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नेपाली Gen-Z आंदोलन को दिशा देने वाले बालेन शाह बनेंगे PM, भारत में पढ़ाई लेकिन दिल में नफरत: जानें दिल्ली की तरफ झुकेंगे या बनेंगे अमेरिका के पिट्ठू?

नेपाल की राजनीति इस समय बड़े बदलाव के दौर से गुजर रही है। 5 मार्च 2026 को हुए आम चुनाव के बाद जारी मतगणना के शुरुआती रुझानों में 35 वर्षीय बालेन शाह और उनकी पार्टी राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (RSP) को भारी बढ़त मिलती दिखाई दे रही है। 165 सीटों वाली संसद में उनकी पार्टी 100 से अधिक सीटों पर आगे बताई जा रही है।

यदि अंतिम परिणाम भी इसी दिशा में आते हैं तो नेपाल की राजनीति में दशकों से सक्रिय पारंपरिक दलों, नेपाली कॉन्ग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टियों को बड़ा झटका लग सकता है। हालाँकि बालेन शाह का संभावित सत्ता में आना केवल राजनीतिक बदलाव नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे राष्ट्रवादी बयानबाजी और पड़ोसी देशों पर तीखी टिप्पणियों से भी जोड़ा जा रहा है।

बालेन शाह खुद को नई पीढ़ी का नेता बताते हैं, लेकिन उनके आलोचक उन्हें एक ऐसे नेता के रूप में देखते हैं जो आक्रामक बयानबाजी, जनभावनाओं को भड़काने और राजनीतिक अस्थिरता से फायदा उठाने की कोशिश करते रहे हैं। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि अगर बालेन शाह नेपाल के प्रधानमंत्री बनते हैं तो इसका असर केवल नेपाल की राजनीति तक सीमित रहेगा या भारत-नेपाल संबंधों और क्षेत्रीय कूटनीति पर भी पड़ेगा।

चुनावी रुझानों ने नेपाल की राजनीति में मचाया भूचाल

नेपाल में इस बार का चुनाव सामान्य परिस्थितियों में नहीं हुआ था। 2025 में देश गंभीर राजनीतिक संकट से गुजरा। सितंबर 2025 में सोशल मीडिया प्रतिबंध के विरोध से शुरू हुआ Gen-Z आंदोलन जल्द ही सरकार विरोधी आंदोलन में बदल गया।

राजधानी काठमांडू समेत कई शहरों में बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हुए। इन प्रदर्शनों के दौरान हिंसा भी हुई जिसमें लगभग 19 लोगों की मौत हुई और 300 से अधिक लोग घायल हुए। इन घटनाओं के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली को इस्तीफा देना पड़ा और संसद भंग हो गई।

इसके बाद नए चुनाव की घोषणा की गई। अब उसी राजनीतिक अस्थिरता के बाद हुए चुनावों में बालेन शाह की पार्टी को बड़ी बढ़त मिलती दिखाई दे रही है। यदि यह रुझान परिणामों में बदलता है तो यह नेपाल की राजनीति में एक बड़ा सत्ता परिवर्तन होगा।

कौन हैं बालेन शाह: रैपर से संभावित प्रधानमंत्री तक

बालेन शाह का पूरा नाम बालेंद्र शाह है। उनका जन्म 1990 में काठमांडू में हुआ था। उनके पिता राम नारायण शाह आयुर्वेद के चिकित्सक थे और उनकी माँ गृहिणी थीं। उन्होंने नेपाल में सिविल और स्ट्रक्चरल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की और बाद में भारत के कर्नाटक स्थित विश्वेश्वरैया टेक्नोलॉजिकल यूनिवर्सिटी से मास्टर्स डिग्री हासिल की।

2015 में आए विनाशकारी नेपाल भूकंप के बाद उन्होंने पुनर्निर्माण के कुछ कार्यों में हिस्सा लिया, लेकिन उनकी असली पहचान एक इंजीनियर के रूप में नहीं बल्कि रैपर और सोशल मीडिया एक्टिविस्ट के रूप में बनी। उनकी लोकप्रियता का आधार उनके गाने और सोशल मीडिया पोस्ट रहे, जिनमें वे नेपाल की राजनीति और नेताओं पर तीखे हमले करते थे।

बालेन शाह के कई रैप गाने नेपाल की राजनीति पर सीधा हमला करते थे। उनका गाना ‘बलिदान’ युवाओं के बीच बेहद लोकप्रिय हुआ। इस गाने में उन्होंने राजनीतिक व्यवस्था पर हमला करते हुए कहा कि देश को बचाने का दावा करने वाले नेता ही देश को बर्बाद कर रहे हैं। नेपाल के युवाओं के बीच यह गाने व्यवस्था विरोधी भावना को बढ़ाने वाले माने गए।

आलोचकों का कहना है कि बालेन शाह ने इसी असंतोष को राजनीतिक पूंजी में बदलने का काम किया।

काठमांडू के मेयर बनकर बढ़ी राजनीतिक महत्वाकांक्षा

2022 में बालेन शाह ने काठमांडू के मेयर का चुनाव स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में लड़ा। इस चुनाव में उन्होंने पारंपरिक दलों के उम्मीदवारों को हराकर जीत हासिल की। उन्हें लगभग 61 हजार से अधिक वोट मिले। हालाँकि मेयर बनने के बाद उनका कार्यकाल भी विवादों से भरा रहा।

उन्होंने कई बार प्रशासनिक अधिकारियों और राष्ट्रीय नेताओं के खिलाफ सार्वजनिक रूप से आक्रामक बयान दिए। कुछ मामलों में उन्होंने सोशल मीडिया पर ऐसी भाषा का इस्तेमाल किया जिसे कई राजनीतिक विश्लेषकों ने गैर-जिम्मेदाराना बताया।

Gen-Z आंदोलन: समर्थन, उकसावे और राजनीतिक लाभ के आरोप

सितंबर 2025 में हुए Gen-Z आंदोलन में बालेन शाह का नाम लगातार चर्चा में रहा। 7 सितंबर 2025 को उन्होंने फेसबुक पर पोस्ट लिखकर युवाओं के आंदोलन का समर्थन किया। उन्होंने लिखा कि Gen-Z की सोच और इच्छाशक्ति को समझना जरूरी है और वे उनके साथ हैं।

इसके अगले दिन काठमांडू समेत कई शहरों में हजारों युवा सड़कों पर उतर आए। प्रदर्शन जल्द ही हिंसक हो गए और कई जगह सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुँचाया गया। इस आंदोलन के दौरान सोशल मीडिया पर बालेन शाह को प्रधानमंत्री बनाने की माँग भी तेजी से बढ़ी।

आलोचकों का कहना है कि बालेन शाह ने युवाओं की नाराजगी को राजनीतिक मौके में बदलने की कोशिश की। हालाँकि बाद में उन्होंने प्रदर्शनकारियों से शांत रहने की अपील भी की।

भारत विरोधी बयान और विवादों का लंबा इतिहास

बालेन शाह कई बार भारत को लेकर विवादित बयान दे चुके हैं। 2023 में जब भारत में संसद के नए भवन में ‘अखंड भारत’ का नक्शा चर्चा में आया तो इसके जवाब में उन्होंने अपने कार्यालय में ‘ग्रेटर नेपाल’ का नक्शा लगा दिया। इस नक्शे में भारत के कई क्षेत्रों को नेपाल का हिस्सा दिखाया गया था।

इसी साल फिल्म ‘आदिपुरुष’ को लेकर भी उन्होंने विवाद खड़ा कर दिया। उनका आरोप था कि फिल्म में माता सीता को भारत की बेटी बताया गया है। इसके विरोध में उन्होंने काठमांडू में भारतीय फिल्मों की स्क्रीनिंग पर अस्थायी प्रतिबंध लगा दिया था। हालाँकि बाद में नेपाल के सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद यह प्रतिबंध हटाना पड़ा।

नवंबर 2025 में बालेन शाह ने फेसबुक पर एक विवादित पोस्ट लिखी जिसमें भारत, अमेरिका और चीन के खिलाफ अभद्र भाषा का इस्तेमाल किया गया था। इस पोस्ट में उन्होंने कई देशों और राजनीतिक दलों के लिए गालियाँ लिखीं। बाद में यह पोस्ट हटा दी गई, लेकिन तब तक यह सोशल मीडिया पर वायरल हो चुकी थी।

उस पोस्ट में लिखा था: “F**k America, F**k India, F**k China, F**k UML, F**k Congress, F**k RSP, F**k RPP, F**k Maobaadi, Go to hell, you guys all combined can do nothing” दिलचस्प बात यह है कि बाद में बालेन उसी RSP पार्टी में शामिल हो गए, जिसे उन्होंने अपनी फेसबुक पोस्ट में निशाना बनाया था।

अमेरिका से करीबी संपर्क को लेकर उठते सवाल

बालेन शाह को लेकर यह चर्चा भी रही है कि उनके अंतरराष्ट्रीय संपर्क काफी मजबूत हैं। उन्हें 2023 में टाइम मैगजीन की प्रभावशाली लोगों की सूची में शामिल किया गया था। इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय मीडिया में भी उन्हें काफी कवरेज मिली। काठमांडू के मेयर रहते हुए उनकी मुलाकात नेपाल में अमेरिकी राजदूत से कई बार हुई।

इन बैठकों की तस्वीरें भी सार्वजनिक हुईं। इसी वजह से नेपाल की राजनीति में कुछ लोग उन्हें अमेरिका के प्रभाव वाला नेता भी बताते हैं। हालाँकि उनके समर्थक इसे सामान्य कूटनीतिक संपर्क बताते हैं। नेपाल की विदेश नीति लंबे समय से भारत और चीन के बीच संतुलन बनाए रखने पर आधारित रही है।

बालेन शाह ने भी कई बार कहा है कि नेपाल को अपने हितों के आधार पर दोनों देशों के साथ संबंध रखने चाहिए। हालाँकि चुनाव के दौरान उन्होंने चीन से जुड़े कुछ औद्योगिक परियोजनाओं को अपने घोषणा पत्र से हटा दिया। कुछ विश्लेषकों ने इसे भारत को संदेश देने की कोशिश बताया। फिर भी यह स्पष्ट नहीं है कि सत्ता में आने के बाद वे भारत और चीन के बीच किस तरह की रणनीति अपनाएँगे।

अगर बालेन शाह बने PM तो भारत के लिए क्या चुनौती?

भारत और नेपाल के बीच ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंध रहे हैं। दोनों देशों के बीच खुली सीमा है और आर्थिक संबंध भी काफी मजबूत हैं, लेकिन बालेन शाह के पिछले बयानों और विवादों को देखते हुए यह आशंका जताई जा रही है कि उनकी सरकार भारत के साथ संबंधों को लेकर अधिक आक्रामक रुख अपना सकती है।

कुछ विश्लेषकों का मानना है कि वे राष्ट्रवादी राजनीति के जरिए घरेलू समर्थन बनाए रखने की कोशिश कर सकते हैं, जिससे समय-समय पर भारत-नेपाल संबंधों में तनाव पैदा हो सकता है। बालेन शाह की लोकप्रियता मुख्य रूप से सोशल मीडिया और युवाओं के बीच उनकी छवि पर आधारित है।

लेकिन आलोचकों का कहना है कि लोकप्रियता और शासन क्षमता अलग चीजें होती हैं। नेपाल इस समय आर्थिक चुनौतियों, बेरोजगारी और राजनीतिक अस्थिरता जैसी कई समस्याओं से जूझ रहा है। ऐसे में सवाल यह है कि क्या एक रैपर से राजनेता बने नेता इन जटिल समस्याओं से निपट पाएँगे या उनकी राजनीति केवल जनभावनाओं को भड़काने तक ही सीमित रहेगी।

अगर वे प्रधानमंत्री बनते हैं तो नेपाल की राजनीति में एक नई शैली देखने को मिल सकती है। लेकिन यह भी संभव है कि उनकी आक्रामक और विवादास्पद राजनीति नेपाल के भीतर और पड़ोसी देशों के साथ नए तनाव पैदा कर दे।

आने वाले दिनों में अंतिम चुनाव परिणाम और उसके बाद बनने वाली सरकार यह तय करेगी कि बालेन शाह का उभार नेपाल के लिए स्थायी बदलाव साबित होगा या नई राजनीतिक अनिश्चितता की शुरुआत।

US का दावा कुछ भी हो, भारत लगातार खरीदता रहा है रूसी तेल: पढ़ें कैसे ‘जहाँ सस्ता मिले’ की नीति पर चलता रहा है हिंदुस्तान

भारतीय समय के मुताबिक अमेरिका ने शुक्रवार (6 मार्च 2026) को नई दिल्ली को 30 दिन का समय दिया कि वो समुद्र में पहले से मौजूद रूसी टैंकरों से कच्चा तेल खरीद सकता है, क्योंकि ईरान-इजराइल संघर्ष की वजह से अंतरराष्ट्रीय सप्लाई चेन बाधित हो गई है। यह आधिकारिक आदेश सिर्फ उन शिपमेंट्स के लिए है जो अभी समुद्र में हैं। बयान में यह भी साफ कहा गया कि ईरान से ऐसे कोई खरीदारी की इजाजत नहीं दी जा रही, क्योंकि ईरान पर भारी प्रतिबंध हैं।

ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की तारीफ की कि उन्होंने ग्लोबल एनर्जी सप्लाई को आने वाले खतरे से निपटने के लिए बड़ा फैसला लिया है, बिना रूस को कोई फायदा दिए। उन्होंने लिखा, “उनकी एनर्जी एजेंडा की वजह से तेल और गैस का उत्पादन अब तक के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुँच गया है। ग्लोबल मार्केट में तेल का बहाव जारी रखने के लिए ट्रेजरी विभाग भारतीय रिफाइनरियों को रूसी तेल खरीदने के लिए 30 दिन का अस्थायी छूट दे रहा है।”

उस संदेश में सबसे अहम शब्द था ‘अलाउ’ यानी इजाजत देना। ट्रंप प्रशासन ने जोर देकर कहा कि वो भारत को जरूरी कच्चा तेल खरीदने के लिए रूसी टैंकरों से छूट ‘दे रहा है’। अपनी तारीफ बढ़ाने के लिए बेसेंट ने इसे राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की समझदारी और मेहरबानी बता दिया।

फिर बेसेंट ने चुपके से भारत को अमेरिका से तेल खरीदने के लिए कहा और दोनों देशों के बीच मजबूत रिश्तों का हवाला दिया। उन्होंने आगे कहा, “यह जानबूझकर छोटी अवधि का उपाय है जो रूसी सरकार को ज्यादा फायदा नहीं देगा क्योंकि यह सिर्फ उन ट्रांजेक्शन को मंजूरी देता है जो समुद्र में फंसे तेल से जुड़े हैं। भारत अमेरिका का जरूरी पार्टनर है और हमें पूरा विश्वास है कि नई दिल्ली अमेरिकी तेल की खरीदारी बढ़ाएगी। यह स्टॉप-गैप उपाय ईरान द्वारा ग्लोबल एनर्जी को बंधक बनाने की कोशिश से होने वाले दबाव को कम करेगा।”

भारत के करीब 40 प्रतिशत तेल आयात खाड़ी क्षेत्र से आता है और उसका बड़ा हिस्सा होर्मुज स्ट्रेट से गुजरता है जो अभी ईरान के नियंत्रण में है। मोदी सरकार ने पहले ही घोषणा की थी कि देश एनर्जी सुरक्षा के मामले में बहुत आरामदायक स्थिति में है और हर दिन दो बार अपनी एनर्जी स्थिति का जायजा ले रहा है। स्टॉक की स्थिति भी अच्छी है और रोजाना भराई हो रही है। इसके अलावा भारत दूसरे स्रोतों से भी बात कर रहा है ताकि तेल का बहाव बिना रुके जारी रहे।

भारत सिर्फ अपने हितों को देखता है, अमेरिका को ‘अलाउ’ करने का कोई अधिकार नहीं

दिलचस्प बात यह है कि अमेरिका का यह नया कदम कई असफल दबाव वाली रणनीतियों के बाद आया है, जिसमें अतिरिक्त 25 प्रतिशत टैरिफ बढ़ाकर कुल 50 प्रतिशत करना और भारत को ‘यूक्रेन युद्ध को फंडिंग’ के नाम पर रूसी तेल छोड़ने के लिए मजबूर करना शामिल है। दूसरी ओर नई दिल्ली ने बार-बार जोर दिया कि उसके फैसले अपनी संप्रभुता और हितों पर आधारित हैं, इसलिए वो किसी चुनौती के सामने नहीं झुकने वाला।

मॉस्को से तेल की खरीद हर महीने विभिन्न कारणों से ऊपर-नीचे होती रही, लेकिन वो कभी ‘रुकी’ नहीं, भले ही वाशिंगटन कुछ भी कहे। असल में भारत रूसी विक्रेताओं से लगातार संपर्क में रहा ताकि होर्मुज स्ट्रेट बंद होने के बाद अपनी एनर्जी जरूरतें पूरी की जा सकें।

रीटर्स ने हाल ही में एक इन्फोग्राफिक शेयर किया जो बात साफ कर देता है। रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद भारत की रूसी तेल खरीद निश्चित रूप से बढ़ गई। लेकिन यह इसलिए नहीं क्योंकि भारत ‘युद्ध को फंडिंग’ देना चाहता था। भारत का उस युद्ध से कोई लेना-देना नहीं था। भारत ने रूसी तेल इसलिए खरीदा क्योंकि रूसी तेल सस्ता मिल रहा था। और देश की जरूरतें पूरी करने के लिए तेल खरीदना भारत सरकार के लिए NATO नेताओं और यूरोपीय मीडिया को खुश करने से ज्यादा अहम था।

फोटो साभार: रायटर्स

रीटर्स के ऊपर वाले इन्फोग्राफिक में साफ दिखता है कि अक्टूबर 2025 के बाद भारत की रूसी तेल खरीद थोड़ी कम हुई, लेकिन वो कभी ‘रुकी’ नहीं, जैसा अमेरिका दावा करना चाहता है।

इसलिए अमेरिका का यह खुद को बड़ा बताना सिर्फ खोखली श्रेष्ठता का एक और प्रयास है जबकि वो खुद को मेहरबान महाशक्ति दिखाने की कोशिश कर रहा है, जो हकीकत से बिल्कुल उलट है।

अमेरिकी छूट से पहले ही रूसी तेल के कार्गो भारत लौट आए

भारत ने ट्रंप प्रशासन की तथाकथित ‘इजाजत’ आने से पहले ही समुद्र में मौजूद रूसी टैंकरों से तेल लेना शुरू कर दिया था ताकि मिडिल ईस्ट से आने वाले कच्चे तेल की कमी पूरी हो सके, क्योंकि उस इलाके में तनाव बढ़ रहा है। ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट के मुताबिक पहले से सुरक्षित किए गए 1 करोड़ बैरल से ज्यादा तेल का बड़ा हिस्सा शायद अमेरिका के इस नए बयान से पहले ही लिया जा चुका था।

भारत सरकार के सूत्रों ने पहले ही कहा था कि फरवरी में रूस भारत का टॉप एनर्जी सप्लायर में से एक था। फरवरी में भारत ने 10.4 लाख बैरल प्रतिदिन कच्चा तेल आयात किया।

ब्लूमबर्ग के शिप-ट्रैकिंग डेटा से पता चला कि अरब सागर और बंगाल की खाड़ी में रूसी कच्चे तेल के लगभग 1.5 करोड़ बैरल टैंकरों पर हैं जबकि सिंगापुर के पास और 70 लाख बैरल हैं। एक हफ्ते के अंदर ये सब भारतीय बंदरगाहों पर पहुंच सकते हैं। इसके अलावा कुछ और सूज सागर और भूमध्य सागर से होते हुए उपमहाद्वीप की ओर बढ़ रहे हैं।

रूसी तेल वाले टैंकरों ने अपने रूट बदलकर भारतीय बंदरगाहों की ओर इशारा करना शुरू कर दिया था, इससे पहले कि व्हाइट हाउस से ‘हम इजाजत दे रहे हैं’ वाला नोटिस आया। केप्लर के मुताबिक कम से कम 18 जहाज जो उराल्स तेल ले जा रहे हैं, वे भारत की ओर बढ़ रहे हैं। कंपनी के एनालिस्ट सुमित रितोलिया ने कहा कि यह विकास “जल्द ही मात्रा को 20 लाख बैरल प्रतिदिन से ऊपर ले जा सकता है।”

एक सूत्र ने बताया कि सूजमैक्स टैंकर ओड्यून जो लगभग 10 लाख बैरल ले जा रहा था। रॉयटर्स ने रिपोर्ट किया कि 4 मार्च को पूर्वी पारादीप बंदरगाह पर राज्य रिफाइनर इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन लिमिटेड को तेल देने के लिए दिखा।

इसके अलावा आईओसी को 7 मार्च यानी शनिवार को पश्चिम भारत के वडिनार बंदरगाह पर स्प्रिंग फॉर्च्यून से लगभग 7 लाख बैरल रूसी तेल मिलने की उम्मीद है। आईओसी के सूत्र ने बताया कि कंपनी रूस से खरीदारी तेज कर रही है जिसमें भारत के आसपास घूम रहे जहाजों पर रखे कंटेनर शामिल हैं।

मीडिया हाउस के एक अंदरूनी सूत्र ने कहा कि भारतीय जल क्षेत्र के पास लगभग 95 लाख बैरल रूसी कच्चा तेल तैर रहा है और कुछ हफ्तों में पहुंच सकता है। एक और भारतीय रिफाइनर ने भी इस तेल का इस्तेमाल करने में दिलचस्पी दिखाई है। रितोलिया ने कहा, “अगर मिडिल ईस्ट से आने वाला तेल कम हो जाता है तो भारतीय रिफाइनर जल्दी ही रूसी ग्रेड की ओर मुड़ सकते हैं।”

उन्होंने देखा कि सिंगापुर स्ट्रेट, अरब सागर क्षेत्र और हिंद महासागर में लगभग 3 करोड़ बैरल रूसी तेल जहाजों पर उपलब्ध है, जिसमें फ्लोटिंग स्टोरेज में रखा तेल भी शामिल है।

ब्लूमबर्ग की एक अलग रिपोर्ट के मुताबिक, केप्लर और वोर्टेक्सा के ट्रैकिंग विश्लेषण से पता चला कि दो टैंकर जो कुल 14 लाख बैरल उराल्स कच्चा तेल ले जा रहे हैं, वे इस हफ्ते भारतीय बंदरगाहों पर उतारने जा रहे हैं, पहले वे पूर्व की ओर जाने का संकेत दे रहे थे।

5 मार्च को मटारी नाम का आफ्रामैक्स टैंकर जो लगभग 7 लाख बैरल ले जा रहा था, वडिनार पहुँचने वाला था। अरब सागर में एक और सूजमैक्स इंड्री जो 730 हजार बैरल से ज्यादा उराल्स लेकर सिंगापुर जा रहा था, इस हफ्ते अचानक उत्तर की ओर भारत की तरफ मुड़ गया। पिछले साल ब्रिटेन और यूरोपीय संघ ने इन तीनों जहाजों पर प्रतिबंध लगा दिए थे।

भारत अपनी नीति खुद बनाता है, व्हाइट हाउस की ‘इजाजत’ से नहीं

ऊपर दिया डेटा साफ कर देता है कि भारत को समय देने का अमेरिका का दावा सिर्फ एक हताश कोशिश है जहाँ उसे क्रेडिट नहीं मिलना चाहिए। नई दिल्ली ने कभी इजाजत माँगी नहीं और न ही ऐसी किसी मेहरबानी की उम्मीद की थी क्योंकि वो चल रहे तनाव के बीच अपनी संप्रभु एनर्जी हितों का पीछा कर रही थी।

इसके अलावा इन आरोपों, जवाबों या रणनीतियों की बेकारता बार-बार साबित हो चुकी है क्योंकि ये मोदी सरकार के किसी फैसले को कभी प्रभावित नहीं करते। पिछले महीने केंद्र ने फिर दोहराया कि वो कच्चा तेल जहां सस्ता और अच्छी क्वालिटी का मिले वहां से आयात करता रहेगा।

भारतीय तेल कंपनियाँ गैर-प्रतिबंधित स्रोतों और भू-राजनीतिक माहौल को ध्यान में रखकर काम करेंगी। यह वाणिज्य और विदेश मंत्रालय के वरिष्ठ प्रतिनिधियों ने कॉन्ग्रेस नेता और लोकसभा सांसद शशि थरूर की अध्यक्षता वाली संसदीय स्थायी समिति को बताया।

एक ऐसा ही किस्सा तब हुआ जब भारत ने अमेरिका के इस दावे का जवाब दिया कि वो रूस से तेल लेना ‘बंद’ करने पर सहमत हो गया। विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने 9 फरवरी को कहा, “हमारे लिए एनर्जी खरीद के फैसलों में राष्ट्रीय हित मार्गदर्शक सिद्धांत होंगे।” उन्होंने बताया कि पर्याप्त उपलब्धता, उचित कीमत और सप्लाई की विश्वसनीयता ही देश की खरीद नीति के पीछे मुख्य कारण हैं।

विदेश सचिव के अनुसार भारत की ‘सबसे बड़ी प्राथमिकता’ है अपने नागरिकों के हितों की रक्षा करना और सुनिश्चित करना कि उन्हें सही कीमत पर पर्याप्त ऊर्जा मिले, भरोसेमंद और सुरक्षित स्रोतों से।

उन्होंने कहा, “इसलिए हमारी आयात नीति एनर्जी के मामले में पूरी तरह इन्हीं उद्देश्यों से चलती है। हम किसी एक स्रोत पर निर्भर नहीं हैं और न ही रहना चाहते हैं। और स्रोतों का मिश्रण समय-समय पर बाजार की वास्तविक स्थितियों के आधार पर बदलता रहता है।”

उन्होंने आगे कहा, “हमारा तरीका है कई स्रोतों को बनाए रखना और जरूरत पड़ने पर उन्हें विविधता देना ताकि स्थिरता बनी रहे। इसलिए मैं कहूंगा कि इस क्षेत्र में जितना ज्यादा विविधता होगी, हम उतने ज्यादा सुरक्षित होंगे।” यह मजबूत जवाब तब आया जब ट्रंप ने दावा किया कि भारत रूसी तेल नहीं खरीदेगा और दोनों देशों के बीच व्यापार व्यवस्था के फ्रेमवर्क की घोषणा के दौरान 25 प्रतिशत टैरिफ घटा दिया।

जैसे ही संकेत मिला, भारत सरकार के सूत्रों ने फिर दोहराया कि रूसी कच्चा तेल भारत में आता रहेगा। भारत सरकार ने कहा, “आज हमारे पास होर्मुज स्ट्रेट में फंसे तेल से ज्यादा एनर्जी स्रोत हैं। हम कच्चे तेल, तेल उत्पादों और एलपीजी के मामले में आरामदायक स्थिति में हैं। हमारी मौजूदा स्टॉक स्थिति अच्छी है। हम दूसरे भौगोलिक क्षेत्रों से अपनी सप्लाई बढ़ाएंगे और होर्मुज स्ट्रेट से आने वाली कमी पूरी करेंगे।”

भारत सरकार ने कहा, “हम 2022 से रूस से कच्चा तेल खरीद रहे हैं। 2022 में हम रूस से कुल आयात का सिर्फ 0.2 प्रतिशत ले रहे थे। फरवरी में हमने कुल कच्चे तेल आयात का 20 प्रतिशत रूस से लिया। फरवरी में भारत ने रूस से 10.4 लाख बैरल प्रतिदिन आयात किया।”

ट्रंप को अपने MAGA समर्थकों को खुश करना है, भारत को नहीं

ट्रंप प्रशासन में बिना वजह खुद को बधाई देने या सराहने की अजीब आदत है, जिसकी वजह से भारत के लगातार जवाबों के बाद खुद को शर्मिंदगी झेलनी पड़ती है।

दूसरी ओर नई दिल्ली लगातार अपने हितों की रक्षा कर रही है और मोदी सरकार इन हरकतों से बिल्कुल प्रभावित नहीं होती। दोनों के बीच यह अब रूटीन बन गया है जहाँ वाशिंगटन कोई बेतुका आदेश या शिकायत लाता है और नई दिल्ली उसे अनदेखा कर देती है या विनम्रता से खारिज कर देती है।

इसी तरह मौजूदा व्हाइट हाउस प्रशासन ने ‘घमंडी दिखावा’ को अपनी आदत बना लिया है। चाहे ‘8 वैश्विक युद्ध रोकना’ हो या पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर प्रतिबंधों से नियंत्रण, ट्रंप के दावे और जमीन पर उनका असल असर अक्सर मेल नहीं खाता। बहुध्रुवीय दुनिया प्रतिबंधों और टैरिफ से रिमोट कंट्रोल नहीं होती।

एक संप्रभु देश की नीति संप्रभु हितों पर चलती है। प्रतिबंध या टैरिफ सिर्फ भू-राजनीतिक हिचकी हैं जिन्हें कभी-कभी ठीक करना और पार करना पड़ता है। चाहे कच्चा तेल हो, तरलीकृत प्राकृतिक गैस (एलएनजी), दुर्लभ पृथ्वी तत्व या कोई भी वस्तु, मौजूदा वैश्विक व्यवस्था सप्लाई चेन और लॉजिस्टिक्स का जटिल जाल है।

कोई एक देश इसे धमकाकर या नखरे करके नहीं नियंत्रित कर सकता। भारत दशकों से इस जटिल जाल में नेविगेट कर रहा है और आगे भी करता रहेगा। इसके अलावा ट्रंप प्रशासन के दावे सिर्फ अपने घरेलू MAGA समर्थकों को खुश करने के लिए हैं।

भारतीय सरकार ऐसा नहीं करती। रूस-यूक्रेन युद्ध, गाजा-इजराइल संघर्ष और पिछले कई सालों के कई परिदृश्यों में भारत का विदेश मंत्रालय ने अपनी बातचीत पूरी तरह आधिकारिक रखी है और अंतरराष्ट्रीय कानूनों तथा राष्ट्रीय प्राथमिकताओं का सम्मान किया है।

ट्रंप प्रशासन के उलट भारत का विदेश मंत्रालय (एमईए) अपनी प्राथमिकताओं को रेखांकित करने के लिए सोशल मीडिया का खेल नहीं खेलता। उन्हें पता है क्या करना है और कहाँ अपनी बात साबित करनी है।

(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

क्यों कमजोर पड़ रहा है चीन? पहली बार विकास दर 5% से नीचे: समझें- कैसे संकट में पड़ी दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था

चीन ने 2026 के लिए अपना जीडीपी विकास दर लक्ष्य 4.5 से 5 प्रतिशत रखा है। यह फैसला गुरुवार (5 मार्च 2026) को नेशनल पीपुल्स कॉन्ग्रेस (एनपीसी) के सत्र में प्रीमियर ली कियांग के गवर्नमेंट वर्क रिपोर्ट में घोषित किया गया। पिछले कई दशकों से चीन हर साल 7-8 प्रतिशत या कम से कम 5 प्रतिशत के आसपास का लक्ष्य रखता था। 1990-91 के बाद यह पहला मौका है जब लक्ष्य 5 प्रतिशत से नीचे चला गया है।

विशेषज्ञों का कहना है कि यह फैसला कमजोरी नहीं, बल्कि सावधानी और लचीलेपन की निशानी है। लेकिन सच्चाई यह है कि यह मजबूरी का फैसला है।

सवाल यह है कि आखिर ऐसा क्यों हुआ? चीन किन गंभीर मुश्किलों में फंस गया है? घरेलू बाजार पूरी तरह ठप क्यों हो गया है? रियल एस्टेट सेक्टर क्यों बर्बाद हो चुका है? वैश्विक तनाव, मिडिल ईस्ट का युद्ध, वेनेजुएला, यूक्रेन और अमेरिका की ट्रेड वॉर का क्या भयानक असर है? कम्युनिस्ट पार्टी की गलत नीतियाँ कितनी जिम्मेदार हैं? और क्या चीन सचमुच अमेरिका के सामने खड़ा हो सकता है या सिर्फ मौका देखकर बयानबाजी करता है और पीछे हट जाता है?

कुल मिलाकर देखें तो चीन की अर्थव्यवस्था अब संकट की चपेट में आ चुकी है और मजबूत दिखने वाला कागजी शेर असल में कमजोर पड़ रहा है।

ऐतिहासिक संदर्भ में समझें- लक्ष्य क्यों इतना कम किया गया?

चीन की अर्थव्यवस्था पिछले 40 सालों से तेजी से बढ़ती रही थी। 1980-90 के दशक में विकास दर 10 प्रतिशत से ऊपर रहती थी। लेकिन अब वह पुराना चमकदार दौर खत्म हो चुका है। 2025 में चीन ने मुश्किल से 5 प्रतिशत विकास हासिल किया, वह भी सिर्फ निर्यात के सहारे। लेकिन 2026 के लिए लक्ष्य घटाकर 4.5-5 प्रतिशत का रेंज कर दिया गया। यह रेंज इसलिए चुनी गई ताकि सरकार को असफलता छिपाने का बहाना मिले। अगर अर्थव्यवस्था और गिरे तो 4.5 प्रतिशत पर भी ‘सफलता’ का दावा कर लेगी।

विशेषज्ञों का कहना है कि यह 1991 के बाद सबसे कम लक्ष्य है और यह चीन की हार का इशारा है। न्यूयॉर्क टाइम्स और गार्जियन जैसी रिपोर्ट्स में साफ कहा गया कि चीन अब ‘संख्या पहले’ की पुरानी चाल नहीं चला पा रहा। लोकल अधिकारी पहले झूठे आँकड़े देकर लक्ष्य पूरा करते थे, लेकिन अब संकट इतना गहरा है कि झूठ भी नहीं चल रहा। 15वीं फाइव ईयर प्लान (2026-2030) शुरू हो रही है, लेकिन रिपोर्ट में खुद स्वीकार किया गया कि घरेलू और वैश्विक दोनों तरफ ‘Grave and Complex’ यानी गंभीर और जटिल समस्याएँ हैं।

बेरोजगारी 5.5 प्रतिशत, 12 मिलियन नई नौकरियाँ, 2 प्रतिशत महंगाई, अनाज 700 मिलियन टन… ये सब लक्ष्य पुराने हैं, लेकिन असल में अर्थव्यवस्था इनसे भी नीचे फिसल रही है। घाटा 4 प्रतिशत रखा गया, लेकिन यह दिखावा है। असल में चीन मजबूरी में विकास दर कम कर रहा है क्योंकि पुरानी चालें फेल हो चुकी हैं।

घरेलू संकट में रियल एस्टेट की बर्बादी और गिरती माँग ने चीन को घुटनों पर ला दिया

चीन की सबसे बड़ी कमजोरी घरेलू बाजार है। आम लोग अब खर्च नहीं कर पा रहे हैं। चीनी लोग संशय की परिस्थितियों को देखते हुए सेविंग्स यानी डर के मारे बचत बढ़ा रहे हैं। चूँकि नौकरियाँ अनिश्चित है। युवाओं में बेरोजगारी बढ़ रही है। सोशल सेफ्टी का पैमाना टूट चुका है। सरकार से लेकर आम लोगों तक पर स्वास्थ्य, शिक्षा और पेंशन का बोझ बढ़ रहा है। ऐसे में साल 2025 में कंज्यूमर स्पेंडिंग पूरी तरह कमजोर रही है और व्यापारिक निवेश भी ठप सा हो गया है।

चीन में सबसे भयानक संकट रियल एस्टेट सेक्टर का है। यह सेक्टर पूरी तरह बर्बाद हो चुका है। पाँचवाँ-छठा साल चल रहा है संकट का, लेकिन इसका कोई अंत नहीं दिख रहा है। चीनी दिग्गज जैसे एवरग्रांडे पूरी तरह दिवालिया हो चुका है। पूरे चीन में 8 करोड़ से ज्यादा अनसोल्ड (बिना बिके) और खाली घर पड़े हैं। पूरे देश में घरों की कीमतें लगातार गिर रही हैं। आम लोगों की जिंदगी भर की कमाई मिट्टी में मिल चुकी है। लोगों का आत्मविश्वास टूट चुका है। चीन की जो लोकल सरकारें पहले जमीन बेचकर कर्ज चुकाती थीं, अब वह रास्ता भी बंद हो चुका है। उनके कर्ज भी आसमान छू रहे हैं।

विशेषज्ञ कहते हैं कि इस सेक्टर की बर्बादी जीडीपी पर हर साल 2 प्रतिशत पॉइंट्स का घातक असर डाल रही है। साल 2024-2025 में यही हुआ और 2026 में भी यही होता दिख रहा है। आम लोग नया घर खरीदने से डर रहे हैं। प्रॉपर्टी मार्केट अब ‘नया मॉडल’ बनाने की बात कर रहा है, लेकिन असल में यह हार का स्वीकारोक्ति है।

जनसंख्या संकट भी एक बड़ा फैक्टर

चीन की अर्थव्यवस्था पर जनसंख्या का संकट भी भारी पड़ रहा है। कई दशकों तक चीन की ‘एक-बच्चा नीति’ ने जनसंख्या वृद्धि को सीमित कर दिया। इसका असर अब साफ दिख रहा है। चीन में जन्म दर तेजी से गिर रही है। तो बुजुर्गों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। वहीं, कामकाजी उम्र की आबादी घट रही है। इसका सीधा असर अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है। जब काम करने वाले लोगों की संख्या कम होगी तो उत्पादन क्षमता भी घटेगी। साथ ही बुजुर्गों की बढ़ती आबादी का बोझ सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था पर पड़ेगा।

यही कारण है कि कई विशेषज्ञ मानते हैं कि चीन की आर्थिक वृद्धि आने वाले दशकों में और धीमी हो सकती है।

कम्युनिस्ट पार्टी की नीतियों की असफलता

चीन की आर्थिक संरचना पर ‘Chinese Communist Party’ का गहरा नियंत्रण है। पिछले कुछ वर्षों में राष्ट्रपति Xi Jinping ने निजी कंपनियों पर नियंत्रण बढ़ाया है। टेक कंपनियों और निजी शिक्षा क्षेत्र पर सरकार की कड़ी कार्रवाई ने निवेशकों का भरोसा कमजोर किया। चीन की आर्थिक रणनीति का मुख्य उद्देश्य अब तीन चीजों पर केंद्रित है- 1. तकनीकी आत्मनिर्भरता, 2. घरेलू स्थिरता, 3. पार्टी का नियंत्रण

इसके लिए चीन ने ‘डुअल सर्कुलेशन’ जैसी नीतियाँ लागू की हैं, जिनका लक्ष्य घरेलू बाजार को मजबूत करना और विदेशी निर्भरता कम करना है। लेकिन इन नीतियों की भी सीमाएँ हैं। जब सरकार अर्थव्यवस्था पर अत्यधिक नियंत्रण रखती है, तो निजी क्षेत्र की पहल कमजोर पड़ सकती है।

व्यावहारिक तौर पर देखें तो चीन की सत्ताधारी पार्टी कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चाइना (सीसीपी) दो बड़े सपने देख रही थी। पहला- टेक्नोलॉजी में वैश्विक नेता बनना और दूसरा – घरेलू स्थिरता। इसके लिए शी जिनपिंग साल 2013 से ‘नई वैज्ञानिक क्रांति’ की बात कर रहे हैं। इसी नजरिए को आगे बढ़ाते हुए साल 2023 में न्यू क्वालिटी प्रोडक्टिव फोर्सेस लाया गया, जिसमें एआई और हाई-टेक पर फोकस रखा गया। लेकिन ये सपने अब टूटते दिख रहे हैं।

अब कम्युनिष्ट पार्टी कोई नतीजे नहीं दे पा रही है। ऐसे में चीन का कर्ज और बढ़ेगा। हालाँकि साल 2026 में फिस्कल डेफिसिट सिर्फ 4 प्रतिशत रखा गया है, लेकिन ये आँकड़ा बहुत बड़ा है।

बता दें कि चीन में दिसंबर 2025 में ‘Investment in people’ का नाटक रचा गया, जिसमें बुजुर्गों की देखभाल, स्वास्थ्य बीमा, चाइल्डकेयर की बातें की गई। लेकिन ये सब उपाय अपर्याप्त साबित हुए हैं। दरअसल, इसका असल मकसद टेक सेक्टर को बचाना है, आम चीनी नागरिकों को नहीं। जाहिर है, कम्युनिष्ट पार्टी की नीतियाँ अब फेल हो चुकी हैं। भले ही दावा स्थिरता का हो, लेकिन ये नीतियाँ असलियत में संकट को बढ़ा ही रही हैं।

चीन की एक बड़ी समस्या यह भी है कि वहाँ के लोग खर्च कम कर रहे हैं। आम तौर पर विकसित अर्थव्यवस्थाओं में विकास का मुख्य आधार घरेलू उपभोग होता है। लेकिन चीन में लंबे समय से अर्थव्यवस्था निवेश और निर्यात पर निर्भर रही है। चीन की कम्युनिस्ट सरकार ने पिछले वर्षों में घरेलू माँग बढ़ाने की कोशिश जरूर की, लेकिन इसमें बहुत बड़ी सफलता नहीं मिली।

इसके पीछे कई कारण हैं-

  • लोगों की आय में धीमी वृद्धि
  • नौकरी को लेकर असुरक्षा
  • सामाजिक सुरक्षा की कमी
  • स्वास्थ्य और शिक्षा का बढ़ता खर्च

इन कारणों से लोग ज्यादा बचत करते हैं और कम खर्च करते हैं। यह स्थिति चीन की सरकार के लिए बड़ी चुनौती बन गई है क्योंकि अगर घरेलू बाजार मजबूत नहीं होगा तो आर्थिक वृद्धि भी सीमित हो जाएगी।

वैश्विक तनाव जैसे ट्रेड वॉर, मिडिल ईस्ट, वेनेजुएला और यूक्रेन ने चीन को बैकफुट पर धकेल दिया

चीन अब वैश्विक मंच पर भी कमजोर दिख रहा है। अमेरिका का ट्रेड वॉर सबसे घातक हथियार साबित हुआ है। डोनाल्ड ट्रंप के टैरिफ से साल 2025 में अमेरिका को चीनी निर्यात 20 प्रतिशत तक गिर गया। भले ही चीन का ट्रेड सरप्लस 1.2 ट्रिलियन डॉलर का रिकॉर्ड बनाता दिखा, लेकिन वो चीन सरकार की निर्यात पर निर्भरता का सबूत ही था, जिसका हल्ला डोनाल्ड ट्रंप कर ही रहे थे। अमेरिका की देखा-देखी अब मैक्सिको और यूरोप भी चीन पर टैरिफ लगा रहे हैं, ऐसे में चीन का निर्यात इंजन फेल होने वाला है।

दरअसल, चीन की अर्थव्यवस्था पर सबसे बड़ा बाहरी दबाव यही अमेरिका के साथ उसकी प्रतिस्पर्धा है। जब अमेरिका में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की सरकार आई, तब चीन के खिलाफ बड़े पैमाने पर टैरिफ लगाए गए। इससे चीन के निर्यात को बड़ा झटका लगा। इसके बाद चीनी कंपनियों पर तकनीकी प्रतिबंध लगाए गए। सेमीकंडक्टर टेक्नोलॉजी पर रोक लगा दी गई और चीनी कंपनियों पर निगरानी बढ़ा दी गई। इस व्यापार युद्ध ने चीन की आर्थिक रणनीति को बदल दिया। अब चीन तेजी से तकनीकी आत्मनिर्भरता की दिशा में बढ़ने की कोशिश कर रहा है। लेकिन यह प्रक्रिया लंबी और महँगी है।

अब मौजूदा समय में देखें तो मिडिल ईस्ट का युद्ध चीन की कमर तोड़ रहा है। ईरान पर हमले से स्ट्रेट ऑफ होर्मुज प्रभावित है। चीन रोज 10 मिलियन बैरल तेल आयात करता है, ज्यादातर इसी रूट से… लेकिन उसके बंद होने से समस्याएँ बढ़ती जा रही हैं। समुद्र में रोके रखा गया तेल कब तक चीन की जरूरतें पूरी करेगा? उसे घूम फिर कर रूस की तरफ ही जाना होगा। वहीं, अफ्रीका की तरफ देखें तो चीन का सारा निवेश फँसता दिख रहा है, मिडिल ईस्ट की हालत खराब हो रही है।

एक तरफ वेनेजुएला में अमेरिका ने सीधा वार किया, जहाँ चीन के अरबों डॉलर के निवेश और लोन डूब गए। इसके साथ ही उसका सस्ता तेल मिलना भी बंद हो गया। वहीं, यूक्रेन युद्ध में भी चीन सिर्फ सस्ता तेल-गैस खरीदता रहा, लेकिन किसी की तरफ खुलकर सामने नहीं आ पाया।

ये सब दिखाते हैं कि चीन सुपरपावर का ढोंग भर रहा है। अमेरिका के सामने वो घुटने टेक देता है। इन सबमें चीन की मौकापरस्ती सामने आ चुकी है और उसकी फूट डालो- राज करो की नीति भी खुल चुकी है। क्योंकि जहाँ भी वो खतरा देखता है, वहाँ से वो तुरंत पीछे हट जाता है। साफ देखें तो वेनेजुएला, ईरान, रूस-यूक्रेन मामलों में चीन की सिर्फ बयानबाजी ही सामने आई, क्योंकि उसने कोई कदम उठाने की हिम्मत ही नहीं की।

क्या चीन सचमुच कागजी शेर साबित हो रहा है?

इसका जवाब के शब्द में ढूँढें तो हाँ, चीन अब कमजोर पड़ रहा है। दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था दिखावटी है। उसके पास निर्यात और हाई-टेक का सहारा तो है, लेकिन घरेलू संकट, रियल एस्टेट की बर्बादी, जनसंख्या आपदा और वैश्विक दबाव उसे तोड़ रहे हैं। सत्ताधारी पार्टी की नीतियाँ स्थिरता का नाटक कर रही हैं लेकिन असल में आम चीनी नागरिकों को लूट रही हैं।

बहरहाल, चीन कमजोर पड़ चुका है। रियल एस्टेट संकट, गिरती माँग, ट्रेड वॉर और मिडिल ईस्ट तनाव ने उसे घेर लिया है। कम्युनिस्ट पार्टी की नीतियाँ असफल साबित हो रही हैं। ऐसे में चीन की अर्थव्यवस्था अब दुनिया के लिए खतरे के सबूत के तौर पर दिख रही है।

अस्थिर दुनिया की भी मार झेलनी चीन की मजबूरी

दरअसल, आज की दुनिया पहले की तुलना में कहीं ज्यादा अस्थिर हो चुकी है। कई बड़े संघर्षों ने वैश्विक व्यापार और सप्लाई चेन को प्रभावित किया है। मिडिल ईस्ट में तनाव बढ़ने से तेल की कीमतों और व्यापार मार्गों पर असर पड़ता है। चीन की ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा इसी क्षेत्र से आता है। अगर फारस की खाड़ी में तनाव बढ़ता है, तो चीन की ऊर्जा आपूर्ति भी प्रभावित हो सकती है।

चीन की विकास दर को 4.5–5 प्रतिशत तक सीमित करना एक बड़ा संकेत है कि दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था अब कई संरचनात्मक चुनौतियों से जूझ रही है। रियल एस्टेट संकट, घटती घरेलू माँग, जनसंख्या समस्या, कम्युनिस्ट नीतियों की सीमाएँ और अमेरिका के साथ रणनीतिक प्रतिस्पर्धा… ये सभी कारक चीन की आर्थिक गति को प्रभावित कर रहे हैं।

हालाँकि चीन अभी भी एक बड़ी आर्थिक शक्ति है और उसकी तकनीकी महत्वाकांक्षाएँ बहुत बड़ी हैं। लेकिन यह भी साफ है कि उसकी अर्थव्यवस्था अब उस ‘चमत्कारी तेजी’ से नहीं बढ़ रही, जिसने उसे पिछले चार दशकों में वैश्विक शक्ति बनाया था।

5000 साल पुराना इतिहास, जमीन में धँसती जा रही प्रतिमा: जानें- राजस्थान में स्थित दुनिया के इकलौते ‘विभीषण मंदिर’ की कहानी, जिसे वक्फ संपत्ति बता हड़पने की हुई कोशिश

राजस्थान के कोटा जिले के कैथून कस्बे में हर साल होली के अवसर पर एक बेहद अनोखी परंपरा देखने को मिलती है। देशभर में होलिका दहन के साथ होली का त्योहार मनाया जाता है लेकिन कैथून में इसके अगले दिन यानी धुलेंडी पर हिरण्यकश्यप के पुतले का दहन किया जाता है।

इसी खास परंपरा के साथ यहाँ पाँच दिवसीय विभीषण मेला आयोजित होता है, जिसमें हजारों श्रद्धालु आस्था और परंपरा का संगम देखने के लिए पहुँचते हैं। इस वर्ष भी मेले की शुरुआत धूमधाम से हुई। राजस्थान के शिक्षा एवं पंचायती राज मंत्री मदन दिलावर मेले के उद्घाटन समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए।

उन्होंने पहले विभीषण मंदिर में पूजा-अर्चना की और फिर मेला स्थल पर परंपरा के अनुसार हिरण्यकश्यप के पुतले का दहन कर अधर्म पर धर्म की विजय का संदेश दिया।

प्रदेश के शिक्षा एवं पंचायती राज मंत्री मदन दिलावर ने किया मेले का शुभारंभ (फोटो साभार:ETV भारत)

होली के बाद हिरण्यकश्यप दहन की अनोखी परंपरा और देव विमानों की शोभायात्रा

कैथून का विभीषण मेला देश में अपनी तरह का अनूठा आयोजन माना जाता है। यहाँ परंपरा के अनुसार, पहले होलिका दहन होता है और उसके अगले दिन धुलेंडी पर हिरण्यकश्यप के पुतले को जलाया जाता है। इस परंपरा का संबंध भक्त प्रह्लाद और भगवान विष्णु की कथा से जोड़ा जाता है।

मान्यता है कि जब होलिका आग में जलकर नष्ट हो गई, तब असुर राजा हिरण्यकश्यप अत्यंत क्रोधित हो गया और उसने अपने पुत्र प्रह्लाद को मारने का प्रयास किया। उसी समय भगवान विष्णु ने नृसिंह अवतार लेकर हिरण्यकश्यप का वध किया और भक्त प्रह्लाद की रक्षा की। इसी घटना की स्मृति में कैथून में धुलेंडी के दिन हिरण्यकश्यप के पुतले का दहन किया जाता है।

यह परंपरा लगभग 45 वर्षों से लगातार निभाई जा रही है और हर साल इसके साथ भव्य मेले का आयोजन होता है। विभीषण मेले की शुरुआत धार्मिक अनुष्ठानों के साथ होती है। आसपास के कई मंदिरों से देवताओं की प्रतिमाओं को सजाए गए देव विमानों में बैठाकर भव्य शोभायात्रा निकाली जाती है।

ये देव विमान श्रद्धालुओं की भीड़ के साथ विभीषण मंदिर तक पहुँचते हैं, जहाँ विधि-विधान से पूजा-अर्चना की जाती है। इसके बाद सभी देव विमानों को मेला स्थल लाया जाता है। मेला स्थल पर आतिशबाजी, सांस्कृतिक गतिविधियाँ और धार्मिक आयोजन होते हैं। कार्यक्रम के अंतिम चरण में मुख्य अतिथि द्वारा हिरण्यकश्यप के पुतले का दहन किया जाता है, जो धर्म की जीत और अधर्म के अंत का प्रतीक माना जाता है।

दुनिया का इकलौता विभीषण मंदिर: हर साल दाने के बराबर जमीन में धंसती जा रही प्रतिमा

कैथून की पहचान केवल मेले तक सीमित नहीं है। यहाँ स्थित विभीषण मंदिर को दुनिया का इकलौता मंदिर माना जाता है जहाँ रावण के भाई विभीषण की पूजा होती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यह मंदिर लगभग पाँच हजार वर्ष पुराना बताया जाता है। मंदिर परिसर में एक विशाल चबूतरे के ऊपर छतरी के नीचे विभीषण की बड़ी प्रतिमा स्थापित है।

(फोटो साभार: News 18)

इस प्रतिमा की खासियत यह है कि इसका केवल धड़ से ऊपर का हिस्सा ही दिखाई देता है, जबकि बाकी भाग जमीन के अंदर धँसा हुआ माना जाता है। स्थानीय लोगों का कहना है कि यह प्रतिमा हर साल थोड़ा-थोड़ा जमीन में और धँसती जाती है। मंदिर के पास एक प्राचीन कुंड भी है, जिसके निकट विक्रम संवत 1815 का शिलालेख मौजूद है।

विभीषण मंदिर से जुड़ी पौराणिक कथा

मंदिर की स्थापना को लेकर एक पौराणिक कथा भी प्रचलित है। कहा जाता है कि भगवान राम के राज्याभिषेक के समय सभी देवी-देवता, ऋषि-मुनि और राजा अयोध्या पहुँचे थे। इसी दौरान भगवान शिव ने पृथ्वी लोक की यात्रा करने की इच्छा जताई। यह सुनकर विभीषण ने निवेदन किया कि वह शिव और हनुमान को कांवड़ में बैठाकर भारत भ्रमण कराना चाहते हैं।

भगवान शिव ने यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया लेकिन एक शर्त रखी कि यात्रा के दौरान काँवड़ जहाँ भी जमीन से टिक जाएगी, वहीं यात्रा समाप्त मानी जाएगी। विभीषण ने एक विशाल लकड़ी की काँवड़ तैयार की जिसकी लंबाई लगभग 8 कोस (करीब 32 किलोमीटर) बताई जाती है। काँवड़ के एक हिस्से में भगवान शिव और दूसरे हिस्से में हनुमान जी विराजमान थे।

जब यह यात्रा प्राचीन नगर कौथुनपुर (आज का कैथून) से गुजर रही थी, तब काँवड़ का एक सिरा जमीन से लग गया। जिस स्थान पर शिवजी का भाग जमीन से टिका, वह स्थान आज चौरचौमा के नाम से जाना जाता है और वहाँ चोमेश्वर महादेव का प्राचीन मंदिर है।

दूसरा हिस्सा कोटा के रंगबाड़ी क्षेत्र में आकर टिका, जहाँ आज हनुमान जी का मंदिर स्थित है। वहीं कैथून में जहाँ विभीषण रुके, वहाँ विभीषण मंदिर की स्थापना मानी जाती है।

मंदिर के वर्तमान स्वरूप का इतिहास और वक्फ विवाद

मंदिर को पौराणिक रूप से हजारों साल पुराना माना जाता है लेकिन इसके वर्तमान ढाँचे का निर्माण बाद में हुआ। माना जाता है कि कोटा के शासक महाराव उम्मेद सिंह प्रथम ने 1770 से 1821 के बीच मंदिर की छतरी और संरचना का निर्माण करवाया था। मंदिर के आसपास के कई हिस्सों का समय-समय पर जीर्णोद्धार भी किया गया।

स्थानीय गौतम परिवार ने प्राचीन कुंड और अन्य संरचनाओं के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। आज भी इस परिवार के सदस्य विशेष अवसरों पर यहाँ पूजा करने आते हैं। मेला उद्घाटन के दौरान मंत्री मदन दिलावर ने मंदिर की जमीन से जुड़े विवाद का भी जिक्र किया। उनके अनुसार, इस भूमि को वक्फ संपत्ति बताकर कब्जाने की कोशिश की गई थी।

उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार द्वारा लाए गए नए वक्फ संशोधन कानून के बाद यह स्पष्ट कर दिया गया है कि केवल वही संपत्ति वक्फ के नाम दर्ज होगी जो वास्तव में मुस्लिम समाज द्वारा दान की गई हो। इस कानूनी बदलाव और लंबे समय से चल रहे संघर्ष के बाद कोर्ट ने विभीषण मंदिर की जमीन हिंदू समाज को वापस सौंपने के आदेश दिए।

दिलावर ने यह भी कहा कि राजस्थान सरकार ने निर्णय लिया है कि आबादी क्षेत्र में स्थित मंदिरों की जमीन के पट्टे मंदिर की मूर्ति के नाम जारी किए जाएँगे, ताकि भविष्य में कोई अवैध कब्जा न कर सके। मेला समारोह में मंत्री दिलावर ने कहा कि विभीषण ने अधर्म के मार्ग पर चल रहे अपने भाई रावण का साथ छोड़कर भगवान राम का साथ दिया था।

रामायण की कथा में विभीषण का यह निर्णय धर्म के पक्ष में खड़े होने का प्रतीक माना जाता है। यही कारण है कि कैथून में उन्हें विशेष सम्मान के साथ पूजा जाता है। होली के बाद हिरण्यकश्यप दहन की परंपरा, दुनिया का इकलौता विभीषण मंदिर और उससे जुड़ी कथाएँ इस स्थान को भारत के धार्मिक मानचित्र पर एक अलग पहचान देती हैं।

₹8300 करोड़/दिन, ₹18 लाख करोड़ खर्च का अनुमान: मिडिल ईस्ट युद्ध में जल रहे अमेरिकी डॉलर, जानें- ईरान पर हमले से US को कितना आर्थिक नुकसान?

युद्ध हमेशा सिर्फ मोर्चे पर लड़ने वाले सैनिकों की जान ही नहीं लेता बल्कि वह देश की अर्थव्यवस्था को भी खाली करता जाता है। बम-बारूद और मिसाइलों से जितना दुश्मन का नुकसान होता है उतना ही अपने देश के खजाने पर भी बोझ पड़ता है। मिडिल ईस्ट में इजरायल-अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध में भारी तबाही मची है। ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई को ढेर कर दिया गया है और हजारों ईरानियों की जान चली गई है।

यह युद्ध जितना ईरान के लिए भारी है, उतना ही अमेरिकी अर्थव्यवस्था के लिए भी। आँकलन बताते हैं कि हमले के पहले ही 24 घंटे में अमेरिका को करीब 779 मिलियन डॉलर (लगभग 6900 करोड़ रुपए) खर्च करने पड़े थे। जैसा कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने संकेत दिया है, अगर यह युद्ध एक महीने या उससे ज्यादा समय तक चलता है तो यह खर्च कई लाख करोड़ रुपए तक पहुँच सकता है।

युद्ध का पहला दिन ही पड़ा भारी

ईरान पर अमेरिकी हमले के पहले 24 घंटे ही इस बात का संकेत दे चुके हैं कि यह युद्ध अमेरिका के लिए कितना महँगा साबित होने वाला है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, सिर्फ शुरुआती सैन्य कार्रवाई में अमेरिका ने लगभग 779 मिलियन डॉलर खर्च कर दिए। इस खर्च में मिसाइल हमले, लड़ाकू विमानों की उड़ानें, सैन्य संसाधनों की तैनाती और युद्ध संचालन से जुड़ी अन्य गतिविधियाँ शामिल हैं।

इतना ही नहीं, इस हमले में अली खामेनेई और कई अन्य अहम सैन्य व राजनीतिक व्यक्तियों को निशाना बनाया गया औ इसके बाद पूरे मध्य-पूर्व में तनाव और तेजी से बढ़ गया है।

₹30 करोड़ की मिसाइल से गिरा रहा ₹30 लाख का ड्रोन

ईरान के सस्ते ड्रोन को मार गिराने के लिए अमेरिका को बेहद महँगी मिसाइलों का इस्तेमाल करना पड़ रहा है। सैन्य रिपोर्टों के मुताबिक, ईरानी ड्रोन को नष्ट करने के लिए अमेरिका ‘पैट्रिएट PAC-3 इंटरसेप्टर मिसाइल’ का सहारा ले रहा है जिसकी कीमत ड्रोन की तुलना में कई गुना ज्यादा है।

जानकारी के अनुसार, ईरान के हमलावर ड्रोन की कीमत करीब 35,000 डॉलर यानी लगभग 29 लाख रुपए के आसपास होती है। वहीं, इन ड्रोन को हवा में ही नष्ट करने के लिए इस्तेमाल की जा रही पैट्रिएट PAC-3 इंटरसेप्टर मिसाइल की कीमत करीब 3.7 मिलियन डॉलर यानी लगभग 30 से 31 करोड़ रुपए बताई जाती है। इसका मतलब यह हुआ कि लगभग 30 लाख रुपये के ड्रोन को गिराने के लिए करीब 30 करोड़ रुपए की मिसाइल खर्च की जा रही है।

सैन्य विशेषज्ञों का कहना है कि युद्ध की परिस्थितियों में ऐसा करना जरूरी हो जाता है। उनका तर्क है कि अगर इन ड्रोन को समय रहते नहीं रोका गया तो वे एयरबेस, तेल रिफाइनरी, बिजली संयंत्र या अन्य महत्वपूर्ण इंफ्रास्ट्रक्चर को निशाना बना सकते हैं।

विमानवाहक पोत चलाना भी महँगा

युद्ध में सबसे ज्यादा खर्च उन बड़े सैन्य प्लेटफॉर्म्स पर होता है जिन्हें युद्ध क्षेत्र में तैनात किया जाता है। जैसे अमेरिका का सबसे बड़ा विमानवाहक पोत USS जेराल्ड रूडोल्फ फोर्ड। यह दुनिया का सबसे आधुनिक और शक्तिशाली कैरियर माना जाता है। लेकिन इसे चलाना बेहद महँगा है।

सुरक्षा अध्ययन संस्थान सेंटर फोर न्यू अमेरिकन सिक्योरिटी (CNAS) के आँकड़ों के मुताबिक, एक कैरियर स्ट्राइक ग्रुप को चलाने में रोज करीब 6.5 मिलियन डॉलर (करीब 58 करोड़ रुपए) खर्च होते हैं। ईरान पर हमले से पहले अमेरिका ने मध्य-पूर्व में ऐसे दो विमानवाहक पोत समूह तैनात किए थे। इसका मतलब है कि सिर्फ इन जहाजों को ऑपरेट करने में ही रोजाना सैकड़ों करोड़ रुपए खर्च हो रहे हैं।

युद्ध शुरू होने से पहले ही अरबों डॉलर झोंके गए

किसी भी युद्ध की असली लागत केवल उस दिन से शुरू नहीं होती जब पहली गोली चलती है। असली खर्च तो उससे पहले की सैन्य तैयारियों में होता है। ईरान पर हमले से पहले अमेरिका ने बड़े पैमाने पर सैन्य तैयारी की थी। इसमें लड़ाकू विमानों को विभिन्न सैन्य अड्डों पर तैनात करना, नौसेना के जहाजों को रणनीतिक स्थानों पर भेजना और मध्य-पूर्व में पहले से मौजूद संसाधनों को नए सिरे से व्यवस्थित करना शामिल था।

इन तैयारियों पर अनुमानित रूप से लगभग 630 मिलियन डॉलर यानी करीब 5556 करोड़ रुपए खर्च हुए। यानी युद्ध शुरू होने से पहले ही अमेरिका अरबों रुपए खर्च कर चुका था।

हर दिन ₹8300 करोड़ खर्च कर रहा अमेरिका

पत्रिका ‘द ऐटलांटिक’ की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि अमेरिकी रक्षा विभाग ने युद्ध के खर्च को लेकर एक शुरुआती अनुमान तैयार किया था। इस अनुमान के मुताबिक अगर यह संघर्ष जारी रहता है तो अमेरिका को हर दिन लगभग 1 अरब डॉलर (करीब 8,300 करोड़ रुपए) खर्च करने पड़ सकते हैं। यानी सिर्फ एक दिन की लड़ाई में ही अमेरिका इतना पैसा खर्च कर रहा है जितना कई छोटे देशों का सालभर का बजट होता है।

इस खर्च में सैन्य अभियानों का संचालन, सैनिकों की तैनाती, लड़ाकू विमानों की उड़ान, मिसाइल और बमों का इस्तेमाल, खुफिया निगरानी और युद्ध से जुड़े अन्य सैन्य संसाधनों का खर्च शामिल होता है। अमेरिकी सेना की मध्य-पूर्व कमान (CENTCOM) और पेंटागन के आँकड़ों के आधार पर तैयार किए गए एक ट्रैकर के अनुसार, गुरुवार तक इस संघर्ष पर अमेरिका का कुल खर्च 5.7 अरब डॉलर (लगभग 47,000 करोड़ रुपए) से भी अधिक हो चुका था।

अगर युद्ध लंबा चला तो लागत कई गुना बढ़ेगी

अर्थशास्त्रियों और सैन्य विश्लेषकों का मानना है कि अगर यह युद्ध कुछ हफ्तों से ज्यादा चला तो अमेरिका के लिए इसकी आर्थिक कीमत बेहद भारी हो सकती है। पेन व्हार्टन बजट मॉडल के निदेशक और जाने-माने आर्थिक विश्लेषक केंट स्मेटर्स का अनुमान है कि अगर युद्ध लगभग एक महीने तक चलता है तो अमेरिका को करीब 210 बिलियन डॉलर यानी लगभग 18.87 लाख करोड़ रुपए खर्च करने पड़ सकते हैं।

यह रकम इतनी बड़ी है कि यह कई छोटे देशों की पूरी सालाना अर्थव्यवस्था से भी ज्यादा है। इसका मतलब यह है कि युद्ध केवल सैन्य मोर्चे पर ही नहीं बल्कि आर्थिक मोर्चे पर भी अमेरिका के लिए एक बड़ी चुनौती बन सकता है।

मिडिल ईस्ट में पहले से ही भारी खर्च कर रहा अमेरिका

यह भी ध्यान देने वाली बात है कि अमेरिका पहले से ही मध्य-पूर्व में भारी सैन्य खर्च कर रहा है। 7 अक्टूबर 2023 को जब हमास ने इजरायल पर हमला किया था तब से अमेरिका लगातार इजरायल को सैन्य सहायता दे रहा है। इस सहायता की कुल राशि लगभग 21.7 बिलियन डॉलर तक पहुँच चुकी है।

इसके अलावा अमेरिका ने यमन, ईरान और मध्य-पूर्व के अन्य क्षेत्रों में चल रहे सैन्य अभियानों में भी भारी पैसा खर्च किया है। रिपोर्ट्स के अनुसार, इन अभियानों पर 9.65 से 12.07 बिलियन डॉलर तक खर्च हो चुके हैं। इस तरह कुल मिलाकर अमेरिका का खर्च 31 से 33 बिलियन डॉलर के बीच पहुँच चुका है।

हर दिन करोड़ों डॉलर खर्च सिर्फ सैनिक भेजने का

इंस्टीट्यूट फोर पॉलिसी स्टडीज (Institute for Policy Studies) के एक विश्लेषण के अनुसार, अमेरिका सिर्फ सैनिकों और सैन्य संसाधनों को मिडिल ईस्ट में भेजने और वहाँ बनाए रखने पर ही रोज करीब 59 मिलियन डॉलर खर्च कर रहा है। यह आँकड़ा सिर्फ सैनिकों की आवाजाही और तैनाती का है।

इसमें मिसाइल, बम, युद्धक विमानों की उड़ानें और उपकरणों के नुकसान जैसे खर्च शामिल ही नहीं हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार, अब तक अमेरिका के तीन लड़ाकू विमान भी नष्ट हो चुके हैं जिन्हें गलती से कुवैत के एयर डिफेंस सिस्टम ने मार गिराया था।

बाद में सामने आता है युद्ध का असली खर्च

विशेषज्ञों का कहना है कि युद्ध की शुरुआती लागत अक्सर कम आँकी जाती है। 9/11 के बाद अमेरिका ने इराक और अफगानिस्तान में जो युद्ध लड़े थे उनकी शुरुआती लागत का अनुमान बाद में कई गुना ज्यादा निकला। शुरुआत में कहा गया था कि इराक युद्ध पर करीब 50 बिलियन डॉलर खर्च होंगे लेकिन बाद में यह खर्च कई ट्रिलियन डॉलर तक पहुँच गया।

‘ईरान ने हॉर्मूज की खाड़ी को भारत के लिए किया ब्लॉक’: कॉन्ग्रेस इकोसिस्टम फैला रही भ्रम, जानिए क्या है इस दावे की हकीकत

होर्मुज स्ट्रेट भारत के लिए बंद नहीं है। ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स ने साफ कर दिया है कि ये समुद्री रास्ता इजरायल अमेरिका, यूरोप के उसके सहयोगी देशों के जहाजों के लिए बंद किया गया है। इसके बावजूद सोशल मीडिया पर कॉन्ग्रेस का प्रोपेगेंडा जारी है।

कॉन्ग्रेस फैला रही झूठ

कॉन्ग्रेस का कहना है कि ईरान ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पूरी तरह बंद कर दिया है। वहाँ से सिर्फ रूस और चीन के जहाज ही जा सकते हैं। इस लिस्ट में भारत का नाम नहीं है। कॉन्ग्रेस का ये भी कहना है कि इस समुद्री रास्ते के बंद होने से 10 हजार करोड़ का भारतीय सामान, 38 जहाज और 1100 नाविक फँसे हुए हैं।

कॉन्ग्रेस का कहना है कि इंडियन नेशनल शिप ओनर्स एसोसिएशन ने भारत सरकार से मदद की गुजारिश की है, लेकिन सरकार मदद करने की स्थिति में नहीं है, क्योंकि भारत सरकार ने ईरान के साथ बातचीत के सारे रास्ते बंद कर लिए हैं।

अब कॉन्ग्रेस को कौन समझाए कि ईरान ने जिसके जहाज को होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने पर हमला करने की बात कही है, उसमें भारत का नाम नहीं है। ईरान सिर्फ उन देशों के जहाजों को पार नहीं होने देगा जिसने प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से युद्ध में इजरायल और अमेरिका का साथ दे रहा है।

भारत ने विश्व शांति की अपील की है। प्रधानमंत्री मोदी ने साफ कहा है कि वैश्विक स्थिरता को अभी सबसे ज्यादा खतरा है और शांति ही एकमात्र हर विवाद को सुलझाने का तरीका है। भारत ने ईरानी सुप्रीम लीडर खामेनेई की मौत पर शोक भी जताया है। ऐसे में भारत के जहाज पर ईरानी आक्रमण का खतरा नहीं है।

बीमा कंपनियों की मनाही का असर

होर्मुज स्ट्रेट दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री रास्तों में से एक है। यूएस-इजरायल और ईरान के बीच चल रहे युद्ध की वजह से इस रास्ते पर कई दिनों से अनिश्चितता बनी हुई है और कमर्शियल ट्रैफिक रुक गए हैं। अब रहा सवाल वहाँ भारतीय सामानों के फँसे होने का, तो इसकी वजह बीमा कंपनियों का होर्मुज स्ट्रेट से होकर जाने वाले जहाजों पर से हाथ खींच लेना है। ब्रिटिश बीमा कंपनियों ने बीमा करना बंद कर दिया है, इसलिए आवाजाही रुकी है।

इंश्योरेंस कंपनियों ने शिपिंग कंपनियों को नोटिस दिया था कि वे ईरान पर इजराइल-US हमलों को देखते हुए इंश्योरेंस रोक देंगी और प्रीमियम बढ़ा देंगी। नॉर्थस्टैंडर्ड, अमेरिकन क्लब, स्वीडिश क्लब, स्कल्ड, गार्ड और लंदन पी एंड आई क्लब सहित प्रमुख बीमा कंपनियों ने पोत सुरक्षा के बढ़ते खतरों का हवाला देते हुए युद्ध जोखिम बीमा वापस ले लिया था।

ये खतरा इजरायल और अमेरिका की ईरान पर किए गए हमले में सुप्रीम लीडर अली खामेनेई के मारे जाने के बाद बढ़ा। ईरान ने इसके बाद स्ट्रेट होर्मुज से गुजरने वाले जहाजों पर हमला करने की चेतावनी दी थी।

राष्ट्रपति ट्रंप ने जहाजों को सुरक्षा देने के लिए यूनाइटेड स्टेट्स डेवलपमेंट फाइनेंस कॉर्पोरेशन (DFC) को खाड़ी में काम करने वाली शिपिंग लाइनों को तुरंत ‘बहुत सही कीमत’ पर पॉलिटिकल रिस्क इंश्योरेंस देने का निर्देश दिया है। उन्होंने कहा कि अगर हालात और बिगड़ते हैं तो US नेवी टैंकरों को होर्मुज स्ट्रेट से एस्कॉर्ट करना शुरू कर सकती है। ऐसी परिस्थिति में जब भारत अपने लिए रास्ता तलाश रहा है, कॉन्ग्रेस लोगों को डरा रही है।

देश को भयभीत करने की कोशिश कर रही कॉन्ग्रेस

कॉन्ग्रेस का कहना है कि होर्मुज स्ट्रेट बंद होने के कारण देश के लोगों को खामियाजा उठाना पड़ेगा, क्योंकि एलजीपी, एलएनजी उसी रास्ते से आता है। मिडिल ईस्ट में होने वाले युद्ध का असर देश के फर्टिलाइजर, ट्रांसपोर्ट, माइनिंग, रेलवे, पॉवर, एग्रीकल्चर समेत कई सेक्टर्स पर पड़ेगा। आने वाले समय में जिस तरह से महँगाई बढ़ेगी और मंदी आएगी, हम उसकी कल्पना भी नहीं कर सकते हैं।

कॉन्ग्रेस ऐसा कह कर सरकार को आगाह करना चाहती है या देश को डराना चाहती है। मिडिल ईस्ट के देशों के साथ भारत के मधुर संबंध हैं और व्यापारिक रिश्ते भी काफी मजबूत हैं। भारत के लिए जब होर्मुज स्ट्रेट बंद नहीं है, तो फिर ऐसा संकट क्यों आएगा। भारत को रूस ने तेल देने की पेशकश भी कर चुका है। बाकी रास्ते भी तलाशे जा रहे हैं।

होर्मुज स्ट्रेट को लेकर ईरान का बयान

ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स ने कहा है कि होर्मुज स्ट्रेट सिर्फ अमेरिका, इजरायल, यूरोप और उनके पश्चिमी सहयोगियों के जहाजों के लिए बंद है। यह घोषणा गुरुवार 5 मार्च 2026 को ईरान के सरकारी ब्रॉडकास्टर IRIB के जरिए की गई है।

रिवोल्यूशनरी गार्ड्स ने कहा कि इंटरनेशनल कानून और संबंधित प्रस्तावों के मुताबिक, इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ ईरान युद्ध के समय होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने को रेगुलेट करने का अधिकार रखता है। इसलिए इस रास्ते से अगर अमेरिका, इजराइल, यूरोप और उनके ‘समर्थकों’ का कोई भी जहाज इस रास्ते पर दिखेगा तो उसपर निश्चित रूप से हमला किया जाएगा।

इससे पहले ईरान ने साफ किया था कि वह चीनी झंडे लगे जहाजों को स्ट्रेट इस्तेमाल करने देगा। अब उसने दुनिया के बाकी देशों को भी ग्रीन सिग्नल दे दिया है, जो इस युद्ध में शामिल नहीं है या उसके खिलाफ नहीं लड़ रहे हैं। ये पूरी दुनिया के लिए राहत भरी खबर है।

वेनेजुएला और ईरान पर चीन की चुप्पी ने किया साबित, वो सिर्फ मौका परस्त: नहीं है सुपरपॉवर जैसी कोई बात, फिर भी हमारे लिबरल्स की चाहत अलग

यूरोप में 9 नवंबर 1989 को एक दीवार गिरी इस दीवार का नाम बर्लिन वाल था। सोवियत रूस समर्थित ईस्ट जर्मनी और अमेरिका जैसी NATO पॉवर से समर्थित वेस्ट जर्मनी इसी के साथ एक हो गए। इस दीवार ने सिर्फ़ देश के दो हिस्सों को एकीकृत नहीं किया बल्कि 4 दशक से चले आ रहे कोल्ड वॉर को भी ख़त्म किया।

इसके साथ ही दुनिया बाई पोलेरिटी यानी द्विध्रुवीय व्यवस्था ख़त्म हो गई। राजनीति विज्ञानियों की द्वितीय विश्व युद्ध के बाद पहली बार चाँदी हुई, उन्हें मल्टी पोलरिज्म, यूनीपोलरिज्म जैसे टर्म्स गढ़ने को मिले। कुछ ने कहा कि अब एक और कोई ताक़त खड़ी होगी और दुनिया वापस पुरानी व्यवस्था में आएगी। जबकि कुछ ने कहा कि मल्टी पोलरिज्म होगा।

2010s में जब चाइना की इकॉनमी 10 ट्रिलियन डॉलर पार हो गई तो बाई पोलर व्यवस्था वालों ने बताया कि चीन ही USSR का उत्तराधिकारी है। लेकिन पिछले एक महीने में ही ये स्मोक स्क्रीन छँट गई है।

पहले वेनेजुएला और अब ईरान, एक-एक करके उसके साथ अलायन्स रखने वाले देशों में अमेरिका मनमर्जी कर रहा है। इसके बदले में चीन के पास कोई जवाब नहीं है। चीन कुछ केसेस में सिर्फ़ बयान जारी करके पल्ला झाड़ ले रहा है और कहीं तो उसके पास ऑफर करने को बयान भी नहीं हैं।

एक-एक करके दोनों केसेज ने कैसे चीन की भद्द पिटवाई है, समझते हैं। सबसे पहले केस लेते हैं वेनेजुएला का।

वेनेजुएला मामले ने बताया, चीन सिर्फ मौकापरस्त

निकोलस मादुरो के राज में वेनेजुएला के तेल का सबसे बड़ा ख़रीददार चीन ही रहा है, रॉयटर्स की एक रिपोर्ट बताती है कि चीन 2025 में वेनेजुएला से 5 लाख बैरल प्रतिदिन ख़रीद रहा था। चाइनीज़ इन्वेस्टर्स ने वेनेजुएला के आयल सेक्टर में 2 बिलियन डॉलर से ज्यादा का इन्वेस्टमेंट भी किया है। और उसकी दोस्ती वेनेजुएला से तेल ख़रीदने तक ही नहीं बल्कि अपने हथियार बेचने की भी है। अमेरिकन थिंक टैंक CSIS की एक आर्म, चाइना पॉवर बताती है कि 2015 से 25 के बीच में चीन ने वेनेजुएला को लगभग 600 मिलियन डॉलर्स यानी 5000 करोड़ से ज्यादा के वेपन्स बेचे हैं।

इनमें आर्मर्ड व्हीकल्स से लेकर ट्रेनर एयरक्राफ्ट, मिसाइल, हेलीकॉप्टर तक शामिल हैं। यही नहीं बल्कि चीन की वेनेजुएला से संबंध भी रणनीतिक लेवल की हैं। इन सब के बाद भी जब जनवरी 2026 में एक ब्रीफ ऑपरेशन के बाद अमेरिका ने मादुरो को उठा लिया और वेनेजुएला में साइलेंट रिजीम चेंज कर दिया, तो चीन चुप हो गया। उसने सिर्फ़ एक बयान जारी करके इति श्री कर ली। UNSC में उसने अमेरिका की निंदा की और कहानी ख़त्म हो गई। यहाँ तक कि मादुरो के लिए छोड़िए, चीन ने अपने इकोनॉमिक इंटरेस्ट्स को भी ख़ासा प्रोटेक्ट नहीं किया। उसको वेनेजुएला से मिलने वाला तेल 50% तक घट गया।

और ये तेल ऐसा नहीं था कि वो ख़रीद रहा था जो कहीं और से भी ख़रीदा जा सकता था। ये तेल असल में चीन के लोन का रिपेमेंट था। लेकिन इन सबके बावजूद चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने अपने बयानों में मादुरो का नाम तक नहीं लिया और ना ही अमेरिका की खुले तौर पर निंदा की, कोई मिलिट्री या इकोनॉमिक एक्शन तो छोड़ दीजिए।

अगर ये पूरा एपिसोड इस बात को सिद्ध करने के लिए कम था कि चीन के पास ऐसी कंडीशंस में सिर्फ़ लिप सर्विस है और वो इकॉनमी चाहे 20 ट्रिलियन की हो गया हो, वो अमेरिका के बराबर खड़ी होने वाली शक्ति आज तक नहीं बन पाया है, तो ईरान पर हमला हो गया।

ईरान पर हमले के बाद भी चीन ने टाइट रखी जुबान

जहाँ मादुरो को अमेरिका ने सिर्फ़ गिरफ्तार किया था तो ईरान के ख़िलाफ़ उसने इजरायल के साथ मिलकर पूरा युद्ध छेड़ दिया और सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह खामनेई को मार तक गिराया। इसके साथ ही ईरान की टॉप लीडरशिप भी ख़त्म कर दी गई। उसके एक्स प्रेसिडेंट को मार दिया गया। उसके न्यूक्लियर रिएक्टर्स पर हमला हुआ।

लेकिन तब भी चीन ने क्या किया? चीन ने वही घिसी पिटी बातें की, जिसमें UN चार्टर, संप्रभुता और वायलेशन जैसे शब्द शामिल थे, जिनकी हैसियत अन्तरराष्ट्रीय राजनीति में किसी फेंके हुए पेपर से ज्यादा नहीं है। इन फैक्ट चाइना ने बाक़ी देशों की तरह सुप्रीम लीडर खामनेई की मौत पर कोई शोक वग़ैरह भी नहीं घोषित किया।

ये सब तब हुआ, जब ईरान और चीन ने 25 साल की साझेदारी का समझौता कर रखा है। ईरान का लगभग 80% क्रूड चीन ख़रीदता है, ईरान चाइना की बेल्ट एंड रोड परियोजना का भी हिस्सा है। उसने लगभग 2 बिलियन डॉलर इन्वेस्ट भी किया हुआ है, आर्म्स भी बेचे हैं।

तेहरान की मेट्रो से लेकर रेलवे लाइंस तक और पोर्ट्स से लेकर ऑयल इंडस्ट्री तक चीन का महत्वपूर्ण इन्वेस्टमेंट ईरान में है। लेकिन यहाँ भी सुप्रीम लीडर की मौत के बाद जिनपिंग का एक भी बयान तक नहीं आया। मिलिट्री इंटरवेंशन और ईरान को वेपन सपोर्ट तो बड़े दूर की बात है।

यानी दोनों केसेस में चीन सिर्फ़ बोलता रह गया और एक्शन के नाम पर उसने एक पुलिस कांस्टेबल को नहीं भेजा। जिन एनालिस्ट्स को ये लगता था कि उन्हें चीन दूसरे देशों बचाएगा क्योंकि वो अब दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी ताक़त बन चुका है, वो सारी एनालिसिस भी धरी रह गई।

यहाँ तक कि वो चाहे तो इस मामले में अमेरिका की तरह अपनी इकोनॉमिक पॉवर का भी यूज कर सकता है, सैंक्शंस लगा सकता है, एक्सपोर्ट रोक सकता है और अपनी मैन्यूफैक्चिरंग के बल पर कुछ डेंट जरूर क्रिएट कर सकता है, लेकिन उससे ये भी नहीं हुआ। क्योंकि चाइना इन सब में अपना सिर्फ़ फ़ायदा देखता है।

फिर भी हमारे लिबरल्स चाहते हैं- भारत युद्ध में कूद जाए

इस सब के बावजूद हमारे लिबरल – वामपंथी और कॉन्ग्रेसी चाहते हैं कि हम इस युद्ध में खामनेई की फोटो और ईरान का झंडा लेकर अमेरिका के ख़िलाफ़ लड़ें, इजरायल से रिश्ते तोड़ दें और उनकी सबमरीन, युद्धपोत सब कुछ ब्लॉक कर दें उनसे एकदम जंग मोड में आ जाएँ, अपनी तेल की सप्लाई ख़त्म कर दें।

और ये सब हम तब करें जब हमारे दर्जनों आयल के टैंकर्स और बाक़ी शिप ईरान के स्ट्रेट ऑफ़ हॉर्मुज़ बंद करने के चलते फँसे रहें। लेकिन कांग्रेसियों के कहने से हमारे नेशनल इंटरेस्ट को हम हैंपर नहीं करेंगे।

भारत ना मिलिट्री एक्शन लेगा और ना ऐसी फर्जी लिप सर्विस देगा जो संकट के समय काम ना आए। याद रखिए जो लोग चीन को USSR का उत्तराधिकारी बता रहे थे, उन्हें याद रखना चाहिए कि ऐसी कंडीशंस में वो अपनी मिलिट्री भेजता था, अपनी सबमरींस भेजता था, UNSC में अमेरिका को मजबूर कर देता था। लेकिन चीन अपने हथियार और अपनी अर्थव्यवस्था को लेकर इन्फ़िरियारिटी में ही जी रहा है। चाहे ऑपरेशन सिंदूर के दौरान उसके एयरडिफेंस का एक्सपोज होना हो या ईरान में उनके एयरडिफेंस के देखते देखते अयातुल्लाह खामनेई का सिटिंग डक बन जाना हो।

कुछ दिनों पहले की ही बात है जब अमेरिका ने जरा सा टैरिफ लगाया था तो चीन की इकॉनमी काँपने लगी थी। सच ये है कि चीन के सो कॉल्ड डिफेंस सिस्टम और उसकी सुपरपॉवर इकॉनमी को वॉर का कोई एक्सपोज़र नहीं है। 1979 के बाद चीन ने कोई युद्ध नहीं लड़ा है।

आज चीन में ना वैसी मिलिट्री ऑपरेशन की हैसियत है और ना ही उस तरह का पॉवर प्रोजेक्शन करने की। हाँ! अगर उसे अमेरिका का सामना करना है तो उसे हमेशा भारत से बना के रखनी पड़ेगी, क्योंकि बिना भारत और रूस का साथ लिए वो सिर्फ़ बयान ही जारी कर पाएगा। निकोलस मादुरो का वेनेजुएला प्रॉपर सोशलिस्ट स्टेट था, यानी उन्हीं वैल्यूज को मानता था, जिनपर चाइना बना है।

भारत-मोदी पर उठाए सवाल, ईरान-खामेनेई के लिए दिखाया प्यार…: प्रोपेगेंडा के ‘प्राइम मास्टर’ बने रवीश कुमार, 5 दिन में 6 Video डालकर जानिए क्या नैरेटिव बनाया

आजकल डिजिटल मीडिया के दौर में पत्रकारिता के मायने बदल गए हैं, लेकिन कुछ पत्रकारों के लिए यह केवल अपना ‘एजेंडा’ सेट करने का जरिया बन गया है। प्रोपेगेंडाई पत्रकार रवीश कुमार के हालिया वीडियोज को देखकर ऐसा लगता है कि उनकी निष्पक्षता की परिभाषा अब केवल ‘एकतरफा विरोध’ तक सिमट गई है। बीते 5 दिनों में रवीश कुमार ने अपने यूट्यूब चैनल पर ईरान-इजरायल-अमेरिका संघर्ष को लेकर 6 वीडियो पोस्ट किए हैं।

गौर करने वाली बात यह है कि जैसे-जैसे दिन बीते, उनकी पत्रकारिता से ‘तथ्य’ गायब होते गए और ‘ईरान के प्रति संवेदना’ बढ़ती गई। इन वीडियोज के जरिए रवीश ने न केवल अमेरिका और इजरायल को विलेन साबित करने की कोशिश की, बल्कि ईरान के कट्टरपंथी शासन का कुछ इस तरह महिमामंडन किया जैसे वे किसी शांतिदूत के पक्ष में खड़े हों।

हमले की आड़ में अमेरिका-इजरायल को घेरने की कोशिश

रवीश कुमार की पहली वीडियो 28 फरवरी को अपलोड की गई थी, जिसका शीर्षक है- ‘अमेरिका-इजरायल का ईरान पर हमला, क्या इस बार बच पाएगा ईरान?’ वीडियो के थंबनेल में उन्होंने ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला खामेनेई के साथ बेंजामिन नेतन्याहू और डोनाल्ड ट्रंप की तस्वीर लगाई है। थंबनेल का टेक्स्ट ‘ईरान पर हमला’ पाठकों को यह संदेश देने की कोशिश करता है कि ईरान एक पीड़ित मुल्क है जिस पर दो ताकतवर देश मिलकर अत्याचार कर रहे हैं। लेकिन टाइटल में ही ‘क्या इस बार बच पाएगा ईरान’ लिखकर रवीश कुमार ने दर्शकों के मन में ईरान के प्रति एक ‘बेचारा’ वाली छवि गढ़ने की कोशिश शुरू कर दी।

वीडियो के अंदर रवीश कुमार ने अमेरिका और इजरायल के खिलाफ बेहद आक्रामक शब्दावली का इस्तेमाल किया है। उन्होंने इन देशों की सैन्य कार्रवाई को ‘उत्पाद’, ‘मनमानी’ और ‘कब्जा’ जैसे शब्दों से नवाजा। रवीश ने यहाँ तक कह दिया कि जब पीएम मोदी इजरायल गए थे, तभी से विशेषज्ञों ने इस हमले की भविष्यवाणी कर दी थी- मानो भारत की कूटनीति का एकमात्र लक्ष्य ईरान पर हमला करवाना हो।

वे ईरान की पाँच लड़कियों की मौत का जिक्र तो करते हैं, लेकिन यह नहीं बताते कि ईरान ने भी मिसाइलें दागी हैं। वे सवाल उठाते हैं कि क्या सत्ता परिवर्तन के लिए किसी देश पर बम गिराया जा सकता है? लेकिन वे इस बात पर चुप्पी साध लेते हैं कि ईरान का शासन अपने ही लोगों और पड़ोसी देशों के लिए कितना खतरनाक रहा है। उनके लिए अमेरिका और इजरायल ‘आउट ऑफ कंट्रोल’ हैं, पर ईरान की परमाणु महत्वाकांक्षाएँ शायद उनके लिए ‘शांति मिशन’ हैं।

ईरान के ‘प्रवक्ता’ बने रवीश: मौत को बताया शहादत, भारत की तटस्थता पर प्रहार

रवीश कुमार ने अपनी दूसरी वीडियो का शीर्षक ‘ख़ामेनेई की शहादत, भागे न बंकर में छुपे, मौत को लगाया गले, शिया जगत शोक की लहर’ रखा है। वीडियो के थंबनेल पर बड़े अक्षरों में ‘खामेनेई शहीद’ लिखा गया है। शीर्षक और थंबनेल से ही स्पष्ट है कि रवीश कुमार ने एक विवादास्पद वैश्विक नेता की मृत्यु को मजहबी और भावनात्मक रंग देते हुए उसे वीरता की गाथा के रूप में पेश किया है। ‘शहादत’ जैसे भारी-भरकम शब्दों का प्रयोग कर वे पहले ही पल से दर्शकों की सहानुभूति ईरान की ओर मोड़ने का प्रोपेगेंडा रच रहे हैं।

वीडियो के भीतर रवीश कुमार ने एक पत्रकार के बजाय ईरान के समर्थक की तरह बात की है। उन्होंने अयातुल्ला खामेनेई की तुलना ’21वीं सदी के कर्बला’ से करते हुए इसे एक महान बलिदान बताया। रवीश ने ट्रंप और नेतन्याहू को ‘विनाश के दरवाजे’ पर खड़ा नेता और ‘बांसुरी बजाने वाला’ करार दिया, जबकि ईरान की सैन्य कार्रवाइयों और क्षेत्रीय तनाव में उसकी भूमिका पर पूरी तरह चुप्पी साध ली। उन्होंने यह नैरेटिव सेट करने की कोशिश की कि खामेनेई मौत से डरे नहीं, बल्कि बहादुरी से उसका सामना किया। वहीं, अमेरिका और इजरायल को ‘अपराधी’ बताते हुए उन्होंने दावा किया कि वे दुनिया की शांति के दुश्मन हैं।

भारत के संदर्भ में, रवीश ने प्रधानमंत्री मोदी और भारत सरकार की चुप्पी पर सवाल उठाए। उन्होंने कटाक्ष किया कि जब दुनिया का इतना बड़ा ‘मजहबी और राजनीतिक’ चेहरा मारा गया, तब भारत का ‘नैतिक कंपास’ कहाँ खो गया? उन्होंने आरोप लगाया कि भारत अब अपनी स्वतंत्र नीति छोड़कर ट्रंप और इजरायल की लाइन पर चल रहा है। रवीश ने यह भी कहा कि मोदी सरकार का यह स्टैंड भारत के व्यापक हितों के खिलाफ हो सकता है क्योंकि भारत में भी बड़ी शिया आबादी रहती है। पूरी वीडियो में उन्होंने ईरान की आक्रामकता को ‘जवाब’ और इजरायल-अमेरिका के हमलों को ‘कायरता’ बताकर अपनी एकतरफा और प्रोपेगेंडाई पत्रकारिता का प्रदर्शन किया है।

मोदी विरोध में अंधे रवीश: देश की कूटनीति पर ‘प्रोपेगेंडा’ प्रहार

रवीश कुमार ने अपनी तीसरी वीडियो का शीर्षक रखा है- ‘क्या मोदी खुलकर ईरान के विरोध में आ गए हैं? सऊदी, बहरीन, UAE और इजरायल को फोन, ईरान को नहीं।’ वहीं थंबनेल पर बड़े अक्षरों में सवाल दागा गया है- ‘क्या भारत ईरान के विरोध में है?’। इस टाइटल और थंबनेल के जरिए रवीश ने वीडियो शुरू होने से पहले ही दर्शकों के मन में यह जहर घोलने की कोशिश की है कि भारत सरकार जानबूझकर एक मुस्लिम मुल्क (ईरान) के खिलाफ साजिश रच रही है और अरब देशों व इजरायल के साथ मिलकर ईरान को अकेला छोड़ रही है।

वीडियो के भीतर रवीश कुमार ने पूरी तरह से एक पक्षपाती ‘स्पोकस्पर्सन’ की तरह बात की है। उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी के शांति और बुद्ध के संदेशों को ‘चुनावी जुमला’ करार देते हुए सवाल उठाया कि भारत इस युद्ध में ईरान के पक्ष में खड़ा क्यों नहीं हो रहा? रवीश ने पीएम मोदी की इजरायल यात्रा को हमले की तैयारी से जोड़ते हुए यहाँ तक कह दिया कि क्या इजरायल ने भारत का इस्तेमाल ‘कवर’ के तौर पर किया? उन्होंने कॉन्ग्रेस नेता सुप्रिया श्रीनेत के ‘जोकर प्रधानमंत्री’ वाले बयान का सहारा लेकर पीएम मोदी पर तंज कसा और पाकिस्तान की तारीफ तक कर डाली कि उसने कम से कम सहानुभूति तो जताई।

रवीश ने खामेनेई की मौत को ‘शहादत’ बताते हुए उसकी तुलना ईसा मसीह के क्रूसीफिकेशन और गुरु गोविंद सिंह जी के बेटों के बलिदान से कर दी, जो न केवल अतार्किक है बल्कि धार्मिक भावनाओं को भड़काने वाला भी है। उन्होंने भारत सरकार की ‘चिंता’ व्यक्त करने वाली कूटनीति को ‘कायरता’ बताया और आरोप लगाया कि भारत अब अपनी स्वतंत्र नीति छोड़कर ट्रंप और नेतन्याहू की लाइन पर चल रहा है। रवीश ने चाबहार पोर्ट में भारत के निवेश का डर दिखाया और एआई (AI) कोर्स का विज्ञापन करते हुए यह नैरेटिव सेट किया कि भारत का ‘नैतिक कंपास’ अब खत्म हो चुका है। पूरी वीडियो में वे इस बात पर अड़े रहे कि भारत को ईरान पर हमले की कड़ी निंदा करनी चाहिए थी, जबकि वे ईरान द्वारा फैलाए जा रहे क्षेत्रीय तनाव पर पूरी तरह मौन रहे।

खाड़ी में खलबली और प्रोपेगेंडा का ताना-बाना

प्रोपेगेंडाई पत्रकार रवीश कुमार की चौथी वीडियो का शीर्षक ‘9 देशों पर हमला बोला ईरान ने, कहीं रिफाइनरी बंद तो कहीं एयरपोर्ट…’ और थंबनेल ‘खाड़ी के देशों में खलबली’ दर्शकों में एक प्रकार का भय और सनसनी पैदा करने की कोशिश करता है। शीर्षक में ‘अमेरिका को भारी नुकसान’ जैसे शब्दों का प्रयोग कर एक ऐसा नैरेटिव सेट किया गया है जिससे ईरान की सैन्य शक्ति को महिमामंडित किया जा सके। एकतरफा पत्रकारिता का उदाहरण देते हुए पत्रकार ने शीर्षक में ही यह तय कर दिया कि दोष किसका है। थंबनेल और टाइटल के जरिए यह संदेश देने की कोशिश की गई है कि पूरा अरब क्षेत्र ईरान के खौफ में है और अमेरिका बेबस नजर आ रहा है, जो कि गंभीर भू-राजनीतिक मुद्दों को एक खास चश्मे से देखने की प्रोपेगेंडा शैली को दर्शाता है।

वीडियो के भीतर रवीश कुमार ने सीधे तौर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भारत सरकार की विदेश नीति को कटघरे में खड़ा किया है। उन्होंने कटाक्ष करते हुए कहा कि पीएम मोदी, जो ‘बुद्ध और युद्ध’ की बातें करते हैं, वे ईरान पर हुए ‘अनैतिक’ हमले और खामेनेई की हत्या पर चुप क्यों हैं? रवीश ने आरोप लगाया कि भारत सरकार अपनी ‘नैतिक साख’ खो चुकी है और अब अमेरिका व इजरायल के दबाव में काम कर रही है। उन्होंने ईरान के सुप्रीम लीडर की हत्या की तुलना मजहबी शहादतों से करते हुए इसे भावनात्मक मोड़ दिया, लेकिन ईरान द्वारा किए गए मिसाइल हमलों पर चुप्पी साध ली। पत्रकार ने भारत की तटस्थता को ‘कायरता’ करार दिया और दावा किया कि इजरायल ने भारत का इस्तेमाल केवल एक ‘कवर’ के रूप में किया है। पूरे वीडियो में उनका स्वर स्पष्ट रूप से ईरान के समर्थन में और मोदी-इजरायल-अमेरिका गठबंधन के प्रति घृणा से भरा हुआ प्रतीत होता है।

दुबई का ‘ब्रैंड’ और भारत की विदेश नीति पर रवीश का प्रहार

रवीश कुमार ने अपनी पाँचवी वीडियो का शीर्षक ‘दुबई में दहशत या सब कुछ नॉर्मल? ईरान के हमलों की चपेट में अरब देश’ रखा है और थंबनेल का टेक्सट ‘दुबई में दहशत’ है। इस वीडियो में रवीश कुमार ने नैरेटिव सेट करते हुए यह दावा किया कि भले ही वहाँ की सरकार सब कुछ सामान्य होने का दावा कर रही हो, लेकिन हकीकत में स्थिति भयावह है। उन्होंने ईरान द्वारा किए गए मिसाइल और ड्रोन हमलों को विस्तार से बताते हुए कहा कि ‘ईरान ने कोई गारंटी नहीं दी है’ कि दुबई सुरक्षित रहेगा। रवीश ने अमेरिकी और इजरायली चेतावनियों को आधार बनाकर यह तर्क दिया कि पूरा मध्य पूर्व युद्ध की आग में है। उन्होंने ईरान के हमलों को एक तरह से ‘स्वाभाविक प्रतिक्रिया’ के रूप में पेश किया और इजरायल-अमेरिका को तनाव बढ़ाने वाला पक्ष बताया। उनके अनुसार, खाड़ी देशों का ‘स्थिरता और शांति’ वाला ब्रैंड अब पूरी तरह चकनाचूर हो चुका है।

वीडियो के भीतर प्रोपेगेंडाई पत्रकार रवीश कुमार ने पत्रकारिता की आड़ में पूरी तरह से ईरान का पक्ष लिया है और भारत सरकार की विदेश नीति पर तीखा प्रहार किया है। उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी द्वारा खाड़ी देशों के नेताओं से बात करने और भारतीयों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के प्रयासों का मजाक उड़ाते हुए कहा कि ‘मोदी के बोलने से क्या होगा?’ रवीश कुमार ने बार-बार यह साबित करने की कोशिश की कि दुबई और सऊदी अरब में सब कुछ खत्म हो चुका है और वहाँ की सरकारें ‘झूठ’ बोल रही हैं कि स्थिति सामान्य है। रवीश ने ईरान के हमलों को जायज ठहराने जैसा लहजा अपनाते हुए कहा कि ‘ईरान ने कोई गारंटी नहीं दी है।’

रवीश ने एक कदम आगे बढ़ते हुए भारतीय शहरों की तुलना दुबई से की और भारतीय शहरों को ‘नरक’ व ‘बर्बाद’ करार दिया। उन्होंने व्यंग्य किया कि भारत में लोग केवल ‘जलेबी-समोसा’ खाकर खुश हैं जबकि विदेश नीति में भारत का कोई वजन नहीं है। उन्होंने बीजेपी के ‘IT सेल’ पर निशाना साधते हुए दर्शकों को भड़काया कि ‘भारत ने इजरायल का साथ देकर क्या पाया?’ रवीश ने खाड़ी देशों में रह रहे 1 करोड़ भारतीयों की सुरक्षा का डर दिखाकर यह नैरेटिव सेट करने की कोशिश की कि भारत का इजरायल के साथ खड़ा होना गलत है। पूरी वीडियो में वे एक ‘प्रोपेगेंडा पत्रकार’ की तरह यह संदेश देते दिखे कि ईरान अजेय है और भारत की विदेश नीति पूरी तरह विफल और ‘दिखावे’ वाली है।

युद्ध की आग में झुलसता मध्य पूर्व और ‘लाचार’ महाशक्ति अमेरिका

रवीश कुमार ने अपनी इस वीडियो का शीर्षक ‘अमेरिका के सैन्य ठिकानों पर हमला, दूतावास बंद, फैल रहा है युद्ध’ रखकर दर्शकों में घबराहट और उत्सुकता पैदा करने की कोशिश की है। थंबनेल पर बड़े अक्षरों में लिखा ‘फँस गया अमेरिका’ यह संकेत देता है कि दुनिया की सबसे बड़ी सैन्य शक्ति अब ईरान के चक्रव्यूह में उलझ चुकी है।

वीडियो के भीतर रवीश कुमार ने अमेरिका और इज़रायल पर तीखे हमले करते हुए आरोप लगाया है कि इन दोनों देशों ने मिलकर ईरान के 150 शहरों पर हमला किया और 160 से अधिक मासूम स्कूल जाने वाली बच्चियों की जान ले ली। रवीश ने इसे ‘ईरान की एकता का आधार’ बताते हुए कहा कि अमेरिका ने बच्चियों के स्कूल पर बम गिराकर अपनी सबसे बड़ी रणनीतिक भूल की है। उन्होंने अमेरिका पर तंज कसते हुए कहा कि वह कुवैत, कतर और बहरीन में बड़े सैन्य अड्डे बनाने के बावजूद अपनी रक्षा नहीं कर पा रहा है और अब हाथ खड़े कर चुका है।

रवीश ने यहाँ तक दावा किया कि अमेरिका के महंगे हथियारों के मुकाबले ईरान के ‘सस्ते और स्वदेशी’ मिसाइलें ज्यादा प्रभावी हैं और अमेरिका के पास हथियारों की वैसी सप्लाई चेन नहीं है जैसी ईरान ने खुद विकसित कर ली है। प्रोपेगेंडाई पत्रकार अमेरिकी विदेश मंत्री के तर्कों को ‘हास्यास्पद’ बताया और कहा कि अमेरिका के पास इस युद्ध को शुरू करने का कोई ठोस कारण नहीं है, सिवाय इसके कि वह इज़रायल के इशारों पर नाच रहा है। रवीश के अनुसार, ईरान अब झुकने के बजाय लंबी लड़ाई के लिए तैयार है, जो ट्रंप के लिए ‘बुरी खबर’ है।

प्रोपेगेंडाई पत्रकार रवीश की ‘एकतरफा’ दुनिया

रवीश कुमार की हालिया वीडियोज को अगर गहराई से देखें, तो यह साफ हो जाता है कि उनकी पत्रकारिता अब निष्पक्ष रहने के बजाय एकतरफा नैरेटिव की ओर झुक गई है। एक पत्रकार की ज़िम्मेदारी होती है कि वह दोनों पक्षों के स्याह और सफेद पहलू दिखाए, लेकिन रवीश ने ईरान को एक ‘आदर्श राष्ट्र’ और वहाँ के नेताओं को ‘मसीहा’ की तरह पेश करने में अपनी सारी ऊर्जा लगा दी है। उन्होंने ईरान द्वारा मिडिल ईस्ट में लड़े जा रहे ‘प्रॉक्सी वॉर’ और लेबनान से लेकर यमन तक उसके हस्तक्षेप पर पूरी तरह चुप्पी साध ली। ताज्जुब की बात यह है कि वे लोकतांत्रिक देशों के नेताओं पर तो तीखे सवाल उठाते हैं, मगर ईरान के उस तानाशाही ढाँचे पर एक शब्द नहीं बोलते जहाँ ‘सुप्रीम लीडर’ का फैसला ही अंतिम कानून होता है।

रवीश की रिपोर्टिंग में शब्दों का चुनाव भी किसी खास एजेंडे की ओर इशारा करता है। वे ईरान के संदर्भ में ‘शहादत’, ‘पवित्र महीना’ और ‘नैतिकता’ जैसे भावनात्मक शब्दों का सहारा लेते हैं, लेकिन यही संवेदनशीलता इजरायल में मारे गए मासूमों के लिए कहीं नजर नहीं आती। इतना ही नहीं, एक अंतरराष्ट्रीय मुद्दे की आड़ में अपनी ही सरकार और देश के मीडिया को नीचा दिखाना उनके कंटेंट का मुख्य हिस्सा बन गया है। कुल मिलाकर, ये वीडियो सूचना देने के बजाय एक खास तरह की नफरत और विचारधारा को बढ़ावा देते हैं। यह साफ है कि उनकी पत्रकारिता अब जमीनी हकीकत दिखाने के लिए नहीं, बल्कि अपनी निजी कुंठा निकालने और एकतरफा ‘प्रोपेगेंडा’ फैलाने का जरिया बन गई है।

खामेनेई की हत्या हो या हिंद महासागर में IRIS डेना का डूबना: क्या भारत को ईरान-US-इजरायल युद्ध में घसीटने की कोशिश कर रहा कॉन्ग्रेसी-वामपंथी इकोसिस्टम?

भारत में विपक्षी नेता, कॉन्ग्रेसी इकोसिस्टम, वामपंथी इकोसिस्टम और कट्टर इस्लामी इकोसिस्टम से जुड़े लोग चाहते हैं कि भारत ईरान के साथ युद्ध में कूद जाए और अमेरिका के साथ जंग कर पूरा देश बर्बाद कर ले। दरअसल, ऐसा सिर्फ उनकी हरकतों से लग रहा है। क्योंकि ईरान युद्ध शुरू होने के बाद से वो भारत सरकार को इस युद्ध में घसीटने की कोई कोर-कसर नहीं छोड़ रहे।

पहले उन्होंने पीएम मोदी की इजरायल यात्रा को निशाने पर लिया और इजरायल के साथ ईरान के युद्ध में भारत की साजिश कहकर घसीटने की कोशिश की। फिर ईरान के कट्टरपंथी तानाशाह खामेनेई की मौत के बाद पीएम मोदी ने दुख क्यों नहीं जताया (हालाँकि डिप्लोमेटिक चैनल्स के माध्यम से तय प्रक्रिया होती है और भारत के विदेश सचिव में ईरान के दूतावास में जाकर रजिस्टर पर हस्ताक्षर किए हैं। ) और अमेरिका-इजरायल का विरोध क्यों नहीं किया.. ये कहकर भारत को उकसाने की कोशिश की।

इस बीच, अब जब हिंद महासागर में ईरानी फ्रिगेट IRIS Dena को जब अमेरिकी पनडुब्बी ने मार गिराया, तो उसे भी भारत पर हमले से जोड़कर बयानबाजी करने लगे। राहुल गाँधी ने तो यहाँ तक कह दिया कि ईरानी भारत के मेहमान थे, जब उनकी फ्रिगेट को मार गिराया गया।

हैरानी की बात है कि ईरान समेत 75 देशों की नेवी और उनके जहाज, एयरक्राफ्ट इस International Fleet Review 2026 में शामिल थे, जिसमें ईरान का जहाज भी शामिल था। ये इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू 2026 15 से 25 फरवरी तक विशाखापटनम में हुआ, जो भारतीय नौसेना के ईस्टर्न नेवल कमांड का हिस्सा है। ये कार्यक्रम 25 फरवरी 2026 को खत्म हो गया और सभी देशों की नेवी अपने-अपने गंतव्य की ओर रवाना हो गई।

इसके करीब 1 सप्ताह बाद 4 मार्च 2026 को अमेरिकी पनडुब्बी ने ईरानी जहाज IRIS Dena को इंटरनेशनल वॉटर में टारपीडो से मारा। वो भारतीय सीमा से दूर हिंद महासागर में था और श्रीलंका का चक्कर लगाकर ईरान की तरफ बढ़ रहा था। ऐसे में उसका भारत से कोई लेना देना नहीं था, लेकिन राहुल गाँधी समेत विपक्षी नेता और वामपंथी-इस्लामी इकोसिस्टम ये अफवाह फैलाने लगा कि अमेरिकी नेवी ने भारत के गेस्ट को मार गिराया।

यहाँ समझने वाली बात ये भी है कि भारत के पानी में जब तक ये जहाज रहा, उसे अमेरिकियों ने हाथ नहीं लगाया। वो हमले से पहले ही इंटरनेशनल वॉटर जोन में था। जहाँ किसी संपर्क कॉल पर जवाब देना भी श्रीलंकाई नेवी का काम था, वो उसने किया भी। लेकिन उसे भारत के पानी में मार गिराया गया, ऐसा दावा करके कॉन्ग्रेसी इकोसिस्टम सिर्फ भारतवासियों को गुमराह ही कर रहा है।

वैसे, यहाँ ये बात भी समझनी होगी कि जब युद्ध होता है, तो पनडुब्बियों का काम दुश्मन को पानी में खोज कर खत्म करना है। अमेरिकी नेवी ने ईरानी जहाज को इंटरनेशनल पानी में मारा। डिस्ट्रेस कॉल श्रीलंका में गई, लेकिन छाती यहाँ कॉन्ग्रेसियों-वामपंथियों की छाती फटने लगी? क्यों? क्योंकि वो चाहते हैं कि किसी न किसी तरह से भारत सरकार के नेतृत्व को नीचा दिखाया जाए।

इस मामले से कुछ समय पहले ही अमेरिकी मीडिया ने फेक खबरें चलाई कि अमेरिका भारतीय नौसैनिक अड्डों का इस्तेमाल कर रहा है, जोकि पूरी तरह से झूठ था। और अब ऐसी ही फर्जी खबरें बनाकर भारत को बदनाम करने की कोशिश ये इकोसिस्टम कर रहा है।

इसे इस उदाहरण से समझें कि कोई मेरा गेस्ट कई दिन पहले ही मेरे घर से रवाना हो चुका है। उसका देश जंग में फंसा है और वो रास्ते में दुश्मन के हाथों मारा जाता है, तो इसमें पूर्व मेजबान का क्या लेना देना? लेकिन नहीं… इसे भारत सरकार को ईरानी-इजरायली युद्ध में घसीटना है, क्योंकि ये भारत की तरक्की देख नहीं पा रहे हैं। सरकार का जनता के साथ मजबूत कनेक्शन नहीं देख पा रहे हैं।

ऐसे में झूठा माहौल खड़ा किया जा रहा है कि भारत अमेरिका-इजरायल जैसे देशों के दबाव में है, जबकि उनकी सरकारों के समय ये दबाव स्पष्ट दिखता था, जिसमें भारत के वीर सैनिकों ने अपना खून बहाकर जंगें जीती और बातचीत की मेजों पर इनकी सरकारों ने वो बढ़त गवाँ दिए।

चलिए, ये पूरा मामला समझाने के लिए आपको विस्तार से हरेक कड़ी के बारे में बताते हैं। इस रिपोर्ट में अंतरराष्ट्रीय फ्लीट रिव्यू 2026 की पृष्ठभूमि, युद्धपोत के डूबने की घटना, ईरानी दावे, अमेरिकी पुष्टि, भारतीय सरकार की प्रतिक्रिया और विपक्ष की बयानबाजी शामिल है। हम यह समझने की कोशिश करेंगे कि कैसे यह कॉन्ग्रेसी-वामपंथी-इस्लामी कट्टरपंथियों का इकोसिस्टम झूठी खबरें फैलाकर भारत को बदनाम करने की कोशिश कर रहा है।

अंतर्राष्ट्रीय फ्लीट रिव्यू 2026 को समझें

यह सब शुरू होता है फरवरी 2026 में विशाखापत्तनम में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय फ्लीट रिव्यू (आईएफआर) 2026 से, जो भारतीय नौसेना द्वारा राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की ओर से आयोजित एक प्रमुख समुद्री कार्यक्रम था। यह आयोजन 15 से 25 फरवरी तक चला और इसका उद्देश्य वैश्विक नौसेनाओं के बीच सहयोग बढ़ाना, समुद्री सुरक्षा को मजबूत करना और भारत की नौसैनिक क्षमताओं का प्रदर्शन करना था।

आईएफआर 2026 में 74 देशों की भागीदारी हुई, जिसमें 66 भारतीय जहाज, भारतीय तटर रक्षक, शिपिंग कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया और नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ ओशन टेक्नोलॉजी के जहाज शामिल थे। विदेशी नौसेनाओं से 19 जहाज और 45 मार्चिंग कंटिंजेंट आए, साथ ही तीन देशों के 60 से अधिक विमान भी भाग लिए।

यह आयोजन पूर्वी नौसेना कमान (ईएनसी) के तहत विशाखापत्तनम में हुआ, जहाँ राष्ट्रपति मुर्मू ने आईएनएस सुमेधा से फ्लीट की समीक्षा की। प्रमुख जहाजों में आईएनएस विक्रांत (भारत का स्वदेशी विमानवाहक पोत), आईएनएस विशाखापत्तनम (विशाखापत्तनम क्लास डिस्ट्रॉयर) और अन्य आधुनिक जहाज शामिल थे। ईरान का युद्धपोत आईआरआईएस डेना भी इस आयोजन में शामिल था, जो एक माउज क्लास फ्रिगेट था।

यह जहाज सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइलों, एंटी-शिप मिसाइलों और टॉरपीडो से लैस (हालाँकि ये साफ है कि किसी एक्सरसाइज में नेवी अपने हथियारों को साथ नहीं रखती, ऐसे में डेना के पास भी हथियार नहीं थे ) हो सकता था और इसमें एक हेलीकॉप्टर भी रखने की क्षमता थी। आयोजन 25 फरवरी को समाप्त हुआ, और सभी भाग लेने वाले देशों की नौसेनाएँ अपने गंतव्यों की ओर रवाना हो गईं।

इस समय तक कोई युद्ध की स्थिति नहीं थी, लेकिन 28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल ने ईरान पर आश्चर्यजनक हमला किया, जिसमें ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई की मौत हो गई। इस हमले ने मध्य पूर्व में संघर्ष को तेज कर दिया और ईरान ने अमेरिकी ठिकानों पर जवाबी हमले शुरू कर दिए।

आईएफआर 2026 न केवल एक सैन्य प्रदर्शन था, बल्कि यह भारत की नौसैनिक कूटनीति का प्रतीक था। आयोजन में भाग लेने वाले जहाजों ने बंगाल की खाड़ी में अभ्यास किया, और यह भारत की ‘सागर’ (सिक्योरिटी एंड ग्रोथ फॉर ऑल इन द रीजन) नीति को मजबूत करने का माध्यम था। लेकिन विपक्ष ने इस आयोजन को भी विवादास्पद बनाने की कोशिश की, खासकर जब आईआरआईएस डेना की घटना हुई।

आईआरआईएस डेना के डूबने से जुड़ी घटनाएँ

आईआरआईएस डेना को बुधवार (4 मार्च 2026) को अमेरिकी वर्जीनिया क्लास परमाणु पनडुब्बी ने हिंद महासागर में अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में टॉरपीडो से मार गिराया। यह घटना श्रीलंका के दक्षिणी तट से करीब 40 किलोमीटर दूर हुई, जो भारतीय क्षेत्र से काफी दूर थी।

जहाज पर सवार कम से कम 87 नाविकों की मौत हो गई, जबकि 32 को बचाया गया और गाले अस्पताल में भर्ती किया गया। दर्जनों अभी भी लापता हैं। अमेरिकी रक्षा सचिव पीट हेगसेथ ने इसकी पुष्टि की और कहा कि यह द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमेरिका द्वारा टॉरपीडो से किसी जहाज को डुबाने की पहली घटना है। उन्होंने इसे ‘साइलेंट डेथ’ करार दिया।

ईरान ने इस हमले पर तीखी प्रतिक्रिया दी। ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराकची ने कहा कि आईआरआईएस डेना ‘भारतीय नौसेना का मेहमान’ था और अमेरिका इसे बिना चेतावनी के मार गिराया। उन्होंने अमेरिका को चेतावनी दी कि ‘अमेरिका इस कायराना हरकत (बिना चेतावनी हमला, वैसे युद्धकाल में कैसी चेतावनी?) का कड़वा अफसोस करेगा।’

ईरान का दावा था कि जहाज आईएफआर 2026 से लौट रहा था, इसलिए यह भारत से जुड़ा था। लेकिन तथ्य बताते हैं कि जहाज 25 फरवरी को विशाखापत्तनम से रवाना हो चुका था और श्रीलंका का चक्कर लगाकर ईरान की ओर जा रहा था। डिस्ट्रेस सिग्नल श्रीलंका की नौसेना को 5:08 बजे सुबह मिला, और बचाव अभियान श्रीलंका ने चलाया।

इस घटना ने मध्य पूर्व में संघर्ष को और तेज कर दिया। ईरान ने इजरायली और अमेरिकी ठिकानों पर नए हमले किए, जबकि इजरायल ने तेहरान पर ‘बड़े पैमाने’ के हमले शुरू किए। वैश्विक स्तर पर यह घटना हिंद महासागर में युद्ध के विस्तार का संकेत थी, जो 2500 नॉटिकल मील दूर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से काफी दूर था।

भारत सरकार की तटस्थता सही, प्रतिक्रिया भी संतुलित, फेक न्यूज की भी खोली पोल

भारतीय सरकार ने इस घटना पर सतर्क रुख अपनाया। सरकारी सूत्रों ने हिंदुस्तान टाइम्स को बताया कि आईआरआईएस डेना और उसके क्रू केवल 16 से 25 फरवरी 2026 तक भारत के मेहमान थे। 28 फरवरी 2026 को युद्ध घोषित होने के बाद जहाज ने भारत से कोई मदद नहीं माँगी। घटना भारतीय क्षेत्र से बाहर अंतरराष्ट्रीय जल में हुई, इसलिए भारत का इससे कोई सीधा लेना-देना नहीं था।

विदेश मंत्रालय की फैक्ट-चेकिंग यूनिट ने अमेरिकी मीडिया की उन खबरों का खंडन किया, जिसमें दावा किया गया कि अमेरिकी नौसेना भारतीय बंदरगाहों का इस्तेमाल ईरान पर हमलों के लिए कर रही है। मंत्रालय ने कहा, “अमेरिकी चैनल ओएएन पर किए जा रहे दावे फेक और झूठे हैं।” यह स्पष्टीकरण सेवानिवृत्त अमेरिकी आर्मी कर्नल डगलस मैकग्रेगर के दावे के जवाब में आया, जिन्होंने कहा था कि अमेरिका मध्य पूर्व में अपने बेस नष्ट होने के बाद भारतीय बंदरगाहों पर निर्भर है।

भारत ने संघर्ष पर तटस्थ रुख अपनाते हुए संवाद और कूटनीति की अपील की। सरकार ने पश्चिम एशिया में रहने वाले करीब 10 मिलियन भारतीयों के हितों की रक्षा पर जोर दिया। यह रुख भारत की स्वतंत्र विदेश नीति को दर्शाता है, जहाँ वह किसी गुट में शामिल नहीं होता।

विपक्ष कर रहा भारत को युद्ध में घसीटने की कोशिश

विपक्ष ने इस घटना को भारत सरकार पर हमला करने का मौका बना लिया। लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गाँधी ने एक्स पर पोस्ट किया, “दुनिया एक अस्थिर चरण में प्रवेश कर चुकी है। आगे तूफानी समुद्र हैं। भारत की तेल आपूर्ति खतरे में है, क्योंकि 40% से अधिक आयात होर्मुज जलडमरूमध्य से होता है। एलपीजी और एलएनजी की स्थिति और भी खराब है। संघर्ष हमारे पिछवाड़े तक पहुँच गया है, जहाँ हिंद महासागर में एक ईरानी युद्धपोत डुबो दिया गया। फिर भी प्रधानमंत्री ने कुछ नहीं कहा। ऐसे समय में हमें पहिये पर मजबूत हाथ की जरूरत है। इसके बजाय भारत के पास एक समझौता करने वाला पीएम है जिसने हमारी रणनीतिक स्वायत्तता को आत्मसमर्पण कर दिया है।”

कॉन्ग्रेस नेता जयराम रमेश ने भी एक्स पर लिखा: “वाशिंगटन की कार्रवाई का भारत के लिए अपार प्रभाव है और यह चौंकाने वाला है कि अब तक डूबने पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है। मोदी सरकार का इस मामले पर कोई आधिकारिक बयान न देना आश्चर्यजनक नहीं होना चाहिए, क्योंकि सरकार ने अभी तक ईरान में टारगेटेड हत्याओं पर अपनी चुप्पी नहीं तोड़ी है, जो ईरानी सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई की हत्या का संदर्भ है। भारतीय सरकार कभी इतनी डरपोक और भयभीत नहीं लगी।”

ये बयान विपक्ष की रणनीति को दर्शाते हैं, जहाँ वे भारत को युद्ध में घसीटने की कोशिश कर रहे हैं। पहले उन्होंने पीएम मोदी की इजरायल यात्रा को निशाना बनाया और इसे ईरान-इजरायल युद्ध में भारत की साजिश बताया। फिर, खामेनेई की मौत पर दुख न जताने और अमेरिका-इजरायल का विरोध न करने पर आलोचना की। अब, आईआरआईएस डेना को ‘भारत का मेहमान’ बताकर अमेरिका के हमले को भारत से जोड़ा जा रहा है।

राहुल गाँधी ने तो यहाँ तक कहा कि ईरानी भारत के मेहमान थे जब उनकी फ्रिगेट मार गिराई गई। लेकिन तथ्य है कि जहाज 25 फरवरी को रवाना हो चुका था, और घटना 4 मार्च को हुई।

फर्जी नरेटिव को आगे बढ़ाने में जुटा वामपंथी इकोसिस्टम

वामपंथी और कट्टर इस्लामी इकोसिस्टम भी इस नरेटिव को बढ़ावा दे रहा है। वे अफवाह फैला रहे हैं कि अमेरिकी नौसेना ने भारत के गेस्ट को मार गिराया, जबकि पनडुब्बियों का काम युद्ध में दुश्मन को खोजकर खत्म करना है। यह सब भारत सरकार को नीचा दिखाने का प्रयास है। उदाहरण के लिए, अगर कोई मेहमान कई दिन पहले घर से रवाना हो चुका है और रास्ते में दुश्मन के हाथों मारा जाता है, तो पूर्व मेजबान का क्या दोष? लेकिन विपक्ष इसे भारत को ईरानी-इजरायली युद्ध में घसीटने का बहाना बना रहा है।

मेजों पर जीते युद्ध गँवाने वाले दे रहे कूटनीति का ज्ञान

यह इकोसिस्टम भारत की तरक्की नहीं देख पा रहा। मोदी सरकार का जनता से मजबूत कनेक्शन उन्हें खटक रहा है। वे दावा कर रहे हैं कि भारत अमेरिका-इजरायल के दबाव में है, जबकि पिछली कॉन्ग्रेस सरकारों में दबाव स्पष्ट था, जहाँ भारतीय सैनिकों ने खून बहाकर जंगें जीतीं, लेकिन बातचीत की मेज पर बढ़त गँवा दी।

चाहे वो लाहौर जीतकर भी ताशकंद में उसे लौटा देना हो, या ढाका से लेकर सियालकोट शहर तक पहुँचकर भी उसे शिमला समझौते में छोड़ देना, जबकि उस समय का नेतृत्व चाहता तो पाकिस्तान को अपनी शर्तों पर घुटने को मजबूत करता और पूरा कश्मीर विवाद खत्म करा सकता था। जबकि इसकी जगह हमने 93 हजार पाकिस्तानी फौजियों को ‘पालने’ की सेवा की।

आम जन को विपक्ष के नरेटिव को समझने की जरूरत

सभी घटनाक्रमों को जोड़ देखने पर ये साफ हो जाता है कि जिन चीजों से भारत का कोई लेना-देना नहीं, उन बातों को लेकर मोदी सरकार को बेवजह घसीटकर भारत के अंदर का माहौल खराब करने की कोशिश की जा रही है। ऐसे में ये साफ है कि राहुल गाँधी और उनके पूरे गैंग बयानबाजी सिर्फ राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश भर है, जो राष्ट्रीय हितों को भी नुकसान पहुँचा सकती है।

यह पूरा मामला दिखाता है कि कैसे विपक्ष भारत को युद्ध में घसीटकर देश को बर्बाद करने की कोशिश कर रहा है। बहलहाल, भारत देश के लोग इतने समझदार हैं कि वो वैश्विक मुद्दों पर राजनीतिक रोटियाँ सेंकने की कोशिश कर रहे विपक्ष की बातों में नहीं ही जाएगी।

हिंदू त्योहारों के इंतजार में बैठे रहते हैं इस्लामी कट्टरपंथी? होली पर देश ही नहीं विदेश में भी हिंदुओं को बनाया गया निशाना: पढ़ें- 8 मामले

हिंदुओं के प्रमुख त्योहारों में से एक होली के अवसर पर देश के अलग-अलग हिस्सों से हिंसा, मारपीट और सांप्रदायिक तनाव की खबरें सामने आई। कहीं होली का त्योहार मना रहे हिंदुओं से मारपीट की गई तो कहीं मस्जिद की दीवारों पर रंग के छीटें पड़ जाने को लेकर इस्लामी कट्टरपंथियों ने बवाल किया।

बिहार, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और यहाँ तक कि ब्रिटेन के लंदन तक कुछ स्थानों पर विवाद बढ़ने से हालात तनावपूर्ण हो गए। हालाँकि अधिकांश स्थानों पर पुलिस और प्रशासन के हस्तक्षेप से स्थिति को नियंत्रित कर लिया गया और एहतियातन सुरक्षा बढ़ा दी गई।

पहले भी हिंदुओं को उनके प्रमुख त्योहारों के दौरान ही निशाना बनाया गया है। आगे ऐसी ही हालिया घटनाओं का विस्तृत विवरण दिया गया है।

मुंगेर में रंग डालने को लेकर हुआ विवाद

बिहार के मुंगेर जिले के आदर्श थाना क्षेत्र स्थित रामपुर कॉलोनी के डोम टोला में होली के दिन रंग-अबीर को लेकर दो समुदायों के बीच तनाव की स्थिति बन गई। होली मना रहे हिंदू युवकों का रंग वहाँ से गुजर रहे कुछ मुस्लिम लोगों पर पड़ गया, जिसके बाद पहले नोकझोंक और फिर बहस शुरू हो गई।

प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, माहौल गर्म होते देख कुछ असामाजिक तत्वों ने स्थिति भड़काने की कोशिश की और पत्थरबाजी की आशंका भी जताई गई। सूचना मिलने पर आदर्श थाना अध्यक्ष पंकज कुमार पासवान पुलिस बल के साथ मौके पर पहुँचे और दोनों पक्षों से बातचीत कर मामला शांत कराया। बाद में SDPO अभिषेक आनंद भी पहुँचे और लोगों से शांति बनाए रखने की अपील की। प्रशासन ने क्षेत्र में पुलिस गश्त बढ़ा दी है।

देहरादून में सब्जी बेचने वाली महिला से सलीम ने की मारपीट

उत्तराखंड की राजधानी देहरादून के कोतवाली नगर क्षेत्र के लक्ष्मण चौक में कुछ मुस्लिम युवकों द्वारा सब्जी बेचने वाली महिला के साथ मारपीट का मामला सामने आया। पीड़िता लक्ष्मी देवी सोनकर के अनुसार एक किशोर फल खरीदकर ले गया और थोड़ी देर बाद लौटकर गाली-गलौज करने लगा।

आरोप है कि उसने फल फेंककर हमला किया, थप्पड़ मारे और जान से मारने की धमकी दी। विरोध करने पर महिला को सड़क की ओर धक्का देकर भाग गया। महिला ने बताया कि आरोपित पहले भी उनकी माता के साथ मारपीट कर चुका है।

पुलिस ने शिकायत के आधार पर शिव नगर कॉलोनी, कांवली रोड निवासी सलीम के खिलाफ मामला दर्ज किया है। घटना के बाद इलाके में तनाव को देखते हुए पुलिस बल तैनात किया गया।

मिर्जापुर में मंदिर की सफाई कर रहे हिंदू व्यक्ति पर हमला

उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिले में विंध्याचल कोतवाली क्षेत्र के रायपुर गाँव में होली के दिन मंदिर की सफाई कर रहे एक व्यक्ति और उसकी माँ पर हमला किया गया। गाँव निवासी अनिल कुमार गुप्ता, जो विहिप और बजरंग दल के विंध्याचल प्रखंड के गो-रक्षा प्रमुख हैं, सुबह प्राचीन शिव मंदिर के आसपास सफाई कर रहे थे।

इसी दौरान कुछ मुस्लिम लोगों ने ईंट-पत्थर और लोहे की रॉड से हमला कर दिया। शोर सुनकर पहुँची उनकी 60 वर्षीय माँ बुधनी देवी को भी पीट दिया गया। पुलिस ने दोनों घायलों को अस्पताल पहुँचाया, हालाँकि हालत गंभीर होने के नाते बाद में मंडलीय अस्पताल रेफर कर दिया गया।

मामले में पुलिस ने अंगूर अली, हसमत अली, सद्दाम अली और नौशाद अली समेत कई लोगों के खिलाफ मामला दर्ज कर आरोपितों को गिरफ्तार कर लिया है। घटना की गंभीरता को देखते हुए एहतियातन गाँव में पुलिस कैंप लगाया गया है।

अनिल गुप्ता ने बताया कि मंदिर के आसपास मकान निर्माण को लेकर कुछ मुस्लिम लगातार अतिक्रमण कर रहे हैं। दो साल पहले उसने प्राचीन मंदिर का जीर्णोद्धार कराया था। तभी से वह लोग मारपीट करने की कोशिश करते रहते हैं। साफ सफाई के लिए भी मंदिर जाने के दौरान वे गाली-गलौज करते हैं।

राजस्थान के टोंक में दो समुदायों के बीच झड़प

राजस्थान के टोंक शहर के पुरानी टोंक थाना क्षेत्र के संघपुरा मोहल्ले में होली की रात मारपीट, झगड़े और पथराव की घटना सामने आई। घटना उस समय हुई जब एक मुस्लिम परिवार नमाज के बाद घर लौट रहा था और पुरानी रंजिश के चलते झगड़ा करने लगा।

घटना के बाद इलाके में तनाव बढ़ गया। हालात को नियंत्रित करने के लिए तीन थानों की पुलिस और RAC के जवानों को तैनात किया गया। DSP मृत्युंजय मिश्रा ने बताया कि स्थिति फिलहाल नियंत्रण में है और लोगों से अफवाहों पर ध्यान न देने की अपील की गई है।

बूंदी में होली जुलूस के दौरान बढ़ा विवाद

राजस्थान के बूंदी जिले के अलोद गाँव में होली जुलूस के दौरान रंग फेंकने की घटना के बाद मुस्लिम पक्ष ने बवाल किया। यहाँ मुस्लिमों ने आरोप लगाया कि हिंदुओं की ओर से जानबूझकर मस्जिद पर काला रंग फेंका गया। सूचना मिलते ही अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक उमा शर्मा के नेतृत्व में भारी पुलिस बल मौके पर पहुँचा और हालात को नियंत्रित किया।

एहतियातन गाँव में पुलिस तैनात कर दी गई है। प्रशासन ने लोगों से अफवाहों से दूर रहने की अपील की है। गाँव में पहले भी रामनवमी जुलूस के दौरान डीजे को लेकर मुस्लिम पक्ष ने हंगामा किया था, जिसके बाद तनाव की स्थिति बनी थी।

गुजरात के भरूच में हिंदू महिलाओं को पूजा करने से रोका

गुजरात के भरूच में विवादित जामा मस्जिद में हिंदू महिलाएँ पूजा-अर्चना करने पहुँची थी, इस दौरान मुस्लिम पक्ष ने बवाल किया और उन्हें रोकने की कोशिश की है। यह विवादित मस्जिद हिंदू-जैन मंदिरों के अवशेषों से बनाई गई है, इसका उल्लेख अलग-अलग स्रोतों में मिलता हैं।

इसका एक वीडियो भी वायरल हो रहा है। वायरल वीडियो में महिलाएँ परिसर में फूल, नारियल और प्रसाद लिए पूजा करती नजर आ रही हैं। मुस्लिमों ने न सिर्फ इसका विरोध किया बल्कि कार्रवाई की भी माँग की। यह विवादित जामा मस्जिद वर्तमान में पुरातत्व विभाग के संरक्षण में है।

संत समाज का दावा है कि यह स्थल मूल रूप से ‘समाली विहार’ जैन मंदिर और चक्रधर स्वामी का जन्मस्थान था।

पंजाब के मोहाली में हिंदुओं के साथ मारपीट

पंजाब के मोहाली के सेक्टर-70 स्थित मटौर गाँव के बाजार में होली के दौरान विवाद का मामला सामने आया। अंबेडकरवादी विरोधी कार्यकर्ता राजेश वाल्मीकि चौहान ने आरोप लगाया कि मस्जिद के पास मतौर गाँव के बाजार में लगभग 15-16  कट्टरपंथियों के एक समूह ने उन पर हमला किया।  

ऑपइंडिया से बात करते हुए राजेश ने बताया कि वह अपने भाई के साथ घर से लौट रहे थे, तभी  उन्होंने कुछ लोगों को सड़क पर हंगामा करते और उत्तर प्रदेश और बिहार से आए उन प्रवासियों पर हमला करते देखा जो होली मना कर अपने घर लौट रहे थे।

राजेश ने आरोप लगाया कि उनके पास लाठी, डंडे भी थे। उन्होंने कहा कि जब उन्होंने उनसे सवाल किया और हमले का विरोध करते हुए कहा कि लोग केवल अपना त्योहार मना रहे थे और इस तरह की हरकतें कानून और संविधान के खिलाफ हैं, तो स्थिति और बिगड़ गई।

लंदन में होली कार्यक्रम के दौरान हमला

ब्रिटेन के लंदन के हैरो इलाके में होली के अवसर पर आयोजित होलिका दहन कार्यक्रम में भी विवाद की घटना सामने आई। ‘इंटरनेशनल सिद्धाश्रम शक्ति केंद्र’ द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम के लिए स्थानीय काउंसिल से अनुमति ली गई थी। कार्यक्रम के दौरान पास की एक मस्जिद से आए कुछ इस्लामी कट्टरपंथियों ने आयोजन में बाधा डाली।

उन्होंने साउंड सिस्टम को गिरा दिया और लोगों को डराने-धमकाने लगे। बाद में वे करीब 20 लोगों के साथ लौटे और श्रद्धालुओं पर दोबारा हमला किया। पुलिस लगभग एक घंटे बाद मौके पर पहुँची और मामले की जाँच शुरू की। कार्यक्रम में दो मेयर, लंदन फायर ब्रिगेड के कमांडर, हैरो काउंसिल के पोर्टफोलियो होल्डर और लेबर ग्रुप के नेता जैसे दिग्गज मौजूद थे।

इतने बड़े नागरिक और राजनीतिक समर्थन के बावजूद कट्टरपंथियों ने बेखौफ होकर इस आयोजन को निशाना बनाया। ब्रिटेन में हिंदू समुदाय अब माँग कर रहा है कि उन्हें भी अन्य समुदायों की तरह सुरक्षा और सम्मान मिलना चाहिए।

पहले भी त्योहारों के मौके पर हिंदुओं को बनाया है निशाना

यह पहली बार नहीं है जब किसी हिंदू त्योहार के आसपास तनाव खड़ा करने की कोशिश हुई हो। पिछले सालों में भी होली के समय हिंदुओं को निशाना बनाकर हिंसा फैलाई जाती रही है। कभी धमकियों से काम चलाया जाता है, तो कभी होली मना रहे हिंदुओं पर सीधा हमला किया जाता है।

हरियाणा के नूहं का नाम बीते कुछ सालों में कई बार तनाव और सांप्रदायिक हिंसा की खबरों के कारण चर्चा में रहा है। खासकर मजहबी जुलूसों के दौरान यहाँ माहौल बिगाड़ने की घटनाएँ सामने आई थीं, जिसके बाद प्रशासन को कर्फ्यू, इंटरनेट बंदी और भारी पुलिस बल की तैनाती जैसे कदम उठाने पड़े थे।

मथुरा की विश्व प्रसिद्ध लट्ठमार और लड्डूमार होली को लेकर सोशल मीडिया पर गलत और भ्रामक जानकारी फैलाने के मामले में उत्तर प्रदेश पुलिस ने 9 यूट्यूबरों और सोशल मीडिया इंफ्लुएंसर्स के खिलाफ FIR दर्ज की है। इन लोगों ने पिछले साल के विवादित वीडियो क्लिप्स को इस साल 2026 की होली से जोड़कर वायरल किए।

इसी तरह साल 2025 की होली में भी माहौल खराब करने का प्रयास किया गया था। उत्तर प्रदेश के बरेली के बारादरी थाना क्षेत्र से 22 फरवरी 2025 को खबर आई थी कि वहाँ कुछ इस्लामी कट्टरपंथियों ने हिंदू युवकों को धमकी दी कि अगर उन्होंने होली मनाई तो उनकी लाशें बिछा दी जाएँगी। जब मामला उठा तो पुलिस ने मामले की जाँच की और इस केस में अयान, सलमान, अमन, रेहान, समेत कई के खिलाफ एक्शन लिया गया।

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में हिंदू छात्रों ने होली मनाने की परमिशन माँगी थी, लेकिन प्रशासन ने ये कहकर साफ इनकार कर दिया कि वो नियमों में बदलाव नहीं करेंगे और जिसे होली मनानी है वो हॉस्टल में रहकर मनाए। हालाँकि, बाद में खबर आई कि वहाँ मशक्कत के बाद हिंदू छात्रों को होली खेलने की परमिशन दी गई।

ऊपर दिए गए उदाहरण केवल कुछ घटनाओं की झलक भर हैं, जबकि वास्तविकता में ऐसी घटनाओं की संख्या कहीं अधिक है। केवल होली ही नहीं, बल्कि कई हिंदू त्योहारों के दौरान भी तनाव या हिंसा की खबरें सामने आती रहती हैं।