बीते दिनों लखनऊ के गोमती नगर में जल जमाव के दौरान एक युवती से बदसलूकी मामले में गिरफ्तार हुए पवन यादव को आज जमानत मिली है। जेल से रिहा होने के बाद उन्होंने सबसे पहले अखिलेश यादव का धन्यवाद किया है। मीडिया को दिए अपने बयान में उसने ऐसे दिखाया कि उसकी गलती नहीं थी फिर भी उसे पकड़ा गया। हालाँकि पुलिस ने विज्ञप्ति जारी कर जानकारी दी कि आरोपित के ऊपर से आरोप नहीं हटे हैं।
#WATCH | Gomti Nagar molestation case | Luckow, UP: On meeting with Akhilesh Yadav regarding his arrest in the case of molestation, accused Pawan Yadav says, "I am thankful to Samajwadi Party and Akhilesh Yadav. I was not there when the incident happened… I was not involved in… pic.twitter.com/Pl4msBUdB1
समाचार एजेंसी एनएआई के अनुसार, पवन यादव ने जेल से निकलने के बाद कहा, “मैं समाजवादी पार्टी और अखिलेश यादव का आभारी हूँ। जब घटना घटी तो मैं वहाँ नहीं था… मैं वीडियो में शामिल नहीं था। सीएम योगी आदित्यनाथ को गलत जानकारी दी गई होगी। जो अधिकारी कहेंगे वही तो मानेंगे। उन्होंने शायद मेरा नाम इसलिए लिया क्योंकि मेरा नाम ‘पवन यादव’ है। अखिलेश जी ने कहा है कि अगर मैंने कुछ गलत नहीं किया है तो मुझे डरने की जरूरत नहीं है। मुझे बहुत बेहतर महसूस हुआ।”
वहीं अखिलेश यादव ने इस मामले में बयान दिया कि गोमती नगर घटना में जो लड़के पकड़े गए और जिसका विधानसभा में नाम लिया गया वह मिलने आया है। अखिलेश यादव के अनुसार वे बेचारा चाय पी रहा था उसी दौरान पुलिसवालों ने उसको पकड़ लिया। उन्होंने कहा ये जाँच का विषय है जिसके बाद ये लोग छूट जाएँगे।
अखिलेश यादव ने आगे अधिकारियों को धमकाने वाले अंदाज में कहा जिन अधिकारियों ने अपना रुतबा बढ़ाने के लिए और सरकार की इमेज बनाने के लिए इनको पकड़ा और थाने में ले जाकर हाथ जोड़कर जो तस्वीर छापी। मैं उनसे कहूँगा कि उनको मत भूलना और मैं भी उनको नहीं भूलूँगा। विधानसभा में और भी नाम पढ़े जाने चाहिए थे, लेकिन केवल दो नाम पढ़े गए।
बता दें कि पवन यादव द्वारा मीडिया में दिए गए बयान और लगाए गए आरोप के बाद यूपी पुलिस ने भी इस बाबत बयान जारी कर बताया कि अभी ये साबित नहीं हुआ है कि पवन यादव घटना में शामिल नहीं था। पुलिस ने बताया पवन यादव के खिलाफ जो भी कार्रवाई हुई है वो विधिपूर्ण ढंग से हुई है। अभी तक प्राप्त जानकारी के अनुसार, उसके खिलाफ स्थानीय स्तर पर पूर्व में में तीन अभियोग पहले से पंजीकृत हैं। जिसमें आरोप पत्र प्रेषित है और वर्तमान प्रकरण की विवेचना पुलिस द्वारा की जा रही है। साक्ष्य के आधार पर विवेचना का निस्तारण किया जाएगा। अभी आरोपित को न तो क्लीन चिट दी गई है और न ही उसे आरोप मुक्त किया गया है।
बता दें कि 31 जुलाई को लखनऊ में बारिश हुई थी जिससे गोमती नगर में ताज होटल के पास काफी पानी भर गया था। उस समय पानी में करीबन 25-30 लड़के वहाँ खड़े होकर हुड़दंग कर रहे थे। तभी एक लड़की अपने दोस्त की वजह से वहाँ गुजरी। इस दौरान लड़कों ने न केवल उस पर पानी फेंका बल्कि उसके साथ बदसलूकी भी की। बाद में घटना की वीडियो वायरल हुई तो दो दर्जन आरोपितों को पुलिस ने पकड़ा और फिर सीएम योगी ने ये मुद्दा सदन में उठाया। आरोपित का नाम पवन यादव बताया गया। इसी के बाद अखिलेश यादव भड़के।
कोलकाता गैंगरेप मामले में सोशल मीडिया पर आवाज उठाने वालों के खिलाफ कोलकाता पुलिस एक्शन ले रही है। कई मामले सामने आए हैं जहाँ सोशल मीडिया यूजर्स ने बताया कि उन्हें कोलकाता का मुद्दा उठाने पर पुलिस से नोटिस मिले। 16 अगस्त को एक महिला डॉक्टर ने अपने ट्वीट के जरिए बताया कि मामले से संबंधित ट्वीट करने पर कोलकाता पुलिस उनके घर पहुँची थी और वहाँ से उनसे कॉल करवाकर कहा कि वो अपने ट्वीट डिलीट करें और अगले दिन थाने में आकर मिलें।
एक्स हैंडल @epicnephrin_e से किए गए ट्वीट में लड़की ने पूरे वाकये को साझा किया है। उन्होंने बताया, “15 अगस्त को शाम 7:30 बजे के करीब कोलकाता पुलिस ने मेरे पते के बारे में पूछना शुरू किया। पड़ोसियों से घरवालों को पता चला कि पुलिस मुझे ढूँढ रही है। उनका कहना था कि उन्हें समन देना है। हालाँकि घर पहुँचने के बाद उन्हें मेरे भाई-भाभी मिले। उन्होंने उनसे मुझे कॉल करने को कहा। पूछा गया- क्या तुमने बर्दवान यूनिवर्सिटी के मामले पर कुछ लिखा है। इस पर मैंने ‘हाँ’ कहा।”
पोस्ट के अनुसार, आगे बातचीत में पुलिस ने पूछा- ” ‘तुमने पोस्ट की प्रमाणिकता जाँची थी।’ मैंने कहा- ‘मैंने इस बारे में मीडिया हाउस के लेख देखे थे, लेकिन मैंने लोगों के स्टेटस में जो एंगल देखा, उस पर पूरी तरह से विश्वास कर लिया। मैंने सत्यापन के बाद पोस्ट के नीचे इसे संपादित किया था।” डॉक्टर को आगे कहा गया- “कृपया पोस्ट को हटा दें और बिना पुष्टि किए आगे कोई जानकारी पोस्ट न करें और कल टाउन थाने में रिपोर्ट करें।'” महिला डॉक्टर के पोस्ट के अनुसार, पुलिस के आगे उनके भाई ने हाथ जोड़े, माँ रोती रहीं। वो लोग उन लोगों को कॉल कर रहे थे जिन्हें वो समझते थे कि मामला संभाल लेंगे। वो असहाय हो गए थे। भाई से सब पूछ रहे थे कि आखिर पुलिस क्यों उनके बारे में पूछ रही थी।
Couldn’t sleep without posting this. My mom got a call from my neighbour (from my hometown) at around 7.30 pm that police(3-4 uniformed officers) were searching for my home. They were saying Kolkata police had asked them to summon me about some post and they searching for my…
जानकारी के अनुसार, ये महिला डॉक्टर पिछले कुछ दिन से इस मामले पर लगातार आवाज उठा रही हैं। वह इस केस में न्याय की गुहार लगा रही हैं, लेकिन उनकी आवाज दबाने के प्रयास हो रहे हैं। 14 अगस्त को टीएमसी समर्थक ने उन्हें खुलेआम धमकाया था कि वह सुनिश्चित करेंगी कि पुलिस उनके पास आकर रहे। इसके अलावा अन्य ट्वीट भी सामने आए थे जिसमें टीएमसी समर्थक लगातार उन्हें धमका रहे थे। डॉक्टर के अनुसार, इन्हीं धमकियों के बाद पुलिस उनके घर तक आ गई और परिवार से कहकर पोस्ट डिलीट करने को कहा।
She is continuously spreading misinformation about the RG Kar case…and yes she is also a doctor. Hope people will understand it's not ok to share misinformation about a sensitive matter… https://t.co/R8vUyjpY97
बता दें कि ये मामला अकेला नही है जहाँ सोशल मीडिया यूजर को आवाज उठाने पर कोलकाता पुलिस का डर दिखाया गया हो। कई यूजर्स हैं जो कह रहे हैं कि उन्हें नोटिस मिला है। एक्स की एक्टिव यूजर और लेखिका शेफाली वैद्य ने बताया कि उन्हें कोलकाता पुलिस से नोटिस मिला है।
Request – Please read through and RT for you agree.
So I got this threatening letter from @KolkataPolice for merely asking a few questions and for exercising my right of free speech.
अपने पोस्ट में उन्होंने बताया, “मुझे कोलकाता पुलिस से यह धमकी भरा पत्र मिला, क्योंकि मैंने कुछ सवाल पूछे थे और अपनी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का प्रयोग किया था। यह ममता प्रशासन द्वारा कोलकाता पुलिस की शक्ति का उपयोग करके आम नागरिकों की आवाज को दबाने का स्पष्ट मामला है। मैं एक आम नागरिक हूँ, जो पीड़िता के साथ जो हुआ, उससे इतनी निराश हूँ कि मैंने बोलने का फैसला किया। लेकिन जाहिर है, कोलकाता पुलिस को स्वतंत्र आवाजें पसंद नहीं हैं। एक महिला और एक मां के रूप में, मुझे अपनी सुरक्षा का डर है। हम सभी जानते हैं कि कोलकाता पुलिस क्या कर सकती है और हम सभी जानते हैं कि पश्चिम बंगाल में ममता के खिलाफ बोलने की हिम्मत करने वाली महिलाओं के साथ क्या होता है।”
Nupur ji @UnSubtleDesi , now I understand why you had to leave West Bengal, when the police force is hand in glove with the state government to muffle and silence the voice of the citizen, nothing can be done. A notice for asking #justiceformoumitadebnath while criminals rule? pic.twitter.com/4ihlTnvZKw
एक अन्य एक्स उपयोगकर्ता ने भी आरजी कर अस्पताल में बलात्कार और हत्या की शिकार डॉक्टर के लिए न्याय की माँग करने पर उसे मिले धमकी भरे नोटिस के बारे में पोस्ट किया। उन्होंने कहा कि जब पुलिस पूरी तरह राज्य सरकार के हाथ में हो और नागरिकों की आवाज दबाने की कोशिश करे तो वाकई कुछ नहीं सकता।
प्रदर्शनकारियों पर हमला
गौरतलब है कि बंगाल के आरजी कर अस्पताल में महिला डॉक्टर के साथ हुई वीभत्सता के बाद सैंकड़ों प्रदर्शनकारी सड़क पर उतरकर इंसाफ माँग रहे है। 14 अगस्त को इन प्रदर्शनकारियों पर हमला हुआ था। उपद्रवियों ने अस्पताल में घुस तोड़फोड़ की थी जिसके बाद आशंका जताई गई थी कि कहीं ये सब सबूत मिटाने के लिए तो नहीं हुआ। भाजपा नेता ने भी इस संबंध में आरोप लगाए थे। हालाँकि बाद में कोलकाता पुलिस ने बयान जारी किया कि ये बात झूठ है कि घटनास्थल से छेड़छाड़ हुई है। हकीकत यह है घटनास्थल सेमिनार रूम है और वो सुरक्षित है।
Since points 1 & 2 concern Kolkata Police, we wish to clarify: 1. Reports of KP informing the family about a possible suicide are false. The family confirmed the call did not come from KP 2. KP didn’t cremate the body of deceased. It was her family who cremated her. https://t.co/ktoVv8scjZ
इसी तरह एक अन्य सवाल किया गया था कि कोलकाता पुलिस ने मृतिका का शव क्यों जलाया। इस पर पुलिस ने जवाब दिया कि शव उन्होंने नहीं जलाया बल्कि पीड़िता के परिवार ने जलाया है। वहीं एक अन्य सवाल जिसमें पूछा गया था कि घटना के अचानक बाद रेनोवेशन का कार्य कैसे शुरू हुआ, इस पर पुलिस ने कोई जवाब नहीं दिया।
कोलकाता के आरजी कर अस्पताल में डॉक्टर के साथ हुए रेप और मर्डर के मामले में अब भारतीय जनता पार्टी ने बंगाल सीएम ममता बनर्जी पर निशाना साधते हुए कोलकाता पुलिस आयुक्त विनीत गोयल पर सवाल उठाए हैं। कहा जा रहा है कि ये कोई पहला मामला नहीं है जिसमें विनीत गोयल ने आरोपितों को बचाने का प्रयास किया हो। इससे पहले बंगाल का एक कामदुनी गैंगरेप केस भी था, जिसमें वही जाँच अधिकारी थे और आरोपित बरी हुए थे।
अमित मालवीय ने कोलकाता हाईकोर्ट में सुनवाई का एक वीडियो साझा करते हुए यह आरोप लगाए। इसमें याचिकाकर्ता के वकील जो मामले की सीबीआई जाँच की माँग कर रहे थे, वह कमिश्नर विनीत गोयल की भूमिका पर सवाल उठाते हैं और अतीत में इसी तरह के एक मामले में उनकी संलिप्तता का हवाला देते हैं। वह कहते हैं कि जैसे 10 साल पहले कामदुनी मामले में आरोपित छूटे थे। वैसे इस मामले में भी छूटेंगे क्योंकि आज जो कोलकाता के पुलिस आयुक्त हैं वो उस समय सीआईडी के महानिरीक्षक थे।
वकीलों ने बताया कि आज कोलकाता मामले को सीबीआई को सौंपने के लिए पहले 7 दिन का समय माँगा गया। फिर कम से कम 24 घंटे माँगे गए। 10 साल पहले भी उनकी (विनीत गोयल) उनकी गड़बड़ी के कारण आरोपित बरी हो गए थे। वकीलों ने कहा कि इस मामले को भी छिपाने के लिए वही हथकंडा अपनाया गया है।
Those asking about the Kamduni rape and murder case…
In Kamduni, 20-year-old Shipra Ghosh was gangraped by eight men. After raping her, they tore apart her legs up to the navel, slit her throat and dumped her body in a field. Ansar Ali, Saiful Ali, Aminoor Ali, Bhutto Molla,… https://t.co/3YecDbxoAk
मालवीय ने इसी सुनवाई की क्लिप को साझा कर कहा, “कोलकाता पुलिस के कमिश्नर विनीत कुमार गोयल से मिलिए। सीआईडी के महानिरीक्षक के तौर पर वे बहुचर्चित बलात्कार और हत्या मामले में जाँच अधिकारी थे।”
बता दें कि आर जी कर मामले में विनीत गोयल पर उठ रहे वालों के बीच चर्चा में आया कामदुनी मामला कोई सामान्य केस नहीं था। 7 जून 2013 को कामदुनी गाँव में 20 साल की एक द्वितीय वर्ष की छात्रा अपने कॉलेज का एग्जाम देकर स्टेशन से अकेले घर लौट रही थी। वहीं सैफुल, अंसार अली समेत 9 की नजर उस पर पड़ी। उन्होंने उसे छेड़ना शुरू किया लेकिन लड़की उन्हें इग्नोर करके आगे बढ़ने लगी। लड़की का यूँ नजरअंदाज करना उन्हें पसंद नहीं आया और फिर वो उसे पकड़कर खेत में ले गए। खेत में उन्होंने लड़की के साथ क्या किया ये सुनकर शायद किसी की भी रूह काँप जाए।
मीडिया में मौजूद जानकारी बताती है कि आरोपितों ने उसके साथ न केवल गैंगरेप किया बल्कि उसे तड़पा-तड़पा कर मारा। उन्होंने लड़की के साथ हैवानियत इतनी दिखाई कि उसके प्राइवेट पार्ट को रेप के दौरान फाड़ दिया गया। इसके अलावा उसकी टांग खींचकर नाभि तक चीर दी गई और उसे फेंकने से पहले वो जिंदा न बचे इसके लिए उसके गले को रेता गया।
लड़की के भाई ने इस मामले में बताया था कि जब वो खुद कामदुनी से लौट रहा था तो उसने आरोपितों को रास्ते में देखा था। अंसार अली और सैफुल बात कर रहे थे- “आज मजा बड़ा आया, अब घर चलना चाहिए।” इनके बाद उसने बाकी 6 लोगों को भी देखा था। लेकिन तब उसे कुछ पता नहीं था।
खबरों के अनुसार, जब लड़की का शव अगले दिन बरामद हुआ तो लड़की अधनंगी थी। उसके साथ हुई वीभत्सता को देख इस मामले का खूब विरोध हुआ था। उसकी सहेलियाँ दिल्ली तक आईं। लोगों का रोष देख फिर ये मामला सीआईडी को सौंपा गया। जाँच में आरोपितों के अपराध का खुलासा हुआ।
लोगों ने उस केस की तुलना वीभत्सता के मामले में दिल्ली के निर्भया से की थी। वहीं अतिरिक्त जिला और सत्र न्यायाधीश संचिता सरकार की अदालत ने इस मामले को देख इसे ‘Rarest Of the Rare (दुर्लभतम से भी दुर्लभतम)’ कहा था। पिछले साल 2023 तक उस मामले में कलकत्ता हाई कोर्ट में सुनवाई हुई। अंत में मामले के 9 आरोपितों में से सिर्फ 2 को आजीवन कारावास की सजा मिली, जबकि बाकी छूट गए।
15 अगस्त 2024 को देशवासियों ने भारत के स्वाधीनता की 78वीं वर्षगांठ मनाई। इस अवसर पर राष्ट्र ने उन तमाम ज्ञात और अज्ञात बलिदानियों को नमन किया जिन्होंने भारत की एकता और अखंडता को बनाए रखने के लिए अपने प्राणों का बलिदान कर दिया। उन्हीं तमाम शूरवीरों में से एक थे मरणोपरांत शौर्य चक्र विजेता मेजर अनुराग नौरियाल। मेजर अनुराग को 23 अक्टूबर 1990 को ऑपरेशन रक्षक में अदम्य साहस दिखते हुए वीरगति मिली थी। ऑपइंडिया ने बलिदानी मेजर के परिवार वालों से मिल कर वर्तमान हालातों की जानकारी ली।
मेजर अनुराग नौरियाल मूल रूप से उत्तराखंड के निवासी थे। उनका जन्म 5 जुलाई 1954 को हुआ था। बचपन से ही राष्ट्रभक्ति से ओत-प्रोत अनुराग ने NDA (नेशनल डिफेन्स एकेडमी) की परीक्षा पास की। वो 23 दिसंबर 1973 को भारतीय सेना में अधिकारी बने। इनकी पोस्टिंग 10 पैरा कमांडों में हुई थी लेकिन बाद में वो गोरखा रेजिमेंट में आ गए थे। तमाम भाषाओं के जानकारी मेजर अनुराग योद्धा एक कुशल गोताखोर भी थे। व्यक्तिगत तौर पर वो खुशमिजाज, अच्छे शायर व गायक भी थे।
मेजर अनुराग की शादी उत्तराखंड की ही उमा नौरियाल से हुई थी। दोनों काफी दिनों तक अफेयर में रहे बाद में परिवार की सहमति से उनका विवाह हो गया। मेजर नौरियाल नोएडा में बस गए थे। परिवार में उनका 1 बेटा और एक बेटी हैं। बेटा इंजीनियर है जबकि बेटी अमेरिका में डॉक्टर हैं। बेटी ने भी कोरोना काल में कई अमेरिकियों की जान बचाई थी। वहीं मेजर नौरियाल की पत्नी उमा नोएडा सेक्टर 59 मेट्रो स्टेशन के पास मौजूद अपने पेट्रोल पम्प का कामकाज संभालती हैं। उन्होंने अपने पेट्रोल पम्प पर अधिकतर नौकरियाँ महिलाओं को दे रखीं हैं।
ऑपेरशन रक्षक में मिली थी वीरगति
साल 1990 में पंजाब में आतंकवाद अपने चरम पर था। इसी आतंकवाद को कुचलने के लिए सुरक्षा बलों ने ऑपरेशन ‘रक्षक’ चला रखा था। मेजर अनुराग भी अपनी टुकड़ी के साथ इसी अभियान का हिस्सा थे। तब उनकी तैनाती फ़िरोज़पुर में थी। 23 अक्टूबर 1990 को इन्फैंट्री ब्रिगेड के मेजर अनुराग बिहार रेजिमेंट के अधिकारी के साथ आतंकवाद प्रभावित इलाके में गश्त कर रहे थे। रास्ते में वायरलेस पर सूचना मिली कि गाँव भूरा करीमपुर के पास जवानों की आतंकियों से मुठभेड़ चल रही है।
आतंकियों से लड़ रहे जवानों को बैकअप देने के लिए मेजर अनुराग अपने साथी जवानों सहित मुठभेड़ स्थल की तरफ रवाना हो गए। आतंकी एक फार्म हॉउस में छिपे हुए थे। मेजर नौरियाल ने अपने साथियों सहित आतंकियों को घेर लिया। इसी दौरान आतंकियों की गोली से उमा चरण प्रसाद नाम के सूबेदार घायल हो गए। उनको जाँघ में गोली लग गई थी। मेजर अनुराग ने यह महसूस कर लिया कि अगर आतंकी को फ़ौरन मार नहीं गिराया गया तो घायल सूबेदार का बचना मुश्किल है। आतंकी लगातार फायरिंग कर रहा था जिससे घायल सूबेदार की मदद नहीं हो पा रही थी।
रणनीति बनाते हुए मेजर अनुराग ने मनोज कुमार नाम के हवलदार के साथ आतंकी पर अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी। इसी दौरान मेजर अनुराग की बाईं बाँह पर गोली लग गई। घायल होने के बावजूद मेजर अनुराग आतंकी पर गोली बरसाते रहे। आतंकी ने मेजर पर भी गोली चलानी चाही लेकिन उस पहले ही वो उन्होंने उसका काम तमाम कर दिया। आतंकी के मारे जाने तक गोली लगने के बावजूद मेजर मोर्चे पर डटे रहे। आख़िरकार उन्हें अस्पताल ले जाया गया। तब तक अधिक खून बह जाने की वजह से मेजर नौरियाल वीरगति को प्राप्त हो चुके थे।
लगा कि दुनिया ही खत्म, लेकिन आखिरकार फौजी की पत्नी थी
ऑपइंडिया ने मेजर अनुराग नौरियाल की वीरांगना पत्नी उमा से बात की। उमा ने हमें बताया कि जब उन्होंने अपने पति की वीरगति का पता चला तो एक बार लगा कि दुनिया यहीं खत्म हो गई। हालाँकि अपने पति द्वारा देश के लिए बलिदान होने की प्रेरणा ने उमा को ताकत दी और उन्होंने खुद को संभाला। उन्होंने अपनी बेटी और बेटे को माँ के साथ पिता का रोल भी निभाते हुए पढ़ाया और अच्छे संस्कार दिए। इसी दौरान उन्होंने खुद भी नौकरी की और आर्थिक संकटों का असर बच्चों पर नहीं पड़ने दिया।
कई चक्कर लगाने के बाद मिला पेट्रोल पम्प
बलिदानी मेजर की पत्नी ने बताया कि उनके पति की वीरगति के बाद सरकार से उन्हें पेट्रोल पम्प देने का आश्वासन मिला था। बीच में कई सरकारें आईं और गईं जिसमें वो लगभग 12 साल तक अलग-अलग लोगों के पास भटकती रहीं। साल 2003 में आखिरकार तमाम कशिशों के बाद वो सफल रहीं। इस दौरान वीरांगना ने कई बड़े लोगों की बदजुबानी भी सुनी। हालाँकि हमारे कई बार पूछने पर उन्होंने किसी का नाम नहीं बताया। उमा ने कहा, “वो सब इतिहास हो चुका है। अब उसे जाने दीजिए।”
सेना ने भी दिया पूरा साथ
उमा नौरियाल ने हमें आगे बताया कि उनके संघर्ष के दिनों में कई स्वजनों और शुभचिंतक साथ खड़े थे। इसी दौरान उन्होंने भारतीय सेना का भी तब से ले कर अब तक मिल रहे सहयोग के लिए आभार जताया। मेजर अनुराग द्वारा दिखाए गए अदम्य साहस की वजह से साल 1991 में मरणोपरांत उन्हें कीर्ति चक्र दिया गया था। यह सम्मान उनकी पत्नी उमा नौरियाल ने राष्ट्रपति भवन में लिया था। उमा नौरियाल ने हमें बताया कि पति के जाने का घाव तो जीवन भर रहेगा लेकिन सेना और लोगों से मिला साथ और प्रेम कहीं न कहीं उन जख्मों पर मरहम की तरह काम करता है।
पहले से बहुत बेहतर हैं अब के हालात
उमा नौरियाल के मुताबिक लगभग 20 साल पहले जब उन्होंने पेट्रोल पम्प चलाना शुरू किया था तब अनुभव न होने की वजह से बहुत दिक्क्तें आईं थीं। इसी दौरान उस इलाके में गुंडागर्दी भी अपने चरम पर हुआ करती थी। गुंडागर्दी के तौर पर हमें तेल भरा कर पैसे न देना और स्टाफ से मारपीट आदि करना शामिल हैं। बलिदानी की पत्नी ने हमें आगे बताया कि अब के हालत काफी बेहतर हैं और गुंडागर्दी भी न के बराबर हो गई है।
आतंकियों के गुणगान पर होती है तकलीफ
देश में एक खास गिरोह द्वारा आतंकियों और अपराधियों के महिमामंडन के चलन पर भी बलिदानी मेजर अनुराग की पत्नी ने दुःख जताया। उन्होंने कहा कि महज राजनीति आदि के नाम पर जब कोई भी किसी आतंकी, अपराधी या देशद्रोही का गुणगान करता है तो कहीं न कहीं उनके साथ ऐसे तमाम परिवारों को तकलीफ होते है जिनके स्वजनों ने देश की रक्षा में अपने प्राण गँवाएँ हैं। उमा नौरियाल ने उम्मीद जताई है कि कि बलिदानियों के परिजनों की पीड़िता को महसूस करते हुए आतंकियों के महिमांडन वाली सोच में जल्द ही बदलाव आएगा।
इनकम टैक्स डिपार्टमेंट ने असम प्रदेश कॉन्ग्रेस कमेटी के अध्यक्ष भूपेन कुमार बोरा को तलब किया है। इनकम टैक्स डिपार्टमेंट ने उन्हें 16 अगस्त तक गुवाहाटी के आयकर भवन में अपने अकाउंट्स बुक यानी खाता बही के साथ पहुँचने के लिए कहा है। इस बारे में इनकम टैक्ट डिपार्टमेंट ने प्रेस रिलीज भी जारी किया है, जिसमें बताया गया है कि आयकर अधिनियम 1961 के तहत भूपेन कुमार बोरा की उपस्थिति अनिवार्य है।
इनकम टैक्स की ओर से कहा गया, “आपको साक्ष्य देने या व्यक्तिगत रूप से या अधिकृत प्रतिनिधि के माध्यम से नीचे निर्दिष्ट खाता बही या अन्य दस्तावेज प्रस्तुत करने के लिए 16 अगस्त, 2024 को आयकर भवन, गुवाहाटी में उपस्थित होना आवश्यक है। आप को तब तक रुकना है, जबतक जाने के लिए अनुमति नहीं दी जाती।” इसके साथ ही कहा गया है कि अगर आप ऐसा करने में विफल रहे हैं, तो आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 272 (1) (सी) के तहत हर बार के लिए आप पर 10 हजार रुपए का जुर्माना लगाया जा सकता है।
पिछले तीन चुनावों में मिली बुरी तरह हार
भूपेन बोरा 2 बार कॉन्ग्रेस के विधायक रहे हैं। वो साल 2006-2016 तक विधायक थे, तो तरुन गोगोई के मुख्यमंत्री रहते हुए वो उनके सलाहकार भी थे। भूपेन बोरा कॉन्ग्रेस के राष्ट्रीय सचिव भी रह चुके हैं, तो साल 2021 से असम कॉन्ग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष हैं। उन्होंने अपनी राजनीति की शुरुआत एनएसयूआई से की थी, फिर युवा कॉन्ग्रेस से होकर कॉन्ग्रेस में आए और विधायक बने थे।
भूपेन बोरा को पिछले 2 चुनावों में बीजेपी के प्रत्याशियों से हार झेलनी पड़ी थी। साल 2016 में उन्हें बीजेपी के देबानंदा हजारिया ने 26 हजार से ज्यादा वोटों से हराया था, तो 2021 में उन्हें बीजेपी के अमियो भुवन ने 10 हजार से ज्यादा वोटों से हराया। वो साल 2014 में लोकसभा चुनाव भी लड़े थे, लेकिन बीजेपी के राम प्रसाद सरमा ने उन्हें 86 हजार से अधिक वोटों से पराजित कर दिया था।
कोलकाता के आरजी कर मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल में 31 वर्षीय डॉक्टर के साथ बलात्कार और हत्या की घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया है। शुरू में कॉलेज प्रशासन कहा कि यह आत्महत्या का मामला है। हालाँकि, जाँच में कहानी अलग निकली। यह पहली बार नहीं है कि इस कॉलेज एंड हॉस्पिटल में इस तरह की घटना हुई है। लगभग 23 साल पहले ऐसा ही एक मामला सामने आया था।
मामला 25 अगस्त 2001 का है। आरजी कर मेडिकल कॉलेज में चौथे वर्ष के छात्र सौमित्र बिस्वास का शव हॉस्टल के उसके कमरे में लटका हुआ मिला था। तब अधिकारियों ने दावा किया था कि यह आत्महत्या का मामला है। मेडिकल कॉलेज प्रशासन द्वारा किया गया यह ऐसा ही दावा था, जो महिला डॉक्टर के रेप-मर्डर मामले में शुरू में उसने किया था।
हालाँकि, सौमित्र के परिजन इसे आत्महत्या मानने को तैयार नहीं थे। मेडिकल कॉलेज प्रशासन के दावे के खिलाफ सौमित्र बिस्वास के परिजन कलकत्ता उच्च न्यायालय गए और जाँच की माँग की। कलकत्ता हाई कोर्ट ने उनकी माँग को स्वीकार करते हुए इस मामले की सीआईडी से जाँच कराने का आदेश दे दिया। इस मामले में मेडिकल कॉलेज की एक छात्रा औरोमिता दास को गिरफ्तार किया गया था।
हालाँकि, पश्चिम बंगाल पुलिस की सीआईडी इस मामले में ज्यादा प्रगति नहीं कर सकी और यह मामला अभी भी अनसुलझा है। पुलिस ने सीपीएम की छात्र शाखा एसएफआई के कई सदस्यों से पूछताछ की, लेकिन कोई सुराग नहीं मिल सका। दरअसल, आरजी कर मेडिकल कॉलेज एंड हॉ़स्पिटल कोलकाता के सबसे अच्छे मेडिकल कॉलेज और हॉस्पिटल में से एक माना जाता है।
सौमित्र की माँ ने आरोप लगाया था कि मेडिकल कॉलेज में उनके बेटे के दोस्त उसकी मौत के लिए जिम्मेदार हैं, क्योंकि उसने कथित तौर पर परिसर में अश्लील गतिविधियों को देखा था। उल्लेखनीय है कि मेडिकल कॉलेज के कई छात्रों ने सौमित्र बिस्वास की मौत के लिए आरजी कर मेडिकल कॉलेज में कथित पोर्न रिंग को जिम्मेदार ठहराया था।
मीडिया से बात करते हुए उस समय आरजी कर मेडिकल कॉलेज के छात्रों ने सौमित्र बिस्वास की ‘हत्या’ के लिए परिसर में पोर्नोग्राफी एवं वेश्यावृत्ति नेटवर्क और महिलाओं के साथ संदिग्ध व्यवहार का आरोप लगाया था। छात्रों ने दावा किया था कि सौमित्र की ‘हत्या’ की गई थी और इसके मास्टरमाइंड राज्य के डॉक्टरों का गिरोह था।
छात्रों का दावा था कि सौमित्र की हत्या को छात्रावास के भीतर अंजाम दिया गया। सौमित्र मेडिकल कॉलेज के बगल में स्थित ललित मेमोरियल हॉस्टल के अपने कमरे में छत से लटका हुआ पाया गया था। उसके सहयोगियों ने दावा किया था कि सौमित्र ने कई हॉस्टल के कमरों में अश्लील तस्वीरें और वीडियो शूट करने के घिनौने काम को उजागर करने की कीमत चुकाई।
छात्रावास के ही उसके एक साथी ने कहा था, “सौमित्र हम सभी की तरह इसके बारे में जानता था, लेकिन न तो उसमें और न ही हम में से किसी में इसे चुनौती देने की हिम्मत थी। लेकिन, सौमित्र के एक करीबी दोस्त एवं उसके बैचमेट को इस गिरोह द्वारा पीड़ित किया गया और उसका चेहरा किसी महिला के नंगे शरीर के साथ जोड़ दिया गया। इसके बाद सौमित्र खुद को रोक नहीं सका।”
उनके अनुसार, शूटिंग मुख्य रूप से सप्ताह के अंत में सेक्स वर्करों को हॉस्टल में बुलाकर की जाती थी। जब कोई सेक्स वर्कर नहीं मिलती थी तो वे पढ़ाई के लिए अस्पताल में लाए गए शवों का इस्तेमाल करते थे। फिर वे शवों की नग्न तस्वीरों पर मॉडल के चेहरे लगाते थे। उनका कहना था कि यह एक बड़ा रैकेट है, जिसे एक राजनेता का समर्थन मिला था।
उसी कॉलेज के फोर्थ ईयर के एक छात्र ने बताया था कि अस्पताल के क्लासरूम, सेमिनार रूम और हॉस्टल के कमरों में पोर्न वीडियो की शूटिंग की गई। उन्होंने कहा कि अधिकारियों को सब पता था, लेकिन उन्होंने कुछ नहीं किया। इतना ही नहीं, बदमाशों ने सेक्स वर्करों के साथ बनाए गए वीडियो पर मेडिकल कॉलेज की छात्राओं के चेहरे की तस्वीरें लगाई थीं।
उस छात्र ने दावा किया था कि जब सौमित्र की गर्लफ्रेंड की तस्वीर का भी इस तरह से इस्तेमाल किया गया तो उसने गिरोह का विरोध किया था और आखिरकार उसकी मौत हो गई। सौमित्र ने अपनी बैचमेट औरोमिता दास को कुछ पुरुषों द्वारा की गई शरारत के बारे में बताया था। जन्मदिन पर ली गई उसकी तस्वीरों में से उसका चेहरा इस्तेमाल करके नग्न शवों पर लगा दिया गया था।
इसके बाद इन तस्वीरों को साझा शेयर कर दिया गया था। बाद में औरोमिता दास को पता चला कि यह सब उस व्यक्ति द्वारा किया गया था, जिसके प्रणय निवेदन को वह पहले ठुकरा चुकी थी। छात्र ने यह भी दावा किया था कि ऐसा करने वाले लड़कों से मिलकर सौमित्र ने उन्हें डाँटा था और इसके बारे में लोगों को बताने की चेतावनी दी थी। इससे वह गिरोह उसकी मौत का कारण बन गया।
इन आरोपों को इस तथ्य से बल मिला कि छात्रावास के एक कमरे में ट्राइपॉड और रिफ्लेक्टर पाए गए थे। इनका इस्तेमाल पोर्न वीडियो शूट करने के लिए इस्तेमाल किया गया था। छात्रों ने पुष्टि की थी कि उस कमरे का उपयोग अक्सर शूटिंग के लिए किया जाता था। हालाँकि, जाँच के दौरान कमरे की तलाशी भी नहीं ली गई।
सोचिए कि एक महिला के साथ क्रूरतापूर्वक बलात्कार किया गया और उसकी हत्या कर दी गई, लेकिन लोगों की सुरक्षा के लिए जिम्मेदार राज्य सरकार पीड़िता को न्याय दिलाने के लिए ‘विरोध प्रदर्शन’ पर उतर आती है। सुनने में ये बिल्कुल अजीब लग रहा है न? लेकिन पश्चिम बंगाल में यही हो रहा है, जहाँ मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कोलकाता के आरजी कर मेडिकल कॉलेज और अस्पताल में 32 वर्षीय प्रशिक्षु डॉक्टर के साथ क्रूर बलात्कार और हत्या के अपराधियों को सजा देने की माँग करते हुए विरोध प्रदर्शन की घोषणा की है। इस मामले में एक पुलिस सहायक स्वयंसेवी संजय रॉय को गिरफ्तार किया गया है, जिसके कथित तौर पर अपना अपराध कबूल कर लिया है।
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने घोषणा की कि 17 अगस्त को उनकी पार्टी अपराधी को सजा दिलाने की माँग को लेकर सभी प्रखंडों में विरोध मार्च निकालेगी। फिर 18 अगस्त को सभी प्रखंडों में प्रदर्शन होगा और 19 अगस्त को दोषियों को फाँसी की सजा दिलाने की माँग को लेकर कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा।
मुख्य आरोपित संजय रॉय गिरफ्तार, मृतक पीड़िता के लिए न्याय की माँग को लेकर डॉक्टरों का प्रदर्शन (फोटो साभार : टीवी9)
ममता बनर्जी ने सीबीआई को दी ‘समय सीमा’
ममता बनर्जी चाहती हैं कि अपराधी को फाँसी की सज़ा दी जाए और उन्होंने ‘माँग’ की है कि सीबीआई रविवार (18 अगस्त) तक यह काम पूरा कर ले। पीड़ित को न्याय दिलाने की ज़िम्मेदारी केंद्रीय जाँच एजेंसी पर डालने का ये एक मौजूदा मुख्यमंत्री का ख़तरनाक दुस्साहस है, जो ये स्पष्ट करता है कि तृणमूल कॉन्ग्रेस (टीएमसी) केंद्र पर दोष मढ़ने और अपनी ज़िम्मेदारियों से पल्ला झाड़ने की बेताबी से कोशिश कर रही है। टीएमसी का राजनीतिक खेल इतनी बेशर्मी भरा है कि एक तरफ़ राज्य सरकार सीबीआई को ‘समय सीमा’ दे रही है और दूसरी तरफ़ हास्यास्पद समय सीमा समाप्त होने से ठीक एक दिन पहले बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन की घोषणा कर रही है।
पुलिस के सामने ट्रकों में भर कर आए गुंडों ने की तोड़फोड़
इस बीच, प्रदर्शनकारी डॉक्टरों पर गुंडों द्वारा हमला किया जा रहा है, जिन्होंने 14 अगस्त को आरजी कर मेडिकल कॉलेज और अस्पताल परिसर में भी तोड़फोड़ की। 50 से अधिक लोगों की भीड़ ने अस्पताल में घुसकर डॉक्टरों पर हमला किया और यहाँ तक कि उस इमारत में घुसने की कोशिश की, जहाँ जूनियर डॉक्टर के साथ बलात्कार किया गया और उसकी हत्या कर दी गई। इस दौरान पुलिस मूकदर्शक बनी रही। यह भी आरोप है कि सत्तारूढ़ टीएमसी सरकार ने हमलों की साजिश रची।
ऐसा लगता है कि न्याय के लिए ‘समय सीमा’ राज्य सरकार ने बहुत सोच-विचार के बाद तय की है क्योंकि घटनाक्रम से पता चलता है कि जब तक सीबीआई मामले की जाँच करेगी, तब तक अधिकांश सबूत नष्ट हो चुके होंगे और प्रदर्शनकारियों को चुप करा दिया जाएगा। माहौल बनाने के लिए सीएम बनर्जी अपनी खुद की अक्षमता का दोष केंद्र पर डाल देंगी और कहेंगी कि सीबीआई मृतक पीड़िता को न्याय दिलाने में विफल रही।
ममता बनर्जी चाहती हैं कि सीबीआई रविवार तक अपराधी को फाँसी पर लटका दे, लेकिन उनकी सरकार पर इस मामले में शामिल लोगों को बचाने का आरोप है। 9 अगस्त को आरजी कर मेडिकल कॉलेज के सेमिनार हॉल में एक पीजी ट्रेनी डॉक्टर का अर्धनग्न शव मिलने के बाद अस्पताल प्रबंधन ने उसके परिवार को सूचित किया कि उसने आत्महत्या कर ली है।
सीबीआई का काम जाँच करना, सजा देने का काम अदालत का
दरअसल, कलकत्ता हाई कोर्ट आरजी कर कॉलेज के प्रिंसिपल डॉ. संदीप घोष को बचाने के लिए राज्य सरकार को फटकार लगाई और कहा कि इसे आत्महत्या बताकर इस जघन्य अपराध को छिपाने की कोशिश की जा रही है। यह ध्यान देने योग्य है कि घोष ने विरोध प्रदर्शनों के बीच इस्तीफा दे दिया और उसी दिन उन्हें राज्य सरकार के कलकत्ता नेशनल मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल (सीएनएमसीएच) का प्रिंसिपल नियुक्त कर दिया गया। तथ्य यह है कि कलकत्ता हाई कोर्ट ने आरजी कर मेडिकल बलात्कार और हत्या मामले को सीबीआई को सौंप दिया, जब पीड़िता के माता-पिता ने चिंता जताई कि कोलकाता पुलिस सही से जाँच नहीं कर रही। ये बात साफ है कि स्थानीय पुलिस निष्पक्षता से काम नहीं कर रही।
ऑपइंडिया ने बताया कि मेडिकल कॉलेज प्रशासन ने किस तरह से चेस्ट मेडिसिन डिपार्टमेंट की दीवारों को ढहा दिया, जहाँ लड़की के साथ बलात्कार हुआ और उसकी हत्या कर दी गई। भाजपा ने आरोप लगाया है कि राज्य सरकार दीवारों को तोड़कर मामले में सबूतों से छेड़छाड़ करने की कोशिश कर रही है। इन घटनाओं के मद्देनजर, ममता बनर्जी ने सीबीआई पर ‘बोझ’ डालकर न्याय सुनिश्चित करने में अपनी विफलता के लिए अपनी सरकार और राज्य पुलिस को आलोचना से बचाने का चतुराई से प्रयास किया।
आम आदमी पार्टी की राह पर ममता बनर्जी
ममता बनर्जी के विरोध प्रदर्शन की घोषणा से सवाल उठता है कि वह किसके खिलाफ विरोध कर रही हैं, कोलकाता पुलिस के खिलाफ, अपराधी के खिलाफ या खुद के खिलाफ? क्योंकि वह मुख्यमंत्री हैं। इसका एक और पहलू है: कहानी को तोड़-मरोड़ कर पेश करना। इस समय, इस भयावह घटना ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है, मीडिया दिखा रहा है कि कैसे पश्चिम बंगाल और देश के दूसरे हिस्सों में डॉक्टर शांतिपूर्वक विरोध कर रहे हैं और कैसे पुलिस की मौजूदगी में बंगाल में उन पर हमला किया गया। हालाँकि, राज्य की मुख्यमंत्री खुद ‘न्याय’ की माँग करते हुए ‘विरोध’ करेंगी, जबकि लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करना उनका काम है, लेकिन वो खुद प्रदर्शन कर रही हैं और न्याय माँगने वालों में शामिल हो गई हैं। ताकि ये भूमिका बनाई जा सके कि ममता बनर्जी पीड़िता के साथ खड़ी हुई हैं, जबकि है इसका एकदम उलटा।
मुख्यमंत्री के तौर पर बनर्जी पश्चिम बंगाल में कानून और व्यवस्था को बनाए रखने के लिए सीधे तौर पर जिम्मेदार हैं। उनकी स्थिति के अनुसार राज्य के निवासियों की सुरक्षा और संरक्षा को बनाए रखने के लिए त्वरित और निष्पक्ष कार्रवाई की आवश्यकता है, न कि विरोध प्रदर्शन आयोजित करने या उनमें शामिल होने की, जैसे कि वह राज्य की सरकार के लिए बाहरी व्यक्ति या विपक्षी नेता हैं।
एक मौजूदा मुख्यमंत्री द्वारा उसी व्यवस्था के खिलाफ विरोध प्रदर्शन करना, जिसे वह नियंत्रित करती हैं, राज्य के शासन की जिम्मेदारी लेने और ऐसे भयानक अपराधों पर तुरंत और निर्णायक रूप से प्रतिक्रिया देने में विफलता को दर्शाता है। आगे बढ़कर नेतृत्व करने और यह सुनिश्चित करने के बजाय कि अपराधियों को तुरंत न्याय के कटघरे में लाया जाए। ऐसा न कर पाने की वजह से ही कलकत्ता हाई कोर्ट ने इस मामले की जाँच सीबीआई को सौंपी है, लेकिन ममता बनर्जी इस पूरे मामले को अब अपने राजनीतिक लाभ के फायदे के लिए इस्तेमाल करने पर उतर आई हैं।
संयोग से, पश्चिम बंगाल में टीएमसी सरकार का ये नाटक नई दिल्ली में आम आदमी पार्टी (आप) सरकार की याद दिलाता है। आप पारंपरिक रूप से “सामान्य दिनों में सरकार की तरह व्यवहार करें, संकट में विपक्ष की तरह व्यवहार करें” के मंत्र का पालन करती रही है। चाहे वह राष्ट्रीय राजधानी में पानी के संकट का सामना करने पर जल मंत्री आतिशी द्वारा किया गया ‘पानी सत्याग्रह’ और आमरण अनशन का नाटक हो और बेशर्मी से इसके लिए पड़ोसी राज्यों को दोषी ठहराना हो, आप ने केंद्र और पड़ोसी हरियाणा और हिमाचल प्रदेश को खलनायक बनाकर अपनी खुद की विफलताओं के लिए जवाबदेही से सफलतापूर्वक पल्ला झाड़ लिया, साथ ही मीडिया का ध्यान पानी के टैंकरों के पीछे भाग रहे दिल्ली के लोगों से हटाकर आतिशी की कथित तौर पर ‘अनशन’ के कारण बिगड़ती तबीयत और उन्हें अस्पताल ले जाने की ओर मोड़ दिया।
ऐसा लगता है कि बनर्जी विरोध प्रदर्शन आयोजित करके अपने शासन में प्रशासनिक विफलताओं से खुद को दूर कर रही हैं, जिसका उद्देश्य खुद को एक सहानुभूतिपूर्ण नेता के रूप में पुनः ब्रांड करना है जो पीड़ित के साथ खड़ी है। हालाँकि, यह रणनीति भयावह अपराध के प्रति वास्तविक प्रतिक्रिया के बजाय केवल एक सतही इशारा है। जनता के आक्रोश के सामने ऐसा लगता है कि वह अपनी छवि को साफ करने का प्रयास कर रही हैं। ये सीएम बनर्जी की खुद को खबरों में बनाए रखने की खोखली चाल हैं, जबकि उनकी सरकार की विफलता पूरी दुनिया देख रही है।
ममता बनर्जी किस तरह से पीड़ित को न्याय दिलाने की जगह राजनीति साध रही है, इसे इस बात से समझिए कि अगर सीबीआई रविवार तक अपनी जाँच पूरी भी कर लेती है, तो ममता बनर्जी इस बात का ढिंढोरा पीटेंगी कि उन्होंने पीड़ित को न्याय दिलाया। और अगर ऐसा नहीं हो पाता है, तो वो पूरी जिम्मेदारी सीबीआई और केंद्र सरकार पर डालने की कोशिश करेंगी। वो ऐसा माहौल बनाएँगी कि केंद्र सरकार महिला विरोधी और असंवेदनशील है। उन्होंने सीबीआई को समयसीमा देकर अपने प्रति लोगों का समर्थन जुटाने की रणनीति बनाई है। जबकि ये बात सभी जानते हैं कि सीबीआई का काम सिर्फ जाँच करना है और तथ्यों को अदालत के सामने रखना है न कि किसी को फाँसी पर लटकाने का फैसला देना।
ये कैसी विडम्बना है कि पीड़ित परिवार को स्थानीय अधिकारियों के अधीन मामले की जाँच प्रभावित होने की चिंता की वजह से कोर्ट जाना पड़ा और सीबीआई जाँच की माँग करनी पड़ी, जबकि उस राज्य की नेता ने सीबीआई को रविवार तक का समय देने का दुस्साहस कर दिया है।
खुद फेल होना और हर बात के लिए केंद्र को दोषी ठहराना ममता की यूएसपी
साल 2019 में ममता बनर्जी ने चक्रवात फानी के भारत के पूर्वी तट पर पहुँचने के बाद ध्यान भटकाने के लिए केंद्र को दोषी ठहराने की कोशिश की थी, जिसमें ओडिशा और पश्चिम बंगाल के तटीय क्षेत्र गंभीर रूप से प्रभावित हुए थे। बनर्जी ने दावा किया था कि पीएम मोदी ने चक्रवात फानी के बाद ओडिशा के सीएम नवीन पटनायक से बात की, लेकिन उन्होंने उन्हें फोन करने की जहमत नहीं उठाई। ममता बनर्जी और उनकी पार्टी ने दावा किया था कि चक्रवात के राज्य के ‘संघीय ढांचे पर हमला’ होने के बाद पीएम मोदी ने सीएम से नहीं बल्कि पश्चिम बंगाल के राज्यपाल से बात की थी। हालाँकि, बाद में पीएमओ ने स्पष्ट किया कि पीएम के स्टाफ ने सीएम ममता को पीएम से बात करने के लिए दो बार फोन करने का प्रयास किया, लेकिन सफलता नहीं मिली। दोनों मौकों पर पीएम के स्टाफ को बताया गया कि वह कॉल बैक करेंगी, जो कभी नहीं हुआ।
डॉक्टरों का विरोध प्रदर्शन 2019 में हुए इसी तरह के आंदोलन की याद दिलाता है, जब एनआरएस मेडिकल कॉलेज और अस्पताल के दो डॉक्टरों पर एक मरीज मोहम्मद सईद के रिश्तेदारों ने हमला किया था, जिसकी जून 2019 में इलाज के दौरान मौत हो गई थी। डॉक्टरों की शिकायतों को दूर करने के बजाय, ममता बनर्जी ने उन पर ‘बाहरी‘ होने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा, ‘वे बाहरी हैं। सरकार किसी भी तरह से उनका समर्थन नहीं करेगी। मैं हड़ताल पर गए डॉक्टरों की निंदा करती हूँ। पुलिसकर्मी ड्यूटी के दौरान मरते हैं लेकिन पुलिस हड़ताल पर नहीं जाती है।’
उस समय, मुख्यमंत्री बनर्जी ने प्रदर्शनकारी चिकित्सकों को काम पर लौटने के लिए सख्त ‘समय सीमा’ दी थी, हालाँकि बाद में उन्हें अपना रुख नरम करना पड़ा और अस्पतालों में सुरक्षा बढ़ाने का आश्वासन देना पड़ा।
केंद्र पर दोष मढ़ने के अलावा, सीएम बनर्जी कानून और व्यवस्था को बनाए रखने में अपनी प्रशासन की विफलता को छिपाने के लिए पीड़ितों को उनकी स्थिति के लिए दोषी ठहराने में भी एक्सपर्ट हैं। उदाहरण के लिए, उन्होंने पहले यह आरोप लगाया था कि जब हिंदू ‘मुस्लिम क्षेत्रों’ से रामनवमी जुलूस निकालते हैं तो हिंसा होती है और उन्होंने इस्लामिक कट्टरपंथियों को उनके धर्म और रमज़ान का हवाला देकर क्लीन चिट देने का भी प्रयास किया।
रेप के मामलों को खारिज करने में माहिर हैं ममता बनर्जी
दुख की बात है कि टीएमसी शासित पश्चिम बंगाल में महिलाओं के खिलाफ अपराध असामान्य नहीं हैं। हाल ही में देखा गया कि कैसे तजामुल हक ने अपनी ‘शरिया अदालत‘ चलाई और एक महिला को तालिबानी अंदाज में जमीन पर पटक कर पीटा, जबकि दूसरी महिला को बांधकर सड़कों पर घुमाया। टीएमसी विधायक हमीदुल रहमान ने पश्चिम बंगाल को ‘मुस्लिम राष्ट्र’ बताते हुए इस कृत्य को उचित ठहराया। देश ने देखा कि कैसे ईडी अधिकारियों पर हमला करने वाले शाहजहाँ शेख और उसके गुर्गों ने संदेशखली में आदिवासी महिलाओं का यौन उत्पीड़न किया और सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को उसे बचाने के लिए फटकार लगाई।
ऐसी कई घटनाएँ हुई हैं जब सीएम बनर्जी ने खुद एक महिला होने के बावजूद महिला पीड़ितों के प्रति अपनी अपमानजनक असंवेदनशीलता दिखाई है। पिछले साल अप्रैल में, उन्होंने दावा किया कि कालीगंज में कथित ‘बलात्कार और हत्या का मामला एक ‘प्रेम प्रसंग’ था जो गलत हो गया। बताया गया कि उत्तर दिनाजपुर जिले के कालियागंज इलाके में एक दलित महिला नहर में तैरती हुई पाई गई। बताया गया कि पीड़िता की हत्या से पहले उसके साथ बलात्कार किया गया था।
2022 में, उन्होंने 14 वर्षीय लड़की के साथ क्रूर बलात्कार और हत्या के आरोपों को ‘प्रेम संबंध’ के रूप में गलत साबित करने की कोशिश की। इसी तरह, 2012 में, ममता बनर्जी ने कोलकाता के पार्क स्ट्रीट में एक एंग्लो-इंडियन महिला सुजेट जॉर्डन के साथ बलात्कार के आरोपितों को दोषमुक्त कर दिया था। बनर्जी ने कहा कि यह घटना ‘शाजानो घोटोना’ (मनगढ़ंत घटना) थी, जिसे कथित तौर पर ‘सरकार को बदनाम करने के लिए डिज़ाइन किया गया था।’ 2013 में बनर्जी ने राज्य में बढ़ते बलात्कार के मामलों को जनसंख्या में वृद्धि से जोड़ा था।
आरजी कर मेडिकल कॉलेज और अस्पताल मामले की बात करें तो मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को राजनीतिक लाभ के लिए इस तरह के गंभीर मुद्दे पर दोष मढ़ने और उसका राजनीतिकरण करने के बजाय सुरक्षा और कानून व्यवस्था सुनिश्चित करने को प्राथमिकता देनी चाहिए। इस देश के लोगों को याद रहेगा कि कैसे एक मौजूदा मुख्यमंत्री ने पीड़ितों के लिए पूरी जाँच और न्याय सुनिश्चित करने के बजाय प्रशासनिक कमियों से ध्यान हटाने के लिए विरोध प्रदर्शन आयोजित किए थे।
यह लेख मूल रूप से अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित है। मूल लेख पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।
अल्लामा इकबाल के नाम से जाना जाने वाला मोहम्मद इकबाल, जिसने कभी ‘सारे जहाँ से अच्छा हिंदोस्ताँ हमारा’ लिखा था, वो देश के विभाजन के लिए सबसे बड़ा जिम्मेदार था। वो न सिर्फ मुस्लिम लीग, बल्कि जिन्ना के लिए भी अगुवा की तरह था। मोहम्मद इकबाल ने ही मजहबी आधार पर मुस्लिमों के लिए सबसे पहले अलग देश की माँग की थी, लेकिन उसे अब तक देश में काफी इज्जत मिलती रही है। लेकिन अब दिल्ली विश्वविद्यालय ने तय किया है कि मोहम्मद इकबाल से जुड़े चैप्टर्स को डीयू के सिलेबल से हटा दिया जाएगा।
डीयू के कुलपति योगेश सिंह ने कहा, “इकबाल भारत विभाजन की शुरुआत करने वालों में से थे, और पाकिस्तान के संस्थापक माने जाने वाले मोहम्मद अली जिन्ना के सलाहकार भी थे। उन्होंने 1904 में लाहौर के गवर्नमेंट कॉलेज में पढ़ाई करते हुए ‘सारे जहाँ से अच्छा, हिंदोस्ताँ हमारा’ लिखा, उन्होंने ताराना-ए-हिंद भी लिखा, लेकिन खुद कभी इसे स्वीकार नहीं किया।” इकबाल उर्दू और फारसी के शायर थे, जिन्होंने हिंदुस्तान को छोड़कर पाकिस्तान को चुना और उसके निर्माण की बैचारिक नींव डाली।
बुधवार (14 अगस्त 2024) को विभाजन विभीषिका दिवस के अवसर पर आयोजित एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए डीयू के कुलपति योगेश सिंह ने कहा, “इकबाल के बारे में सभी को अपना विचार रखने का अधिकार है, लेकिन डीयू देश की एकता और अखंडता के साथ समझौता नहीं करेगा। डीयू में महात्मा गाँधी, भीमराम आंबेडकर, विनायक दामोदर सावरकर के बारे में पढ़ाया जाएगा, लेकिन देश के विभाजन के लिए जिम्मेदार इकबाल के बारे में अब नहीं पढ़ाया जाएगा।”
उन्होंने कहा, “शिक्षा और शोध के साथ-साथ विश्वविद्यालयों को ऐसे विचार भी तैयार करना चाहिए, जो राष्ट्र पर कभी संकट आने पर देश के लिए एकजुट खड़े हो सकें।” उन्होंने यह भी कहा कि कोई नहीं चाहता था कि भारत का बंटवारा हो, लेकिन किसी ने भी इसके खिलाफ विरोध नहीं किया। इस कार्यक्रम में केंद्रीय कानून और न्याय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल भी मौजूद रहे।
बता दें कि इकबाल ने अपनी रचनाओं में इस्लामिक कट्टरपंथ को बढ़ावा दिया है। तराना ए मिल्ली में उसने लिखा है कि “काबा-पहला घर, जिसे बुतपूजकों से मुक्त करा लिया है। हम इसके संरक्षक हैं और यह हमारा रक्षक है।”
इकबाल के लाहौर ने निकल कर ब्रिटेन जाने के बीच साल 1904-1910 के बीच वैचारिक परिवर्तन आए थे। वो इंग्लैंड में जाकर कट्टरपंथी बन गया था और पाकिस्तान के निर्माण की वैचारिक बीज उसी के दिमाग की उपज थी। उसने 29 दिसंबर 1930 को मुस्लिम लीग के अधिवेशन में अध्यक्षीय भाषण दिया था और साफ कहा था कि वो मुस्लिमों के लिए अलग देश की माँग करता है। उसने कहा था कि हिंदुस्तान में इस्लाम की रक्षा नहीं हो सकती और न ही मुस्लिमों की, ऐसे में अलग देश ही एकमात्र उपाय है।
बता दें कि साल 2023 में ही डीयू की समिति ने एक प्रस्ताव पारित कर बीए-सेकंड ईयर के सिलेबल में शामिल रहे इकबाल पर आधारित सामग्री को हटाने की सिफारिश की थी। दिल्ली यूनिवर्सिटी एग्जीक्यूटिव काउंसिल के अप्रूवल के बाद इक़बाल को सिलेबस से हटाने की प्रक्रिया चल रही थी, जिसे बाद में हटा दिया गया।
पश्चिम बंगाल की सत्ताधारी तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) नेता शांतनु सेन को कोलकाता स्थित आरजी कर मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल के खिलाफ बोलने पर पार्टी के प्रवक्ता पद से हटाया दिया गया है। उन्होंने एक दिन पहले ही कहा था कि यह मेडिकल कॉलेज असामाजिक गतिविधि का अड्डा हो गया है। इसी मेडिकल कॉलेज में महिला डॉक्टर के साथ रेप करके हत्या कर दी गई है।
पूर्व राज्यसभा सांसद शांतनु सेन मृतक डॉक्टर के लिए न्याय माँग रहे प्रदर्शनकारी डॉक्टरों के साथ खड़े थे। कहा जा रहा है कि शांतनु सेन द्वारा मेडिकल कॉलेज पर की गई टिप्पणी से तृणमूल कॉन्ग्रेस का आलाकमान नाराज हो गया है। इसके कारण उन्हें प्रवक्ता पद से हटा दिया गया। शांतनु सेन और उनकी पत्नी काकाली दोनों ही इस मेडिकल कॉलेज के पूर्व छात्र हैं।
इतना ही नहीं, शांतनु सेन की बेटी भी इसी कॉलेज की छात्रा है। शांतनु सेन ने दावा किया था कि उनकी बेटी को भी भेदभाव का सामना करना पड़ा है। उनकी बेटी अगले छह माह में मेडिसिन में स्नातक का कोर्स पूरा कर लेगी। शांतनु सेन की पत्नी काकाली ने कहा था, “मुझे यह अच्छा नहीं लगता कि मेरी बेटी यहाँ रात की शिफ्ट में काम करेगी।”
उन्होंने कहा था, “कॉलेज में एक रैकेट चलता है और अगर आप उसमें शामिल नहीं देते हैं तो आपको निशाना बनाया जाता है। अगर आप साथ देते हैं तो आप जो चाहें कर सकते हैं। मैं किसी विशेष प्रोफेसर का नाम नहीं लेना चाहता, लेकिन अगर आप उनकी नजर में अच्छे हैं तो आप परीक्षा में नकल भी कर सकते हैं। अगर आप निशाने पर हैं तो आप चाहे कितने भी अच्छे हों, आपकी डिग्री रद्द कर दी जाएगी।”
टीएमसी नेता डॉक्टर शांतनु सेन ने आगे बताया, “सरस्वती पूजा से एक दिन पहले मेरी बेटी उससे संबंधित समारोह के लिए कॉलेज जा रही थी। मेरी बेटी इस रैकेट में शामिल न हो जाए, इसलिए उसे कॉलेज में भाग लेने की अनुमति नहीं दी गई। कोई भी उससे बात नहीं करता और न ही उसके साथ पढ़ता है।”
शांतनु सेन ने आरजी कर मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल के पूर्व प्रिंसिपल संदीप घोष की खुलेआम आलोचना की थी। घोष को सत्तारूढ़ टीएमसी सरकार का करीबी माना जाता है। उन्होंने कॉलेज की बदहाली के लिए घोष को जिम्मेदार ठहराते हुए कहा था, “पिछले तीन सालों से प्रिंसिपल की वजह से आरजी कर मेडिकल कॉलेज और अस्पताल की हालत खराब है।”
अब यह बात सामने आई है कि टीएमसी नेता को पार्टी प्रवक्ता के पद से हटा दिया गया है। हालाँकि, TMC बंगाल के उपाध्यक्ष जयप्रकाश मजूमदार ने अस्पताल प्रशासन पर टिप्पणी के बाद उन्हें हटाए जाने के आरोपों को खारिज किया है। उन्होंने कहा कि सेन को टीएमसी प्रवक्ता के पद से हटाने का फैसला आरजी कर अस्पताल की घटना से पहले ही लिया गया था।
कोलकाता के आरजी कर मेडिकल कॉलेज और अस्पताल में 8-9 अगस्त की रात में महिला डॉक्टर की रेप के बाद हत्या कर दी गई थी। इस मामले में विरोध प्रदर्शन जारी है। इस बीच, 14 अगस्त की रात लेफ्ट दलों ने विरोध प्रदर्शन का आह्वान किया था, लेकिन इस प्रदर्शन में शामिल लोगों ने आरजी कर अस्पताल में ही जमकर तोड़फोड़ की।
प्रदर्शनकारियों में से निकली भीड़ ने घटनास्थल यानी सेमीनार हाल में तोड़फोड़ की कोशिश की, लेकिन जब वो तीसरी मंजिल पर पहुँचने में सफल नहीं हुए, तो उन्होंने दूसरे फ्लोर को बर्बाद कर डाला। भीड़ ने सबूत मिटाने की भी कोशिश की।
इस घटनाक्रम के दौरान जो पुलिस प्रदर्शनकारियों को रोकने और स्टाफ की सुरक्षा की जिम्मेदारी संभाले हुई थी, उसके जवान भाग खड़े हुए और अस्पताल के अंदर ही घुसकर अपनी जान बचाने की कोशिश करने लगे। उन्होंने स्टाफ नर्स तक को यहाँ तक कह दिया कि “आपकी सुरक्षा की जिम्मेदारी आपके खुद की है।” इसके साथ ही पुलिस वाले टॉयलेट से लेकर बाथरूम तक में छिपकर जान बचाई। बताया जा रहा है कि प्रदर्शनकारी भीड़ रात करीब 11.20 बजे हिंसक हो गई और बैरिकेड्ट तोड़कर अंदर घुस गई।
आजतक की रिपोर्ट के मुताबिक, एक नर्स ने बताया, “वे उस सेमिनार रूम (जहां डॉक्टर से रेप-मर्डर हुआ था) को तोड़ देना चाहते थे, उनका मुख्य लक्ष्य यही था। उन्होंने तीसरी मंजिल में घुसने की कोशिश की लेकिन वे नहीं जा सके। उन्होंने दूसरी मंजिल को तहस-नहस कर दिया। इमरजेंसी वार्ड के अंदर भी पुलिसकर्मी ज्यादा संख्या में नहीं थे। पुलिसकर्मी हमसे मदद माँग रहे थे। कह रहे थे कि हमें अपने वार्ड में कहीं छिपा दो। हम इतना डरे हुए थे कि हमारी जूनियर और सीनियर सभी नर्सें रो रहीं थीं।”
सफेद एप्रन पहने एक नर्स ने एबीपी आनंदा को बताया, ” ऐसा हुआ है कि पुलिस वाले बाथरूम में घुस आए और हमसे छिपने के लिए जगह माँगी।” उसने पुष्टि की कि अस्पताल में तोड़फोड़ रोकने के बजाय पुलिस वाले छिपे हुए थे। पुलिस द्वारा यह कहे जाने पर कि उसकी सुरक्षा उसकी जिम्मेदारी है, वह हैरान रह गई।
गुरुवार (15 अगस्त) की रात को 50 से ज़्यादा लोगों की भीड़ ने कोलकाता के आरजी कर मेडिकल कॉलेज और अस्पताल को घेर लिया। गुंडों ने एक महिला डॉक्टर के बलात्कार और हत्या के लिए न्याय की माँग कर रहे प्रदर्शनकारी डॉक्टरों पर हमला किया। सोशल मीडिया पर सामने आए वीडियो में भीड़ अस्पताल परिसर में तोड़फोड़ करती, पुलिस वाहनों को नुकसान पहुँचाती और वहाँ मौजूद डॉक्टरों पर हमला करती नजर आ रही है। हमलावर पत्थरबाजी में भी शामिल थे।
इस बीच, आरजी कर हॉस्पिटल में बुधवार रात हुई हिंसा और तोड़फोड़ के फेडरेशन ऑफ रेजिडेंट डॉक्टर्स एसोसिएशन (FORDA) ने फिर से हड़ताल का फैसला लिया है। FORDA की ओर से कहा गया है कि, सरकार काम के दौरान स्वास्थ्य कर्मियों की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं कर पा रहे हैं। सरकार हमारी प्रतिबद्धताओं और सेवा को उचित सम्मान नहीं दिला पा रही है, यह उसकी बड़ी विफलता है। FORDA ने कहा कि, हाल के घटनाक्रम की गंभीरता और न्याय की माँग को देखते हुए, हमने तुरंत प्रभाव से हड़ताल फिर से शुरू करने का फैसला किया है। इसके लिए हम रेजिडेंट डॉक्टर्स एसोसिएशन (आरडीए) के साथ काम कर रहे हैं और अन्य स्टेकहोल्डर्स के साथ काम कर रहे हैं।