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कभी कपड़ों का ठेला लगाता था, फिर ₹20 करोड़ की हवेली में रहने लगा कॉन्ग्रेसी दंगाई हाजी अली शहजाद: लगाता था अपनी अदालत, भाई पर कई आपराधिक केस

मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले में 21 अगस्त 2024 को मुस्लिम भीड़ ने पुलिस स्टेशन पर हमला कर दिया था। हमले में कई पुलिसकर्मी घायल हुए थे। इस हमले का सरगना कॉन्ग्रेस नेता हाजी शहजाद अली था, जिसकी करोड़ों रुपए की हवेली और कारों पर प्रशासन ने बुलडोजर चलाकर ध्वस्त कर दिया है। शहजाद अली कुछ साल पहले तक बेहद गरीब हुआ करता था और कपड़े की फेरी लगाता था।

हिंदू परिवार की जमीन पर बनी थी हवेली

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, हाजी शहजाद अली की जिस हवेली पर प्रशासन का बुलडोजर चला है, वहाँ की जमीन का मालिक कभी एक कोइरी परिवार हुआ करता था। आरोप है कि कई आपराधिक मुकदमों में नामजद हाजी शहजाद अली ने ये जमीन उसे डरा-धमका कर हासिल की थी। इन आरोपों की जाँच फिलहाल जिला प्रशासन करवा रहा है।

हाजी शहजाद अली पर हत्या के प्रयास, धमकी देने और जमीन हथियाने के कई आपराधिक केस पहले से चल रहे हैं। हाजी शहजाद अली के अपने तीन अन्य भाइयों के साथ मिलकर नेक्सस चला रहा था। इस गिरोह में उसका सबसे छोटा भाई फैयाज अली भी शामिल है। फयाज अली बी पुलिस की लिस्ट में एक रजिस्टर्ड अपराधी है। उस पर कई मुकदमे दर्ज हैं।

लगाता था अपनी अदालत

एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार, हाजी शहजाद अली किसी समय अपनी खुद की अदालत लगाया करता था। इस अदालत को खानका का नाम दिया गया था। हाजी शहजाद ने इसके कई वीडियो खुद वायरल किए थे। इस अदालत में वह लोगों के आपसी झगड़े अपनी दबंगई से सुलझाता था। इसके लिए वह पैसे भी ऐंठता था।

सुलह समझौतों के मामलों में हाजी अली पीड़ित और आरोपित पक्षों से पैसे ऐंठा करता था। अब पुलिस के पास हाजी शहजाद और उसके भाइयों के अवैध कारनामों की तमाम शिकायतें आ रही हैं। इन सभी शिकायतों पर छतरपुर का जिला प्रशासन जाँच करवा रहा है। इन शिकायतों में करोड़ों रुपए की जमीन कौड़ियों के भाव खरीदना भी शामिल है।

कभी ठेले पर बेचता था कपड़े

हाजी शहजाद अली कोई खानदानी रईस नहीं है। लोग बताते हैं कि कुछ समय पहले तक वह फेरी लगाकर पुराने कपड़े बेचा करता था। स्थानीय लोगों को ये नहीं पता कि कपड़ों की फेरी लगाने वाला हाजी शहजाद इतने कम समय में अरबपति कैसे बन गया। शहजाद के पास कुछ अघोषित सम्पत्तियाँ होने की भी आशंका है।

फिलहाल जिला प्रशासन हाजी शहजाद की चल-अचल सम्पत्तियों की जाँच में जुटा है। इसके अलावा पुलिस पर हमले के कुछ अन्य आरोपितों पर रासुका और जिला बदर जैसी कार्रवाई हो सकती है। बता दें कि हाजी शहजाद अली कॉन्ग्रेस का जिला उपाध्यक्ष है। मुस्लिमों के पैगंबर के कथित अपमान के नाम पर वह 21 अगस्त को सैकड़ों उपद्रवियों का नेतृत्व कर रहा था।

इस दौरान भीड़ ने उन्मादी नारे लगाए और पुलिस स्टेशन को निशाना बनाया। इस मामले में पुलिस ने हाजी अली सहित 50 लोगों और 200 अज्ञात लोगों के खिलाफ नामजद रिपोर्ट लिखी है। वीडियो फुटेज से कुछ संदिग्धों को देख कर उनकी धरपकड़ की जा रही है। कई आरोपितों के पास शस्त्र लाइसेंस थे जिनको निरस्त करने की भी कार्रवाई चल रही है।

‘बांग्लादेश जैसी स्थिति पैदा करने की थी साजिश’: ‘किसान आंदोलन’ पर बोलीं BJP सांसद कंगना रनौत- लटकी थी लाशें, हो रहे थे बलात्कार

बॉलीवुड अभिनेत्री और हिमाचल प्रदेश के मंडी लोकसभा सीट से भाजपा सांसद कंगना रनौत ने कहा कि अगर देश का शीर्ष नेतृत्व को बेहद मजबूत बताया है। उन्होंने कहा कि अगर नेतृत्व मजबूत नहीं होता तो किसान आंदोलन के दौरान पंजाब को भी बांग्लादेश बना दिया जाता। उन्होंने कहा कि किसान आंदोलन के नाम पर उपद्रवी हिंसा फैला रहे थे। प्रदर्शन स्थल पर रेप और हत्याएँ हो रही थीं।

कंगना ने एक मीडिया हाउस दो दिए इंटरव्यू में कहा, “आज हमारा शीर्ष नेतृत्व कमजोर होता तो भारत में बांग्लादेश जैसी स्थिति हो सकती थी। यहाँ किसान आंदोलन के दौरान क्या हुआ, उसे सबने देखा। प्रोटेस्ट के नाम पर वायलेंस फैलाया गया। वहाँ रेप हो रहे थे। मारकर लाशों को लटकाया जा रहा था।” उन्होंने कहा कि उपद्रवियों ने बहुत लंबी योजना बना रखी थी।

अभिनेत्री ने तीनों कृषि कानूनों को वापस लेने के सरकार के फैसले को सही ठहराया और कहा, “जब उस बिल को वापस लिया गया तो ये उपद्रवी चौंक गए, क्योंकि उनकी प्लानिंग तो बहुत लंबी थी। उन पर समय रहते कंट्रोल पा लिया गया, वरना वे कुछ भी कर सकते थे।” उन्होंने पंजाब का उदाहरण दिया, जहाँ ड्रग्स रैकेट और धर्मांतरण रैकेट सक्रिय हैं।

दैनिक भास्कर को दिए इंटरव्यू में भाजपा सांसद कंगना रनौत ने कहा, “पंजाब में क्या हो रहा है, यह सारी दुनिया देख रही है। ‘उड़ता पंजाब’ फिल्म में वहाँ की रियलिटी भी दिखाई गई है। इस समय पंजाब में ड्रग्स माफिया, धर्म परिवर्तन गैंग और अलगाववादी खालिस्तान समर्थक खूब फल-फूल रहे हैं। वहाँ पर कुछ लोग हर वक्त कानून अपने हाथ में ले रहे हैं।”

महिला सुरक्षा के सवाल पर उन्होंने कहा, “मैंने हमेशा महिलाओं के सपोर्ट में आवाज बुलंद की है। आज से 10 साल पहले आमिर खान जी के शो सत्यमेव जयते में मैंने फिल्मों में आइटम नंबर्स का खुला विरोध किया था। आइटम सॉन्ग में महिला को ऑब्जेक्टिफाई किया जाता है। एक महिला का शरीर सिर्फ मनोरंजन के लिए है? इससे समाज में गलत मैसेज जाता है।”

उन्होंने कहा कि संजय लीला भंसाली की फिल्म ‘रामलीला’ में आइटम सॉन्ग करने के लिए कहा गया था, लेकिन उन्होंने मना कर दिया। इसी तरह, फराह खान ने भी अपनी फिल्म के लिए उन्हें कॉल किया था, लेकिन कंगना ने उन्हें भी मना कर दिया। उन्होंने कहा, “मेरा वजूद मुझे यह सब करने की इजाजत नहीं देता, क्योंकि इसे मैं महिला के अपमान के तौर पर देखती हूँ।”

फिल्म इंडस्ट्री के लोगों का उनसे खफा रहने के सवाल पर कंगना ने कहा, “लोगों को लगता है कि कंगना कुछ ज्यादा ही सच बोल देती है। मैंने इंडस्ट्री में फैले सेक्सिज्म, नेपोटिज्म और आइटम नंबर्स के खिलाफ हमेशा से ही बोला है। मीटू मूवमेंट के वक्त भी मैंने काफी लोगों के पोल खोले थे। सुशांत सिंह राजपूत के सुसाइड के वक्त भी मैंने काफी खुलासे किए, जिसकी वजह से काफी लोगों को मिर्ची लगी थी।”

किसान आंदोलन और पंजाब को लेकर कंगना रनौत द्वारा दिए गए बयान पर पंजाब के कॉन्ग्रेस नेता राजकुमार वेरका ने निशाना साधा है। वेरका ने कहा, “कंगना लगातार किसानों पर ऐसे बयान दे रही हैं। उनके खिलाफ FIR दर्ज की जाए और उन पर NSA लगाया जाए।” राजकुमार वेरका 2 बार कांग्रेस विधायक रह चुके हैं। 2017 से 2022 तक पंजाब सरकार में कैबिनेट मंत्री भी रहे हैं। 

‘मियाँ मुस्लिमों से खाली कराओ इलाक़ा, वरना…’: गैंगरेप के बाद 30 संगठनों का सरकार को अल्टीमेटम, कॉन्ग्रेस MLA बलात्कारियों की जगह प्रदर्शनकारियों का कर रहे विरोध

असम के ढिंग में गुरुवार (22 अगस्त, 2024) को कक्षा 8 में पढ़ने वाली एक नाबालिग लड़की का गैंगरेप हुआ था। इस गैंगरेप का आरोप मुस्लिम समुदाय के 3 लोगों पर लगा था। इस घटना के बाद अब प्रदेश भर में विरोध-प्रदर्शन शुरू हो गए हैं। इन प्रदर्शनों में शामिल लोगों ने मियाँ मुस्लिमों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। प्रदर्शन में शामिल कई संगठनों ने मियाँ मुस्लिमों (बांग्लादेशी घुसपैठियों) को ऊपरी असम खाली कर देने का अल्टीमेटम दिया है। इन प्रदर्शनकारियों ने मियाँ मुस्लिमों को समाज के लिए नासूर बताया है। वहीं कॉन्ग्रेस विधायक ने इस मुद्दे पर प्रदर्शनकारी संगठनों को चैलेन्ज दे कर माहौल को और भड़का दिया है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, पूर्वी और ऊपरी असम के 30 से अधिक संगठन ढिंग की रेप पीड़िता के लिए न्याय की माँग कर रहे हैं। इन सभी ने एक स्वर में मियाँ मुसलमान कहे जाने वाले बांग्लादेशी मुस्लिमों को 7 दिनों का अल्टीमेटम देते हुए इलाका छोड़ देने के लिए कहा है। ताई अहोम युवा परिषद नाम के संगठन ने कहा, “पूरी घटना मियाँ मुस्लिमों द्वारा की गई है। मियाँ मुसलमान अब असम के लिए नासूर बन गए हैं। निचले असम में भी कई मियाँ मुसलमान हैं। वे बलात्कार, डकैती, मादक पदार्थों की तस्करी जैसे अपराधों में शामिल हैं। इनसे लोग बेहद परेशान हैं।”

‘ताई अहोम युवा परिषद’ ने आगे कहा कि निचले असम जैसी घटनाएँ अब ऊपरी असम में भी हो रहीं हैं। परिषद ने सरकार को 7 दिनों का अल्टीमेटम दिया है कि वो बांग्लादेशी घुसपैठियों यानी कि मिया मुस्लिमों को फ़ौरन बाहर खदेड़े। इस तय समय सीमा में कोई कदम नहीं उठाने पर ‘ताई अहोम युवा परिषद’ ने बल प्रयोग कर के खुद मिया मुस्लिमों को बाहर निकालने की घोषणा की है। अपने इस संकल्प को संगठन ने अंतिम शब्द बताया है जिसमे कोई समझौता होने की गुंजाईश नहीं है।

ताई अहोम युवा परिषद द्वारा उठाई गई मिया मुस्लिमों को बाहर करने की माँग को असम के कई अन्य संगठनों का भी समर्थन मिला है। इसमें असोमिया युवा मंच, असोमिया महिला मंच, बीर लचित सेना, ऑल असम आदिवासी छात्र संघ, कृषक मुक्ति संग्राम समिति, छात्र मुक्ति संग्राम समिति, असम सब्स आदिवासी छात्र संघ, गरिया मारिया देसी जातीय परिषद, चुटिया जातीय युवा सम्मेलन, ऑल असम चुटिया छात्र संघ, ऑल असम सोनोवाल कछारी छात्र संघ, ताई अहोम युवा परिषद, ऑल असम सोनोवाल कछारी छात्र संघ, ताई अहोम युवा परिषद ऑल मोरन छात्र संघ, और अहोम सेना आदि शामिल हैं।

कॉन्ग्रेस विधायक की चुनौती

वहीं असम से कॉन्ग्रेस विधायक अब्दुर रशीद मंडल द्वारा मिया मुस्लिमों को निकालने का ऐलान कर रहे संगठनों को चुनौती दी गई है। उन्होंने चैलेन्ज दे कर कहा कि प्रदर्शनकारी ऊपरी असम से मियाँ मुसलमानों को नहीं निकाल पाएँगे। ढिंग की घटना की निंदा करते हुए अब्दुर रशीद ने आगे कहा कि कुछ लोगों की गलती के लिए सबको दोषी नहीं ठहराया जा सकता है। कॉन्ग्रेस विधायक का दावा है कि मियाँ मुस्लिम असम के विभिन्न क्षेत्रों में हो रहे कार्यों में अपना योगदान दे रहे हैं। उन्होंने ऐसे तनावपूर्ण हालातों के लिए असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा की टिप्पणियों को जिम्मेदार बताया।

‘महिलाओं के प्रति अपराध अक्षम्य, अपराधियों के साथ-साथ मददगार भी नहीं बख्शे जाने चाहिए’: महाराष्ट्र में PM मोदी ने लखपति दीदियों की सफलता की बताई कहानी

प्रधानमंत्री मोदी ने रविवार (25 अगस्त 2024) को महाराष्ट्र के जलगाँव में ‘लखपति दीदी’ कार्यक्रम में शामिल हुए और 11 लाख लखपति दीदियों को सर्टिफिकेट दिया। इस दौरान पीएम ने इस स्व-सहायता समूहों को 5,000 करोड़ रुपए का ऋण जारी किया। प्रधानमंत्री ने सभा संबोधित करते हुए रेप की घटनाओं पर भी दुख व्यक्त किया और कहा कि महिलाओं के प्रति अपराध अक्षम्य है।

प्रधानमंत्री मोदी ने महिलाओं के खिलाफ हो रही हिंसा पर चिंता जताते हुए कहा, “आज देश का हर राज्य अपनी बेटियों की पीड़ा और गुस्से को समझ रहा है। मैं देश के हर राजनीतिक दल और राज्य सरकार से कहूँगा कि महिलाओं के खिलाफ अपराध अक्षम्य है। दोषी कोई भी हो उसे बचना नहीं चाहिए। सरकारें आती जाती रहेंगी। नारी के सम्मान और गरिमा और उनके जीवन की रक्षा का दायित्व हमारा है।”

कोलकाता के आरजी कर मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल में ट्रेनी महिला डॉक्टर की रेप एवं हत्या और बदलापुर में बच्चियों के यौन शोषण पर देश उबल रहा है। इनका नाम लिए बिना पीएम ने कहा, “महिलाओं के खिलाफ अपराध को किसी भी रूप में मदद करने वाले बचने नहीं चाहिए। अस्पताल हो, स्कूल हो, दफ्तर हो या फिर पुलिस व्यवस्था… जिस स्तर पर लापरवाही हो, सबका हिसाब होना चाहिए।”

प्रधानमंत्री ने कहा, “महिलाओं के खिलाफ अपराध करने वाले अपराधियों के लिए हम कानून को मजबूत और सख्त बना रहे हैं। पहले शिकायतें आती थीं कि एफआईआर दर्ज नहीं होती थी। हम बीएनएस (भारतीय न्याय संहिता) लाए और इसमें कई संशोधन किए। अगर महिला थाने नहीं जाना चाहती है तो वह ई-एफआईआर (ऑनलाइन) दर्ज करा सकती है।”

प्रधानमंत्री मोदी ने आगे कहा, “ई-एफआईआर में कोई बदलाव या छेड़छाड़ नहीं कर सकता। शादी के बाद महिलाओं के खिलाफ अपराध की शिकायतें आती थीं। हमने बीएनएस में संशोधन किए हैं। महिलाओं के खिलाफ अपराध के लिए केंद्र सरकार राज्य सरकारों के साथ है।” उन्होंने कहा कि भारत की मातृशक्ति ने समाज और राष्ट्र के भविष्य को बनाने में हमेशा से बहुत बड़ा योगदान दिया है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भाजपा सरकार में महिला के हित में हुए कार्यों के बारे में भी बताया। उन्होंने कहा कि सरकार आज बेटियों के लिए हर सेक्टर को खोल रही है, जहाँ कभी उन पर पाबंदियाँ होती थीं। आज तीनों सेनाओं में महिला अफसर तैनात हो रही हैं। फाइटर पायलट बन रही हैं। गाँव में कृषि और डेयरी सेक्टर से लेकर स्टार्टअप्स क्रांति तक में बेटियाँ बिजनेस मैनेज कर रही हैं।

लखपति दीदी योजना को लेकर पीएम ने कहा, “लोकसभा चुनाव के दौरान मैं आपके बीच आया था। तब मैंने कहा था हमें 3 करोड़ बहनों को लखपति बनाना है, जो सेल्फ हेल्प ग्रुप का काम करती हैं। मैंने कहा था कि इनकी एक साल की कमाई 1 लाख रुपए से ज्यादा होगी। बीते दस साल में 1 करोड़ लखपति दीदी बनीं और बीते 2 महीने में 11 लाख नई लखपति दीदी बन गईं।”

इस योजना की सफलता के उत्साहवर्द्धक नतीजे मिलने की बात करते हुए पीएम ने कहा, “इस महीने 1 लाख से ज्यादा लखपति दीदी बनी हैं। इसके लिए महायुति सरकार ने बहुत मेहनत की है। महाराष्ट्र में एक से बढ़कर एक योजनाएँ चलाई जा रही हैं। लखपति दीदी बनाने का ये अभियान सिर्फ बहनों बेटियों की कमाई बढ़ाने का अभियान नहीं है। ये आने वाली पीढ़ियों को सशक्त करने का अभियान है।”

महिला मंडलों को सरकार द्वारा दिए गए प्रोत्साहन को लेकर पीएम मोदी ने कहा, “साल 2014 तक 25,000 करोड़ रुपए से भी कम बैंक लोन सखी मंडलों को मिला था। वहीं, पिछले 10 साल में करीब 9 लाख करोड़ रुपए की मदद दी गई है। कहाँ 25 हजार करोड़ और कहां 9 लाख करोड़। इतना ही नहीं सरकार जो सीधी मदद देती है। उसका परिणाम मिला है।”

जनजातीय समाज के पवित्र स्थल को मुस्लिमों ने बना दिया कब्रिस्तान: जहाँ करते थे पूजा वहाँ रहमतुल्लाह को दफना दिया, पूर्व CM बोले – प्रशासन भी दे रहा साथ

झारखंड के जामताड़ा जिले में एक जमीन पर मालिकाना हक जताते हुए मुस्लिम और जनजातीय समुदाय के लोग आमने-सामने आ गए हैं। विवाद की वजह ‘पुरातन पतित’ नाम की जगह है। जनजातीय लोग इसे अपनी धार्मिक जमीन बता रहे हैं जबकि मुस्लिम समुदाय के लोग इसे अपना कब्रिस्तान घोषित कर रहे हैं। मुस्लिम पक्ष द्वारा यहाँ पर एक शव को भी दफना दिया गया जिस से तनाव का माहौल बन गया। जनजातीय समुदाय ने पुलिस पर मुस्लिमों के पक्ष में कार्रवाई करने का आरोप लगाया है। भाजपा ने इस विवाद की वजह हेमंत सोरेन सरकार की तुष्टिकरण की नीति बताया है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह मामला जामताड़ा के नारायणपुर थाना क्षेत्र में आने वाले पावन पतित नाम की जगह का है। शनिवार (24 अगस्त, 2024) को इसी क्षेत्र के शहरपुर पंचायत में रहने वाले गाँव पीठुआडीह के रहमतुल्लाह की मौत हो गई थी। रहमतुल्लाह का जनाजा ले कर मुस्लिम समुदाय पावन पतित जमीन की जमीन पर बढ़ चला। इसी जमीन पर रहमतुल्लाह को दफनाने की तैयारियाँ शुरू हो गईं। जैसे ही आसपास के जनजातीय लोगों को इसकी जानकारी हुई वो नाराज हो गए।

बताते चलें कि पावन पतित भूमि को जामताड़ा के जनजातीय लोग अपना धार्मिक स्थल मानते हैं। जैसे ही उन्हें अपने धार्मिक स्थल पर लाश दफनाने की तैयारियों का पता चला, वो एकजुट हो कर मौके पर पहुँच गए। उन्होंने शव दफनाने का विरोध किया तो दूसरी तरफ से भी तनातनी शुरू हो गई। माहौल को तनावपूर्ण देख कर मौके पर पुलिस बल पहुँच गया। पुलिस ने थोड़ी देर बातचीत के बाद मुस्लिमों का पक्ष लिया और पावन पतित की भूमि पर ही रहमतुल्लाह को दफना दिया गया।

स्थानीय जनजातीय समुदाय ने पुलिस की कार्रवाई को एकपक्षीय बताया। उन्होंने आरोप लगाया है कि स्थानीय प्रशासन भी मुस्लिम समुदाय का साथ दे रहा है। हालात तनावपूर्ण देखते हुए इलाके में पुलिस बल की सक्रियता बढ़ा दी गई है। वहीं झारखंड के भाजपा नेता बाबूलाल मरांडी ने इस हरकत को ‘लैंड जिहाद’ का नाम दिया है। बाबूलाल मरांडी के मुताबिक, राज्य में झामुमो और कॉन्ग्रेस की मिलीजुली सरकार मुस्लिम तुष्टिकरण कर रही है जिसका जवाब जनजातीय समाज चुनावों में देगा।

‘वंचितों के अधिकारों की रक्षा के लिए सतर्क हैं हम’: दलित महिला से कई बार रेप करने वाले रफीक को HC से जमानत नहीं, नौकरी का झाँसा देकर फाँसा था

कर्नाटक हाईकोर्ट ने एक शादीशुदा दलित महिला से रेप कर के उसे इस्लाम कबूल करवाने के आरोपित की जमानत अर्जी ख़ारिज कर दी है। आरोपित का नाम रफीक है। 33 वर्षीय रफीक की जमानत अर्जी पर उच्च न्यायालय ने यह फैसला 3 जुलाई, 2024 को सुनाया है। अपनी टिप्पणी में न्यायाधीश ने कहा कि वो समाज को संदेश देना चाहते हैं कि अदालतें वंचितों की रक्षा करने व जबरन धर्मांतरण के खिलाफ सतर्क हैं।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस मामले की सुनवाई कर्नाटक हाईकोर्ट की धारवाड़ बेंच में हुई। रफीक ने जिला अदालत से ख़ारिज होने के बाद हाईकोर्ट में जमानत याचिका दाखिल की थी। इस पर जस्टिस एस रचैया की कोर्ट में सुनवाई हुई। बचाव पक्ष की तमाम दलीलें काम नहीं आईं और आखिरकार रफीक की जमानत अर्जी ख़ारिज कर दी गई। अपनी टिप्पणी में न्यायाधीश ने आरोपित के अपराध को गंभीर श्रेणी का बताया। उन्होंने यह भी कहा कि ऐसे मामलों से समाज पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। अदालत ने पीड़िता को गरीब और मासूम माना जो रफीक की साजिश का शिकार हुई।

निर्णय देते हुए की गई टिप्पणी में जस्टिस रचैया ने कहा कि समाज को यह संदेश जाना चाहिए कि अदालतें वंचितों के अधिकारों व जबरन धर्मांतरण जैसे अपराधों के खिलाफ सतर्क हैं। रफीक की तरफ से अधिवक्ता महंतेश एस हिरेमठ ने बहस की। वहीं सरकारी वकील प्रवीण वाई देवरेद्दियवर ने इस जमानत अर्जी का विरोध किया। पीड़िता की तरफ से सीनियर एडवोकेट एस आर हेगड़े ने बहस की।

क्या था मामला

बताते चलें कि रफीक पर आरोप है कि उसने नौकरी दिलाने के नाम पर पहले एक अनुसूचित जाति (SC वर्ग) की महिला से दोस्ती की और इसी बहाने उसे अपने साथ ले कर बेलगावी चला गया। बेलगावी में पीड़िता को एक कमरे में रखा गया। यहाँ रफीक ने पीड़िता से कई बार बलात्कार किया। पीड़िता शादीशुदा और 2 बच्चों की माँ थी जिसे कुछ दिनों बाद इस्लाम कबूल करने का दबाव दिया जाने लगा। कुछ दिनों बाद पीड़िता जैसे-तैसे रफीक के चंगुल से निकल कर भागने में कामयाब रही थी।

घर आ कर महिला ने अपने पति को सारी बात बताई थी। पीड़िता के पति ने रफीक को नामजद करते हुए पुलिस में FIR दर्ज की थी। यह FIR IPC की धाराओं के साथ SC/ST एक्ट व कर्नाटक प्रोटेक्शन ऑफ़ राइट टू फ्रीडम ऑफ़ रिलिजन एक्ट 2022 के तहत दर्ज हुई थी। रफीक को गिरफ्तार कर लिया गया था जिसकी जमानत जिला अदालत ने ख़ारिज कर दी थी। आखिरकार अब रफ़ीक की जमानत अर्जी हाईकोर्ट से भी ख़ारिज हो चुकी है।

10% से बढ़ा कर किया 14%, अब हो गया 18.5%… समझिए कैसे कर्मचारी नहीं मोदी सरकार उठाएगी पेंशन का भार: 23 लाख को UPS से फायदा, 10 बिंदुओं में समझें नई स्कीम

मोदी सरकार अब सरकारी कर्मचारियों के लिए UPS (यूनिफाइड पेंशन स्कीम) लेकर आई है।केंद्रीय कैबिनेट ने इस निर्णय को मंजूरी भी दे दी है। इससे पहले NPS (न्यू पेंशन स्कीम) लागू कर दी गई थी, लेकिन कॉन्ग्रेस पार्टी लगातार OPS (ओल्ड पेंशन स्कीम) लागू करने की ज़िद कर रही थी। इसके लिए सरकारी कर्मचारियों को भड़काया जा रहा था। ऐसे में मोदी सरकार ने बीच का रास्ता निकाला है। OPS ने सरकारी खजाने पर भारी बोझ भी पड़ता है। आइए, 10 बिंदुओं में समझते हैं कि UPS है क्या।

पहला, केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री अश्विनी वैष्णव ने बताया है कि सरकारी कर्मचारियों की तरफ से सबसे महत्वपूर्ण विषय था कि उन्हें एक निश्चित राशि चाहिए। केंद्रीय मंत्री ने इसे वाजिब माँग बताते हुए कहा कि कई वित्तीय मॉडलों का अध्ययन कर के 50% Assured Pension की व्यवस्था की गई। रिटायरमेंट से पहले के 12 महीनों की औसत बेसिक Pay का आधा होगा। इसकी योग्यता सेवा में 25 वर्ष पूरे करने वाले कर्मचारियों पर लागू होगी। 10-25 के बीच अनुपातिक पेंशन की व्यवस्था होगी।

दूसरा, कर्मचारियों और इस योजना का भारत नहीं डाला जाएगा। आज कर्मचारी 10% योगदान देते हैं और 10 वर्ष पहले तक सरकार भी 10% योगदान देती थी। मोदी सरकार ने 2019 में इसे 14% कर दिया, जो अब 18.5% हो जाएगा। तीसरा, कभी किसी कर्मचारियों की मौत हो जाए तो पति/पत्नी को फैमिली पेंशन मिलेगा। मौत से तुरंत पहले जो पेंशन थी, उसका 60% उसके पति अथवा पत्नी को मिलेगा। चौथा, न्यूनतम पेंशन की भी व्यवस्था की गई है।

ये एक बड़ा विषय था क्योंकि सेवा की अवधि कम होने की स्थिति में पेंशन में वित्तीय योगदान भी कम होता था और इस तरह पेंशन में पर्याप्त धनराशि नहीं मिल पाती थी। अब ऐसा नहीं होगा। इसीलिए, अब 10,000 रुपए की न्यूनतम Assured पेंशन की व्यवस्था की गई है। पाँचवाँ, महँगाई के साथ कर्मचारियों को भी फायदा मिलेगा। ‘ऑल इंडिया कंज्यूमर प्राइस फॉर इंडस्ट्रियल वर्कर्स’ का इस्तेमाल कर के पेंशन के ऊपर इन्फैशन इंडेक्सेशन मिलेगा, जिसे DA की जगह DR कहा जाएगा।

छठा, इस योजना में Lump-Sum पेमेंट है, जो ग्रैच्युटी के अतिरिक्त होगा। Superannuation की स्थिति में ये धनराशि तय की गई है। हर 6 महीने की सेवा के लिए मासिक PA-DA को जोड़ कर जितना होगा उसका 10% दिया जाएगा। इससे कर्मचारियों को बड़ी राहत मिलेगी। अगर किसी की सेवा 30 वर्ष की है तो उसे 5 महीने का वेतन इसके तहत मिलेगा। सातवाँ, जो लोग रिटायर हो चुके हैं और NPS के तहत हैं वो भी इस योजना का लाभ ले सकेंगे। PPF रेट के ब्याज के साथ उन्हें इंटरेस्ट का पेमेंट एरियर के रूप में किया जाएगा।

8वाँ, कर्मचारी ये चुन सकेंगे कि वो NPS में रहना चाहते है या फिर UPS में। इस योजना का लाभ केंद्र सरकार के कर्मचारियों को मिलेगा। नौवाँ, ये योजना 1 अप्रैल, 2025 से लागू हो जाएगी। केंद्र सरकार के करीब 23 लाख कर्मचारियों को इसका लाभ मिलेगा। अंतिम और दसवीं महत्वपूर्ण बात, राज्य सरकारें भी इसी आर्कटेक्चर को अपने कर्मचारियों के लिए इस्तेमाल कर सकती है। राज्य सरकार के भी कर्मचारी अगर इसमें शामिल होते हैं तो करीब 90 लाख सरकारी कर्मचारियों को इसका लाभ मिलेगा।

‘असम में अगर शाहजहाँ या शाह ज़लाल से नाम पूछें तो बुद्धिजीवी Victim Card खेलते हैं’: CM सरमा बोले- लैंड जिहाद की लड़ाई में मुझे और मेरे परिवार को खतरा

असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने एक प्रेस वार्ता के दौरान एक पत्रकार से उसका नाम पूछ लिया था। संयोग से वह पत्रकार मुस्लिम निकला था। इसके बाद वामपंथी-इस्लामी गैंग के साथ-साथ विपक्षी दलों ने सीएम सरमा को सांप्रदायिक बताते हुए हमला बोल दिया था। अब मुख्यमंत्री सरमा ने इसका करारा जवाब दिया है और कहा है कि यह सुरक्षा कारणों से जरूरी था।

उन्होंने अपने बयान का एक वीडियो शेयर करते हुए सोशल मीडिया साइट एक्स पर लिखा, “प्रेस वार्ता में यह नियम होता है कि पत्रकार अपने नाम का परिचय देने के बाद सवाल पूछते हैं। यह सुरक्षा के लिए भी अनिवार्य है। लेकिन, असम में अगर शाहजहाँ या शाह ज़लाल से नाम पूछें तो बुद्धिजीवी ‘Victim Card’ खेलने लगते हैं।”

उन्होंने कहा कि वे असम में लैंड जिहाद के खिलाफ कार्रवाई कर रहे हैं, इसलिए ‘टूलकिट’ गैंग द्वारा उन्हें निशाना बनाया जा रहा है। उन्होंने कहा, “लैंड जिहाद का Toolkit जानिए। असम में बदलते जनसांख्यिकी के खिलाफ जो मैं लड़ाई लड़ रहा हूँ, उससे मुझे और मेरे परिवार को बहुत बड़ा खतरा है। Ecosystem के लोग मुझे जितना भी गाली देना चाहें, दे सकते हैं, लेकिन मैं पीछे नहीं हटूँगा।”

कॉन्ग्रेस सहित विपक्षी दलों द्वारा इसे मुद्दा बनाने को लेकर सीएम ने कहा, “असम में लोकसभा चुनाव के बाद जिन क्षेत्रों में एक पार्टी ने अपना वोट शेयर बढ़ाया, वहाँ इस पार्टी के समर्थकों यानी एक विशेष समुदाय को इतना साहस प्राप्त हुआ कि वह अपना दबदबा बनाने के चक्कर में हैं। हिंदू महिलाओं पर जो अत्याचार की घटना आ रही है इसी का परिणाम है।”

उन्होंने आगे कहा, “असम में महिलाओं के खिलाफ अपराध भी एक बड़ी अतिक्रमण रणनीति का हिस्सा है। वे परिवारों को डराते हैं और फिर उनकी ज़मीन हड़प लेते हैं। धींग का पवित्र शहर और हाल ही में एक हिंदू नाबालिग के खिलाफ अपराध की जगह पर कभी 90% हिंदू आबादी थी। आज यहाँ 90% मुस्लिम आबादी है।”

दरअसल, 21 अगस्त को मीडिया से बातचीत के दौरान शाह आलम नाम के एक ऑनलाइन मीडिया के पत्रकार ने सीएम सरमा से सवाल पूछा। आलम ने पूछा था कि क्या राज्य सरकार ने उनके जालुकबारी निर्वाचन क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले मंडकाटा में पहाड़ियों की कटाई के खिलाफ कोई कार्रवाई की है।

इस पर सीएम सरमान ने आलम से कहा कि अगर उनके पास पहाड़ी काटने का वीडियो फुटेज है तो उसे साझा करें। उन्होंने कहा कि अगर पहाड़ी कट रही है तो उसे रोकना होगा। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि मंडकाटा पहाड़ी की कटाई गुवाहाटी में अचानक आई बाढ़ का कारण नहीं हो सकती।

इस दौरान सीएम ने पत्रकार से उसका नाम पूछ लिया। पत्रकार ने अपना नाम भी बताया। इसके बाद उन्होंने एक प्राइवेट यूनिवर्सिटी का नाम लिया, जिसके संस्थापक एवं चांसलर एक मुस्लिम महबूबुल हक हैं। इससे पहले सरमा ने गुवाहाटी में बाढ़ के लिए इस यूनिवर्सिटी को भी जिम्मेवार बताया था।

उन्होंने कहा था कि मेघालय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के परिसर के निर्माण के लिए वनों की बड़े पैमाने पर कटाई की गई, जिसके कारण गुवाहाटी में अचानक बाढ़ आई। उन्होने कहा था कि विश्वविद्यालय के द्वार मक्का (सऊदी अरब का इस्लामी शहर) जैसे हैं। उन्होंने विश्वविद्यालय के खिलाफ राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) का दरवाजा खटखटाने की बात कही थी।

इस मामले को वामपंथी और इस्लामी गैंग के साथ-साथ विपक्षी दलों ने सांप्रदायिक बताकर खूब उछाला था। कॉन्ग्रेस के जयराम रमेश ने कहा था, “असम के मुख्यमंत्री ने जो कहा वह अस्वीकार्य और निंदनीय है। बीमार दिमाग और बड़बोलापन एक जहरीला मिश्रण है।”

बांग्लादेश में तख्तापलट का फायदा मुस्लिम घुसपैठियों को, 1 महीने में 35 पकड़ाए: संघर्ष कर रहे हिंदुओं पर बोले असम के CM- हिंदू होते हैं मातृभूमि के भक्त

असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने शनिवार (24 अगस्त 2024) को कहा कि बांग्लादेश में तख्ता पलट के बाद वहाँ के हिंदू लड़ रहे हैं, जबकि मुस्लिम भागकर भारत में घुसपैठ कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि पिछले एक महीने में 35 बांग्लादेशी मुस्लिम घुसपैठियों को गिरफ्तार किया गया है। सीएम सरमा का कहना है कि पिछले एक महीने में बांग्लादेश से एक भी हिंदू भारत नहीं आया।

हिमंता सरमा ने कहा कि जिन 35 बांग्लादेशियों को गिरफ्तार किया है, उनके पास पासपोर्ट नहीं है। वे सब भारत के असम राज्य में अवैध रूप से घुसे थे। उन्होंने कहा कि हाल ही में असम के करीमगंज में दो लोगों को गिरफ्तार किया गया और उन्हें वापस भेज दिया गया। सरमा के अनुसार, “वहाँ की हिंदू कम्यूनिटी भारत आने की कोशिश नहीं कर रही है, मुस्लिम यहाँ आने की लगातार कोशिश कर रहे हैं।”

सीएम सरमा ने शनिवार को कहा, “आज ही हमने करीमगंज में 2 लोगों को गिरफ्तार किया और उन्हें वापस भेजा। वे हिंदू नहीं थे।” उन्होंने बताया कि बांग्लादेशी मुस्लिम असम के जरिए कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरु और तमिलनाडु के शहर कोयंबटूर जाना चाहते हैं। ये घुसपैठिए माधोपुर (बीडी)-अगरतला रूट के जरिए भी असम में घुस रहे हैं। असम पुलिस ने बदरपुर रेलवे स्टेशन दोनों पकड़ा है। 

हिमंता सरमा ने कहा कि करीमगंज में पकड़ाए दोनों बांग्लादेशी भी बेंगलुरु और कोयंबटूर की टैक्सटाइल इंडस्ट्रीज में नौकरी करना चाहते थे। उनकी पहचान मासूम खान और सोनिया अख्तर के रूप में हुई है। मासूम बांग्लादेश के मॉडलगंज पुलिस स्टेशन इलाके का रहने वाला है। वहीं, सोनिया ढाका की रहने वाली है। दोनों अगरतला रूट से असम आए थे।

असम के मुख्यमंत्री ने कहा है कि अगर बांग्लादेश के हिंदू भारत आना चाहते तो वे बँटवारे के समय ही आ जाते। वे बांग्लादेश को अपनी मातृभूमि मानते हैं, इसलिए वे नहीं आए। हिमंता सरमा ने आगे कहा, “हमें उनका सम्मान करना चाहिए। हमने प्रधानमंत्री मोदी से कहा है कि वे बांग्लादेश सरकार से हिंदुओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने का दबाव डालें।”

बता दें कि बांग्लादेश में 5 अगस्त 2024 को तख्ता पलट हुआ था। आरक्षण खत्म करने की माँग को लेकर शुरू हुआ प्रदर्शन हिंसक हो और कट्टरपंथियों के हाथ में चला गया था। इसके बाद शेख हसीना ने प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा देकर बांग्लादेश छोड़ दिया था। इसके बाद वहाँ के अल्पसंख्यक हिंदुओं के घरों-दुकानों एवं मंदिरों पर हमले हुए। कई लोगों की हत्या कर दी गई।

जो NPS में लगा चुके पैसा, उनके लिए UPS में क्या, कितना और कैसे होगा फायदा… OPS के मुकाबले कितना अलग: जानिए पॉइंट-बाइ-पॉइंट

केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने यूनिफाइड पेंशन स्कीम (Unified Pension Scheme- UPS) को मंजूरी दी है। यह 1 अप्रैल 2025 से लागू हो जाएगा। इस योजना से 23 लाख केंद्रीय कर्मचारियों को लाभ मिलेगा। कर्मचारियों को राष्ट्रीय पेंशन योजना (NPS) और यूनिफाइड पेंशन योजना (UPS) में एक को चुनने का विकल्प दिया जाएगा। अब UPS, NPS और OPS के अंतर को समझने की कोशिश करते हैं।

यूनिफाइड पेंशन स्कीम (UPS)

UPS केंद्र की एनडीए सरकार द्वारा शुरू की गई नई पहल है। यह ओल्ड पेंशन स्कीम (OPS) की ही तरह काम करेगा और साथ ही इसमें NPS के भी कुछ जरूरी फायदों को शामिल किया गया है। इसके तहत कर्मचारियों की बेसिक सैलरी के 50 फीसदी के बराबर आजीवन पेंशन देने का प्रावधान किया गया है। UPS का लाभ लेने के लिए 25 वर्ष की न्यूनतम अर्हक सेवा का मानदंड रखा गया है।

UPS चुनने वाले कर्मचारियों को सेवानिवृत्ति से पहले अंतिम 12 महीनों के मूल वेतन के औसत का 50 प्रतिशत मिलेगा। लाभार्थी को न्यूनतम 10 वर्ष की सेवा की सेवानिवृत्ति पर कम-से-कम 10,000 रुपये प्रतिमाह मिलेंगे। केंद्रीय कर्मचारियों को NPS और UPS में से चुनाव का विकल्प मिलेगा। राज्य सरकारें भी इसे लागू कर सकती हैं।

इसमें महंगाई बढ़ने के हिसाब से डियरनेस अलाउंस में बढोतरी, कर्मचारी की मृत्यु पर परिजनों को पेंशन का 60 फीसदी देने की गारंटी है। इसमें ग्रेच्युटी के साथ एकमुश्त सुपरएनुएशन का भी प्रावधान किया गया है। महंगाई राहत औद्योगिक श्रमिकों के लिए अखिल भारतीय उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (AICPI-IW) पर आधारित होगी। 

प्रत्येक छह महीने की सेवा के लिए सेवानिवृत्ति की तिथि पर मासिक पारिश्रमिक यानी वेतन और महंगाई भत्ते का दसवाँ हिस्सा दिया जाएगा। सरकारी कर्मचारी अपने वेतन का 10% यूपीएस में योगदान देंगे। अब जिस तरह से ओल्ड पेंशन स्कीम में सरकार का योगदान 14 फीसदी होता था, वो यूपीएस में बढ़ाकर 18.5 फीसदी कर दिया गया है।

केंद्रीय कर्मचारियों की तरह ही अब राज्य सरकारों को भी एकीकृत पेंशन योजना (UPS) और राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली (NPS) में से एक को चुनने का विकल्प दिया जाएगा। अगर राज्य सरकारें NPS के बजाय UPS चुनती हैं तो इसके लाभार्थियों की संख्या लगभग 90 लाख हो जाएगी। UPS प्राइवेट कर्मियों के लिए नहीं है। वहीं, NPS में प्राइवेट नौकरी वाले निवेश कर सकते हैं।

नेशनल पेंशन सिस्टम (NPS)

प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) की सरकार ने नेशनल पेंशन सिस्टम (NPS) योजना को साल 2004 से लागू किया था। इस योनजा को ओल्ड पेंशन स्कीम (OPS) की जगह पर लागू करने की योजना थी। हालाँकि, इसका बड़े पैमाने पर विरोध हुआ था।

NPS के तहत कर्मचारियों से भी पेंशन में योगदान लिया गया था। यह योगदान 10 प्रतिशत है। इसके अलावा, इसमें कुछ और भी प्रावधान किए गए हैं। इसमें पेंशन की 60 फीसदी रकम टैक्स फ्री होती है और एकमुश्त निकाली जा सकती है। वहीं, इसकी 40 फीसदी रकम पर टैक्स ब्रैकेट के हिसाब टैक्स देना होता है।

NPS के तहत मिलने वाला पेंशन कर्मचारी द्वारा नौकरी के दौरान दिए गए योगदान पर निर्भर करता है। इसके साथ ही यह रकम शेयर बाजार आदि से जुड़ा होता है तो इससे मिलने वाली रकम मार्केट परफॉर्मेंस पर भी निर्भर करता है। इसमें सरकारी कर्मचारी अपने मूल वेतन और DA का 10% योगदान करते हैं, जबकि सरकार इसमें 14 फीसदी का योगदान करती है।

एनपीएस में कोई भी व्यक्ति अपना अकाउंट खोल सकता है। इसमें न्यूनतम योगदान 500 रुपए है। इसमें दो तरह के अकाउंट होते हैं। पहला, टियर-1 अकाउंट और दूसरा टियर-2 अकाउंट। टियर-1 अकाउंट अनिवार्य होता है और इस पर टैक्स छूट मिलती है। वहीं, टियर-2 वैकल्पिक होता है। इसमें से कभी भी निकाल सकते हैं। इस पर कर छूट का लाभ नहीं मिलता है।

NPS से कोई भी कर्मचारी सेवानिवृत्ति के बाद एकमुश्त एक्यूमुलेटेड राशि के तौर पर पेंशन की कुल राशि का 60 फीसदी रकम निकाल सकते हैं। बाकी रकम का इस्तेमाल रेगुलर पेंशन के भुगतान के लिए एन्यूटी खरीदने में किया जा सकता है। इसमें 60 प्रतिशत राशि पर कोई भी टैक्स नहीं लगेगा।

ओल्ड पेंशन स्कीम (OPS)

ओल्ड पेंशन स्कीम में कर्मचारियों के आखिरी वेतन के आधार पर मासिक पेंशन देने का प्रावधान है। इस योजना के तहत कर्मचारियों को पेंशन में योगदान नहीं देना होता था। इसका खर्च सरकार वहन करती थी। इस योजना के स्थान पर अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने NPS योजना लागू की थी। OPS को फिर से लागू करने की माँग लगातार होती रहती है।

OPS सिर्फ उन सरकारी कर्मचारियों पर लागू होता है, जो 1 जनवरी 2004 से पहले नौकरी में शामिल हुए हैं। OPS में पेंशन की रकम में महंगाई भत्ते (DA) में समय-समय पर होने वाले बदलावों को भी शामिल किया जाता है। DA महंगाई से जुड़ा मामला है। इसके स्कीम के तहत मिलने वाली रकम पर कोई टैक्स नहीं लगता है।

OPS के तहत कर्मचारी अपनी रिटायरमेंट के बाद अंतिम वेतन का 50 प्रतिशत पेंशन के रूप में निकाल सकते थे। इस योजना को सरकार ने अब बंद कर दिया है। अगर कर्मचारी NPS की जगह UPS का चुनाव करते हैं तो उन्हें जो अतिरिक्त राशि या उसका ब्याज बनेगा, उसे केंद्र भुगतान करेगा। यह अतिरिक्त रकम लगभग 800 करोड़ रुपए की होगी।

तीनों में कौन सा स्कीम बेहतर?

OPS सबसे बेहतर स्कीम था, क्योंकि इसमें कर्मचारियों को पेंशन के लिए कोई योगदान नहीं देना पड़ता था। इसका सारा खर्च सरकार वहन करती थी। हालाँकि, कुछ अन्य फायदों को उसकी जगह लाए गए NPS में जोड़ा गया था। सरकार का आकलन है कि अभी कार्यरत 99 फीसद केंद्रीय कर्मियों के लिए UPS फायदेमंद होगा। ऐसे में NPS और नया स्कीम UPS में कौन बेहतर है, यह जानना जरूरी है।

UPS में कर्मचारियों को एक निश्चित पेंशन मिलेगा, जो उनकी पिछले एक साल के औसत मूल वेतन एवं महंगाई भत्ता का 50 प्रतिशत होगा। वहीं, NPS में बाजार में निवेशित राशि के हिसाब से पेंशन राशि मिलने की व्यवस्था है। UPS में सेवा काल 10 से 25 वर्षों का है तो पेंशन की राशि अवधि के समानुपातिक आवंटन के आधार पर तय होगी। यह व्यवस्था NPS में नहीं है।

UPS में सेवानिवृत्त कर्मचारी की मृत्यु होने पर उसके आश्रित (पति या पत्नी) को पेंशन राशि का 60 फीसदी सुनिश्चत पारिवारिक पेंशन के तौर पर देने की व्यवस्था की गई है। इसकी महत्वपूर्ण व्यवस्था यह है कि इसमें न्यूनतम पेेंशन की राशि 10 हजार रुपए प्रतिमाह है, जबकि NPS में इस तरह की व्यवस्था नहीं है।

UPS की एक महत्वपूर्ण लाभ यह है कि इसे महंगाई सूचकांक से जोड़ा गया है। अगर खुदरा महंगाई दर बढ़ती है तो उसके हिसाब से पेंशन की राशि भी बढ़ेगी। महंगाई भत्ता के आधार पर पेंशन, पारिवारिक पेंशन और न्यूनतम पेंशन तीनों का निर्धारण होगा। वहीं, NPS में इसका निर्धारण सिर्फ मार्केट के आधार होता है।

मोदी सरकार द्वारा पेश इस नई पेंशन स्कीम में सेवा काल के दौरान हर छह माह के लिए मूल वेतन का 10 फीसद राशि एकमुश्त मिलेगी, जो ग्रेच्यूटी के अलावा होगी। इसके अलावा, UPS में सरकार का योगदान 18.5 प्रतिशत होगा, जोकि NPS के योगदान से अधिक है। NPS में सरकार का योगदान 14 प्रतिशत है।