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अजय बनकर इश्तियाक कुरैशी ने छत्तीसगढ़ की युवती को शादी का दिया झाँसा, रेप के बाद हुआ फरार: पुलिस ने कानपुर से दबोचा

छत्तीसगढ़ में नाम बदलकर एक हिंदू लड़की से रेप करने का मामला सामने आया है। उत्तर प्रदेश का रहने वाला इश्तियाक कुरैशी सोशल मीडिया पर अजय समरथ बनकर छत्तीसगढ़ की युवती से दोस्ती की। इसके बाद उसे अपने प्रेमजाल में फँसा लिया और शादी का झाँसा देकर उसके साथ रेप किया। पुलिस ने आरोपित को गिरफ्तार कर लिया है।

 मामला छत्तीसगढ़ के कोंडागाँव जिले के फरसगाँव थाना क्षेत्र का है। यहाँ की रहने वाली एक हिंदू पीड़िता ने बताया कि आरोपित इश्तियाक कुरैशी ने सोशल मीडिया साइट इंस्टाग्राम पर अजय समरथ के नाम से अपना अकाउंट बना रखा था। एक साल पहले एक दिन इश्तियाक ने उसे फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजा। युवती ने उसके रिक्वेस्ट को स्वीकार कर लिया।

इसके बाद इश्तियाक उसे अक्सर मैसेज करने लगा। उसने उसे अपने झाँसे में ले लिया। इश्तियाक ने लड़की फोन नंबर भी ले लिया और उससे बातें करने लगा। धीरे-धीरे उसने युवती पर डोरे डालते हुए कहा कि वह उससे प्रेम करता है। युवती उसे अजय समझते हुए उसकी बातों में आ गई। उसने मान लिया कि अजय बना इश्तियाक उससे शादी करेगा।

युवती ने बताया कि इश्तियाक कुरैशी अक्टूबर 2023 में उत्तर प्रदेश से छत्तीसगढ़ आया और उसे मिलने के लिए बुलाया। वहाँ इश्तियाक कुरैशी ने उससे शादी का वादा करके उसके साथ कई बार दुष्कर्म किया। इतना ही नहीं, युवती से संबंध बनाने के बाद इश्तियाक कुरैशी फरार हो गया और उसने अपना संबंध खत्म कर लिया।

बाद में खोजबीन करने पर युवती को पता चला कि अजय का असली नाम इश्तियाक कुरैशी है। इसके बाद उसने फरसगाँव पुलिस थाने में जाकर अपनी शिकायत दर्ज कराई। शिकायत के आधार पर पुलिस ने इश्तियाक कुरैशी के खिलाफ मामला दर्ज करके जाँच शुरू कर दी। आरोपित को पकड़ने के लिए पुलिस ने एक टीम गठित की।

इसी दौरान पुलिस को आरोपित इश्तियाक कुरैशी का लोकेशन कानपुर मिला। इसके बाद फरसगाँव पुलिस कानपुर पहुँची और वहाँ के नौंगवा गौतम गाँव से उसे गिरफ्तार कर लिया। इसके बाद उसे पकड़ कर छत्तीसगढ़ अपने साथ ले गई और कोर्ट में पेश किया। वहाँ से उसे जेल भेज दिया गया।

तिब्बत को संरक्षण देने के लिए अमेरिका ने बनाया कानून, चीन से दो टूक – दलाई लामा से बात करो: जानिए क्या है उस बिल में जिस पर राष्ट्रपति जो बायडेन ने किया दस्तखत

अमेरिका के राष्ट्रपति जो बायडेन ने तिब्बत समाधान अधिनियम (Resolve Tiber Act) पर हस्ताक्षर कर दिया है, जिसके बाद ये कानून बन गया है। इस अधिनियम द्वारा अमेरिका ने चीन से साफ शब्दों में कहा है, “तिब्बत पर चीन के जारी कब्जे का समाधान दमन से नहीं, बल्कि बातचीत के माध्यम से शांतिपूर्ण ढँग से किया जाना चाहिए।” चीन ने रिज़ॉल्व तिब्बत एक्ट का विरोध किया था और इसे अस्थिरता पैदा करने वाला एक्ट बताया था। यह एक्ट पिछले साल फरवरी में प्रतिनिधि सभा द्वारा पारित किया गया था और मई में सीनेट ने इसे मंजूरी दे दी थी।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, राष्ट्रपति जो बाइडेन ने तिब्बत-चीन विवाद के समाधान को बढ़ावा देने वाले अधिनियम पर हस्ताक्षर किए, जिसे लोकप्रिय रूप से रिज़ॉल्व तिब्बत अधिनियम के रूप में जाना जाता है। कानून में कहा गया है कि यह अमेरिकी नीति है कि तिब्बत मुद्दे को बिना किसी पूर्व शर्त के बातचीत के माध्यम से शांतिपूर्ण तरीकों से अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुसार हल किया जाना चाहिए। इसमें तिब्बत के बारे में चीन के झूठ पर भी निशाना साधा गया है, तथा चीन से तिब्बत के इतिहास के बारे में गलत सूचना का प्रचार बंद करने को कहा गया है, तथा विदेश विभाग को इन झूठे दावों का सीधे तौर पर मुकाबला करने के लिए नया अधिकार दिया गया है।

बायडेन ने शुक्रवार (12 जुलाई 2024) को जारी एक बयान में कहा, “आज, मैंने एस. 138, “तिब्बत-चीन विवाद समाधान को बढ़ावा देने वाला अधिनियम” (“अधिनियम”) पर हस्ताक्षर किए हैं। मैं तिब्बतियों के मानवाधिकारों को आगे बढ़ाने और उनकी विशिष्ट भाषाई, सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत को संरक्षित करने के प्रयासों का समर्थन करने के लिए कांग्रेस की द्विदलीय प्रतिबद्धता को साझा करता हूं।” बायडेन ने कहा, “मेरा प्रशासन पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना से दलाई लामा या उनके प्रतिनिधियों के साथ बिना किसी पूर्व शर्त के सीधी बातचीत फिर से शुरू करने का आह्वान करता रहेगा, ताकि मतभेदों को दूर किया जा सके और तिब्बत पर बातचीत के जरिए समझौता किया जा सके।”

इंटरनेशनल कैंपेन फॉर तिब्बत के अध्यक्ष तेनचो ग्यात्सो ने इस पर खुशी जताई और कहा, “रिज़ोल्व तिब्बत एक्ट तिब्बती लोगों के साथ चीन के क्रूर व्यवहार को दर्शाता है। तिब्बतियों के लिए यह उम्मीद का संदेश है। अन्य देशों के लिए यह मानवाधिकारों और लोकतांत्रिक स्वतंत्रता के लिए तिब्बत के शांतिपूर्ण संघर्ष का समर्थन करने का आह्वान है और बीजिंग के लिए यह एक घोषणा है कि तिब्बत के लिए अमेरिकी समर्थन खत्म नहीं हो रहा, बल्कि चीन को तिब्बत के साथ बातचीत फिर से शुरू करनी चाहिए और ऐसा समाधान खोजना चाहिए जो तिब्बती लोगों के मौलिक अधिकारों का समर्थन करता हो।” बता दें कि दलाई लामा ने बार-बार चीन से तिब्बती लोगों को वास्तविक स्वायत्तता देने का आह्वान किया है, और अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत यह स्पष्ट है कि लोगों को आत्मनिर्णय का अधिकार है।

यह अधिनियम तिब्बत के लिए अमेरिकी समर्थन को बढ़ाता है – जिससे विदेश विभाग के अधिकारियों को चीनी सरकार द्वारा तिब्बत के बारे में फैलाई जा रही गलत सूचनाओं का सक्रियतापूर्वक और सीधे तौर पर मुकाबला करने का अधिकार मिलता है। साथ ही यह इस झूठे दावे को खारिज करता है कि तिब्बत “प्राचीन काल” से चीन का हिस्सा रहा है, तथा चीनी सरकार और दलाई लामा या उनके प्रतिनिधियों या तिब्बती समुदाय के लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित नेताओं के बीच बिना किसी पूर्व शर्त के वार्ता के लिए दबाव डालता है, तथा तिब्बत पर वार्ता के माध्यम से समझौते के लक्ष्य की दिशा में बहुपक्षीय प्रयासों में अन्य सरकारों के साथ समन्वय करने के लिए विदेश विभाग की जिम्मेदारी की पुष्टि करता है।

अमेरिकी कॉन्ग्रेस के कुछ चुनिंदा सदस्यों द्वारा तीन वर्षों के प्रयास के बाद, जिसे तिब्बत समर्थकों और तिब्बती अमेरिकियों का व्यापक समर्थन प्राप्त था, रिज़ॉल्व तिब्बत एक्ट कानून बन गया। केंद्रीय तिब्बती प्रशासन और आईसीटी बोर्ड तथा कर्मचारियों के वरिष्ठ नेताओं ने कॉन्ग्रेस के नेताओं से मुलाकात की और उन्हें तिब्बत की स्थिति के बारे में जानकारी दी तथा चर्चा की कि किस तरह से नई पहल से मदद मिल सकती है। प्रतिनिधि जिम मैकगवर्न (डी-एमए) और माइकल मैककॉल (आर-टीएक्स) ने सदन में नेतृत्व किया, जबकि सीनेटर जेफ मर्कले (डी-ओआर) और टॉड यंग (आर-आईएन) ने सीनेट में विधेयक पेश किया। सभी चार प्रमुखों और उनके कर्मचारियों ने इस कानून को लागू करने के लिए अथक प्रयास किया।

यह अधिनियम तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र और चीन के अन्य तिब्बती क्षेत्रों को पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना (पीआरसी) के हिस्से के रूप में मान्यता देने की अमेरिका की लंबे समय से चली आ रही नीति में कोई बदलाव नहीं करता है। इस नीतिगत निर्णय के बारे में बायडेन ने कहा कि यह विदेशी राज्यों और ऐसे राज्यों की क्षेत्रीय सीमाओं को मान्यता देने के उनके अधिकार में आता है। अमेरिका पहले की तरह ही वन-चाइना नीति का समर्थन करता रहेगा, इसके बावजूद कि वो ताइवान के साथ भी संबंध रखता है और उसे सैन्य साजो-सामान से लेकर आर्थिक मदद तक पहुँचाता है।

गौरतलब है कि 14वें दलाई लामा 1959 में तिब्बत से भागकर भारत आ गये, जहाँ उन्होंने हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला में निर्वासित सरकार स्थापित की थी। साल 2002 से 2010 तक दलाई लामा के प्रतिनिधियों और चीनी सरकार के बीच नौ दौर की वार्ता हुई, लेकिन कोई ठोस परिणाम नहीं निकला। चीन भारत में रहने वाले 89 वर्षीय तिब्बती आध्यात्मिक नेता को एक “अलगाववादी” मानता है, जो तिब्बत को देश के बाकी हिस्सों से अलग करने के लिए काम कर रहा है।

दमोह के जिस कॉन्वेंट स्कूल ने TC में छात्राओं का बदला धर्म, वह माता-पिता पर ईसाई बनने का बनाता था दबाव: इनकार करने पर मैनेजर करता था प्रताड़ित

मध्य प्रदेश के एक नामी अंग्रेजी स्कूल में छात्राओं की स्कूल स्थानांतरण सर्टिफिकेट (TC) में उनका धर्म बदलने का आरोप लगाया है। छात्राओं के अभिभावक ने मध्य प्रदेश राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग से इसकी शिकायत की है। अब यह बात सामने आई है कि स्कूल प्रशासन ने छात्राओं के परिजन पर धर्मांतरण का दबाव बनाया था। जब वे तैयार नहीं हुए तो उनके बच्चों का धर्म सर्टिफिकेट पर बदल दिया।

मध्य प्रदेश के दामोह में स्थित गुड शेफर्ड इंग्लिश मीडियम स्कूल की दो छात्राओं के स्थानांतरण प्रमाण पत्र पर हिंदू धर्म की जगह ईसाई धर्म लिखे जाने का आरोप लगाया है। छात्राओं का कहना है कि स्कूल प्रशासन की इस गलती के कारण उन्हें नए स्कूल में नामांकन लेने में समस्या हो रही है। छात्राओं के अभिभावक ने इस मामले की लिखित शिकायत राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग के समक्ष दर्ज कराई है।

इस मामले का संज्ञान लेते हुए आयोग ने जिलाधिकारी को कार्रवाई करने के लिए पत्र लिखा है। मध्य प्रदेश बाल अधिकार संरक्षण आयोग के अध्यक्ष द्रविंद्र मोरे ने कलेक्टर को लिखे पत्र में कहा है कि उत्तर प्रदेश के वाराणसी जिले के रहने वाले रवि शंकर ने शिकायत दर्ज कराई है कि गुड शेफर्ड स्कूल द्वारा उनकी दो बेटियों के स्थानांतरण प्रमाण पत्र में धर्म हिंदू की स्थान ईसाई लिख दिया गया है।

भास्कर की एक्सक्लूसिव रिपोर्ट के मुताबिक, स्कूल प्रशासन ने मूल रूप से वाराणसी के रहने वाली छात्राओं के माता-पिता पर धर्मांतरण पर पहले दबाव डाला था। उन्होंने जब इनकार किया तो प्रताड़ित करना शुरू कर दिया। इसके बाद स्कूल की टीसी पर छात्राओं की धर्म ईसाई लिख दिया गया। छात्राएँ अनुसूचित जाति वर्ग की है। इसके कारण उन्हें दूसरे स्कूलों में नामांकन करने में परेशानी आ रही है।

पथरिया स्थित गुड शेफर्ड स्कूल के खिलाफ साल 2023 में भी शिकायत हो चुकी है। तब स्कूल का मैनेजर और उसकी पत्नी फरार हो गए थे। इस बार हुई शिकायत के बाद बाल आयोग ने स्कूल की मान्यता रद्द करने की सिफारिश की है। शिकायत के बाद स्कूल शिक्षा विभाग ने गुड शेफर्ड स्कूल की मान्यता रद्द कर दी है।

दरअसल, वाराणसी से 30 किलोमीटर दूर बरजी गाँव के रहने वाले रविशंकर भारती साल 2011 में दमोह गए थे। वहाँ गुड शेफर्ड मिडिल स्कूल में शिक्षक के रूप में उनकी जॉब लग गई। कुछ दिनों बाद उन्हें मौखिक तौर पर स्कूल का प्रिंसिपल भी बना दिया। साल 2014 के बाद रवि शंकर अपने परिवार को भी दमोह लेकर गए। वहाँ उनकी पत्नी किरण को भी स्कूल ने शिक्षक की नौकरी दे दी।

इसके बाद रविशंकर और किरण ने अपने चारों बच्चों का इसी स्कूल में नाम लिखवा दिया। रविशंकर का कहना है कि 2014-15 में जब उन्होंने अपने बच्चों का इस स्कूल में नामांकन कराया तो फॉर्म में धर्म के कॉलम में हिन्दू लिखा था। इस पर स्कूल की मैनेजर की पत्नी स्मिता मोल नाराज हो गईं। उन्होंने दूसरा फॉर्म देते हुए कहा कि इसमें ईसाई लिखना होगा। यह सिर्फ कागजी होगा, ताकि नौकरी बची रहे।

रविशंकर का कहना है कि नौकरी जाने के डर से वे मानसिक दबाव में आ गए और फॉर्म में अपने बच्चों का धर्म ईसाई लिख दिया। उनका कहना है कि बच्चों का नामांकन होने के बाद मैनेजर शेर तेरंग ने उनसे चर्च जाने के लिए कहने लगा। बच्चों को भी रविवार की प्रार्थना के लिए चर्च भेजने के लिए कहा। इस पर रविशंकर ने मना कर दिया। उनका कहना है कि स्कूल दूसरे सभी टीचर ईसाई थे।

रविशंकर का यह भी आरोप है कि क्लास के नैतिक शिक्षा की पीरियड में ईसाई धर्म से संबंधित चीजें बच्चों को पढ़ाने के लिए कहा जाता था। जब वे विरोध किए तो वे निशाने पर आ गए। उन्हें परेशान करने के उद्देश्य से उनका खुलवाए गए EPF खाते में उनके नाम की स्पेलिंग ही बदल दी गई। इसकी शिकायत रविशंकर ने मैनेजर से की तो उसने कहा कि ‘तुम ईसाई नहीं बन रहे हो। इसलिए मदद नहीं मिलेगी।’

रविशंकर ने कहा कि साल 2022-23 में उन्हें प्रिंसिपल के पद से भी हटा दिया गया। यहाँ तक कि स्कूल की ओर से बीआरसी कार्यालय में शिक्षकों की भेजी गई सूची और टीचर अटेंडेंस रजिस्टर से भी उनका और उनकी पत्नी का नाम भी हटा दिया गया। इसके बाद रविशंकर ने इसकी शिकायत एसडीएम से की और कहा कि उन पर धर्म परिवर्तन के लिए दबाव बनाया जा रहा है।

शिकायत के बाद एसडीएम की ओर से जाँच शुरू हुई तो मैनेजर शेर सिंह तेरंग और उसकी पत्नी स्मिता मोल फरार हो गईं। रविशंकर ने बताया कि बड़ी बेटी प्रज्ञा 12वीं में पथरिया में ही दूसरे स्कूल में पढ़ रही थी। वहीं, रिया 8वीं में और सृष्टि 5वीं में इसी स्कूल में पढ़ती थीं। तीनों का बोर्ड का एग्जाम था। इसलिए स्कूल नहीं छोड़ा। परीक्षा खत्म होने के बाद टीसी लेने गए तो वहाँ यह घटना हुई।

गुड शेफर्ड स्कूल में LKG से लेकर 8वीं तक की पढ़ाई होती थी। इस साल फरवरी तक इस स्कूल में लगभग 450 बच्चे पढ़ते थे। विवाद के बाद बच्चों की संख्या घटकर 215 रह गई है। प्रशासन ने जब स्कूल में जाँच की तो इस दौरान ऐसी पुस्तकें और दस्तावेज मिले, जिससे बच्चों और टीचिंग स्टाफ का धर्मांतरण कराने की कोशिश का पता चला है।

बिहार में निर्दलीय शंकर सिंह ने जदयू-राजद को हराया, बंगाल में 25 साल की मधुपूर्णा बनीं MLA, हिमाचल में CM सुक्खू की पत्नी जीतीं: जानें 13 सीटों पर उपचुनाव के परिणाम

देश भर में 13 सीटों पर हुए विधानसभा चुनाव में I.N.D.I. गठबंधन को सफलता मिली है, वहीं NDA गठबंधन को झटका लगा है। 4 सीटें कॉन्ग्रेस, इतनी ही सीटें TMC और एक-एक सीट DMK और AAP के खाते में गई गई है। निर्दलीय ने भी एक सीट झटकने में कामयाबी पाई। वहीं भाजपा को मात्र 2 सीटों से ही संतोष करना पड़ा है। इस तरह 13 में से 10 सीटें I.N.D.I. गठबंधन वालों के खाते में गई। विपक्ष इसके बाद मोदी सरकार पर हमला और तेज़ कर सकता है।

बसबसे पहले बात करते हैं बिहार के पूर्णिया स्थित रुपौली की, जहाँ बड़ा उलटफेर हुआ। लोकसभा चुनाव हारने वाली RJD की बीमा भारती को उन्हें निर्दलीय हराने पप्पू यादव का भी समर्थन हासिल था, फिर भी वो हार गईं। वहीं जदयू के कलाधर मंडल दूसरे स्थान पर तरहे, जो NDA के उम्मीदवार थे। जीत दर्ज की शंकर सिंह ने, जो ‘नॉर्थ बिहार लिबरेशन आर्मी’ नामक संगठन के मुखिया रहे हैं। जहाँ बीमा भारती के पति अवधेश मंडल र 46 मुकदमे दर्ज हैं, शंकर सिंह पर भी 16 FIR दर्ज हैं। दशकों तक दोनों में खूनी संघर्ष चला है। उप-मुख्यमंत्री व भाजपा नेता विजय सिन्हा ने कहा कि शंकर सिंह भी हमलोग से ही जुड़े हुए उम्मीदवार थे।

भाजपा ने जिन 2 सीटों पर जीत दर्ज की हैं, उनमें से एक है हिमाचल प्रदेश का हमीरपुर विधानसभा क्षेत्र। अनुराग सिंह ठाकुर के गढ़ में पार्टी इज्जत बचाने में कामयाब रही। यहाँ से आशीष शर्मा जीते हैं। उन्होंने 2022 में भी यहाँ से निर्दलीय जीत दर्ज की थी। वहीं भाजपा को दूसरी सीट मिली है मध्य प्रदेश के अमरवाड़ा में, जहाँ उसके उम्मीदवार कमलेश प्रताप शाह विजयी रहे। पश्चिम बंगाल की चारों सीटें मानिकतला, रायगंज, बागदा और राणाघाट में TMC की जीत हुई। बागदा से मात्र 25 वर्ष की मधुपूर्णा ठाकुर ने जीत दर्ज की। उनकी माँ ममताबाला ठाकुर राज्यसभा सांसद हैं।

चारों सीटों पर भाजपा ही दूसरे नंबर की पार्टी रही। कॉन्ग्रेस पार्टी ने जो सीटें अपने नाम की हैं, वो हैं उत्तराखंड का मंगलपुर, बद्रीनाथ और हिमाचल प्रदेश का हिमाचल प्रदेश का नालागढ़ और देहरा। मंगलौर से काजी मुहम्मद निजामुद्दीन, बद्रीनाथ से लखपत सिंह बुटोला, नालागढ़ से हरदीप संघ बावा और देहरा से मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू की पत्नी कमलेश ठाकुर ने जीत दर्ज की। पंजाब के जालंधर पश्चिम से AAP के मोहिंदर भगत जीते, वहीं तमिलनाडु विकरावंडी से DMK ने जीत दर्ज की।

उत्तराखंड में तेज़ी से बढ़ रही मुस्लिमों और ईसाइयों की जनसंख्या: UCC पैनल की रिपोर्ट में खुलासा – पहाड़ों से हो रहा पलायन

उत्तराखंड सरकार ने राज्य में यूनिफॉर्म सिविल कोड लाने का संकल्प लिया हुआ है, जिसका ड्राफ्ट भी सरकार को सौंपा जा चुका है। इस बीच, शुक्रवार को यूसीसी पैनल की 4 खंड की रिपोर्ट सार्वजनिक की गई। इस रिपोर्ट में बताया गया है कि उत्तराखंड में पहाड़ों से लोग मैदानों की ओर पलायन कर रहे हैं, तो मैदानी इलाकों में शहरी आबादी बहुत तेजी से बढ़ी है। ये आबादी उत्तराखंड के अंदर की ही नहीं है, बल्कि दूसरे राज्यों से आए लोगों की वजह से भी है। खास बात ये है कि उत्तराखंड में मुस्लिमों और ईसाइयों की आबादी हिंदुओं और सिखों की तुलना में 2 गुना से भी ज्यादा बढ़ी है।

उत्तराखंड समान नागरिक संहिता (यूसीसी) पैनल की रिपोर्ट ने बदलती जनसांख्यिकी की ओर ध्यान खींचा है। उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में आबादी घट रही है, तो मैदानी इलाकों में बेहद तेजी से आबादी बढ़ी है। इसमें सबसे बड़ा योगदान दूसरे राज्यों से आने वाले प्रवासियों ने किया है। रिपोर्ट अपने पहले खंड के अध्याय 2 में बताती है कि उत्तराखंड की सांख्यिकी डायरी 2021-22 के अनुसार, 2001-11 के दशक में मैदानी इलाकों में शहरी क्षेत्रों में ‘30.23% की जनसंख्या वृद्धि’ देखी गई, जो काफी हद तक पलायन के कारण थी। दूसरी ओर, अल्मोड़ा और गढ़वाल के दो पहाड़ी जिलों में इस अवधि में उनकी आबादी में ‘पूर्ण गिरावट’ देखी गई है।

मुस्लिमों-ईसाइयों की संख्या तेजी से बढ़ी

यूसीसी पैनल रिपोर्ट यह भी बताता है कि चुनाव आयोग के आँकड़ों से पता चलता है कि पिछले दशक के दौरान राज्य के मैदानी इलाकों में मतदाताओं की संख्या में ‘लगभग 30% की तीव्र वृद्धि’ हुई है। पैनल की रिपोर्ट में कहा गया है कि यह जनसंख्या की सामान्य दशकीय वृद्धि दर से बहुत अधिक है, जो अन्य राज्यों से पलायन में भी तेजी से वृद्धि का संकेत देता है। रिपोर्ट में आगे कहा गया है कि धार्मिक अल्पसंख्यक समूहों का एक बड़ा हिस्सा राज्य के मैदानी इलाकों में स्थित है। उदाहरण के लिए, हरिद्वार और उधम सिंह नगर जिलों के 34.3% और 22.6% निवासी मुस्लिम हैं।

पिछली जनगणना के आंकड़ों का हवाला देते हुए इसमें कहा गया है कि उधम सिंह नगर के लगभग दसवें हिस्से के निवासी सिख हैं। इसमें कहा गया है कि 2001-11 के दशक के दौरान, मुसलमानों और ईसाइयों की वार्षिक औसत जनसंख्या वृद्धि दर (3.9% से अधिक) सिखों (1.15%) और हिंदुओं (1.60%) से आगे निकल गई है। इसी अवधि के दौरान जैन आबादी की पूर्ण संख्या में गिरावट आई।

पैनल रिपोर्ट में साझा किए गए डेटा और पाई चार्ट से पता चलता है कि राज्य के ‘पहाड़ी क्षेत्र’ से 98% सुझाव यूसीसी के पक्ष में थे, जबकि सिर्फ 2% विरोध में थे। मैदानी इलाकों में तस्वीर काफी बदल जाती है, जहां कथित तौर पर दूसरे राज्यों से काफी अधिक पलायन हुआ है। यहां प्राप्त सुझावों में से सिर्फ 38% यूसीसी के पक्ष में थे, जबकि 62% इसके खिलाफ थे। इसी तरह, पैनल द्वारा व्यक्तिगत रूप से फील्ड विजिट में प्राप्त सुझावों में पहाड़ी क्षेत्र में यूसीसी के लिए 99% समर्थन दिखा। मैदानी इलाकों के मामले में 92% सुझाव यूसीसी के पक्ष में थे, जबकि 8% इसके विरोध में थे।

उत्तराखंड में अक्टूबर से लागू हो जाएगा यूसीसी

उत्तराखंड सरकार ने इससे पहले रिपोर्ट के मुख्य अंश ही जारी किए थे, लेकिन शुक्रवार शाम पूरी रिपोर्ट आम लोगों के लिए उपलब्ध हो गई है। वेबसाइट https://ucc/uk.gov.in/ पर जाकर कोई भी व्यक्ति रिपोर्ट को देख सकता है। दरअसल, उत्तराखंड की धामी सरकार ने 27 मई 2022 को यूसीसी का ड्राफ्ट तैयार करने के लिए एक पांच सदस्यीय कमेटी बनाई थी। रिटायर्ड जस्टिस रंजना देसाई की अध्यक्षता में कमेटी गठित की गई थी। कमेटी ने 43 जनसंवाद कार्यक्रम और विभिन्न माध्यमों से 2.33 लाख लोगों से यूसीसी के लिए सुझाव लिए थे। इसके बाद 2 फरवरी, 2024 को कमेटी ने सरकार को यूसीसी की रिपोर्ट सौंपी।

कमेटी की ओर से रिपोर्ट सौंपे जाने के बाद मुख्यमंत्री धामी ने 7 फरवरी को यूसीसी के ड्राफ्ट को विधानसभा के पटल पर रखा। इसे विधानसभा में ध्वनि मत से पास कर दिया गया। इसके बाद उत्तराखंड यूसीसी को लागू करने वाला देश का पहला राज्य बन गया। विधेयक को कानून बनाने के लिए राष्ट्रपति के पास भेजा गया और फिर 11 मार्च को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने यूसीसी विधेयक को मंजूरी दे दी। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने अक्टूबर माह में इसे उत्तराखंड में लागू करने का ऐलान किया है।

आपातकाल को जायज ठहराने में जुटे राजदीप सरदेसाई और प्रियंका चतुर्वेदी: ‘संविधान हत्या दिवस’ से बिफरा विपक्षी गिरोह, कहा- संविधान के तहत थी इमरजेंसी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने 25 जून को ‘संविधान हत्या दिवस’ घोषित किया है। इसी दिन 1984 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी के नेतृत्व वाली कॉन्ग्रेस सरकार ने देश में आपातकाल घोषित करते हुए विपक्षी नेताओं को जेल में डाल दिया था। साथ ही मीडिया पर भी अंकुश लगा दिया था। अब उद्धव ठाकरे वाली शिवसेना (UBT) की नेता प्रियंका चतुर्वेदी और कॉन्ग्रेस समर्थक पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने आपातकाल का समर्थन किया है।

उद्धव ठाकरे वाली शिवसेना (UBT) की नेता प्रियंका चतुर्वेदी ने सोशल मीडिया साइट X पर आपातकाल का समर्थन किया। उन्होंने लिखा, “क्या कोई माननीय गृह मंत्री अमित शाह को बताएगा कि आपातकाल संवैधानिक रूप से उपलब्ध धारा के आधार पर लगाया गया था? संविधान हत्या दिवस कहना हास्यास्पद है, क्योंकि यह वही संविधान था जिसमें आपातकाल की धारा थी!”

चतुर्वेदी ने आगे कहा, “यह आपातकाल की अति हो सकती है और इसे घोषित करने के लिए अधिकार को कमज़ोर किया जा सकता है या आपातकाल घोषित करने के लिए राजनीतिक कारण भी हो सकते हैं, लेकिन यह निश्चित रूप से संवैधानिकता की मृत्यु नहीं हो सकती है! ख़ुद बदलने चले थे संविधान, मिल गया उसका परिणाम, इसलिए हो रहे हैं हैरान। अब आये दिन दे रहें ऐसे बयान।”

प्रियंका चतुर्वेदी की तरह ही पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने भी आपातकाल का समर्थन किया है। राजदीप ने सोशल मीडिया साइट X पर लिखा, “ब्रेकिंग न्यूज़: मोदी सरकार ने कहा है कि वह 25 जून को 1975 की आपातकाल की वर्षगाँठ को ‘संविधान हत्या दिवस’ के रूप में मनाएगी। विपक्ष के नारे ‘संविधान ख़तरे में है’ और ‘संविधान हत्या दिवस’ के बीच हम संविधान का ओवरडोज़ ले रहे हैं!”

राजदीप ने आगे लिखा, “सच तो यह है कि संविधान को सही मायने में बचाने/सम्मान करने का एकमात्र तरीका संवैधानिक मूल्यों का सम्मान करना है। पहला कदम: हर सरकार, चाहे वह केंद्र हो या राज्य, एजेंसियों का दुरुपयोग बंद करे! 75 के आपातकाल की निंदा करने और फिर उसके मुख्य पापों को दोहराने का कोई मतलब नहीं है! सुर्खियाँ बटोरने वाली नौटंकी कम, ज़्यादा सारगर्भित बातें!”

संविधान हत्या दिवस का ऐलान करते हुए गृहमंत्री अमित शाह ने कहा कि कैसे इंदिरा गाँधी ने तानाशाही मानसिकता का परिचय देते हुए लोकतंत्र की आत्मा का गला घोंट दिया था। उन्होंने याद किया कि कैसे लाखों लोग जेल में ठूँस दिए गए थे, मीडिया की आवाज़ को दबा दिया गया था। अमित शाह ने ऐलान किया कि हर साल इसकी स्मृति में भारत सरकार ने 25 जून को ‘संविधान हत्या दिवस’ के रूप में मनाने का निर्णय लिया है।

पाकिस्तान में जहाँ-जहाँ होने हैं चैंपियंस ट्रॉफी के मैच, वहाँ-वहाँ आतंकी बुरहान वानी के समर्थन में रैलियाँ: इधर शाहिद अफरीद कह रहे – खेल को राजनीति से दूर रखे भारत

पाकिस्तान में ICC चैंपियंस ट्रॉफी का आयोजन होना है। हालाँकि, कहा जा रहा है कि BCCI ने मन बना लिया है कि भारतीय क्रिकेट टीम को इस टूर्नामेंट में हिस्सा लेने के लिए वहाँ नहीं भेजा जाएगा, बल्कि श्रीलंका या UAE का वैकल्पिक वेन्यू के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। अब चैंपियंस ट्रॉफी पर आतंकवाद का साया मँडरा रहा है। पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद और वित्तीय राजधानी कही जाने वाली कराची में आतंकी बुरहान वानी के समर्थन में रैलियाँ की जा रही हैं।

असल में जम्मू कश्मीर में सक्रिय आतंकवादी बुरहान वानी को जुलाई 2016 में भारतीय सेना ने एक मुठभेड़ में मार गिराया था। पाकिस्तान में उसकी ‘डेथ एनिवर्सरी’ मनाई जा रही है। बुरहान वानी हिज़्बुल मुजाहिद्दीन से जुड़ा हुआ था, जो भारत के अलावा यूरोप, कनाडा और अमेरिका में भी प्रतिबंधित संगठन है। 8 जुलाई को वो मारा गया था, उसी दिन इस साल बदनौता गाँव में हमला कर आतंकियों ने सेना के 5 जवानों की जान ले ली। सोशल मीडिया पर उसके लिए अभियान चलाया जा रहा है।

‘इंडिया टुडे’ की खबर के अनुसार, बुरहान वानी को ‘शहीद’ बताते हुए 843 पोस्ट ‘X’ पर किए गए हैं। कराची, इस्लामाबाद, मुजफ्फराबाद और नीलम घाटी में 20 ऐसे लोकेशन मिले हैं, जहाँ इस आतंकवादी के समर्थन में रैलियाँ हुईं। ये इलाके ICC कैंपियन्स ट्रॉफी की मेजबानी करने वाले मैदानों से नज़दीक हैं, ऐसे में इस टूर्नामेंट पर सुरक्षा को लेकर प्रश्नचिह्न खड़े हो रहे हैं। कराची में नेशनल क्रिकेट स्टेडियम से मात्र 6 किलोमीटर की दूरी पर प्रदर्शनकारियों को भारत विरोधी नारेबाजी करते हुए देखा गया।

इस्लामाबाद में भारतीय दूतावास के बाहर प्रदर्शनकारियों ने जमावड़ा किया। ये जगह रावलपिंडी क्रिकेट स्टेडियम से मात्र 8 किलोमीटर की दूरी पर है। पाकिस्तान के पूर्व कप्तान शाहिद अफरीदी खेल को राजनीति से दूर रखने की बातें कर के और पाकिस्तान में विराट कोहली की फैन फॉलोविंग का हवाला देकर भारतीय टीम को पाकिस्तान का दौरा करने बोल रहे हैं, लेकिन वो खुद एक कट्टरपंथी रहे हैं और PoK पर पाकिस्तान के दावे का समर्थन करते हैं।

पकिस्तान के स्पोर्ट्स पत्रकार शोएब जट्ट ने भी पाकिस्तान के नेताओं पर निशाना साधते हुए कहा है कि उन्हें भारत से बात करनी चाहिए, बजाए बयानबाजी करने के। पाकिस्तान हर साल 8 जुलाई को ‘रेजिस्टेंस डे’ मनाता है। PoK के मुजफ्फराबाद में भी 300 से अधिक युवक बुरहान वानी की तस्वीर हाथ में लेकर प्रदर्शन करते हुए निकले। हुर्रियत कॉन्फ्रेंस (APHC-AJK) ने भी इस्लामाबाद में रैलियाँ निकाली हैं। कराची स्थित आर्ट्स काउंसिल से लेकर प्रेस क्लब तक ऐसी रैलियाँ हुई हैं। हाल ही में कश्मीर के रियासी में आतंकियों ने बस पर गोलीबारी कर 9 श्रद्धालुओं को मार डाला था, जिसमें महिलाएँ-बच्चे भी थे।

जम्मू कश्मीर के उप-राज्यपाल को अब दिल्ली के LG जितनी शक्तियाँ, ट्रांसफर-पोस्टिंग के लिए भी उनकी अनुमति ज़रूरी: मोदी सरकार के आदेश पर भड़के उमर अब्दुल्ला

केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर को दी दिल्ली जैसा संवैधानिक अधिकार देने की कवायद शुरू कर दी है, दिल्ली की तरह जम्मू कश्मीर के एलजी को भी अब ​प्रशासनिक शक्तियाँ दी जा रही है। जम्मू-कश्मीर में अब ट्रांसफर और पोस्टिंग एलजी की अनुमति के बिना नहीं हो पाएगी। इसका जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने विरोध किया है, वहीं महबूबा मुफ्ती ने अब तक इस मामले में कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है।

केंद्रीय गृह मंत्रालय ने जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम 2019 की धारा 55 के तहत संशोधित नियमों को अधिसूचित किया है, इसमें एलजी को अधिक शक्ति देने का प्रावधान है। इसमें नई धाराएँ जोड़ी गई है।

जानकारी के मुताबिक, केंद्र सरकार द्वारा शुक्रवार (12 जुलाई 2024) को एक अधिसूचना जारी की गई। अधिसूचना में कहा गया है कि जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल को आईएएस और आईपीएस जैसे अखिल भारतीय सेवा के अधिकारियों के तबादलों और पोस्टिंग, पुलिस, कानून और व्यवस्था के साथ-साथ न्यायिक अधिकारियों की नियुक्ति के मामलों में अधिक अधिकार मिलेंगे।

मुख्य नियमों में नियम 42 के बाद 42ए जोड़ा गया है, जिससे उपराज्यपाल को राज्य से केंद्र शासित प्रदेश बने राज्य के लिए महाधिवक्ता और विधि अधिकारियों की नियुक्ति करने का अधिकार मिल गया है। 42बी यह भी स्पष्ट करता है कि अभियोजन स्वीकृति देने या अस्वीकार करने या अपील दायर करने के प्रस्ताव भी एलजी द्वारा ही दिए जाएंगे।

आपको बता दें कि जब से जम्मू कश्मीर का पुनर्गठन हुआ है, तब से वहाँ चुनाव नहीं हो पाए हैं। मगर जब भी सरकार का गठन होगा तब सबसे अधिक शक्तियाँ राज्यपाल के पास होंगी। ये शक्तियाँ ऐसी ही हैं, जैसे दिल्ली के एलजी के पास होती है।

उमर अब्दुल्ला ने केंद्र सरकार के इस निर्णय को लेकर कड़ी आलोचना की है। नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता उमर अब्दुल्ला ने कहा, “एक और संकेत है कि जम्मू-कश्मीर में चुनाव करीब हैं। यही वजह है कि जम्मू-कश्मीर के लिए पूर्ण, अविभाजित राज्य का दर्जा बहाल करने को लेकर समय सीमा तय करने की दृढ़ प्रतिबद्धता इन चुनाव के लिए एक शर्त है। जम्मू-कश्मीर के लोग शक्तिहीन, रबर स्टैम्प सीएम से बेहतर के हकदार हैं, जिन्हें अपने चपरासी की भी नियुक्ति के लिए एलजी से गिड़गिड़ाना पड़ेगा।”

गौरतलब है कि 5 अगस्त, 2019 को संविधान के अनुच्छेद 370 के तहत जम्मू-कश्मीर को दिया गया स्पेशल स्टेट्स खत्म कर दिया है। इसके साथ पूर्ववर्ती राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों को बाँट दिया। इसमें जम्मू-कश्मीर और लद्दाख शामिल हैं। लद्दाख में विधानसभा नहीं है। बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने जम्मू-कश्मीर में विधानसभा चुनाव कराने के लिए 30 सितंबर की समयसीमा तय की है।

लालू यादव ने हाथ जोड़ अनिल अंबानी को किया प्रणाम, प्रियंका चतुर्वेदी ने एन्जॉय किया ‘यादगार क्षण’: अनंत अंबानी की शादी में I.N.D.I. नेताओं का जमावड़ा, सलमान खुर्शीद भी दिखे खुश

जहाँ एक तरफ I.N.D.I. गठबंधन के नेता पानी पी-पी कर एशिया के सबसे अमीर उद्योगपति मुकेश अंबानी को कोसते हैं, वहीं दूसरी तरह उनके यहाँ मेहमान बन कर जाते हैं और दावत भी उड़ाते हैं। शुक्रवार (12 जुलाई, 2024) को भी ऐसा ही नज़ारा देखने को मिला जब NCP (SP) के मुखिया शरद पवार, TMC सुप्रीमो ममता बनर्जी, राजद सुप्रीमो लालू यादव, शिवसेना (UBT) नेता उद्धव ठाकरे व प्रियंका चतुर्वेदी और बिहार के पूर्व उप-मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव समेत कई नेता मुकेश अंबानी के मेहमान बन कर मुंबई पहुँचे।

बता दे कि मुकेश अंबानी के बेटे अनंत की शादी वीरेन मर्चेंट की बेटी राधिका से हो रही है। इसी समारोह में एक तरह से ‘मिनी I.N.D.I. गठबंधन’ पहुँचा था। गाँधी परिवार निमंत्रण के बावजूद इस शादी समारोह में नहीं पहुँचा, क्योंकि जनता के सामने भद्द पिटने का डर था। समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव भी इस शादी समारोह में सपरिवार मौजूद रहे। ये सब वही नेता हैं, जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आलोचना के लिए मुकेश अंबानी से उनकी नज़दीकी होने की बात कहते हैं।

सोशल मीडिया में शिवसेना (UBT) की राज्यसभा सांसद प्रियंका चतुर्वेदी का भी मजाक उड़ रहा है, जिन्होंने इंग्लैंड के पूर्व प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर के साथ अनंत अंबानी-राधिका मर्चेंट की शादी में पोज दिया। उन्होंने इसे एक यादगार क्षण करार दिया। प्रियंका चतुर्वेदी ने ‘X’ पर इस तस्वीर को न पोस्ट करते हुए इंस्टाग्राम पर डाला। ये वही प्रियंका चतुर्वेदी हैं, जो ‘मोदी अंबानी फ्रेंडशिप गोल्स’ की बात करते हुए ‘ये दोस्ती हम नहीं तोड़ेंगे’ गाने के बोल शेयर कर चुकी हैं।

वहीं इस शादी समारोह में लालू यादव अपनी पत्नी राबड़ी देवी, बेटे तेजस्वी यादव, बहू राजश्री और बेटी मीसा भारती के साथ शामिल हुए। लालू यादव जब समारोह में पहुँचे तो मुकेश अंबानी के भाई अनिल अंबानी ने उनका स्वागत किया। इस दौरान लालू यादव ने हाथ जोड़ कर अनिल अंबानी को नमस्कार किया। अखिलेश यादव अपनी बेटी और पत्नी डिंपल के साथ समारोह में मौजूद रहे। यहाँ तक कि कॉन्ग्रेस नेता सलमान ख़ुर्शीद भी अपने परिवार के साथ भोज खाने के लिए पहुँचे।

‘अमेरिका की उप-राष्ट्रपति ने राहुल गाँधी से फोन पर की बात, दुनिया मानती है अगला PM’: कॉन्ग्रेस इकोसिस्टम के साथ-साथ मीडिया ने चलाई खबर, जानें क्या है सच

कॉन्ग्रेस का इकोसिस्टम कह रहा है कि अमेरिका की उप-राष्ट्रपति कमला हैरिस ने कॉन्ग्रेस पार्टी के पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी से मुलाकात की है। कॉन्ग्रेस से जुड़े हैंडलों के अलावा पार्टी समर्थक पत्रकार भी ऐसा ही दावा कर रहे हैं। यहाँ तक कि कई मीडिया संस्थानों ने भी इस रिपोर्ट को जम कर चलाया। द इकोनॉमिक टाइम्स’, ‘टाइम्स नाउ’, NDTV ‘द फ़ेडरल न्यूज़’, ‘डेक्कन हेराल्ड’, Outlook, ‘ABP न्यूज़’ और ‘टेलीग्राफ इंडिया’ ने इस खबर को शेयर किया।

कई मीडिया संस्थानों ने चलाई कमला हैरिस के राहुल गाँधी से बात करने की खबर

इतना ही नहीं, कॉन्ग्रेस के कई नेताओं ने भी इस खबर को शेयर किया। खुद को लेखक बताने वाले हर्ष तिवारी ने दावा किया कि लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष बनने के बाद राहुल गाँधी का कद काफी बढ़ गया है, दुनिया उन्हें अगले प्रधानमंत्री के रूप में देख रही है। इंदिरा गाँधी के कट्टर समर्थक रविंदर कपूर ने भी इस रिपोर्ट को शेयर किया। कॉन्ग्रेस के सबसे वफादार पत्रकार आदेश रावल ने भी यही दावा किया। ‘कॉन्ग्रेस टास्कफोर्स’ से जुड़े अंकित मयंक ने लिखा कि LoP बनने के बाद राहुल गाँधी के लिए किसी देश के बड़े नेता से ये पहली बातचीत है।

नागालैंड की कॉन्ग्रेस नेता वेनिशा G कीबा ने भी इस दावे को दोहराया। मोदी विरोधी ट्वीट्स करने वाले गरुराज अनजान ने इसे एक बदलाव करार दिया। कॉन्ग्रेस के एक अन्य कट्टर समर्थक प्रह्लाद दलवाड़ी ने तो राहुल गाँधी को ‘भारत का शैडो प्रधानमंत्री’ तक करार दिया। ‘ABP न्यूज़’ के आशीष सिंह भी ये दावा करने वालों में शामिल रहे। ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ के राजनीतिक संपादक विनोद शर्मा ने तो ये तक लिख दिया कि ‘चंपू मीडिया’ इस पर कुछ नहीं कह रहा है, केवल आपातकाल की रट लगा रहा है।

अब हम आपको इस दावे की सच्चाई बताते हैं। असल में राहुल गाँधी से कमरा हैरिस ने कोई बातचीत नहीं की है। अमेरिका की उप-राष्ट्रपति की वेबसाइट पर भी इस संबंध में कुछ उपलब्ध नहीं है, न ही अमेरिकी मीडिया ने ऐसा कुछ चलाया है। अमेरिका में समाचार एजेंसी PTI के चीफ कॉरेस्पोंडेंट ललित K झा ने अमेरिकी उप-राष्ट्रपति कार्यालय से बात की। अमेरिकी वाईस प्रेसिडेंट ऑफिस ने कहा है कि ये खबर गलत है। इधर कॉन्ग्रेस समर्थक फर्जी खबर पर लहालोट हुए जा रहे थे।