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₹10 लाख का बॉन्ड, देश छोड़ने पर रोक, पासपोर्ट करना होगा सरेंडर… मनीष सिसोदिया को सुप्रीम कोर्ट ने दी जमानत, दिल्ली शराब घोटाले में AAP नेता की हुई थी गिरफ्तारी

सुप्रीम कोर्ट ने आम आदमी पार्टी नेता और विधायक मनीष सिसोदिया को दिल्ली शराब घोटाला मामले में जमानत दे दी है। सुप्रीम कोर्ट ने मनीष सिसोदिया को प्रवर्तन निदेशालय (ED) और केन्द्रीय जाँच एजेंसी (CBI), दोनों के मामले जमानत दे दी है। मनीष सिसोदिया को यह जमानत मुकदमे में देरी के आधार पर दी गई है।

सुप्रीम कोर्ट की बीआर गवई और केवी विश्वनाथन सदस्यता वाली बेंच ने शुक्रवार (9 अगस्त, 2024) को मनीष सिसोदिया की जमानत याचिका पर निर्णय सुनाया। इससे पहले यह निर्णय अगस्त को सुरक्षित रख लिया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को सुनवाई करते हुए दिल्ली हाई कोर्ट के जमानत ना देने के फैसले को रद्द कर दिया और मनीष सिसोदिया को जमानत दे दी।

सुप्रीम कोर्ट ने मनीष सिसोदिया को ED और CBI दोनों मामलों में जमानत दी है। उन्हें जमानत के लिए ₹10 लाख का बॉन्ड भरना होगा। इसके साथ ही उनके देश छोड़ने पर भी कोर्ट ने रोक लगा दी है। उन्हें अपना पासपोर्ट भी जमा करना होगा। मनीष सिसोदिया को हर सप्ताह दो बार पुलिस के सामने हाजिरी लगानी पड़ेगी।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मनीष सिसोदिया के मामले में मुकदमा तेज नहीं चला और यह उनके अधिकारों का हनन है। सुप्रीम कोर्ट ने इसी आधार पर उन्हें जमानत दे दी। कोर्ट ने कहा कि इस मुकदमे के जल्द पूरे होने के आसार नहीं है, ऐसे में मनीष सिसोदिया को जमानत मिलनी चाहिए।

मुकदमे के देरी को लेकर ED ने सुप्रीम कोर्ट में दलील दी कि यह मनीष सिसोदिया की वजह से हुई है। मनीष सिसोदिया ने इस मामले में कई याचिकाएँ लगाई, जिसके कारण मामला आगे नहीं बढ़ सका। हालाँकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को मानने से इनकार कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मनीष सिसोदिया की कोई भी याचिका निचली अदालत द्वारा गलत नहीं ठहराई गई है।

सुप्रीम कोर्ट में ED ने सुनवाई के दौरान माँग की कि मनीष सिसोदिया को दिल्ली सचिवालय या भी दिल्ली के मुख्यमंत्री दफ्तर में जाने से रोका जाए। हालाँकि, सुप्रीम कोर्ट ने ED की यह दलील नहीं मानी। कोर्ट ने कहा कि मामले में सबूत जमा हो चुके हैं, इसलिए उनसे छेड़छाड़ होने की संभावना नहीं है। ED ने कहा है कि हम कोर्ट के पास वापस सबूतों से छेड़छाड़ के मामले में आ सकते हैं। मनीष सिसोदिया की रिहाई शुक्रवार शाम तक हो सकती है।

गौरतलब है कि दिल्ली के तत्कालीन उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया को ED ने दिल्ली शराब घोटाला मामले में गिरफ्तार कर लिया था। वह तब से जेल में बंद हैं। इस बीच उन्हें मेडिकल आधार पर अंतरिम जमानत मिल चुकी है। दिल्ली शराब घोटाला में एजेंसियों का आरोप है कि दिल्ली सरकार ने शराब नीति बदल कर निजी डीलरों को फायदा पहुँचाया। इसके बदले में उनसे पैसे लिए गए और इसका इस्तेमाल गोवा चुनाव में किया।

दिल्ली के दरियागंज से पकड़ा गया ISIS आतंकी रिजवान अली, 15 अगस्त से पहले बड़े हमले की फिराक में था: VIP इलाकों की रेकी कर ली थी पूरी

दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने 15 अगस्त 2024 से पहले एक आईएस आतंकी को गिरफ्तार किया है। आतंकी का नाम रिजवान अली है। रिजवान दिल्ली के दरियागंज इलाके का रहने वाला है। पुलिस का कहना है कि रिजवान इस स्वतंत्रता दिवस से पहले किसी बड़ी आतंकी घटना को अंजाम देने की फिराक में था, लेकिन सही समय पर उसे पकड़ लिया गया।

जानकारी के मुताबिक, दिल्ली पुलिस लंबे समय से रिजावन की तलाश कर रही थी। राष्ट्रीय जाँच एजेंसी ने इसके और इसके साथियों के ऊपर तीन लाख रुपए का इनाम रखा हुआ था। स्पेशल सेल ने पुरानी दिल्ली दरियागंज के पास से इसे गिरफ्तार किया है और कुछ हथियार भी बरामद किया है, जिसमें पिस्टल शामिल है।

बताया जा रहा है कि रिजवान ने दिल्ली के कुछ वीआईपी इलाकों की रेकी की हुई थी। उसका मकसद किसी बड़ी आतंकी घटना को अंजाम देने का था। अब गिरफ्तारी के बाद उसके ऊपर यूएपीए के तहत केस दर्ज करके रिजवान के नेटवर्क का पता लगाने का प्रयास हो रहा है।

गौरतलब है कि रिजवान अली, पुणे आईएसआईएस मॉड्यूल में कुख्यात आतंकियों में शामिल था। दिल्ली पुलिस को उसके दरियागंज में होने की जानकारी मिली थी। अब पुलिस उसे पकड़कर उससे से पूछताछ में लगी है। गिरफ्तारी के दौरान उसके पास से हथियार बरामद हुए हैं।

रिजवान के पकड़ में आने से पहले साल 2023 के सितंबर-अक्टूबर में पुलिस ने उसी के साथी आतंकी शहनवाज को गिरफ्तार किया था। वांटेड लिस्ट में शामिल अब्दुल डायपरवाला अब भी फरार है।

भारत और हिंदू घृणा में सना मौलाना भी बांग्लादेश की अंतरिम सरकार में, तालिबान जैसा शासन चाहता है हिफाजत-ए-इस्लाम: क्या कट्टरपंथ की आग बुझा पाएँगे मोहम्मद युनुस?

भारत के पड़ोसी देश बांग्लादेश में प्रधानमंत्री शेख हसीना के तख्तापलट के बाद अब नई अंतरिम सरकार का गठन हो गया है। इसके मुखिया बांग्लादेश की ग्रामीण बैंक के संस्थापक मोहम्मद युनुस को बनाया गया है। इस सरकार में 16 अन्य सदस्यों को शामिल किया गया है। बांग्लादेश की नई अंतरिम सरकार में शामिल किए जाने वाले 16 सदस्यों में पूर्व की जमात-ए-इस्लामी सरकार के करीबियों से लेकर कट्टरपंथी मौलानाओं को जगह दी गई है।

बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के गठन के पहले और वर्तमान में लगातार हिन्दुओं के खिलाफ इस्लामी कट्टरपंथी हिंसा कर रहे हैं। बांग्लादेश के अलग-अलग इलाकों में मंदिरों को तोड़ा और जलाया गया है। हिन्दुओं की हत्याएँ भी हुई हैं। उनके घर तोड़े और लूटे गए हैं। इसके अलावा महिलाओं से बलात्कार भी हुए हैं।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के नए मुखिया मोहम्मद युनुस को बधाई दी है। उन्होंने इसी के साथ बांग्लादेश में हिन्दुओं और अन्य अल्पसंख्यक समुदायों की सुरक्षा की आशा जताई है। पीएम मोदी ने बांग्लादेश के लोगों की भलाई की लिए मिलकर काम करने का भरोसा दिया है।

बांग्लादेश की अंतरिम सरकार में प्रोफ़ेसर युनुस के अलावा डॉ सलेहुद्दीन अहमद, AF हसन आरिफ, ब्रिगेडियर सखावत हुसैन, तौहीद हुसैन, फरीदा अख्तर, शर्मीन मुर्शीद, सैयदा रिजवाना हसन, नूरजहाँ बेगम, डॉ आसिफ नजरुल, आदिलुर रहमान खान, बिधान रंजन रॉय, फारुक आजम, सुप्रदीप चकमा, AFM खालिद हुसैन, नाहिद इस्लाम और आसिफ महमूद को शामिल किया गया है। इस सरकार के सदस्यों में सबसे अधिक चिंताएँ AFM खालिद हुसैन के शामिल किए जाने पर बढ़ी हैं।

कौन है AFM खालिद हुसैन?

बांग्लादेश की अंतरिम सरकार में अबुल फैयाज मोहम्मद खालिद हुसैन को भी सलाहकार बनाया गया है। AFM खालिद हुसैन एक इस्लामी कट्टरपंथी देवबंदी मौलाना है। AFM खालिद हुसैन हिफाजत-ए-इस्लाम बंगलादेश नाम के एक संगठन से जुड़ा हुआ है। यह संगठन हिन्दू और भारत विरोधी रवैया अपनाता आया है। हिफाजत-ए-इस्लाम संगठन बांग्लादेश को तालिबान शासित अफगानिस्तान की तरह बनाना चाहता है। यह संगठन हिन्दू विरोधी हिंसा में लिप्त रहा है।

AFM खालिद हुसैन हिफाजत-ए-इस्लाम का उपाध्यक्ष रहा है। वह 2020-2021 के बीच इस संगठन का उप-मुखिया था। AFM खालिद हुसैन का यह संगठन अपने हिन्दू विरोधी रवैये के लिए जाना जाता रहा है। इस संगठन ने लगातार हिन्दू विरोधी हिंसा को अंजाम दिया है। इसके सदस्य हिन्दू मंदिरों पर हमला करते रहे हैं। यह संगठन भारत विरोधी भी है। यह संगठन लगातार बांग्लादेश में कट्टरपंथी इस्लाम लाने की वकालत करता रहा है।

हिन्दू विरोधी हिंसा में लिप्त रहा है हिफाजत-ए-इस्लाम

जिस संगठन के पूर्व उपाध्यक्ष AFM खालिद हुसैन को युनुस सरकार में जगह दी गई है, वह 2021 में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के बांग्लादेश दौरे पर हिन्दू विरोधी हिंसा कर रहा था। इस दौरान इसके सदस्यों ने बांग्लादेश में हिन्दू मंदिरों पर हमले किए थे। इसके अलावा इन्होने सड़कों पर काफी उत्पात मचाया था। हिफाजत-ए-इस्लाम के सदस्यों ने बांग्लादेश की सड़कों पर डायरेक्ट एक्शन डे के लिए नारे लगाए थे। उनका कहना था कि बांग्लादेश में 1946 जैसा डायरेक्ट एक्शन डे होना चाहिए जिसमें हिन्दुओं का नरसंहार हुआ था।

इस हिंसा के बाद हिफाजत-ए-इस्लाम के नेता ममनूल हक़ को शेख हसीना सरकार ने गिरफ्तार किया था। हक़ के ऊपर आरोप था कि उसने पीएम मोदी के दौरे के दौरान हिंसा भड़काई और तोड़फोड़ करवा कर बांग्लादेश को अस्थिर करने का प्रयास किया। हक़ ने पूछताछ में खुलासा किया था कि उसके संगठन के लोग शेख हसीना सरकार को सत्ता से हटाकर एक तालिबानी सरकार बांग्लादेश में लाना चाहते थे। हक़ और उसके संगठन के लोग ऐसे कार्यक्रम आयोजित करते थे, जहाँ मुस्लिमों को हथियार उठाने के लिए भड़काया जाता था।

हिफाजत-ए-इस्लाम से जुड़ा एक और मौलाना रफीकुल इस्लाम मदनी भी हिन्दू और भारत विरोधी जहर उगलता रहा है। उसने भी 2021 में पीएम मोदी की यात्रा के दौरान लोगों को भड़काया था। उसका आरोप था कि शेख हसीना की सरकार को हिंदुत्व वाली विचारधारा भारत से चला रही है। उसने एक वीडियो मैसेज जारी करके बांग्लादेशी मुस्लिमों को दिल्ली पर कब्जा करने का सन्देश दिया था। उसने कहा था कि बांग्लादेशी पीएम मोदी को रोकने के लिए शहीद भी हो जाएँगे।

युनुस सरकार को लेकर बढ़ी चिंताएँ

बांग्लादेश में शेख हसीना सरकार के विरुद्ध चालू हुई हिंसा उनके इस्तीफे के बाद हिन्दू विरोधी हिंसा में बदल गई है। लगातार हिन्दुओ पर अत्याचार हो रहा है। इस्लामी कट्टरपंथी उनको प्रताड़ित कर रहे हैं। स्थितियाँ इतनी बिगड़ी हैं कि पीएम मोदी को अलग से हिन्दुओ की सुरक्षा की अपील नई बांग्लादेशी सरकार से करनी पड़ी है।

इस बीच अंतरिम सरकार में इस्लामी कट्टरपंथी मौलाना को शामिल किया जाना इस सरकार की मंशा पर सवाल खड़े करता है। यह मौलाना उसी सोच का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिसमें मुस्लिमों के अलावा बाकी धर्मों के लोगों को काफिर की संज्ञा दी गई है।

₹1 लेकर जिन्होंने पाकिस्तान को दुनिया के सामने किया चित, अब वे CAS में लड़ेंगे ओलंपिक मेडल पाने की लड़ाई: क्या विनेश फोगाट को मिलेगा सिल्वर?

पेरिस ओलंपिक में भारतीय पहलवान विनेश फोगाट के साथ 50 किग्रा वर्ग कुश्ती के फाइनल में पहुँचने के बाद जो कुछ भी हुआ उस मामले को अब भारत के सबसे टॉप वकीलों में से एक वकील हरीश साल्वे देखेंगे। जानकारी आई है कि हरीश CAS (कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन फॉर स्पोर्ट्स) में विनेश फोगाट और भारतीय ओलंपिक संघ का प्रतिनिधित्व करेंगे।

भारतीय समय के अनुसार यह सुनवाई दोपहर 1:30 बजे से होनी है। बताया जा रहा है कि केस का फैसला भी आज ही आ सकता है। किसी खास वजह से अगर मामले में और सुनवाई की ज़रूरत होगी तो आगे की तारीख दी जा सकती है।

हरीश साल्वे ने न्यूज एजेंसी एएनआई से इस बात को कंफर्म किया कि उन्हें भारतीय ओलंपिक संघ ने विनेश फोगाट के केस के लिए उन्हें नियुक्त किया है।

उल्लेखनीय है कि इससे पहले विनेश फोगाट मामले की सुनवाई 8 अगस्त को ही होनी थी मगर भारतीय टीम की ओर से केस के लिए वकील नियुक्त करने के लिए वक्त माँगा गया था। अब आज यह निर्णय लिया गया कि ये केस हरीश साल्वे लड़ेंगे।

बता दें कि विनेश फोगाट के ओवरवेट के कारण उन्हें ओलंपिक फाइनल से डिस्क्वालिफाई करने की बात सामने आई थी। बताया गया था कि फाइनल के वक्त उनका वजन 100 ग्राम से ज्यादा मिला जिसके बाद उन्होंने दूसरी बार वजन के लिए अपील की लेकिन उसे खारिज कर दिया गया, लेकिन अब कहा जा रहा है कि इस मामले में उन्हें सिल्वर मेडल मिल सकता है।

फिलहाल पेरिस में पेरिस के चार वकील वर्तमान में विनेश का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं, मगर हरीश साल्वे की भागीदारी के साथ, भारतीय ओलंपिक संघ को अनुकूल नतीजे मिलने की उम्मीद है। साल्वे भारत के वही वकील हैं जिन्होंने इंटरनेशनल कोर्ट में भारत की ओर से कुलभूषण जाधव का केस लड़ा था। वो केस साल्वे ने महज एक रुपए में लड़ा था। अपनी दलीलों से उन्होंने इंटरनेशनल कोर्ट में पाकिस्तान को मात देने में सफलता हासिल की थी।

पेरिस ओलंपिक में बेटे ने जीती चाँदी, माँ ने जीता दिल: कहा- जो सोना ले गया वो भी हमारा लड़का, पिता बोले- 2028 के लिए फिर से तैयारी करके जाना

पेरिस ओलंपिक 2024 में भाला फेंक प्रतियोगिता में नीरज चोपड़ा ने एक बार फिर देश का नाम रौशन किया है। उन्होंने फाइनल मैच में 89.45 मीटर का थ्रो फेंककर अपने खाते में सिल्वर मेडल हासिल किया। वहीं गोल्ड इस बार पाकिस्तान के अरशद नदीम के हिस्से आया जिन्होंने 92.97 मीटर की थ्रो की थी।

नीरज चोपड़ा ने चाँदी जीतने पर कहा, “जब भी हम देश के लिए पदक जीतते हैं तो हम सभी खुश होते हैं…अब खेल को बेहतर बनाने का समय आ गया है…हम बैठकर चर्चा करेंगे और प्रदर्शन में सुधार करेंगे…भारत ने (पेरिस ओलंपिक में) अच्छा खेला…प्रतियोगिता अच्छी थी (आज)…लेकिन हर एथलीट का अपना दिन होता है, आज अरशद का दिन था…मैंने अपना सर्वश्रेष्ठ दिया लेकिन कुछ चीजों पर ध्यान देने और काम करने की जरूरत है…हमारा राष्ट्रगान आज भले ही नहीं बजाया गया हो, लेकिन भविष्य में यह कहीं और जरूर बजाया जाएगा…।”

वहीं इस जीत के बाद नीरज चोपड़ा के माता-पिता ने भी इस जीत पर प्रतिक्रिया दी जिसे सुनकर देश का हर शख्स गौरवान्वित है। नीरज की माँ से जब पेरिस ओलंपिक में उनके बेटे के प्रदर्शन पर पूछा गया तो उन्होंने कहा, ”हम बहुत खुश हैं। हमें तो सिल्वर भी गोल्ड जैसा लग रहा है।”

पत्रकार ने जब अरशद नदीम के बारे में बात की तो उन्होंने जवाब देते हुए कहा, ”कोई बात नहीं जी, जो गोल्ड ले गया है वो भी हमारा लड़का है। मेहनत करके हासिल किया है। हर खिलाड़ी का दिन होता है। वह चोटिल था, इसलिए हम उसके प्रदर्शन से खुश हैं। जब वो आएगा तो मैं उसका पसंदीदा खाना बनाऊँगी।”

वहीं इस मामले पर नीरज चोपड़ा के पिता ने कहा, “नीरज ने मेहनत की है उसने सिल्वर मेडल जीता है यह पूरे देश के लिए बड़ी खुशी के पल हैं। उसको ग्रोइंग इंजरी थी मुझे लगता है कि उसी की वजह से फाउल होते चले गए। ओलंपिक के बाद अपना इलाज करवा कर 2028 ओलंपिक के लिए तैयार हो जाएगा। हमें ऐसी उम्मीद है कि वह ऐसे ही शानदार परफॉर्म करता रहेगा। विनेश फोगाट ने सिल्वर के लिए अप्लाई डाली हुई है मुझे लगता है कि वह अपील कामयाब हो जाएगी और उन्हें सिल्वर मेडल मिलना चाहिए नीरज को यही कहना चाहूँगा कि अपना 100% देना और 2028 के लिए फिर से तैयारी करके जाना।”

अरशद नदीम पर नीरज के पिता ने कहा “हर खिलाड़ी का दिन होता है उसका लक होता है, उसने जो प्रैक्टिस की अपने देश के लिए उसने अपने देश के लिए जीता है वह उसकी मेहनत का है। अगर किसी खिलाड़ी को इंजरी होती है तो तभी फाउल होता है मुझे लगता है इंजरी की वजह से कोई फर्क है। दो-तीन दिन नीरज से कोई बात नहीं होगी उसके बाद देखते हैं।”

बता दें कि नीरज चोपड़ा ने इससे पहले टोक्यो ओलंपिक में गोल्ड मेडल जीता था। उस समय भी अरशद नदीम और नीरज चोपड़ा खूब चर्चा में आए थे। हालाँकि उस टाइम नीरज ने मीडिया में सामने आकर सारे सवालों के जवाब दिए थे। वहीं अरशद नदीम ने भी अपनी हार पर पाकिस्तान में मिल रही कम सुविधाओं की बात कही थी। उन्होंने कहा था, “दी गई सुविधाओं के साथ, हम केवल दिल जीत सकते हैं, पदक नहीं।” उन्होंने ये भी बताया कि कैसे पाकिस्तानी सरकार सिर्फ क्रिकेट की दीवानी है इसलिए वह अन्य खेलों पर ध्यान भी नहीं देते।

भारत में रहने वाले सभी लोग यहाँ के मूलनिवासी: शूद्रों यानी ‘दास-दस्यु’ और ‘सबसे निचले पायदान’ वाले नैरेटिव पर डॉ अम्बेडकर का फैक्ट-चेक

चूँकि विश्व मूलनिवासी दिवस- जो कि प्रत्येक वर्ष 9 अगस्त को मनाया जाता है- भारत में शुरुआत से ही एक विवादित, परंतु अज्ञात विषय रहा है। इसलिए यह हमें इस बात की जाँच करने के लिए प्रेरित करता है कि ‘मूलनिवासी’ कौन थे और उनकी उत्पत्ति भारतीय समाज में कैसे हुई? इस संदर्भ में, डॉ बीआर अम्बेडकर से बेहतर कोई नाम नहीं हो सकता। इन्होंने अपने लोकप्रिय पुस्तक, ‘शूद्र कौन थे? – वे इंडो-आर्यन समाज में चौथे वर्ण कैसे बने’ में अत्यंत वैज्ञानिक और विस्तृत तरीके से इसका विश्लेषण किया है।

पहली बार 1946 में प्रकाशित यह पुस्तक, मुख्य रूप से हिंदू समाज के चौथे वर्ण के रूप में शूद्रों की उत्पत्ति पर आलोचनात्मक प्रकाश डालती है। पुस्तक इस तथ्य पर ध्यान केंद्रित करती है कि कैसे ‘जाति की समस्या’ सामाजिक संगठन और संरचना निर्धारण करने में एक प्रभुत्वशाली कारक बन गई।

महार समुदाय में जन्म और बचपन से ही जातिवाद का कड़वा अनुभव होने के कारण, डॉ अंबेडकर ने ऐतिहासिक साक्ष्यों के आलोक में ‘जाति-समस्या’ की जाँच की और प्रमाणित किया कि कैसे जाति सामाजिक कार्रवाई का मूलभूत मापदंड बन गई। अपने गहन अध्ययन के आधार पर वह दावा करते हैं कि मूल रूप से शूद्र इंडो-आर्यन समाज में क्षत्रिय थे, जो ब्राह्मणवादी कानूनों की गंभीरता के कारण समय के साथ इतने अपमानित हो गए कि वो लोग सार्वजनिक जीवन में वास्तव में बहुत निम्न दर्जे पर पहुँच गए।

आर्यन आक्रमण सिद्धांत और डॉ अम्बेडकर

अपने सिद्धांत को सिद्ध करने के लिए, डॉ अम्बेडकर ने विभिन्न ब्राह्मणवादी विद्वानों और लेखकों का अध्ययन  किया, लेकिन उन्हें हिंदू समाज के चौथे वर्ण के रूप में शूद्रों की उत्पत्ति के लिए हिंदू धर्मग्रंथों और साहित्य में कोई उल्लेख नहीं मिला। फलस्वरूप, उन्हें पश्चिमी-यूरोपीय दार्शनिकों द्वारा स्थापित आर्य-आक्रमण सिद्धांत का उल्लेख करना पड़ा।

आर्य आक्रमण सिद्धांत के अनुसार, आर्य वे हैं जिन्होंने वेदों की रचना की, और बाहर से आकर भारत पर आक्रमण किया और स्थानीय लोगों पर अपना वर्चस्व स्थापित किया। स्थानीय लोगों को यूरोपीय लोग मूल निवासी, दास-दस्यु मानते थे। श्वेत रंग की सर्वोच्चता में विश्वास करते हुए उन्होंने दावा किया कि आर्य श्वेत नस्ल के थे, जबकि दास-दस्यु काले रंग के थे।

आर्यों ने श्वेत रंग को प्राथमिकता दी और चतुर्वर्ण व्यवस्था बनाई। इसमें शूद्रों यानी ‘दास-दस्यु’ को अलग कर व्यवस्था में सबसे निचले पायदान पर रखा गया। आर्यन आक्रमण सिद्धांत, पश्चिमी लेखकों द्वारा भारत पर पश्चिम की वरीयता/सर्वोच्चता स्थापित करने के उद्देश्य से किया गया। उनका कुतर्क था कि भारत के लोग अज्ञानी-अंधविश्वासी रहे हैं और पश्चिम के लोग ज्ञानी हैं, जिन्होंने वेदों की रचना की।

डॉ बीआर अम्बेडकर ने ‘आर्यन आक्रमण सिद्धांत’ का पूरी तरह से खंडन किया और अपने विश्लेषण से इस तथ्य को स्थापित किया कि भारत में रहने वाले सभी लोग आर्य हैं और वे (आर्यन) बाहर से आई कोई जाति नहीं हैं। इस संबंध में, उन्होंने सबसे पहले वेदों, मुख्य रूप से ऋग्वेद का उल्लेख किया। जिससे पता चलता है कि ऋग्वेद में कई स्थानों पर आर्य शब्द का प्रयोग किया गया है, जिसके अलग-अलग अर्थ हैं जैसे, सम्माननीय व्यक्ति, भारत का नाम, नागरिक या शत्रु आदि। लेकिन कहीं भी इसका प्रयोग जाति या नस्ल के तौर पर नहीं किया गया है।

ऋग्वेद का गहराई से अध्ययन करने के बाद, अम्बेडकर ने देखा कि आर्य आधिपत्य सिद्धांत और गैर-आर्यन प्रजातियों मतलब दास-दस्यु पर आधिपत्य स्थापित करने का कोई सबूत नहीं है, न ही दास-दस्यु कोई अलग जाति-प्रजाति है। दूसरा, उनका दावा है कि यदि त्वचा का रंग इंडो-आर्यन समाज में ‘चतुर्वर्ण-व्यवस्था’ या नस्ल वर्गीकरण का आधार था, तो हिंदू समाज के चार वर्गों (वर्णों) के लिए चार अलग-अलग रंग का उल्लेख होना चाहिए था। यहाँ आर्य-आक्रमण सिद्धांत अपनी वैधता और प्रामाणिकता स्थापित करने में विफल हो जाता है। इसके अलावा ऐसा कोई साक्ष्य नहीं है जो यह साबित कर सके कि आर्य, दास-दस्यु इंडो-आर्यन समाज में अलग-अलग नस्लें थीं।

शूद्र क्षत्रिय, ब्राह्मण और उपनयन संस्कार

किंतु यहाँ प्रश्न उठता है कि शूद्र कौन थे? इसका उत्तर देते हुए, डॉ अम्बेडकर कहते हैं कि शूद्र आर्य थे, जो हिंदू समाज के क्षत्रिय वर्ग से संबंधित थे। शूद्र क्षत्रियों का एक इतना महत्वपूर्ण हिस्सा था कि प्राचीन आर्य समुदायों के कुछ सबसे प्रतिष्ठित और शक्तिशाली राजा शूद्र थे। किंतु कालांतर में, ब्राह्मणों द्वारा क्षत्रियों के शूद्र कुल के ‘उपनयन संस्कार’ से इनकार ने उन्हें इंडो-आर्यन समाज में दूसरे से चौथे पायदान पर धकेल दिया।

शूद्र कुल के क्षत्रियों के ‘उपनयन संस्कार’ से इनकार का उद्भव ब्राह्मणों की प्रतिशोध की भावना से हुआ था, जो कुछ शूद्र राजाओं के अत्याचारों, उत्पीड़न और अपमान से कराह रहे थे। ब्राह्मणों द्वारा क्षत्रियों को उपनयन देने से इनकार का कानूनी या धार्मिक आधार नहीं था, बल्कि पूरी तरह से दोनों वर्णों के बीच राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता के कारण था।

डॉ अम्बेडकर द्वारा किया गया यह विश्लेषण स्पष्ट रूप से प्रदर्शित करता है कि यद्यपि हिंदू समाज सदियों से जाति या वर्ण के आधार पर विभाजित है, लेकिन तथ्य यह है कि भारत में रहने वाले सभी लोग मूलनिवासी और आर्य हैं।

डेमोग्राफी ही नहीं बदल रहे बांग्लादेशी घुसपैठिए, झारखंड में अफीम की खेती को भी दे रहे खाद-पानी: बोले बाबूलाल मरांडी- नशे से संथालों को बर्बाद करने की साजिश

झारखंड के संथाल परगना में बांग्लादेशी घुसपैठ का असर जनसांख्यिकी के अलावा कानून-व्यवस्था पर भी पड़ने लगा है। बांग्लादेशी घुसपैठिए इस इलाके में अफीम की खेती करवा रहे हैं। इसके लिए स्थानीय जनजातीय समुदाय को ढाल बनाया जा रहा है। इस अफीम की तस्करी भी हो रही है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, बांग्लादेशी तस्कर झारखंड के संथाल परगना के उन इलाकों में आते हैं जहाँ गरीब आबादी बसती है। इस इलाके में घुसने और आम ग्रामीणों से सम्पर्क साधने के लिए यह बांग्लादेशी यहाँ सामान बेचने वाला बन कर घुसते हैं। इसके बाद यह ग्रामीणों को अफीम की खेती के बारे में बताते हैं।

बताया गया कि यह बांग्लादेशी तस्कर ग्रामीणों को समझाते हैं कि अफीम की खेती कम इलाके में बहुत अच्छा फायदा देती है। ग्रामीण भी जल्दी पैसा कमाने की चाहत में अपनी जमीन अफीम खेती के लिए देने को तैयार हो जाते हैं। इसके बाद बांग्लादेशी घुसपैठिए इन्हें अफीम के बीज, खाद और कीटनाशक तक लाकर देते हैं।

फसल होने के बाद इस अफीम को भारत से तस्करी कर बांग्लादेश ले जाया जाता है। अफीम की कीमत विदेशी बाजारों में लाखों रूपए में है। अफीम की खेती से निकलने वाला पोस्ता दाना भी उपयोग में आता है। ग्रामीण भी इससे फायदा उठाते हैं।

यह धंधा लम्बे समय से चल रहा है। पुलिस जब सख्ती करती है तो इस इलाके में बांग्लादेशियों की गतिविधियाँ कुछ दिनों के लिए रुक जाती हैं। जैसे ही पुलिस अपनी कार्रवाई कम करती है, यह बांग्लादेशी दोबारा से अपना धंधा चालू कर देते हैं। इन जिलों में अफीम की खेती का दायरा इतना बढ़ चुका है कि 2009 में सैटेलाईट से इनकी ट्रैकिंग करवाई गई थी।

यह तस्कर पश्चिम बंगाल और झारखंड में सीमा पार करते रहते हैं और इस खेती को बढ़ाते हैं। हाल ही में झारखंड के चाईबासा लगभग ₹6 करोड़ की अफीम जब्त की गई थी। झारखंड के ही चतरा में 2023 में केवल जून माह तक ही 125 गाँवों में अफीम की खेती की बात सामने आई थी।

बताया जा रहा है कि अवैध अफीम का यह कारोबार ₹100 करोड़ का है। झारखंड में सैटेलाईट से नजर रखे जाने के बाद इस इलाके में कुछ सफलता मिली है। हालाँकि, सीमाई इलाकों में अब भी कहीं कहीं अफीम उगा कर बेचीं जा रही है।

गौरतलब है कि संथाल परगना में बांग्लादेशी घुसपैठ एक बड़ा मुद्दा है। इस मुद्दे को लगातार विपक्ष उठा भी रहा है। हाल ही में झारखंड हाई कोर्ट ने इस पर सख्त रुख अपनाते हुए कहा था कि सरकार जल्द से जल्द सभी बांग्लादेशियों की पहचान करके उनको बाहर निकाले। कोर्ट के इस फैसले के बाद साहिबगंज जिला में एक कमिटी भी प्रशासन ने बनाई थी।

बांग्लादेशी घुसपैठ का असर चुनावों पर भी होने का असर है। भाजपा झारखंड ने हाल ही में एक रिपोर्ट राज्य चुनाव आयोग को सौंपी थी। इसमें कहा गया था कि राज्य के 1467 बूथ पर अप्रत्याशित ढंग से वोटों में बढ़ोतरी हुई है। यह बढ़ोतरी कुछ बूथ पर 100% से अधिक है।

झारखंड में अफीम की खेती को लेकर भाजपा प्रदेश अध्यक्ष बाबूलाल मरांडी ने भी चिंता जताई है। उन्होंने कहा है कि इससे संथाल परगना के युवाओं को नशे में फंसा बर्बाद करने की साजिश हो रही है। उन्होंने झारखंड की हेमंत सोरेन सरकार पर इस मामले में ढिलाई बरतने का आरोप लगाया है।

नोबेल पुरस्कार विजेता मुहम्मद यूनुस बने बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के प्रमुख, 2 प्रदर्शनकारी छात्र नेता भी शामिल: जानिए इस अर्थशास्त्री के हसीना से रिश्ते

बांग्लादेश में जारी हिंसा के बीच वहाँ की सेना ने अंतरिम सरकार का गठन कर दिया है। नोबेल पुरस्कार विजेता मुहम्मद यूनुस ने गुरुवार (8 अगस्त 2024) को अंतरिम सरकार के प्रमुख के रूप में शपथ ली। वे 8 अगस्त को ही पेरिस से ढाका पहुँचे। अंतरिम सरकार का प्रमुख बनने के लिए विशेष तौर पर उन्हें बुलाया गया था। पीएम मोदी ने उन्हें शुभकामनाएँ दी हैं।

आरक्षण के खिलाफ जमात-ए-इस्लामी और छात्रों के हिंसक प्रदर्शन के बाद प्रधानमंत्री शेख हसीना ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया था। इसके साथ ही उन्होंने बांग्लादेश छोड़कर भारत आ गई थीं। इसके बाद बांग्लादेश की सेना ने वहाँ की व्यवस्था को अपने नियंत्रण में ले लिया था और अंतरिम सरकार बनाने की घोषणा की थी।

पीएम मोदी ने X पर लिखा, “प्रोफेसर मोहम्मद यूनुस को उनकी नई ज़िम्मेदारी संभालने पर मेरी शुभकामनाएँ। हम उम्मीद करते हैं कि जल्द ही सामान्य स्थिति बहाल हो जाएगी, जिससे हिंदुओं और अन्य सभी अल्पसंख्यक समुदायों की सुरक्षा सुनिश्चित होगी। भारत शांति, सुरक्षा और विकास के लिए दोनों देशों के लोगों की साझा आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए बांग्लादेश के साथ काम करने के लिए प्रतिबद्ध है।”

इस बीच पूरे बांग्लादेश में हिंसा का दौर जारी है। जमात के कट्टरपंथी तत्व हिंदुओं को निशाना बना रहे हैं। हिंदुओं की हत्या की जा रही है, उनके घरों एवं मंदिरों को जलाया जा रहा, संपत्तियों को लूटा जा रहा है और महिलाओं के साथ बलात्कार किया जा रहा है। हिंसा एवं उत्पीड़न से तंग होकर हिंदू बांग्लादेश छोड़कर भारत में घुसने की कोशिश कर रहे हैं।

अंतरिम सरकार के मुखिया मुहम्मद यूनुस ग्रामीण बैंक के संस्थापक और मशहूर सोशल एक्टिविस्ट हैं। उन्हें बांग्लादेश में बैंकों का जनक माना जाता है। देश में उन्होंने ग्रामीण बैंकों की पूरी श्रृंखला विकसित की है। उन पर श्रम कानून उल्लंघन का एक मामला भी चल रहा था, लेकिन कार्यभार संभालने से ठीक एक दिन पहले एक अदालत ने उनकी पिछली सजा को पलट दिया था।

मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व में बांग्लादेश की अंतरिम सरकार में 16 लोगों ने शपथ ली है। इनमें मोहम्मद नाहिद इस्लाम और आसिफ साजिब भुइयाँ भी शामिल हैं। ये दोनों वो छात्र नेता हैं, जिन्होंने बांग्लादेश में आरक्षण विरोधी प्रदर्शन का नेतृत्व का किया था। उन्होंने देश के लोगों से सुरक्षा का आश्वासन दिया है।

यूनुस ने कहा, “बांग्लादेश ने आज एक नया विजय दिवस स्थापित किया है। हमें उसे ध्यान में रखते हुए और मजबूत बनाते हुए आगे बढ़ना है। युवाओं ने इसे संभव बनाया है। इसके लिए मैं उनकी प्रशंसा करता हूँ और उन्हें धन्यवाद देता हूँ। इस देश पुनर्जन्म हुआ है। इस पुनर्जन्म में मुझे जो बांग्लादेश मिला है, वह बहुत तेजी से आगे बढ़ेगा ये हमारा वादा है।”

उधर, शेख हसीना के बेटे सजीब वाजेद ने राजनीति में लौटने का इशारा किया है। प्रतिक्रिया देते हुए वाजेद ने कहा, “मैंने कहा था कि मेरा परिवार अब राजनीति में शामिल नहीं होगा, लेकिन जिस तरह से हमारी पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं पर हमले हो रहे हैं, हम हार नहीं मान सकते।”

कौन हैं मुहम्मद यूनुस

मोहम्मद यूनुस एक बैंकर और अर्थशास्त्री और नोबल पुरस्कार विजेता हैं। उनका जन्म 28 जून 1940 को अविभाजित भारत में हुआ था। वे बंगाल के चिटगाँव के जौहरी हाजी मोहम्मद सौदागर के घर पैदा हुए थे। शुरुआती शिक्षा के बाद उन्होंने ढाका यूनिवर्सिटी से अर्थशास्त्र की पढ़ाई की और उसके बाद अमेरिका चले गए। वहाँ अर्थशास्त्र में PhD करने के बाद वहीं इकोनॉमिक्स पढ़ाने लगे।

मुहम्मद यूनुस बांग्लादेश बनने के बाद स्वदेश लौटे। उन्होंने चिटगाँव यूनिवर्सिटी में अर्थशास्त्र विभाग के प्रमुख का पद संभाला। यूनुस ने कर्ज से दबे परिवारों को बाहर निकालने के लिए महिलाओं की स्वयं सहायता समूह बनाया, जो बेहद सफल रहा। यही आगे चलकर 1983 में ग्रामीण बैंक की नींव बना। इसकी सफलता के बाद अमेरिका ने भी इसे अपनाया है।

ग्रामीण बैंक की सफलता के बाद यूनुस ने 1997 में ग्रामीण फोन कंपनी की शुरुआत की। इस कंपनी ने बांग्लादेश में सबसे पहले प्रीपेड मोबाइल सेवाओं की शुरुआत की। आज ग्रामीण फोन बांग्लादेश की सबसे बड़ी मोबाइल नेटवर्क कंपनी है। इसका 48% बाजार पर कब्जा है और 8 करोड़ से अधिक ग्राहक हैं। यह सरकार को सबसे ज्यादा टैक्स देने वाली कंपनी है।

गरीबी मिटाने के लिए किए गए उनके कार्यों के लिए साल 2006 में ग्रामीण बैंक और मोहम्मद यूनुस को नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उस दौरान वे ग्रामीण बैंक से जुड़े हुए थे। इसके साथ ही वे बांग्लादेश में कई विकास परियोजनाओं में सलाहकार की हैसियत से अपनी सेवाएँ दे रहे थे।

राजनीति में कदम

18 फरवरी 2007 को यूनुस ने ‘नागरिक शक्ति’ नाम से एक राजनीतिक पार्टी बनाई। उन्होंने कहा कि वे इस पार्टी में साफ-सुथरी छवि वाले लोगों को ही शामिल करेंगे। इनमें प्रोफेसर, पत्रकार जैसे चर्चित चेहरे थे। यूनुस का इरादा 2008 का चुनाव लड़ने का था। इसके बाद वे तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख हसीना की आँखों में खटकने लगे।

शेख हसीना ने यूनुस का नाम लिए बिना एक बार कहा था, “राजनीति में नए लोग अक्सर खतरनाक होते हैं। उन्हें संदेह की नजर से देखा जाना चाहिए। ये देश को फायदा पहुँचाने से अधिक नुकसान पहुँचाते हैं।” इस तानातनी के बाद मुहम्मद यूनुस ने पार्टी की स्थापना के सिर्फ 76 दिन बाद 3 मई को पार्टी छोड़ने का ऐलान कर दिया।

साल 2008 में सरकार बनाने के तुरंत बाद शेख हसीना ने यूनुस के पीछे जाँच एजेंसियों को लगा दिया। उन पर सरकार को बिना बताए विदेशों से पैसा लेने और टेलीकॉम नियम तोड़ने के आरोप लगाए गए। उन्हीं की कंपनी के स्टाफ ने यूनुस पर केस कर दिया। शेख हसीना आरोप लगाए कि यूनुस गरीबों को अधिक ब्याज पर कर्ज देते हैं।

भास्कर की रिपोर्ट के मुताबिक, मुहम्मद यूनुस तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख हसीना के पिता शेख मुजीबुर्रहमान के कट्टर समर्थक थे। टेनेसी में पढ़ाने के दौरान यूनुस ने बांग्लादेश के मुक्ति संग्राम के बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिए एक अखबार लॉन्च किया था। हालाँकि, पार्टी बनाने के बाद दोनों के बीच दुश्मनी हो गई। यह कहानी इंदिरा गाँधी और राजमाता गायत्री देवी की तरह है।

शेख हसीना के निशाने पर आने के बाद जनवरी 2024 में मुहम्मद यूनुस पर 100 से अधिक केस चल रहे थे। उन्हें भ्रष्टाचार के मामले में कोर्ट ने 6 महीने जेल की सजा सुनाई थी। हालाँकि, यह सजा अब पलट दी गई है। शेख हसीना को बांग्लादेश में लोकतंत्र का कातिल बताने वाले यूनुस का कहना है कि भारत की शह पर वह तानाशाह बनीं।

पेरिस ओलंपिक 2024 में पुरुष हॉकी टीम ने जीता कांस्य पदक, भारत की झोली में कुल 4 मेडल: इस जीत के साथ गोलकीपर श्रीजेश ने अंतरराष्ट्रीय खेलों से लिया संन्यास

पेरिस ओलंपिक 2024 में मेंस हॉकी में भारतीय टीम ने गुरुवार (8 अगस्त) को एक रोमांचक मुकाबले में स्पेन को हराकर ब्रॉन्ज (कांस्य) पदक जीता। हरमनप्रीत सिंह की अगुवाई में टीम इंडिया द्वारा इस उपलब्धि के बाद पेरिस ओलंपिक में भारत के खाते में अब कुल 4 मेडल हो चुके हैं। वहीं, भारतीय हॉकी के गोलकीपर श्रीजेश ने अंतरराष्ट्रीय हॉकी से संन्यास ले लिया।

कप्तान हरमनप्रीत सिंह की अगुवाई में टीम इंडिया ने स्पेन को 2-1 से हराकर ओलंपिक खेलों में लगातार दूसरी बार ब्रॉन्ज मेडल जीता है। इससे पहले टोक्यो ओलंपिक 2021 में जर्मनी को हराकर भारत ने कांस्य पदक जीता था। बता दें कि ओलंपिक में भारत ने मेंस हॉकी में आठ बार गोल्ड मेडल जीता है। वहीं, टीम का आखिरी गोल्ड रूस के मॉस्को ओलंपिक 1980 में मिला था।

पेरिस ओलंपिक में मुकाबले के दौरान भारत की ओर से कप्तान हरमनप्रीत सिंह ने 30वें और 33वें मिनट में दो गोल दागे। वहीं, स्पेन की ओर से मार्क मिरालेस ने 18वें मिनट में गोल किया। इस तरह भारत ने 2-1 के मुकाबले से यह प्रतियोगिता जीत ली। ओलंपिक 2024 में भारतीय हॉकी टीम को सेमीफाइनल मुकाबले में जर्मनी से हार का सामना करना पड़ा।

वहीं, सेमीफाइनल हारने के बाद भारतीय हॉकी टीम गोल्ड की दौड़ से बाहर हो गई। इस रोमांचक मुकाबले में जर्मनी ने भारत को 3-2 से हरा दिया था। जीत पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने टीम को बधाई दी है। अब भारत के खाते में कुल चार मेडल हैं। इससे पहले भारत को शूटिंग में 3 कांस्य पदक मिले हैं। 

इस उपलब्धि के बीच भारत के हॉकी टीम के अनुभवी कप्तान पीआर श्रीजेश ने अंतरराष्ट्रीय हॉकी से संन्यास लेने की घोषणा कर दी है। भारतीय हॉकी खिलाड़ियों ने श्रीजेश के सम्मान में झुककर अभिवादन किया। श्रीजेश के शानदार गोलकीपिंग की बदौलत भारतीय हॉकी टीम लगातार 2 ओलपिंक में 2 मेडल जीतने में कामयाब रही।

टोक्यो ओलंपिक 2021 में श्रीजेश के प्रदर्शन के दम पर भारत ने जर्मनी को हराकर 40 साल बाद ब्रॉन्ज मेडल जीता था। इससे पहले हॉकी टीम ने 1980 में ओलंपिक मेडल जीता था। 1972 के बाद पहली बार भारतीय हॉकी टीम ओलंपिक में लगातार 2 ब्रॉन्ज जीती है। इससे पहले 1968 और 1972 ओलंपिक में ऐसा हुआ था। 

ह्यूमन राइट्स वॉच की एशिया उपनिदेशक डाल रही हिंदुओं के नरसंहार पर पर्दा, बांग्लादेश में इस्लामी क्रूरता को बताया राजनीतिक मामला

बांग्लादेश में हिंदुओं पर अत्याचार जारी है, लेकिन लोगों का एक वर्ग हिंदू विरोधी नरसंहार को कमतर आँकने की कोशिश कर रहा है और इसे राजनीति से प्रेरित हिंसा बता रहा है। ह्यूमन राइट्स वॉच (HRW) की डिप्टी एशिया डायरेक्टर मीनाक्षी गांगुली ने कहा कि इस्लामवादियों द्वारा बांग्लादेश में की जा रही हिंसा राजनीतिक कारणों से हो रही है, ना कि हिंदुओं के खिलाफ नफरत की वजह से।

मीनाक्षी गांगुली ने बुधवार (7 अगस्त) को सोशल मीडिया साइट X (पूर्व में ट्विटर) पर लिखा, “बांग्लादेश में संगीतकार राहुल आनंदा के घर को हिंदू अल्पसंख्यकों पर हमलों की एक भयावह श्रृंखला में जला दिया गया, क्योंकि वे शेख हसीना की अवामी लीग पार्टी का समर्थन करते थे। अधिकारियों को कानून का शासन सुनिश्चित करना चाहिए और अपराधियों की पहचान करके उन पर मुकदमा चलाना चाहिए।”

जैसा कि पहले बताया गया था कि 5 अगस्त की दोपहर को गायक और बैंड जोलर गान के फ्रंटमैन राहुल आनंदा के घर एक इस्लामी भीड़ पहुँची और उन पर हमला किया। वह एक किराए के घर में रह रहे थे। जब हमला हुआ, तब राहुल अपनी पत्नी शुक्ला, बेटा तोता और परिवार के अन्य सदस्यों के साथ थे। अपने परिवार के साथ वहाँ से भागने में सफल रहे और एक अज्ञात स्थान पर शरण ली।

जिस घर में राहुल आनंदा रहते थे, वह 140 साल पुराना था। यह घर जलकर अब राख हो गया है और उसमें मौजूद सारी यादें और इतिहास भी जलकर राख हो गए हैं। उल्लेखनीय है कि साल 2019 में मीनाक्षी गांगुली ने दावा किया था कि कश्मीरी हिंदुओं को 1990 में संभवतः भारत सरकार द्वारा घाटी छोड़ने के लिए ‘कहा’ गया था।

यहाँ ध्यान देने वाली बात यह भी है कि गांगुली अकेली नहीं हैं, जो ये भयावह कहानी फैला रही हैं कि हिंदुओं, उनके मंदिरों और संपत्तियों पर इस्लामवादियों द्वारा हिंदुओं से नफरत के कारण हमला नहीं, बल्कि शेख हसीना की अवामी लीग के समर्थन का बदला लेने के लिए हमला किया जा रहा है। अमेरिका के प्रसिद्ध अखबार न्यूयॉर्क टाइम्स ने भी यही किया था।

हालाँकि, पाठकों से कड़ी प्रतिक्रिया मिलने के बाद अखबार ने प्रकाशित समाचार रिपोर्टों में से एक का शीर्षक बदल दिया। पहले, शीर्षक था ‘प्रधानमंत्री के हटने के बाद बांग्लादेश में बदला लेने के लिए हिंदुओं पर हमले’। सोशल मीडिया पर भारी आलोचना के बाद इसका शीर्षक बदल दिया गया है, लेकिन विषयवस्तु वही रही।

इस रिपोर्ट में कहा गया है कि बांग्लादेश में हिंदुओं को इसलिए निशाना बनाया जा रहा है, क्योंकि वे शेख हसीना की राजनीतिक पार्टी आवामी लीग का समर्थन करते हैं, ना कि सांप्रदायिक कारणों से उन पर हमला किया जा रहा है। हालाँकि, शेख हसीना की पार्टी का समर्थन करने के कारण भी हिंदुओं की हत्या करना, उनके घरों और मंदिरों को तोड़ना उचित नहीं है।

अगर मीनाक्षी गांगुली के तर्क को मान भी लिया जाए तो क्या मीनाक्षी गांगुली, ह्यूमन राइट्स वॉच, NYT और अन्य इस्लामिस्ट चीयरलीडर्स यह बताने में कोई आपत्ति करेंगे कि मृतक के निजी अंग की जाँच करना किसी की राजनीतिक संबद्धता कैसे निर्धारित करता है? इस तरह घटनाएँ राजनीतिक कारणों से नहीं, बल्कि धार्मिक नफरत के कारण से ही हो सकती हैं।

ऐसी एक घटना में इस्लामिस्टों ने जमीन पर पड़े एक मृत शव को घेर लिया। वहाँ कई लोग मृतक के चारों ओर जमा थे। एक इस्लामिस्ट ने छड़ी की सहायता से मृतक को नंगा कर दिया और उसके निजी अंग की जाँच की कि उसका खतना हुआ है या नहीं। जब इस्लामिस्टों ने देखा कि खतना नहीं हुआ तो उनकी खुशी की सीमा नहीं ही और वे ‘हिंदू, हिंदू’ चिल्लाने लगे।

यह घोर निंदनीय है कि तथाकथित मानवाधिकार रक्षक सांप्रदायिक रूप से प्रेरित हिंदू विरोधी हिंसा को राजनीतिक रंग देने की कोशिश कर रही हैं, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि कोई भी उनके इस्लामवादी आकाओं की आलोचना या सवाल न कर सके। बांग्लादेश में हिंदुओं पर हमले, हत्या, मंदिरों एवं घरों में तोड़फोड़, महिलाओं से बलात्कार की अनगिनत घटनाएँ सामने आ चुकी हैं।