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झारखंड में एक भी बांग्लादेशी नहीं… हेमंत सोरेन सरकार का दावा हाई कोर्ट के गले भी नहीं उतरा, पूछा- 60 साल में 16% कैसे कम हो गई ST आबादी

झारखंड हाई कोर्ट ने बांग्लादेशी घुसपैठ मामले में झारखंड सरकार पर प्रश्न उठाए हैं। हाई कोर्ट ने सरकार से पूछा है कि जब बांग्लादेशी घुसपैठ से इनकार किया जा रहा है तो भला जनजातीय जनसंख्या कैसे घट गई। हाई कोर्ट ने संथाल परगना में जनजातीय समाज (ST) की जनसंख्या घटने को लेकर प्रश्न पूछे हैं।

झारखंड हाई कोर्ट ने बांग्लादेशी घुसपैठ को लेकर दायर की गई एक याचिका की सुनवाई में यह सब बाते कही हैं। झारखंड हाई कोर्ट ने 22 अगस्त, 2024 को इस मामले की सुनवाई की है। इस दौरान हाई कोर्ट के सामने संथाल परगना के सभी जिलों के डिप्टी कमिश्नरों ने बांग्लादेशी घुसपैठ को हलफनामा दायर किया है।

यह हलफनामे गोड्डा, देवघर, जामताड़ा, पाकुड़, साहिबगंज और दुमका जिलों के प्रशासन की तरफ से दाखिल किए गए हैं। इस हलफनामे में प्रशासन ने दावा किया है कि इन जिलों में कोई भी बांग्लादेशी घुसपैठिया नहीं आया है। प्रशासन के इस दावे पर हाई कोर्ट ने नाराजगी जाहिर की है।

हाई कोर्ट ने इस संबंध में कहा, “इस कोर्ट ने संबंधित जिलों के DC की ओर से दायर हलफनामे का अध्ययन किया है, जिसमें कहा गया है कि बांग्लादेशी प्रवासियों की कोई घुसपैठ नहीं हुई है, लेकिन इन क्षेत्रों में अनुसूचित जनजातियों की संख्या कम होने के कारण के संबंध में कोई बात नहीं बताई गई है।”

हाई कोर्ट ने आगे इसी मामले पर प्रश्न उठाए हुए कहा, “सवाल यह है कि यहाँ रखे गए आँकड़ों में इस क्षेत्र में (संथाल परगना) अनुसूचित जनजातियों की जनसंख्या 1951 में 44.67% थी जो वर्ष 2011 में घट कर 28.11% तक आ गई। इसे दिनांक 8 अगस्त, 2024 के आदेश में नोट भी किया गया है। लेकिन हैरानी की बात है कि हलफनामे में इन क्षेत्रों में आदिवासियों की जनसंख्या में कमी के बारे में कोई प्रासंगिक आँकड़े प्रस्तुत नहीं करके उस बिंदु पर कोई जवाब नहीं दिया गया है।”

गौरतलब है कि इस मामले की पहले सुनवाई में कोर्ट ने राज्य में बांग्लादेशी घुसपैठ पर चिंता जताते हुए राज्य सरकार को आदेश दिया था कि वह इनकी पहचान करे। कोर्ट ने कहा था कि राज्य सरकार राज्य में अवैध रूप से घुसने वालों की पहचान करके आँकड़े तैयार करे और उन्हें राज्य से बाहर करे। इसको लेकर संथाल परगना के जिलों ने कमिटियों का गठन किया था। इन कमिटियों का काम जिलों में बांग्लादेशी घुसपैठियों की पहचान करना था। अब इस मामले में इन जिलों के प्रशासन ने कहा है कि राज्य में कोई घुसपैठिया नहीं है।

सरकार कह रही घुसपैठ नहीं, लेकिन वोट बेतहाशा बढ़े

जहाँ झारखंड सरकार घुसपैठ की बात को कोर्ट के भीतर नकार रही है वहीं विपक्षी दल दूसरी चिंताएँ जता रहे हैं। हाल ही में भाजपा की रिपोर्ट में सामने आया है कि मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्रों में वोटरों की संख्या में अप्रत्याशित बढ़त 20% से 123% तक की है। यह बढ़त इन 10 विधानसभा के कुल 1467 बूथ पर हुई है।

भाजपा ने बताया है कि सामान्यतः पाँच वर्षों में 15% से 17% की वृद्धि होती है, इसीलिए यह वृद्धि असामान्य है। भाजपा ने यह भी बताया है कि हिन्दू आबादी वाले बूथ पर वोटरों की संख्या में बढ़त मात्र 8% से 10% हुई है। भाजपा ने यह भी बताया है कि कई बूथ पर हिन्दू मतदाता घट भी गए हैं।

नई नहीं है डेमोग्राफी बदलने की बात

झारखंड हाई कोर्ट की टिप्पणी को रेखांकित करने वाली काफी सारी घटनाएँ पहले भी सामने आ चुकी हैं। इससे पहले मार्च, 2024 में आजतक की एक रिपोर्ट में याचिका में बताई गई समस्या को लेकर ही बात की गई थी। आजतक की रिपोर्ट में बताया गया था कि यहाँ बांग्लादेशी मुस्लिम घुसपैठिए, पश्चिम बंगाल के रास्ते आते हैं। इसके बाद वह बस जाते हैं। इनमें से कुछ आदिवासियों की लड़कियों को निशाना बनाते हैं। जब लडकियाँ उनके दिखावे में फंस जाती हैं तो उनसे शादी कर ली जाती है।

शादी के बाद लड़की की कागजों में पहचान जनजाति के तौर पर ही रहने दी जाती है। इसके बाद उस लड़की के नाम पर जमीन ली जाती है या फिर उसकी ही जमीन कब्जा ली जाती है। रिपोर्ट में बताया गया था कि यह सब करने के लिए बांग्लादेश से आने वाले घुसपैठियों को फंडिंग मिलती है। लड़की की पहचान जनजातीय रखने के पीछे सरकारी फायदे लेने के मकसद रहता है। इसके अलावा कई जगह उन लड़कियों को चुनाव भी लड़वाया गया, जिन्होंने मुस्लिमों से शादी की।

आजतक की रिपोर्ट में यह तक बताया गया था कि यहाँ घुसपैठ करने वाले बांग्लादेशी इस जमीन में खनन के लिए भी ऐसा कर रहे हैं। कुल मिलाकर धीमे-धीमे इस इलाके की पहचान बदली जा रही है। बांग्लादेशी घुसपैठिए झारखंड में घुसते ही फर्जी पहचान पत्र भी बनवा लेते हैं। इसमें इनकी मदद पहले से आकर बस चुके लोग भी करते हैं।

2272 जातियाँ/जनजातियाँ टारगेट, हर गाँव से डाटा इकट्ठा करने के लिए एजेंट: भारतीयों को ईसाई बना रहा अमेरिका का ‘जोशुआ प्रोजेक्ट’, 6 करोड़ लोगों तक पहुँचे

भारत में लम्बे समय से हिन्दुओं और विशेष कर जनजातीय समूहों को ईसाई बनाने का काम चल रहा है। इसके लिए ईसाई मिशनरी नैतिक-अनैतिक तरीके सब अपनाती आई हैं। ईसाईयत फैलाने के लिए विदेशों से भी फंडिंग होती रही है। ईसाइयत में धर्मांतरण करवाने वालों के निशाने पर गरीब और पिछड़े हिन्दू सबसे अधिक रहे हैं। उन इलाकों में भी ईसाइयत ने पैर पसारे हैं, जहाँ आज भी सामान्य सुविधाएँ पहुँच नहीं पाई हैं। कहीं अच्छे इलाज तो कहीं पढ़ाई के नाम पर लोगों को अपना धर्म छोड़ ईसाइयत में आने को बरगलाया जा रहा है।

भारत में ईसाई धर्म को बढ़ावा देने में जोशुआ प्रोजेक्ट बड़ी भूमिका निभा रहा है। अमेरिका से चलने वाला यह संगठन भारत की जातियों-जनजातियों और अन्य समूहों के आँकड़े इकट्ठा करके उनको ईसाई बनाने का प्रयास कर रहा है। जोशुआ प्रोजेक्ट ने भारत में 2000 से अधिक जातियों और समुदायों के आँकड़े इकट्ठा किए हैं। जोशुआ प्रोजेक्ट मात्र भारत ही नहीं बल्कि विश्व के बाकी हिस्सों में भी काम कर रहा है। इसके निशाने पर अधिकांश वह देश हैं, जहाँ ईसाइयत अभी बड़े पैमाने पर अपने पैर नहीं पसार पाई है।

क्या है जोशुआ प्रोजेक्ट?

जोशुआ प्रोजेक्ट उनको ईसाई बनाने का मिशन है जो इसमें आस्था नहीं रखते। यह संगठन अमेरिका से काम करता है। इसे 1995 में चालू किया गया था। इसे चार लोगों ने मिलकर चालू किया था। इन चार व्यक्तियों में एक भारतीय भी था। जोशुआ प्रोजेक्ट की वेबसाइट बताती है कि यह बाइबल में दिए गए एक निर्देश पर काम करता है। जोशुआ का कहना है कि बाइबल के मैथ्यू 28:19 में उन्हें विश्व के अलग-अलग हिस्सों में लोगों को ईसाइयत का अनुयायी बना कर उनका बाप्तिस्मा बनाने का आदेश मिला है, जिस पर वह काम कर रहे हैं।

जोशुआ प्रोजेक्ट का मुख्य काम उन समूह के आँकड़े इकट्ठा करना है, जिनमें अभी तक ईसाइयत का प्रभाव नहीं हुआ है। जोशुआ प्रोजेक्ट को इसके लिए पैसा कहाँ से आता है, यह स्पष्ट नहीं है। हालाँकि, जोशुआ प्रोजेक्ट अपनी वेबसाइट पर ईसाइयत को बढ़ाने के लिए दान माँगता है। जोशुआ प्रोजेक्ट ने जो समूह ईसाइयत से दूर हैं, उनके लिए एक नक्शा बनाया है। विश्व के नक़्शे पर एक इलाका भी बनाया गया है, जो ईसाइयत से सबसे दूर है। इसे जोशुआ प्रोजेक्ट ने ’10:40 विंडो’ का नाम दिया है।

यह 10:40 विंडो अक्षांश पर 10 डिग्री उत्तर और 40 डिग्री उत्तर के बीच पड़ने वाले देशों का एक इलाका है। इसमें भारत, चीन, सऊदी अरब और म्यांमार जैसे देश आते हैं। जोशुआ प्रोजेक्ट का कहना है कि यह देश ईसाइयत का प्रतिरोध करते रहे हैं, इसलिए इनमें ईसाइयत का प्रचार करने की सबसे पहले जरूरत है।

कैसे काम करता है जोशुआ प्रोजेक्ट?

जोशुआ प्रोजेक्ट ने भारत की अलग-अलग जातियों और जनजातीय समूहों के आँकड़े इकट्ठा किए हैं। जोशुआ प्रोजेक्ट के पास देश की 2272 जातियों-जनजातियों के आँकड़े हैं। जोशुआ प्रोजेक्ट अपने काम को पाँच स्तर पर मापता है। जिन जातियों में ईसाइयत में धर्मांतरण नहीं हो पाया है, उन्हें जोशुआ ‘अनरीचड’ के वर्ग में रखता है। इसके अलावा जिन जातियों-जनजातियों को में ईसाइयत को फैलाने में आंशिक सफलता मिली है, उन्हें ‘मिनिमली रीच्ड’ वर्ग और इस्ससे ऊपर ‘सुपरफिशियली रीच्ड को रखा जाता है। इसके अलावा भी दो वर्ग हैं।

जोशुआ प्रोजेक्ट को लेकर दैनिक भास्कर ने अपनी एक रिपोर्ट में बताया है कि यह मिशन देश भर में हर जाति समूह को ईसाइयत में लाने के लिए एक एजेंट की नियुक्ति कर रहा है। यह एजेंट धर्मांतरण के साथ ही जगह-जगह नए चर्च बनाने का काम कर रहे हैं। भास्कर को ऐसा ही एक एजेंट भी मिला है। रिपोर्ट में बताया गया है कि जोशुआ प्रोजेक्ट इन एजेंटों को लम्बी ट्रेनिंग के बाद जमीन पर उतारता है। इनका मुख्य काम जगह-जगह जाकर आँकड़े इकट्ठा करना होना है। इन्ह्ने जोशुआ प्रोजेक्ट की तरफ से लगभग ₹2000 की तनख्वाह भी मिलती है।

क्या बताता है जोशुआ प्रोजेक्ट का डाटा?

जोशुआ प्रोजेक्ट की वेबसाइट के अनुसार, उन्हें भारत में 2272 समूहों तक ईसाइयत को लेकर जाना है। जोशुआ प्रोजेक्ट बताता है कि वह इनमें से अभी 2041 जातियों तक नहीं पहुँच सका है। वहीं 103 जातियों में ईसाइयत का प्रभाव डालने में यह सफल रहा है। इनमें एक छोटी संख्या में लोग ईसाइयत को मानने लगे हैं। वहीं 128 जाति समूह ऐसे हैं, जिनमे बड़े पैमाने पर ईसाइयत की घुसपैठ हो गई है। जोशुआ प्रोजेक्ट की वेबसाइट ने बताया है कि वह अब तक 143 करोड़ में से 6 करोड़ लोगों तक ईसाइयत को लेकर पहुँच चुके हैं।

वेबसाइट के अनुसार, भारत में इवैंजेलिकल ईसाइयत (ईसाइयत की एक शाखा, जिसे जोशुआ प्रोजेक्ट फैला रहा है।) की वृद्धि दर 3.9%/वर्ष है। यह वैश्विक औसत से कहीं अधिक है। इसके अंतर्गत उन लोगों को रखा जाता है, जो पूरी तरीके से जोशुआ प्रोजेक्ट के ढाँचे में ढल चुके हैं। जोशुआ प्रोजेक्ट की वेबसाइट मात्र हिन्दू ही नहीं बल्कि सिखों और मुस्लिमों समेत बौद्धों के आँकड़े भी भारत में इकट्ठा कर रहा है। उसने इनके आँकड़े भी अपनी वेबसाइट पर डाले हुए हैं।

बड़ी संख्या में जातियों में धर्मांतरण

जोशुआ प्रोजेक्ट का डाटा बताता है कि उसने कई जातियों में 10%-100% तक ईसाइयत में धर्मांतरण करवाया है। जिन जातियों में बड़ी संख्या में ईसाइयत में धर्मांतरण हुआ है, उनको अलग नाम दे दिया गया है। तेलंगाना के मडिगा और माला समुदाय में 21000 की आबादी को ईसाइयत में बदल कर उसे आदि क्रिस्चियन का नाम दिया गया है। बोडो समुदाय की 15.7 लाख आबादी में से लगभग 1.5 लाख आबादी को ईसाइयत में लाया गया गया है।

जोशुआ प्रोजेक्ट की इतनी बड़ी मशीनरी लगातार भारत में चल रही है। इसको खाद-पानी भी मिल रहा है। कई बार ऐसे ईसाई प्रचारक पकड़े गए हैं, जो ईसाइयत में लोगों को लाने के लिए उन्हें प्रलोभन दे रहे थे। ऐसा ही एक मामला हाल ही में मध्य प्रदेश में सामने आया था, जहाँ ईसाइयत में धर्मान्तरित होने पर लगभग ₹20 लाख तक का ऑफर दिया गया था। इसी तरह बरेली में भी ईसाई धर्म प्रचारकों द्वारा हिन्दू नाबालिगों को निशाना बनाने की बात सामने आई थी। कई लोगों पर कार्रवाई के बाद भी यह नेटवर्क लगातार चलता रहता है।

‘शैतान घुसा है शरीर में, पीट-पीटकर निकाल दूँगा’ : पंजाब में पादरी ने 30 साल के दिहाड़ी मजदूर को उतारा मौत के घाट, 9 गिरफ्तार

पंजाब के गुरदासपुर में 30 साल के दिहाड़ी मजदूर को बेरहमी से पीटे जाने के बाद उसकी मौत हो गई। पुलिस ने इस घटना की जानकारी 25 अगस्त को दी। उन्होंने बताया कि इस घटना की बाबत उन्होंने 9 लोगों को गिरफ्तार किया है। इसमें जैकब मसीह नाम के पादरी का नाम भी शामिल है। कहा जा रहा है कि पादरी ने शरीर से बुरी आत्मा निकालने के नाम पर युवक को पीटा। इस दौरान उसके साथ 8 लोग और भी शामिल थे।

पीड़ित मजदूर की पहचान सैमअुल मसीह के नाम से हुई। वो गुरदासपुर धरीवाल के सिंहपुरा गाँव का था। पुलिस ने बताया कि उसे दौरे आते थे और वो चिल्लाता था। इन्हीं कारणों से उसके परिजनों ने जैकब मसीह को संपर्क किया कि वो लोग घर में आकर प्रार्थना करवा दें।

जैकब मसीह ने परिवार की बात सुनी और बुधवार को प्रार्थना कराने का दिन दिया। जैकब ने यह भी परिवार के मन में डाला कि सैमुअल के भीतर शैतान घुस गया है और वो लोग उसे पीट -पीटकर बाहर निकालेंगे। पादरी ने इस तरह परिवार का ब्रेनवॉश किया कि परिजन भी मान गए कि पीटने से सैमुअल को कुछ नहीं होगा।

इसके बाद जैकब और उसके 8 साथियों ने मिकर सैमुअल को ताबडतोड़ मारा। इलाज के नाम पर उसे इतना पीटा गया कि वहीं मौके पर ही सैमुअल की मौत हो गई। परिजनों को अगले दिन उन्हें शव का अंतिम संस्कार करना पड़ा। घटना से उबरने के बाद सैमुअल की माँ और पत्नी ने जैकब मसीह के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई।

पुलिस ने शव को निकलवाकर पहले पोस्टमार्टम कराया और फिर पादरी व 8 अन्य के खिलाफ भारतीय न्याय संहिदा की उपयुक्त धाराओं के अंतर्गत केस को दर्ज कर लिया।

मालूम हो कि यूएसए के अटलांटा से भी ऐसा मामला 9 जनवरी को सामने आया था। साउथ कोरियन महिला ट्रंक में मिली थी। छानबीन में पता चला था कि एक संगठन द्वारा उसे वादा किया गया था कि वो उसे ईश्वर से मिलाएँगे। हालाँकि बाद में राक्षस की आत्मा मारकर भगाने के नाम पर उसे पीट-पीटकर मार डाला गया।

‘भाई होता तो तू यहाँ बैठती’ : बरेली के कंपनी गार्डन में हिंदू लड़के के साथ बैठी बुर्के वाली लड़की, इस्लामी कट्टरपंथी ने थप्पड़ मारे, वीडियो वायरल

उत्तर प्रदेश के बरेली से एक वीडियो सामने आई है। इस वीडियो में इस्लामी कट्टरपंथियों का एक गुट एक हिंदू लड़के को मारते हुए इसलिए दिख रहा है क्योंकि वो बुर्का पहनी लड़की के साथ बैठा है। कट्टरपंथी उनसे बार-बार आधार कार्ड माँगते हैं और बीच में उन्हें थप्पड़ भी मारते हैं।

सोशल मीडिया पर साझा हो रही वीडियो को लेकर कहा जा रहा है कि ये बरेली के कपंनी गार्डन की है जहाँ बुर्का पहनी लड़की को एक लड़के के साथ बैठे देखा गया। इस्लामी कट्टरपंथी पहले लड़के को थप्पड़ मारते हैं। लड़की उन्हें रोकती है तो एक कट्टरपंथी उस लड़की को भी थप्पड़ मारते हैं। आवाज सुनाई पड़ती है- हाथ पकड़ती है उसका और उसके बाद उसे झापड़ मारा जाता है।

लड़का स्थिति संभालने के लिए बताता भी है कि वो लड़की उसकी दीदी है, वहीं लड़की भी कहती है कि वो लड़का उसका भाई है, लेकिन कट्टरपंथी मानने को तैयार नहीं होते। वो सवाल करते हैं- “अगर ये भाई होता तो तू इसके साथ यहाँ आकर बैठती।”

इसके बाद लड़का बार-बार पुलिस को फोन करने की बात कहता है लेकिन सब उसे रोकते रहते हैं। आखिर में वो हिम्मत करके उठ जाता है और सवाल करता है कि आपने थप्पड़ क्यों मारा। लड़का अपने भैया को फोन मिलाता है और कहता है कि अगर वीडियो ही बनानी है तो वीडियो बनाना उसका भी अधिकार है वो भी वीडियो बनाएगा। इसके बाद उसे धक्का देकर बैठा दिया जाता है।

बता दें कि ये वीडियो कब की है ये तो अभी नहीं पता चल सकता है लेकिन इस Treeni नाम के अकॉउंट से वीडियो को शेयर करके पुलिस से कार्रवाई करने की माँग की जा रही है। वहीं बरेली पुलिस ने इस घटना के संबंध में अपने ट्वीट में बताया कि प्रभारी निरीक्षक कोतवाली, बरेली को जाँचकर आवश्यक विधिक कार्यवाही करने हेतु निर्देशित कर दिया गया है।

अपने कर्मचारियों को UPS पावर देने वाला पहला राज्य बना महाराष्ट्र, मोदी सरकार लेकर आई है पेंशन की यह स्कीम: जानिए कर्मचारियों को कैसे मिलेगा फायदा

महाराष्ट्र की एकनाथ शिंदे की अगुवाई वाली NDA सरकार ने राज्य कर्मचारियों के लिए यूनिफाइड पेंशन स्कीम (UPS) लागू कर दी है। महाराष्ट्र, केंद्र की मोदी सरकार के बाद इसे लागू करने वाला पहला राज्य बन गया है। महाराष्ट्र के राज्य कर्मचारी अब अपनी सेवानिवृत्ति के लिए UPS चुन सकेंगे।

महाराष्ट्र सरकार ने रविवार (25 अगस्त, 2024) को ऐलान किया कि वह UPS लागू कर रही है। रविवार को ही इसे महाराष्ट्र कैबिनेट की मंजूरी भी मिल गई। अब महाराष्ट्र सरकार के लिए काम करने वाले राज्य कर्मचारी UPS या फिर न्यू पेंशन स्कीम, दोनों में से एक का चुनाव कर सकेंगे। न्यू पेंशन स्कीम को 2004 में सरकारी कर्मचारियों के लिए लाया गया था।

महाराष्ट्र सरकार के अंतर्गत अभी लगभग 14.5 लाख कर्मचारी काम करते हैं। इनमें से बड़ी संख्या उनकी है, जिन्होंने 2004 के बाद नौकरी पाई है। 2004 के बाद नौकरी पाने वालों को पुरानी पेंशन का लाभ नहीं मिलता। ऐसे में उन्हें अब सेवानिवृत्ति के समय अधिक लाभ चुनने की आजादी होगी।

महाराष्ट्र सरकार के इस फैसले को आगामी विधानसभा चुनावों से जोड़ कर देखा जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह निर्णय राज्य कर्मचारियों में अपना जनाधार बढ़ाने के लिए NDA सरकार ने लिया है। महाराष्ट्र में 2024 के अंत तक विधानसभा चुनाव होने हैं। इसमें NDA का मुकाबला INDI गठबंधन से है।

UPS को केंद्र सरकार ने शनिवार (25 अगस्त, 2024) को मंजूरी दी थी। इसके तहत 1 जनवरी, 2004 के बाद केंद्र सरकार में नौकरी पाने वाले कर्मचारियों को अधिक सेवानवृत्ति लाभ देने की बात कही गई है। इसके तहत यदि को केंद्र सरकार का कर्मचारी 25 वर्षों तक सेवा देता है, तो उसे उसकी अंतिम बेसिक तनख्वाह का 50% निश्चित तौर पर पेंशन में दिया जाएगा।

कर्मचारियों को पेंशन में महंगाई भत्ता भी मिलेगा। इसके अलावा कर्मचारी की मौत पर उसके परिजनों को उसकी तनख्वाह का 60% देने का फैसला सरकार ने किया है। साथ ही उन कर्मचारियों को ₹10 हजार पेंशन निश्चित तौर पर दी जाएगी, जिन्होंने केंद्र सरकार को 10 साल तक सेवा दी है।

केंद्र सरकार ने UPS के जरिए पुरानी पेंशन स्कीम (OPS) की माँग को पूरा करने की कोशिश की है। हालाँकि, UPS पुरानी पेंशन स्कीम से काफी अलग है। OPS के अंतर्गत पहले कर्मचारियों को कोई भी अंशदान नहीं देना होता था, जबकि अभी UPS में यह अंशदान जारी रहेगा।

20 साल पहले सरकारी जमीन कब्ज़ा कर रखी छोटी सी बुनियाद, अब बन गई वहाँ बड़ी सी ‘मदीना मस्जिद’ और मदरसा: वक्फ बोर्ड का लगा दिया ठप्पा, अदालत बोला – हटो वहाँ से

उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जिले में कोर्ट ने सरकारी जमीन पर बनी एक मस्जिद को ध्वस्त करने का आदेश जारी किया है। इस मस्जिद का नाम मदीना मस्जिद है जिसे मुस्लिम समुदाय के लोग वक्फ बोर्ड में रजिस्टर्ड बताते आ रहे थे। हिन्दू संगठनों ने इस मस्जिद को अवैध बताते हुए लम्बी कानूनी लड़ाई लड़ी। कोर्ट ने मस्जिद की पैरवी कर रही कमिटी पर जुर्माना भी ठोका है। यह आदेश गुरुवार (22 अगस्त, 2024) को जारी हुआ है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह मस्जिद बिंदकी क्षेत्र के मलवाँ कस्बे में लगभग 20 साल पहले बनी थी। शुरुआत में इसका आकर काफी छोटा था जो धीरे-धीरे बढ़ाया जाता रहा। वर्तमान में यह मस्जिद कस्बे और आसपास की सबसे बड़ी मस्जिदों में शुमार की जाने लगी थी। साल 2005 से हिन्दू संगठनों ने इस मस्जिद को अवैध बताते हुए लम्बी लड़ाई जमीन से ले कर कोर्ट तक लड़ी थी। उनका आरोप था कि मदीना नाम की इस मस्जिद को ग्राम समाज की सरकारी भूमि को कब्ज़ा कर के बनवाया गया है। आरोप यह भी है कि इस मस्जिद के साथ मदरसा भी बनवा दिया गया था।

हालाँकि, मुस्लिम पक्ष इन आरोपों से लगातार इनकार करता रहा। मस्जिद की पैरवी वक्फ सुन्नी मदीना मस्जिद कमिटी कर रही थी। इस कमिटी की तरफ से हैदर अली कोर्ट में पेश हो रहे थे। हिन्दू संगठन की तरफ से बिंदकी तहसीलदार की कोर्ट में केस दायर किया गया था। अपने जवाब में मस्जिद कमेटी ने बताया कि 20 साल पहले मदीना मस्जिद पट्टे पर दी गई जमीन पर बनी थी। हैदर अली ने कोर्ट में जवाब दाखिल करते हुए हिन्दू संगठन के आरोपों को बेबुनियाद करार दिया था।

तहसीलदार की अदालत ने दोनों पक्षों सुनवाई का मौक़ा दिया। कोर्ट ने क्षेत्रीय लेखपाल से आख्या मँगवाई। इस आख्या में साबित हुआ कि मस्जिद अवैध कब्ज़ा कर के बनाई गई थी। अवैध कब्ज़े का यह दायरा लगभग 4 बिस्वा बताया गया है। आखिरकार 22 अगस्त को कोर्ट ने मलवां कस्बे की मदीना मस्जिद को सरकारी जमीन पर बना करार दिया। तहसीलदार की कोर्ट ने संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों को निर्देश दिया है कि वो सरकारी भूमि पर बने अवैध निर्माण को ध्वस्त करें। साथ ही पुलिस को कार्रवाई के दौरान पूरी सुरक्षा मुहैया करवाने के निर्देश भी दिए।

तहसीलदार अचलेश सिंह की कोर्ट ने अपने आदेश में मस्जिद कमेटी को 65,500 रुपए जुर्माना भी भरने का आदेश दिया है। हालाँकि वक्फ सुन्नी मदीना मस्जिद कमेटी के अध्यक्ष हैदर अली ने इस फैसले के खिलाफ ऊपरी अदालत में जाने की बात कही है। बताते चलें कि इसी साल 21 जुलाई को फतेहपुर में हिन्दू संगठनों ने पंचायत कर के मदीना मस्जिद पर जल्द फैसला देने की माँग की थी। तब जिलाधिकारी ने मामले को 15 दिनों में निस्तारित करवाने का आश्वासन दिया था।

‘नमाजी टोपी पहने बच्चे कर रहे पढ़ाई, पोंछ दिया हिन्दू छात्रों का तिलक’: बिजनौर में शिक्षिका आएशा के खिलाफ शुरू हुई जाँच, जुमे के दिन बच्चों को ले जाया जाता है मस्जिद

उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले के एक सरकारी स्कूल में मुस्लिम छात्रों का नमाज़ी टोपी पहन कर पढ़ाई करते हुए वीडियो वायरल हो रहा है। आरोप है कि टोपी लगा कर स्कूल आने का फरमान उन्हें उनके ही स्कूल के एक मुस्लिम टीचर ने सुनाया है। इन बच्चों को जुमे के दिन यानी शुक्रवार को मस्जिद में नमाज़ पढ़ने के लिए भी ले जाया जाता है। बताया यह भी जा रहा है कि इसी स्कूल में हिन्दू बच्चों को तिलक लगा कर आने पर टोका भी गया है। जिले के बेसिक शिक्षा अधिकारी ने इस पूरे मामले में जाँच के आदेश दिए है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह मामला बिजनौर जिले के बनेड़ा स्थित उच्च माध्यमिक विद्यालय का है। यहाँ पढ़ने वाले कुछ हिन्दू छात्रों ने शिकायत की है कि जब वो स्कूल में तिलक लगा कर गए तो उसे पोंछ दिया गया। यह आरोप स्कूल की टीचर आएशा पर लगा है। मयंक नाम के छात्र का यह भी कहना है कि जब उन्हीं के कई मुस्लिम सहपाठी नमाज़ी टोपी पहन कर स्कूल आते हैं तो उनको कोई नहीं रोकता। कुछ अन्य हिन्दू बच्चों के परिजनों की भी यही शिकायत है।

इस मामले के सामने आने के बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) ने भी आपत्ति उठाई है। आरएसएस के खंड कार्यवाह रोहित ने बताया कि स्कूल के कुछ छात्र उनकी शाखा में भी आते है। इन बच्चों ने यहाँ खुद को स्कूल टीचर आएशा के दोहरे भेदभाव से पीड़ित बताया। बकौल रोहित स्कूल के कुछ मुस्लिम छात्रों को तो स्कूल टाइम में ही जुमे (शुक्रवार) के दिन पास की एक मस्जिद में भी नमाज़ के लिए ले जाया जाता है। रोहित ने इस पूरे मामले की जाँच और कार्रवाई की माँग उठाई है।

इस मामले में स्कूल के प्रिंसिपल का भी बयान सामने आया है। उन्होंने माना कि स्कूल में नमाज़ी टोपी लगा कर आना सही नहीं है। बकौल प्रिंसिपल स्कूल के मुस्लिम टीचर ही अपने समुदाय के छात्रों को टोपी पहन कर आने के लिए कहते हैं। प्रिंसिपल ने यह स्वीकार किया कि शुक्रवार के दिन मुस्लिम छात्र पास की मस्जिद में नमाज़ पढ़ने के लिए जाते हैं। ये बच्चे स्कूल के मुस्लिम टीचरों के साथ मस्जिद में जाते हैं। प्रिंसिपल ने बताया कि उन्होंने तमाम सीनियर अधिकारियों को इसकी सूचना भेज दी है।

इस मामले में बिजनौर के जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी (BSA) का भी बयान सामने आया है। उन्होंने बताया कि मिली शिकायत का संज्ञान ले लिया गया है और जाँच शुरू कर दी गई है। बकौल BSA जाँच के बाद सामने आए तथ्यों के आधार पर आगे की कार्रवाई अमल में लाई जाएगी।

MP में हड़पी OBC परिवार की जमीन, कर्नाटक में दलित कर्मचारी की आत्महत्या, झारखंड में जनजातीय समाज के पवित्र स्थल को बनाया कब्रिस्तान: कॉन्ग्रेस का ‘पिछड़ा प्रेम’

राहुल गाँधी आजकल बात-बात में जातिगत जनगणना की माँग करते हैं। बार-बार कहते हैं कि ‘90% जनसंख्या’ को व्यवस्था से बाहर रखा गया है। कहते हैं कि दलितों और जनजातीय समाज का मोदी सरकार में उत्पीड़न हो रहा है। कभी ये पूछते हैं कि केंद्रीय सचिवों में कितने OBC हैं, तो कभी इसी आड़ में मन में छिपी मुस्लिमों वाली बात भी निकल आती है। लेकिन, कॉन्ग्रेस पार्टी का असली चरित्र कुछ और है। आइए, जानते हैं कि SC, ST और OBC के साथ कॉन्ग्रेस पार्टी का ताज़ा व्यवहार क्या रहा है।

सबसे पहले बात करते हैं कॉन्ग्रेस के OBC प्रेम की, इसके लिए हमें चलना पड़ेगा मध्य प्रदेश के छतरपुर। वहाँ हाल ही में दंगे भड़क गए। कारण – महाराष्ट्र में महंत रामगिरी महाराज के बयान से इन्हें दिक्कत थी। महाराष्ट्र के नासिक और छत्रपति संभाजी नगर में इसके लिए पहले से ही दंगे किए जा चुके थे। मध्य प्रदेश में भी मौलाना इरफ़ान चिश्ती ने वीडियो बना कर कहा कि विरोध प्रदर्शन में जो नहीं आएगा उसे ईद के जुलूस में शामिल होने का अधिकार भी नहीं होगा।

मध्य प्रदेश में दिखा कॉन्ग्रेस का ‘OBC-प्रेम’

इसमें नाम आता है कॉन्ग्रेस के जिला उपाध्यक्ष हाजी शहज़ाद अली का, जिसके नेतृत्व में इस्लामी भीड़ ने पुलिस पर पत्थरबाजी की और जम कर हिंसा की। प्रदेश में मुख्यमंत्री मोहन यादव के नेतृत्व में भाजपा की सरकार चल रही है, ऐसे में दंगाई नेता के आलीशान घर पर बुलडोजर चला। हाजी शहज़ाद अली के बारे में पता चला कि कभी ठेला लगा कर पुराने कपड़े बेचने वाला व्यक्ति आज अरबपति है। उसके भाई पर कई आपराधिक मामले दर्ज हैं। वो खुद की शरिया अदालत लगाता था।

लेकिन, जानने वाली बात ये है कि हाजी शहज़ाद अली ने 20 करोड़ रुपए की जो हवेली बनाई, वो एक कुशवाहा परिवार की जमीन हड़प कर बनाई गई है। जिला प्रशासन के पास इसकी जाँच भी लंबित है। आरोप है कि उसने डर और अपना रुतबा दिखा कर ये जमीन हड़प ली। उसके दुबई कनेक्शन की जाँच हो रही है। उत्तर प्रदेश में कोइरी वर्ग में आने वाले काछी, कुशवाहा, शाक्य और मौर्य OBC वर्ग में आते हैं। कॉन्ग्रेस के एक मुस्लिम नेता ने ओबीसी समाज की जमीन हड़प हवेली खड़ी कर ली और कहीं कोई चर्चा नहीं?

अब सुनिए, उलटा कॉन्ग्रेस नेताओं ने उस नेता का समर्थन किया। पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने हाजी शहज़ाद अली का अवैध घर ध्वस्त किए जाने को अमानवीय और अन्यायपूर्ण बता दिया। प्रियंका गाँधी ने इसे अदालत की अवमानना बताते हुए कहा कि किसी के घर से छत छीन लेना सही नहीं है। उन्होंने इसे बर्बरता करार दिया। उन्हें इस दौरान उस ओबीसी परिवार का दर्द दिखा, जिसकी जमीन हड़पी गई थी? कॉन्ग्रेस के लोकसभा व्हिप मोहम्मद जावेद ने इसे मुस्लिम-घृणा से जोड़ा

कर्नाटक में देखिए कॉन्ग्रेस का ‘दलित-प्रेम’

हमने अभी कॉन्ग्रेस पार्टी का OBC-प्रेम देखा, आइए अब पार्टी के दलित-प्रेम की भी बात कर लेते हैं। कर्नाटक में सिद्दारमैया मुख्यमंत्री हैं और कॉन्ग्रेस का ही शासन है। वाल्मीकि समाज कई राज्यों में दलितों का एक अहम हिस्सा है। कर्नाटक में इसे ST में डाला गया है। ये काफी पिछड़ा समूह है, क्योंकि इसके अधिकतर लोग सफाईकर्मी हैं। जम्मू कश्मीर में अनुच्छेद 370 और 35A के निरस्त होने से पहले एक तो स्थायी नागरिकता नहीं हासिल थी, ऊपर से इस समाज में पैदा होने वाला हर बच्चा अपने माथे पर ‘सफाईकर्मी’ का ठप्पा लिए पैदा होता था।

उन्होंने 1957 में पंजाब से लाकर बसाया गया था और जम्मू कश्मीर से संबंधित इस कानून के 1944 के बाद आए किसी भी शख्स को नागरिकता नहीं मिल सकती थी। वो न वोट दे सकते थे, न किसी सरकारी योजना का लाभ मिल सकता था और न उनके बच्चों को कोई छात्रवृत्ति। तहत खैर, बात करते हैं कर्नाटक की। वहाँ एक संस्था है – ‘कर्नाटक महर्षि वाल्मीकि शेड्यूल्ड ट्राइब्स डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन’ (KMVSTDCL), जिसमें घोटाला हुआ। घोटाला करने वाला कौन था, कॉन्ग्रेस का मंत्री।

ट्रस्ट के एकाउंट्स सुपरिटेंडेंट P चंद्रशेखरन ने आत्महत्या कर ली संदिग्ध परिस्थितियों में। उन्होंने अपने सुसाइड नोट में जनजातीय कल्याण मंत्री B नागेंद्र का नाम लिखा। बोर्ड के मैनेजिंग डायरेक्टर और अकाउंटेंट भी इस मामले में जेल में हैं। बी नागेंद्र को इस्तीफा देना पड़ा, CID को आत्महत्या की जाँच सौंपी गई। वो दलित समाज से थे। क्या उनकी संदिग्ध मौत को लेकर किसी कॉन्ग्रेस नेता ने आवाज़ उठाई? नहीं। कॉन्ग्रेस के मंत्री इस घोटाले में ED की गिरफ्त में हैं। दलित अधिकारी की मौत के बाद ही ये घोटाला खुला।

बताया जाता है कि ये पूरा घोटाला 187 करोड़ रुपए का है। मृत अधिकारी की पत्नी ने भी कॉन्ग्रेस के पूर्व मंत्री B नागेंद्र पर ही आरोप लगाया। चंद्रशेखरन की पत्नी कविता का कहना है कि उनके पति को ईमानदार होने की कीमत चुकानी पड़ी। एक दलित महिला न्याय की माँग कर रही है, कॉन्ग्रेस सरकार नहीं सुन रही। उनका कहना है कि उन्हें SIT की जाँच पर भरोसा नहीं है, उल्टा उनके पति को ही फँसाया जा रहा है। उन्होंने CBI जाँच की माँग की है। क्या ‘दलित-प्रेम’ वाली कॉन्ग्रेस एक दलित महिला की पुकार सुनेगी? नहीं, वो सिर्फ भाषण देंगे।

कॉन्ग्रेस का जनजातीय-प्रेम भी देखिए

भारत में आज जनजातीय समाज की राष्ट्रपति हैं, वो भी एक महिला। ये बड़े सम्मान की बात है दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के लिए, क्योंकि समाज के अंतिम पायदान पर खड़े समूह की महिला देश के सबसे बड़े संवैधानिक पद पर हैं। ये प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार और भाजपा के कारण संभव हुआ। कॉन्ग्रेस का ‘जनजातीय-प्रेम’ समझने के लिए चलते हैं झारखंड, जहाँ की एक चौथाई से भी अधिक जनसंख्या शेड्यूल्ड ट्राइब्स है। वहाँ झामुमो की सरकार है, हेमंत सोरेन मुख्यमंत्री हैं, कॉन्ग्रेस इस सरकार में शामिल है।

हाल ही में वहाँ एक घटना सामने आई। मामला जामताड़ा स्थित ‘पुरातन पतित’ नामक जगह का है। जनजातीय समाज के लिए ये एक पवित्र जगह थी, जहाँ वो पूजा-पाठ करते थे। स्थानीय मुस्लिमों ने उसे कब्रिस्तान बता दिया। रहमतुल्लाह नामक एक शख्स की मौत के बाद उसे वहाँ दफना भी दिया गया। पुलिस-प्रशासन ने भी जनजातीय समाज का साथ नहीं दिया। क्या किसी कॉन्ग्रेस नेता ने आवाज़ उठाई? नहीं। नाराज़ जनजातीय समाज ने विरोध किया, लेकिन पुलिस ने मुस्लिमों का ही फैसला माना

झारखंड में धड़ल्ले से ‘लैंड जिहाद’ चल रहा है, जिसके तहत जनजातीय समाज की लड़कियों से शादी कर ली जाती है, फिर उसके नाम पर जमीनें खरीद ली जाती हैं उस समाज के लोगों से, फिर उस लड़की को पंचायत चुनाव में जिता कर जनप्रतिनिधि बना दिया जाता है और सत्ता की बागडोर मुस्लिमों के हाथ में चली जाती है। इनमें से कई बांग्लादेशी घुसपैठिए भी हैं। इस दिशा में कॉन्ग्रेस वाली गठबंधन सरकार कोई कार्रवाई नहीं कर रही। यानी, वो जनजातीय समाज नहीं बल्कि मुस्लिमों की तरफ हैं, अवैध घुसपैठियों की तरफ हैं। पाकुड़ में भी ऐसा मामला सामने आया, भाजपा नेता बाबूलाल मरांडी ने आवाज़ उठाई

दलित, जनजातीय, OBC… कॉन्ग्रेस के लिए सिर्फ जुबान पर, दिल में ‘मुस्लिम’

इन घटनाओं से स्पष्ट पता चलता है कि सिर्फ मीडिया में चर्चा के लिए और हिन्दुओं को विभाजित करने के लिए दलित, जनजातीय और ओबीसी का रट्टा लगाया जाता है राहुल गाँधी सहित अन्य कॉन्ग्रेस नेताओं द्वारा, उनका असली उद्देश्य तो मुस्लिम तुष्टिकरण है। हमने देखा था कैसे मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्रित्व काल में दंगों को रोकने के नाम UPA सरकार ऐसा कानून लेकर आ रही थी जिसके बाद हिंसा की स्थिति में सिर्फ हिन्दुओं को ही जेल होती। हिन्दू, यानी सारे हिन्दू। इसमें ओबीसी या SC/ST को इससे बाहर रखने का कोई प्रावधान नहीं था, सारे हिन्दू।

इसी तरह वक्फ बोर्ड देश का तीसरा सबसे बड़ा जमीन मालिक बन गया है। तमिलनाडु में तिरुचिपल्ली के श्रीरंगम तालुका में स्थित तिरुचेंदुरई गाँव में तो वक्फ बोर्ड ने पूरे के पूरे गाँव पर ही दावा ठोक दिया, जिस कारण गाँव वाले अपनी जमीन तक नहीं बेच पाए। जबकि वहाँ 1500 वर्ष पुराना मंदिर भी था, तब का जब इस्लाम का जन्म भी नहीं हुआ था। पटना के फतुहा में भी इसी तरह गाँव पर दावा ठोक दिया गया। वक्फ में संशोधन वाला बिल आया तो कॉन्ग्रेस इसके विरोध में थी। यानी, ये मुस्लिमों की तरफ ही हैं। बाकी सबके साथ तो छलावा कर रहे।

‘जो प्रदर्शन में नहीं आएगा, उसे ईद के जुलूस में भी शामिल होने का हक़ नहीं’: जिस मौलाना के वीडियो के बाद छतरपुर में हुए दंगे वो धराया, महंत को दी थी गाली

मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले में बुधवार (21 अगस्त, 2024) को मुस्लिम भीड़ ने थाने पर हमला कर के कई पुलिसकर्मियों को घायल कर दिया था। इस मामले में पुलिस ने कई उपद्रवियों का जुलूस निकाल कर जेल भेजा और मुख्य आरोपित कॉन्ग्रेस नेता हाजी शहजाद अली के घर पर बुलडोजर चलाया। अब इसी घटना में एक मौलाना का वीडियो वायरल हो रहा है। वायरल वीडियो में मौलाना को उन्मादी बयानबाजी करते हुए भीड़ को भड़काते देखा जा सकता है। मौलाना का नाम इरफ़ान चिश्ती बताया जा रहा है। मौलाना को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। गिरफ्तारी के बाद मौलाना लोगों से माफ़ी माँगता नजर आया।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, थाने पर हमला करने से एक दिन पहले मंगलवार (19 अगस्त) को ने एक वीडियो जारी किया था। उस वीडियो में मौलाना ने ज्यादा से ज्यादा तादाद में मुस्लिमों को प्रदर्शन में शामिल होने के लिए उकसाया था। इसी वीडियो में मौलाना ने यह भी कहा था कि जो भी इस प्रदर्शन में शामिल नहीं होगा उसे ईद-उल-मिलाद के जुलूस में भी शिरकत करने का कोई हक नहीं होगा। वीडियो में मौलाना ने यह भी कहा कि इस बार ज्ञापन नहीं दिया जाएगा बल्कि सीधे FIR दर्ज करवाई जाएगी। इरफ़ान चिश्ती ने वीडियो बनाने से 1 रात पहले उलेमाओं से हुई किसी मीटिंग का भी हवाला दिया।

वायरल वीडियो में सबको सलाम पेश करने के बाद इरफ़ान चिश्ती ने संत गिरिराज को मक्कार कहा। बोला, “कल नमाज़-ए-जोहर (जोहर की नमाज़) के बाद शहर की पूरी आवाम मस्तान शाह के मैदान में इकट्ठा हो और उस खिनजीर (सूअर) के नाम पर FIR दर्ज की जाए।” वीडियो में मौलाना ने भड़काऊ भाषण के आरोप में जेल काट रहे मुफ़्ती सलमान अज़हरी की शान में कसीदे भी गढ़े। बकौल मौलाना प्रदर्शन में शामिल होने वाले लोग अल्लाह के रसूल से सच्ची मोहब्बत और अपनी गवाही के लिए जाने जाएँगे।

इस वीडियो के वायरल होने के बाद पुलिस हरकत में आई। पुलिस ने मौलाना इरफ़ान चिश्ती को गिरफ्तार कर लिया। गिरफ्तारी के बाद पुलिस ने अदालत से मौलाना का 2 दिनों का कस्टडी रिमांड लिया है। रिमांड पर जाते हुए मौलाना को अपनी गलती याद आई। उसने मीडिया के आगे कबूल किया कि उसने जो किया और कहा वो गलत था। फिलहाल आरोपित मौलाना से पूछताछ की जा रही है। उसके जरिए पुलिस को इस हमले में शामिल कुछ अन्य उपद्रवियों के बारे में जानकारी मिलने का अनुमान है।

‘मदरसा नहीं चला तो सरकारी स्कूल भी नहीं चलेगा’: सरकारी स्कूल को साबिर हुसैन, जमशेर और मौलाना जहीरुद्दीन ने बना दिया मदरसा, बच्चों को देने लगे दीनी तालीम

उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जिले में एक सरकारी स्कूल में मदरसे वाली पढ़ाई कराए जाने का मामला सामने आया है। इस स्कूल की तरफ जाने वाले रास्ते को भी बाँस-बल्ली लगा कर रोक दिया गया था। इस मामले में एक मौलाना सहित कुल 3 लोगों को नामजद किया गया है। शुक्रवार (24 अगस्त, 2024) को पुलिस ने केस दर्ज कर के तीनों आरोपितों को गिरफ्तार कर लिया है जिनके नाम मौलाना जहीरुद्दीन, जमशेर और साबिर हुसैन हैं। स्कूल के सहायक अध्यापक अमीन अहमद अंसारी को सस्पेंड कर दिया गया है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, घटना सोनभद्र के थाना क्षेत्र कोन की है। यहाँ के क्षेत्र पंचायत सदस्य (BDC) मेंबर सोमारू पटेल ने बताया कि ग्राम पंचायत बरवाखाड़ इलाके में बने प्राथमिक विद्यालय में पिछले 15 दिनों से छुट्टी है। आरोप है कि इस छुट्टी में बंद पड़े स्कूल की चाबी प्रिंसिपल ने मौलाना जहीरुद्दीन को दे दी। जमीरुद्दीन इस स्कूल में मदरसे की तर्ज़ पर मुस्लिम बच्चों को उर्दू सहित अन्य इस्लामी किताबें पढ़ाने लगा और दीनी तालीम देना शुरू कर दिया।

बताया जा रहा है कि जब इसकी जानकारी अन्य ग्रामीणों हुई तो उन्होंने विरोध शुरू कर दिया। इस स्कूल के सहायक अध्यापक अमीन अंसारी हैं जिन पर आरोप है कि उन्होंने यहाँ की चाबी मौलाना को दे दी थी। सोमारू पटेल ने अमीन अंसारी को ऐसा करने से रोका तो आसपास के कुछ मुस्लिमों ने बाँस और बल्ली लगा कर स्कूल का रास्ता ही रोक दिया। आरोप है कि रास्ता रोकने वालों ने कहा कि अगर मदरसा नहीं चला तो परिषदीय स्कूल भी नहीं चलने दिया जाएगा। शुक्रवार (23 अगस्त 2024) को जब बच्चे स्कूल पहुँचे तो उन्हें रास्ता बंद मिला। ऑपइंडिया के पास शिकायत कॉपी मौजूद है।

मामले की जानकारी मिलते ही हिन्दू संगठन के सदस्य भी स्कूल पहुँचने लगे। सूचना पर पहुँची पुलिस ने रास्ते में लगाए गए अवरोध को हटवाया और फिर तहरीर ले कर जाँच शुरू कर दी। स्कूल में मदरसा चला रहे मौलाना जहीरुद्दीन के साथ रास्ते को रोकने के आरोप में साबिर हुसैन और जमशेर को गिरफ्तार कर लिया गया है। इन सभी आरोपितों पर भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 196, 285 और 121 (1) के तहत कार्रवाई की गई है। वहीं शिक्षा विभाग ने आरोपित सहायक अध्यापक अमीन अहमद अंसारी को सस्पेंड कर दिया है। पुलिस और शिक्षा विभाग इस मामले की जाँच करवा रहा है।