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नोबेल पुरस्कार विजेता मुहम्मद यूनुस बने बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के प्रमुख, 2 प्रदर्शनकारी छात्र नेता भी शामिल: जानिए इस अर्थशास्त्री के हसीना से रिश्ते

बांग्लादेश में जारी हिंसा के बीच वहाँ की सेना ने अंतरिम सरकार का गठन कर दिया है। नोबेल पुरस्कार विजेता मुहम्मद यूनुस ने गुरुवार (8 अगस्त 2024) को अंतरिम सरकार के प्रमुख के रूप में शपथ ली। वे 8 अगस्त को ही पेरिस से ढाका पहुँचे। अंतरिम सरकार का प्रमुख बनने के लिए विशेष तौर पर उन्हें बुलाया गया था। पीएम मोदी ने उन्हें शुभकामनाएँ दी हैं।

आरक्षण के खिलाफ जमात-ए-इस्लामी और छात्रों के हिंसक प्रदर्शन के बाद प्रधानमंत्री शेख हसीना ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया था। इसके साथ ही उन्होंने बांग्लादेश छोड़कर भारत आ गई थीं। इसके बाद बांग्लादेश की सेना ने वहाँ की व्यवस्था को अपने नियंत्रण में ले लिया था और अंतरिम सरकार बनाने की घोषणा की थी।

पीएम मोदी ने X पर लिखा, “प्रोफेसर मोहम्मद यूनुस को उनकी नई ज़िम्मेदारी संभालने पर मेरी शुभकामनाएँ। हम उम्मीद करते हैं कि जल्द ही सामान्य स्थिति बहाल हो जाएगी, जिससे हिंदुओं और अन्य सभी अल्पसंख्यक समुदायों की सुरक्षा सुनिश्चित होगी। भारत शांति, सुरक्षा और विकास के लिए दोनों देशों के लोगों की साझा आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए बांग्लादेश के साथ काम करने के लिए प्रतिबद्ध है।”

इस बीच पूरे बांग्लादेश में हिंसा का दौर जारी है। जमात के कट्टरपंथी तत्व हिंदुओं को निशाना बना रहे हैं। हिंदुओं की हत्या की जा रही है, उनके घरों एवं मंदिरों को जलाया जा रहा, संपत्तियों को लूटा जा रहा है और महिलाओं के साथ बलात्कार किया जा रहा है। हिंसा एवं उत्पीड़न से तंग होकर हिंदू बांग्लादेश छोड़कर भारत में घुसने की कोशिश कर रहे हैं।

अंतरिम सरकार के मुखिया मुहम्मद यूनुस ग्रामीण बैंक के संस्थापक और मशहूर सोशल एक्टिविस्ट हैं। उन्हें बांग्लादेश में बैंकों का जनक माना जाता है। देश में उन्होंने ग्रामीण बैंकों की पूरी श्रृंखला विकसित की है। उन पर श्रम कानून उल्लंघन का एक मामला भी चल रहा था, लेकिन कार्यभार संभालने से ठीक एक दिन पहले एक अदालत ने उनकी पिछली सजा को पलट दिया था।

मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व में बांग्लादेश की अंतरिम सरकार में 16 लोगों ने शपथ ली है। इनमें मोहम्मद नाहिद इस्लाम और आसिफ साजिब भुइयाँ भी शामिल हैं। ये दोनों वो छात्र नेता हैं, जिन्होंने बांग्लादेश में आरक्षण विरोधी प्रदर्शन का नेतृत्व का किया था। उन्होंने देश के लोगों से सुरक्षा का आश्वासन दिया है।

यूनुस ने कहा, “बांग्लादेश ने आज एक नया विजय दिवस स्थापित किया है। हमें उसे ध्यान में रखते हुए और मजबूत बनाते हुए आगे बढ़ना है। युवाओं ने इसे संभव बनाया है। इसके लिए मैं उनकी प्रशंसा करता हूँ और उन्हें धन्यवाद देता हूँ। इस देश पुनर्जन्म हुआ है। इस पुनर्जन्म में मुझे जो बांग्लादेश मिला है, वह बहुत तेजी से आगे बढ़ेगा ये हमारा वादा है।”

उधर, शेख हसीना के बेटे सजीब वाजेद ने राजनीति में लौटने का इशारा किया है। प्रतिक्रिया देते हुए वाजेद ने कहा, “मैंने कहा था कि मेरा परिवार अब राजनीति में शामिल नहीं होगा, लेकिन जिस तरह से हमारी पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं पर हमले हो रहे हैं, हम हार नहीं मान सकते।”

कौन हैं मुहम्मद यूनुस

मोहम्मद यूनुस एक बैंकर और अर्थशास्त्री और नोबल पुरस्कार विजेता हैं। उनका जन्म 28 जून 1940 को अविभाजित भारत में हुआ था। वे बंगाल के चिटगाँव के जौहरी हाजी मोहम्मद सौदागर के घर पैदा हुए थे। शुरुआती शिक्षा के बाद उन्होंने ढाका यूनिवर्सिटी से अर्थशास्त्र की पढ़ाई की और उसके बाद अमेरिका चले गए। वहाँ अर्थशास्त्र में PhD करने के बाद वहीं इकोनॉमिक्स पढ़ाने लगे।

मुहम्मद यूनुस बांग्लादेश बनने के बाद स्वदेश लौटे। उन्होंने चिटगाँव यूनिवर्सिटी में अर्थशास्त्र विभाग के प्रमुख का पद संभाला। यूनुस ने कर्ज से दबे परिवारों को बाहर निकालने के लिए महिलाओं की स्वयं सहायता समूह बनाया, जो बेहद सफल रहा। यही आगे चलकर 1983 में ग्रामीण बैंक की नींव बना। इसकी सफलता के बाद अमेरिका ने भी इसे अपनाया है।

ग्रामीण बैंक की सफलता के बाद यूनुस ने 1997 में ग्रामीण फोन कंपनी की शुरुआत की। इस कंपनी ने बांग्लादेश में सबसे पहले प्रीपेड मोबाइल सेवाओं की शुरुआत की। आज ग्रामीण फोन बांग्लादेश की सबसे बड़ी मोबाइल नेटवर्क कंपनी है। इसका 48% बाजार पर कब्जा है और 8 करोड़ से अधिक ग्राहक हैं। यह सरकार को सबसे ज्यादा टैक्स देने वाली कंपनी है।

गरीबी मिटाने के लिए किए गए उनके कार्यों के लिए साल 2006 में ग्रामीण बैंक और मोहम्मद यूनुस को नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उस दौरान वे ग्रामीण बैंक से जुड़े हुए थे। इसके साथ ही वे बांग्लादेश में कई विकास परियोजनाओं में सलाहकार की हैसियत से अपनी सेवाएँ दे रहे थे।

राजनीति में कदम

18 फरवरी 2007 को यूनुस ने ‘नागरिक शक्ति’ नाम से एक राजनीतिक पार्टी बनाई। उन्होंने कहा कि वे इस पार्टी में साफ-सुथरी छवि वाले लोगों को ही शामिल करेंगे। इनमें प्रोफेसर, पत्रकार जैसे चर्चित चेहरे थे। यूनुस का इरादा 2008 का चुनाव लड़ने का था। इसके बाद वे तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख हसीना की आँखों में खटकने लगे।

शेख हसीना ने यूनुस का नाम लिए बिना एक बार कहा था, “राजनीति में नए लोग अक्सर खतरनाक होते हैं। उन्हें संदेह की नजर से देखा जाना चाहिए। ये देश को फायदा पहुँचाने से अधिक नुकसान पहुँचाते हैं।” इस तानातनी के बाद मुहम्मद यूनुस ने पार्टी की स्थापना के सिर्फ 76 दिन बाद 3 मई को पार्टी छोड़ने का ऐलान कर दिया।

साल 2008 में सरकार बनाने के तुरंत बाद शेख हसीना ने यूनुस के पीछे जाँच एजेंसियों को लगा दिया। उन पर सरकार को बिना बताए विदेशों से पैसा लेने और टेलीकॉम नियम तोड़ने के आरोप लगाए गए। उन्हीं की कंपनी के स्टाफ ने यूनुस पर केस कर दिया। शेख हसीना आरोप लगाए कि यूनुस गरीबों को अधिक ब्याज पर कर्ज देते हैं।

भास्कर की रिपोर्ट के मुताबिक, मुहम्मद यूनुस तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख हसीना के पिता शेख मुजीबुर्रहमान के कट्टर समर्थक थे। टेनेसी में पढ़ाने के दौरान यूनुस ने बांग्लादेश के मुक्ति संग्राम के बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिए एक अखबार लॉन्च किया था। हालाँकि, पार्टी बनाने के बाद दोनों के बीच दुश्मनी हो गई। यह कहानी इंदिरा गाँधी और राजमाता गायत्री देवी की तरह है।

शेख हसीना के निशाने पर आने के बाद जनवरी 2024 में मुहम्मद यूनुस पर 100 से अधिक केस चल रहे थे। उन्हें भ्रष्टाचार के मामले में कोर्ट ने 6 महीने जेल की सजा सुनाई थी। हालाँकि, यह सजा अब पलट दी गई है। शेख हसीना को बांग्लादेश में लोकतंत्र का कातिल बताने वाले यूनुस का कहना है कि भारत की शह पर वह तानाशाह बनीं।

पेरिस ओलंपिक 2024 में पुरुष हॉकी टीम ने जीता कांस्य पदक, भारत की झोली में कुल 4 मेडल: इस जीत के साथ गोलकीपर श्रीजेश ने अंतरराष्ट्रीय खेलों से लिया संन्यास

पेरिस ओलंपिक 2024 में मेंस हॉकी में भारतीय टीम ने गुरुवार (8 अगस्त) को एक रोमांचक मुकाबले में स्पेन को हराकर ब्रॉन्ज (कांस्य) पदक जीता। हरमनप्रीत सिंह की अगुवाई में टीम इंडिया द्वारा इस उपलब्धि के बाद पेरिस ओलंपिक में भारत के खाते में अब कुल 4 मेडल हो चुके हैं। वहीं, भारतीय हॉकी के गोलकीपर श्रीजेश ने अंतरराष्ट्रीय हॉकी से संन्यास ले लिया।

कप्तान हरमनप्रीत सिंह की अगुवाई में टीम इंडिया ने स्पेन को 2-1 से हराकर ओलंपिक खेलों में लगातार दूसरी बार ब्रॉन्ज मेडल जीता है। इससे पहले टोक्यो ओलंपिक 2021 में जर्मनी को हराकर भारत ने कांस्य पदक जीता था। बता दें कि ओलंपिक में भारत ने मेंस हॉकी में आठ बार गोल्ड मेडल जीता है। वहीं, टीम का आखिरी गोल्ड रूस के मॉस्को ओलंपिक 1980 में मिला था।

पेरिस ओलंपिक में मुकाबले के दौरान भारत की ओर से कप्तान हरमनप्रीत सिंह ने 30वें और 33वें मिनट में दो गोल दागे। वहीं, स्पेन की ओर से मार्क मिरालेस ने 18वें मिनट में गोल किया। इस तरह भारत ने 2-1 के मुकाबले से यह प्रतियोगिता जीत ली। ओलंपिक 2024 में भारतीय हॉकी टीम को सेमीफाइनल मुकाबले में जर्मनी से हार का सामना करना पड़ा।

वहीं, सेमीफाइनल हारने के बाद भारतीय हॉकी टीम गोल्ड की दौड़ से बाहर हो गई। इस रोमांचक मुकाबले में जर्मनी ने भारत को 3-2 से हरा दिया था। जीत पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने टीम को बधाई दी है। अब भारत के खाते में कुल चार मेडल हैं। इससे पहले भारत को शूटिंग में 3 कांस्य पदक मिले हैं। 

इस उपलब्धि के बीच भारत के हॉकी टीम के अनुभवी कप्तान पीआर श्रीजेश ने अंतरराष्ट्रीय हॉकी से संन्यास लेने की घोषणा कर दी है। भारतीय हॉकी खिलाड़ियों ने श्रीजेश के सम्मान में झुककर अभिवादन किया। श्रीजेश के शानदार गोलकीपिंग की बदौलत भारतीय हॉकी टीम लगातार 2 ओलपिंक में 2 मेडल जीतने में कामयाब रही।

टोक्यो ओलंपिक 2021 में श्रीजेश के प्रदर्शन के दम पर भारत ने जर्मनी को हराकर 40 साल बाद ब्रॉन्ज मेडल जीता था। इससे पहले हॉकी टीम ने 1980 में ओलंपिक मेडल जीता था। 1972 के बाद पहली बार भारतीय हॉकी टीम ओलंपिक में लगातार 2 ब्रॉन्ज जीती है। इससे पहले 1968 और 1972 ओलंपिक में ऐसा हुआ था। 

ह्यूमन राइट्स वॉच की एशिया उपनिदेशक डाल रही हिंदुओं के नरसंहार पर पर्दा, बांग्लादेश में इस्लामी क्रूरता को बताया राजनीतिक मामला

बांग्लादेश में हिंदुओं पर अत्याचार जारी है, लेकिन लोगों का एक वर्ग हिंदू विरोधी नरसंहार को कमतर आँकने की कोशिश कर रहा है और इसे राजनीति से प्रेरित हिंसा बता रहा है। ह्यूमन राइट्स वॉच (HRW) की डिप्टी एशिया डायरेक्टर मीनाक्षी गांगुली ने कहा कि इस्लामवादियों द्वारा बांग्लादेश में की जा रही हिंसा राजनीतिक कारणों से हो रही है, ना कि हिंदुओं के खिलाफ नफरत की वजह से।

मीनाक्षी गांगुली ने बुधवार (7 अगस्त) को सोशल मीडिया साइट X (पूर्व में ट्विटर) पर लिखा, “बांग्लादेश में संगीतकार राहुल आनंदा के घर को हिंदू अल्पसंख्यकों पर हमलों की एक भयावह श्रृंखला में जला दिया गया, क्योंकि वे शेख हसीना की अवामी लीग पार्टी का समर्थन करते थे। अधिकारियों को कानून का शासन सुनिश्चित करना चाहिए और अपराधियों की पहचान करके उन पर मुकदमा चलाना चाहिए।”

जैसा कि पहले बताया गया था कि 5 अगस्त की दोपहर को गायक और बैंड जोलर गान के फ्रंटमैन राहुल आनंदा के घर एक इस्लामी भीड़ पहुँची और उन पर हमला किया। वह एक किराए के घर में रह रहे थे। जब हमला हुआ, तब राहुल अपनी पत्नी शुक्ला, बेटा तोता और परिवार के अन्य सदस्यों के साथ थे। अपने परिवार के साथ वहाँ से भागने में सफल रहे और एक अज्ञात स्थान पर शरण ली।

जिस घर में राहुल आनंदा रहते थे, वह 140 साल पुराना था। यह घर जलकर अब राख हो गया है और उसमें मौजूद सारी यादें और इतिहास भी जलकर राख हो गए हैं। उल्लेखनीय है कि साल 2019 में मीनाक्षी गांगुली ने दावा किया था कि कश्मीरी हिंदुओं को 1990 में संभवतः भारत सरकार द्वारा घाटी छोड़ने के लिए ‘कहा’ गया था।

यहाँ ध्यान देने वाली बात यह भी है कि गांगुली अकेली नहीं हैं, जो ये भयावह कहानी फैला रही हैं कि हिंदुओं, उनके मंदिरों और संपत्तियों पर इस्लामवादियों द्वारा हिंदुओं से नफरत के कारण हमला नहीं, बल्कि शेख हसीना की अवामी लीग के समर्थन का बदला लेने के लिए हमला किया जा रहा है। अमेरिका के प्रसिद्ध अखबार न्यूयॉर्क टाइम्स ने भी यही किया था।

हालाँकि, पाठकों से कड़ी प्रतिक्रिया मिलने के बाद अखबार ने प्रकाशित समाचार रिपोर्टों में से एक का शीर्षक बदल दिया। पहले, शीर्षक था ‘प्रधानमंत्री के हटने के बाद बांग्लादेश में बदला लेने के लिए हिंदुओं पर हमले’। सोशल मीडिया पर भारी आलोचना के बाद इसका शीर्षक बदल दिया गया है, लेकिन विषयवस्तु वही रही।

इस रिपोर्ट में कहा गया है कि बांग्लादेश में हिंदुओं को इसलिए निशाना बनाया जा रहा है, क्योंकि वे शेख हसीना की राजनीतिक पार्टी आवामी लीग का समर्थन करते हैं, ना कि सांप्रदायिक कारणों से उन पर हमला किया जा रहा है। हालाँकि, शेख हसीना की पार्टी का समर्थन करने के कारण भी हिंदुओं की हत्या करना, उनके घरों और मंदिरों को तोड़ना उचित नहीं है।

अगर मीनाक्षी गांगुली के तर्क को मान भी लिया जाए तो क्या मीनाक्षी गांगुली, ह्यूमन राइट्स वॉच, NYT और अन्य इस्लामिस्ट चीयरलीडर्स यह बताने में कोई आपत्ति करेंगे कि मृतक के निजी अंग की जाँच करना किसी की राजनीतिक संबद्धता कैसे निर्धारित करता है? इस तरह घटनाएँ राजनीतिक कारणों से नहीं, बल्कि धार्मिक नफरत के कारण से ही हो सकती हैं।

ऐसी एक घटना में इस्लामिस्टों ने जमीन पर पड़े एक मृत शव को घेर लिया। वहाँ कई लोग मृतक के चारों ओर जमा थे। एक इस्लामिस्ट ने छड़ी की सहायता से मृतक को नंगा कर दिया और उसके निजी अंग की जाँच की कि उसका खतना हुआ है या नहीं। जब इस्लामिस्टों ने देखा कि खतना नहीं हुआ तो उनकी खुशी की सीमा नहीं ही और वे ‘हिंदू, हिंदू’ चिल्लाने लगे।

यह घोर निंदनीय है कि तथाकथित मानवाधिकार रक्षक सांप्रदायिक रूप से प्रेरित हिंदू विरोधी हिंसा को राजनीतिक रंग देने की कोशिश कर रही हैं, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि कोई भी उनके इस्लामवादी आकाओं की आलोचना या सवाल न कर सके। बांग्लादेश में हिंदुओं पर हमले, हत्या, मंदिरों एवं घरों में तोड़फोड़, महिलाओं से बलात्कार की अनगिनत घटनाएँ सामने आ चुकी हैं।

‘क्या ये हमारा देश नहीं है? अब हम असहाय महसूस कर रहे’: बांग्लादेश की हिंदू विरोधी हिंसा से सदमे में हिंदू छात्र, शेख हसीना के खिलाफ प्रदर्शन में थे शामिल

बांग्लादेश हिंदुओं के लिए नरक बन गया है। वहाँ हर तरफ डर का साया है। ढाका विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र 26 वर्षीय निलय कुमार बिस्वास का कहना है कि आरक्षण विरोधी आंदोलन धीरे-धीरे एक ऐसे आंदोलन में बदल गया है, जिसमें देश में हिंदू अल्पसंख्यकों को निशाना बनाया जा रहा है। उन्होंने कहा, “मैं अपने परिवार की सुरक्षा की चिंता में रातों को सो नहीं पाता हूँ।”

निलय बिस्वास बांग्लादेश में जारी हिंदू विरोधी हिंसा एवं धार्मिक घृणा के एकमात्र शिकार हिंदू समुदाय के छात्र निलय कुमार बिस्वास नहीं हैं। वहाँ, का हर हिंदू कट्टरपंथी जमात-ए-इस्लामी और खालिदा जिया की पार्टी के निशाने पर आ गया है। हालात ये हैं कि अब बांग्लादेश में हिंदुओं की आबादी 24% से घटकर 8% रह गई है। निलय ने भी शेख हसीना के खिलाफ प्रदर्शन में भाग लिया था।

यहाँ महत्वपूर्ण बात ये है कि पूर्व प्रधानमंत्री बेगम खालिदा जिया के नेतृत्व वाली बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) और प्रतिबंधित बांग्लादेश जमात-ए-इस्लामी के सदस्यों ने भी छात्र आंदोलन की आड़ में हाथ मिला लिया। इसके परिणामस्वरूप शेख हसीना को मजबूरन इस्तीफा देना पड़ा और जल्दी-जल्दी में बांग्लादेश को छोड़कर भारत आना पड़ा।

उस समय से कट्टरपंथी इस्लामी हिंदुओं को लगातार निशाना बना रहे हैं। उनके मंदिरों को नष्ट कर रहे हैं। उनके घरों को आग लगा रहे हैं। उनकी महिलाओं का शोषण कर रहे हैं। यह सब एक लोकतांत्रिक क्रांति के नाम पर किया जा रहा है। 5 अगस्त के बाद से ये घटनाएँ और भी बढ़ गई हैं, जब सोशल मीडिया और समाचार आउटलेट पर हिंदुओं पर कई हमलों की चिंताजनक रिपोर्टें सामने आई हैं।

बांग्लादेश में हुए छात्र आंदोलन में जोश के साथ हिस्सा लेने वाले हिंदू छात्र-छात्राओं को अब सड़कों पर अल्पसंख्यकों का खून बहाने वाले इस्लामवादियों का सामना करना पड़ रहा है। यह बदसूरत सच्चाई हिंदू छात्रों के लिए एक झटका है, जो अपने खिलाफ हो रहे बेवजह दंगों से उतने ही चिंतित और हैरान हैं।

बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना के इस्तीफे के बाद निलय कुमार बिस्वास पूरी रात सो नहीं पाए हैं। उन्होंने कहा कि वे ढाका में काफी सुरक्षित महसूस करते हैं, लेकिन रात में वे बांग्लादेश की राजधानी के बाहर रहने वाले दोस्तों और परिवार के लोगों की परेशानी भरी कॉल की वजह से सो नहीं पाते।

उन्होंने कहा कि अंतरिम सरकार की स्थापना तक बांग्लादेशी लोगों, खासकर हिंदुओं को एक-दूसरे का ख्याल रखने की जरूरत है। द प्रिंट को उन्होंने कहा, “अधिकांश पुलिस स्टेशन खाली रहते हैं। जब हत्यारी भीड़ उत्पात मचाती है तो आम बांग्लादेशी असहाय होकर देखते हैं। अल्पसंख्यक हिंदू समुदाय ऐसे समय में विशेष रूप से असहाय महसूस करता है, क्योंकि हम आसान लक्ष्य होते हैं।”

पिछले साल ढाका विश्वविद्यालय के मास कम्युनिकेशन और पत्रकारिता विभाग से सामाजिक विज्ञान में मास्टर डिग्री प्राप्त करने वाले बिस्वास ने बताया कि बड़ी संख्या में हिंदू छात्रों ने कोटा सुधार प्रदर्शनों में हिस्सा लिया था, जिसके कारण शेख हसीना को बाहर होना पड़ा। उन्होंने कहा कि मुस्लिम ही नहीं, बल्कि कई हिंदू छात्र चाहते थे कि सरकारी नौकरियों में कोटा प्रणाली में सुधार किया जाए।

बिस्वास ने कहा, “प्रदर्शन के दौरान हम अपने साथी मुस्लिम छात्रों के साथ चले, उम्मीद के गीत गाए, फासीवाद के खिलाफ नारे लगाए और पुलिस की लाठी और गोलियों का सामना किया। आज बांग्लादेश में फैली अराजकता में हिंदू मंदिरों पर हमला किया जा रहा है, हमारे घरों को लूटा जा रहा है, आग लगाई जा रही है, हमारी जान खतरे में है।”

कोटा के खिलाफ आंदोलन में हिंदू छात्रों ने खून बहाया: बिस्वास

उन्होंने दावा किया कि हिंदुओं पर हमलों के बीच हिंदू अपने साथी मुस्लिमों के पास मदद के लिए गए हैं। उन्होंने कहा, “मेरे मुस्लिम दोस्त भीड़ को मंदिरों और हिंदू घरों में तोड़फोड़ करने और आग लगाने से रोकने के लिए पहरा दे रहे हैं। सोशल मीडिया पर नेकदिल मुस्लिम नागरिकों की अपील है कि देश को अंधकार में न जाने दें। यह साथी मुसलमान ही हैं जो हमारी रक्षा कर सकते हैं। हम और किससे मदद माँगे?”

बिस्वास को डर है कि अगर अंतरिम प्रशासन जल्दी से स्थापित नहीं किया गया तो विनाश और हो सकता है। उन्होंने कहा, “बांग्लादेश को मुस्लिमों, हिंदुओं और सभी अन्य धर्मों के नागरिकों के साथ एक नई शुरुआत की जरूरत है। लोग सांप्रदायिक दंगों से प्रभावित जिलों की सूची बना रहे हैं। मैं यही प्रार्थना कर सकता हूँ कि सूची और लंबी न हो। पहले ही समुदाय बहुत कुछ खो चुका है।”

प्रदर्शन में भाग लेने वाली छात्रा का दर्द

बिस्वास की तरह ही यूनिवर्सिटी की छात्रा आरिया भौमिक ने भी शेख हसीना के पद से हटने का स्वागत करते हुए बांग्लादेश के झंडे के साथ जश्न मनाई थी और इसकी कई तस्वीरें भी पोस्ट की थीं। उन्होंने लिखा था, “बंगाल के लोग अब आज़ाद हैं।” एक अन्य पोस्ट में उन्होंने लिखा, “मैं हिंदू हूँ और बांग्लादेश में हर धर्म के मेरे दोस्त मेरी रक्षा के लिए यहाँ हैं। हमने मिलकर बांग्लादेश को बनाया है। हम एकजुट हैं।”

आरिया की गलतफहमी कट्टरपंथियों ने तुरंत दूर कर दी। उन्हें मुस्लिम बहुल देश में एक हिंदू के जीवन की कीमत का एहसास हुआ तो उन्होंने एक अन्य पोस्ट में अपील की, “हम धर्म की परवाह किए बिना एकजुट हैं। हमने धर्म नहीं, केवल मानवता देखी है और अब हम हिंदुओं पर हमला किया जा रहा है। यह समय है कि हम अपनी आवाज़ उठाएँ, इस अन्याय के खिलाफ़ अपना रुख़ स्पष्ट और मज़बूत करें।”

हालाँकि, आरिया को यह एहसास नहीं था कि भले ही यह यह उनके लिए सच हो, लेकिन एक इस्लामवादी दुनिया को इस्लाम के चश्मे से देखता है। विरोध प्रदर्शन उनके लिए हिंदुओं पर हमला करने का एक साधन मात्र है। आरिया ने कई समाचार लेखों के स्क्रीनशॉट भी अपलोड किए, जिनमें हिंदुओं, उनके घरों और मंदिरों पर हुए हमलों का विवरण दिया गया था।

इनमें प्रसिद्ध बांग्लादेशी संगीतकार राहुल आनंद भी शामिल हैं। कट्टरपंथियों ने उनके घर को आग लगा दी और उनके सामान को लूट लिया था। इस तरह, जिन हिंदू छात्र-छात्राओं ने बांग्लादेश को अपना देश माना और आंदोलन में खड़े रहे, वे आज अपने परिवारों, मित्रों और साथी हिंदुओं के जीवन और सम्मान की भीख माँगने पर मजबूर हो गए हैं कि उन्हें बख्श दिया जाए।

हिंसा की आग में जल रहे बांग्लादेश से भागे हिंदू, बंगाल बॉर्डर पर BSF ने रोका: नो मैन्स लैंड में सैकड़ों लोगों ने शरण ली, वापस लौटने से किया इनकार

बांग्लादेश में जारी हिंसा के बीच वहाँ के नागरिक भारत में अवैध रूप से घुसने की कोशिश कर रहे हैं। उत्तर बंगाल में अंतरराष्ट्रीय सीमा पर तैनात सीमा सुरक्षा बल (BSF) ने बुधवार (7 अगस्त 2024) को ऐसी कई कोशिशों को नाकाम कर दिया। BSF ने बताया कि बांग्लादेश के ठाकुरगाँव जिले के करीब 200 ग्रामीणों ने भारत में घुसने की कोशिश की। इनमें से ज्यादातर अवामी लीग के सदस्य और हिंदू हैं। बीएसएफ ने इन्हें रोकने के लिए हवा में गोलियाँ चलाईं।

उत्तर बंगाल फ्रंटियर BSF ने सोशल मीडिया साइट एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर किए गए अपने पोस्ट में लिखा, “बीएसएफ उत्तर बंगाल फ्रंटियर ने आज भारत-बांग्लादेश सीमा के पास बांग्लादेशी नागरिकों की भीड़ को प्रभावी ढंग से रोका। सतर्कता और बांग्लादेश बॉर्डर गार्ड (BGB) के साथ समन्वय किया और उन्होंने इनकी सुरक्षा सुनिश्चित की और किसी भी सीमा उल्लंघन को रोका।”

हालाँकि, ग्रामीणों ने बांग्लादेश लौटने से इनकार कर दिया, क्योंकि भीड़ आवामी लीग के सदस्यों और हिंदुओं की तलाश कर रही थी। वहाँ से भागे लोग दोनों देशों के बीच स्थित नो-मैन्स लैंड में ही रुके रहे। सीमा का वह हिस्सा बिना बाड़ का है। इसलिए बीएसएफ को उन्हें भारत से बाहर रखने के लिए एक मानव अवरोध बनाना पड़ा।

BSF के DIG (उत्तर बंगाल फ्रंटियर) अमित त्यागी ने कहा, “गाँव वाले अभी भी वहीं अंतरराष्ट्रीय सीमा से 200 मीटर से 500 मीटर की दूरी पर हैं।” करीब 600 बांग्लादेशी उत्तरी बंगाल में जलपाईगुड़ी के पास नो-मैन्स लैंड छोड़ने से इनकार कर रहे हैं और भारत में प्रवेश की माँग कर रहे हैं। BSF और BGB, दोनों उन्हें वापस जाने के लिए कह रहे हैं, लेकिन वे मना कर रहे हैं।

सोशल मीडिया पर साझा किए गए वीडियो में दिख रहा है कि भारत में प्रवेश करने के लिए ठाकुरगाँव जिले के टेम्काभिता गाँव में नदी पार कर रहे बांग्लादेशी हिंदुओं और अन्य लोगों को भीड़ द्वारा निशाना बनाया जा रहा है। गाँव के सभी लोग अपना घर-बार छोड़कर जरूरी सामान के साथ पश्चिम बंगाल के उत्तरी दिनजापुर जिले की सीमा पर पहुँचे है। वहाँ, उन्हें BSF ने उन्हें रोक रखा है।

रिपोर्ट के मुताबिक, सीमा पर कई जगहों पर ऐसे दृश्य देखने को मिल रहे हैं। एक अन्य स्थान पर BSF ने छह लोगों को जीरो पॉइंट पर रोका है। उस क्षेत्र में सीमा पर कंटीले तारों की बाड़ नहीं होने के कारण यह अंतरराष्ट्रीय सीमा पार करने के लिए आकर्षक जगह बन गई है। इसके कारण BSF कर्मियों पर बहुत अधिक दबाव पड़ रहा है।

मंगलवार (6 अगस्त 2024) की रात को स्थिति तब और बिगड़ गई जब आवामी लीग के पूर्व सांसद कमरुल अरेफिन, उनकी पत्नी और दो बेटियों ने पेट्रापोल-बेनापोल सीमा क्रॉसिंग पर बिना वैध वीजा के भारत में प्रवेश करने का प्रयास किया। उन्होंने अपने देश में जान का खतरा बताते हुए भारत में प्रवेश की अपील की थी।

हालाँकि, BSF ने उन्हें रोक दिया और वापस बांग्लादेश भेज दिया। वहाँ BGB ने उन्हें हिरासत में ले लिया। उसी तरह बुधवार (7 अगस्त 2024) को बीजीबी ने दर्शना सीमा चौकी पर अवामी लीग के दो और राजनेताओं को रोक लिया।

भारत को भी हिंसा के आग में जलते देखना चाहता है विपक्ष, मणिशंकर अय्यर बोले- बांग्लादेश की तरह ही हुई धांधली: जानिए कैसे आग से खेल रही कॉन्ग्रेस

शेख हसीना के प्रधानमंत्री पद से इस्तीफे और देश छोड़ने के बाद बांग्लादेश में अराजकता और हिंदू विरोधी हिंसा फैल गई है। ऐसे में भारत के राजनीतिक गिद्धों को उम्मीद है कि यहाँ भी इसी तरह का ‘विद्रोह’ होगा। कुछ कॉन्ग्रेसी नेताओं ने बांग्लादेश की स्थिति की तुलना भारत में चल रहे काल्पनिक मोदी विरोधी ‘अंडरकरंट’ से करनी शुरू कर दी है। जिस बांग्लादेश में प्रदर्शनकारियों ने शेख हसीना के आवास गोनो भवन पर धावा बोलकर लूटपाट की, उसी तरह की कल्पना वे भारत के लिए भी कर रहे हैं।

कॉन्ग्रेस के मुखर वक्ता मणिशंकर अय्यर ने 7 अगस्त को हिंसाग्रस्त बांग्लादेश की स्थिति की तुलना भारत से की। चुनावों के दौरान विपक्ष द्वारा लगाए गए ईवीएम हैकिंग के आरोपों को दोहराते हुए अय्यर ने इशारा किया कि भारतीय चुनाव किसी भी तरह से स्वतंत्र और निष्पक्ष नहीं थे। उन्होंने कहा, “बांग्लादेशी विपक्षी दल इसलिए इससे दूर रहे क्योंकि उन्हें लगा कि यह प्रक्रिया न तो स्वतंत्र है और न ही निष्पक्ष।”

अपने अपमानजनक एवं पाकिस्तान परस्त बयानों के लिए कुख्याति अय्यर ने कहा कि भारत में बांग्लादेश जैसी स्थिति नहीं है। यहाँ विपक्ष स्वतंत्रता के साथ चुनावों में भाग लेता है, लेकिन कुछ चिंताएँ हैं और कुछ ‘संदेह’ उत्पन्न हुए हैं, जिसको लेकर कुछ समूहों द्वारा सवाल उठाए जा रहे हैं। उन्होंने दावा किया कि साल 2024 के लोकसभा चुनाव में करीब 79 सीटों पर पहले एवं बाद के आँकड़ों में काफी अंतर है।

अय्यर ने दावा किया कि जिस तरह बांग्लादेश के लोगों के मन में वहाँ के चुनाव नतीजों को लेकर संदेह पैदा हुआ, उसी तरह कई भारतीयों को भी ‘गड़बड़ी’ का संदेह है। अय्यर ने कहा, “इस तरह की आशंकाएँ यहाँ अभी जताई गई हैं, लेकिन बांग्लादेश में ये चरम पर हैं।” उन्होंने बांग्लादेश से सबक लेने की बात कहते हुए कहा, “हम विकसित भारत होंगे, लेकिन क्या यह स्वतंत्र और लोकतांत्रिक भारत होगा?”

जाहिर है कि मणिशंकर अय्यर के निराधार दावों की जड़ें एक संदिग्ध ऑनलाइन रिपोर्ट में हैं। हालाँकि, चुनाव आयोग ने हाल ही में इन दावों का खंडन किया था और कहा था कि ‘मानव जाति के इतिहास में अब तक हुए सबसे बड़े चुनावों को बदनाम करने के लिए कुछ लोगों (उम्मीदवारों के अलावा) द्वारा झूठा अभियान चलाया जा रहा है।”

भारतीय चुनाव आयोग ने कहा था, “इसके हर चरण में उम्मीदवारों/हितधारकों को शामिल किया गया है। मतदान के दिन शाम 7 बजे के (जब कई केेद्रों पर मतदान बंद हो रहे होते हैं और/या मतदाता कतार में प्रतीक्षा कर रहे होते हैं) अनुमानित मतदान के आँकड़े की तुलना मतदान के एक दिन बाद उपलब्ध ‘मतदान समाप्ति’ के आँकड़े से करने का निराधार प्रयास किया जा रहा है।”

चुनावी डेटा और नतीजे RPA की धाराओं के तहत वैधानिक रूपों और प्रक्रियाओं के अनुसार हैं। वहीं, किसी उम्मीदवार या मतदाता द्वारा चुनावी नतीजों को चुनौती देने का वैध तरीका RPA 1951 के तहत चुनाव याचिका के माध्यम से है। चुनाव आयोग ने कहा कि लोकसभा चुनाव 2019 में 138 ईपी के मुकाबले लोकसभा चुनाव 2024 में 79 पीसी में कम संख्या में EP दायर किए गए हैं।

कॉन्ग्रेस नेता निराधार और दुर्भावनापूर्ण दावों का इस्तेमाल न केवल मोदी सरकार और चुनाव आयोग पर हमला करने के लिए कर रहे हैं, बल्कि भारत में बांग्लादेश जैसी अराजकता को बढ़ावा देने के लिए भी कर रहे हैं। कॉन्ग्रेस नेता सज्जन वर्मा ने कहा कि वह दिन दूर नहीं जब लोग शेख हसीना की तरह पीएम मोदी के सरकारी आवास पर लोग धावा बोलेंगे। उन्होंने कहा, “पहले श्रीलंका में जनता अपने प्रधानमंत्री के आवास में घुस गई, फिर बांग्लादेश में और अब भारत का नंबर है।”

कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता सलमान खुर्शीद ने भी धमकी दी है। एक पुस्तक विमोचन समारोह में बोलते हुए उन्होंने कहा, “कश्मीर में सब कुछ सामान्य लग सकता है। चुनाव परिणामों के बाद दिल्ली में भी सब कुछ सामान्य लग सकता है, लेकिन सच्चाई यह है कि सतह के नीचे कुछ और है। बांग्लादेश में जो हो रहा है, वह यहाँ भी हो सकता है। हमारे देश का विस्तृत भूभाग बांग्लादेश जैसी घटनाओं को होने से रोकता है।”

कॉन्ग्रेस नेताओं के इस तरह के बयान न केवल बेचैन करने वाले हैं, बल्कि स्थिर भारत में अशांति और अराजकता भड़काने की खतरनाक प्रवृत्ति का भी संकेत देते हैं। कॉन्ग्रेस की बयानबाजी उसकी बार-बार की राजनीतिक असफलताओं से निकली हताशा को दिखाती है। भारत के लोगों ने लगातार तीन चुनावों में मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार को चुना है, जो नेतृत्व और नीतियों के मजबूत पसंद का संकेत है।

हालाँकि, भाजपा की सीटें कम जरूर हुई हैं, लेकिन लोकतंत्र में यह आश्चर्यजनक नहीं है। लोकतांत्रिक प्रक्रिया का सम्मान करने और रचनात्मक विपक्ष में भाग लेने के बजाय, कॉन्ग्रेस की धमकी लोकतंत्र को कमजोर करती है। जाति और क्षेत्रीय आधार पर देश में दरार पैदा करने की पूरी कोशिशों के बावजूद कॉन्ग्रेस अपनी सीटों की संख्या में कुछ ही इज़ाफा कर पाई है।

हालाँकि, कॉन्ग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए गठबंधन बड़ी बढ़त हासिल करने के बावजूद भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए को नहीं हरा पाया। इसके बाद कॉन्ग्रेस लोकतांत्रिक तरीके से चुनी हुई सरकार को हटाने के लिए नागरिक विद्रोह की उम्मीद कर रही है। इस बीच, ‘मोहब्बत की दुकान’ के स्वयंभू मालिक एवं संचालक राहुल गाँधी ने अपनी पार्टी के नेताओं के भड़काऊ बयानों पर चुप्पी साध रखी है।

अब अखाड़े में नहीं, कोर्ट में होगा विनेश फोगाट के मेडल का फैसला: 4 वकील CAS में रखेंगे भारत की महिला पहलवान का पक्ष, क्या मिलेगा सिल्वर?

भारतीय पहलवान विनेश फोगाट के ओलंपिक से अयोग्य घोषित होने के बाद भी सिल्वर मेडल की उम्मीदें बची हुई हैं। उनके सिल्वर मेडल को लेकर ओलंपिक खेलों का एक कोर्ट फैसला करेगा। विनेश ने इस कोर्ट में अपनी अपील दाखिल की है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, विनेश फोगाट ने बुधवार (7 अगस्त, 2024) को अयोग्य घोषित किए जाने के बाद ओलंपिक खेलों में विवादों के निपटारे के लिए स्पोर्ट्स आर्ब्रीट्रेशन कोर्ट (CAS) में अपील दाखिल की थी। विनेश फोगाट ने पहले कोर्ट से माँग की थी कि उन्हें फाइनल मुकाबला खेलने दिया जाए।

बताया गया कि इसके लिए उन्होंने दोबारा वजन तोलने की माँग की थी। इसके बाद उन्होंने अपनी अपील को बदल लिया और माँग की कि उन्हें दूसरी खिलाड़ी के साथ संयुक्त सिल्वर मेडल दिया जाए। उनकी इस अपील को CAS ने स्वीकार कर लिया है और इस पर गुरुवार (8 अगस्त, 2024) को सुनवाई करेगी। इसके बाद अंतरिम फैसला दिया जाएगा।

बताया गया कि CAS ने विनेश फोगाट की फाइनल मैच खेलने की अपील मानने से इनकार कर दिया था और कहा था कि वह इस संबंध में कोई बदलाव नहीं करेगा। CAS ने कहा था कि वह ओलंपिक खेलों का क्रम नहीं बदलेगी।

CAS के फैसले से ही पता चलेगा कि कि क्या विनेश को कोई पदक दिया जाएगा या फिर वह बिना पदक के ही ओलंपिक से लौटेंगी। विनेश ने इससे पहले गुरुवार को अपने संन्यास का ऐलान भी कर दिया। उन्होंने एक ट्वीट लिख कर अपना दुख व्यक्त किया और कुश्ती से संन्यास की घोषणा की।

CAS खेलों के मामले विवाद हल करने के लिए बनाई गई एक संस्था है। ओलंपिक खेलों में होने वाले विवाद इसी में जाते हैं। इसका मुख्यालय स्विटज़रलैंड में है लेकिन पेरिस में इसकी एक अस्थायी शाखा भी खोली गई है, ताकि यहाँ उपजे विवादों को हल किया जा सके। विनेश फोगाट का मामला पेरिस के ही चार वकील रख रहे हैं।

गौरतलब है कि बुधवार (7 अगस्त, 2024) को विनेश फोगाट ने एक जापानी खिलाड़ी को हरा दिया था और इसके बाद सेमीफाइनल में पहुँची थी। इसके बाद उन्होंने सेमीफाइनल में क्यूबा की एक खिलाड़ी को हराया था और फाइनल में पहुँच गई थी। उनका फाइनल में मुकाबला अमेरिकी खिलाड़ी से होना था।

फाइनल मुकाबले से पहले विनेश फोगाट का वजन तय सीमा से अधिक पाया गया था। उनका वजन तय सीमा से 100 ग्राम अधिक था। इसके बाद वह अयोग्य घोषित कर दी गईं थी। इसके बाद उन्होंने कोर्ट जाने का निर्णय लिया जिसका अब फैसला आना है।

DNA टेस्ट के लिए सपा नेता मोईद खान और उसके नौकर राजू खान का लिया सैंपल, अयोध्या की OBC लड़की से गैंगरेप का मामला: गर्भपात के बाद पीड़िता अस्पताल में भर्ती

अयोध्या गैंगरेप मामले में पीड़िता के गर्भपात के बाद अब डीएनए टेस्ट की प्रक्रिया आगे बढ़ रही है। जाँच के लिए गैंगरेप के आरोपित सपा नेता मोईद खान और उसके नौकर राजू खान का सैंपल ले लिया गया। पीड़िता अभी लखनऊ के अस्पताल में ही एडमिट है। डॉक्टरों के अनुसार, उसकी हालत में तेजी से सुधार हो रहा है। जल्द ही उसे अस्पताल से छुट्टी मिल सकती है।

बता दें कि इससे पहले डॉक्टरों की सलाह और घरवालों की मंजूरी से अयोध्या गैंगरेप पीड़िता का अबॉर्शन लखनऊ के केजीएमयू में हुआ था। गर्भपात के समय लड़की 12 सप्ताह की गर्भवती थी। डॉक्टरों ने कहा था कि उसका शरीर डिलीवरी लायक नहीं है इसलिए अबॉर्शन ही एक मात्र तरीका है।

इसके बाद बच्ची का अबॉर्शन करवाया गया और भ्रूण का डीएनए संभाल कर रखा गया ताकि आरोपित के बारे में पता चल सके। अब इसी जाँच को पूरा करने के लिए दोनों आरोपित के भी डीएनए टेस्ट ले लिए गए।

उल्लेखनीय है कि 30 जुलाई को अयोध्या में ओबीसी समाज की एक बच्ची से गैंगरेप का मामला सामने आया था। रेप का आरोप सपा नेता मोईद खान पर लगा था जिन्हें अयोध्या सांसद अवधेश प्रसाद का करीबी भी कहा जाता है।

रिपोर्ट्स में बताया गया था कि घटना खुलने के करीब 75 दिन पहले पीड़िता अपनी माँ के साथ मजदूरी कर के लौट रही थी। तभी रास्ते में मोईद की दुकान में काम करने वाले नौकर राजू खाँ ने पीड़िता को टोस्ट लेने के लिए अपनी दुकान पर बुलाया। लड़की पहले भी मोईद की दुकान पर आती जाती रही थी इसीलिए वो विश्वास कर के वहाँ चली गई।

इसके बाद वहीं राजू और मोईद खान ने बारी बारी से उसके साथ रेप किया। इस दौरान उन्होंने बच्ची की वीडियो भी बनाई जिसे दिखाकर वह उसे ब्लैकमेल करते रहे और रेप भी किया। बाद में लड़की जब प्रेगनेंट हो गई तब ये पूरा मामला खुला।

लड़की की माँ ने सख्ती से पूछा तो बेटी ने सब कुछ बता दिया इसके बाद ये केस दर्ज पुलिस थाने में दर्ज हुआ और मोईद खान व राजू खान दोनों लोग गिरफ्तार किए गए।

मालूम हो कि मोईद खान की नजदीकी सपा सांसद अवधेश प्रसाद से होने के चलते अवधेश प्रसाद से भी कई सवाल हुए। हालाँकि उन्होंने इस मुद्दे पर कुछ भी बोलने से मना कर दिया। वहीं अखिलेश यादव ने इस मामले में डीएनए टेस्ट की माँग की थी।

विनेश फोगाट पर कॉन्ग्रेस की राजनीति को उनके ताऊ ने किया फुस्स, कहा- भूपेंद्र हुड्डा ने CM रहते बबीता-गीता के साथ किया भेदभाव, आज राज्यसभा की कर रहे बात

ओलंपिक में वजन ज्यादा होने के कारण अयोग्य करार दी गईं विनेश फोगाट के मुद्दे पर विपक्ष जमकर राजनीति कर रहा है। इसी क्रम में हरियाणा के पूर्व सीएम हरियाणा भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने कहा कि अगर उनकी सरकार होती तो वो विनेश को राज्यसभा में सीट देते। अब भूपेंद्र सिंह हुड्डा के इसी बयान पर विनेश फोगाट के ताऊ और गीता फोगाट व बबीता फोगाट के पिता महावीर फोगाट ने करारा जवाब दिया है।

उन्होंने समाचार एजेंसियों से बात करते हुए कहा, “2005 और 2010 के कॉमनवेल्थ गेम्स में गीता ने गोल्ड मेडल लिया था और बबीता ने सिल्वर मेडल लिया था। पहली महिला पहलवान थी जिन्होंने हिंदुस्तान की तरफ से ये मेडल लिया। इसके बाद 2012 में गीता ने बतौर पहली महिला ओलंपिक क्वालीफाई किया था। जब भूपेंद्र हुड्डा की सरकार और गीता और बबीता को DSP का पद मिलना था लेकिन हुड्डा साहब ने भेदभाव करके गीता को इंस्पेक्टर और बबीता को सब इंस्पेक्टर लगाया।”

आगे उन्होंने कहा, “कोर्ट में केस डालने के बाद कोर्ट ने इस पर संज्ञान लिया। जब भूपेंद्र हुड्डा की सरकार थी तब गीता ने कई रिकॉर्ड बनाए तब उन्हें राज्यसभा क्यों नहीं भेजा?” महावीर फोगाट ने कैमरे के सामने कहा कि उन्हें लगता है कि भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने ये सब सिर्फ राजनीति के चलते कहा है।

बता दें कि विनेश फोगाट ने पेरिस ओलंपिक 50 किग्रा कुश्ती स्पर्धा के फाइनल से पहले वजन अधिक पाए जाने के कारण बुधवार (8 अगस्त 2024) को ओलंपिक से अयोग्य घोषित किया गया था। इसके बाद पूरा देश उनके साथ खड़ा हुआ। इस बीच हरियाणा सरकार ने ऐलान किया कि वो विनेश को वो सारे सम्मान देगी जो मेडल आने पर खिलाड़ी को दिए जाते हैं।

चुन-चुनकर हो रही हिंदुओं की हत्या, लेकिन ‘स्क्रॉल’ के लिए यह ‘सामान्य हिंसा’; NYT बता रहा ‘मुस्लिमों का बदला’: बांग्लादेश पर प्रपंच में जुटा विदेशी-वामपंथी मीडिया

बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना की सत्ता इस्लामी कट्टरपंथियों के विरोध के बाद खत्म हो गई है। शेख हसीना खुद इस्तीफ़ा देकर भारत आ गई हैं। इस बीच में बांग्लादेश में हो रही सरकार विरोधी हिंसा को हिन्दू विरोधी हिंसा में बदल दिया गया है। इस हिन्दू विरोधी हिंसा में मंदिर तोड़े जा रहे हैं, हिन्दुओं को सरेआम मारा जा रहा है। हिन्दू महिलाओं के साथ बलात्कार हो रहा है, घर भी इस्लामी कट्टरपंथियों की भीड़ लूट रही है। इन सबके बीच इस्लामी हिंसा पर पर्दा डालने और उसको सही ठहराने के लिए देसी-विदेशी मीडिया आगे आ गया है।

बांग्लादेश में हिन्दुओं के खिलाफ हिंसा

बांग्लादेश से हिन्दुओं के विरुद्ध हिंसा की लगातार हिंसा की कहानियाँ सामने आ रही हैं। बांग्लादेश के पिरोजपुर जिले में हिन्दू महिलाओं के साथ बलात्कार हुआ है। इस्लामी भीड़ ने उनके गहने भी लूट लिए, इसकी कहानी खुद इन महिलाओं ने सुनाई है। एक महिला ने बताया, “रात में वो लोग आए। उन्होंने हमारे घरों में तोड़फोड़ की और सब कुछ लूट लिया। हम इस दौरान छिप गए थे। उन्होंने मेरे साले की पत्नी को पकड़ लिया और उसे दूसरे कमरे में ले गए। उन्होंने उसके साथ रेप किया। बाद में, हमें वह मिली।”

हिन्दू महिलाओं के अलावा मंदिर भी निशाने पर हैं। बांग्लादेश के खुलना में एक हिन्दू मंदिर को इस्लामी कट्टरपंथियों ने आग लगा दी। इसके बाद यहाँ रखी भगवान की मूर्तियाँ तोड़ दी। मंदिर में आग लगने से काफी नुकसान हुआ। खुलना में ही एक काली मंदिर को भी नुकसान पहुँचाया गया। देश के अलग-अलग हिस्सों में छोटे-छोटे मंदिर भी निशाने पर आए। कई जगह मूर्तियों को भी तोड़ा गया, आग लगाई गई या फिर पूरे मन्दिर को नष्ट करने का प्रयास हुआ।

इस्लामी कट्टरपंथी हिन्दुओं को चुन-चुन कर मार रहे हैं। हसीना सरकार में कर्मचारी रहे हिन्दुओं को इस्लामी कट्टरपंथी सार्वजनिक रूप से मार रहे हैं। ऐसे ही एक हिन्दू पुलिस अधिकारी की नृशंस तरीके से कट्टरपंथियों ने हत्या की। पुलिस अधिकारी संतोष साहा के क्षत विक्षत शव की तस्वीर सामने आई है। एक हिन्दू पत्रकार और एक पार्षद की भी बांग्लादेश में हत्या की गई है।

हिन्दू हिंसा की चपेट में, मीडिया प्रोपेगेंडा फैलाने में जुटा

बांग्लादेश में हिन्दू महिलाओं के साथ रेप, मंदिरों के टूटने और सार्वजनिक हत्याओं के बीच मीडिया इन सब पर पर्दा डालने में जुट गया है। हमेशा भारत और हिन्दुओं के विरोध में खड़ा रहने वाला मीडिया हिन्दुओं के विरुद्ध हिंसा को जायज ठहरा रहा है। इसके लिए बड़े बड़े कॉलम लिखे जा रहे हैं। अमेरिकी समाचार पत्र न्यूयॉर्क टाइम्स जहाँ एक ओर हिन्दुओं के खिलाफ हिंसा को मुस्लिमों का बदला बता रहा है, वहीं भारतीय वामपंथी मीडिया पोर्टल स्क्रॉल बांग्लादेशी के हिन्दुओं के ऊपर हिंसा का दोष भारत के हिन्दुओं के ऊपर डालने में जुट गया है।

न्यूयॉर्क टाइम्स ने बताया बदला, बाद में बदली हेडलाइन

अमेरिकी वामपंथी मीडिया न्यूयॉर्क टाइम्स ने बांग्लादेश में हिन्दुओं पर हो रहे अत्याचार को बदले के कारण हुए हमले बताया। न्यूयॉर्क टाइम्स ने यह सिद्ध करने का प्रयास किया कि पहले हिन्दुओं ने इस्लामी कट्टरपंथियों के साथ अन्याय किया था, जिसका अब बदला लिया जा रहा है। उसने अपनी खबर की हेडलाइन में यह बात लिखी। न्यूयॉर्क टाइम्स ने लिखा, “प्रधानमंत्री के इस्तीफे के बाद बांग्लादेश में हिंदुओं पर बदले की कार्रवाई।”

इस खबर में न्यू यॉर्क टाइम्स ने बताया कि हिन्दुओं पर हमला इसलिए नहीं हो रहा क्योंकि हमला करने वाले कट्टरपंथी इस्लामी हैं, बल्कि उन पर हमला इसलिए हो रहा है क्योंकि वह शेख हसीना के समर्थक के तौर पर देखे जाते हैं।

यानि न्यूयॉर्क टाइम्स यह कहना चाहता है कि हिन्दुओं पर हमले उनके धर्म के कारण नहीं बल्कि उनके राजनीतिक समर्थन के कारण हो रहे हैं। न्यूयॉर्क टाइम्स के इस हेडलाइन को लेकर सोशल मीडिया पर आक्रोश व्यक्त किया गया।

सोशल मीडिया साईट एक्स (पहले ट्विटर) पर अभिनव अग्रवाल ने लिखा, “यदि किसी नरसंहार को छुपाना हो, नरसंहार का बचाव करना हो, बच्चों का यौन शोषण करने वालों को बचाना हो, तो कुख्यात न्यूयॉर्क टाइम्स पर आँख बंद करके भरोसा कर लीजिए।”

X यूजर बाला ने भी इसको लेकर गुस्सा जताया। उन्होंने लिखा, “न्यूयॉर्क टाइम्स ने बांग्लादेशी हिंदुओं के नरसंहार को ‘बदले का हमला’ बताया है। NYT हिंदुओं की हत्याओं को शेख हसीना के समर्थकों के खिलाफ़ हमले बताकर उन्हें दबाने की कोशिश कर रहा है।”

न्यूयॉर्क टाइम्स ने इस विरोध के बाद यह हेडलाइन चुपके से बदल दी और बदले की बात हटा दी। न्यूयॉर्क टाइम्स ने इसके बाद इस हेडलाइन में लिखा, ”प्रधानमंत्री के जाने के बाद बांग्लादेश में हिंदुओं पर हमले।” जहाँ हेडलाइन बदल गई है, इसके अंदर के तर्क अब भी हिन्दू विरोधी ही हैं।

स्क्रॉल ने हिन्दुओं पर हमले को बताया उनकी ही गलती

जहाँ एक ओर न्यू यॉर्क टाइम्स ने हिन्दुओं पर हमले को राजनीतिक बदला सिद्ध करने की कोशिश की तो वहीं भारतीय वामपंथी मीडिया पोर्टल स्क्रॉल ने इस्लामी कट्टरपंथियों की हिंसा को सही ठहराने की कोशिश की। स्क्रॉल ने एक लेख में इस हिंसा का जिम्मेदार भारत के हिन्दुओं को बताने की कोशिश की। स्क्रॉल में गुरुवार (8 अगस्त, 2024) को नीलाद्रि चटर्जी, मुहम्मद आसिफुल बसर और एरिल्ड एनजेल्सन ने यह लेख लिखा है।

इस लेख में इन्होंने लिखा, “सत्ता सफलतापूर्वक उखाड़ फेंकने के बाद भी, तानाशाह अवामी लीग सरकार के खिलाफ़ गुस्सा हिंसक घटनाओं के रूप में बाहर निकल रहा है। यह कोई आश्चर्यजनक बात नहीं है, क्योंकि किसी भी विद्रोह के बाद किसी न किसी तरह की हिंसा होती है, बांग्लादेश कोई अपवाद नहीं है।” स्क्रॉल ने यह लिख स्पष्ट कर दिया कि हर सत्ता के पलटने के बाद हिंसा होती ही है कि वह हिंसा को असामान्य चीज नहीं मानता।

हिंसा को सही ठहराने के बाद स्क्रॉल ने इसका दोष भारतीय हिन्दुओं पर मढ़ा। स्क्रॉल ने दावा किया कि भारतीय मीडिया में मौजूद दक्षिणपंथी बांग्लादेश में हिन्दुओं के विरुद्ध हिंसा की खबरें दिखा कर स्थिति को बिगाड़ रहे हैं। यानी जो हिंसा इस्लामी कट्टरपंथी और जमात के लोग कर रहे हैं, उसके लिए भी हिन्दू जिम्मेदार हैं।

जब इतने से भी स्क्रॉल का मन नहीं भरा तो उसने यह भी बताया कि कैसे कट्टरपंथी अच्छे लोग हैं और उनकी गलत तस्वीर भारत में पेश की जा रही है। स्क्रॉल ने यहाँ मंदिरों के बाहर कथित तौर पर मानव श्रृंखला बनाने वाले मुस्लिमों का उदाहरण दिया।

कुल मिलाकर स्क्रॉल यह कहना चाहता है कि हिंसा होती ही है और बांग्लादेश में हो रही हिंसा कोई अलग चीज नहीं। दूसरा उसने हिन्दुओं पर हमले को धार्मिक आधार पर ना बताकर यह सिद्ध करना चाहा कि यह हमले आवामी लीग का समर्थक होने को लेकर हो रहे हैं। इसके बाद उसने यह भी बता डाला हिन्दुओं पर हमले इसलिए हो रहे हैं क्योंकि दंगाई लूट करना चाहते हैं।

बांग्लादेश में हिन्दुओं पर हो रहे हमलों पर लीपापोती करने और उन्हें ही अपराधी सिद्ध करने देने की यह बात कोई नई नहीं है। इससे पहले भी कई बार ऐसा ही हो चुका है। वामपंथी मीडिया ने इससे पहले 2023 में हरियाणा के नूंह में हिन्दू यात्रा पर मुस्लिमों के हमले का दोष भी हिन्दुओं पर मढ़ दिया था। वामपंथी मीडिया ने बताया था कि मुस्लिमों ने हमला इसलिए किया क्योंकि हिन्दू यहाँ मंदिर में जल चढाने आए थे, जो उन्हें नहीं करना चाहिए था, क्योंकि यह एक ‘मुस्लिम एरिया’ था।