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700+ जानवरों (हाथी, हिब्बो, जेब्रा…) को मारेगा नामीबिया, कुछ इस तरह नागरिकों का पेट भरेगा सूखे और भूख से बेहाल देश: खाने को लेकर लड़ रहे इंसान और जानवर

अफ्रीकी महाद्वीप के देश नामीबिया ने 723 जंगली जानवरों को मारने का एलान किया है। इन जानवरों में 83 हाथी भी शामिल हैं। इस कदम से नामीबिया अपने यहाँ भूख और सूखे से बेहाल लगभग 14 लाख नागरिकों को खाना देगा। नामीबिया के पर्यावरण मंत्री ने इस कदम की पुष्टि की है। उन्होंने कहा कि देश में बचे खाने के लिए जानवरों और इंसानों में संघर्ष न हो इसके लिए भी यह कदम एहतियातन उठाए जा रहे हैं।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, नामीबिया इस समय सूखे की वजह से भुखमरी के कगार पर खड़ा है। देश के लगभग 84% संसाधन खत्म हो गए हैं। ऐसे में वहाँ रहने वाले लगभग 14 लाख लोगों के खाने के लाले पड़ रहे हैं। सूखे की वजह से जंगली जानवर भी जीने के लिए जद्दोजहद कर रहे हैं। इंसानों और जानवरों के बीच खाने की होड़ से दोनों तरफ का काफी नुकसान हो रहा है। नामीबिया के पर्यावरण मंत्री ने ऐसे हालातों में मानव जीवन को सर्वोच्च प्राथमिकता माना। उन्होंने बताया कि सरकार ने ऐसे हालातों से निबटने के लिए 723 जंगली जानवरों को मारने का निर्णय लिया है।

जून 2024 में संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट प्रकाशित हुई थी। इस रिपोर्ट में बताया गया था कि सूखे से दक्षिण अफ्रीकी देशों के लगभग 3 करोड़ लोग बुरी तरह से प्रभावित हुए हैं। इन प्रभावितों में नामीबिया को सबसे ऊपर रखा गया है। कत्ल के जिन जानवरों को चिह्नित किया गया है उसमें 300 जेब्रा, 30 हिप्पो, 50 इम्पाला, 60 भैंसे, 100 नीलगाय, 83 हाथी और 100 एलैंड शामिल हैं। बताया जा रहा है कि ये पशु अक्सर इंसानों की बस्ती की तरफ आ रहे थे। वध के बाद इन पशुओं के मांस को खाने के लिए प्रयोग में लाया जाएगा।

‘बिहारी’ के बाद अब ‘जाति’ वाली गाली सुनेंगे बिहार वाले: अगड़ा-पिछड़ा की राजनीति ने राज्य को बनाया नरक, जातिवाद बना रहा जिंदा लाश

बिहार में हर तरफ हलचल है। शोर है। उथल-पुथल है। यह चुनाव की आहट है। बिहार में विधानसभा चुनाव में लगभग एक साल का वक्त है, लेकिन अभी से वातावरण में जातिवादी बारूद की गंध फैलनी शुरू हो गई है। जातिवादी के लिए कुख्यात राष्ट्रीय जनता दल (RJD) से लेकर जातिवाद की राजनीति करने वाले नेता तक अपनी तिकड़म भिड़ाने में लग गए हैं।

राजद के राज्यसभा सांसद मनोज झा द्वारा सदन में पढ़ा गया भयंकर जातिवादी कविता ‘ठाकुर का कुँआ’ से शुरू हुई आग, जनता दल (यूनाइटेड) यानी JDU नेता एवं बिहार सरकार में मंत्री अशोक चौधरी के बयान के बाद पूरी तरह लपटों में फैल चुकी है। अशोक चौधरी ने जिस तरह भूमिहार समाज पर निशाना साधा, वह एक सुनियोजित प्रक्रिया दिख रही है।

जहानाबाद में 29 अगस्त 2024 को अशोक चौधरी ने भूमिहार समाज पर निशाना साधते हुए कहा था कि जिन लोगों ने लोकसभा चुनाव में पार्टी का साथ नहीं दिया, पार्टी उनको जगह नहीं देगी। उन्होंने कहा था, “क्या नीतीश कुमार ने ऐसा किया कि जहाँ भूमिहारों का गाँव है वहाँ सड़क नहीं बनेगा? लेकिन जब अति पिछड़ा उम्मीदवार बनेगा तो कहेंगे कि वोट नहीं देंगे। क्यों नहीं देंगे?”

अशोक चौधरी यहीं नहीं रूके। उन्होंने आगे कहा, “हम जहानाबाद को नस-नस को जानते हैं। मेरे पिताजी यहाँ विधायक रहे हैं। हम भूमिहारों को भी बढ़िया से जानते हैं। मेरी बेटी का तो ब्याह ही भूमिहार से हुआ है तो और अच्छे से जानते हैं। नेता के साथ शिद्दत से रहना चाहिए। जो लोग चुनाव में दिल्ली-कलकत्ता घूम रहे थे, वो अगर चाह रहे हैं कि नेता के कंधे पर बैठकर विधानसभा चुनाव लड़ेंगे तो ये नहीं चलेगा।”

अशोक चौधरी के इस बयान के बाद बिहार में जातिवादी राजनीति की खुलेआम चर्चा होने लगी। अशोक चौधरी के बयान का ना सिर्फ विपक्षी दलों ने बल्कि उनकी पार्टी के सहयोगी दल के नेताओं ने आलोचना की। यहीं नहीं, जदयू तक में उनके बयान की भर्त्सना होने लगी। जदयू के एमएलसी नीरज कुमार ने कहा कि उन्हें इस तरह का बयान देने की हिम्मत कैसे हुई।

अशोक चौधरी के बयान पर पलटवार करते हुए सहयोगी दल भाजपा से बिहार में मंत्री एवं भूमिहार समाज से आने वाले विजय सिन्हा ने कहा, “भूमिहार एक जाति नहीं, एक कल्चर है। वह कल्चर भूमि से जुड़ने का, जमीन पर रहने का और जमीनी हकीकत जानने की ताकत आज भी किसी को है तो वह जो जमीन से जुड़ा है, उसी को है। जाति की राजनीति करने वाले ना जमात के हितैषी हैं और राष्ट्र के हितैषी हैं।”

ऐसा नहीं है कि बिहार में जाति की राजनीति की उबाल अशोक चौधऱी के बयान से आई है। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट के एससी-एसटी में क्रिमिलेयर को लेकर दिए गए बयान के बाद जातीय राजनीति को उभारने की कोशिश की जा रही है। भाजपा सरकार में शामिल केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान अलग राह पर चल रहे हैं तो केंद्रीय मंत्री जीतनराम माँझी अलग राह पकड़े हुए हैं।

दरअसल, CJI डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली 7 सदस्यीय संविधान बेंच ने 1 अगस्त को अपने फैसले में कहा था कि राज्य SC-ST को दिए जाने वाले आरक्षण के भीतर ऐसी जातियों को ज्यादा तरजीह दे सकते हैं, जो आर्थिक-सामाजिक रूप से अधिक पिछड़ गई हैं। यानी सर्वोच्च न्यायालय ने कोटा में कोटा सिस्टम को अनुमति दे दी थी। लेकिन, बात इससे आगे की थी।

सुनवाई के दौरान जस्टिस BR गवई ने कहा कि यह राज्य सरकार का कर्तव्य है कि वह अधिक पिछड़ी जातियों को तरजीह दे। उन्होंने कहा कि SC-ST समुदाय में भी केवल कुछ ही लोग आरक्षण का लाभ उठा रहे हैं। उन्होंने कहा कि SC-ST आरक्षण में भी क्रीमी लेयर पहचानी जाए और जिन जातियों को लाभ मिल चुका है, उन्हें इससे बाहर कर दिया जाए।

उन्होंने अपनी टिप्पणी के दौरान स्पष्ट कहा, “मुझे यह कहने में कोई हिचकिचाहट नहीं है कि सेंट पॉल हाई स्कूल और सेंट स्टीफन कॉलेज में पढ़ने वाले बच्चे और देश के पिछड़े और दूरदराज के क्षेत्र के एक छोटे से गाँव में पढ़ने वाले बच्चे को एक ही श्रेणी में रखना संविधान में निहित समानता के सिद्धांत को नकार देगा।”

इस दौरान जस्टिस गवई ने एक उदाहरण देकर कहा कि आज के समय में एससी-एसटी कोटे में वर्गीकरण का विरोध करना ऐसा ही है जैसे ट्रेन के जनरल कोच में संघर्ष होता है कि जो पहले बाहर रहता है वह भीतर आने के लिए संघर्ष करता है और अंदर आने के बाद फिर हर संभव प्रयास करता है कि बाहर वाला अंदर न आ पाए।

जस्टिस विक्रम नाथ ने कहा कि क्रीमी लेयर का सिद्धांत अनुसूचित जातियों पर भी उसी तरह लागू होता है, जैसे यह अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) पर लागू होता है। मामले की सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने देश में दलित वर्ग के लिए आरक्षण का पुरजोर बचाव किया और कहा कि सरकार SC-ST आरक्षण के भीतर सब कैटेगरी के पक्ष में है।

सुप्रीम कोर्ट के इस बयान के बाद विपक्षी तो विपक्षी, सत्ताधारी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के दो घटक दल आपस में भिड़ गए। एक लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के नेता चिराग पासवान सुप्रीम कोर्ट के विरोध में आ गए। उन्होंने कहा कि SC में क्रिमिलेयर लागू नहीं होनी चाहिए। जाहिर है कि वे जिस पासवान समाज से आते हैं, वह बिहार और आसपास के राज्यों में संपन्न जाति में गिनी जाति है।

वह अपने वर्ग के अन्य जाति समूहों से अधिक शिक्षित और संपन्न है। अगर इसमें क्रिमिलेयर सिस्टम लागू हो जाता है तो चिराग पासवान सहित उनके समाज के कई लोगों की को नौकरी एवं शिक्षा आरक्षण का लाभ छोड़ना पड़ जाएगा। ऐसे में सिर्फ अपनी जाति की राजनीति देखते हुए चिराग पासवान ने अपनी सरकार के स्टैंड के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट के निर्णय आलोचना शुरू कर दी।

हालाँकि, इस मामले में केंद्र सरकार ने अपना स्टैंड क्लियर कर दिया है कि वह एससी-एसटी में क्रिमिलेयर सिस्टम के पक्ष में नहीं है। इसके बावजूद चिराग पासवना केंद्र पर दबाव बनाने के लिए राजनीतिक पैंतरेबाजी शुरू कर दिए। कभी रूठने का दिखावा करने लगे तो कभी झारखंड और दिल्ली में अपनी पार्टी से उम्मीदवार उतारने का संकेत देकर दबाव की राजनीति करने लगे।

दूसरी तरफ, जीतनराम माँझी जैसे राजनेता भी हैं जो अपनी मुसहर जाति के उत्थान के लिए कोटेे में कोटा तथा क्रिमिलेयर सिस्टम की माँग कर रहे हैं। उनका मत स्पष्ट है कि जो समाज या व्यक्ति आगे निकल चुका है, उसे आरक्षण का लाभ छोड़कर इसे दूसरे लोगों को सौंप देना चाहिए। इसके लिए वे लगातार आवाज भी उठा रहे हैं। इस बात को लेकर माँझी और पासवान में तानातनी भी है।

दरअसल, चिराग पासवान बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में खुद को एकमात्र सक्षम नेता मान रहे हैं। इस बीच भाजपा के वरिष्ठ नेता एवं पूर्व केंद्रीय मंत्री संजय पासवान ने रविवार (1 सितंबर) को एक नई माँग करके पासवान की उम्मीदवारी के साथ-साथ तेजस्वी यादव के मुख्यमंत्री बनने के सपने की हवा निकाल दी। संजय पासवान ने कहा कि ओबीसी मुख्यमंत्री का समय समाप्त हुआ। अब दलित मुख्यमंत्री बनने का समय है।

संजय पासवान का कहना है कि कॉन्ग्रेस ने 12 जातियों को मुख्यमंत्री पद पर मौका दिया। अब बिहार  में राजग को भी नेतृत्व परिवर्तन कर दलितों को मौका देना चाहिए। वर्तमान राजनीति और समय की माँग है। राजग को नुकसान पहुँचाना उद्देश्य नहीं है, लेकिन वह समाज के हित की बात तो लोगों तक पहुँचाना चाहते हैं। उनके बेटे गुरु प्रकाश बिहार भाजपा के प्रदेश मंत्री एवं प्रवक्ता हैं।

ये सारा खेल बिहार की जातिवादी राजनीति की बिसात पर अपने-अपने मोहरे बैठाने के लिए है। बिहार में जातिगत सर्वे करवाकर राजद सुप्रीमो लालू यादव के बेटे तेजस्वी यादव पहले ही अपनी मंशा जता चुके हैं कि वे प्रदेश में किस तरह की राजनीतिक गोलबंदी करने की कोशिश कर रहे हैं। जदयू के साथ गठबंधन सरकार में जाति सर्वे कराने के बाद आनन-फानन में बिहार में 65 प्रतिशत आरक्षण लागू कर दिया गया।

हालाँकि, अदालत ने इसे 50 प्रतिशत की स्वीकृत सीमा से अधिक आरक्षण बताकर खारिज कर दिया। अब इसे इस आरक्षण को लागू करने के लिए के लिए धरना प्रदर्शन शुरू करने वाले हैं। उन्हें लगता है कि इस आरक्षण के नाम पर ओबीसी, एससी और एसटी समाज को राजद से जोड़ लेंगे। इससे पहले उनकी पार्टी के सांसद मनोज झा राज्यसभा में ‘ठाकुर का कुँआ’ कविता पढ़कर क्षत्रिय/राजपूत समाज के प्रति अपनी और पार्टी की मंशा जता चुके थे।

उस दौरान मनोज झा के बयान को लेकर देश भर में उनकी आलोचना हुई थी। हालाँकि, अपने बयान को सही साबित करने के लिए वे अपने मीडिया और अकादमी जगत के दोस्तों का सहारा लेकर उसे ह्वाइटवॉश करने की पूरी कोशिश किए। लेकिन, इस बयान ने राजद की अगली रणनीति के बारे में संकेत दे दिया था। यही राजनीति उनके पिता और बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू यादव ने भी शुरू की थी।

इसका परिणाम ये हुआ था कि बिहार में जगह-जगह नरसंहार होने शुरू हो गए थे। लोगों की लाशें गिरतीं और लालू यादव इसे राजनीतिक रंग देकर सत्ता की मलाई खाते रहे। इस उन्होंने 15 साल तक अपनी और अपनी पत्नी के रूप में बिहार की सत्ता संभाली और बिहार को इस बदहाली तक पहुँचा दिया। उनका कालखंड जंगलराज के रूप में आज भी बिहार के लिए एक काला अध्याय है, जिस पर आज भी कोई बात नहीं करना चाहता।

लालू यादव ने जातिवाद को राजनीति के रूप में इस्तेमाल करके और आगे चलकर इसे अपने बेटे को विरासत के रूप में सौंपकर लोकतंत्र को मजबूत नहीं, बल्कि कमजोर करने का प्रयास कर रहे हैं। लोकतंत्र एक वैचारिक उन्नति है, जिसमें शासन करने वाला सबको समान रूप से देखे और जो नीचे के पायदान पर रह गए हों, उन्होंने ऊपर उठाने की कोशिश करे।

यूनानी दार्शनिक अरस्तू ने भी कहा है कि ‘शासन उन्हें ही करना चाहिए, जो सबसे अच्छा शासन करने में सक्षम हैं’। यानी जो राजधर्म समझते हों, लोगों में परस्पर भाईचारा और समाज में समन्वय विकसित करने वाला ही लोकतंत्र में सच्चा नायक होता है। रॉबर्ट डाहल ने भी कहा है, “किसी देश में स्थिर लोकतंत्र की संभावनाएँ बेहतर होती हैं, यदि उसके नागरिक और नेता लोकतांत्रिक विचारों, मूल्यों और प्रथाओं का दृढ़ता से समर्थन करते हैं।”

हालाँकि, राजद के नेताओं में इन लोकतांत्रिक मूल्यों को लेकर किसी तरह की प्रतिबद्धता नहीं दिखती है। शायद ऐसे ही लोगों को लेकर अमेरिकी राजनेता, वकील, राजनयिक, लेखक ज़ॉन ऐडम ने लगभग 250 वर्ष पहले था लोकतंत्री की सफलता पर सवाल खड़ा किया था। हालाँकि, भारत लोकतंत्र की जननी है और लिच्छवी जैसे क्षत्रिय गणराज्यों ने इसे पाल-पोषकर वटवृक्ष बनाया है, जिसके कारण आज यह विश्व के कई देशों की सत्ता प्रणाली है।

जॉन ऐडम ने कहा था, “मैं यह नहीं कहता कि लोकतंत्र समग्र रूप से और लंबे समय में राजतंत्र या अभिजाततंत्र से ज़्यादा हानिकारक रहा है। लोकतंत्र कभी भी अभिजाततंत्र या राजतंत्र जितना टिकाऊ नहीं रहा है और न ही हो सकता है। लेकिन, जब तक यह टिका रहता है, यह इन दोनों से ज़्यादा ख़ूनी होता है। याद रखें, लोकतंत्र कभी भी लंबे समय तक नहीं टिकता। यह जल्द ही बर्बाद हो जाता है, थक जाता है और खुद को मार डालता है। अभी तक ऐसा कोई लोकतंत्र नहीं आया जिसने आत्महत्या न की हो।”

जॉन एडम ने लोकतंत्र की आत्महत्या की बात ऐसे नहीं की है। लोकतंत्र कोई आदमी नहीं है, जो तनाव या अवसाद में आत्महत्या कर लेगा। दरअसल, यह राजनेताओं द्वारा लोकतंत्र में निभाए जा रहे आचार और विचार भी लोकतंत्र को सफल या आत्मघाती बनाता है। भारत का लोकतंत्र कितना सफल है, इसे इस कसौटी पर कसकर देखा जा सकता है कि जिस देश में लगभग 4000 जातियाँ हैं, वहाँ ‘जिसकी जितनी आबादी, उसकी उतनी भागीदारी’ कितनी उचित है।

लोकतंत्र प्रबुद्धता, समर्पण, त्याग एवं सेवा का संचालक है। इसमें अगर कोई भी नेता सर्वसमाज की बात करता है तो वह उसे मजबूत करने की बात करता है। अगर किसी जाति विशेष की बात करता है तो वह लोकतंत्र को आत्महत्या के लिए उकसाने जैसा काम करता है। नेताओं के विचार, आचरण और समर्पण पर ही लोकतंत्र की महिमा और उसकी स्थिति टिकी हुई है। ये कोई गुण राजद में नहीं है।

ऐसा नहीं है यह राजद, जदयू, हम, लोजपा रामविलास, सपा या कॉन्ग्रेस की ही बात है। अब तक सबसे नैतिकता का दावा करने वाली पार्टी भाजपा के नेता भी जातिवादी राजनीति से अलग नहीं हो पाते। चाहे वो सांसद महेश शर्मा का बयान हो या मध्य प्रदेश विधानसभा के प्रोटेम स्पीकर रहे रामेश्वर शर्मा का जातीय घृणा से भरा हुआ बयान हो या गुजरात के परषोतम रूपाला का बयान हो। ये सब राजनीति को कमतर करने वाले हैं।

महान कृष्ण भक्त मीराबाई के गुरू रैदास ने कहा है, “जात पांत के फेर मंहि, उरझि रहइ सब लोग। मानुषता कूं खात हइ, रैदास जात कर रोग॥” अर्थात, अज्ञानवश सभी लोग जाति-पाँति के चक्कर में उलझकर रह गए हैं। वे इस जातिवाद के चक्कर से नहीं निकले तो एक दिन जाति का यह रोग संपूर्ण मानवता को निगल जाएगा।

आज राजनीति में जाति को बाँटने की नहीं, बल्कि जाति को जोड़ने वाली राजनीति होनी चाहिए। अशोक चौधरी ने भूमिहार समाज या मनोज झा ने क्षत्रिय समाज को निशाना बनाया है, उसे स्वस्थ लोकतंत्र की संज्ञा नहीं दी जा सकती। राजद और तेजस्वी इस परिभाषा से अलग हैं, क्योंकि इसका आधार ही जातिवाद है। इसलिए तेजस्वी या राजद के मायावी जाल में अन्य नेताओं को फँसने से बचना चाहिए।

खासकर यह बिहार के लिए बहुत जरूरी है, क्योंकि बिहार इस देश में जातिवाद की सबसे अधिक मार झेल रहा है। यहाँ के युवा शिक्षा और रोजगार के लिए अन्य राज्यों में जाने के लिए विवश हैं। उन राज्यों में उनके साथ दोयम दर्जे का व्यवहार किया जाता है। उनके साथ तिरस्कार की भावना प्रदर्शित की जाती है। ऐसे में बिहारी नेताओं को एकजुट होकर बिहार के विकास की संभावाएँ तलाशनी चाहिए।

देवभूमि उत्तराखंड में नाबालिग लड़की के साथ अश्लीलता, चमोली का सैलून संचालक आरिफ फरार: नाराज़ लोगों ने निकाली आक्रोश रैली, दुकान में तोड़फोड़

उत्तराखंड के चमोली जिले में एक नाबालिग लड़की से छेड़छाड़ की घटना से तनाव फैल गया है। छेड़छाड़ का आरोप सैलून चलाने वाले आरिफ पर लगा है। पीड़िता के परिजनों ने मामले की शिकायत पुलिस में दर्ज करवाई है। घटना से नाराज लोगों ने जुलूस निकाल कर विरोध जताया है। आरोपित की दुकान में तोड़फोड़ भी की गई है। शनिवार (31 अगस्त, 2024) को पुलिस ने केस दर्ज कर के फरार हो चुके आरिफ की तलाश शुरू कर दी है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह घटना चमोली जिले के नंदानगर की है। यहाँ शनिवार को एक नाबालिग पीड़िता के पिता ने थाने में तहरीर दी है। तहरीर में बताया गया था कि सैलून चलाने वाला 24 वर्षीय आरिफ पिछले लम्बे समय से पीड़िता को पीड़िता को गंदे-गंदे इशारे कर रहा था। शुरुआत में पीड़िता ने इन हरकतों को अनदेखा किया। 22 अगस्त को आरिफ ने एक बार फिर से पीड़िता को गंदे इशारे किए। इस बार पीड़िता ने रोते हुए अपनी माँ को सारी बात बता दी।

लड़की के पिता ने इसी दिन पुलिस में तहरीर दे कर आरोपित के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की माँग की। पुलिस ने केस दर्ज कर के जाँच शुरू कर दी।

इस बीच घटना की जानकारी हिन्दू संगठन के सदस्यों सहित स्थानीय जनता को भी लग गई। स्थानीय लोगों ने आरिफ की दुकान में तोड़फोड़ की। हालाँकि पुलिस ने मौके पर पहुँच कर लोगों को समझाया-बुझाया। घटना के विरोध में लोगों ने एक रैली निकाली और नारेबाज़ी की है। फिलहाल पुलिस मामले की जाँच व अन्य जरूरी कार्रवाई कर रही है।

पैसा आपका, वोट भी आपका… प्रभावित लेकिन कर रहा है बिग डाटा और AI: गोपनीयता अब एक मिथक

दुनिया में पाँच प्रमुख सागर हैं, जिनके नाम हममें से अधिकतर लोग जानते हैं। लेकिन एक ‘महासागर’ ऐसा भी है जिसके बारे में बहुत बातें होती हैं, पर सही जानकारी का अभाव है। इसे आधुनिक दुनिया का ‘तेल’ कहा जाता है — इसका नाम है ‘बिग डेटा’।

आपने सुना होगा कि फोन हमारी बातें सुनता है। दुनिया में 4.8 बिलियन स्मार्टफोन हैं। सोचिए, इन सभी की बातों को सुनने और इस डेटा को संग्रहीत करने वाला तंत्र कैसा होगा? इतने विशाल डेटा को कैसे संभाला जाता होगा? और क्या है वह एआई (AI: Artificial intelligence, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) जिससे दुनिया भयभीत रहती है? 

क्या आपको पता है कि फेसबुक रोज़ 4 पेटाबाइट डेटा उत्पन्न करता है? वहीं गूगल हर दिन 20 पेटाबाइट डेटा जेनरेट करता है। एक पेटाबाइट लगभग 10,00,000 जीबी के बराबर होता है। तो सवाल उठता है, इतने विशाल डेटा का प्रबंधन कैसे होता है?

कहानी शुरू होती है 1960 से 1980 के दशक से, जब पहली बार डेटा प्रबंधन की चुनौतियाँ सामने आईं। उस समय कंप्यूटर सीमित लोगों की पहुँच में थे और बड़े-बड़े मेनफ्रेम कंप्यूटरों पर डेटा प्रोसेसिंग होती थी। 90 के दशक में RDBMS का उदय हुआ, जिसने डेटा को व्यवस्थित और संग्रहीत करने में अहम भूमिका निभाई। SQL क्वेरी लैंग्वेज भी इसी समय विकसित हुई, जो आज IT की रीढ़ मानी जाती है।

2000 का दशक, वर्ल्ड वाइड वेब की क्रांति का समय था। इस क्रांति ने डेटा की दुनिया में एक विस्फोट कर दिया। वेब ने असीमित डेटा उत्पन्न किया, लेकिन इसे प्रोसेस करने के लिए तकनीक की कमी थी। 

इसी दौरान, गूगल ने इस चुनौती को स्वीकार किया और GFS (Google File System) विकसित किया। इसके बाद डग कटिंग और उनके साथियों ने HDFS (Hadoop Distributed File System) की खोज की, जिसमें कई सर्वर्स आपस में जुड़कर बड़े से बड़े डेटा को प्रोसेस कर सकते थे। इसके बाद फेसबुक के जोयदीप सेन शर्मा और आशीष ठीसू ने “Hive” विकसित किया, और फिर Spark जैसी तकनीक आई, जो Hadoop से लगभग 100 गुना तेज़ है। 

2010 के बाद, क्लाउड कंपनियों का उदय हुआ, जिनमें अमेज़न, माइक्रोसॉफ्ट, और गूगल प्रमुख हैं। इन क्लाउड सेवाओं ने लोगों को यह आजादी दी कि वे अपने डेटा को दुनिया के किसी भी कोने में स्टोर कर सकें और जरूरत के अनुसार स्पेस का उपयोग करें।

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के विकास ने इस तकनीक को और भी शक्तिशाली बना दिया। अब अगर आप अपने फोन पर स्पोर्ट्स शूज़ सर्च करते हैं, तो आपको विभिन्न प्लेटफॉर्मों पर स्पोर्ट्स शूज़ के विज्ञापन दिखने लगते हैं। यह AI और बिग डेटा का मेल है। 

हालाँकि, जितनी यह तकनीक लाभदायक है, उतनी ही खतरनाक भी साबित हो सकती है। किसी फर्म के पास आपके हर एक सेकंड की जानकारी हो, आपकी आदतों का ब्यौरा हो, तो आपके मन को नियंत्रित करना कितना आसान हो जाएगा। गोपनीयता अब एक मिथक बन चुकी है, और यह प्रक्रिया रुकने वाली नहीं है। 

किसी भी तकनीक के संभावित खतरों से बचाव के लिए ज्ञान ही हमारी सबसे बड़ी ढाल है। हमें खुद को नई जानकारियों से लैस रखना चाहिए ताकि कोई मशीन या तकनीक हमारे मौलिक निर्णयों को प्रभावित न कर सके, चाहे वह निर्णय किसी सामान की खरीदारी का हो या किसी को वोट देने का।

दुकान से लौट रही 7 साल की बच्ची का यौन शोषण, TMC नेता ने दिया मामले को रफा-दफा करने का ऑफर: RAF तैनात, बीरभूम और हावड़ा के बाद अब नॉर्थ 24 परगना में घटना

पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता में RG Kar मेडिकल कॉलेज एवं हॉस्पिटल में महिला डॉक्टर के साथ बलात्कार कर के हत्या कर दी गई। इसे लेकर जनाक्रोश थमा भी नहीं कि बीरभूम में अब्बासुद्दीन नामक शख्स द्वारा अस्पताल में भर्ती होकर नर्स के साथ छेड़खानी करने की घटना सामने आई। इसके बाद हावड़ा के एक अस्पताल में 13 साल की बच्ची के यौन शोषण का मामला सामने आया। वहीं अब नॉर्थ 24 परगना में नाबालिग लड़की के साथ यौन प्रताड़ना की घटना को अंजाम दिया गया है। लड़की की उम्र मात्र 7 वर्ष है।

मध्यमग्राम में आक्रोशित लोगों ने इस घटना के बाद आरोपित के घर पर हमला कर दिया और उसके रिश्तेदारों की दुकानें भी तहस-नहस कर दी। मामला तब बढ़ गया जब सत्ताधारी तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) के एक स्थानीय नेता ने पीड़िता के परिजनों को मामले को रफा-दफा करने का ऑफर दिया। पीड़िता के पिता ने बताया कि उनकी बेटी दुकान से लौट रही थी, इसी दौरान आरोपित ने यौन शोषण किया। आरोपित उसी गाँव का रहने वाला है। पीड़ित परिवार ने उसे कड़ी सज़ा दिए जाने की माँग की है।

पीड़िता के पिता ने कहा कि उन्होंने विश्वास ही नहीं हुआ कि आरोपित इस तरह की हरकत कर सकता है। आरोपित को गिरफ्तार कर लिया गया है। घटना रोहांडा पंचायत के राजभरी क्षेत्र की है। शनिवार (31 अक्टूबर, 2024) की रात को सामने आई। आरोपित के घर के बाहर स्थानीय लोगों ने प्रदर्शन किया। जिस TMC नेता के बयान को लेकर हंगामा हुआ, वो पंचायत सदस्य का पति है। उसके घर को भी प्रदर्शनकारियों ने निशाना बनाया, जिसके बाद RAF (रैपिड एक्शन फोर्स) को तैनात करना पड़ा।

पुलिस ने भीड़ को तितर-बितर करने के लिए आँसू गैस के गोलों का भी इस्तेमाल किया। पंचायत सदस्य के परिवार ने विपक्षी दल CPM पर इस हमले का आरोप लगाया है। उधर पश्चिम बंगाल के वीरभूम जिले में एक अस्पताल के अंदर नर्स के साथ छेड़छाड़ की घटना सामने आई। आरोपित का नाम अब्बासुद्दीन बताया जा रहा है। वहीं हावड़ा के एक अस्पताल में एक बच्ची के साथ यौन शोषण की घटना सामने आई है। लड़की की उम्र मात्र 13 वर्ष है, CT स्कैन के दौरान उसके साथ इस तरह की हरकत की गई। उसका पैंट खोला गया, किस किया गया और पूछा गया कि क्या वो पॉर्न देखती है।

इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती कराया गया अब्बासुद्दीन, नर्स से ही करने लगा छेड़खानी: दी गंदी-गंदी गालियाँ, कोलकाता और हावड़ा के बाद बीरभूम की घटना

पश्चिम बंगाल के वीरभूम जिले में एक अस्पताल के अंदर नर्स के साथ छेड़छाड़ की घटना सामने आई है। छेड़छाड़ का आरोप एक मरीज पर लगा है जिसका नाम अब्बासुद्दीन बताया जा रहा है। बुखार की दिक्कत बता कर भर्ती हुए अब्बासुद्दीन ने नर्स के दुर्व्यवहार शुरू कर दिया था। घटना शनिवार (31 अगस्त, 2024) की है। मामले की शिकायत पुलिस में दर्ज करवाई गई है जिस पर जाँच की जा रही है। आरोपित पर कार्रवाई न होने पर अस्पताल के स्टाफ ने काम बंद करने की भी चेतावनी दी है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, घटना वीरभूम जिले के इल्लामबाजार की है। यहाँ शनिवार को पीड़िता ने पुलिस में शिकायत दर्ज करवाई है। शिकायत में बताया गया है कि घटना की रात अब्बासुद्दीन इलाज के लिए स्वास्थ्य केंद्र लाया गया था। वह स्ट्रेचर पर लाया गया था। उसके साथ तीमारदार के तौर पर उसके परिवार के अन्य सदस्य भी थे। इलाज के लिए अब्बासुद्दीन को इमरजेंसी वार्ड में भर्ती करवाया गया। थोड़ी देर बाद डॉक्टरों के निर्देश पर एक नर्स को ड्रिप चढ़ाने के लिए वहाँ गई।

आरोप है कि वार्ड में अब्बासुद्दीन ने नर्स के साथ छेड़छाड़ शुरू कर दी। अब्बासुद्दीन की इस हरकत पर नर्स बेहद डर गई और विरोध किया। विरोध से भड़क अब्बासुद्दीन ने पीड़िता को गंदी-गंदी गालियाँ देना शुरू किया। नर्स वार्ड से लौट आई और अपने अन्य सहकर्मियों को इस घटना की जानकारी दी। अस्पताल के अन्य स्टाफ अब्बासुद्दीन की हरकत से खफा हो गए। उन्होंने मामले की तहरीर में पुलिस में दी है। आरोपित पर कड़ी कार्रवाई न होने पर उन्होंने काम बंद करने की चेतावनी भी दी है।

मामले में एक आरोपित को गिरफ्तार किया गया है। फिलहाल पुलिस मामले की जाँच व अन्य जरूरी कानूनी कार्रवाई कर रही है।

बताते चलें कि अस्पतालों की महिला स्टाफ की सुरक्षा को ले कर पश्चिम बंगाल में इस समय आंदोलन जोरों पर है। राजनैतिक दलों से ले कर छात्र संगठनों ने महिलाओं की सुरक्षा बेहतर करने के लिए सड़कों पर उतर कर प्रदर्शन किया है। यह प्रदर्शन RG कर मेडिकल कॉलेज की वारदात के बाद शुरू हुए हैं। सुप्रीम कोर्ट तक ने अस्पतालों में काम करने वाली महिलाकर्मियों की सुरक्षा के लिए केंद्रीय बलों की नियुक्ति का आदेश दिया है।

साले की घर वाली पर ही आ गया रमज़ान का दिल, इनकार करने पर पेट्रोल छिड़क ससुराल में लगा दी आग: 4 की मौत, मृतकों में वो खुद और एक बच्चा भी शामिल

पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले में एक युवक ने अपने साले की बीवी से निकाह न होने पर ससुराल वालों सहित खुद को भी आग लगा दी है। इस आगजनी ने आरोपित रमजान सहित कुल 4 लोगों की मौत हो गई है जबकि 2 अन्य गंभीर रूप से घायल हुए हैं। मृतकों में एक बच्चा भी शामिल है। घटना शुक्रवार (30 अगस्त, 2024) की है। पुलिस मामले की जाँच कर रही है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक यह घटना मुर्शिदाबाद जिले के थानाक्षेत्र सागरदिघी की है। यहाँ के गाँव बहालनगर में रमज़ान का काफी समय पहले निकाह हुआ था। 2 साल पहले रमज़ान की बीवी की मौत हो गई थी। बीवी के मरने के बाद भी रमज़ान अपनी ससुराल आता-जाता रहा। इसी दौरान रमज़ान का दिल अपने साले की बीवी पर आ गया। वह मन ही मन अपने साले की बीवी से निकाह करने के सपने पालने लगा। इसी सपने को हकीकत में बदलने के लिए रमज़ान शुक्रवार को अपनी ससुराल पहुँच गया।

ससुराल पहुँच कर रमज़ान ने अपने मन की बात जाहिर की। उसके साले की बीवी सहित अन्य ससुरालीजन इस प्रस्ताव से हैरान हो गए। उन्होंने रमज़ान के इस ऑफर को ख़ारिज कर दिया। अपने सपने चूर-चूर होता देख कर रमज़ान का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुँच गया। उसने पहले गालियाँ बकनी शुरू कर दीं और इसके विरोध होने पर वो मारपीट पर उतारू हो गया। आरोप है कि रमज़ान किसी बड़ी घटना को अंजाम देने की साजिश पहले ही रच कर आया था। वो अपने साथ पेट्रोल भी ले कर पहुँचा था।

अपनी मंशा पूरी तरह से ख़ारिज होने से खफा रमज़ान ने पेट्रोल छिड़क कर अपनी ससुराल में आग लगा दी। कुछ ही देर में आग की चपेट में पूरा मकान आ गया। आसपास के लोगों ने आग बुझाने की कोशिश की। जब तक आग पर काबू पाया गया तब तक रमज़ान सहित 4 लोगों की जल कर मौत हो चुकी थी। इन चार मृतकों में एक नाबालिग बच्चा भी शामिल है। वहीं इसी घटना में 2 अन्य लोग गंभीर रूप से झुलस गए हैं जिनका इलाज अस्पताल में चल रहा है। पुलिस पूरे मामले की जाँच और अन्य जरूरी कानूनी कार्रवाई कर रही है।

Kiss किया, पैंट खोला, पूछा – पॉर्न वीडियो देखती हो? RG Kar के बाद अब हावड़ा के अस्पताल में 13 साल की लड़की का यौन शोषण, रोती निकली पीड़िता

पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता स्थित RG Kar मेडिकल कॉलेज एवं हॉस्पिटल में एक महिला डॉक्टर के साथ बलात्कार और हत्या की घटना को लेकर अभी आक्रोश थमा भी नहीं था कि अब हावड़ा के एक अस्पताल में एक बच्ची के साथ यौन शोषण की घटना सामने आई है। लड़की की उम्र मात्र 13 वर्ष है, CT स्कैन के दौरान उसके साथ इस तरह की हरकत की गई। आरोपित अमन राज को गिरफ्तार कर लिया गया है। वो सीटी स्कैन डिपार्टमेंट में अस्थायी कर्मचारी के रूप में तैनात था।

13 वर्षीय बच्ची को न्यूमोनिया की शिकायत के कारण हॉस्पिटल में एडमिट कराया गया था। बुधवार (28 अगस्त, 2024) को उक्त बच्ची को अस्पताल लाया गया था। शनिवार की रात को बच्ची को CT स्कैन के लिए ले जाया गया। इसके थोड़ी देर बाद ही लड़की को रोती हुई वहाँ से बाहर आते हुए देखा गया। रोती हुई पीड़िता ने एक अन्य मरीज के परिजन से मदद माँगी। लड़की की माँ अस्पताल के बाहर थी, वो ये सब देख कर दौड़ती हुई अंदर आई और बच्ची से सारी बात पूछी।

इसके बाद अस्पताल परिसर में इस घटना की खबर फैल गई और स्थानीय लोग आक्रोशित हो गए। इसके बाद लड़की के परिजन और अन्य रिश्तेदार अस्पताल पहुँच गए और उन्होंने आक्रोश प्रकट किया। आरोपित को पकड़ कर पीटने की कोशिश भी की गई। हावड़ा पुलिस घटना की सूचना मिलने के बाद मौके पर पहुँची और भीड़ से बचा कर आरोपित को हिरासत में लिया गया। परिजनों की शिकायत पर FIR दर्ज कर ली गई है। घटना की जाँच की जा रही है।

लड़की ने बताया है कि आरोपित ने उसका पैंट खोलने की कोशिश की और पूछा कि क्या उसने गंदे वीडियो देखे हैं। साथ ही उसने लड़की को किस भी किया था। कॉन्ग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी ने कहा कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी जिम्मेदारों से भाग रही हैं और इसीलिए CBI को दोष दे रही हैं। गायिका श्रेया घोषाल ने भी सितंबर में होने वाले अपने कंसर्ट को आगे बढ़ा दिया है। TMC सरकार की पुलिस ने प्रदर्शनकारियों के खिलाफ बल-प्रयोग भी किया था।

डायरेक्टर ने सेक्स के लिए एडजस्टमेंट करने को कहा, प्रोड्यूसर ने रेप के लिए साड़ी खींची: हिरोइन चार्मिला ने बताई मलयालम फिल्मों की एक और गंदी बात

निर्देशक हरिहरन के खिलाफ अभिनेत्री चार्मिला द्वारा लगाए गए आरोपों की अभिनेता विष्णु ने पुष्टि की है। विष्णु के अनुसार, निर्देशक ने उनसे पूछा था कि ‘क्या वह एडजस्ट करेंगी’? विष्णु ने बताया कि उन्हें चार्मिला से यह पूछने के निर्देश दिए गए थे कि क्या वह कुछ माँगों को पूरा करेंगी। जब चार्मिला ने मना तो विष्णु ने यह बात हरिहरन को बताई। आखिरकार, चार्मिला को फिल्म ‘परिणयम’ में निकाल दिया गया।

चार्मिला ने आरोप लगाया था कि निर्देशक हरिहरन ने उनसे पूछा कि क्या वह ‘एडजस्टमेंट’ (सेक्स के लिए तैयार होने के संदर्भ में) के लिए तैयार हैं। चार्मिला ने कहा, “उन्होंने मेरे दोस्त और अभिनेता विष्णु से पूछा कि क्या मैं एडजस्टमेंट के लिए तैयार हूँ। चूँकि, मैंने ‘नहीं’ कहा, इसलिए हरिहरन ने हम दोनों को अपनी फिल्म ‘परिणयम’ से हटा दिया।”

उन्होंने सन 1997 में आई फिल्म ‘अर्जुनन पिल्लयम अंचू मक्कलम’ के सेट पर हुई एक भयानक घटना का भी जिक्र किया। इसको लेकर अभनेत्री ने दावा किया कि सेट पर उनकी सहयोगी के साथ रेप और उनके साथ मारपीट क की गई थी। चार्मिला ने बताया कि निर्माता एमपी मोहनन और प्रोडक्शन मैनेजर दोनों ने उनकी साड़ी खींचकर रेप की कोशिश की थी।

35 से ज़्यादा मलयालम फ़िल्मों में काम कर चुकी चार्मिला ने बताया, “साल 1997 में ‘अर्जुनन पिल्लयम अंजु मक्कलम’ की शूटिंग के दौरान निर्माता एमपी मोहनन, प्रोडक्शन मैनेजर शानमुखन और उनके दोस्तों ने मेरे साथ सामूहिक बलात्कार करने की कोशिश की थी। मैं किसी तरह होटल के कमरे से भागने में कामयाब रही। उन्होंने मेरी साड़ी उतारने की कोशिश की।”

ऑनमनोरमा की रिपोर्ट के मुताबिक, अभिनेत्री ने आगे बताया, “उन्होंने मेरे असिस्टेंट के साथ भी यौन उत्पीड़न किया। एक पुरुष असिस्टेंट के साथ मारपीट की गई। जिस होटल में मैं ठहरी थी, वहाँ की रिसेप्शनिस्ट भी इसमें शामिल थी। एक ऑटो-रिक्शा ड्राइवर ने हमें बचाया। हालाँकि मैं बच गई, लेकिन उन्होंने उस फ़िल्म में काम कर रहे जूनियर आर्टिस्ट के साथ बलात्कार किया।”

उन्होंने यह भी बताया कि निर्देशक हरिहरन ने उनसे पूछा कि क्या वह ‘एडजस्टमेंट’ (सेक्स के लिए तैयार होने के संदर्भ में) के लिए तैयार हैं। चार्मिला ने कहा, “उन्होंने मेरे दोस्त और अभिनेता विष्णु से पूछा कि क्या मैं एडजस्टमेंट के लिए तैयार हूँ। चूँकि, मैंने ‘नहीं’ कहा, इसलिए हरिहरन ने हम दोनों को अपनी फिल्म ‘परिणयम’ से हटा दिया।”

अभिनेत्री ने कहा, “मैंने चार भाषाओं में काम किया है। ऐसी समस्याएँ मुख्य रूप से मलयालम उद्योग में हैं।” चार्मिला ने कहा कि वह शिकायत करने के लिए आगे नहीं आना चाहती थीं, क्योंकि उनका एक बेटा भी है। चार्मिला ने स्वीकार किया कि अनुचित माँगों को पूरा करने से इनकार करने के कारण उन्हें कम फिल्में आदि ऑफर की जा रही हैं।

बांग्लादेश में हिंदू टीचर-प्रोफेसरों से जबरन इस्तीफा ले रहे कट्टरपंथी: प्रिंसिपल शुक्ला रानी हलदर को ऑफिस में घेरा, धमकी देकर सिर्फ 4 शब्द लिखवाया- ‘मैं इस्तीफा देती हूँ’

भारत समर्थक माने जाने वाली प्रधानमंत्री शेख हसीना के तख्ता पलट के बाद बांग्लादेश में अल्पसंख्यक हिंदुओं पर कहर जारी है। एक तरफ हिंदू ग्रामीणों के घर-मकानों में लूट-पाट करके उन्हें आग के हवाले किया जा रहा है तो दूसरी तरफ महिलाओं से बलात्कार की घटनाओं को अंजाम दिया जा रहा है। अब सरकारी नौकरी में शामिल हिंदुओं को इस्तीफा देने के लिए दबाव बनाया जा रहा है।

5 अगस्त 2024 को हसीना सरकार के पतन के बाद हिंदू सरकारी शिक्षकों को इस्तीफा के लिए मजबूर किया जा रहा है। सामने आई रिपोर्ट में अब तक कम-से-कम 50 हिंदू शिक्षकों को नौकरी छोड़ने के लिए मजबूर किया गया है। हालाँकि, वास्तविक संख्या बहुत अधिक है। ऐसे ही एक मामले में बरिशाल के बेकरगंज सरकारी कॉलेज की प्रिंसिपल शुक्ला रानी हलदर को इस्तीफा के लिए मजबूर किया गया।

बांग्लादेशी दैनिक प्रोथोम अलो ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि 29 अगस्त 2024 को छात्रों और बाहरी लोगों की भीड़ ने उनके कार्यालय पर धावा बोल दिया और उनसे इस्तीफे की माँग करने लगे। इस दौरान उन्हें तरह-तरह से धमकी दी गई। इन धमकियों के बीच हलदर ने एक सादे पर ‘मैं इस्तीफा देती हूँ’ लिख दिया। इस तरह उन्हें सरकारी नौकरी से हटने के लिए मजबूर कर दिया गया।

स्थानीय रिपोर्ट के मुताबिक, प्रिंसिपल हलदर के खिलाफ विरोध प्रदर्शन का नेतृत्व स्थानीय बीएनपी नेता के बेटे ने किया, जो कॉलेज में छात्र है। उसके साथ अधिकतर लोग बीएनपी के ही कार्यकर्ता थे। बीएनपी खालिदा जिया की पार्टी है, जो कट्टरपंथी गतिविधियों में संलिप्त रही है। वह शेख हसीना की विरोधी है। सेना को वर्तमान में इसका समर्थन प्राप्त है।

हिंदुओं के खिलाफ नफरत के कुख्यात बीएनपी पार्टी के कार्यकर्ताओं ने प्रिंसिपल शुक्ला रानी हलदर पर वित्तीय भ्रष्टाचार, अनियमित उपस्थिति और अन्य कदाचार का आरोप लगाते हुए उनसे इस्तीफ़े की माँग की। कुछ प्रदर्शनकारियों ने उनके दफ़्तर पर धावा बोल दिया और उन्हें तरह-तरह से धमकाते हुए अपने पद से इस्तीफ़ा देने का दबाव बनाया।

आखिरकार दोपहर 2:00 बजे शुक्ला रानी हलदर को एक खाली कागज़ पर “मैं इस्तीफ़ा देती हूँ” लिखने के लिए मजबूर किया गया। फिर उन्हें कागज़ पर हस्ताक्षर करने और मुहर लगाने के लिए मजबूर किया गया। प्रिंसिपल शुक्ला रानी हलदर ने कहा, “मेरे कुछ छात्रों ने मुझे बहुत अपमानित किया है। हालाँकि, इसमें छात्रों से ज़्यादा बाहरी लोग शामिल थे।”

उन्होंने आगे कहा, “उन्हें शांत करने में असमर्थ होने के बाद मेरे पास इस्तीफ़ा देने के अलावा कोई विकल्प नहीं था। अब, पूरे मामले का फ़ैसला शिक्षा मंत्रालय के उच्च अधिकारियों द्वारा किया जाएगा।” अपने खिलाफ़ लगे आरोपों पर उन्होंने कहा, “किसी भी आरोप के लिए कोई ठोस सबूत नहीं है। शिक्षकों के बीच आपसी लड़ाई है और एक गुट ने मेरे खिलाफ़ छात्रों और बाहरी लोगों का इस्तेमाल किया है।”

प्रिंसिपल हलदर के समर्थन में उतरे शिक्षक एवं छात्र-छात्राएँ

सरकारी बीएम कॉलेज में प्रबंधन विभाग की पहली महिला शिक्षिका एवं अध्यक्ष प्रोफेसर शाह साजेदा ने इस मामले पर कहा, “जब मैंने देखा कि मेरी जूनियर सहकर्मी शुक्ला के साथ कैसा व्यवहार किया गया तो मेरी आँखों से आँसू छलक आए। जब ​​से मैंने सोशल मीडिया पर उनकी असहाय और हताश छवि देखी है, मैं खुद को माफ नहीं कर पा रही हूँ। एक महिला शिक्षिका के साथ ऐसा व्यवहार अस्वीकार्य है।”

दरअसल, 14वें बीसीएस शिक्षा संवर्ग की अधिकारी शुक्ला रानी हलदर ने 2022 के मध्य में बेकरगंज सरकारी कॉलेज की प्रिंसिपल के रूप में अपना पद-भार संभाला। इससे पहले, उन्होंने बरिशाल में सरकारी ब्रोजोमोहन (बीएम) कॉलेज में अंग्रेजी की प्रोफेसर के रूप में काम किया। हलदर की तस्वीरें वायरल होने के बाद स्थानीय स्तर पर सोशल मीडिया पर बांग्लादेशी सरकार की खूब आलोचना हो रही है।

बीएम कॉलेज की पूर्व छात्रा मीता मिटू ने फेसबुक पर निराशा व्यक्त करते हुए लिखा, “शुक्ला रानी मैडम बीएम कॉलेज में अंग्रेजी विभाग में मेरी पसंदीदा शिक्षिका थीं। वह वर्तमान में बेकरगंज सरकारी कॉलेज में प्रिंसिपल हैं। उन्हें इस्तीफा देने के लिए मजबूर किया गया है। वह एक असाधारण व्यक्ति हैं, जो हमेशा खुश एवं मुस्कुराती रहती हैं। मैडम, आप जैसे लोग इस तरह के व्यवहार के लायक नहीं हैं। उन्हें माफ़ करें।”

बरिशाल गवर्नमेंट आईएचटी के एक अन्य पूर्व छात्र एमएम जुबैर ने फेसबुक पर लिखा, “जब मैं बरिशाल गवर्नमेंट आईएचटी में था, तब मैडम ने हमें अतिथि शिक्षक के रूप में पढ़ाया था। वह एक गर्मजोशी से भरी, छात्रों के अनुकूल शिक्षिका हैं, जो हमेशा मुस्कुराती रहती हैं। बीएम कॉलेज में सेवा देने के बाद वह अब बेकरगंज गवर्नमेंट कॉलेज में प्रिंसिपल हैं।”

बांग्लादेश की वर्तमानन स्थिति पर चिंता व्यक्त करते हुए एमएम जुबैर ने आगे लिखा, “मेरा मानना ​​है कि कोई अपने फायदे के लिए छात्रों का शोषण कर रहा है। उनके पूर्व छात्र और बांग्लादेश के एक चिंतित नागरिक के रूप में मैं इस घटना का विरोध करता हूँ और उचित जाँच की माँग करता हूँ। कृपया उन्हें माफ कर दें, मैडम।” फेसबुक पर छात्र-छात्राओं के बयान भरे पड़े हैं, जो उनके आक्रोश को दिखाते हैं।

वहीं, बीसीएस कैडर के एक अधिकारी ने प्रोथोम एलो नाम के मीडिया हाउस से नाम नहीं छापने की शर्त पर बात करते हुए कहा, “हलदर मैडम मेरी शिक्षिका थीं। उनका अपना कोई बच्चे नहीं है। छात्र-छात्राएँ ही उनके बच्चों की तरह थे। मैं ऐसे आदर्श शिक्षक के साथ किए गए क्रूर व्यवहार को स्वीकार नहीं कर सकता।” बांग्लादेश का संभ्रांत वर्ग भी वर्तमान सत्ता और उसके क्रूर व्यवहार की आलोचना कर रहा है।

उन्होंने ट्वीट किया, “बांग्लादेश में शिक्षकों को इस्तीफा देने के लिए मजबूर किया जा रहा है। पत्रकार, मंत्री, पूर्व सरकार के अधिकारी मारे जा रहे हैं, परेशान किए जा रहे हैं, जेल में बंद किए जा रहे हैं। जनरल जेड ने अहमदिया मुसलमानों के उद्योग जला दिए हैं। इस्लामी आतंकवादियों ने सूफी मुसलमानों की मजारें और दरगाहें ध्वस्त कर दी हैं। यूनुस इसके खिलाफ कुछ नहीं कहते।”

प्रिंसिपल हलदर ही नहीं, 50+ शिक्षक-शिक्षिकाओं से इस्तीफा

इसी तरह 18 अगस्त को अजीमपुर सरकारी गर्ल्स स्कूल एवं कॉलेज की लगभग 50 छात्राओं ने प्रिंसिपल गीतांजलि बरुआ और सहायक प्रिंसिपल गौतम चंद्र पाल को घेर कर उनसे इस्तीफा माँगने लगीं। इनमें शारीरिक शिक्षक शहनाज अख्तर भी थीं। गीतांजली ने डेली स्टार को बताया, “18 अगस्त से पहले उन्होंने मेरा इस्तीफा नहीं माँगा। उस दिन वे मेरे कार्यालय में घुस आईं और मुझे अपमानित किया।”

इसी तरह कबि नज़रूल विश्वविद्यालय के लोक प्रशासन और शासन अध्ययन विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर संजय कुमार मुखर्जी को भी इस्तीफा देने के लिए मजबूर किया गया। मुखर्जी ने इंडिया टुडे से बातचीत में कहा, “मुझे प्रॉक्टर और विभागाध्यक्ष के पद से इस्तीफ़ा देने के लिए मजबूर किया गया। हम इस समय बहुत कमज़ोर स्थिति में हैं।” हालाँकि, इन शिक्षकों में से 19 को फिर बहाल कर दिया गया है।

बता दें कि देश भर में ऐसी कई घटनाएँ हुई हैं। सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे फोटो में छात्रों द्वारा शिक्षकों और अकादमिक प्रशासकों को त्यागपत्र पर हस्ताक्षर करने के लिए मजबूर करते हुए देखा जा सकता है। दिन-पर-दिन बिगड़ती जा रही स्थिति के बीच बांग्लादेश में हिंदू शिक्षकों के साथ-साथ अन्य सरकारी सेवाओं में काम करने वाले लोगों के बीच भय और असहाय होने की भावना बढ़ती जा रही है।

बांग्लादेश हिंदू बौद्ध ईसाई ओइक्या परिषद की छात्र शाखा ‘बांग्लादेश छात्र ओइक्या परिषद’ ने शनिवार (31 अगस्त 2024) को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की। इस दौरान हिंदू सहित अन्य अल्पसंख्यकों के खिलाफ कार्रवाइयों की निंदा की और उनके खिलाफ बढ़ती असहिष्णुता पर बात की। निर्वासित बांग्लादेशी लेखिका तस्लीमा नसरीन ने अल्पसंख्यकों की सुरक्षा नहीं करने के लिए मुहम्मद यूनुस सरकार पर निशाना साधा।

संगठन के समन्वयक साजिब सरकार ने कहा कि शेख हसीना सरकार के पतन के बाद धार्मिक और जातीय अल्पसंख्यकों को हमलों, लूटपाट, महिलाओं पर हमले, मंदिरों में तोड़फोड़, घरों और व्यवसायों पर आगजनी और हत्याओं का सामना करना पड़ा है। इसके अलावा, अल्पसंख्यक शिक्षकों पर शारीरिक हमला किया गया है और उनमें से 50 को 30 अगस्त तक इस्तीफा देने के लिए मजबूर किया गया है।