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‘असम बन सकता है मुस्लिम-बहुल प्रदेश’: सही साबित हुई CM हिमंता बिस्वा सरमा की ये चिंता, 8 मुस्लिम बहुल जिलों में बढ़े मतदाता; जानें असम SR प्रक्रिया में क्या निकला

असम में विधानसभा चुनाव से पहले विशेष मतदाता सूची संशोधन (SR) प्रक्रिया पूरी हो गई है। इस दौरान 5.86 लाख नए नाम जोड़े गए, जबकि 2.43 लाख नाम हटा दिए गए, जिससे अंतिम मतदाता सूची तैयार हो गई है। हैरानी की बात यह है कि इस संशोधित सूची में कुल मतदाता संख्या कम होने के बावजूद ये जानकारी सामने आती है कि 8 मुस्लिम-बहुत जिलों में मतदाताओं की संख्या बढ़ी है।

जिलावार आँकड़ों के अनुसार, असम के 35 जिलों में से केवल 10 जिलों में मतदाताओं की संख्या बढ़ी है। यह आँकड़ा मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा की चिंता को ही साबित करता दिख रहा है, क्योंकि इन जिलों में डेमोग्राफी और मतदाता वृद्धि के रुझान चुनावी दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं।

असम में SR की अंतिम सूची में हटाए गए 2.49 करोड़ मतदाता

SR प्रक्रिया में असम के 35 जिलों में हर बूथ-लेवल अधिकारी (BLO) ने घर-घर जाकर मतदाता सूची की पूरी जाँच की। हर व्यक्ति से उनका नाम, उम्र और पहचान के दस्तावेज स्त्यापित किए गए। इसमें यह देखा गया कि कौन नए योग्य मतदाता हैं, कौन मर चुका है या कौन दूसरी जगह स्थायी रूप से स्थानांतरित हो चुका है, और किन लोगों के नाम डुप्लीकेट या गलत तरीके से सूची में दर्ज थे।

प्रक्रिया के बाद 10 फरवरी 2026 को अंतिम मतदाता सूची जारी की गई, जिसमें कुल 2,49,58, 139 मतदाता दर्ज हैं। इनमें लगभग 1.24 करोड़ पुरुष, 1.24 करोड़ महिलाएँ और 343 तीसरें-लिंग मतदाता शामिल हैं। यह संख्या मसौदा सूची की तुलना में 2,43,485 मतदाता कम हैं, जो कि लगभग 0.97 की गिरावट दर्शाती है।

इनमें 5,86,000 नए नाम सूची में जोड़े गए, जिनमें मुख्य रूप से वे युवा शामिल थे जिन्होंने हाल ही में 18 वर्ष की उम्र पूरी की और वे लोग जिन्होंने पिछले अपडेट में अपने नाम दर्ज नहीं करवाए थे। वहीं, 2,43,000 नाम हटाए गए, जिनमें मृतक लोग, दूसरी जगह स्थाीय रूप से गए लोग और डुप्लीकेट प्रविष्टियाँ शामिल थीं।

मुस्लिम-बहुल जिलों में मतदाताओं की संख्या बढ़ी

असम के SR की प्रक्रिया पूरी होने के बाद जो डिटेल सामने आई है उसे देखकर पता चलता है कि इतनी बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम कटने के बावजूद कई जिलों में मतदाताओं की संख्या बढ़ी है। कुल 35 जिलों में से 10 जिलों में मतदाताओं की संख्या बढ़ी और इनमें से 8 मुस्लिम-बहुत जिले सबसे ज्यादा बढ़ोतरी वाले रहे हैं।

इन जिलों में ड्राफ्ट सूची की तुलना में मतदाता संख्या में बढ़ोतरी सबसे अधिक दर्ज की गई। बारपेटा में सबसे ज्यादा लगभग 28,000 (2.1% की वृद्धि) नए मतदाता जुड़े, जबकि दक्षिण सलमारा में सबसे कम करीब 200 (0.1% की वृद्धि) मतदाता बढ़े। इसी के साथ धुबरी, गोलपाड़ा, मोरीगाँव, नगाँव और बोंगाईगाँव जैसे पश्चिमी असम के जिलों में भी 5,000 से 10,000 के बीच वोटर संख्या में वृद्धि देखी गई। यह आँकड़े स्थानीय डेमोग्राफी में बदलाव को साफ दिखाता है।

इनके अलावा दो गैर-मु्स्लिम बहुल जिले माजुली और बजाली में भी मामूली वृद्धि दर्ज की गई है। माजुली में लगभग 209 और बजाली में करीब 1,300 मतदाताओं की संख्या बढ़ी है। इसके विपरीत, असम के कुछ जनजातीय बहुल जिलों जैसे दीमा हसाओ, कार्बी आंगलोंग, कोराझार और बोडोलैंड में मतदाता संख्या घट गई। कुल मिलाकर 24 जिलों में मतदाताओं की संख्या कम हुई, जबकि मुस्लिम-बहुल जिलों में बढ़ोतरी हुई।

सीएम हिमंता बिस्वा सरमा ने जताई थी चिंता

असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने पिछले कुछ समय में बार-बार राज्य की बदलती डेमोग्राफी को लेकर चिंता जताई है। उन्होंने कई सार्वजनिक मंचों पर कहा है कि अगर मौजूदा रुझान इसी तरह जारी रहे तो 2041 तक असम मुस्लिम बहुल राज्य बन सकता है।

सरमा का कहना है कि 1951 में असम में मुस्लिम आबादी लगभग 12 प्रतिशत थी, जो 2011 की जनगणना तक बढ़कर करीब 34 प्रतिशत हो गई। उनका दावा है कि कुछ जिलों में यह प्रतिशत 50 से भी अधिक हो चुका है और कई क्षेत्रों में तेजी से जनसंख्या संतुलन बदल रहा है।

मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि अगर यही रफ्तार बनी रही तो आने वाली जनणनाओं में मुस्लिम आबादी 40 प्रतिशत या उससे अधिक तक पहुँच सकती है, जिससे राज्य की सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक संरचना पर असर पड़ेगा। उन्होंने इस मुद्दे को ‘डेमोग्राफिक चैलेंज’ बताते हुए कहा कि यह केवल आँकड़ों का विषय नहीं है, बल्कि जमीन, संसाधनों, राजनीति प्रतिनिधित्व और स्थानीय समुदायों की पहचान से जुड़ा सवाल है।

अब राज्य में SR की अंतिम मतदाता सूची में मुस्लिम-बहुल जिलों में मतदाता वृद्धि के आँकड़ों से मुख्यमंत्री की चिंता सही साबित हो रही है। सीएम ने भी इसे व्यापक डेमोग्राफी परिप्रेक्ष्य में देखने की बात कही है।

न रेवड़ी, न वोट बैंक का तुष्टिकरण: UP बजट का एक संदेश यह भी, योगी 2.O के आखिरी बजट में भी लोकलुभावन की जगह लोकहित को तरजीह

उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने बुधवार (11 फरवरी 2026) को वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए 9.12 लाख करोड़ का ऐतिहासिक बजट पेश किया, यह पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 12.9% अधिक है। यह राज्य का अब तक का सबसे बड़ा बजट है। राज्य में अगले साल की शुरुआत में विधानसभा चुनाव होने हैं, ऐसे समय में आमतौर पर सरकारों से उम्मीद की जाती है कि वे लोकलुभावन घोषणाओं की झड़ी लगा दें। नई सब्सिडी, मुफ्त योजनाएँ, कर्ज माफी और कैश जैसी चीजों की घोषणा की जाए।

हालाँकि, योगी सरकार ने बजट में ‘रेवड़ी संस्कृति’ की जगह अर्थव्यवस्था को मजबूत करने वाली ठोस योजनाओं पर जोर दिया है। यह बजट इस बात का संकेत है कि जो सरकारें लगातार काम करती हैं, उन्हें चुनाव से ठीक पहले जनता को लुभाने के लिए अस्थायी राहत का सहारा लेने की आवश्यकता नहीं होती। उनके पास दिखाने के लिए काम होता है, दिशा होती है और भविष्य की स्पष्ट योजना होती है।

योगी सरकार ने कैसे दी अर्थव्यवस्था को धार

2017 में जब योगी आदित्यनाथ उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने थे तो हालात आज के जैसे नहीं थे। यूपी पर ‘बीमारू राज्य’ का ठप्पा लगा था, कानून-व्यवस्था की हालात खस्ता थी और लगता था कि गरीबी-बदहाली ही राज्य के लोगों का भविष्य है। निवेशक यहाँ आने से हिचकिचाते थे, उद्योगों का अभाव था और बेरोजगारी एक बड़ी समस्या थी।

जब दूसरे प्रदेशों में उद्योग धंधों को आगे बढ़ाया जा रहा, इन्फ्रा से लेकर रोजगार तक बढ़ाने पर जोर था तब यूपी में मुख्तार अंसारी और अतीक अहदम जैसे लोगों को प्रश्रय देकर गुंडा राज को बढ़ावा दिया जा रहा है। पिछले कुछ वर्षों में स्थिति बदली है। योगी सरकार ने कानून-व्यवस्था को सुधारने, बुनियादी ढाँचे को मजबूत करने और निवेश का माहौल बनाने पर लगातार काम किया। योगी सरकार ने माफियाओं के कब्जे से 65,000 एकड़ से अधिक जमीन मुक्त कराकर लैंड बैंक बनाया है।

योगी सरकार के प्रयासों का ही नतीजा है कि 1960 के दशक के बाद पहली बार यूपी का राष्ट्रीय GDP में हिस्सा बढ़ा है। 1960 के बाद अन्य राज्य लगातार आगे बढ़ते गए और यूपी पिछड़ता गया। एक के बाद एक साल आता रहा और उत्तर प्रदेश का शेयर राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में कम होता गया। 1960-61 में यूपी का राष्ट्रीय जीडीपी में हिस्सा 14.4% था जो गिरते-गिरते 2017-18 में 8.6% रह गया था लेकिन अब 2024-25 में बढ़कर 9.1% हो गया है।

इकोनॉमी को मजबूत करने का सबसे बड़ा तरीका है इंफ्रा का विकास। सरकार ने एक्सप्रेसवे, एयरपोर्ट और इंडस्ट्रीयल कॉरिडोर पर लगातार फोकस किया, जो न सिर्फ कनेक्टिविटी बढ़ाते हैं बल्कि रोजगार भी पैदा करते हैं। इससे राज्य की GDP बढ़ रही है और निवेश खुद-ब-खुद आ रहा है, बिना फ्री स्कीम्स के लालच दिए। योगी सरकार ने यूपी में कई इन्वेस्टमेंट समिट का आयोजन कराया जिसमें हजारों करोड़ के निवेश प्रस्ताव आए और धरातल पर उतरे भी। इस बजट में उसी नीति की निरंतरता दिखाई देती है।

जनता और सरकार के बीच विश्वास का बजट

यह बजट इस बात का संकेत है कि सरकार को जनता पर पूरा भरोसा है और जनता को CM योगी के नेतृत्व पर। चुनाव से पहले आमतौर पर सरकारें लोकलुभावन घोषणाओं का सहारा लेती हैं लेकिन इस बार ऐसा नहीं हुआ। इसकी वजह स्पष्ट है कि सरकार को अपने काम पर विश्वास है। जब सरकार जानती है कि उसने पूरे कार्यकाल में लगातार विकास किया है, तो उसे वोट पाने के लिए अतिरिक्त वादों की जरूरत नहीं पड़ती। यह बजट बताता है कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में भरोसे का एक नया आधार तैयार हुआ है, जहाँ विकास ही सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा बन गया है।

मुफ्तखोरी नहीं, विकास की सोच

जब सरकार को अपने काम पर भरोसा होता है, तब उसकी प्राथमिकता मुफ्त योजनाएँ नहीं बल्कि स्थायी विकास होता है। योगी सरकार के बजट में यही सोच दिखाई देती है। यहाँ तात्कालिक लाभ देने वाली घोषणाओं की जगह ऐसी योजनाओं पर ध्यान दिया गया है, जो लंबे समय तक प्रदेश को मजबूत करें। इंफ्रास्ट्रक्चर, उद्योग, शिक्षा, स्वास्थ्य और कृषि जैसे क्षेत्रों पर जोर इस बात का प्रमाण है कि सरकार भविष्य की नींव मजबूत करना चाहती है।

सरकार ने मुफ्तखोरी के बजाय ठोस काम पर जोर दिया है। 2026-27 में कुल कैपिटल एक्सपेंडिचर ₹2.52 लाख करोड़ रखा गया है, जो इंफ्रास्ट्रक्चर और विकास से जुड़ा है। यानी कुल बजट का करीब 22% विकास कार्यों पर खर्च किया जाना है जो बताता है कि सरकार लंबे वक्त के लिए उत्तर प्रदेश को तैयार कर रही है।

चुनाव नहीं, भविष्य को ध्यान में रखकर बनाया गया बजट

यह बजट चुनाव जीतने के लिए नहीं बल्कि उत्तर प्रदेश को आगे ले जाने के उद्देश्य से बनाया गया है। बड़े-बड़े शहरों और तीर्थनगिरयों के विकास के लिए हजारों करोड़ की योजानओं को प्राथमिकता दी गई है। इनका असर तुरंत नहीं बल्कि आने वाले वर्षों में दिखाई देगा।

आमतौर पर चुनावी बजट में अल्पकालिक लाभ देने वाली घोषणाएँ होती हैं लेकिन यहाँ लंबे समय के लिए यूपी को विकास की पटरी पर दौड़ाने की सोच दिखाई देती है। साफ है कि योगी सरकार का लक्ष्य केवल सत्ता में बने रहना नहीं बल्कि प्रदेश की आर्थिक और सामाजिक स्थिति को मजबूत करना है। यह बजट विकास की उस दिशा को दर्शाता है, जो स्थायी और दूरगामी है।

सरकार ने वोट के लिए फ्री पैसा देने की नहीं सोची बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य और कृषि जैसे सेक्टर को और मजबूत करने पर जोर दिया है। बजट में शिक्षा को रिकॉर्ड 12.4% हिस्सा मिला है, जो करीब ₹1.13 लाख करोड़ बैठता है और यह 2016-17 के मुकाबले लगभग चार गुना ज्यादा है। कृषि क्षेत्र के लिए ₹1 लाख करोड़ का प्रावधान है जो करीब 11% होता है। वहीं, स्वास्थ्य विभाग को रिकॉर्ड ₹37,956 करोड़ आवंटित हुए जो योगी सरकार आने से पहले इससे 4.5 गुना कम था।

परिवारवाद और क्षेत्रवाद से ऊपर बजट

यह बजट परिवारवाद या क्षेत्रवाद की राजनीति से अलग एक नई सोच को दर्शाता है। इसमें किसी खास क्षेत्र या राजनीतिक समूह को विशेष लाभ देने की कोशिश नहीं दिखाई देती। इसके बजाय पूरे उत्तर प्रदेश को एक इकाई के रूप में देखा गया है। सरकार का ध्यान इस बात पर है कि विकास का लाभ प्रदेश के हर कोने तक पहुँचे। यह दृष्टिकोण बताता है कि नीति निर्माण में व्यक्तिगत या क्षेत्रीय हितों की जगह राज्य के भविष्य को प्राथमिकता दी जा रही है। यह बजट उत्तर प्रदेश को एक साझा भविष्य की ओर ले जाने का प्रयास है।

यूपी का बजट किसे एक क्षेत्र जिले के विकास पर केंद्रित नहीं है प्रदेश के हर हिस्से तक विकास पहुँचाने का बीड़ा सरकार ने उठाया है। राजधानी लखनऊ में कैंसर हॉस्पिटल और कुकरैल वन क्षेत्र में नाइट सफारी पार्क के लिए 500 करोड़ का ऐलान है तो लखनऊ डेवलपमेंट एरिया व अन्य डेवलपमेंट अथॉरिटी के लिए बजट में 800 करोड़ रुपए का प्रावधान है।

मेरठ, मथुरा-वृंदावन और कानपुर डेवलपमेंट अथॉरिटी में विकास योजनाओं के लिए 750 करोड़ रुपए दिए गए हैं। वहीं, अयोध्या के विकास के लिए 100 करोड़ रुपए के फंड का ऐलान किया गया है। इसके साथ ही, मिर्जापुर, मुरादाबाद, बलरामपुर, शाहजहाँपुर और भदोही में विश्वविद्यालयों के निर्माण के लिए करीब 200 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया है।

योगी सरकार के बजट से यह स्पष्ट होता है कि निर्णय राजनीति के आधार पर नहीं बल्कि नीति के आधार पर लिए जा रहे हैं। लोकलुभावन वादों से बचकर योगी सरकार ने आर्थिक अनुशासन और जिम्मेदार शासन का संदेश दिया है। बजट में किसी के लिए बेशक रेवड़ियाँ नहीं है लेकिन ग्रामीण और शहरी, किसान और उद्योग, युवा और बुजुर्ग सभी वर्गों की जरूरतों को ध्यान में रखा गया है। यह बजट दिखाता है कि सरकार ने लोकप्रियता की जगह व्यावहारिकता को चुना है और सरकार केवल वर्तमान नहीं बल्कि भविष्य की आर्थिक स्थिति को भी ध्यान में रखकर फैसले ले रही है।

शिक्षा-इन्फ्रा-स्वास्थ्य-रोजगार… BJP सरकार ने 10 साल में बदल दी UP की तस्वीर, बजट से जानिए कैसे अखिलेश यादव के ‘दुशासन’ से प्रदेश को बनाया UP-Yogi

पिछले 10 सालों में उत्तर प्रदेश की राजनीति और अर्थव्यवस्था दोनों की तस्वीर बदल चुकी है और यह बदलाव सबसे साफ बजट के आँकड़ों में दिखाई देता है। एक ओर 2026-27 का बजट है, जिसे योगी आदित्यनाथ सरकार ने अपने कार्यकाल का 10वाँ बजट बताते हुए नए उत्तर प्रदेश की दिशा में अगला कदम बताया है, तो दूसरी ओर ठीक एक दशक पहले का वह दौर है जब अखिलेश यादव ने अपने कार्यकाल का आखिरी बजट पेश किया था।

एक दशक पहले का बजट घोषणाओं, योजनाओं और राजनीतिक संदेशों से भरा हुआ था। उस समय सरकार अपने विकास मॉडल को एक्सप्रेस-वे, लैपटॉप वितरण और ग्रामीण परियोजनाओं के जरिए पेश कर रही थी। आज योगी सरकार का 10वाँ बजट कानून व्यवस्था, शिक्षा-रोजगार, महिलाओं, निवेश और राजकोषीय अनुशासन जैसे मुद्दों को केंद्र में रखता दिखता है। फर्क साफ है- तब सुर्खियाँ बनाने पर ज्यादा जोर था, आज व्यवस्था को स्थायी ढाँचे में ढालने की बात की जा रही है।

इसी अंतर को समझना जरूरी है, क्योंकि बजट केवल आँकड़ों का दस्तावेज नहीं होता, बल्कि सरकार की नीयत, नीति और नजरिए का आईना होता है। अब यह जानना दिलचस्प होगा कि अखिलेश यादव के अंतिम बजट और योगी सरकार के 10वें बजट में प्राथमिकताओं, खर्च की दिशा और परिणामों के स्तर पर कितना अंतर दिखाई देता है और क्या वाकई उत्तर प्रदेश की आर्थिक सोच ने एक नया मोड़ लिया है।

10 साल में बजट का आकार: ₹3.46 लाख करोड़ से ₹9 लाख करोड़ तक का सफर

साल 2016-17 में जब अखिलेश यादव की सरकार ने अपना अंतिम बजट पेश किया था, तब उसकी कुल राशि लगभग ₹3,46,935 करोड़ थी। उस समय इसे प्रदेश के इतिहास का सबसे बड़ा बजट बताया गया और सरकार ने इसे विकास की रफ्तार से जोड़कर पेश किया। लेकिन आँकड़ों के पीछे देखें तो उस बजट का बड़ा हिस्सा राजस्व व्यय और योजनागत घोषणाओं में केंद्रित था। यानी खर्च ज्यादा था, पर भविष्य में निवेश की रफ्तार सीमित दिखाई दी। बजट बड़ा जरूर था, पर प्रदेश की आर्थिक ताकत उसी पुराने दायरे में घूमती दिखती थी।

अब साल 2026-27 में तस्वीर बदल चुकी है। योगी आदित्यनाथ सरकार ने लगभग ₹9.13 लाख करोड़ का बजट पेश किया है, जो 10 साल पहले के मुकाबले लगभग ढाई गुना है। यह बढ़ोतरी सिर्फ महँगाई या सामान्य विस्तार की वजह से नहीं बताई जा रही, बल्कि इसे सड़कों, एक्सप्रेस-वे, औद्योगिक कॉरिडोर, ऊर्जा और बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स से जोड़ा जा रहा है।

यानी अब जोर सिर्फ बजट को ‘सबसे बड़ा’ बताने पर नहीं, बल्कि उसे आर्थिक मजबूती और निवेश से जोड़ने पर है। यही फर्क बताता है कि एक दौर में आँकड़ों की चमक ज्यादा थी, जबकि आज सररकार उन आँकड़ों को ठोस ढाँचे में बदलना जानती है।

इंफ्रास्ट्रक्चर मॉडल: ग्रामीण सड़कों से अब मेगा कैपिटल निवेश

अगर उत्तर प्रदेश के इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर को 2016-17 और 2026-27 के बजट के आईने में देखें, तो तस्वीर साफ तौर पर बदलती हुई नजर आती है। 2016-17 में अखिलेश यादव सरकार में लोक निर्माण विभाग (PWD) को सड़कों और पुलों के लिए ₹14,721 करोड़ आवंटित किए गए थे।

ग्रामीण सड़क संपर्क के लिए ₹1,923 करोड़, प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना (PMGSY) के तहत ₹1,111 करोड़, ग्रामीण पुलों के लिए ₹1,180 करोड़ का प्रावधान था। उस समय बिजनौर-मेरठ 4-लेन रोड और गंगा ब्रिज जैसे प्रोजेक्ट्स प्रमुख रहे। फोकस मुख्य रूप से ग्रामीण कनेक्टिविटी और पारंपरिक सड़क निर्माण पर था।

इसके मुकाबले 2026-27 में योगी आदित्यनाथ सरकार ने केवल लोक निर्माण विभाग को ₹34,468 करोड़ का प्रावधान दिया है, जबकि सड़क और पुलों पर कुल कैपिटल आउटले ₹38,343 करोड़ रखा गया है। यह 2016-17 की तुलना में करीब 2.3 गुना वृद्धि दिखाता है।

चार नए एक्सप्रेसवे- गंगा एक्सप्रेसवे, विंध्य एक्सप्रेसवे, बुंदेलखंड-रीवा लिंक एक्सप्रेसवे और आगरा-लखनऊ एक्सप्रेसवे एक्सटेंशन के लिए ₹1,050 करोड़ का प्रावधान किया गया है। ब्रिज मेंटेनेंस पर ₹3,000 करोड़ और मुख्यमंत्री ग्राम सड़क मरम्मत योजना के तहत ₹200 करोड़ अलग से रखे गए हैं। साथ ही ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट के जरिए ₹36 लाख करोड़ के MoU निवेश का लक्ष्य रखा गया है, जिसमें इंफ्रास्ट्रक्चर सबसे बड़ा आकर्षण है।

अन्य इंफ्रास्ट्रक्चर की बात करें तो 2016-17 में लखनऊ मेट्रो की शुरुआत, बुलेट ट्रेन की योजना, 40,000 सोलर स्ट्रीट लाइट्स और ग्रामीण टैंक-नहरों के निर्माण जैसे प्रोजेक्ट्स थे। वहीं 2026-27 में लखनऊ मेट्रो एक्सटेंशन के लिए ₹50 करोड़, बुलेट ट्रेन प्रोजेक्ट पर अपडेट, शहरी विकास के लिए ₹25,400 करोड़ (जिसमें स्मार्ट सिटी के लिए ₹400 करोड़ और ग्रीन रोड के लिए ₹800 करोड़ शामिल हैं) का बड़ा प्रावधान किया गया है।

सबसे अहम बात यह है कि 2026-27 में कुल कैपिटल एक्सपेंडिचर ₹2.52 लाख करोड़ रखा गया है, जो सीधे इंफ्रास्ट्रक्चर और विकास से जुड़ा है और कुल बजट का लगभग 22% विकास कार्यों पर खर्च करने का संकेत देता है। साफ है कि जहाँ पहले ग्रामीण सड़कों तक बात सीमित थी, अब एक्सप्रेसवे और बड़े निवेश मॉडल पर जोर है।

स्वास्थ्य सेक्टर में बड़ा बदलाव

अगर स्वास्थ्य सेक्टर की तुलना करें तो 2016-17 में चिकित्सा स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग को करीब ₹8,500 करोड़ का प्रावधान था, जो उस समय के कुल बजट का लगभग 2.5% बैठता था। मोबाइल मेडिकल यूनिट्स के लिए ₹100 करोड़ रखे गए थे ताकि दूरदराज इलाकों तक इलाज पहुँचे।

ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं के लिए NRHM के तहत ₹3,000 करोड़ से अधिक का प्रावधान था। जिला अस्पतालों की मरम्मत और नए उपकरणों के लिए ₹500 करोड़ दिए गए। शिशु मृत्यु दर कम करने के विशेष अभियान पर ₹200 करोड़ और कुपोषण मुक्त यूपी के लिए पोषण योजना में ₹300 करोड़ रखे गए। उस समय राज्य में 36 मेडिकल कॉलेजों का उल्लेख था, यानी मेडिकल शिक्षा का ढांचा अभी सीमित था।

इसके मुकाबले 2026-27 में स्वास्थ्य विभाग को रिकॉर्ड ₹37,956 करोड़ आवंटित हुए, जो लगभग 4.5 गुना वृद्धि दिखाते हैं और कुल बजट का करीब 6% हिस्सा बनाते हैं। अब जोर सिर्फ बेसिक सुविधाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि बड़े पैमाने पर मेडिकल शिक्षा और विशेष इलाज पर है। 14 नए मेडिकल कॉलेजों के लिए ₹1,023 करोड़ का प्रावधान किया गया है। लखनऊ कैंसर संस्थान के लिए ₹315 करोड़ और असाध्य रोगों के मुफ्त इलाज के लिए ₹130 करोड़ रखे गए हैं।

इसी के साथ ग्रामीण स्वास्थ्य के तहत NRHM का बजट बढ़ाकर ₹8,641 करोड़ कर दिया गया है। आयुष्मान भारत और मुख्यमंत्री जन आरोग्य योजना के लिए ₹2,000 करोड़ का प्रावधान है, जिससे 49.22 लाख परिवारों को लाभ मिलने की बात कही गई है। मेडिकल शिक्षा में बड़ा उछाल दिखता है- MBBS सीटें 4,540 से बढ़कर 12,800 और PG सीटें 1,221 से बढ़कर 4,995 हो गई हैं। मेडिकल कॉलेजों की संख्या 36 से बढ़कर 81 तक पहुँच चुकी है, जिनमें 45 सरकारी हैं।

स्वास्थ्य सेवाओं के परिणामों में भी बदलाव का दिखे हैं। संस्थागत प्रसव 34.74 लाख से बढ़कर 41 लाख हो गए हैं, यानी लगभग 18% की वृद्धि हुई है। 75 जिलों में मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम चलाया जा रहा है और डिजीज सर्विलांस पोर्टल के जरिए बीमारियों की डिजिटल निगरानी की व्यवस्था की गई है।

साफ तौर पर देखा जाए तो 2016-17 में प्राथमिक स्वास्थ्य, पोषण और बुनियादी ढाँचे पर जोर था, जबकि 2026-27 में मेडिकल कॉलेजों का तेजी से विस्तार, गंभीर बीमारियों के इलाज पर निवेश, मुफ्त स्वास्थ्य योजनाओं का विस्तार और डिजिटल हेल्थ सिस्टम पर ज्यादा फोकस दिखाई देता है। मेडिकल कॉलेज दोगुने से अधिक हो गए हैं और सीटें लगभग तिगुनी।

शिक्षा में डिजिटल छलाँग और रोजगार में निवेश का बड़ा दाँव

अगर शिक्षा सेक्टर की बात करें तो 2016-17 में शिक्षा विभाग को लगभग ₹28,000 करोड़ मिले थे, जो करीब 8% के आसपास बैठता था। इसमें बेसिक शिक्षा पर ₹12,000 करोड़ से ज्यादा खर्च का प्रावधान था। नए स्कूल भवन बनाने और शिक्षक भर्ती पर जोर दिया गया। माध्यमिक शिक्षा के लिए ₹5,000 करोड़ रखे गए थे। कस्तूरबा गाँधी विद्यालय की 100 नई इकाइयों का प्रावधान इसी में शामिल था। उच्च शिक्षा के लिए ₹2,500 करोड़ दिए गए और 15 लाख छात्रों को लैपटॉप वितरण के साथ डिजिटल क्लासरूम की योजना चलाई गई।

मुख्यमंत्री मेधावी विद्यार्थी योजना के लिए ₹300 करोड़ और 25 लाख छात्रों को स्कॉलरशिप देने का लक्ष्य रखा गया। संस्कृत पाठशालाओं के विकास के लिए ₹100 करोड़ दिए गए। उस समय फोकस ज्यादा स्कूल भवन, छात्रवृत्ति और लैपटॉप जैसी योजनाओं पर था।

अब 2026-27 के बजट में शिक्षा को रिकॉर्ड 12.4% हिस्सा मिला है, जो करीब ₹1.13 लाख करोड़ बैठता है। यह 2016-17 के मुकाबले लगभग चार गुना ज्यादा है। 57 नए मुख्यमंत्री मॉडल कम्पोजिट विद्यालय बनाए जा रहे हैं। हर विद्यालय के निर्माण पर ₹25 करोड़ और उपकरणों पर ₹5 करोड़ का प्रावधान है।

बेसिक शिक्षा इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए ₹2,000 करोड़ रखे गए हैं। समग्र शिक्षा अभियान पर ₹666 करोड़ और राजकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय भवनों के लिए ₹479 करोड़ दिए गए हैं। गाँवों में डिजिटल पुस्तकालय खोलने के लिए ₹454 करोड़ का प्रावधान है। पीएम श्री योजना के लिए ₹300 करोड़ और पॉलिटेक्निक में स्मार्ट क्लास के लिए ₹10 करोड़ रखे गए हैं।

उच्च शिक्षा में प्रधानमंत्री उच्चतर शिक्षा अभियान के लिए ₹600 करोड़ दिए गए हैं। छात्राओं के लिए स्कूटी योजना चलाई जा रही है। सैनिक स्कूल गोरखपुर और लखनऊ के लिए ₹25 करोड़ प्रत्येक का प्रावधान है। संस्कृत छात्रवृत्ति के लिए ₹20 करोड़ रखे गए हैं। साथ ही MBBS और PG सीटें बढ़ाने पर भी जोर है।

रोजगार की बात करें तो 2016-17 में मनरेगा के तहत ₹4,500 करोड़ का प्रावधान था। स्किल ट्रेनिंग और लैपटॉप योजनाओं के जरिए 5 लाख युवाओं को नौकरी देने का लक्ष्य रखा गया। MSME सेक्टर के लिए ₹1,000 करोड़ की लोन गारंटी की व्यवस्था थी।

2026-27 में टेक युवा समर्थ युवा योजना के तहत 10 लाख नौकरियाँ देने की बात कही गई है। ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट के ₹36 लाख करोड़ के MoU निवेश से 20 लाख रोजगार सृजन का लक्ष्य है। स्टार्टअप फंड के लिए ₹1,000 करोड़ और कौशल विकास पर ₹2,500 करोड़ रखे गए हैं, जिससे 1 करोड़ युवाओं को ट्रेनिंग देने की योजना है। आईटी पार्क और इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग हब पर भी जोर है। बेरोजगारी भत्ता जैसी योजनाओं का भी जिक्र है।

तुलना साफ है। 2016-17 में शिक्षा और रोजगार का फोकस बुनियादी ढाँचे और सीमित स्तर की योजनाओं तक था। 2026-27 में शिक्षा का हिस्सा 8% से बढ़कर 12.4% हो गया है और बजट चार गुना तक बढ़ा है। रोजगार में 5 लाख से बढ़कर 30 लाख से ज्यादा संभावित नौकरियों दी जा रही हैं। अब जोर बड़े निवेश, डिजिटल शिक्षा और टेक्नोलॉजी आधारित रोजगार पर साफ दिखता है।

कृषि क्षेत्र मे मदद से मॉडल बदलाव तक

अखिलेश यादव सरकार के 2016-17 बजट में कृषि एवं कृषि विपणन विभाग को लगभग ₹12,500 करोड़ दिए गए थे, जो करीब 3.6% हिस्सा था। उस समय जोर पारंपरिक मदद और सीधी सब्सिडी पर ज्यादा था। किसान दुर्घटना बीमा योजना के लिए ₹100 करोड़ रखे गए थे। सिंचाई पंप सेट पर सब्सिडी के लिए ₹1,200 करोड़ और बीज व खाद पर ₹800 करोड़ का प्रावधान था। रबी और खरीफ फसलों की MSP खरीद के लिए ₹2,500 करोड़ दिए गए थे ताकि किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य मिल सके।

ग्रामीण गौशालाओं के लिए ₹200 करोड़ और मुख्यमंत्री कृषक दुर्घटना कल्याण योजना के लिए ₹150 करोड़ रखे गए थे। फल और सब्जी क्लस्टर विकसित करने के लिए ₹300 करोड़ का प्रावधान था। ODOP जैसी शुरुआती पहलों का भी जिक्र था। करीब 2.5 करोड़ किसानों को लाभ देने का लक्ष्य रखा गया था। कुल मिलाकर फोकस राहत, सब्सिडी और बुनियादी समर्थन पर था।

अब 2026-27 में तस्वीर काफी बदली हुई दिखती है। कृषि को करीब 11% हिस्सा मिला है, जो लगभग ₹1 लाख करोड़ बैठता है। यह 2016-17 की तुलना में लगभग आठ गुना ज्यादा है। अब बात सिर्फ सब्सिडी की नहीं बल्कि खेती को आधुनिक और लाभकारी बनाने की हो रही है।

पीएम किसान सम्मान निधि के लिए ₹2,000 करोड़ का प्रावधान है, जिससे 2.5 करोड़ किसानों को लाभ मिलने की बात कही गई है। मुख्यमंत्री कृषक समृद्धि योजना पर ₹5,000 करोड़ रखे गए हैं, जिसका लक्ष्य 1 करोड़ किसानों को कवर करना है। फसल विविधीकरण और बागवानी के लिए ₹3,200 करोड़ दिए गए हैं। ड्रोन दीदी योजना के तहत ₹500 करोड़ का प्रावधान है और 10,000 ड्रोन उपलब्ध कराने की योजना है। 50 जिलों में जैविक खेती क्लस्टर विकसित करने के लिए ₹1,000 करोड़ रखे गए हैं।

कोल्ड चेन और गोदाम निर्माण के लिए ₹2,500 करोड़ का प्रावधान है। MSP खरीद के लिए ₹10,000 करोड़ रखे गए हैं, जिससे गेहूं और धान के करीब 50 लाख किसानों को फायदा मिलने की बात कही गई है। पशुपालन के लिए ₹4,000 करोड़ दिए गए हैं और दूध उत्पादन 5 करोड़ लीटर प्रतिदिन तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है। मत्स्य पालन के लिए ₹800 करोड़ का प्रावधान है। साथ ही ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट के जरिए ₹10 लाख करोड़ के कृषि निवेश का जिक्र है।

तुलना साफ है। 2016-17 में कृषि का जोर सब्सिडी, सिंचाई और MSP समर्थन तक सीमित था और बजट का हिस्सा 3.6% था। 2026-27 में हिस्सा बढ़कर 11% हो गया है और फोकस विविधीकरण, ड्रोन और टेक्नोलॉजी, कोल्ड चेन और बड़े निवेश पर है। लक्ष्य किसान की औसत आय को ₹1 लाख सालाना से बढ़ाकर ₹2.5 लाख तक ले जाने का रखा गया है।

पर्यटन में सीमित विकास से धार्मिक और वैश्विक ब्रांडिंग तक का सफर

अखिलेश यादव सरकार के 2016-17 बजट में पर्यटन विभाग को लगभग ₹800 से ₹1,000 करोड़ के बीच आवंटन मिला था, जो करीब 0.3% के आसपास बैठता था। उस समय पर्यटन में फोकस ऐतिहासिक और धार्मिक स्थलों के विकास तक सीमित था। इन स्थलों के विकास के लिए ₹307 करोड़ का प्रावधान किया गया था।

लखनऊ आगरा एक्सप्रेसवे का निर्माण भले ही कुल ₹4,003 करोड़ का था, लेकिन इसे पर्यटन से भी जोड़ा गया क्योंकि इससे आगरा और आसपास के पर्यटन स्थलों तक पहुँच आसान हुई। कुंभ मेला और संगम क्षेत्र के विकास पर भी ध्यान था। इलाहाबाद में एलिवेटेड रोड के लिए ₹250 करोड़ का प्रावधान किया गया था।

लखनऊ मेट्रो के लिए ₹814 करोड़ और कानपुर व वाराणसी मेट्रो के लिए ₹50-50 करोड़ दिए गए थे, जिससे पर्यटकों की आवाजाही बेहतर हो सके। ODOP जैसी शुरुआती ब्रांडिंग योजनाओं का जिक्र भी इसी समय हुआ। उस दौर में राज्य में सालाना करीब 23 करोड़ पर्यटक आने का आँकड़ा बताया जाता था।

अब 2026-27 में पर्यटन को ₹3,500 करोड़ का प्रावधान मिला है, जो लगभग 0.4% हिस्सा है और 2016-17 के मुकाबले करीब 3.5 गुना ज्यादा है। सबसे बड़ा फोकस अयोध्या और राम मंदिर विकास पर है, जिसके लिए ₹1,500 करोड़ रखे गए हैं।

प्रयागराज में कुंभ और उससे जुड़े इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए ₹800 करोड़ का प्रावधान है। इको टूरिज्म, हेरिटेज आर्क और एडवेंचर जैसी 5 नई पर्यटन नीतियाँ लागू की गई हैं। हेलिकॉप्टर टूर और क्रूज पर्यटन के लिए ₹200 करोड़ रखे गए हैं। ODOP 2.0 के तहत 75 जिलों में ब्रांडिंग के लिए ₹500 करोड़ का प्रावधान है। ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट के जरिए ₹5 लाख करोड़ के पर्यटन निवेश का जिक्र किया गया है।

पर्यटकों की संख्या में भी बड़ा अंतर दिखाया जा रहा है। जहाँ 2017 के आसपास यह आँकड़ा करीब 23 करोड़ था, वहीं अब 137 करोड़ पर्यटकों के आने का दावा है, यानी लगभग छह गुना वृद्धि।

तुलना साफ है। 2016-17 में पर्यटन का फोकस बुनियादी विकास और सीमित धार्मिक स्थलों तक था और बजट हिस्सा करीब 0.3% था। 2026-27 में हिस्सा बढ़कर 0.4% हुआ है, लेकिन रणनीति बदल गई है। अब राम मंदिर, कुंभ, ब्रांडिंग, हेलिटूरिज्म और बड़े निवेश के जरिए पर्यटन को सीधे आर्थिक इंजन बनाने की कोशिश दिखाई देती है, जिसमें राजस्व को दस गुना तक बढ़ाने का लक्ष्य रखा गया है।

महिलाओं के लिए सहायता से व्यापक सशक्तिकरण तक का बदलाव

अखिलेश यादव सरकार के 2016-17 बजट में महिला कल्याण और युवतियों के लिए करीब ₹2,000 करोड़ का प्रावधान था, जो लगभग 0.6% हिस्सा बैठता था। योजनाएँ थीं, लेकिन दायरा सीमित था और लाभार्थियों की संख्या भी कम थी।

कन्या विवाह सहायता योजना के लिए ₹200 करोड़ रखे गए थे। प्रति बालिका ₹30,000 से ₹51,000 तक की मदद का प्रावधान था, खासकर अंतर्जातीय विवाह में। पोषण और कुपोषण मुक्त यूपी के लिए ₹300 करोड़ दिए गए, जिसमें आंगनबाड़ी सेवाएँ शामिल थीं।

लड़कियों की शिक्षा के लिए कस्तूरबा गांधी विद्यालय की 100 नई इकाइयों का प्रावधान था, जो माध्यमिक शिक्षा के करीब ₹500 करोड़ के हिस्से में शामिल था। उच्च शिक्षा के ₹2,500 करोड़ में 15 लाख छात्राओं को लैपटॉप वितरण भी शामिल था।

ग्रामीण महिला सशक्तिकरण के तहत स्वयं सहायता समूहों के लिए ₹400 करोड़ रखे गए। सुरक्षा के लिए मिशन शक्ति जैसी शुरुआती पहल का जिक्र था। कुल मिलाकर लगभग 10 लाख लड़कियों को प्रत्यक्ष लाभ पहुंचाने का लक्ष्य था।

अब 2026-27 में तस्वीर काफी विस्तृत दिखती है। महिलाओं और युवतियों के लिए ₹15,000 करोड़ से ज्यादा का प्रावधान है, जो करीब 1.6% हिस्सा है और पहले के मुकाबले लगभग 2.7 गुना वृद्धि दर्शाता है।

मुख्यमंत्री कन्या सुमंगला योजना के लिए ₹700 करोड़ रखे गए हैं। इसमें प्रति बालिका ₹15,000 छह चरणों में देने का प्रावधान है और करीब 25 लाख लाभार्थियों को कवर करने का लक्ष्य है। मुख्यमंत्री सामूहिक विवाह योजना के लिए ₹550 करोड़ का प्रावधान है, जिसमें सभी वर्गों के लिए प्रति विवाह ₹1 लाख सहायता दी जा रही है। एससी, एसटी और सामान्य वर्ग की निर्धन पुत्रियों के विवाह अनुदान के लिए ₹150 करोड़ रखे गए हैं, जिसमें ₹51,000 से ₹61,000 तक की सहायता है।

पिछड़े वर्ग की बेटियों के विवाह अनुदान के लिए ₹200 करोड़ अलग से हैं। आँगनबाड़ी कार्यकर्ताओं के अतिरिक्त मानदेय के लिए ₹971 करोड़ दिए गए हैं। सुपोषण योजना के लिए ₹100 करोड़ रखे गए हैं। श्रमजीवी महिला छात्रावास 7 शहरों में बनाने के लिए ₹170 करोड़ का प्रावधान है।

छात्रवृत्ति योजनाओं में भी बड़ा विस्तार दिखता है। एससी छात्रवृत्ति के लिए ₹968 करोड़, सामान्य वर्ग के लिए ₹900 करोड़, अल्पसंख्यक के लिए ₹365 करोड़ और पिछड़े वर्ग के लिए ₹2,825 करोड़ का प्रावधान है। बेरोजगार युवतियों के लिए कंप्यूटर ट्रेनिंग पर ₹35 करोड़ और उच्च शिक्षा की छात्राओं के लिए ‘मुफ्त स्कूटी’ योजना भी शामिल है। मिशन शक्ति का विस्तार किया गया है, जिसमें सुरक्षा ऐप और हेल्पलाइन जैसी व्यवस्थाएँ शामिल हैं। अब 1 करोड़ से ज्यादा महिलाओं को लाभ पहुँचाने का लक्ष्य रखा गया है।

तुलना साफ है। 2016-17 में फोकस विवाह सहायता, शिक्षा और बेसिक सशक्तिकरण तक सीमित था और हिस्सा करीब 0.6% था। 2026-27 में हिस्सा बढ़कर 1.6% हो गया है और योजनाओं का दायरा भी काफी बढ़ गया है। लाभार्थियों की संख्या 10 लाख से बढ़कर 1 करोड़ से ज्यादा बताई जा रही है, जिससे महिला सशक्तिकरण को ज्यादा प्राथमिकता मिलती दिख रही है।

सीमित योजनाओं से ट्रिलियन डॉलर इकोनॉमी के विजन तक का सफर

आखिर में अगर इस पूरी तुलना को देखें तो फर्क सिर्फ आँकड़ों का नहीं, सोच और पैमाने का भी दिखाई देता है। अखिलेश सरकार के साल 2016-17 में बजट का फोकस सीमित दायरे में योजनाओं और सब्सिडी तक ज्यादा केंद्रित था, जबकि योगी सरकार के साल 2026-27 के बजट में लगभग हर बड़े क्षेत्र में कई गुना बढ़ा हुआ प्रावधान, भारी पूंजीगत व्यय और आने वाले कल को देखते हुए आर्थिक ढाँचे पर जोर साफ नजर आता है।

योगी सरकार ने ₹2.52 लाख करोड़ का कैपिटल एक्सपेंडिचर रखकर यह संदेश देने की कोशिश की है कि अब फोकस सिर्फ खर्च पर नहीं, बल्कि स्थायी संपत्तियाँ खड़ी करने पर है। ₹36 लाख करोड़ के निवेश MoU, एक्सप्रेसवे नेटवर्क, मेडिकल कॉलेजों की संख्या 36 से बढ़ाकर 81 तक पहुँचाना, शिक्षा का हिस्सा 8 प्रतिशत से बढ़ाकर 12.4 प्रतिशत करना और स्वास्थ्य बजट को ₹8,500 करोड़ से बढ़ाकर ₹37,956 करोड़ तक ले जाना जैसे आँकड़े सीधे तौर पर पैमाने में आए बदलाव को दिखाते हैं।

तुलना का निष्कर्ष यही है कि अखिलेश सरकार का मॉडल सीमित विस्तार और सब्सिडी आधारित समर्थन पर ज्यादा टिका था, जबकि योगी सरकार का मौजूदा बजट बड़े निवेश, तेज आर्थिक वृद्धि, इंफ्रास्ट्रक्चर निर्माण और व्यापक सामाजिक कवरेज के जरिए उत्तर प्रदेश को बड़े आर्थिक ढाँचे में स्थापित करने की कोशिश करता दिखता है। आखिर में बजट केवल कागज पर लिखे आँकड़े नहीं होते, बल्कि यह तय करते हैं कि प्रदेश किस दिशा में आगे बढ़ेगा।

नया नहीं है विदेशी सेबों का आयात, मीडिया भारत-US ट्रेड डील पर भ्रम फैलाना बंद करे: केंद्रीय मंत्री ने बताया- कैसे अमेरिकी सेबों के आने से भी नहीं पड़ेगा किसानों पर असर

भारत और अमेरिका के बीच अंतरिम व्यापार समझौते के ढाँचे की घोषणा के बाद से आम लोग यह जानने को उत्सुक हैं कि अंतिम समझौता कैसा होगा। राजनेता या तो इसका पूरी तरह समर्थन कर रहे हैं या फिर इसकी कड़ी आलोचना कर रहे हैं, जबकि व्यापारी वर्ग इसे सतर्क होकर आशावाद के साथ देख-समझ रहा है।

भारत-अमेरिका समझौते के तहत भारत ने सेब समेत कुछ खास कृषि उत्पादों पर अमेरिका को कोटा आधारित रियायतें देने पर सहमति जताई है। हालाँकि भारतीय बाजार में अमेरिकी सेब की एंट्री की संभावना ने खासकर जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के सेब उत्पादकों की चिंता बढ़ा दी है।

अमेरिकी सेब के लिए कोटा, भारतीय उत्पादकों की चिंताएँ और केंद्र सरकार का आश्वासन

भारत-अमेरिका व्यापार समझौते के तहत भारतीय सरकार ने अमेरिकी सेब पर आयात शुल्क 50% से घटाकर 25% कर दिया है। इसके साथ ही न्यूनतम आयात मूल्य (MIP) 75 से 80 रुपए प्रति किलो तय किया गया है। इसका मतलब यह है कि बहुत सस्ते सेब भारतीय बाजार में नहीं आ सकेंगे और स्थानीय किसानों के कारोबार को नुकसान नहीं पहुँचेगा।

मीडिया में अमेरिकी सेबों को लेकर हो रही रिपोर्टिंग

इसका कारण यह है कि टैक्स जोड़ने के बाद इन सेबों की कीमत लगभग 100 रुपए प्रति किलो या उससे अधिक होगी। इसके बावजूद जम्मू-कश्मीर, खासकर कश्मीर घाटी, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के सेब उत्पादकों ने चिंता जताई है।

उनका मानना है कि सीमित मात्रा में भी अमेरिकी सेब का आयात, जो आकार में एकसमान, उच्च गुणवत्ता वाले और प्रतिस्पर्धी कीमत पर उपलब्ध होते हैं, घरेलू सेब की कीमतों पर दबाव डाल सकता है, खासकर उन सेबों पर जो कोल्ड स्टोरेज से निकालकर ऑफ-सीजन में बेचे जाते हैं।

गौरतलब है कि कश्मीर भारत के कुल सेब उत्पादन का करीब 70 से 80 प्रतिशत हिस्सा देता है। ऐसे में सेब वहाँ की अर्थव्यवस्था, रोजगार और सामाजिक स्थिरता के लिए बेहद अहम हैं। जम्मू-कश्मीर में सेब उद्योग की कीमत लगभग 12,000 करोड़ रुपए आँकी जाती है और इससे करीब 35 लाख लोगों को प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रोजगार मिलता है।

वर्ष 2024-25 के सीजन में करीब 21 लाख टन कश्मीरी सेब दिल्ली, बेंगलुरु, चेन्नई, अहमदाबाद, कोलकाता, मुंबई जैसे बड़े शहरों में बेचे गए। हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के भी कई किसान अमेरिकी सेब के आयात को अपने अस्तित्व से जोड़कर देख रहे हैं।

उनका कहना है कि पहले से ही बढ़ती लागत, जलवायु परिवर्तन से होने वाले नुकसान, सीमित कोल्ड स्टोरेज सुविधाएँ और परिवहन की दिक्कतों ने उनके मुनाफे को कम कर दिया है। ऐसे में अगर पीक सीजन में अमेरिकी सेब आ गए तो कीमतें गिरेंगी और स्थानीय अर्थव्यवस्था पर बुरा असर पड़ेगा।

मीडिया में अमेरिकी सेबों को लेकर हो रही रिपोर्टिंग

कश्मीर वैली फ्रूट ग्रोअर्स कम डीलर्स यूनियन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर अमेरिका और यूरोप से आने वाले सेब पर 100% से अधिक आयात शुल्क लगाने की माँग की है। यूनियन ने चेतावनी दी कि विदेशी सेब का उदार आयात भारत के बागवानी क्षेत्र को ‘बीमार उद्योग’ में बदल सकता है।

हिमाचल प्रदेश में भी यह चिंता जताई गई है कि वहाँ के प्रीमियम सेब 100 से 150 रुपए प्रति किलो बिकते हैं और अगर अमेरिकी सेब भी इसी कीमत पर उपलब्ध होंगे तो उपभोक्ता आयातित सेब को प्राथमिकता देंगे। कुछ लोगों का मानना है कि अमेरिकी सेब के लिए MIP 100 रुपए प्रति किलो होना चाहिए था।

वहीं कई किसान यह भी कहते हैं कि इस समझौते का घरेलू सेब उद्योग पर खास असर नहीं पड़ेगा, क्योंकि स्थानीय सेब गुणवत्ता में किसी से कम नहीं हैं। उनके अनुसार, MIP बढ़ाने की माँग करने की बजाय किसानों को सब्सिडी, बेहतर पौध और आधुनिक तकनीक पर जोर देना चाहिए।

मीडिया में अमेरिकी सेबों को लेकर हो रही रिपोर्टिंग

इन तमाम चिंताओं के बीच केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने बार-बार भरोसा दिलाया है कि घरेलू किसानों के हित पूरी तरह सुरक्षित हैं। उन्होंने कहा कि भारत अब या भविष्य में ऐसा कोई भी व्यापार समझौता नहीं करेगा, जिससे कृषि और डेयरी क्षेत्र में उसकी ‘रेड लाइन’ पार हो।

मंत्री ने स्पष्ट किया कि भारतीय किसानों और MSMEs सेक्टर के हित पूरी तरह संरक्षित हैं। सेब आयात के मुद्दे पर उन्होंने बताया कि देश में सेब की माँग 25-26 लाख टन से अधिक है, जबकि उत्पादन करीब 20-21 लाख टन है।

भारत पहले से ही हर साल करीब 5.5 लाख टन सेब आयात करता है, जिसमें अमेरिका बड़ा आपूर्तिकर्ता है। उन्होंने कहा कि अमेरिकी सेब की अंतिम कीमत लगभग 100 रुपए प्रति किलो होगी, इसलिए स्थानीय किसानों को नुकसान की आशंका नहीं होनी चाहिए।

पीयूष गोयल ने कहा, “हम सेब के मामले में आत्मनिर्भर नहीं हैं। हमारी माँग 25-26 लाख टन है, जबकि उत्पादन 20-21 लाख टन है। हम हर साल 5.5 लाख टन सेब आयात करते हैं, जिसमें बड़ी मात्रा अमेरिका से आती है। हमने सेब के बाजार को पूरी तरह नहीं खोला है, बल्कि कोटा दिया है, जो वर्तमान आयात से भी कम है।”

उन्होंने आगे कहा, “सेब पर न्यूनतम आयात मूल्य 50 रुपए है और 50 प्रतिशत शुल्क के बाद यह 75 रुपए हो जाता है। यानी इससे कम कीमत पर सेब देश में नहीं आ सकते। अमेरिकी सेब के लिए MIP 80 रुपए है और 25 प्रतिशत शुल्क के बाद कीमत करीब 100 रुपए हो जाती है। इससे किसानों को सुरक्षा मिलती है।”

मंत्री ने जोर देकर कहा कि सीमित मात्रा में आने वाले अमेरिकी सेब स्थानीय किसानों के लिए खतरा नहीं हैं और यह मौजूदा आयात से भी कम मात्रा में होंगे।

पीड़ित मानसिकता का चश्मा: हर सुधारात्मक कदम पर आक्रोश छोड़ना होगा

मोदी सरकार द्वारा सीमित और संतुलित रियायत देने के बावजूद कुछ स्थानीय हितधारक डर फैलाने और पीड़ित मानसिकता को बढ़ावा दे रहे हैं। यह मुद्दा केवल सेब तक सीमित नहीं है। भारत में नीतिगत और सार्वजनिक विमर्श में वैश्विक प्रतिस्पर्धा को अक्सर ‘पीड़ित होने’ के रूप में देखा जाता है, जबकि इसे आत्म-सुधार का अवसर माना जाना चाहिए।

भारत एक मजबूत अर्थव्यवस्था और विशाल बाजार वाला देश है। वह विकसित राष्ट्र बनने की दिशा में तेजी से बढ़ रहा है। ऐसे में व्यापार और उद्योग को संरक्षणवाद की ढाल के पीछे छिपे रहने की आदत छोड़नी होगी। ऊँचे शुल्क और गैर-शुल्क बाधाओं ने लंबे समय तक स्थानीय उत्पादकों को कठिन सुधारों से बचाए रखा।

2020 के किसान आंदोलन ने दिखाया कि अच्छे सुधार भी आसानी से स्वीकार नहीं होते। भारतीय सेब स्वाद में अच्छे हैं, लेकिन गुणवत्ता में एकरूपता की कमी, कमजोर ग्रेडिंग-पैकेजिंग, ठंडी भंडारण व्यवस्था की कमी और आधुनिक तकनीक को अपनाने में सुस्ती जैसी समस्याएँ हैं।

अमेरिकी सेब बेहतर तकनीक, कीट नियंत्रण, नियंत्रित वातावरण भंडारण और गुणवत्ता मानकों के कारण आगे हैं। यदि चिली, तुर्की और अन्य देशों से आने वाले सेब हिमाचल और कश्मीर के किसानों को खत्म नहीं कर पाए, तो केवल अमेरिकी सेब से अचानक इतना डर समझ से परे है।

भारतीय सेबों की अपनी सांस्कृतिक पहचान है, कीमत अपेक्षाकृत कम है और आपूर्ति श्रृंखला मजबूत है। असल मुकाबला उपभोक्ता की पसंद से तय होगा। यदि अमेरिकी सेब ज्यादा पसंद किए जाते हैं, तो इसका मतलब गुणवत्ता और मूल्य में अंतर है, जिसे घरेलू उत्पादकों को पाटना होगा। प्रतिस्पर्धा सुधार के लिए दबाव बनाती है।

1991 के बाद भारत के ऑटो, टेलीकॉम और उपभोक्ता वस्तु क्षेत्रों में यही देखने को मिला। संरक्षणवाद से उपभोक्ताओं को नुकसान और महंगे दाम चुकाने पड़ते हैं। इसलिए आत्मसंतोष की संस्कृति छोड़नी होगी।

मेनस्ट्रीम मीडिया कश्मीरी सेब उत्पादकों की चिंता को बढ़ा-चढ़ाकर कर रहा पेश

हर सुधारात्मक कदम पर आक्रोश देश के लिए ठीक नहीं है। हर व्यापार समझौते में कुछ को फायदा और कुछ को नुकसान होता है। भारत जैसी परिपक्व अर्थव्यवस्था को अल्पकालिक झटकों को सहने और खुद को बेहतर बनाने की क्षमता दिखानी चाहिए और यहाँ के लोगों को संरक्षित लाभ के नुकसान पर शोक मनाने के बजाय अनुकूलन, कौशल उन्नयन और वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मक मानकों को पूरा करने की क्षमता प्रदर्शित करनी चाहिए।

मेनस्ट्रीम मीडिया को भी कश्मीरी सेब उत्पादकों के सवालों के साथ संतुलित रिपोर्टिंग करनी चाहिए। अमेरिकी सेब का सीमित और सुरक्षित आयात कोई अस्तित्व का संकट नहीं है। मीडिया को इस पर प्रकाश डालना चाहिए था कि भारत पहले से कई देशों से सेब आयात करता है और इससे घरेलू उत्पादन खत्म नहीं हुआ है।

डर और आक्रोश के शोर में यह तथ्य दब रहा है कि अमेरिकी सेब मुख्य रूप से प्रीमियम शहरी बाजारों में प्रतिस्पर्धा करेंगे, न कि स्थानीय सेबों को पूरी तरह खत्म करेंगे। समय की माँग है कि उत्पादक गुणवत्ता, ब्रांडिंग और इंफ्रास्ट्रक्चर पर ध्यान दें, सरकार से तकनीक और निवेश में सहयोग माँगें और वैश्विक मानकों के अनुरूप खुद को ढालें।

यह रिपोर्ट मूल रुप से अंग्रेजी में श्रद्धा पांडेय ने लिखी है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।

भक्ति, तप, सेवा और सत्संग… ‘हर-हर महादेव’ के साथ हुई भावनाथ मेले की शुरुआत: जानिए क्यों कहा जाता है इसे गुजरात का ‘मिनी कुंभ’

योगियों की तपोभूमि, साधु-संतों के लिए माँ की गोद समान और श्रद्धालुओं को परम शांति व आध्यात्मिक सुख का अनुभव कराने वाले गुजरात के जूनागढ़ के पवित्र गिरनार पर्वत की तलहटी में सैकड़ों वर्षों से भावनाथ का मेला आयोजित होता आ रहा है। महा वद नौम से महाशिवरात्रि तक चलने वाले इस भाव, भक्ति और भव्यता के अद्भुत संगम में गुजरात भर से ही नहीं, बल्कि पूरे देश से साधु-संत, महंत और श्रद्धालु एकत्र होते हैं।

यहाँ सत्संग होता है, भगवान शिव की आराधना की जाती है और आध्यात्मिक ऊर्जा का अद्भुत अनुभव होता है। इस वर्ष भावनाथ का मेला बुधवार (11 फरवरी 2026) को हर-हर महादेव की गूँज के साथ शुरू हुआ और पहले से कहीं अधिक भव्य रूप में आयोजित किया जा रहा है। इस साल की तैयारियों और विशालता को देखते हुए इसे ‘मिनी कुंभ’ भी कहा जा रहा है। इस बार भावनाथ मंदिर का संचालन सरकार के पास है, जिससे मेले की पवित्रता बनी रहे और इसे राष्ट्रीय तथा वैश्विक स्तर पर पहचान मिले।

इसके लिए सरकार द्वारा भी व्यापक प्रयास किए जा रहे हैं। व्यवस्थाओं से लेकर तैयारियों तक, हर स्तर पर अंतिम रूप दिया जा रहा है। गिरनार की तलहटी में सुवर्णरेखा नदी के तट पर स्थित अति पवित्र भावनाथ महादेव मंदिर में इस मेले का आयोजन होता है। मंदिर में स्थापित शिवलिंग स्वयंभू है। ‘भावनाथ’ का अर्थ है ‘भाव’ अर्थात जो सृजित हुआ है, उसके नाथ यानी संसार के सृजनकर्ता भगवान शिव।

क्या हैं मंदिर से जुड़ी दंतकथाएँ?

मंदिर के पीछे एक प्राचीन कथा प्रचलित है। कहा जाता है कि प्रलयकाल में संपूर्ण सृष्टि रुद्र में लीन हो गई और ब्रह्मा का एक दिन पूर्ण हुआ। प्रभात होते ही ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र क्रमशः सत्त्व, रज और तमस रूप में प्रकट हुए। प्रलय के समय भगवान शिव जल में समाधिस्थ थे।

तीनों देवों में यह विवाद हो गया कि सबसे महान कौन है। तब शिवजी ने बीच में हस्तक्षेप कर ब्रह्मा को सृष्टि रचना, विष्णु को पालन और रुद्र को संहार का कार्य सौंपकर विवाद का समाधान किया। इसके बाद ब्रह्मा ने शिवजी से आग्रह किया कि वे पृथ्वी पर रहकर मानवों के सुख-दुःख का निवारण करें।

शिवजी ने पृथ्वी पर दृष्टि डाली और वनराजि से सुशोभित उज्जयंत पर्वत (गिरनार) उन्हें प्रिय लगा। यहीं उन्होंने निवास किया। उधर कैलाश में महादेव को न पाकर माता पार्वती उन्हें खोजने निकलीं। देवताओं से जानकारी मिलने पर वे क्रोधित होकर गिरनार पहुँचीं। उसी दिन भगवान शिव भावनाथ रूप में प्रकट हुए, वह दिन वैशाख शुक्ल पूर्णिमा का था।

ऐसी लोकमान्यता है कि माता पार्वती ने अंबिका रूप में गिरनार पर वास किया, विष्णु ने दामोदर कुंड में दामोदर रूप धारण किया और अन्य देवता, यक्ष व गंधर्व भी गिरनार के विभिन्न स्थानों पर निवास करने लगे। भावनाथ मंदिर के पास स्थित मृगीकुंड की कथा भी अत्यंत रोचक है।

कहा जाता है कि कान्यकुब्ज (कन्नौज) के राजा भोज को उनके सेवक ने बताया कि रेवताचल (गिरनार) के जंगल में हिरणों के झुंड के बीच एक स्त्री घूम रही थी, उसका चेहरा हिरण जैसा और शरीर स्त्री जैसा था। राजा भोज बड़ी मशक्कत के बाद उसे अपने महल में लाए। विद्वान दोनों में अंतर नहीं समझ पाए तो राजा कुरुक्षेत्र में तपस्या कर रहे ऋषि ऊर्ध्वरेत के पास गए।

ऋषि ने मृगीमुखी को मनुष्य की वाणी प्रदान की। उन्होंने अपने पिछले जीवन के बारे में बताते हुए कहा कि पहले राजा भोज सिंह थे और वह हिरण थीं। शिकार करते समय हिरण का सिर एक बाँस की झाड़ी में फँस गया और उसका शरीर सुवर्णरेखा नदी में गिर गया। नदी के पवित्र जल से शरीर ने मनुष्य का रूप धारण कर लिया, लेकिन चेहरा हिरण का ही रहा।

ऋषि के आदेशानुसार, राजा ने हिरण की खोपड़ी को झाड़ी से निकाला और उसे सुवर्णरेखा के जल में विसर्जित कर दिया। जिसके बाद मृगीमुखी का संपूर्ण शरीर मनुष्य बन गया। राजा भोज ने उनसे विवाह किया और अपनी पत्नी के सुझाव पर गिरनार पर्वत की तलहटी में यह मृगीकुंड बनवाया। यह लोककथा है और आज भी शिवरात्रि के दिन साधु यहाँ स्नान करते हैं।

क्यों कहलाता है यह क्षेत्र ‘वस्त्रपूत क्षेत्र’?

इस क्षेत्र को ‘वस्त्रपूत क्षेत्र’ भी कहा जाता है। स्कंद पुराण के अनुसार, एक बार भगवान शिव और माता पार्वती आकाश मार्ग से जा रहे थे, तभी माता का दिव्य वस्त्र यहाँ गिर पड़ा। उसी समय से यह स्थान ‘वस्त्रपूत क्षेत्र’ कहलाने लगा। गुजरात सरकार द्वारा प्रकाशित पुस्तक ‘गुजरात्न लोकोत्सव अना मेला’ में भी इस कथा का उल्लेख मिलता है।

साधुओं के मृगीकुंड स्नान का विशेष महत्व

इस मेले का मुख्य उद्देश्य सांसारिक लोगों पर नहीं, बल्कि संतों और भिक्षुओं पर केंद्रित है। व्रत के दिन, भावनाथ मंदिर में ध्वजारोहण के साथ मेले का औपचारिक उद्घाटन किया जाता है। यह पवित्र कार्य देश भर से आए भिक्षुओं की उपस्थिति में संपन्न होता है। प्रशासन इन सभी भिक्षुओं के लिए अखाड़ा और आवास की व्यवस्था करता है।

एक ओर साधुओं के डेरे लगते हैं, दूसरी ओर सेवाभावी संस्थाओं के तंबू सजते हैं। चार दिनों तक पूरी तलहटी शिवमय और भक्तिमय वातावरण से भर जाती है। यह मेला सैकड़ों वर्षों से आयोजित होता आ रहा है और समय के साथ कुछ परिवर्तन हुए हैं, लेकिन इसका मूल तत्व आज भी जीवंत है। जैसे कुंभ में शाही स्नान का महत्व है, वैसे ही यहाँ मृगीकुंड में स्नान का विशेष स्थान है।

शिवरात्रि की मध्यरात्रि में निकलने वाली साधुओं की शोभायात्रा मुख्य आकर्षण

इस मेले का सबसे बड़ा आकर्षण है महाशिवरात्रि की मध्यरात्रि में निकलने वाली साधुओं की भव्य शोभायात्रा। नागा साधु, अघोरी और विभिन्न अखाड़ों के साधु घोड़ा गाड़ी, बग्घी और हाथियों पर सवार होकर शंखनाद और बैंड-बाजों के साथ मृगीकुंड स्नान के लिए प्रस्थान करते हैं। रास्ते में वे अंग-प्रदर्शन, तलवारबाजी और लाठी-कला का प्रदर्शन भी करते हैं।

शाही स्नान का नेतृत्व पंचदशनाम जूना अखाड़ा करता है। इसके साथ अन्य अखाड़ों के महामंडलेश्वर, मंडलेश्वर और हजारों साधु सम्मिलित होते हैं। स्नान के पश्चात भावनाथ मंदिर में महाआरती और महापूजा होती है और प्रातःकाल तक मेले का समापन होता है।

लोकमान्यता है कि गिरनार गुफा में रहने वाले नागा साधु भी इन जुलूसों में भाग लेते हैं और कुछ साधु स्नान के बाद अदृश्य हो जाते हैं और फिर कभी दिखाई नहीं देते। साधुओं और संतों के स्नान के बाद, भावनाथ मंदिर में भगवान शिव की आरती और महापूजा की जाती है। मेला सुबह तक समाप्त हो जाता है।

ऑपइंडिया से बात करते हुए अंबिका आश्रम के महंत रामजुबापू कहते हैं, “यह मेला कुंभ मेले जितना ही पवित्र है। महाशिवरात्रि पर हजारों नागा साधु-अघोरी यहाँ के कुंड में शाही स्नान करते हैं, लेकिन स्नान के बाद बाहर नहीं आते। आज तक यह पता नहीं चल पाया है कि वे साधु कहाँ से आते हैं और दामोदर कुंड में डुबकी लगाने के बाद कहाँ गायब हो जाते हैं।”

सेवा कार्यों में जुटती हैं सामाजिक संस्थाएँ

सौराष्ट्र की पावन भूमि पर ऐसा धार्मिक आयोजन हो और सेवा कार्य न हों, यह संभव नहीं। भावनाथ मेले में देशभर से आने वाले साधु-संतों और श्रद्धालुओं की सेवा हेतु अनेक सामाजिक संस्थाएँ जुटती हैं। भोजन, विश्राम, सत्संग, भजन और चिकित्सा जैसी सेवाएँ निरंतर चलती रहती हैं।

दिन-रात भक्तों की सेवा में समर्पित यह संस्थाएँ इस मेले को सेवा और समर्पण का अनुपम उदाहरण बनाती हैं। मेले के लिए गुजरात और पूरे देश से साधु-संतों, सामाजिक संगठनों और दानदाताओं का समूह 5 मई से ही गिरनार की तलहटी में भक्तों की सेवा के लिए पहुँचना शुरू कर देता है। उनकी रातें या उतार पहले से तय होते हैं।

उदाहरण के लिए जेरामबापा की रात, तोरानिया की रात, परबन की रात, भूराभागत की रात, लक्ष्मण बरोट की रात, खोडियार रस मंडल की रात। यहाँ सुबह, दोपहर और शाम तीनों समय भोजन और ठहरने की व्यवस्था होती है। साथ ही भजन-सत्संग-सन्तवाणी निरंतर होती रहती है। इस दौरान कुछ प्रसिद्ध कलाकार भी उपस्थित होते हैं, जो संतवाणी में भाग लेंते हैं।

भावनाथ का यह मेला केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि भक्ति, तप, सेवा और सत्संग का अद्वितीय संगम है, जहाँ मानव आत्मा को शिव से एकाकार होने का दिव्य अनुभव प्राप्त होता है।

यह रिपोर्ट मूल रुप से गुजराती में भार्गव राज्यगुरु ने लिखी है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

भारत ने नहीं बदला अपना स्टैंड, ट्रेड डील में अमेरिका को करना पड़ा बदलाव: व्हाइट हाउस ने अपनी फैक्ट शीट में ‘दाल’ शब्द को हटाया, ‘वादे’ की जगह लिखा- इंडिया की इच्छा

अमेरिका ने हाल ही में किए गए इंडिया-US ट्रेड डील को लेकर जारी किए गए फैक्ट शीट में चुपके से बदलाव किया है। बदले हुए फैक्टशीट में दालों का जिक्र नहीं है, $500 बिलियन यानी ₹4194.5 करोड़ से ज्यादा की अमेरिकी सामान खरीदने की भारत की प्रतिबद्धता को अब इरादा कहा गया है और डिजिटल सर्विसेज़ टैक्स से जुड़े क्लेम हटा दिए गए हैं। ये बदलाव डॉक्यूमेंट्स के पब्लिश होने के कुछ ही घंटों के अंदर किए गए।

अमेरिकी दालों पर कोई छूट नहीं

अमेरिका ने भारत के साथ हुए ट्रेड डील की फैक्ट शीट में कुछ बदलाव किए हैं। भारत के हिसाब से ये काफी राहत देने वाली है। फैक्ट शीट से दालें हटा दी गई हैं। इसका मतलब है कि भारत को अब अमेरिका दालों पर टैरिफ घटाने की जरूरत नहीं है। इससे दाल उत्पादक किसानों को राहत मिलेगी। अगर अमेरिकी दालें भारत के बाजार में आती तो किसानों को नुकसान हो सकता था।

भारत में दालें राजनीतिक रूप से एक सेंसिटिव सेक्टर हैं। खास बात यह है कि भारत मसूर, छोले और सूखी फलियों का सबसे बड़ा प्रोड्यूसर और कंज्यूमर है। इन्हें हटाना दिखाता है कि नई दिल्ली ने उस भाषा के खिलाफ विरोध किया है जिस पर वह सहमत नहीं थी।

500 बिलियन डॉलर खरीद की ‘प्रतिबद्धता’ अब बना ‘इरादा’

भारत अमेरिका ट्रेड डील के साझा बयान में कहा गया था कि अगले 5 सालों में भारत ने अमेरिका से 500 अरब डॉलर का आयात करने का वादा किया है। लेकिन बदलाव के बाद इसमें कहा गया है कि ‘प्रतिबद्धता’ नहीं बल्कि ये ‘इरादा’ है। यानी डील के हिसाब से इसमें बदलाव संभव है और भारत की कोई कानूनी बाध्यता नहीं है। अब इसमें लिखा है, ‘भारत ज्यादा अमेरिकी सामान खरीदने और $500 बिलियन यानी ₹4194.5 करोड़ से ज़्यादा की US एनर्जी, इन्फॉर्मेशन और कम्युनिकेशन टेक्नोलॉजी, कोयला और दूसरे प्रोडक्ट खरीदने का इरादा रखता है।’

साभार- WayBackMachine/White House

डिजिटल सर्विस टैक्स हटाने वाली बात भी हटाई

अमेरिका के फैक्टशीट में जो बदलाव हुए हैं उसमें भारत के अपने डिजिटल सर्विस टैक्स हटाने से जुड़ा टेक्स्ट भी हटा दिया गया है। पहले कहा गया था, ‘भारत अपने डिजिटल सर्विस टैक्स हटा देगा और डिजिटल ट्रेड में भेदभाव वाले या बोझिल तरीकों और दूसरी रुकावटों को दूर करने वाले मजबूत बाइलेटरल डिजिटल ट्रेड नियमों पर बातचीत करने के लिए प्रतिबद्ध है, जिसमें इलेक्ट्रॉनिक ट्रांसमिशन पर कस्टम ड्यूटी लगाने पर रोक वाले नियम भी शामिल हैं।

अमेरिका ने अब कहा है, ‘भारत ने डिजिटल ट्रेड के लिए भेदभाव वाले या बोझिल तरीकों और दूसरी रुकावटों को दूर करने वाले मजबूत बाइलेटरल डिजिटल ट्रेड नियमों पर बातचीत करने का वादा किया है।’ फिलहाल भारत को डिजिटल टैक्स पर कुछ करने की जरूरत नहीं है। आगे नियमों को लेकर बात हो सकती है।

फैक्ट शीट में बदलाव भारत के लिए फायदेमंद

दालों पर टैरिफ नहीं घटाने से तो भारत को फायदा होगा ही साथ ही भारत पर टैरिफ 18 फीसदी किए जाने का फर्क भी बाजार में दिखेगा। भारत पर लगा टैरिफ पड़ोसी देशों पाकिस्तान, श्रीलंका, बांग्लादेश, चीन, वियतनाम और दूसरे देशों से कम है। अब रूस से तेल खरीदने को लेकर लगाया गया 25 फीसदी रेसिपोकल टैरिफ भी खत्म हो गया है, यानी 50 फीसदी टैरिफ की जगह अब भारत को 18 फीसदी टैरिफ देना होगा। साझा बयान में जिन बातों का मतलब भारत के हितों के खिलाफ लग रहा था, उनमें बदलाव किया गया है और अमेरिका ने फैक्टशीट में चुपके से कई बदलाव किए हैं।

एक साल से चल रही थी ट्रेड डील पर बातचीत

व्यापार समझौतों में शब्दों के अपने मायने होते हैं। इसमें बदलाव का असर पड़ता है। यूएस ट्रेड डील में प्रतिबद्धता को इरादा में बदला गया। इसका काफी डिप्लोमैटिक और इकोनॉमिक असर पड़ता है। व्हाइट हाउस ने US-इंडिया ट्रेड डील पर अपनी फैक्ट शीट में चुपके से किए गए खास बदलावों को वापस ले लिया, क्योंकि बदलाव आधिकारिक साझा बयान से थोड़े अलग थे।
फैक्ट शीट में 9 फरवरी को जो बदलाव किया गया था, जिसमें ऐसी भाषा जोड़ी गई थी जो इंडिया के ‘व्यापारिक वचनबद्धता’ को बढ़ाती हुई लग रही थी। दालों पर भारत द्वारा टैरिफ कम करने की बात थी। कुछ घंटों बाद बिना सार्वजनिक जानकारी दिए 10 फरवरी 2026 को इन बदलावों को हटा दिया गया। अब साझा बयान के साथ नए फैक्ट शीट को शामिल किया गया है।

भारत और अमेरिका फरवरी 2025 में शुरू हुई लगभग एक साल की बातचीत के बाद एक अंतरिम ट्रेड समझौते पर पहुँचे। भारत को टेक्सटाइल, गारमेंट्स, लेदर, फुटवियर, केमिकल्स, होम डेकोर और कुछ खास मशीनरी जैसे कई एक्सपोर्ट्स पर ड्यूटी 50 परसेंट से घटाकर 18 परसेंट करने का फायदा मिलेगा।

योगी सरकार ने बनाया विकास का रिकॉर्ड, 8 साल में 2x होकर ₹30.25 लाख करोड़ हुई UP की अर्थव्यवस्था: जानें- इकोनॉमिक सर्वे की बड़ी बातें

उत्तर प्रदेश विकास की पटरी पर दौड़ रहा जिसके चलते अर्थव्यवस्था पिछले 8 वर्षों में दोगुनी हो गई है। वर्ष 2016-17 में यह 13.30 लाख करोड़ रुपए थी जो 2024-25 में बढ़कर 30.25 लाख करोड़ रुपए हो गई है।

राज्य के वित्त मंत्री सुरेश खन्ना ने 9 फरवरी 2026 को राज्य विधानसभा में आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 पेश करते हुए यह जानकारी दी है। राज्य सरकार ने इस दौरान निवेश योजना भी प्रस्तुत की जिसके तहत भारत के सबसे अधिक आबादी वाले राज्य उत्तर प्रदेश को मध्यम अवधि में 1 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने का लक्ष्य रखा गया है।

2025-26 में अर्थव्यवस्था के ₹36 लाख करोड़ तक पहुँचने का अनुमान

सोमवार (9 फरवरी) को उत्तर प्रदेश की राज्य विधानसभा में पेश किया गया आर्थिक सर्वेक्षण राज्य सरकार का पहला ऐसा वार्षिक आर्थिक दस्तावेज है, जो केंद्र सरकार की परंपरा के समान है। उत्तर प्रदेश सरकार का आर्थिक सर्वेक्षण राज्य के आर्थिक प्रदर्शन, विभिन्न क्षेत्रों की प्रगति और पूरी वित्तीय स्थिति का डेटा देता करता है।

सर्वेक्षण के अनुसार, उत्तर प्रदेश का सकल घरेलू उत्पाद (GDP) 10.8% की चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर से बढ़ा है। यह 2016-17 में 13.30 लाख करोड़ रुपए से बढ़कर 2024-25 में 30.25 लाख करोड़ रुपए हो गया है। वित्त वर्ष 2025-26 में उत्तर प्रदेश की अर्थव्यवस्था के 36 लाख करोड़ रुपए तक विस्तार करने का अनुमान है।

बजट सत्र के पहले दिन उत्तर प्रदेश के वित्त मंत्री सुरेश खन्ना ने कहा, “आर्थिक सर्वेक्षण केवल आँकड़ों का संकलन नहीं है बल्कि यह राज्य की प्रगति, लोगों की आकांक्षाओं और भविष्य की संभावनाओं को दर्शाने वाला एक जीवंत दस्तावेज है।”

घरेलू और वैश्विक निवेशकों की बढ़ती रुचि का संकेत देते हुए खन्ना ने कहा कि राज्य में 50 लाख करोड़ रुपए से अधिक के औद्योगिक प्रस्ताव आने की संभावना है। प्रति व्यक्ति आय के बारे में मंत्री खन्ना ने बताया कि यह 2016-17 में 54,564 रुपए से बढ़कर 2024-25 में 1,09,844 रुपए हो गई है। वर्ष 2025-26 के लिए प्रति व्यक्ति आय के 1.20 लाख रुपए तक पहुँचने का अनुमान है। वहीं, GSDP प्रति व्यक्ति के आधार पर आय 2016-17 में 61,142 रुपए से बढ़कर 2024-25 में 1,26,304 रुपए हो गई है।

राज्य विधानसभा में अपने भाषण के दौरान खन्ना ने बताया कि भारत की आजादी के समय उत्तर प्रदेश की प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय औसत के बराबर थी लेकिन 2014-15 तक यह घटकर राष्ट्रीय औसत के 50.2 प्रतिशत पर पहुँच गई। हालाँकि, 2024-25 में यह अनुपात सुधरकर 53.5 प्रतिशत हो गया है। वहीं, उत्तर प्रदेश की अपनी कर आय 2.5 गुना बढ़कर 2.09 लाख करोड़ रुपए हो गई है। कर्ज-से-GSDP अनुपात 28 प्रतिशत है, जो राष्ट्रीय औसत से कम है।

आर्थिक विकास का मुख्य आधार बनी कृषि

उत्तर प्रदेश के आर्थिक विकास का प्रमुख आधार कृषि और इससे जुड़े क्षेत्र रहे हैं जिनका राज्य की अर्थव्यवस्था में योगदान 25.8 प्रतिशत है। आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के अनुसार, उद्योग क्षेत्र की हिस्सेदारी 27.2 प्रतिशत और सेवा क्षेत्र की हिस्सेदारी 47 प्रतिशत रही है। उत्तर प्रदेश 2024-25 में 737.4 लाख मीट्रिक टन उत्पादन के साथ भारत का सबसे बड़ा खाद्यान्न उत्पादक राज्य बना हुआ है। वर्ष 2017-18 से 2024-25 के बीच राज्य के कुल खाद्यान्न उत्पादन में 28.5 प्रतिशत की वृद्धि हुई जबकि उत्पादकता में 11.8 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई। इससे राष्ट्रीय खाद्यान्न उत्पादन में उत्तर प्रदेश की हिस्सेदारी 18.1 प्रतिशत से बढ़कर 20.6 प्रतिशत हो गई है।

वर्ष 2017-18 से 2024-25 के बीच प्रति हेक्टेयर फसलों का सकल मूल्य वर्धन 0.98 लाख रुपए से बढ़कर 1.73 लाख रुपए हो गया है। धान और गेहूँ राज्य की सबसे बड़ी कृषि उपज बने हुए हैं। रबी और खरीफ दोनों मौसमों में उत्पादकता और क्षेत्रफल में बढ़ोतरी दर्ज हुई है।

इंफ्रास्ट्रक्चर और निवेश का हब बनता UP

आर्थिक सर्वेक्षण में बताया गया कि वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम 2026 में 2.94 लाख करोड़ रुपए के समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए गए। सर्वेक्षण में उत्तर प्रदेश के बेहतर होते इंफ्रास्ट्रक्चर को लेकर भी बात की गई है। इसमें कहा गया है कि राज्य राष्ट्रीय स्तर पर एक्सप्रेसवे का केंद्र बनता जा रहा है, जहाँ कुल 22 एक्सप्रेसवे हैं जिनमें तीन निर्माणाधीन और सात चालू हैं।

इसके अलावा, उत्तर प्रदेश के पास भारत का सबसे बड़ा रेल नेटवर्क है और राज्य अपने एविएशन सेक्टर का भी विस्तार कर रहा है। BJP सरकार ने 5 अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डों सहित कुल 24 हवाई अड्डों का लक्ष्य तय किया है। सर्वेक्षण में जेवर अंतरराष्ट्रीय ग्रीनफील्ड हवाई अड्डे का भी उल्लेख किया गया है, जिसे उत्तर भारत के लिए एक प्रमुख लॉजिस्टिक्स और कार्गो प्रवेश द्वार के रूप में विकसित किया जा रहा है।

हाल के वर्षों में रजिस्टर्ड फैक्ट्रियों की संख्या दोगुनी होकर 30,000 के पार पहुँच गई है। UP में औद्योगिक सकल मूल्य वर्धन में 25 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। योगी सरकार ने रणनीतिक रूप से कुछ शहरों को विशेष औद्योगिक केंद्र के रूप में विकसित करने के लिए चुना है, जिसमें राज्य की राजधानी लखनऊ को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस केंद्र, कानपुर को ड्रोन निर्माण और परीक्षण केंद्र और नोएडा को सूचना प्रौद्योगिकी और इलेक्ट्रॉनिक्स निर्माण का प्रमुख आधार बनाया जा रहा है।

क्लीन एनर्जी को भविष्य बताते हुए आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 में कहा गया है कि स्थापित क्षमता में सौर ऊर्जा की हिस्सेदारी 23 प्रतिशत से बढ़कर 27 प्रतिशत हो गई है। शहरी विकास को संभालने के लिए लगभग 100 नए टाउनशिप की योजना बनाई गई है। सर्वेक्षण के अनुसार, वर्ष 2046 तक राज्य की शहरी आबादी 35.8 प्रतिशत तक पहुँच जाएगी।

हेल्थ सेक्टर को योगी सरकार की प्राथमिकता, ₹46728 करोड़ हुआ बजट

आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के अनुसार, उत्तर प्रदेश में चिकित्सा ढाँचे और सार्वजनिक स्वास्थ्य खर्च में उल्लेखनीय विस्तार हुआ है। राज्य के नवीनतम बजट में कुल बजट का लगभग 6.1 प्रतिशत स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए आवंटित किया गया है, जो राष्ट्रीय औसत से अधिक है। राज्य सरकार ने स्वास्थ्य बजट के लिए 46,728.48 करोड़ रुपए का आवंटन किया है। सर्वेक्षण के निष्कर्षों के अनुसार, स्वास्थ्य पर सरकारी खर्च बढ़ने से सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता और वहन क्षमता में सुधार हुआ है।

मातृ स्वास्थ्य कार्यक्रमों के बेहतर कवरेज के कारण संस्थागत प्रसव में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। वर्ष 2024-25 में 96.12 प्रतिशत प्रसव संस्थागत रहे जबकि गैर-संस्थागत प्रसव की संख्या घटकर 1.66 लाख रह गई है।

RSS शताब्दी समारोह से आरफा-सुप्रिया को आई मिचली, क्या ‘बॉलीवुड इकोसिस्टम’ ढहने से घबराया इस्लामी-लिबरल गैंग?

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के 100 साल पूरे होने पर देश के अलग-अलग कोनों में अलग तरह से उत्सव हो रहे हैं। इसी कड़ी में एक कार्यक्रम मुंबई में भी ऐसा हुआ, जहाँ बॉलीवुड की नामी हस्तियों ने शिरकत की और पूरे कार्यक्रम को देखने के बाद वो संघ की तारीफ किए बिना नहीं रह सके। किसी ने संघ के कार्यों को सराहा, कोई संघ प्रमुख के भाषण से अभिभूत होता दिखा।

बॉलीवुड एक्टर रणवीर सिंह ने वीडियो शेयर कर कहा, “RSS को 100 वर्ष पूरे करने पर हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ। पिछले 100 सालों से संघ ने देश की सेवा में जो योगदान दिया, उसके लिए दिल से धन्यवाद।”

वहीं, करण जौहर ने कहा कि RSS के शताब्दी समारोह में शामिल होकर उन्हें काफी अच्छा लगा और मोहन भागवत के विचार और आदर्श उन्हें बहुत प्रेरणादायक लगे। करण जौहर ने आगे कहा कि बॉलीवुड की हस्तियों को इतना समय देने के लिए वे मोहन भागवत का दिल से धन्यवाद करते हैं। करण ने ये भी जोड़ा कि मोहन भागवत का सेंस ऑफ ह्यूमर कमाल का है और बातचीत के दौरान वो खूब हँसे भी।

इसके अलावा, शिल्पा शेट्टी ने भी RSS को 100 वर्ष पूरे होने की शुभकामनाएँ दी और कहा कि वो मोहन भागवत की बहुत बड़ी फैन है और राष्ट्र के लिए उनके समर्पण और सोच की दिल से तारीफ करती हैं। शिल्पा शेट्टी ने बताया कि उनके विचार उन्हें प्रेरित करते हैं और इससे वो देश की सेवा से जुड़े काम और ज्यादा मन लगाकर कर पाएँगी।

दोगलई का ‘आरफा’ मॉडल

जैसे-जैसे ये लोग मीडिया में संघ को लेकर अपने बयान दे रहे थे वैसे-वैसे वामपंथी-कट्टरपंथी और कॉन्ग्रेसियों का एक वर्ग अपनी-अपनी जगहों पर बैठकर भीतर ही भीतर फुँक रहा था। आरफा खानम और सुप्रिया श्रीनेत उन्हीं में से एक हैं।

आरफा खानम का पोस्ट

आरफा ने कार्यक्रम देखने के बाद एक ट्वीट किया और कार्यक्रम में जाने वाली हस्तियों को बॉलीवुड में सबसे बड़ा डरपोक करार दिया। आरफा ने लिखा, “बॉलीवुड के सबसे बड़े डरपोक आरएसएस के कदमों में लोटे हुए हैं। क्यों? क्योंकि वो नैतिक रूप से मर चुके हैं और सत्ता को चुनौती नहीं देना चाहते। एक संस्था जिसने कभी भारतीय संविधान पर विश्वास नहीं किया। कभी मुस्लिमों के खिलाफ हिंसा भड़काई, कभी महिलाओं का अपमान किया, उसकी पूजा देश के सबसे नामी और प्रभावशाली लोगों के द्वारा किया जा रहा है। मुझे उल्टी आने जैसा लग रहा है।” इसके अलावा आरफा ने वीडियो भी बनाया है।

आरफा के पोस्ट में दुख, दर्द, पीड़ा सब है। उन्हें एक्टर्स की पर्सनल चॉइस को लेकर ऐसी समस्या है कि उन्हें खुद नहीं पता कि लोग उनकी दोगलई पर भी सवाल खड़ा कर देंगे। अगर आप आरफा का पोस्ट देखेंगे तो ऐसे मामलों से सना पड़ा है जिसके दो पक्ष हैं, लेकिन आरफा उस पक्ष को ही साझा करती हैं जो उनके प्रोपेगेंडा और नैरेटिव पर सेट हो। जैसे बांग्लादेश में हिंदुओं पर अत्याचार का मुद्दा चूँकि उनके नैरेटिव लायक नहीं है इसलिए वो इस पर नहीं बोलतीं, मगर कट्टरपंथियों के साथ अगर एक हिंदू जुड़ा दिख जाए तो ये दिखाने में आरफा जी जान झोंक देती हैं कि वहाँ हिंदू सुरक्षित हैं।

आरफा खानुम की दोगलई का न कोई अंत है और न होता दिख रहा है। अपने आपको पत्रकार कहने वाली ये महिला अपने पत्रकारिता करियर की आड़ में इस्लाम के बचाव में सरेआम हर तथ्यों को गलत बता देती है। उन लोगों को मासूम दिखाने का प्रयास करती है जो खुलेआम कहते हैं कि उनके लिए देश और संविधान से पहले उनका मजहब है… लेकिन अगर एक संगठन जो आपदा के समय में प्रभावित लोगों की मदद में सबसे आगे आकर हाथ बढ़ाता तो वो इसपर सिर्फ इसलिए सवाल उठाती हैं क्योंकि उसका जुड़ाव सनातन से है।

एजेंडा खत्म होने का डर?

आरफा खानम के बयान पर पत्रकार राजन कुमार झा ने तीखा पलटवार किया है। उन्होंने आरफा की ‘छटपटाहट’ की असली वजह बताते हुए लिखा कि बॉलीवुड अब उनके ‘प्रोपेगेंडा’ के चंगुल से आजाद हो रहा है। राजन झा ने आरफा की परेशानी के तीन मुख्य कारण गिनाए।

आतंकियों की पहचान: अब फिल्मों में आतंकियों को ‘भटका हुआ’ नहीं, बल्कि सीधे ‘आतंकी’ दिखाया जाएगा। आस्था का सम्मान: हिंदू प्रतीकों और सनातन का मजाक उड़ाने का खेल अब बंद होगा। इस्लामीकरण पर रोक: फिल्मों के जरिए नैरेटिव सेट कर देश के ‘इस्लामीकरण’ का जरिया खत्म हो जाएगा।

RSS की तारीफ करने के लिए निशाना बना रही- सुप्रिया श्रीनेत

इसी प्रकार कॉन्ग्रेस नेत्री सुप्रिया श्रीनेत ने खुद बताया है कि वैसे तो वो बॉलीवुड सेलेब्रिटीज को निशाना बनाने से परहेज करती हैं, लेकिन चूँकि अब ये लोग आरएसएस की तारीफ कर रहे हैं इसलिए वो इन्हें निशाना बना रही हैं। उन्होंने पूछा है कि आखिर बॉलीवुड वाले लिंचिंग, बलात्कार, हेट स्पीच, किसान हित, मणिपुर मुद्दे, महंगाई, प्रदूषण जैसे मुद्दे पर क्यों बात नहीं कर पाते।

निजी नफरत बनाम राष्ट्र सेवा

सच तो यह है कि संघ आज अपने मूल्यों और सेवा के कारण समाज के हर वर्ग में स्वीकार्य हो रहा है। करण जौहर जैसे फिल्मकार अगर मोहन भागवत के ‘सेंस ऑफ ह्यूमर’ और आदर्शों की बात कर रहे हैं, तो यह उनकी अपनी समझ है। लेकिन वामपंथी ईको-सिस्टम को डर है कि अगर बॉलीवुड ने संघ के राष्ट्रवाद को अपना लिया, तो उनकी बरसों की मेहनत से बनाई गई नफरत की दीवार ढह जाएगी।

सीधी बात है, जो लोग खुद संविधान को अपनी सुविधा के हिसाब से इस्तेमाल करते हैं, वे दूसरों को ‘डरपोक’ न कहें। संघ की 100 साल की यात्रा और उसकी सेवा को आज देश पहचान रहा है और यही पहचान इन प्रोपेगेंडा चलाने वालों की सबसे बड़ी तकलीफ है।

2046 तक देश में बच्चों से ज्यादा बुजुर्ग होंगे: जानिए यह भारत के लिए कितनी बड़ी चुनौती, क्यों हाईकोर्ट ने की इसके लिए ‘सिस्टम’ की बात

राजस्थान हाईकोर्ट ने बुजुर्गों की हालत को लेकर गंभीर चिंता जताई है। अदालत का कहना है कि 2046 तक देश में बच्चों से ज्यादा बुजुर्ग होंगे लेकिन उनके लिए हमारा सिस्टम अभी तैयार नहीं है। इसी चिंता के बीच हाई कोर्ट की जयपुर बेंच ने राज्य के वृद्धाश्रमों की स्थिति की पड़ताल का आदेश दिया है ताकि यह पता चल सके कि वहाँ रहने वाले बुजुर्गों को वास्तव में कैसी सुविधाएँ मिल रही हैं और सिस्टम जमीनी स्तर पर कितना प्रभावी है। अदालत की यह टिप्पणी अहम है, जो भारत अभी सबसे युवा देश है, रफ्तार से दौड़ रहा है उसे अपने बुजुर्गों की भी चिंता करने की आवश्यकता है।

बुजुर्गों को भगवान का दर्जा लेकिन अब उपेक्षित: जानें HC ने क्या-क्या कहा?

राजस्थान हाई कोर्ट ने राज्य में चल रहे सभी 31 वृद्धाश्रमों (ओल्ड एज होम) की जाँच का निर्देश दिया है। राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण इसे लेकर एक विस्तृत रिपोर्ट तैयार करेगा जिसमें वृद्धाश्रमों में चिकित्सा की सुविधा, फूड क्वालिटी, भवनों की स्थिति, सफाई और सुरक्षा के इंतजामों के विषय में विस्तार से बताया जाएगा। राजस्थान सरकार ने बताया कि प्रदेश में 31 वृद्धाश्रम चल रहे हैं जिस पर कोर्ट ने कहा कि सिर्फ नंबर बताना काफी नहीं है बल्कि वहाँ बुजुर्गों के लिए कैसी व्यवस्था है यह देखना भी जरूरी है।

HC ने बुजुर्गों की सामाजिक स्थिति पर गंभीर टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि भारतीय संस्कृति में बुजुर्गों को हमेशा सम्मान और आदर का स्थान दिया गया है लेकिन समय के साथ यह परंपरा कमजोर होती जा रही है। कोर्ट के मुताबिक, संयुक्त परिवारों के टूटने, तेजी से बढ़ते शहरीकरण और बदलती जीवनशैली ने बुजुर्गों को समाज में धीरे-धीरे असहाय और उपेक्षित स्थिति में पहुँचा दिया है।

अदालत ने यह भी संकेत दिया कि समाज और व्यवस्था दोनों को बुजुर्गों की बदलती जरूरतों को समझते हुए अधिक संवेदनशील और जिम्मेदार होना होगा।

2046 तक देश में कितने होंगे बुजुर्ग

सितंबर 2023 में संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष (UNFPA) और इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर पॉपुलेशन साइंसेज (IIPS) ने एक रिपोर्ट जारी की थी। यह रिपोर्ट देश और दुनिया के प्रमुख जनसंख्या और वृद्धावस्था संबंधी आँकड़ों के आधार पर किया गया है। इसमें IIPS द्वारा किए गए ‘लॉन्गिट्यूडिनल एजिंग सर्वे इन इंडिया (2017-18)’, भारत की जनगणना, भारत सरकार के जनसंख्या अनुमान (2011-2036) और संयुक्त राष्ट्र के विश्व जनसंख्या संभावनाएँ 2022 से प्राप्त आँकड़ों पर आधारित थी।

रिपोर्ट में बताया गया है कि दुनिया में साल 2022 में करीब 110 करोड़ लोग ऐसे थे, जिनकी उम्र 60 साल या उससे ज्यादा थी। यह दुनिया की कुल आबादी का लगभग 13.9 प्रतिशत था। अगले 30 सालों में बुजुर्गों की संख्या तेजी से बढ़ने वाली है। अनुमान है कि 2050 तक यह संख्या बढ़कर करीब 210 करोड़ हो जाएगी और तब दुनिया की कुल आबादी में बुजुर्गों का हिस्सा करीब 22 प्रतिशत तक पहुँच जाएगा। यह बदलाव दुनिया के हर हिस्से में दिखाई देगा।

भारत में भी ऐसा ही होगा। साल 2022 में भारत में करीब 14.9 करोड़ बुजुर्ग थे, जिनकी उम्र 60 साल या उससे ज्यादा थी। यह देश की कुल आबादी का लगभग 10.5 प्रतिशत था। लेकिन 2050 तक बुजुर्गों की संख्या बढ़कर करीब 34.7 करोड़ हो जाएगी और तब देश की आबादी में उनका हिस्सा करीब 21 प्रतिशत तक पहुँच जाएगा।

फोटो साभार: इंडिया एजिंग रिपोर्ट 2023

रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2000 से 2022 के बीच भारत की कुल आबादी में करीब 34 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई लेकिन इसी दौरान 60 साल से ज्यादा उम्र के लोगों की संख्या 103 प्रतिशत तक बढ़ गई। यानी बुजुर्गों की संख्या देश की कुल आबादी से कहीं ज्यादा तेजी से बढ़ी। इससे भी ज्यादा तेज बढ़ोतरी 80 साल से ऊपर उम्र के लोगों में हुई। इस उम्र वर्ग की आबादी में इस दौरान करीब 128 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई।

आगे के अनुमान और भी चौंकाने वाले हैं। साल 2022 से 2050 के बीच भारत की कुल आबादी में सिर्फ 18 प्रतिशत की बढ़ोतरी होने की उम्मीद है जबकि बुजुर्गों की संख्या करीब 134 प्रतिशत तक बढ़ सकती है। इसी अवधि में 80 साल से ज्यादा उम्र के लोगों की संख्या लगभग 279 प्रतिशत तक बढ़ने का अनुमान है।

खास बात यह है कि बहुत ज्यादा उम्र के बुजुर्गों में महिलाओं की संख्या पुरुषों से ज्यादा होगी। इनमें बड़ी संख्या विधवा और दूसरों पर निर्भर रहने वाली महिलाओं की होगी। जैसे-जैसे उम्र 60 से 80 साल के बीच बढ़ेगी, बुजुर्ग महिलाओं की संख्या पुरुषों की तुलना में लगातार बढ़ती जाएगी।

कैसा रहा है वृद्ध आबादी में बढ़ोतरी का इतिहास (फोटो: इंडिया एजिंग रिपोर्ट 2023)

अनुमान है कि साल 2046 तक भारत में बुजुर्गों की संख्या बच्चों (0 से 14 वर्ष) से ज्यादा हो जाएगी। वहीं, 2050 तक देश की कामकाजी उम्र की आबादी (15 से 59 वर्ष) में गिरावट आने लगेगी।

बूढ़े होते लोग, भारत के सामने कैसी चुनौती?

आँकड़ों से स्पष्ट है कि भारत तेजी से ‘एजिंग सोसाइटी’ की और बढ़ रहा है। जीवन प्रत्याशा में वृद्धि, स्वास्थ्य सुविधाओं में सुधार और जन्मदर में गिरावट ने मिलकर भारत के ‘एज स्ट्रक्चर’ को बदल दिया है। यह आँकड़ों का यह बदलाव लोगों और देश दोनों के लिए ही चुनौती लाने वाले है वो भी ऐसे वक्त में जब भारत को अपनी बूढ़ी होती आबादी की चिंता के लिए बहुत काम करना बाकी है। सामाजिक-आर्थिक तौर पर उम्र का यह बदलाव कई तरह के असर दिखाएगा जिससे निपटने भारत के लिए चुनौती होने वाला है।

‘फेमिनाइजेशन-रुरललाइजेशन ऑफ एजिंग’

भारत में वृद्धावस्था का एक प्रमुख पहलू ‘फेमिनाइजेशन ऑफ एजिंग’ है। भारत में 60 साल की उम्र के बाद औसतन लोग करीब 18.3 साल और जीवित रहते हैं। इसमें महिलाओं की उम्र पुरुषों से ज्यादा होती है। 60 साल की उम्र के बाद महिलाएँ औसतन लगभग 19 साल और पुरुष लगभग 17.5 साल तक जीवित रहते हैं। महिलाएँ पुरुषों की तुलना में अधिक समय तक जीवित रहती हैं, जिसके कारण वृद्ध महिलाओं की संख्या अधिक होती है। इनमें से बड़ी संख्या विधवाओं की होती है, जो अकेले रहती हैं और परिवार पर निर्भर होती हैं। सामाजिक सुरक्षा की सीमित व्यवस्था और सामाज के पितृसत्तात्मक ढाँचे के कारण वृद्ध महिलाएँ अधिक असुरक्षित स्थिति में होती हैं।

इसका एक अन्य पहलू रुरललाइजेशन यानी ग्रामीणीकरण है। भारत की 71 प्रतिशत वृद्ध आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करती है। ग्रामीण भारत में स्वास्थ्य सेवाओं की कमी, सीमित परिवहन सुविधाएँ, कम आय और सामाजिक अलगाव वृद्ध लोगों की समस्याओं को और बढ़ सकते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में युवा आबादी का शहरों की ओर पलायन भी वृद्ध लोगों को अकेला छोड़ देता है, जिससे वे खुद भी भावनात्मक और सामाजिक रूप से अधिक कमजोर हो जाते हैं।

वृद्धों की कामकाजी आबादी

वृद्धों में भी बढ़ते वृद्ध

भारत में ‘एजिंग ऑफ द एज्ड’ की ट्रेंड भी दिख रहा है। इसका अर्थ है कि वृद्ध आबादी के भीतर 75 वर्ष और उससे अधिक आयु के लोगों का अनुपात लगातार बढ़ रहा है। यह वर्ग स्वास्थ्य सेवाओं, देखभाल और सामाजिक सहायता पर अधिक निर्भर होता है। जैसे-जैसे इस आयु वर्ग की संख्या बढ़ेगी वैसे-वैसे हेल्थ सिस्टम, परिवार संरचना और सामाजिक कल्याण योजनाओं पर दबाव भी बढ़ेगा। संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष और अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के अनुसार, सुपर-एज्ड आबादी का बढ़ना विकासशील देशों के लिए सबसे बड़ी सामाजिक चुनौतियों में से एक है।

सिल्वर इकोनॉमी की कमजोर स्थिति

वृद्ध आबादी के लिए आर्थिक अवसरों और सेवाओं के बाजार को ‘सिल्वर इकोनॉमी’ कहा जाता है। इसमें स्वास्थ्य सेवाएँ, बीमा, आवास, वित्तीय उत्पाद, तकनीकी समाधान और मनोरंजन सेवाएँ शामिल होती हैं। भारत की सिल्वर इकोनॉमी का मूल्य 2024 में लगभग 73,000 करोड़ रुपए आँका गया है और अनुमानों के अनुसार आने वाले वर्षों में इसमें कई गुना वृद्धि होगी। विकसित देशों में सिल्वर इकोनॉमी एक मजबूत आर्थिक क्षेत्र बन चुकी है लेकिन भारत में यह अभी भी अविकसित अवस्था में है। जिसके चलते वृद्ध लोगों की जरूरतों और उपलब्ध सेवाओं के बीच अंतर बना हुआ है।

आर्थिक निर्भरता और असुरक्षा

भारत में वृद्धों की आर्थिक स्थिति एक गंभीर चिंता का विषय है। उपलब्ध आँकड़ों के अनुसार, केवल 11 प्रतिशत वृद्ध पुरुषों को वर्क पेंशन मिलती है और 16.3 प्रतिशत को सामाजिक पेंशन प्राप्त होती है। वहीं, वृद्ध महिलाओं में 27.4 प्रतिशत केवल सामाजिक पेंशन पर निर्भर हैं और मात्र 1.7 प्रतिशत को कार्य पेंशन मिलती है। लगभग पाँचवां हिस्सा ऐसा है जिसके पास कोई स्थायी आय स्रोत नहीं है। यह स्थिति वृद्धावस्था को आर्थिक असुरक्षा और गरीबी से जोड़ देती है।

देश के सामने कम नहीं चुनौती

जब बुजुर्गों की संख्या बढ़ेगी और युवाओं की संख्या घटेगी तो काम करने वाले लोगों की संख्या कम होगी। इससे देश की उत्पादन क्षमता घटेगी। भारत की अर्थव्यवस्था अभी तक युवा लेबर पर निर्भर रही है। अगर कामकाजी आबादी घटेगी, तो उद्योग, कृषि और सेवा क्षेत्र पर असर पड़ेगा। भारत में पेंशन और सामाजिक सुरक्षा प्रणाली सीमित है। सरकारी कर्मचारियों को पेंशन मिलती है लेकिन असंगठित क्षेत्र के करोड़ों मजदूरों के पास कोई पेंशन व्यवस्था नहीं है। जब बुजुर्गों की संख्या बढ़ेगी, तो सरकार पर पेंशन देने का दबाव बढ़ेगा। इससे सरकारी बजट पर भारी बोझ पड़ेगा।

स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए चुनौती

भारत में बड़ी संख्या में बुजुर्ग गरीब हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में बुजुर्गों की स्थिति और खराब है। अगर सरकार ने पर्याप्त सामाजिक सुरक्षा नहीं दी तो बुजुर्ग गरीबी और निर्भरता में फँस सकते हैं। इसके साथ ही बुजुर्गों की बढ़ती संख्या का सबसे बड़ा असर स्वास्थ्य क्षेत्र पर पड़ेगा। बुजुर्गों को लंबे समय तक इलाज की जरूरत होती है। उन्हें हृदय रोग, मधुमेह, कैंसर, गठिया और मानसिक रोग जैसी समस्याएँ होती हैं। भारत में अभी बुजुर्गों के लिए विशेष स्वास्थ्य सेवाएँ बहुत कम हैं। अगर बुजुर्गों की संख्या तेजी से बढ़ी, तो अस्पतालों और डॉक्टरों पर भारी दबाव पड़ेगा। साथ ही, शहरों में पहले से ही भीड़, प्रदूषण और आवास की समस्या है। बुजुर्गों के लिए शहरों को अनुकूल बनाना एक बड़ी चुनौती होगी।

बुजुर्ग आबादी को सरकार का साथ

भारत में बुजुर्ग आबादी तेजी से बढ़ रही है और वरिष्ठ नागरिकों के लिए कई योजनाएँ/कानून लागू किए गए हैं ताकि उन्हें आर्थिक सुरक्षा, भोजन, स्वास्थ्य और सामाजिक सम्मान मिल सके।। 1999 में राष्ट्रीय वृद्धजन नीति शुरु की गई जिसका मुख्य उद्देश्य बुजुर्गों को आर्थिक सुरक्षा, बेहतर स्वास्थ्य सेवाएँ और सामाजिक सम्मान देना है। इसके तहत सरकार ने यह मान्यता दी कि बुजुर्गों को केवल सहायता नहीं बल्कि गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार मिलना चाहिए।

इसके बाद वर्ष 2007 में माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों की देखभाल और कल्याण अधिनियम लागू किया गया। इस कानून के तहत बच्चों और उत्तराधिकारियों को अपने माता-पिता और बुजुर्ग परिजनों की देखभाल और भरण-पोषण की जिम्मेदारी दी गई है। यदि बच्चे अपने माता-पिता की देखभाल नहीं करते तो बुजुर्ग कानूनी रूप से भरण-पोषण की माँग कर सकते हैं। सरकार ने राष्ट्रीय वृद्धजन स्वास्थ्य देखभाल कार्यक्रम शुरू किया। इस कार्यक्रम के तहत प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों और जिला अस्पतालों में बुजुर्गों के लिए विशेष चिकित्सा सुविधाएँ विकसित की गई हैं। इसमें जेरियाट्रिक यानी वृद्धावस्था से जुड़ी बीमारियों का इलाज, पुनर्वास सेवाएँ और कुछ क्षेत्रों में घरेलू देखभाल जैसी सुविधाएँ शामिल हैं।

इसके साथ ही, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय वृद्धावस्था पेंशन योजना (1995) के तहत गरीब बुजुर्गों को मासिक पेंशन दी जाती है जबकि अन्नपूर्णा योजना (2000) से पेंशन से वंचित पात्र बुजुर्गों को हर महीने 10 किलो खाद्यान्न मिलता है। राष्ट्रीय पेंशन योजना (2004) सरकारी कर्मचारियों के लिए योगदान आधारित पेंशन व्यवस्था है, जिसने पुरानी पेंशन योजना का स्थान लिया। माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण एवं कल्याण अधिनियम (2007) के तहत 60 वर्ष से अधिक उम्र के माता-पिता को बच्चों से भरण-पोषण का अधिकार मिला और राज्यों को वृद्धाश्रम स्थापित करने का निर्देश दिया गया।

इसके अलावा, अटल पेंशन योजना (2015) के तहत असंगठित क्षेत्र के लोग 18-40 वर्ष की उम्र में योगदान कर पेंशन प्राप्त करते हैं, जिसमें सरकार भी योगदान करती है। राष्ट्रीय वयोश्री योजना (2017) के तहत गरीब और दिव्यांग बुजुर्गों को व्हीलचेयर, श्रवण यंत्र, चश्मा जैसे सहायक उपकरण दिए जाते हैं। प्रधानमंत्री श्रम योगी मानधन योजना (2019) में असंगठित श्रमिकों को 60 वर्ष के बाद 3000 रुपए मासिक पेंशन मिलती है। SACRED योजना (2021) बुजुर्गों को रोजगार के अवसर देने के लिए ऑनलाइन प्लेटफॉर्म उपलब्ध कराती है जबकि यूनिफाइड पेंशन योजना (2024) सरकारी कर्मचारियों को NPS का विकल्प देकर निश्चित पेंशन की व्यवस्था करती है।

क्या है आगे की राह

भारत में सरकारी और सामाजिक स्तर पर वृद्धों की जरूरतों के लिए कई अहम कदम उठाए गए हैं। हालाँकि, आबादी जिस तरह बढ़ रही है उसमें ये कदम नाकाफी साबित हो सकते हैं और साथ ही कई अन्य ऐसी चीजें हैं जिनमें सुधार की गुजाइंश नजर आती है। बढ़ती आबाद से साफ है कि अगर आज बुजुर्गों के लिए मजबूत व्यवस्था नहीं बनाई गई तो भविष्य में करोड़ों लोग आर्थिक, स्वास्थ्य और सामाजिक समस्याओं से जूझेंगे।

आर्थिक-स्वास्थ्य सुरक्षा के लिए उठाए जाएँ कदम

भारत में बुजुर्गों के लिए सबसे बड़ी समस्या आर्थिक सुरक्षा की है। बड़ी संख्या में बुजुर्गों के पास नियमित आय का कोई साधन नहीं है और वे अपने बच्चों या परिवार पर निर्भर हैं। सरकार की वृद्धावस्था पेंशन योजनाएँ मौजूद हैं लेकिन उनकी राशि लोगों के लिए कम पड़ रही है।

ऐसे में जरूरी हो जाता है कि बुजुर्गों के लिए न्यूनतम आय की गारंटी दी जाए और पेंशन की राशि बढ़ाई जाए।स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी भी बुजुर्गों के जीवन को कठिन बना देती है। भारत में अभी बुजुर्गों के लिए अलग से मजबूत स्वास्थ्य व्यवस्था नहीं है। जरूरी है कि हर जिले में बुजुर्गों के लिए विशेष अस्पताल और डॉक्टर हों, सस्ती दवाइयाँ उपलब्ध कराई जाएँ।

अकेलेपन से निपटने के लिए बने सामाजिक ढाँचा

आज के समय में बुजुर्गों की एक बड़ी समस्या अकेलापन और उपेक्षा भी है। संयुक्त परिवारों के टूटने, शहरीकरण और बदलती जीवनशैली के कारण कई बुजुर्ग अकेले रह जाते हैं। कई रिपोर्ट्स बताती हैं कि भारत में बड़ी संख्या में बुजुर्ग खुद को सामाजिक रूप से अलग-थलग महसूस करते हैं। इसलिए जरूरी है कि समाज और सरकार मिलकर बुजुर्गों के लिए सामुदायिक केंद्र, सामाजिक गतिविधियाँ और सुरक्षित वृद्धाश्रम विकसित करें ताकि वे खुद को अकेला न महसूस करें और सम्मान के साथ जीवन जी सकें।

बुजुर्गों के लिए सेल्फ हेल्प ग्रुप (SHG) बनाने की जरूरत है ताकि वे सामाजिक रूप से सक्रिय रह सकें और एक-दूसरे से जुड़ सकें। अलग-अलग पीढ़ियों के बीच संवाद और सहयोग बढ़ाने की भी जरूरत है ताकि बुजुर्गों का अनुभव और ज्ञान युवा पीढ़ी तक पहुँचे और समाज को उसका लाभ मिले। डिजिटल युग में बुजुर्गों को पीछे न छोड़ने के लिए उन्हें डिजिटल साक्षरता और तकनीकी कौशल सिखाने की जरूरत है, ताकि वे ऑनलाइन सेवाओं, ई-कॉमर्स और डिजिटल स्वास्थ्य सुविधाओं का उपयोग कर सकें।

भारत में बुजुर्गों के कल्याण के लिए सरकारी योजनाएँ बहुत जरूरी हैं लेकिन केवल सरकार के प्रयास ही पर्याप्त नहीं हैं। समाज को भी आगे बढ़कर बुजुर्गों के साथ जुड़ने की जरूरत है। बुजुर्ग हमारे समाज की धरोहर हैं। बदलती जीवनशैली और व्यस्तता के कारण कई बुजुर्ग अकेलेपन और उपेक्षा का शिकार हो जाते हैं।

ऐसे में परिवार, पड़ोस और समाज का दायित्व बनता है कि वे बुजुर्गों को सम्मान, प्यार और सहयोग दें। उनके साथ समय बिताना, उनकी समस्याओं को सुनना और जरूरत पड़ने पर मदद करना समाज की जिम्मेदारी है। जब सरकार और समाज मिलकर काम करेंगे तभी बुजुर्गों का जीवन सुरक्षित, सम्मानजनक और खुशहाल बन सकेगा।

बांग्लादेश चुनाव में केवल 4% महिला उम्मीदवार, उन्हें भी मिल रहीं रेप-हत्या की धमकियाँ: शेख हसीना- खालिदा जिया के देश में महिलाओं के नेतृत्व के खिलाफ कट्टरपंथी

बांग्लादेश में दो ताकतवर महिला नेताओं ने सफलतापूर्वक दशकों तक राज चलाया। अवामी लीग की शेख हसीना और बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी की दिवंगत खालिदा जिया। कट्टरपंथी अब कहते हैं कि महिलाएँ कौम का नेतृत्व नहीं कर सकतीं इसलिए मात्र 4 फीसदी महिलाओं को पार्टियों ने उम्मीदवार बनाया है। इन महिलाओं को यौन उत्पीड़न, चरित्र हनन और ऑनलाइन ट्रोलिंग का सामना करना पड़ रहा है। शेख हसीना को पद से हटाने के बाद जिस तरह से कट्टरपंथियों का राज वहाँ आ गया है, निकट भविष्य में महिलाओं के दिन अच्छे नहीं आने वाले।

30 पार्टियों ने एक भी महिला को नहीं दिया टिकट

15 फरवरी को बांग्लादेश में आम चुनाव है। इसके लिए 51 पार्टियों ने 1981 उम्मीदवार चुनाव मैदान में उतारे हैं। इनमें सिर्फ 78 महिलाएँ हैं। करीब 30 पार्टियों ने एक भी महिला को टिकट नहीं दिया। शेख हसीना की पार्टी आवामी लीग को चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। खालिदा जिया दुनिया छोड़ चुकी है। उनकी पार्टी बीएनपी ने 10 महिलाओं को टिकट दिया है।

द डेली स्टार के मुताबिक, जमात-ए-इस्लामी, इस्लामी आंदोलन बांग्लादेश, बांग्लादेश खिलाफत मजलिस, खिलाफत मजलिस, बांग्लादेश इस्लामी फ्रंट, लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी, जोनोतार दल, बांग्लादेश सांस्कृतिक मुक्ति जोत, बांग्लादेश कांग्रेस, जातीय पार्टी , बांग्लादेश खिलाफत आंदोलन, बांग्लादेश नेशनलिस्ट फ्रंट और बांग्लादेश जसद समेत कम से कम 30 पार्टियों ने सिर्फ पुरुष उम्मीदवार को चुनाव मैदान में उतारा है।

जानकारी के मुताबिक, 78 महिलाओं में से एक तिहाई भी खुद राजनीतिज्ञ नहीं हैं, बल्कि असरदार राजनीति लोगों की रिश्तेदार हैं, पार्टी नेताओं की पत्नियाँ, बेटियाँ या परिवार की सदस्य हैं।

बांग्लादेश में आधी से ज्यादा आबादी औरतों की है। देश में पुरुषों और औरतों का अनुपात 97 : 100 है। इसके बावजूद देश में मात्र 3.93 परसेंट औरतों को उम्मीदवार बनाया गया है। 78 महिला उम्मीदवारों में से 61 को 21 राजनीतिक पार्टियों ने टिकट दिया है, जबकि 17 निर्दलीय हैं।

रिप्रेजेंटेशन ऑफ द पीपल ऑर्डर 1972 के तहत पॉलिटिकल पार्टियों को सेंट्रल लेवल सहित कमिटी में कम से कम 33 फीसदी पद महिलाओं के लिए आरक्षित करना जरूरी है, लेकिन कोई भी पार्टी ऐसा करने में नाकाम रही तो 2021 में चुनाव आयोग ने इसकी मियाद 2030 तक बढ़ा दी।

महिला नहीं कर सकती कौम का नेतृत्व- जमात

जमात-ए-इस्लामी के अमीर शफीकुर रहमान जैसे नेता खुलेआम कहते हैं कि महिला पार्टी, समाज या देश का नेतृत्व नहीं कर सकतीं, इसलिए उनकी पार्टी ने किसी महिला को टिकट नहीं दिया।
कुछ ऐसा ही बयान हिफाजत ए इस्लाम जैसी इस्लामिक संगठन का भी है। इसके नेता अजीज उल हक का कहना है कि जिस कौम का लीडर महिला होता है, वह कौम तरक्की नहीं कर सकती। उन्होंने अमेरिका का उदाहरण देते हुए कहा कि अमेरिका में आज तक कोई महिला राष्ट्रपति नहीं बन पाई। उन्होंने यहाँ तक कहा कि बांग्लादेश में शरिया कानून लागू होना चाहिए।

जमात-ए-इस्लामी महिला विंग की सेक्रेटरी नूरुन्निसा सिद्दिका ने कहा, “कुरान के अनुसार, पुरुष महिलाओं के डायरेक्टर होते हैं, जिसे इस्लाम में एक आदेश और जिम्मेदारी माना जाता है।” सिद्दिका ने महिलाओं को टिकट नहीं दिए जाने को ‘संगठन का फैसला’ बताया।

मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि ऐसे बयान पितृसत्तात्मक मानदंडों को मजबूत करते हैं। इससे महिलाएँ और भी राजनीति से दूर हो गई है। महिलाओं में जबरदस्त असुरक्षा की भावना है और ऐसे बयान उन्हें हतोत्साहित करते हैं। राजनीत जैसे क्षेत्र में आने के लिए विश्वास की काफी जरूरत है, मानवाधिकार कार्यकर्ता भी कट्टरपंथी बयानों से बेहद चिंतित हैं।

महिलाओं को मिल रही धमकियाँ

कई महिला उम्मीदवारों का कहना है कि उन्हें ऑनलाइन और जमीनी स्तर पर उत्पीड़न का सामना करना पड़ रहा है। साइबरबुलिंग, यौन उत्पीड़न की धमकी, चरित्र हनन करने की कोशिश की जा रही है। उनके खिलाफ साजिश रची जा रही है, ताकि चुनाव मैदान छोड़ दें।

नेशनल सिटिजन पार्टी यानी एनसीपी की उम्मीदवार दिलशाना पारुल का कहना है कि उन्हें हेडस्कार्फ को लेकर ट्रोल किया जा रहा है। हिजाब पर छींटाकशी की जा रही है। ट्रोल करने वालों में तथाकथित प्रोग्रेसिव लोग भी शामिल हैं। उनका कहना है कि पुरुष नेताओं को उनकी कार्यशैली, भ्रष्टाचार जैसे वजहों से आलोचना की जाती है, लेकिन महिलाओं के चरित्र पर आसानी से वार कर देते हैं।

एनसीपी की एक और उम्मीदवार नबीला तस्नीद ढाका 20 से चुनाव मैदान में हैं। उनका कहना है कि उनके बैनर पोस्ट तक फाड़ दिए गए। अधिकारियों ने उन्हें मदद करने के बजाए किसने किया उसका वीडियो लाने को कह रहे हैं। उन्हें डराया धमकाया जा रहा है।

एक और उम्मीदवार तस्लीमा अख्तर का कहना है कि ऑनलाइन उन्हें धमकियाँ मिल रही हैं। ऑनलाइन टारगेट करना आसान होता है। उनका कहना है कि देश की कानून व्यवस्था काफी लचर है, महिलाओं को घर में रहने के लिए मजबूर कर दिया गया है। इसलिए महिलाएँ वोट डालने कितनी निकलेंगी, ये भी बड़ा सवाल है।

जमीन पर संघर्ष कर राजनीति में आगे बढ़ने वाली महिलाएँ काफी कम है। इसके पीछे पारिवारिक माहौल है। कोई नहीं चाहता कि उनके घर की बेटी अनसेफ हो। इसलिए राजनीति में नहीं आने देते।