एंटी-अंबेडकरवादी सामाजिक कार्यकर्ता राजेश वाल्मीकि चौहान ने आरोप लगाया कि 4 मार्च 2026 को होली सेलिब्रेशन के दौरान पंजाब के SAS नगर के सेक्टर 70 में एक मस्जिद के पास मटौर गाँव के मार्केट में लगभग 15-16 आदमियों ने उन पर हमला कर दिया। चौहान ने अपनी तकलीफ को सोशल मीडिया पर वीडियो शेयर कर जाहिर किए। उन्होंने दावा किया कि उन पर तब हमला किया गया, जब उन्होंने उत्तर प्रदेश और बिहार के प्रवासियों को कट्टरपंथियों द्वारा सड़क पर पीटे जाने का विरोध किया।
सभी साथियो जय श्री राम 🙏 जय हिंद वंदेमातरम् दोस्तो @Raazvalmiki7250 की हालत अभी भी गंभीर बनी हुई है आप सभी भाई का साथ दे देश द्रोही कट्टर पंथियो ने जान से मारने की कोशिश की थी अभी भी भाई सरकारी अस्पताल मे भर्ती है pic.twitter.com/xRugwpkMs3
— Rajesh Valmiki Chouhan (@Raazvalmiki7250) March 5, 2026
राजेश वाल्मीकि चौहान वाल्मीकि समुदाय (दलित) से हैं। वह अक्सर उन अंबेडकरवादियों के खिलाफ आवाज उठाते हैं जो हिंदू धर्म, हिंदू देवी-देवताओं और रीति-रिवाजों को गाली देते हैं।
राजेश वाल्मीकि चौहान ने कथित हमले के बारे में बताया
ऑपइंडिया से बात करते हुए राजेश ने कहा कि यह घटना दोपहर के आसपास हुई जब वह अपने भाई के घर से अपने घर लौट रहे थे। उन्होंने सड़क पर कुछ लोगों को हंगामा करते और कथित तौर पर UP और बिहार के उन प्रवासियों पर हमला करते देखा, जो होली मना रहे थे और अपने घर जा रहे थे।
राजेश ने आरोप लगाया कि हमलावरों के पास डंडे, रॉड और लाठियाँ थीं और सिख की ड्रेस पहने एक आदमी के पास भाला था। उसने कहा कि जब उसने उनसे पूछा और हमले का विरोध करते हुए कहा कि ये लोग बस अपना त्योहार मना रहे थे, तो उन्हें क्यों पीट रहे हो? ऐसी हरकतें कानून और संविधान के खिलाफ हैं।
अपराधि थाने मे खुले घूमते है यहा उत्तर प्रदेश और बिहार के हिन्दुओ की कोई सुन वाई नही होती क्या पंजाब भारत मे नही है,, क्या भारतीय संविधान पंजाब मे लागू नही है…. ..??? @AamAadmiParty@DGPPunjabPolice दंगाइ खुलेआम लूट पात मचा रहे थे राह चलती बहन बेटियो के साथ अभद्रता कर रहे https://t.co/6eL3EcPD2R
— Rajesh Valmiki Chouhan (@Raazvalmiki7250) March 5, 2026
राजेश का कहना है कि इतना बोलते ही उनमें से एक व्यक्ति ने उसकी जेब से मोबाइल फोन जबरन निकाल लिया और उस पर वीडियो रिकॉर्ड करने का आरोप लगाया। राजेश के मुताबिक, हमलावरों ने कहा कि उत्तर प्रदेश और बिहार के स्टूडेंट इलाके में आते हैं, हंगामा करते हैं और शराब पीते हैं।
इस पर जवाब देते हुए राजेश ने कहा कि अगर कोई दिक्कत है, तो पुलिस के पास जाया जा सकता है या फिर उन लोगों को ठीक से समझा सकते हैं। उसकी बातों को नजरअंदाज करते हुए हमलावरों ने उसके पास जो कैश था उसे ले लिया और उसके गले से चांदी की चेन निकाल ली। राजेश ने दावा किया कि फिर कई लोगों ने उसे डंडों और रॉड से पीटा।
उसने यह भी आरोप लगाया कि हमलावरों में से एक ने उसके पेट में भाला घोंपने की कोशिश की, लेकिन मौके पर मौजूद एक दूसरे आदमी ने उसे रोक दिया। राजेश ने आगे दावा किया कि जब उसकी पत्नी आई और बीच-बचाव करने की कोशिश की, तो उस पर भी डंडों से हमला किया गया।
पुलिस ने शिकायत दर्ज करने से मना कर दिया- राजेश
हमले के बाद राजेश ठीक से चल नहीं पा रहा था और उसके हाथ में गंभीर चोटें आई थीं। उसके अनुसार, उसकी पत्नी उसे सेक्टर 71 के मटौर पुलिस स्टेशन ले गई। हालाँकि पुलिस ने उसकी शिकायत दर्ज नहीं की और उसे घर जाकर आराम करने और मरहम लगाने के लिए कहा। राजेश के मुताबिक पुलिस ने उससे पहले एक मेडिकल सर्टिफिकेट लाने को कहा।
उसने आगे दावा किया कि बाद में उसने एक लोकल डॉक्टर से सलाह लेने के बाद मेडिकल मदद माँगी, जिसने उसे हॉस्पिटल में भर्ती होने की सलाह दी। राजेश ने कहा कि हॉस्पिटल में एक मेडिकल स्लिप बनाई गई थी, लेकिन उसे अपनी जेब से दवा खरीदनी पड़ी, क्योंकि शुरू में कोई दवा नहीं दी गई थी।
उसने यह भी आरोप लगाया कि उसके पास आयुष्मान कार्ड होने के बावजूद, हॉस्पिटल ने उसे लेने से मना कर दिया और बताए गए एक्स-रे के लिए कैश पेमेंट माँगा।
पुलिस ने शिकायत दर्ज न करने के दावों को गलत बताया
ऑपइंडिया से बात करते हुए, मटौर पुलिस स्टेशन के SHO रूपिंदर सिंह ने उन दावों को गलत बताया कि पुलिस ने राजेश की शिकायत दर्ज करने से इनकार किया है। उन्होंने कहा कि पूरे शहर में CCTV कैमरे लगे हैं और अगर कोई पुलिस के पास शिकायत करने आता है, तो वे उस पर कार्रवाई करते हैं।
(यह लेख अंग्रेजी में लिखा गया है। मूल रूप को पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)
मिडिल ईस्ट में अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच बढ़ते टकराव ने क्षेत्र को गंभीर सुरक्षा संकट में डाल दिया है। इसका असर अब वैश्विक ऊर्जा बाजार पर भी दिखने लगा है। इस संकट से दुनिया के तेल और गैस व्यापार को बाधित करने की आशंका पैदा हो गई है।
दुनिया के टॉप 10 तेल उत्पादक देशों में से पाँच ‘सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, इराक, ईरान और कुवैत’ इसी क्षेत्र में हैं। साल 2024 में वैश्विक तेल उत्पादन का 31% हिस्सा यहीं से आया जबकि 38% तेल निर्यात भी पश्चिम एशिया से हुआ।
2 मार्च को कतर ने ईरान के ड्रोन हमले के बाद दुनिया की सबसे बड़ी LNG निर्यात इकाई में उत्पादन रोक दिया। इसके अलावा सऊदी अरब और इराक समेत खाड़ी के कई देशों में रिफाइनरियां बंद करने की घोषणा की गई है। स्थिति तब और गंभीर हो गई जब ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ को बंद कर दिया गया। इस समुद्री मार्ग से दुनिया की लगभग 20% तेल आपूर्ति गुजरती है। भारत की करीब 50% तेल और गैस आपूर्ति भी इसी रास्ते से आती है। इसके चलते अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल और पेट्रोल की कीमतें बढ़ गई हैं।
भारत कैसे कर रहा है इस संकट से निपटने की तैयारी?
इस संकट के बीच केंद्र की मोदी सरकार ने कहा है कि देश के पास 6 से 8 सप्ताह का ईंधन और कच्चे तेल का भंडार मौजूद है। सरकार का कहना है कि फिलहाल पेट्रोल, डीजल और एलपीजी की कमी की आशंका नहीं है।
द हिंदू को सरकारी सूत्रों के मिली जानकारी के अनुसार, भारत के पास करीब 25 दिन का कच्चा तेल और 25 दिन के पेट्रोल, डीजल व एलपीजी का स्टॉक उपलब्ध है। इसमें आपात स्थिति के लिए बनाए गए स्पेशल पेट्रोलियम रिजर्व (SPR) शामिल नहीं हैं। इन्हें जोड़ने पर भंडार और बढ़ जाता है।
आधा कच्चा तेल भंडार नियमित रूप से रिफिल होता रहेगा क्योंकि गैर-होर्मुज क्षेत्रों से आयात जारी है। इसमें समुद्र में आ रहे टैंकरों का तेल और रिफाइनरियों के स्टोरेज टैंक में रखा स्टॉक भी शामिल है। रिफाइनरियाँ लगातार कच्चा तेल प्रोसेस कर नई खेप मँगा रही हैं, जिससे आपूर्ति बनी रहने की उम्मीद है।
पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय (MoPNG) ने हालात की समीक्षा के लिए भारतीय कंपनियों के साथ कई बैठकें की हैं। मंत्रालय बैकअप योजना तैयार कर रहा है जिसमें वैकल्पिक आपूर्ति क्षेत्रों की पहचान शामिल है।
मनीकंट्रोल की रिपोर्ट के मुताबिक, होर्मुज के अलावा केप ऑफ गुड होप जैसे समुद्री रास्ते विकल्प हो सकते हैं, हालाँकि इससे बीमा और माल ढुलाई की लागत बढ़ेगी। LNG के मामले में भारत की सुरक्षा सीमित है क्योंकि इसे कच्चे तेल की तरह बड़े पैमाने पर स्टोर करना मुश्किल होता है। भारत को एलएनजी का सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता कतर है और वहाँ उत्पादन रुक गया है।
सरकारी अधिकारियों का कहना है कि अगर रुकावट एक हफ्ते या 10 दिन तक रहती है तो बड़ा असर नहीं पड़ेगा। लेकिन लंबा संकट होने पर स्थानीय स्तर पर बदलाव और वैकल्पिक स्रोतों पर निर्भरता बढ़ानी पड़ सकती है। भारतीय तेल और गैस कंपनियां रूस, अमेरिका, पश्चिम अफ्रीका और लैटिन अमेरिका से अतिरिक्त LNG और कच्चा तेल मँगाने के विकल्प तलाश रही हैं। अरब सागर और हिंद महासागर में उपलब्ध रूसी कार्गो, जिनमें फ्लोटिंग स्टोरेज भी शामिल है, भारत के लिए राहत का जरिया बन सकते हैं।
ईरान ने ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ पर नियंत्रण का किया दावा
ईरान ने दावा किया है कि उसने रणनीतिक रूप से अहम ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ पर पूरा नियंत्रण कर लिया है। यह संकरा समुद्री मार्ग दुनिया की लगभग 20% तेल और LNG आपूर्ति के लिए इस्तेमाल होता है और फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी से जोड़ता है।
ईरानी मीडिया में दावा किया गया कि ईरान इस मार्ग से गुजरने वाले किसी भी जहाज पर गोलीबारी कर सकता है जिसके बाद बीमा कंपनियों ने क्षेत्र में काम कर रहे जहाजों को कवर देना बंद कर दिया। इसके चलते मालभाड़ा और बीमा दरें बढ़ गई हैं जबकि कई टैंकर और कार्गो जहाजों ने अपना रास्ता बदलना शुरू कर दिया है।
फार्स न्यूज एजेंसी को जारी बयान में रिवोल्यूशनरी गार्ड्स नेवी के अधिकारी मोहम्मद अकबरजादेह ने कहा, “इस समय ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ इस्लामिक रिपब्लिक की नौसेना के पूर्ण नियंत्रण में है।” उन्होंने चेतावनी दी कि यहाँ से गुजरने वाले जहाज मिसाइल या ड्रोन हमले की चपेट में आ सकते हैं।
इस बीच, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि उन्होंने संयुक्त राज्य विकास वित्त निगम (DFC) को निर्देश दिया है कि खाड़ी क्षेत्र से गुजरने वाले सभी समुद्री व्यापार, खासकर ऊर्जा आपूर्ति के लिए राजनीतिक जोखिम बीमा और वित्तीय गारंटी उपलब्ध कराई जाए।
ट्रंप ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रूथ सोशल पर लिखा कि जरूरत पड़ने पर अमेरिकी नौसेना टैंकरों को हॉरमुज़ से सुरक्षित एस्कॉर्ट करेगी। उन्होंने कहा कि अमेरिका हर हाल में दुनिया में ऊर्जा की निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित करेगा।
रणनीतिक पेट्रोलियम रिजर्व (SPR) और उनका भंडारण
हर औद्योगिक अर्थव्यवस्था की नींव ऊर्जा सुरक्षा पर टिकी होती है। तेजी से बढ़ती ऊर्जा जरूरतों वाले देश के लिए कच्चे तेल की स्थिर आपूर्ति बेहद जरूरी है। इसी उद्देश्य से रणनीतिक पेट्रोलियम रिजर्व (SPR) बनाए जाते हैं ताकि आपात स्थिति में भी देश की ऊर्जा आपूर्ति बाधित न हो।
SPR अत्यधिक सुरक्षित और विशेष भंडारण सुविधाएँ होती हैं जहाँ आपातकाल के लिए कच्चा तेल जमा किया जाता है। ये भंडार परिवहन में देरी, प्राकृतिक आपदा या अंतरराष्ट्रीय बाजार में उतार-चढ़ाव जैसी परिस्थितियों में बफर का काम करते हैं।
अधिकांश SPR गहरे भूमिगत कृत्रिम गुफाओं में बनाए जाते हैं। ये कम लागत, पर्यावरण पर कम प्रभाव और उच्च सुरक्षा के लिए जाने जाते हैं। आमतौर पर ये दो प्रकार के होते हैं- हार्ड रॉक कैवर्न और साल्ट कैवर्न। भारत में ज्यादातर हार्ड रॉक कैवर्न बनाए गए हैं जबकि अमेरिका में साल्ट कैवर्न अधिक प्रचलित हैं।
फोटो साभार: drishtiias.com
साल्ट कैवर्न ‘सोल्यूशन माइनिंग’ तकनीक से बनाए जाते हैं। इसमें नमक की परतों में पानी डाला जाता है, जिससे नमक घुलकर बाहर निकल जाता है और खाली जगह बन जाती है। नमक मिले पानी (ब्राइन) को निकालने के बाद उस स्थान पर कच्चा तेल भरा जाता है। यह प्रक्रिया चट्टानों को काटकर गुफा बनाने की तुलना में सस्ती और तेज होती है।
हार्ड रॉक कैवर्न ड्रिलिंग और ब्लास्टिंग के जरिए तैयार किए जाते हैं। इनकी दीवारें और छत प्राकृतिक अवरोध का काम करती हैं जिससे तेल सुरक्षित रहता है।
अमेरिका का रणनीतिक पेट्रोलियम रिजर्व दुनिया का सबसे बड़ा आपातकालीन तेल भंडार है जो पूरी तरह साल्ट कैवर्न संरचना पर आधारित है। वहीं, भारत में राजस्थान को नमक के विशाल भंडार के कारण ऐसे भंडार बनाने के लिए उपयुक्त स्थान माना जाता है।
भारत के रणनीतिक पेट्रोलियम रिजर्व
रणनीतिक पेट्रोलियम रिजर्व की व्यवस्था केवल किसी एक देश तक सीमित नहीं है। ऊर्जा आपूर्ति को लंबे समय तक सुरक्षित और स्थिर रखने के लिए इसे वैश्विक स्तर पर अपनाया गया है। हाल ही में मध्य पूर्व में OPEC सदस्य ईरान से जुड़ा संकट और उसका ऊर्जा व्यापार पर असर, इन रिजर्व की अहमियत को और स्पष्ट करता है।
भारत में SPR नेटवर्क का संचालन इंडियन स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व्स लिमिटेड (ISPRL) करता है जो पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय के तहत एक विशेष संस्था है। भारत के पास कुल 5.3 मिलियन टन कच्चे तेल को भंडार करने की क्षमता है जो तीन जगहों पर है इनमें विशाखापत्तनम (1.33 MMT), मंगलुरु (1.5 MMT) और पदुर (2.5 MMT) शामिल हैं। ये सभी परियोजनाएँ SPR कार्यक्रम के पहले चरण में बनाई गई थीं। इनकी कुल क्षमता करीब 39.1 मिलियन बैरल कच्चे तेल की है।
9 फरवरी को केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने राज्यसभा में बताया कि किसी भू-राजनीतिक संकट की स्थिति में ये भंडार देश की ऊर्जा जरूरतों को 74 दिनों तक पूरा कर सकते हैं। बाद में भारतीय ऊर्जा एजेंसी ने इसे बढ़ाकर 90 दिन तक बताया।
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ये भंडार समुद्र तट के पास रिफाइनरियों के निकट चट्टानी गुफाओं में बनाए गए हैं ताकि लॉजिस्टिक्स, सुरक्षा और संचालन में सुविधा बनी रहे। जुलाई 2021 में सरकार ने दूसरे चरण के तहत दो और वाणिज्यिक-सह-रणनीतिक भंडार केंद्र स्थापित करने को मंजूरी दी। ये केंद्र चाँदीखोल (4 MMT) और पदुर (2.5 MMT) में बनाए जाएँगे। कुल 6.5 MMT क्षमता वाली ये परियोजनाएँ पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (PPP) मॉडल पर विकसित की जा रही हैं।
अमेरिका ने अपने रणनीतिक पेट्रोलियम रिजर्व का कैसे इस्तेमाल किया
दुनिया का सबसे बड़ा आपातकालीन तेल भंडार अमेरिका के पास है। सरकार इसे अक्सर संकट के समय ईंधन की कीमतों को नियंत्रित करने और बाजार को स्थिर रखने के लिए इस्तेमाल करती है।
रॉयटर्स के अनुसार, इन भंडारों में करीब 415.4 मिलियन बैरल कच्चा तेल जमा है, जिसमें अधिकतर ‘सौर क्रूड’ (उच्च सल्फर वाला तेल) शामिल है। कई अमेरिकी रिफाइनरियाँ इस तरह के तेल को प्रोसेस करने के लिए तैयार हैं।
यह तेल भूमिगत नमक की विशाल गुफाओं में सुरक्षित रखा जाता है जो खाड़ी तट के राज्यों लुइसियाना और टेक्सास में स्थित हैं। इन संरचनाओं की कुल भंडारण क्षमता लगभग 714 मिलियन बैरल तक है।
क्या है रणनीतिक पेट्रोलियम रिजर्व का महत्व?
‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ पर रुकावट समुद्री व्यापार मार्गों पर बढ़ते खतरों की ताजा मिसाल है। इससे पहले 2023 में यमन स्थित हूती विद्रोहियों ने अंतरराष्ट्रीय शिपिंग लेनों पर हमला किया था। 23 दिसंबर 2023 को हूती नियंत्रण वाले क्षेत्रों से दक्षिणी लाल सागर में दो एंटी-शिप बैलिस्टिक मिसाइलें दागी गई थीं।
गाजा विवाद के बीच इजरायल से आने-जाने वाले जहाजों को लाल सागर और हिंद महासागर में निशाना बनाया गया। इन हमलों के कारण कई कंटेनर शिपिंग कंपनियों को छोटा और व्यस्त मार्ग ‘रेड सी’ या ‘सुएज नहर’ का उपयोग करने की योजना छोड़नी पड़ी। ‘सुएज नहर’ भूमध्य सागर को लाल सागर से जोड़ती है।
इजरायल और ईरान के बीच टकराव ने हालात को और अस्थिर कर दिया है। जैसे-जैसे देशों के बीच कूटनीतिक संबंध बिगड़ते हैं, वैश्विक व्यापार मार्ग और ज्यादा असुरक्षित होते जा रहे हैं। ऐसे में ऊर्जा आपूर्ति बाधित होने का खतरा उन देशों के लिए गंभीर है जो आयात पर निर्भर हैं- जैसे भारत।
इन्हीं सब मसलों में रणनीतिक पेट्रोलियम रिजर्व बेहद अहम हो जाते हैं। ये सुनिश्चित करते हैं कि आपूर्ति श्रृंखला में बाधा आने पर भी तेल की उपलब्धता बनी रहे। ये सिर्फ राष्ट्रीय सुरक्षा या आर्थिक स्थिरता का साधन नहीं हैं बल्कि संकट के समय जीवनरेखा की तरह काम करते हैं खासतौर पर उन देशों के लिए जिनकी विकास यात्रा तेल पर निर्भर है।
(यह खबर मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई है जिसे इस लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं)
आज ईरान और इजरायल सीधे हमले कर रहे हैं और खुले युद्ध की मुहाने पर दोनों देश खड़े हैं। दोनों देशों ने एक-दूसरे पर हजारों मिसाइलें दागी हैं जिससे मिडिल ईस्ट में तनाव चरम पर पहुँच गया है। 28 फरवरी से शुरू हुए अमेरिका-इजरायल के हमलों में ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत हो गई है।
ऐसी खुली दुश्मनी के माहौल में यह बात अविश्वसनीय लग सकती है कि कभी इजरायल और ईरान गुप्त साझेदार हुआ करते थे। लेकिन अगर हम कुछ दशक पीछे जाएँ तो याद आता है कि दोनों देश एक समय गुप्त सहयोगी थे और उनका निशाना एक साझा दुश्मन था- इराक।
एक साझा दुश्मन: सद्दाम का इराक
1960 और 1970 के दशक में जब ईरान इस्लामिक रिपब्लिक नहीं बना था तब वहाँ शाह मोहम्मद रजा पहलवी का शासन था। उस समय ईरान के पश्चिमी देशों से दोस्ताना संबंध थे और इजरायल के साथ भी उसके करीबी रिश्ते थे।
दोनों देशों के लिए इराक एक बड़ा खतरा था। इजरायल अपने चारों ओर दुश्मन अरब देशों से घिरा हुआ था। वहीं, शाह के शासन वाला ईरान, इराक के बढ़ते अरब राष्ट्रवादी नेतृत्व और उसके महत्वाकांक्षी रुख से चिंतित था। खासकर सद्दाम के दौर में इराक की क्षेत्रीय प्रभुत्व की कोशिशों ने ईरान और इजरायल दोनों को परेशान कर दिया था।
इसी साझा चिंता ने गहरे सहयोग की नींव रखी। इजरायल की खुफिया एजेंसी मोसाद और ईरान की गुप्त पुलिस SAVAK ने मिलकर इराक के भीतर कुर्द विद्रोहियों का समर्थन किया। रणनीति साफ थी कि बगदाद को अंदर से कमजोर करना है।
1958 तक इजरायल, ईरान और तुर्की ने मिलकर एक गुप्त खुफिया गठबंधन बना लिया था जिसे ‘ट्राइडेंट’ कहा जाता था। विश्लेषक ट्रीटा पारसी के अनुसार इसकी सोच यह थी कि इजरायल को मध्य पूर्व के ‘किनारे’ पर मौजूद गैर-अरब देशों के साथ दोस्ती करनी चाहिए। ईरान इनमें सबसे महत्वपूर्ण था। इसकी वजह सिर्फ उसकी सैन्य ताकत नहीं थी बल्कि यह भी था कि उसके पास तेल था, जिसे अरब देश इजरायल को बेचने से मना कर रहे थे।
इस्लामिक क्रांति ने सब बदल दिया
1979 में रूहोल्लाह खुमैनी के नेतृत्व में हुई इस्लामिक क्रांति के साथ ही सब कुछ बदल गया। शाह देश छोड़कर भाग गए और ईरान एक पश्चिम समर्थक राजशाही से बदलकर शरिया कानून पर आधारित इस्लामिक गणराज्य बन गया। खामेनेई ने खुले तौर पर अमेरिका को ‘ग्रेट सैटन’ (बड़ा शैतान) और इजरायल को ‘लिटिल सैटन’ (छोटा शैतान) कहा था।
ईरान सार्वजनिक रूप से इजरायल का कट्टर विरोधी बन गया। लेकिन अंतरराष्ट्रीय राजनीति अक्सर पर्दे के पीछे अलग तरह से काम करती है।
क्रांति के सिर्फ 18 महीने बाद सितंबर 1980 में इराक ने ईरान पर हमला कर दिया। ईरान-इराक युद्ध शुरू हो चुका था। सद्दाम ने सोचा कि वह ईरान की अंदरूनी अराजकता का फायदा उठाकर पुराने सीमा विवाद (खासकर शत्त-अल-अरब जलमार्ग से जुड़ा) निपटा सकता है। यह युद्ध 8 साल तक चला और इसमें लाखों लोगों की जान गई।
वैचारिक दुश्मनी के बावजूद, ईरान और इजरायल ने एक बार फिर खुद को एक ही दुश्मन ‘सद्दाम के इराक’ के सामने खड़ा पाया।
गुप्त हथियार, शांत सौदे
ईरान की सेना बहुत हद तक शाह के दौर में खरीदे गए अमेरिकी हथियारों और उपकरणों पर निर्भर थी। 1979 के बंधक संकट के बाद, जब ईरानी छात्रों ने 50 से अधिक अमेरिकियों को 444 दिनों तक बंधक बनाकर रखा, तब अमेरिका ने कड़े प्रतिबंध लगा दिए। इससे ईरान के सामने हथियारों और कल-पुर्जों की भारी कमी हो गई। ऐसे समय में इजरायल ने हस्तक्षेप किया।
1980 में इजरायल ने गुप्त रूप से ईरान को एफ-4 फैंटम लड़ाकू विमानों के लिए कल-पुर्जे उपलब्ध कराए। इनके बिना ईरान की वायुसेना का बड़ा हिस्सा जमीन पर ही खड़ा रह जाता। हथियारों की यह आपूर्ति यूरोप के रास्ते अक्सर तीसरे देशों के माध्यम से जारी रही।
इज़रायल के नजरिए से इराक की जीत को रोकना बेहद जरूरी था। सद्दाम हुसैन की सरकार को तत्काल और बड़ा खतरा माना जाता था। ईरान की मदद करके इराक को कमजोर करना रणनीतिक रूप से सही कदम समझा गया। एक और चिंता भी थी और वह थी, ईरान में रह रहे लगभग 60,000 यहूदियों की सुरक्षा।
ईरान-कॉन्ट्रा प्रकरण
1980 के दशक के मध्य में ‘ईरान-कॉन्ट्रा प्रकरण’ के दौरान यह गुप्त रिश्ता दुनिया के सामने आया। अमेरिका के राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन के प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारियों ने गुप्त रूप से (आंशिक रूप से इजरायली रास्ते से) ईरान को हथियार बेचने में मदद की। बदले में लेबनान में हिज्बुल्लाह द्वारा बंधक बनाए गए अमेरिकी नागरिकों की रिहाई की कोशिश की गई।
इस धन का कुछ हिस्सा अवैध रूप से निकारागुआ के कॉन्ट्रा विद्रोहियों को दिया गया। इस घोटाले से रीगन सरकार की साख को नुकसान पहुँचा और वॉशिंगटन, यरुशलम और तेहरान के बीच गुप्त सौदों का खुलासा हुआ। विवाद के बावजूद ईरान-इराक युद्ध के दौरान हथियारों की आपूर्ति जारी रही।
रणनीतिक सहयोगी से कट्टर दुश्मन तक
1988 में ईरान-इराक युद्ध खत्म होने के बाद इजरायल और ईरान की गुप्त नज़दीकी कमजोर पड़ने लगी। 1989 में खुमैनी की मृत्यु के बाद खामेनेई ने सत्ता संभाली और इजरायल विरोधी कड़ा रुख जारी रखा।
1990 के दशक तक हालात बदल चुके थे। खाड़ी युद्ध के बाद इराक कमजोर हो गया और सोवियत संघ टूट गया। वे कारण खत्म हो गए जिन्होंने कभी इजरायल और ईरान को साथ लाया था।
इसके बाद ईरान ने खुद को इजरायल का दुश्मन बना लिया। उसने लेबनान में हिज्बुल्लाह और गाजा में हमास का समर्थन किया जिन्होंने 2006 और 2008 में इजरायल से सीधे युद्ध लड़े। ईरानी नेता अक्सर इजरायल के विनाश की बात करते रहे।
2026: युद्ध के कगार पर
आज हालात सीधे टकराव तक पहुँच चुके हैं। अमेरिकी चेतावनियों के बावजूद खामेनेई के नेतृत्व में आगे बढ़ाए गए ईरान के परमाणु कार्यक्रम ने तनाव बढ़ाया है। पिछले एक साल में आर्थिक संकट और राजनीतिक दमन के कारण 31 प्रांतों में सरकार विरोधी प्रदर्शन हुए। प्रदर्शनकारियों पर सख्ती से वैश्विक आलोचना बढ़ी और वॉशिंगटन का दबाव भी तेज हुआ।
घरेलू अशांति, परमाणु तनाव और क्षेत्रीय प्रॉक्सी संघर्षों के बीच हाल में US-इजरायल के हमलों में खामेनेई की मौत हुई। जवाब में ईरान ने इजरायल पर बड़े पैमाने पर मिसाइल हमले किए। इज़रायल पहले से ही ईरान समर्थित गुटों गाजा में हमास, लेबनान में हिज्बुल्लाह और यमन में हूती से लड़ रहा है। दोनों देश अब पूर्ण युद्ध के सबसे करीब हैं।
इतिहास बताता है कि भू-राजनीति स्थायी नहीं होती। कभी इजरायल और ईरान ने इराक के खिलाफ साथ काम किया था। वह साथ विचारधारा नहीं बल्कि रणनीतिक जरूरत पर आधारित था। आज मिसाइलों और धमकियों के बीच वह दौर अकल्पनीय लगता है। पर मध्य पूर्व में रिश्ते बदलते हैं कल के गुप्त साझेदार आज के कट्टर दुश्मन बन सकते हैं।
होली रंगों का त्योहार है। जो खासकर हिंदू धर्म में मनाया जाता है। लेकिन खुद को सेकुलर बताने वाले कुछ बॉलीवुड सेलिब्रेटीज को इसी हिंदू त्योहार से परेशानी होती है। कोई त्वचा खराब होने का बहाना बनाता है, कोई सेहत का हवाला देता है, तो कोई होली को बदनाम करने के लिए छेड़छाड़ जैसे मुद्दे आगे कर देता है। सोशल मीडिया पर लंबी-लंबी पोस्ट लिखी जाती हैं, पानी की बर्बादी पर ज्ञान दिया जाता है और त्योहार से दूरी बना ली जाती है।
ये वही चेहरे हैं, जो ईद पर डायट भूलकर इफ्तार पार्टियों में नजर आते हैं, क्रिसमस पर जश्न मनाते हैं और तस्वीरें शेयर करते हैं। लेकिन होली आते ही इन्हें पानी की बर्बादी याद आ जाती है, पर्यावरण की चिंता सताने लगती है। घंटों शावर लेना, स्टीम बाथ करना या वाटर पार्क में मौज करना इन्हें गलत नहीं लगता, पर हिंदू त्योहार पर सवाल जरूर उठते हैं। हर साल यही दोहरा रवैया सामने आता है। इस लिस्ट में सबके चहीते बॉलीवुड सेलिब्रेटी करीना कपूर, तापसी पन्नू तक का नाम हैं।
सोनाक्षी सिन्हा के मुस्लिम पति जहीर इकबाल
इस लिस्ट में सबसे पहला नाम बॉलीवुड एक्ट्रेस सोनाक्षी सिन्हा के मुस्लिम पति जहीर इकबाल का नाम है। अपनी हर वीडियो में पति जहीर के साथ दिखने वाली सोनाक्षी सिन्हा इस बार ही होली सेलिब्रेशन की वीडियो में अकेले दिख रही हैं। लोग अनुमान लगा रहे हैं कि शायद जहीर ने होली से दूरी बना ली है।
दोनों ने होली को लेकर एक प्रमोशनल वीडियो भी बनाया था, जिसमें सिर्फ सोनाक्षी सिन्हा ने होली का रंग लगाया, जबकि जहीर इकबाल ने रंगों से परहेज किया। बता दें कि सोनाक्षी सिन्हा हिंदू हैं और उन्होंने मुस्लिम एक्टर जहीर इकबाल से कोर्ट मैरिज की है। अक्सर हिंदू त्योहारों में सोनाक्षी सिन्हा अपने पति जहीर इकबाल के साथ दिखाई नहीं देती हैं। इसके अलावा सालभर जहीर और सोनाक्षी साथ वीडियो बनाते हैं।
ये सेलिब्रिटी जोड़ी सार्वजनिक तौर पर कह चुकी है कि इन्हें एक-दूसरे के धर्म को लेकर कोई समस्या नहीं है, इनका मानना है कि प्यार इनके लिए सबसे ऊपर है। इसके बावजूद सोनाक्षी सिन्हा को जहीर इकबाल के साथ ईद मनाते और मस्जिद जाते देखा जाता है। लेकिन दूसरी जहीर इकबाल होली और हिंदू त्योहारों से परहेज करते हैं।
फरहाना भट्ट
बिग बॉस सीजन 19 से चर्चा में आई फरहाना भट्ट ने इस बार होली पर अपना योगदान कुछ ऐसा दिया जैसे फिल्म ‘लैला मजनू’ में उनका रोल था, बस दो सीन का। पहले सीन में वह मुंबई में पैपराजी के सामने पोज देती नजर आईं। वहाँ उन्होंने कहा कि वह होली कार्यक्रम में शामिल होने आई हैं, लेकिन उनके चेहरे पर रंग की एक छींट तक नहीं थी। साफ दिख रहा था कि रंगों से दूरी बनाई गई है।
दूसरा सीन सोशल मीडिया पर दिखा, जहाँ उन्होंने होली की शुभकामनाएँ देते हुए एक उर्दू शायरी पढ़ दी। लेकिन वहाँ भी रंगों से परहेज साफ नजर आया। ये वही फरहाना हैं, जो बिग बॉस के घर में अपने बेबाक अंदाज के लिए पहचानी जाती थीं। हर मुद्दे पर खुलकर बोलना और सामने वाले को जवाब देना उनकी पहचान रही। लेकिन जब खुले तौर पर हिंदू त्योहार को सेलिब्रेट करने की बारी आई तो उनरका मजहब आड़े आ गया। रंगों से दूरी और बाद में रंग लगाने की बात कहकर उन्होंने खुद को अलग रखा।
करीना कपूर
बॉलीवुज एक्ट्रेस करीना कपूर भी होली से दूरी बनाती हैं। उनका बहाना है कि उनके दादा राज कपूर के जाने के बाद से उनकी जिंदगी से रंग चले गए हैं। ये वही करीना कपूर हैं, जो हर साल ईद और क्रिसमस मनाते तस्वीरें सोशल मीडिया पर शेयर करती हैं। लेकिन सिर्फ होली पर ही इन्हें अपने दादाजी की याद आती है।
दरअसल, करीना कपूर ने मुस्लिम एक्टर सैफ अली खान से शादी की है। दोनों खुद को सेकुलर बताते हैं। लेकिन सैफ के साथ शादी के बाद से ही करीना कपूर त्योहार मनाने को लेकर ‘चूजी’ हो गई हैं। हर साल की तरह इस बार भी करीना कपूर की होली पर कोई तस्वीरें सामने नहीं आई, न ही उनके बच्चे तैमूर और जहाँगीर की होली खेलते कोई तस्वीरें सामने आईं।
जैस्मीन भसीन
बिग बॉस सीजन 14 फेम और टीवी एक्ट्रेस जैस्मीन भसीन भी इन्हीं लोगो में से एक हैं। जैस्मीन को अक्सर अबाया पहनकर मस्जिद जाते देखा जाता है। लेकिन इफ्तार पार्टी में व्यस्त जैस्मीन इस बार अपने हिंदू त्योहार होली के लिए समय नहीं निकाल पाई। पहले उनकी होली खेलते वीडियोज सामने आती थीं, लेकिन इस बार इफ्तार पार्टी को उन्होंने अपनी प्राथमिकता बनाया।
यह बदलाव उनके मुस्लिम बॉयफ्रेंड अली गोनी के साथ रहने के बाद आया है। दोनों खुद को सेकुलर बताते हैं, लेकिन साफ दिखता है कि अली गोनी अपना मजहबी प्रोपेगेंडा जैस्मीन पर थोपते हैं। खुद वो गणेश चतुर्थी पर ‘गणपति बप्पा मोरया’ बोलने से हिचकते हैं, लेकिन हिंदू गर्लफ्रेंड को मस्जिद लेकर जाते हैं और इफ्तार पार्टी रखवाते हैं।
तापसी पन्नू
ऐसे ही बॉलीवुड एक्ट्रेस तापसी पन्नू भी खुद को होली से दूर रखती हैं। कई इंटरव्यू में वे कह चुकी हैं कि उन्हें कैमिकल वाले रंग पसंद नहीं हैं और वह अपनी स्किन को लेकर सावधान रहती हैं। उनका कहना है कि बचपन में वह होली खेलती थीं, लेकिन अब न वो और न ही उनका परिवार रंगों की होली खेलता है।
जॉन अब्राहिम
बॉलीवुड एक्टर जॉन अब्रहाम, जो खुद को नास्तिक बताते हैं उन्हें भी होली खेलना पसंद नहीं है। लेकिन ईद पर गले लगते दिखाई देते हैं। उन्होंने एक इंटरव्यू में बताया कि लोग इस त्योहार का बहाना बनाकर एक-दूसरे का फायदा उठाते हैं। इसी के साथ उन्होंने केमिकल रंग से नुकसान की भी बात कही।
यानी सारा ज्ञान उन्होंने हिंदू त्योहार होली पर ही पेल दिया। लेकिन ईद पर बकरा काटने या जानवरों की सुरक्षा पर उन्हें बात करते कभी नहीं सुना गया। क्रिसमस पर भी वो तस्वीरें साझा करते हैं, लेकिन तब भी उन्हें पेड़ों के काटने या पर्यावरण को नुकसान पहुँचाने को लेकर ज्ञान देते नहीं सुना गया। सारा ज्ञान उन्होंने सिर्फ होली के लिए बचाकर रखा और त्योहार को बदनाम करने के लिए फलाने आरोप लगा डाले और खुद को भी इससे दूर कर लिया।
हिंदू त्योहारों पर अलग रवैया क्यों?
ये वही लोग हैं जो इसी देश, इसी इंटस्ट्री और यहीं की ऑडियंस के दम पर अपनी पहचान बनाते हैं। इनको काम भी यहीं से चाहिए, शोहरत भी यही से चाहिए और ताली भी यहीं से चाहिए। लेकिन होली जैसे मौके आते ही इनके चेहरे का रंग बदल जाता है। तब ये साफ दिखाने लगते हैं कि इनके लिए कौम और पहचान क्या मायने रखती है।
ईद पर इफ्तार पार्टी में शामिल होने से इन्हें कभी परहेज नहीं होता। वहाँ तस्वीरें खिंचवाना, मुबारकबाद देना और जश्न में शामिल होना सब ठीक लगता है। लेकिन जैसे ही हिंदू त्योहार आते हैं, अचानक पर्यावरण की चिंता जाग जाती है। पानी बचाने का ज्ञान, प्रदूषण की बात और त्योहार को ही सवालों के घेरे में खड़ा करने की आदत शुरू हो जाती है।
सवाल त्योहार मनाने के तरीके का नहीं है, सवाल दोहरे रवैये का है। अगर सादगी से रहना है तो हर त्योहार पर वही रवैया दिखना चाहिए। लेकिन जब चुनकर सिर्फ हिंदू त्योहारों पर ही नसीहत दी जाए, तो लोग सवाल तो करेंगे ही। दर्शक सब देख रहे हैं और अब फर्क समझ भी रहे हैं।
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने घोषणा की है कि वाशिंगटन गल्फ रीजन से होकर जाने वाले समुद्री व्यापार के लिए राजनीतिक जोखिम बीमा और आर्थिक सुरक्षा गारंटी देंगे। ये घोषणा पश्चिम एशिया के हालात और ग्लोबल तेल सप्लाई पर हो रहे असर को देखते हुए किया गया है।
"Effective IMMEDIATELY, I have ordered the United States Development Finance Corporation (DFC) to provide, at a very reasonable price, political risk insurance and guarantees for the Financial Security of ALL Maritime Trade… If necessary, the United States Navy will begin… pic.twitter.com/pIJyFwL78j
राष्ट्रपति ट्रंप का यह ऐलान ईरान की उस धमकी के बाद आया है जिसमें उसने होर्मुज स्ट्रेट को पार करने की कोशिश करने वाले जहाजों पर हमला करने की बात कही थी। होर्मुज दुनिया के सबसे अहम चोकपॉइंट्स में से एक है।
इससे पहले इंश्योरेंस कंपनियों ने शिपिंग कंपनियों को नोटिस दिया था कि वे ईरान पर इजराइल-US हमलों को देखते हुए इंश्योरेंस रोक देंगी और प्रीमियम बढ़ा देंगी। नॉर्थस्टैंडर्ड, अमेरिकन क्लब, स्वीडिश क्लब, स्कल्ड, गार्ड और लंदन पी एंड आई क्लब सहित प्रमुख बीमा कंपनियों ने पोत सुरक्षा के बढ़ते खतरों का हवाला देते हुए युद्ध जोखिम बीमा वापस ले लिया था।
ये खतरा इजरायल और अमेरिका की ईरान पर किए गए हमले में सुप्रीम लीडर अली खामेनेई के मारे जाने के बाद बढ़ा। ईरान ने UAE,सऊदी अरब और दूसरे मिडिल ईस्ट के कई देशों पर हमले किए।
DFC समुद्री व्यापार का इंश्योरेंस करेगा
ट्रुथ सोशल पर एक पोस्ट में ट्रंप ने कहा कि उन्होंने यूनाइटेड स्टेट्स डेवलपमेंट फाइनेंस कॉर्पोरेशन (DFC) को खाड़ी में काम करने वाली शिपिंग लाइनों को तुरंत ‘बहुत सही कीमत’ पर पॉलिटिकल रिस्क इंश्योरेंस देने का निर्देश दिया है।
उन्होंने लिखा, “मैंने तुरंत प्रभाव से यूनाइटेड स्टेट्स डेवलपमेंट फाइनेंस कॉर्पोरेशन को सभी समुद्री व्यापार, खासकर खाड़ी से होकर जाने वाली एनर्जी की फाइनेंशियल सिक्योरिटी के लिए पॉलिटिकल रिस्क इंश्योरेंस और गारंटी देने का आदेश दिया है। यह सभी शिपिंग लाइनों के लिए उपलब्ध होगा।”
इसके अलावा, उन्होंने कहा कि अगर हालात और बिगड़ते हैं तो US नेवी टैंकरों को होर्मुज स्ट्रेट से एस्कॉर्ट करना शुरू कर सकती है। उन्होंने आगे कहा कि अगर जरूरी हुआ, तो यूनाइटेड स्टेट्स नेवी जल्द से जल्द होर्मुज स्ट्रेट से टैंकरों को एस्कॉर्ट करना शुरू कर देगी। चाहे कुछ भी हो, यूनाइटेड स्टेट्स दुनिया में एनर्जी का फ्री फ्लो पक्का करेगा।
होर्मुज स्ट्रेट तेल का अहम रास्ता बना हुआ है
होर्मुज स्ट्रेट, जो फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी से जोड़ता है, दुनिया के तेल शिपमेंट का लगभग पाँचवाँ हिस्सा हैंडल करता है। ईरान की धमकियों और इंश्योरेंस कंपनियों द्वारा खाड़ी क्षेत्र, खासकर होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने वाले टैंकरों पर प्रीमियम चार्ज लगाने की वजह से यह समुद्री रास्ता चार दिनों से बंद है।
(ये लेख मूल रूप से अंग्रेजी में लिखा गया है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)
ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर हालात एक बार फिर बेहद तनावपूर्ण हो गए हैं। इजरायल और अमेरिका की हालिया सैन्य कार्रवाइयों ने मध्य पूर्व को युद्ध के मुहाने पर ला खड़ा किया है। इसके बावजूद ईरान अपने परमाणु ढाँचे को फिर से खड़ा करने की पुकजोर कोशिश में है।
यूँ तो मिडिल ईस्ट में ईरान का परमाणु कार्यक्रम दशकों से तनाव का केंद्र रहा है पर अब ये अब खुलेआम युद्ध की शक्ल ले चुका है। इजरायल और अमेरिका की हालिया स्ट्राइक्स ने नतांज जैसी प्रमुख सुविधाओं को नुकसान पहुँचाया है, लेकिन ईरान का कार्यक्रम पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है।
ताजा हालात: न्यूक्लियर फैसिलिटी का क्या हुआ?
ईरान की प्रमुख न्यूक्लियर साइट नतांज पर हाल ही में भारी क्षति हुई है। 1 और 2 मार्च 2026 को लिए गए सैटेलाइट इमेजेस से पता चलता है कि कम्प्लेक्स के अंदर कम से कम दो छोटी बिल्डिंग्स को गंभीर नुकसान पहुँचा, जो एक दिन पहले बिल्कुल सुरक्षित दिख रही थीं।
ईरान के एटॉमिक एनर्जी चीफ मोहम्मद एस्लामी ने संयुक्त राष्ट्र को पत्र लिखकर अमेरिका और इजरायल पर दो हमलों का आरोप लगाया। यह नुकसान जून 2025 के युद्ध के बाद आया, जब इजरायल की ‘ऑपरेशन राइजिंग लायन’ और अमेरिका की ‘ऑपरेशन मिडनाइट हैमर’ ने नतांज, इस्फहान और फोर्डो जैसी साइट्स को निशाना बनाया था।
अमेरिका ने दावा किया कि कार्यक्रम ‘ऑब्लिटरेट’ यानी खत्म हो गया, लेकिन सैटेलाइट इमेजेस दिखाते हैं कि ईरान पुनर्निर्माण कर रहा है। फरवरी 2026 में अमेरिका की ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ और इजरायल की ‘ऑपरेशन रोअरिंग लायन’ ने फिर से न्यूक्लियर और मिसाइल साइट्स को टारगेट किया।
ईरान में न्यूक्लियर फैसिलिटी में हो रहे काम की सैटेलाइट तस्वीर, साभार- The times of Israel
IAEA का अनुमान है कि ईरान के पास 440 किलो 60% यूटेनियम स्टॉक है, जो 10 बम बना सकता है, लेकिन इसकी लोकेशन अज्ञात है। नतांज ईरान का मुख्य संवर्धन केंद्र था, जहाँ हजारों सेंट्रीफ्यूज लगे थे, लेकिन हमलों के बावजूद IAEA को इंस्पेक्शन में बाधाएँ आ रही हैं। ईरान ने नए अंडरग्राउंड बंकर्स बना लिए हैं, जो हमलों से सुरक्षित हैं।
US-इजरायल की चिंताएँ और बयानबाजी
इजरायल के पीएम बेंजामिन नेतन्याहू ने कहा कि अगर हमला न होता, तो ईरान का कार्यक्रम ‘महीनों में इम्यून’ हो जाता, क्योंकि वे अंडरग्राउंड बंकर्स बना रहे थे। उन्होंने फॉक्स न्यूज को बताया कि जून 2025 के हमलों के बाद ईरान ने नए साइट्स बनाए, जो मिसाइल और न्यूक्लियर प्रोग्राम को सुरक्षित कर देते। नेतन्याहू ने इसे ‘क्विक एंड डिसाइसिव’ बताया और कहा कि यह रीजिम चेंज यानी ईरान की सत्ता के पतन की स्थितियाँ पैदा करेगा।
अमेरिकी वाइस प्रेसिडेंट जेडी वेंस ने कहा कि ट्रंप का लक्ष्य ईरान का ‘माइंडसेट’ बदलना है, ताकि वे कभी न्यूक्लियर वेपन न बनाएँ। उन्होंने जून 2025 के हमलों को सफल बताया, लेकिन कहा कि नेगोशिएशंस नाकाम रहीं क्योंकि ईरान नहीं माना।
यूएस स्पेशल एन्वॉय स्टीव विटकॉफ ने खुलासा किया कि ईरानी नेगोशिएटर्स ने दावा किया था कि उनके पास 460 किलो 60% एंरिच्ड यूटेनियम है, जो 11 बम बना सकता है। ट्रंप प्रशासन ने इसे रोकने के लिए स्ट्राइक्स किए।
CFR के अनुसार, इजरायल ईरान को एक्जिस्टेंशियल थ्रेट मानता है, क्योंकि न्यूक्लियर ईरान मिडिल ईस्ट को डेस्टेबलाइज करेगा। अमेरिका ने JCPOA से 2018 में बाहर निकलने के बाद सैंक्शंस लगाए, और अब 2026 में ओमान में बातचीत जारी है।
ईरान का परमाणु कार्यक्रम: शुरुआत से आज तक
1950-1970: ईरान ने अमेरिका और पश्चिमी देशों की मदद से परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम शुरू किया। 1979: ईरानी क्रांति के बाद कार्यक्रम धीमा पड़ा। 2002: नतांज़ और अराक में गुप्त परमाणु स्थलों का खुलासा हुआ। 2015: JCPOA (ईरान परमाणु समझौता) हुआ, जिसमें ईरान ने यूरेनियम संवर्धन सीमित करने का वादा किया। 2018: अमेरिका ने समझौते से बाहर निकलकर कठोर प्रतिबंध लगाए। 2025: इजरायल और अमेरिका ने ईरान के परमाणु स्थलों पर बमबारी की।
ईरान न्यूक्लियर हथियार क्यों चाहता है?
ईरान का न्यूक्लियर प्रोग्राम 1950 के दशक में शाह के समय ‘एटम्स फॉर पीस’ के तहत अमेरिकी मदद से शुरू हुआ था। 1979 की इस्लामिक रेवोल्यूशन के बाद सस्पेंड हुआ, लेकिन 1980 के दशक में हुए ईरान-इराक वॉर में केमिकल अटैक्स के बाद रिवाइव हो गया। ईरान इसे ‘पीसफुल’ बताता है, लेकिन वेस्टर्न एनालिस्ट्स कहते हैं कि यह वेपन रिसर्च है।
इसके पीछे ईरान का मकसद इजरायल के न्यूक्लियर आर्सेनल और अमेरिकी थ्रेट्स के खिलाफ खुद को मजबूत करना है। ईरान के पास मिडिल ईस्ट का सबसे बड़ा बैलिस्टिक मिसाइल आर्सेनल है, जो 2000 किमी तक मार कर सकता है। न्यूक्लियर वेपन से वे रीजनल पावर बनेंगे, प्रॉक्सीज (हिजबुल्लाह, हूती) को स्ट्रॉन्ग करेंगे। IAEA रिपोर्ट्स कहती हैं कि ईरान ने 60% एंरिचमेंट बढ़ाया, जो वेपन्स-ग्रेड (90%) के करीब है।
ईरान के अधिकारी कहते हैं कि ‘कॉर्नर्ड कैट’ होने पर डॉक्ट्रिन चेंज कर सकते हैं। ‘कॉर्नर्ड कैट’ (घिरी हुए बिल्ली) का मतलब है कि जब कोई जीव खतरे में घिर जाता है, तो वह आक्रामक हो जाता है – यानी ईरान भी अस्तित्व पर संकट दिखने पर अपनी नीति बदल सकता है।
अप्रैल 2024 में IRGC के न्यूक्लियर सिक्योरिटी कमांडर ब्रिगेडियर जनरल अहमद हग्तलाब ने कहा कि अगर इजरायल ईरान की न्यूक्लियर साइट्स पर हमला करता है या धमकी देता है तो ईरान अपना ‘न्यूक्लियर डॉक्ट्रिन रिवाइज’ (परमाणु नीति संशोधित) कर सकता है।
अप्रैल 2024 के इजरायल पर ड्रोन-मिसाइल हमले के बाद उन्होंने धमकी देते हुए कहा था, “हमारे पास इजरायल की न्यूक्लियर साइट्स की जानकारी है, और जवाबी मिसाइल हमले तैयार हैं।”
इजरायल-अमेरिका क्यों रोकना चाहते हैं?
इजरायल के लिए ईरान एक्जिस्टेंशियल थ्रेट है। नेतन्याहू कहते हैं कि 95% मिडिल ईस्ट की परेशानियाँ ईरान से हैं। न्यूक्लियर ईरान सऊदी, UAE जैसे देशों को आर्म्स रेस में धकेलेगा। इजरायल ने पहले इराक (1981), सीरिया (2007) के रिएक्टर्स बम किए।
अमेरिका ईरान को US इंटरेस्ट्स के खिलाफ मानता है। ट्रंप ने 2018 में JCPOA छोड़ा क्योंकि यह अस्थायी था। 10-15 साल बाद खत्म हो जाता, एंरिचमेंट फिर शुरू हो जाता।
ट्रंप इसे कमजोर मानते थे, इसलिए अधिक से अधिक सैंक्शंस लगाए। उनका कहना था कि नई डील ‘इंडेफिनिट’ यानी हमेशा के लिए होनी चाहिए। उनका लक्ष्य ये है कि कोई न्यूक्लियर वेपन नहीं हो, मिसाइल प्रोग्राम खत्म किया जाए और प्रॉक्सी सपोर्ट मिलना बंद हो।
ट्रंप के स्पेशल एन्वॉय स्टीव विटकॉफ ने कहा कि ईरान ने ‘इनएलियनेबल राइट’ माँगी, लेकिन US ने कहा कि हम रोकेंगे। रीजिम चेंज यानी सत्ता में बदलाव से पीस डील्स होंगी। रीजिम चेंद को लेकर ईरान में लंबे समय से विरोध प्रदर्शन होते आए हैं। इस दौरान खामेनेई ने हजारों लोगों को मरवा दिया।
ट्रंप ने जनवरी 2026 में इसे लेकर खामेनेई को चेतावनी भी दी थी कि ईरान प्रोटेस्टर्स की हत्या बंद करे, वरना मिलिट्री एक्शन लिया जाएगा।
क्या है ईरान का न्यूक्लियर डॉक्ट्रिन
ईरान का न्यूक्लियर डॉक्ट्रिन सरल शब्दों में यही कहता है कि ईरान परमाणु बम या हथियार कभी नहीं बनाएगा। यह खामेनेई के फतवे पर टिका है, जो इस्लामिक नियमों से आता है। ईरान का दावा है कि उसका प्रोग्राम बिजली और मेडिकल के लिए है। NPT संधि में शामिल होने से उन्हें यूरेनियम संवर्धन (3-5%) का अधिकार है। लेकिन वे इसमें 60% तक पहुँच गए, जो बम के करीब (90%) है।
ईरान ने न्यूक्लियर नॉन-प्रोलिफरेशन ट्रीटी (NPT) पर हस्ताक्षर किए हैं, लेकिन 2015 के JCPOA (संयुक्त व्यापक कार्य योजना) समझौते के बाद उसने कई उल्लंघन किए हैं। IAEA (अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी) का कहना है कि ईरान ने पर्छिन और लाविसान-शियन साइट्स जैसी जगहों पर गुप्त अनुसंधान किया है।
डॉक्ट्रिन के अनुसार ईरान का कार्यक्रम केवल शांतिपूर्ण ऊर्जा उत्पादन के लिए है, लेकिन 60% तक यूरेनियम संवर्धन (सिविल उपयोग के लिए सामान्यतः 3-5% पर्याप्त) ने संदेह पैदा कर दिया है।
हालिया बदलाव के संकेत मिले हैं, जहाँ ईरानी अधिकारी कहते हैं कि बाहरी खतरों की स्थिति में डॉक्ट्रिन में परिवर्तन संभव है। खामेनेई के सलाहकार कमल खर्राजी ने कहा है कि यदि ईरान के अस्तित्व पर खतरा आया तो सैन्य डॉक्ट्रिन बदल दी जाएगी। उन्होंने दावा किया कि अनुमति मिलने पर ईरान एक हफ्ते में ही परमाणु परीक्षण कर सकता है।
खामेनेई के ‘परमाणु फतवा’ की सच्चाई क्या है?
खामेनेई का फतवा ईरान द्वारा दुनिया को परमाणु हथियारों को ‘हराम’ यानी इस्लामिक नियमों में निषिद्ध के तौर पर बताकर दुनिया भर में प्रचारित किया गया, लेकिन असल में यह एक फर्जी नैरेटिव है।
अटलांटिक काउंसिल के विश्लेषण के अनुसार, 2004 में तत्कालीन न्यूक्लियर नेगोशिएटर हसन रूहानी ने यूरोपीय देशों को बताया कि खामेनेई ने फतवा जारी किया है, जो NPT से ज्यादा मजबूत है।
2003 में इराक इनवेजन के बाद खामेनेई ने कहा, ‘हम बॉम्ब नहीं चाहते।’ 2004 में रूहानी ने EU को बताया कि फतवा है। लेकिन खामेनेई ने कभी लिखित फतवा नहीं जारी किया।
उनके भाषणों में भी ‘उपयोग’ को हराम कहा गया, प्रोडक्शन या स्टोरेज पर कोई बात नहीं की गई।उनकी वेबसाइट पर 85 बयानों में सिर्फ उपयोग पर ध्यान केंद्रित किया गया है।
यह नैरेटिव 2003 इराक इनवेजन के बाद शुरू हुआ, जब ईरान ने अपना अस्तित्व बचाने के लिए इसे इस्तेमाल किया। अब अगर बात करें शिया लॉ की तो शिया कानून में फतवा स्थायी नहीं बल्कि रिवर्सिबल (बदलने योग्य) है, जैसे 1890s टोबैको फतवा। अधिकारी जैसे अली अली (2021) ने कहा: “कॉर्नर्ड कैट अलग व्यवहार करेगी।”
शिया लॉ में फतवा रिवर्सिबल है। अलवी ने कहा, ‘कॉर्नर्ड कैट अलग बिहेव करेगी।’ साइंटिस्ट्स कहते हैं कि खामेनेई कल स्टांस चेंज कर सकते हैं। यह पॉलिटिकल टूल है, जैसे 1890 के दशक में जारी हुआ तंबाकू फतवा।
तंबाकू फतवा की कहानी ऐसी है कि काजर सत्ता में नासिर अल-दीन शाह ने 1890 में ब्रिटेन को तंबाकू व्यापार का एकाधिकार दे दिया। इसके बाद धर्मगुरु मिर्जा हसन शिराजी ने दिसंबर 1891 में फतवा जारी किया, “तंबाकू का उपयोग इमाम महदी के खिलाफ युद्ध है।” इसके बाद लाखों ईरानियों ने तंबाकू पीना बंद कर दिया।
परिणाम में ईरान की अर्थव्यवस्था चरमरा गई और जनवरी 1892 में फतवा वापस ले लिया गया और फिर धूम्रपान वापस शुरू हो गया। खामेनेई के न्यूक्लियर फतवे को इसी तरह ‘रिवर्सिबल’ बताया जाता है।
ईरान न्यूक्लियर प्रोग्राम की पूरी कहानी
ईरान का परमाणु कार्यक्रम 1957 में अमेरिका की मदद से शुरू हुआ था, जब शाह के समय ‘एटम्स फॉर पीस’ योजना के तहत सहयोग हुआ। 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद यह कार्यक्रम निलंबित हो गया, लेकिन 1980 के दशक में ईरान-इराक युद्ध के दौरान इसे पुनर्जनन मिला। 2000 के दशक में नतांज और फोर्डो जैसी गुप्त साइटों का खुलासा होने पर IAEA ने सवाल उठाए।
2015 में JCPOA समझौते से यूरेनियम संवर्धन सीमित (3.67%) हुआ और IAEA निरीक्षण बढ़े। 2018 में ट्रंप ने इससे बाहर निकल गए और कड़े प्रतिबंध लगाए। इसके जवाब में ईरान ने ब्रेकआउट टाइम (बम बनाने की अवधि) कम कर दिया।
2024 में ईरान ने इजरायल पर सीधा हमला किया। जून 2025 में इजरायल-अमेरिका ने नतांज, इस्फहान पर स्ट्राइक्स किए, और IAEA ने नवंबर 2024 में 182 किलो 60% संवर्धित यूरेनियम का अनुमान लगाया। फरवरी 2026 में फिर हमले हुए।
इस कार्यक्रम ने मिडिल ईस्ट को युद्ध के कगार पर ला खड़ा कर दिया। इजरायल-ईरान के बीच टकराव अब बढ़ गया है और प्रॉक्सी वॉर तेज हुए हैं। सऊदी अरब ने कहा है कि ईरान को हथियार मिले तो हमें भी बनाने होंगे। सबसे चिंताजनक बात ये है कि IAEA को ईरान के स्टॉक की जगहों का पता नहीं है जो सबसे बड़ा खतरा है।
war on the rocks का फरवरी 2026 का एक लेख कहता है कि ईरान में सैन्य हमले न्यूक्लियर इंफ्रास्ट्रक्चर (सेंट्रीफ्यूज, प्लांट्स) को नष्ट कर सकते हैं, लेकिन कार्यक्रम को पूरी तरह समाप्त नहीं कर सकते। इसके कई कारण हैं।
ईरान के पास अब भी यूरेनियम का बड़ा स्टोरेज है, जिसे IAEA अब तक खत्म नहीं कर पाया है। ईरान ने नतांज के मलबे पर ही नए अंडरग्राउंड बंकर्स बनाए। ईरान के 1000+ न्यूक्लियर वैज्ञानिक कहीं भी नए प्लांट्स बना सकते हैं।
मिडिल ईस्ट का क्या है भविष्य: रीजिम चेंज या आर्म्स रेस?
ईरान के न्यूक्लियर संकट को लेकर भविष्य देखा जाए तो दो मुख्य रास्ते दिख रहे हैं। पहला, या तो रीजिम चेंज हो यानी ईरानी सरकार का पतन होगा और या फिर मिडिल ईस्ट में न्यूक्लियर आर्म्स रेस शुरू होगी। इसमें देशों के बीच हथियारों की होड़ लगेगी और स्थिति और बदतर होती चली जाएगी।
हालिया इजरायल-अमेरिकी स्ट्राइक्स ने ईरान के न्यूक्लियर इंफ्रास्ट्रक्चर को काफी नुकसान पहुँचाया है, लेकिन संवर्धित यूरेनियम का मटेरियल और न्यूक्लियर एक्सपर्ट्स अभी भी ईरान के पास बरकरार है।
इसके अलावा ओमान में चल रही डिप्लोमेटिक टॉक्स फेल हो चुकी हैं, जिससे अब पूरी तरह से क्षेत्रीय युद्ध की आशंका बढ़ गई है। ईरान IAEA निरीक्षण के बिना ही अपने कार्यक्रम का पुनर्निर्माण करेगा। इके कारण ये मिडिल ईस्ट में और अधिक असुरक्षा का मैहौल पैदा करेगा।
दूसरी ओर डोनाल्ड ट्रंप का रीजिम चेंज का आह्वान इराक (2003) और लीबिया (2011) की तरह जोखिम भरा हो सकता है, जहाँ सरकार गिरने से अराजकता फैल गई। इससे मिडिल ईस्ट में न्यूक्लियर आर्म्स रेस का खतरा मंडरा रहा है, जहां सऊदी अरब जैसे देश भी हथियार बनाने पर उतर आएँगे।
बात 28 फरवरी 1757 की है। होली के त्यौहार में डूबे मथुरा-वृंदावन में हर तरह उल्लास का माहौल था। लोग खुशी में झूम रहे थे। लेकिन अफगान शासक अहमदशाह अब्दाली की नजर मथुरा-वृंदावन और आसपास के इलाके को लग गई थी। उसने अपनी सेना की एक टुकड़ी मथुरा-वृंदावन की तरफ भेजा। इसका नेतृत्व सरदार जहान खान कर रहा था।
इसकीौ जानकारी मिलते ही जाट राजकुमार जवाहर सिंह करीब 5000 योद्धाओं के साथ मथुरा की सीमा पर खड़े थे। मथुरा में आक्रांताओं को घुसने नहीं देने के लिए उन्होंने अहमद शाह अब्दाली की सेना के साथ 9 घंटे तक संघर्ष किया। इस दौरान उनके ज्यादातर सैनिक वीरगति को प्राप्त हुए। लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। इसके बाद मथुरा-वृंदावन में जमकर मारकाट मची। होली मनाने आए हजारों भक्तों को काट डाला गया। सड़कें खून से लाल हो गई।
Hindu Genocide of 1757 during Holi
28 Feb 1757. Jat prince Jawahar Singh with 5000 men offered resistance against Ahmad Shah Abdali's forces near Mathura fr 9 hrs, but in vain. What followed was genocide of 1000s of devotees who assembled in Mathura/Vrindavan 2 celebrate Holi 👇 pic.twitter.com/1i9pGZgV8o
सरदार खान ने आम लोगों और तीर्थयात्रियों की हत्या कर उसकी खोपड़ी इकट्ठा करने का आदेश अपने आदमियों को दिया था, क्योंकि अहमदशाह अब्दाली ने उसे हर सिर पर 5 रुपए ईनाम देने की बात कही थी। जाहिर है बड़े पैमाने पर लोगों का कत्लेआम कर खोपड़ी जमा किए जा रहे थे।
अब्दाली ने आदेश दिया था, “जाट की सीमाओं में जाओ और उसके कब्जे वाले हर शहर और जिले को लूटो और तबाह मचा दो। मथुरा-वृंदावन हिंदुओं की पवित्र जगह है। वहाँ इतना कत्लेआम मचाओ कि लोग हजारों सालों तक याद रखें। उस राज्य में कुछ भी मत छोड़ना। यहाँ से लेकर अकबराबाद (आगरा) तक कुछ भी बचना नहीं चाहिए।”
अहमदशाह अब्दाली ने ये भी कहा था कि वे जहाँ भी जाएँ, बारूद और तलवार साथ रखें। जो भी लूट का माल उन्हें मिले, वह ले लें। हर कोई जो काफिरों के सिर काटकर लाए, उसे सेनापति के तंबू के सामने फेंक दे। सबका हिसाब-किताब लगा कर सरकारी फंड से हर सिर के लिए पाँच रुपये दिए जाएँगे।
1 मार्च की सुबह-सुबह अफगान सेनापति सरदार जहान खान शहर में आया। उसने देखा कि शहर को बचाने के लिए न तो कहीं खाई खोदी गई थी और न ही मजबूत दीवार बनाई गई थी। मथुरा में बस भगवान कृष्ण के भक्त, उनकी पूजा में लीन पुजारी और तीर्थयात्री थे। होली के रंग में खून का रंग भी शामिल हो चुका था। सरदार जहान खान को अपने बादशाह अब्दाली को खुश करने का इससे अच्छा मौका नहीं मिल सकता था। उसने शहर में जो दिख रहा था, उसे मारना शुरू किया और लूटपाट करने लगा।
28 फरवरी को उसका जिस तरह बहादुरी से जाटों ने मुकाबला किया था, उसका गुस्सा भी था। इसलिए किसी पर भी रहम न करने का आदेश उसने अपनी सेना को दिया। हिंदुओं के खून से पूरा इलाका लहुलुहान हो गया। खून की नदियाँ सड़कों पर बह गई। शहर को लूटने और कत्लेआम से भी जब उसका मन नहीं भरा, तो उसने शहर में आग लगा दी। शहर में जहाँ भी भगवान की मूर्तियाँ दिखीं, उन्हें भारी हथियार जैसे- कुल्हाड़ी से मार-मार कर टुकड़े-टुकड़े कर दिए गए।
बच्चों को मार कर उन्हें पोलो बॉल की तरह एक तरफ से दूसरी तरफ फेंका जा रहा था। महिलाओं को अपनी इज्जत बचाने के लिए जल समाधि लेने के लिए मजबूर होना पड़ा। जो दिखी उनकी आबरू लूट ली गई और मार डाला। अमीर लोगों की संपत्ति लूटने के बाद खूबसूरत हिन्दू महिलाओं को बंधक बना कर अब्दाली का सेनापति साथ ले गया।
यमुना किनारे झोपड़ी में रहने वाले कृष्ण भक्तों को भी नहीं छोड़ा। बैरागी और संन्यासी साधुओं को उनकी झोपड़ियों में काट दिया गया। इस दौरान हर झोपड़ी में ‘एक कटा हुआ सिर रखा था जिसके मुँह पर मरी हुई गाय का सिर लगा था और उसके गले में रस्सी बंधी थी। मुस्लिम जौहरी के बयान के मुताबिक, मथुरा में इतनी तबाही हुई थी कि सात दिनों तक यमुना का पानी खून जैसा लाल बहता रहा और फिर पीला हो गया।
एक दिन तक जमकर उत्पात मचा कर सरदार जहान खान उसी रात मथुरा से चला गया। उसके कुछ सैनिक नजीब उद दौला के नेतृत्व में वहाँ तीन दिन तक रुका रहा। इस दौरान जो कुछ लोग बच गए थे, उन्हें मार डाला और घर से मंदिर तक हर जगह घुस कर हर कोने में बचे दौलत को लूट कर ले गया।
वृंदावन में नरसंहार
सरदार जहान खान मथुरा के बाद वृंदावन पहुँचा। मथुरा से सात मील उत्तर में वृंदावन को भी जमकर लूटा। लोगों का कत्लेआम किया और लोगों को लूटा। समीन के संस्मरणों के अनुसार, ‘जहाँ भी देखो, मारे गए लोगों के ढेर लगे हुए थे, बहुत सारी लाशें पड़ी थी। हर तरफ खून ही खून था।
रास्ते पर इतना खून था कि रास्ता पहचानना मुश्किल हो रहा था। एक जगह पर करीब 2 सौ मरे हुए बच्चों को ढेर कर दिया गया था। किसी भी लाश का सिर नहीं था, क्योंकि सिर तो अब्दाली की सेना अपने साथ ले गई थी। हर तरफ सिर्फ बदबू फैली हुई थी।
नागा साधुओं ने गोकुल में नहीं घुसने दिया
अब्दाली की सेना फिर गोकुल की ओर कूच की। अब्दाली ने शहर से छह मील दक्षिण-पूर्व में महाबन में डेरा डाला। यहाँ से उसने गोकुल को लूटने के लिए एक सेना भेजी, जो उनके कैंप से करीब दो मील दूर था। वहाँ नागा साधुओं ने मंदिर और आम लोगों की रक्षा की।
अब्दाली की सेना के खिलाफ भीषण युद्ध हुआ और नागा साधुओं ने वीरता से लड़ते हुए अब्दाली की फौज को परास्त किया। इस दौरान 2000 से ज्यादा नागा साधु वीरगति को प्राप्त हुए। बंगाल के वकील जुगल किशोर, जो उस समय शाह के कैंप में थे, ने उन्हें बताया कि गोकुल सिर्फ नंगे वैरागियों का आश्रम है और वहाँ ज्यादा पैसा नहीं है। इसलिए शाह ने अपनी टुकड़ी वापस बुला ली और गोकुल बच गया।
साधुओं और जाटों की वीरता इतिहास में स्वर्णाक्षरों में अंकित है। धर्म और मातृभूमि की रक्षा करते हुए हजारों वीरों ने होली के दिन अपनी जान देश को समर्पित किया।
बॉम्बे हाई कोर्ट ने पक्षकारों के बीच आपसी समझौता होने के बाद हाल ही में एक महत्वपूर्ण फैसले में POCSO एक्ट 2012 के तहत दर्ज FIR को रद्द कर दिया है। इस फैसले के बाद न्याय, संवेदना और कानून की सख्ती को लेकर चर्चा तेज हो गई है। इस मामले में मोहन मारुति जाधव पर उनकी नाबालिग भतीजी ने POCSO एक्ट की धारा 8 और 12 के तहत आरोप लगाए थे। साथ ही उन पर भारतीय न्याय संहिता (BNS) 2023 की कुछ धाराओं के तहत भी मामला दर्ज किया गया था।
बाद में पीड़िता ने अदालत में कहा कि अब उसे अपने चाचा से कोई शिकायत नहीं है। उसने यह भी बताया कि उसके चाचा उसे बेटी की तरह रखते हैं। अदालत ने टिप्पणी की कि यह आरोप एक ‘गलतफहमी’ की वजह से लगाए गए थे। समझौते के तहत आरोपित को 1.5 लाख रुपए जमा करने का निर्देश दिया गया। यह राशि पीड़िता की पढ़ाई के लिए मैकबुक खरीदने के उद्देश्य से तय की गई है।
13 फरवरी 2026 को दिए गए इस फैसले को एक ऐसे बढ़ते रुझान के तौर पर देखा जा रहा है, जिसमें भारतीय अदालतें आपसी समझौते के आधार पर आपराधिक मामलों की कार्यवाही रोक देती हैं, भले ही वे मामले सामान्य तौर पर समझौते योग्य (compoundable) न हों। अब सवाल उठ रहा है कि ऐसे फैसले क्यों होते हैं और सुप्रीम कोर्ट के महत्वपूर्ण निर्णय इनकी वैधता के बारे में क्या कहते हैं?
कानूनी ढाँचा: CrPC की धारा 482 के तहत केस रद्द करने की शक्ति
ऐसे समझौतों की जड़ में हाई कोर्ट की एक खास कानूनी शक्ति होती है। यह शक्ति दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC), 1973 की धारा 482 में दी गई थी, जिसे अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 528 में शामिल किया गया है। इस प्रावधान के तहत हाई कोर्ट को यह अधिकार है कि वह न्याय के हित में या कानून के दुरुपयोग को रोकने के लिए किसी FIR या आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर सकता है।
आमतौर पर कुछ अपराध ऐसे होते हैं जिनमें दोनों पक्ष आपसी समझौता कर सकते हैं। इन्हें ‘समझौता योग्य’ (compoundable) अपराध कहा जाता है और इनका प्रावधान CrPC की धारा 320 में है। लेकिन POCSO या बलात्कार जैसे गंभीर अपराध ‘गैर-समझौता योग्य’ (non-compoundable) माने जाते हैं यानी इन्हें निजी तौर पर सुलझाया नहीं जा सकता। इसके बावजूद हाल के वर्षों में अदालतों ने धारा 482 का इस्तेमाल करते हुए कुछ मामलों में कार्यवाही रद्द की है, खासकर तब जब मामला निजी विवाद का हो और दोनों पक्षों में आपसी समझौता हो चुका हो।
हालाँकि, यह अधिकार असीमित नहीं है। सुप्रीम कोर्ट पहले भी स्पष्ट कर चुका है कि FIR रद्द करना एक असाधारण कदम है और इसे बहुत सावधानी से इस्तेमाल किया जाना चाहिए। ऐसा तभी किया जाना चाहिए जब आरोप पूरी तरह बेबुनियाद हों या मुकदमा जारी रखने से नुकसान ज्यादा और फायदा कम हो। POCSO जैसे मामलों में अदालतें खास तौर पर दो बातों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश करती हैं एक तरफ समझौता और दूसरी तरफ बच्चों की सुरक्षा। कई मामलों में अगर पीड़िता बालिग हो चुकी हो और वह खुद समझौते के लिए तैयार हो या आरोपी से शादी कर चुकी हो तो अदालतें कार्यवाही रद्द करने की अनुमति दे देती हैं।
व्यवस्था पर दबाव और व्यावहारिक सोच
देश की अदालतों पर इस समय भारी बोझ है। साल 2026 की शुरुआत तक करीब 5.4 करोड़ मामले लंबित हैं जिनमें से लगभग 70% आपराधिक मामले हैं। दीवानी (सिविल) मामलों में फैसले आने में अक्सर दशकों लग जाते हैं। ऐसे में कई बार पक्षकार ज्यादा दबाव बनाने के लिए विवाद को आपराधिक रंग दे देते हैं। यानी जो मामला शुरू में पारिवारिक या कॉन्ट्रैक्ट से जुड़ा विवाद होता है, वह आगे चलकर ऐसी FIR में बदल जाता है, जिसमें यौन अपराध, मारपीट या धोखाधड़ी जैसे आरोप लगा दिए जाते हैं।
स्थिति और जटिल तब हो जाती है जब पुलिस जाँच में देरी होती है। जाँच लंबी खिंचती है, गवाह मुकर जाते हैं और समय बीतने के साथ सबूत कमजोर हो जाते हैं। ऐसे में दोष साबित करना मुश्किल हो जाता है। इन हालात में जब दोनों पक्ष आपसी समझौता कर लेते हैं तो अदालतें कई बार व्यावहारिक रुख अपनाती हैं। इससे एक तरफ लंबित मामलों का बोझ कम होता है तो दूसरी तरफ अगर पीड़िता आरोपित से शादी कर ले या अपने आरोप वापस ले ले तो सामाजिक शांति की कोशिश होती है।
केस रद्द करने के मार्गदर्शक सिद्धांत
सुप्रीम कोर्ट ने अपने कई महत्वपूर्ण फैसलों के जरिए यह साफ किया है कि गैर-समझौता योग्य अपराधों में FIR रद्द करते समय बहुत सावधानी बरतनी चाहिए। भारत की दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) के तहत जो अपराध धारा 320 में शामिल नहीं हैं उन्हें गैर-समझौता योग्य माना जाता है। इन मामलों में राज्य खुद अभियोजन चलाता है क्योंकि इन्हें समाज के खिलाफ अपराध माना जाता है।
साल 1992 के चर्चित मामले ‘हरियाणा राज्य बनाम भजन लाल’ में सुप्रीम कोर्ट ने FIR रद्द करने के 7 आधार बताए थे। इनमें यह भी शामिल था कि यदि आरोप पहली नजर में बेहद अविश्वसनीय हों या किसी अपराध का खुलासा ही न करते हों, तो अदालत हस्तक्षेप कर सकती है। इस फैसले ने बेकार और निरर्थक मुकदमों को रोकने के लिए अदालतों को एक आधार दिया।
इसके बाद 2012 के ऐतिहासिक मामले ‘ज्ञान सिंह बनाम पंजाब राज्य’ में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर समझौते से न्याय सुनिश्चित होता है, तो हाई कोर्ट को यह अधिकार है कि वह गंभीर अपराधों में भी कार्यवाही रद्द कर सकता है बशर्ते उनका स्वरूप मुख्य रूप से निजी या सिविल विवाद से जुड़ा हो। हालाँकि, अदालत ने साफ चेतावनी दी कि बलात्कार जैसे जघन्य अपराध या ऐसे अपराध जो समाज पर व्यापक असर डालते हैं उन्हें वैवाहिक या कारोबारी विवादों की तरह नहीं देखा जा सकता। ऐसे मामलों में FIR रद्द करना बेहद सावधानी और सीमित परिस्थितियों में ही संभव है।
इसके आगे बढ़ते हुए सुप्रीम कोर्ट ने 2014 के मामले ‘नरेंद्र सिंह बनाम पंजाब राज्य’ में यह स्पष्ट किया कि हत्या के प्रयास जैसे गंभीर मामलों में भी किन परिस्थितियों में FIR रद्द की जा सकती है। कोर्ट ने कहा कि फैसला लेते समय 3 बातों पर खास ध्यान दिया जाना चाहिए अपराध की गंभीरता, समझौते की सच्चाई (क्या वह दबाव में तो नहीं हुआ) और दोष सिद्ध होने की संभावना।
इसके बाद 2017 में ‘पर्बतभाई अहीर बनाम गुजरात राज्य’ में सुप्रीम कोर्ट ने फिर दोहराया कि समझौते के बावजूद आर्थिक अपराधों या ऐसे मामलों में FIR रद्द नहीं की जानी चाहिए जिनका समाज पर व्यापक असर पड़ता है।
खास तौर पर यौन अपराधों के मामलों में अदालतें बेहद सतर्क रहती हैं क्योंकि ऐसे अपराधों का असर सिर्फ पीड़ित पर ही नहीं, बल्कि पूरे समाज पर पड़ता है। 2025 के मामले ‘मधुकर बनाम महाराष्ट्र राज्य’ में SC ने कहा कि बलात्कार से जुड़ी FIR को केवल ‘असाधारण परिस्थितियों’ में ही रद्द किया जा सकता है। यह तभी संभव है जब दोनों पक्षों के बीच स्वेच्छा से समझौता हुआ हो और अदालत को लगे कि मुकदमा जारी रखने में कोई जनहित नहीं है।
हालाँकि, 2024 के मामले ‘रामजी लाल बैरवा बनाम राजस्थान राज्य’ में सुप्रीम कोर्ट ने सिर्फ समझौते के आधार पर POCSO की कार्यवाही रद्द करने से साफ इनकार कर दिया था। अदालत ने कहा कि POCSO कानून का मुख्य उद्देश्य बच्चों को शोषण से बचाना है इसलिए केवल आपसी समझौता इस तरह के गंभीर मामलों को खत्म करने का आधार नहीं बन सकता।
FIR रद्द करने और ना करने का पैटर्न
अलग-अलग मामलों में अदालतों का रुख इसी सिद्धांत पर आधारित दिखाई देता है। POCSO मामलों में कई बार FIR तब रद्द की जाती है जब पीड़िता आरोपित से शादी कर चुकी हो और दोनों पारिवारिक जीवन जी रहे हों।
2025 में सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले में कार्यवाही इसलिए समाप्त कर दी गई क्योंकि एक शादीशुदा दंपती को लंबे मुकदमे से परेशान करना उचित नहीं माना गया। इसी तरह 2025 में केरल हाई कोर्ट ने दो POCSO मामलों को समझौते के बाद इसलिए रद्द कर दिया क्योंकि दोनों मामलों में शादी हो चुकी थी। 2023 में दिल्ली हाई कोर्ट ने भी एक POCSO एफआईआर को खत्म कर दिया था, जहाँ दोनों पक्ष नाबालिग थे और आपसी समझौता हो चुका था।
हालाँकि, हर मामले में राहत नहीं मिलती। 2026 में मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने समझौते के बावजूद बलात्कार से जुड़े POCSO मामले को रद्द करने से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि पीड़िता का शरीर ‘उसका मंदिर’ है और ऐसा अपराध सामाजिक अपराध है।
इसी तरह 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने एक शिक्षक के खिलाफ दर्ज POCSO एफआईआर को बहाल कर दिया। इससे पहले हाई कोर्ट ने पारिवारिक समझौते के आधार पर उसे रद्द कर दिया था लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने बच्चों की सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए उस आदेश को पलट दिया।
निष्कर्ष: न्याय या समझौता?
ऐसे समझौते अदालतों पर बढ़ते बोझ, जजों की कमी और लंबी कानूनी प्रक्रिया के बीच एक व्यावहारिक रास्ता बनकर सामने आते हैं। हालाँकि, आलोचकों का कहना है कि इससे गंभीर अपराधों के खिलाफ सख्त संदेश कमजोर हो सकता है, खासकर बच्चों से जुड़े मामलों में।
बॉम्बे हाई कोर्ट के मामले में शिक्षा के लिए आर्थिक सहायता का आदेश पीड़ित-केंद्रित सोच दिखाता है, लेकिन यह सवाल भी उठाता है कि क्या पैसों से सम्मान और न्याय की भरपाई हो सकती है।
सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया है कि समझौता सार्वजनिक हित से ऊपर नहीं हो सकता। अदालतों को हर मामले में तथ्यों को सावधानी से परखते हुए यह सुनिश्चित करना होगा कि FIR रद्द करना सुविधा नहीं बल्कि न्याय का माध्यम बने।
(यह खबर मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई है जिसे इस लिंक पर क्लिक कर पढ़े सकते हैं)
भारत की आत्मा गाँवों में बसती है और गाँवों की रीढ़ हैं हमारी महिलाएँ। आज भी, जब देश तेजी से विकास के पथ पर अग्रसर है, ग्रामीण भारत की महिलाएँ आर्थिक और सामाजिक रूप से सशक्तिकरण की राह में अनेक चुनौतियों का सामना कर रही हैं। ऐसे में उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले में ‘पहल’ संस्थान द्वारा शुरू की गई एक पहल न केवल इन महिलाओं के जीवन में बदलाव लाने वाली है बल्कि यह जनसेवा और राजनीति के आध्यात्मिकीकरण का एक सशक्त उदाहरण भी प्रस्तुत करती है।
जब 100 स्वयं सहायता समूहों की महिलाएँ ‘रामजी का सोहर’ गाते हुए ‘रामजी के पेड़े’ का निर्माण करेंगी, तो यह एक व्यवसाय होने के साथ-साथ आस्था, संस्कृति, आत्मनिर्भरता और सामुदायिक एकता का एक अनूठा सम्मिश्रण भी होगा।
‘पहल’ संस्थान का यह प्रयास सचमुच एक सार्थक पहल है। बस्ती के 100 स्वयं सहायता समूहों को 1-1 लाख रुपए की आर्थिक सहायता (जो 25-25 हजार की चार किश्तों में दी जाएगी) प्रदान करना एक साहसिक और दूरदर्शितापूर्ण कदम है। यह राशि इन महिलाओं के हाथों में एक ऐसा उपकरण है, जिससे वे न केवल अपनी बल्कि अपने परिवार और समाज की तकदीर बदल सकती हैं। यह पूँजी उन्हें एक ऐसे उद्यम से जोड़ती है जिसकी जड़ें भारतीय संस्कृति और आस्था में गहराई तक धँसी हुई हैं।
‘रामजी के पेड़े’ का निर्माण इस परियोजना की आत्मा है। यह कोई साधारण मिठाई नहीं है। यह प्रसाद है, जो अयोध्या के भव्य राम मंदिर में विराजमान भगवान श्रीराम को चढ़ाया जाएगा। जब महिलाएँ इन पेड़ों को बनाएँगी तो उस प्रक्रिया में वो ‘रामजी का सोहर’ (लोकगीत) गाएँगी। ‘रामजी का सोहर’ गीत केवल एक लोकगीत नहीं है बल्कि यह हमारी सांस्कृतिक विरासत का एक जीवंत दस्तावेज है।
जब ये महिलाएँ काम करते हुए इन गीतों को गाएँगी तो वे न केवल अपनी परंपराओं को संरक्षित करेंगी बल्कि उन्हें आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाने का काम भी करेंगी। यह सांस्कृतिक पुनरुत्थान का एक सुंदर उदाहरण है, जहाँ लोक कला और आधुनिक उद्यम साथ-साथ चलते हैं। यह परिदृश्य हमें उस भारत की याद दिलाता है, जहाँ हर काम में ईश्वर का स्मरण होता था, हर उत्सव में सामूहिकता होती थी और हर उपज में आस्था का समावेश होता था।
देश-विदेश से राम भक्तों द्वारा इस प्रसाद के लिए आने वाले ऑर्डर इस बात के प्रमाण होंगे कि आस्था की कोई सीमा नहीं होती और न ही उसकी कोई कीमत होती है। यह माँग इन महिलाओं के उत्पाद को एक वैश्विक पहचान देगी और उन्हें आर्थिक रूप से इतना सशक्त बनाएगी कि वे आत्मनिर्भर भारत के सच्चे निर्माता साबित होंगी।
इस परियोजना के केंद्र में जनसेवा की भावना निहित है। यह कोई दान या हैंडआउट नहीं है बल्कि एक स्थायी आजीविका का माध्यम है। यह महिलाओं को उनके पैरों पर खड़ा होने का अवसर देता है। वे अब केवल परिवार की आर्थिक स्थिति में सहायक नहीं रहेंगी बल्कि वे स्वयं आय के मुख्य स्रोतों में से एक बन जाएँगी।इससे उनके परिवारों का जीवन स्तर तो ऊपर उठेगा ही, साथ ही समाज में उनकी स्थिति और सम्मान में भी अभूतपूर्व वृद्धि होगी।
एक आत्मनिर्भर महिला न केवल अपने बच्चों की शिक्षा का खर्च उठा सकती है बल्कि वह उनके स्वास्थ्य और पोषण पर भी ध्यान दे सकती है। इस तरह, यह एकल पहल सामाजिक विकास के कई आयामों को एक साथ छूती है।
इस पूरी अवधारणा में ‘राजनीति का आध्यात्मिकीकरण’ का गूढ़ दर्शन छिपा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी राजनीति में नैतिकता और अध्यात्म के समावेश पर बल दिया है। आज के संदर्भ में, राजनीति का आध्यात्मिकीकरण का अर्थ है, विकास की राजनीति को आस्था, संस्कृति और सामुदायिक मूल्यों से जोड़ना। यह केवल वोट बैंक की राजनीति से ऊपर उठकर, जनता की भावनाओं और आस्था को विकास की मुख्यधारा में शामिल करने का प्रयास है।
यहाँ ‘राम’ केवल एक देवता नहीं हैं बल्कि भारतीय सांस्कृतिक चेतना के प्रतीक हैं। उनसे जुड़कर यह आर्थिक गतिविधि एक पवित्र आयाम ग्रहण कर लेती है। जब राजनीतिक इच्छाशक्ति और सामाजिक संगठन मिलकर ऐसी परियोजनाओं को बढ़ावा देते हैं, जिनका सीधा संबंध लोगों की आस्था से हो, तो वह जनसेवा महज एक सरकारी योजना न रहकर एक जनांदोलन का रूप ले लेती है।
यह परियोजना दर्शाती है कि कैसे एक धार्मिक स्थल (राम मंदिर) और धार्मिक आयोजन को आर्थिक गतिविधियों के केंद्र में रखा जा सकता है। इससे एक ऐसा इकोसिस्टम तैयार होता है, जहाँ आस्था उत्पादन को बढ़ावा देती है, उत्पादन रोजगार पैदा करता है और रोजगार समृद्धि लाता है। यह राजनीति का वह रूप है जो विकास को धार्मिक आस्था से जोड़कर उसे अधिक समावेशी और प्रभावशाली बनाता है।
बस्ती की यह पहल केवल एक स्थानीय घटना नहीं है, यह एक विचार है – एक ऐसा विचार जो पूरे देश में दोहराया जा सकता है। यह दर्शाता है कि कैसे आस्था, संस्कृति और आधुनिक अर्थशास्त्र का सम्मिलन समाज के सबसे कमजोर वर्गों को सशक्त बना सकता है।
‘रामजी के पेड़े’ का निर्माण केवल एक मिठाई बनाने की प्रक्रिया नहीं है, यह आत्मसम्मान, आत्मनिर्भरता और आध्यात्मिकता का निर्माण है। जनसेवा का यह मॉडल, जो राजनीति के आध्यात्मिकीकरण की अवधारणा पर आधारित है, हमें सिखाता है कि सच्चा विकास वही है जो जनता की आस्था और आकांक्षाओं से जुड़ा हो।
होली नजदीक आने से ठीक पहले एक बार फिर हिंदुओं को बाँटने का खेल शुरू हो गया है। सोशल मीडिया पर कुछ लोग खुद को अंबेडकरवादी बताकर खुलेआम कह रहे हैं कि होली उनका त्योहार नहीं है। वीडियो बनाकर समाज के अन्य लोगों से त्योहार से दूर रहने की अपील की जा रही है। माहौल ऐसा बनाया जा रहा है कि बहुजन समाज के लिए होली एक त्योहार नहीं, बल्कि शोक है।
सिर्फ इतना ही नहीं, होलिका दहन की कथा को भी तोड़-मरोड़कर पेश किया जा रहा है। भगवान विष्णु के भक्त प्रह्लाद की कहानी को अलग रंग देकर लोगों के मन में भ्रम फैलाने की कोशिश हो रही है। ‘होलिका के बलात्कार’ की भी कहानी सुनाई जा रही है। साफ दिख रहा है कि होली से पहले हिंदुओं को बाँटने की साजिश रची जा रही है।
‘मनुवादी विचारधारा वालों ने होलिका का किया बलात्कार’
ऐसे कई वीडियो इंटरनेट पर वायरल हो रहे हैं। सबसे पहला वीडियो आँचल गौतम नाम की युवती का है, जो गाँव के लोगों को होलिका दहन के इतिहास के बारे में जानने के लिए कहती है। खुद को अंबेडकरवादी बताते हुए आँचल दावा करती है कि राजा हिरण्यकशिपु उनके समाज के थे और उनकी बहन होलिका के साथ ‘मनुवादी विचारधारा’ के लोगों ने बलात्कार किया था।
“मनुवादियों ने प्रह्लाद को शराबी बना दिया। अपनी शादी से एक दिन पहले, जब होलिका अपने भतीजे प्रह्लाद को भोजन परोसने गई, तो मनुवादियों ने होलिका के साथ बलात्कार किया और उसे जिंदा जला दिया। होली मत मनाओ।”
आँचल गाँव के लोगों को संबोधित करते हुए कहती हैं कि हम सभी लोगों को होली नहीं मनाना चाहिए। वे होलिका की मनगढ़ंत कथा सुनाते हुए कहती है, “एक राजा हिरण्यकशिपु थे हमारे समाज के। उनकी बहन थी होलिका। हेणाकश्यप के पुत्र थे प्रह्लाद। मनुवादी विचारधारा के लोग प्रह्लाद को दारू-शराब पिलाते थे। होलिका प्रह्लाद को बहुत ज्यादा मानती थी।”
वह आगे कहती है, “प्रह्लाद कहीं घूमने गया था, वहाँ उसको शराब पिला दी। उसके पीछे होलिका अपने भतीजे को खाना खिलाने अपने हाथों से गई। वो प्रह्लाद को ढूँढती है, वहाँ मनुवादी विचारधारा के लोग होलिका के साथ रातभर बलात्कार करते हैं। और होलिका को जला देते हैं। और सभी लोग क्या करते है हैप्पी होली।”
इतना ही नहीं वह अपनी कहानी आगे जारी रखते हुए कहती है, “वो सब लोग एक दूसरे को रंग लगाकर जश्न मनाते हैं कि उन्होंने होलिका को मार दिया। और कोई पाप न लगे इसीलिए होली मनाते हैं। तो सोचिए अगर हमारी बहन-बेटी के साथ बलात्कार हो जाएगा तो क्या हम होली मनाएँगे? इसीलिए हम लोगों को होली नहीं मनाना चाहिए।”
अंबेडकरवादियों का होली बॉयकॉट का अभियान
आँचल गौतम की इस वीडियो पर सोशल मीडिया पर मानो अभियान छिड़ गया। एक के बाद एक अंबेडकरवादियों की वीडियो सामने आईं, जिसमें होली न मनाने की अपील की गई। साथ ही होलिका को बहुजन समाज का बताकर उसके जलने का शोक मनाने को कहा गया।
नीचे वीडियो शालू गुप्ता नाम की अंबेडकरवादी कहती हैं, “होली हमारा त्योहार नहीं है। जिंदा स्त्री को जलाकर खुशी मनाने की चली आ रही परंपरा को आँख बंद करके स्वीकार नहीं करना है। क्षमा चाहती हूँ, न ही मैं होली की बधाई किसी को दूँगी और न ही लूँगी। जय भीम”
बिहार के एक युवक सुरेंद्र कुमार ने भी कहा, “होलिका बहुजन समाज के लिए काला दिन है। समाज के लोग इतिहास जानें।” वे कहते हैं कि हिंदू धर्म ने कभी बहुजन समाज की महिलाओं का सम्मान नहीं किया, यह सम्मान उन्हें बाबा भीमराव अंबेडकर से मिला है। उन्होंने यह भी कहा कि अगर नाच-गाना करना है तो अपने महापुरुषों की जयंती पर करो।
तत्काल प्रभाव से संज्ञान लें
सुरेंद्र कुमार जोकि ( बक्सर बिहार ) का है ने फेसबुक पर होलिका माता के साथ बलात्कार का फर्जी वीडियो/दावा पोस्ट कर हिंदू भावनाओं को ठेस पहुंचाई है।
होलिका दहन हिंदू संस्कृति का पवित्र पर्व है, प्रह्लाद की रक्षा का प्रतीक है इसमें बलात्कार जैसी… pic.twitter.com/LO2LKCqAVc
जैसा यहाँ खुद को अंबेडकरवादी बताने वाले लोग होलिका दहन के पीछे का इतिहास और मनगढ़ंत कहानी बनाकर पेश कर रहे हैं। असल में ऐसा कुछ है ही नहीं। पौराणिक कथाओं के अनुसार, होली बुराई पर अच्छाई की जीत और भगवान की भक्ति की शक्ति के प्रतीक के रूप में मनाई जाती है। कथा में बताया गया है कि असुर राजा हिरण्यकशिपु चाहता था कि सभी लोग उसी की पूजा करें, लेकिन उसका पुत्र प्रह्लाद भगवान विष्णु का भक्त था। इससे क्रोधित होकर उसने प्रह्लाद को मारने की कई कोशिशें कीं।
इसी क्रम में राजा की बहन होलिका, जिसे अग्नि से न जलने का वरदान था, प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि में बैठ गई। लेकि भगवान विष्णु की कृपा से प्रह्लाद सुरक्षित बच गए और होलिका जलकर भस्म हो गई। इसी घटना की याद में फाल्गुन पूर्णिमा की रात होलिका दहन किया जाता है और अगले दिन रंगों वाली होली खेली जाती है, जो प्रह्लाद की जान बचने की खुशी का प्रतीक है।
वहीं होलिका को बहुजन समाज बताने वाले लोग भी जान लें कि होलिका ब्राह्मण स्त्री थी, जिसके पिता महान ऋषि कश्यप थे। ऋषि कश्यप की तीन संतानें थीं- होलिका, हिरण्यकशिपु और हिण्याक्ष। हिंदू शास्त्रों के मुताबिक, तीनों का स्वभाव अत्याचारी और राक्षसी बताया गया है। हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपुर का वध भगवान विष्णु ने वराह अवतार और नरसिंह अवतार में किया था। वहीं होलिका भक्त प्रह्लाद को मारने की कोशिश में खुद अग्नि में जलकर मर गई।
यहाँ अंबेडकरवादियों की मनगढ़ंत कहनी पर विराम लगता है। होलिका का न तो बलात्कार हुआ, और न ही किसी न उसे जबरदस्ती आग में जलाया। वही प्रह्लाद को मनुवादियों द्वारा शराबी और जुआरी भी नहीं बनाया गया। अंबेडकरवादियों की कहानी पूरी तरह से मनगढ़ंते है। होली हिंदुओं का त्योहार है और इसे हिंदू धर्म के हर व्यक्ति को खुशी से मनाना चाहिए, क्योंकि यह बुराई पर जीत का प्रतीक है।
अंबेडकरवादियों की मनगढ़ंत कहानी के मायने क्या हैं?
यह पहली बार नहीं है। हर साल होली से पहले कुछ कथित अंबेडकरवादी अपनी बनाई हुई कहानी लेकर सामने आ जाते हैं और कहते हैं कि होली उनका त्योहार नहीं है। वह इतिहास में दलित समाज पर हुए अत्याचार जैसी पुरानी बातें दोहराकर खुद को हिंदुओं से अलग बताने लगते हैं।
ये लोग खुलेआम हिंदू धर्म को बाँटने की साजिश रचते हैं। कम पढ़े-लिखे और भोले लोगों के बीच लंबी-लंबी बातें रखी जाती हैं। भाषणों, वीडियो और सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए उनके मन में भ्रम पैदा किया जाता है। धीरे-धीरे उनके दिमाग में शक और अलगाव का जहर भरा जाता है।
आखिर में नुकसान किसका होता है। उसी समाज का जिसे तोड़ने की कोशिश की जाती है। जहाँ आज देश को हिंदुओं की एकता की जरूरत है, वहाँ ऐसे कुछ लोग नफरत का जहर उगलते हैं और हिंदुओं को बाँटने में लग जाते हैं।