतिक रूप में बाल विवाह के खिलाफ नहीं हैं।” उन्होंने कहा कि सरकारी अधिकारी द्वारा पंजीकरण से जवाबदेही बढ़ेगी।

सरमा ने सीमा बनाम अश्विनी कुमार मामले में सुप्रीम कोर्ट के 2006 के फैसले का हवाला दिया जिसमें कोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकारों को विवाहों का अनिवार्य पंजीकरण सुनिश्चित करने का निर्देश दिया था। “इसका मतलब है कि विवाहों का पंजीकरण करवाने की जिम्मेदारी राज्य को दी गई है। राज्य इसके लिए काजी व्यवस्था पर निर्भर नहीं रह सकता।” उन्होंने काजियों को “निजी संस्था” करार दिया।

इस मामले में इस्लाम ने कहा कि सरकार मुस्लिमों के निकाह को सरल बनाने की जगह कठिन बना रही है। इससे मुस्लिमों को समस्याओं का सामना करना पड़ेगा। इस्लाम ने 30 दिन पहले निकाह के रजिस्ट्रेशन की सूचना देने के अनिवार्य शर्त को लेकर कहा। उन्होंने कहा कि ये मुद्दा स्पेशल मैरिज एक्ट का है, इसे मुस्लिमों के निकाह से जोड़ना सही नहीं होगा।