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अब होली पर शुरु हुआ ‘अंबेडकरवादियों’ का ड्रामा, होलिका की मनगढ़ंत कहानी से हिंदुओं को बाँटने की साजिश: जानें- कैसे फैला रहे झूठ और क्या है असल मान्यता

होली से ठीक पहले एक बार फिर हिंदुओं को बाँटने का खेल शुरू हो गया है। सोशल मीडिया पर कुछ लोग खुद को अंबेडकरवादी बताकर खुलेआम कह रहे हैं कि होली उनका त्योहार नहीं है। वीडियो बनाकर माहौल ऐसा बनाया जा रहा है कि बहुजन समाज के लिए होली एक त्योहार नहीं, बल्कि शोक है।

होली नजदीक आने से ठीक पहले एक बार फिर हिंदुओं को बाँटने का खेल शुरू हो गया है। सोशल मीडिया पर कुछ लोग खुद को अंबेडकरवादी बताकर खुलेआम कह रहे हैं कि होली उनका त्योहार नहीं है। वीडियो बनाकर समाज के अन्य लोगों से त्योहार से दूर रहने की अपील की जा रही है। माहौल ऐसा बनाया जा रहा है कि बहुजन समाज के लिए होली एक त्योहार नहीं, बल्कि शोक है।

सिर्फ इतना ही नहीं, होलिका दहन की कथा को भी तोड़-मरोड़कर पेश किया जा रहा है। भगवान विष्णु के भक्त प्रह्लाद की कहानी को अलग रंग देकर लोगों के मन में भ्रम फैलाने की कोशिश हो रही है। ‘होलिका के बलात्कार’ की भी कहानी सुनाई जा रही है। साफ दिख रहा है कि होली से पहले हिंदुओं को बाँटने की साजिश रची जा रही है।

‘मनुवादी विचारधारा वालों ने होलिका का किया बलात्कार’

ऐसे कई वीडियो इंटरनेट पर वायरल हो रहे हैं। सबसे पहला वीडियो आँचल गौतम नाम की युवती का है, जो गाँव के लोगों को होलिका दहन के इतिहास के बारे में जानने के लिए कहती है। खुद को अंबेडकरवादी बताते हुए आँचल दावा करती है कि राजा हिरण्यकशिपु उनके समाज के थे और उनकी बहन होलिका के साथ ‘मनुवादी विचारधारा’ के लोगों ने बलात्कार किया था।

आँचल गाँव के लोगों को संबोधित करते हुए कहती हैं कि हम सभी लोगों को होली नहीं मनाना चाहिए। वे होलिका की मनगढ़ंत कथा सुनाते हुए कहती है, “एक राजा हिरण्यकशिपु थे हमारे समाज के। उनकी बहन थी होलिका। हेणाकश्यप के पुत्र थे प्रह्लाद। मनुवादी विचारधारा के लोग प्रह्लाद को दारू-शराब पिलाते थे। होलिका प्रह्लाद को बहुत ज्यादा मानती थी।”

वह आगे कहती है, “प्रह्लाद कहीं घूमने गया था, वहाँ उसको शराब पिला दी। उसके पीछे होलिका अपने भतीजे को खाना खिलाने अपने हाथों से गई। वो प्रह्लाद को ढूँढती है, वहाँ मनुवादी विचारधारा के लोग होलिका के साथ रातभर बलात्कार करते हैं। और होलिका को जला देते हैं। और सभी लोग क्या करते है हैप्पी होली।”

इतना ही नहीं वह अपनी कहानी आगे जारी रखते हुए कहती है, “वो सब लोग एक दूसरे को रंग लगाकर जश्न मनाते हैं कि उन्होंने होलिका को मार दिया। और कोई पाप न लगे इसीलिए होली मनाते हैं। तो सोचिए अगर हमारी बहन-बेटी के साथ बलात्कार हो जाएगा तो क्या हम होली मनाएँगे? इसीलिए हम लोगों को होली नहीं मनाना चाहिए।”

अंबेडकरवादियों का होली बॉयकॉट का अभियान

आँचल गौतम की इस वीडियो पर सोशल मीडिया पर मानो अभियान छिड़ गया। एक के बाद एक अंबेडकरवादियों की वीडियो सामने आईं, जिसमें होली न मनाने की अपील की गई। साथ ही होलिका को बहुजन समाज का बताकर उसके जलने का शोक मनाने को कहा गया।

नीचे वीडियो शालू गुप्ता नाम की अंबेडकरवादी कहती हैं, “होली हमारा त्योहार नहीं है। जिंदा स्त्री को जलाकर खुशी मनाने की चली आ रही परंपरा को आँख बंद करके स्वीकार नहीं करना है। क्षमा चाहती हूँ, न ही मैं होली की बधाई किसी को दूँगी और न ही लूँगी। जय भीम”

बिहार के एक युवक सुरेंद्र कुमार ने भी कहा, “होलिका बहुजन समाज के लिए काला दिन है। समाज के लोग इतिहास जानें।” वे कहते हैं कि हिंदू धर्म ने कभी बहुजन समाज की महिलाओं का सम्मान नहीं किया, यह सम्मान उन्हें बाबा भीमराव अंबेडकर से मिला है। उन्होंने यह भी कहा कि अगर नाच-गाना करना है तो अपने महापुरुषों की जयंती पर करो।

ऐसे ही एक वीडियो में बिहार की कविता अंबेडकर होलिका की वही मनगढ़ंत कहानी सुनाती है और बहुजन समाज को होली न मनाने के लिए कहती हैं।

क्या है होलिका दहन मनाने के पीछे की असल मान्यता?

जैसा यहाँ खुद को अंबेडकरवादी बताने वाले लोग होलिका दहन के पीछे का इतिहास और मनगढ़ंत कहानी बनाकर पेश कर रहे हैं। असल में ऐसा कुछ है ही नहीं। पौराणिक कथाओं के अनुसार, होली बुराई पर अच्छाई की जीत और भगवान की भक्ति की शक्ति के प्रतीक के रूप में मनाई जाती है। कथा में बताया गया है कि असुर राजा हिरण्यकशिपु चाहता था कि सभी लोग उसी की पूजा करें, लेकिन उसका पुत्र प्रह्लाद भगवान विष्णु का भक्त था। इससे क्रोधित होकर उसने प्रह्लाद को मारने की कई कोशिशें कीं।

इसी क्रम में राजा की बहन होलिका, जिसे अग्नि से न जलने का वरदान था, प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि में बैठ गई। लेकि भगवान विष्णु की कृपा से प्रह्लाद सुरक्षित बच गए और होलिका जलकर भस्म हो गई। इसी घटना की याद में फाल्गुन पूर्णिमा की रात होलिका दहन किया जाता है और अगले दिन रंगों वाली होली खेली जाती है, जो प्रह्लाद की जान बचने की खुशी का प्रतीक है।

वहीं होलिका को बहुजन समाज बताने वाले लोग भी जान लें कि होलिका ब्राह्मण स्त्री थी, जिसके पिता महान ऋषि कश्यप थे। ऋषि कश्यप की तीन संतानें थीं- होलिका, हिरण्यकशिपु और हिण्याक्ष। हिंदू शास्त्रों के मुताबिक, तीनों का स्वभाव अत्याचारी और राक्षसी बताया गया है। हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपुर का वध भगवान विष्णु ने वराह अवतार और नरसिंह अवतार में किया था। वहीं होलिका भक्त प्रह्लाद को मारने की कोशिश में खुद अग्नि में जलकर मर गई।

यहाँ अंबेडकरवादियों की मनगढ़ंत कहनी पर विराम लगता है। होलिका का न तो बलात्कार हुआ, और न ही किसी न उसे जबरदस्ती आग में जलाया। वही प्रह्लाद को मनुवादियों द्वारा शराबी और जुआरी भी नहीं बनाया गया। अंबेडकरवादियों की कहानी पूरी तरह से मनगढ़ंते है। होली हिंदुओं का त्योहार है और इसे हिंदू धर्म के हर व्यक्ति को खुशी से मनाना चाहिए, क्योंकि यह बुराई पर जीत का प्रतीक है।

अंबेडकरवादियों की मनगढ़ंत कहानी के मायने क्या हैं?

यह पहली बार नहीं है। हर साल होली से पहले कुछ कथित अंबेडकरवादी अपनी बनाई हुई कहानी लेकर सामने आ जाते हैं और कहते हैं कि होली उनका त्योहार नहीं है। वह इतिहास में दलित समाज पर हुए अत्याचार जैसी पुरानी बातें दोहराकर खुद को हिंदुओं से अलग बताने लगते हैं।

ये लोग खुलेआम हिंदू धर्म को बाँटने की साजिश रचते हैं। कम पढ़े-लिखे और भोले लोगों के बीच लंबी-लंबी बातें रखी जाती हैं। भाषणों, वीडियो और सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए उनके मन में भ्रम पैदा किया जाता है। धीरे-धीरे उनके दिमाग में शक और अलगाव का जहर भरा जाता है।

आखिर में नुकसान किसका होता है। उसी समाज का जिसे तोड़ने की कोशिश की जाती है। जहाँ आज देश को हिंदुओं की एकता की जरूरत है, वहाँ ऐसे कुछ लोग नफरत का जहर उगलते हैं और हिंदुओं को बाँटने में लग जाते हैं।

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ऑपइंडिया स्टाफ़
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कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

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