मुख्य सलाहकार मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार के बाद अब बांग्लादेश में आखिरकार लोकतांत्रिक सरकार बनने जा रही है। कल यानि गुरुवार (12 फरवरी 2026) को हुए आम चुनाव में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) ने निर्णायक जीत हासिल कर सरकार बनाने जा रही है।
पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया के बेटे तारीक रहमान, जो 17 साल के ब्रिटेन प्रवास के बाद दिसंबर 2025 में अपने देश बांग्लादेश वापस लौटे थे, अब प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने वाले हैं।
300 सदस्यीय जातीय संसद (जातीय संगसद) की 299 में से 297 सीटों के नतीजे आ चुके हैं। ताजा आंकड़ों के अनुसार BNP और उसके सहयोगी दलों ने 210 से अधिक सीटें जीतकर दो-तिहाई बहुमत हासिल कर लिया है।
वहीं, मुख्य विपक्षी गठबंधन, जो जमात-ए-इस्लामी के नेतृत्व में 11 दलों का है, करीब 70 सीटों पर सिमटता दिख रहा है। तारीक रहमान ने ढाका-17 और बोगुरा-6, दोनों सीटों से जीत दर्ज की है और माना जा रहा है कि वह इसी हफ्ते के आखिर तक प्रधानमंत्री पद की शपथ ले सकते हैं। पार्टी ने जश्न मनाने के बजाय देशभर में शुक्रिया अदा करने के लिए दुआ करने की अपील की है, जो दो दशक बाद सत्ता में वापसी का संकेत है।
इन चुनावी नतीजों पर भारत की भी कड़ी नजर है, क्योंकि बांग्लादेश की राजनीतिक स्थिति सीधे तौर पर भारत की सुरक्षा से जुड़ी मानी जाती है। भारत में पहले से ही कुछ हलकों में चिंता जताई जा रही है।
वजह यह है कि BNP का अतीत भारत विरोधी रुख से जुड़ा रहा है। जब खालिदा जिया प्रधानमंत्री थीं, तब उत्तर-पूर्व भारत के अलगाववादी संगठनों, खासकर ULFA को बांग्लादेश में पनाह मिलने के आरोप लगे थे।
2001 से 2006 के कार्यकाल के दौरान बड़े पैमाने पर हथियारों की खेप भारत के लिए भेजे जाने के मामले में भी BNP सरकार पर आंखें मूंदने के आरोप लगे थे। साथ ही उस दौर में अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा और भारत विरोधी बयानबाजी को भी नजरअंदाज किए जाने की बात कही जाती रही है।
भारत और बांग्लादेश के रिश्ते
जब बांग्लादेश में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) की सरकार थी, तब भारत और बांग्लादेश के रिश्ते अपने सबसे खराब दौर में माने जाते हैं। उस समय सीमा पर झड़पें बढ़ीं, तस्करी के मामले सामने आए और सरकार का झुकाव पाकिस्तान की ओर माना गया।
हालात तब बदले जब अवामी लीग ने चुनाव जीता और शेख हसीना प्रधानमंत्री बनीं। उनके कार्यकाल में भारत विरोधी अलगाववादी संगठनों को बांग्लादेश से बाहर निकाल दिया गया, जिसके बाद उन्हें म्यांमार और दूसरे इलाकों में शरण लेनी पड़ी। दोनों देशों के बीच व्यापार भी हसीना सरकार के दौरान काफी बढ़ा।
ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि BNP का दोबारा सत्ता में आना भारत के लिए बहुत अच्छी खबर नहीं है। लेकिन चुनावी नतीजों को देखें तो भारत के नजरिए से यह सबसे बेहतर संभव परिणाम माना जा सकता है। इस चुनाव में असल में सिर्फ दो ही संभावित नतीजे थे और जो नतीजा सामने आया, वह दूसरे विकल्प से कहीं बेहतर है।
भारत की सबसे भरोसेमंद साझेदार रही अवामी लीग को इस बार चुनाव लड़ने से रोक दिया गया था। मुकाबला सिर्फ दो मोर्चों के बीच था, एक तरफ BNP और दूसरी तरफ जमात-ए-इस्लामी के नेतृत्व वाला 11 दलों का गठबंधन।
इस गठबंधन में कई कट्टर इस्लामी विचारधारा वाले दल शामिल हैं, जैसे जमात-ए-इस्लामी, बांग्लादेश खिलाफत मजलिस, खिलाफत मजलिस, बांग्लादेश खिलाफत आंदोलन, निजाम-ए-इस्लाम पार्टी और कुछ छात्र संगठन जो अब नेशनल सिटीजन पार्टी के नाम से सामने आए हैं। इन दलों का मकसद शरिया कानून के आधार पर इस्लामी राज्य की स्थापना बताई जाती है।
जमात-ए-इस्लामी ने 1971 में बांग्लादेश के गठन का विरोध किया था और उस समय पाकिस्तान के साथ खड़ी रही थी, जिस पर नरसंहार के आरोप लगे थे। इस संगठन की विचारधारा लंबे समय से कट्टरपंथी मानी जाती है और उस पर पाकिस्तान के प्रति नरम रुख रखने के आरोप भी लगते रहे हैं।
शेख हसीना सरकार के दौरान इस संगठन पर प्रतिबंध लगा दिया गया था और इसे चुनाव लड़ने की अनुमति नहीं थी। हालाँकि, हसीना सरकार के गिरने के बाद यह प्रतिबंध हटा दिया गया और संगठन फिर से राजनीतिक प्रक्रिया में शामिल हो गया।
अगर जमात-ए-इस्लामी के नेतृत्व में सरकार बनती, तो यह भारत के लिए एक रणनीतिक बुरा सपना साबित होता। इसका मतलब होता कि ढाका खुलकर पाकिस्तान और चीन की ओर झुक जाता।
भारत के साथ लगी खुली और संवेदनशील सीमा के जरिए आतंकी नेटवर्क को बढ़ावा मिल सकता था। हिंदुओं और अन्य अल्पसंख्यकों पर हमलों में बढ़ोतरी की आशंका रहती। पानी बंटवारे जैसे मुद्दों पर विवाद और तेज होते और इंडिया आउट जैसी मुहिम को हवा मिलती। ऐसे हालात में बंगाल की खाड़ी पर चीन की पकड़ और मजबूत होती और पाकिस्तान को भी इस क्षेत्र में गलत तरीके से दखल का मौका मिल जाता।
भारत की पूर्वी सीमा पर कट्टरपंथी इस्लाम का असर बढ़ता, वही ताकतें सक्रिय हो जातीं जो पाकिस्तान में हावी हैं और जिन्होंने अफगानिस्तान और म्यांमार को अस्थिर किया। इसका सीधा असर पश्चिम बंगाल, असम और देश के दूसरे हिस्सों तक महसूस किया जा सकता था।
इसके मुकाबले बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) अलग है। उसमें कई कमियाँ हो सकती हैं, लेकिन वह मजहबी राज्य की वकालत करने वाली पार्टी नहीं, बल्कि खुद को राष्ट्रवादी पार्टी के रूप में पेश करती है।
शासन का अनुभव रखने वाली BNP से यह उम्मीद की जा रही है कि वह व्यावहारिक रुख अपनाएगी और समझेगी कि भारत से अलग-थलग रहकर बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था आगे नहीं बढ़ सकती।
अगर जमात-ए-इस्लामी के नेतृत्व में सरकार बनती, तो यह भारत के लिए एक रणनीतिक बुरा सपना साबित होता। इसका मतलब होता कि ढाका खुलकर पाकिस्तान और चीन की ओर झुक जाता।
भारत के साथ लगी खुली और संवेदनशील सीमा के जरिए आतंकी नेटवर्क को बढ़ावा मिल सकता था। हिंदुओं और अन्य अल्पसंख्यकों पर हमलों में बढ़ोतरी की आशंका रहती। पानी बंटवारे जैसे मुद्दों पर विवाद और तेज होते और इंडिया आउट जैसी मुहिम को हवा मिलती। ऐसे हालात में बंगाल की खाड़ी पर चीन की पकड़ और मजबूत होती और पाकिस्तान को भी इस क्षेत्र में गलत तरीके से दखल का मौका मिल जाता।
भारत की पूर्वी सीमा पर कट्टरपंथी इस्लाम का असर बढ़ता, वही ताकतें सक्रिय हो जातीं जो पाकिस्तान में हावी हैं और जिन्होंने अफगानिस्तान और म्यांमार को अस्थिर किया। इसका सीधा असर पश्चिम बंगाल, असम और देश के दूसरे हिस्सों तक महसूस किया जा सकता था।
इसके मुकाबले बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) अलग है। उसमें कई कमियाँ हो सकती हैं, लेकिन वह मजहबी राज्य की वकालत करने वाली पार्टी नहीं, बल्कि खुद को राष्ट्रवादी पार्टी के रूप में पेश करती है। शासन का अनुभव रखने वाली BNP से यह उम्मीद की जा रही है कि वह व्यावहारिक रुख अपनाएगी और समझेगी कि भारत से अलग-थलग रहकर बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था आगे नहीं बढ़ सकती।
On arrival in Dhaka, met with Mr Tarique Rahman @trahmanbnp, Acting Chairman of BNP and son of former PM of Bangladesh Begum Khaleda Zia.
Handed over to him a personal letter from Prime Minister @narendramodi.
भारत ने साफ संकेत दिया कि भले ही उसने शेख हसीना को शरण दी है, लेकिन वह बांग्लादेश की नई सरकार के साथ काम करने को तैयार है। जैसे ही यह स्पष्ट हुआ कि बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) चुनाव जीतने जा रही है, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आधिकारिक नतीजों का इंतजार किए बिना ही तारीक रहमान और BNP को बधाई दे दी।
यह सही है कि BNP का अतीत भारत के लिए पूरी तरह भरोसेमंद नहीं रहा है, लेकिन मौजूदा हालात में यही नई हकीकत है और दूसरे विकल्प की तुलना में बेहतर भी। दूसरा विकल्प एक इस्लामी गठबंधन था, जो बांग्लादेश को पाकिस्तान-चीन धुरी की ओर ले जा सकता था और भारत के खिलाफ माहौल को और भड़का सकता था।
खास बात यह भी है कि छात्रों द्वारा बनाई गई नेशनल सिटीजन पार्टी (NCP), जिसने हसीना सरकार को हटाने में भूमिका निभाई थी, चुनाव में अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाई। जमात के नेतृत्व वाले गठबंधन का हिस्सा रही NCP ने 30 सीटों पर चुनाव लड़ा, लेकिन सिर्फ 6 सीटें जीत सकी। चूँकि NCP खुलकर भारत विरोधी रुख रखती है, इसलिए उसका कमजोर प्रदर्शन भारत के लिए सकारात्मक माना जा रहा है।
एक और जरूरी बात यह है कि बांग्लादेश के मतदाताओं ने BNP को स्पष्ट और भारी बहुमत दिया है। पार्टी किसी सहयोगी दल पर निर्भर नहीं है। स्थिर और मजबूत BNP सरकार का मतलब है कि सीमा सुरक्षा पर बेहतर तालमेल हो सकता है और तस्करी व घुसपैठ पर सख्ती बढ़ सकती है।
अब भारत-बांग्लादेश संबंध आगे बढ़ सकते हैं। तीस्ता नदी के पानी बंटवारे, भारत-बांग्लादेश-म्यांमार-थाईलैंड हाईवे के जरिए कनेक्टिविटी और द्विपक्षीय व्यापार जैसे मुद्दों पर बातचीत फिर शुरू हो सकती है। यह भी उम्मीद है कि BNP के शासन में ढाका चीन की स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स रणनीति का पूरी तरह हिस्सा नहीं बनेगा।
हालाँकि एक बड़ा सवाल अब भी बना रहेगा शेख हसीना का भारत में रहना। बांग्लादेश के अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायाधिकरण ने उन्हें ‘मानवता के खिलाफ अपराध’ के मामले में मौत की सजा सुनाई है।
अगर BNP सरकार अगर उनके वापस आने पर दबाव बढ़ाती है, तो दोनों देशों के रिश्ते जटिल हो सकते हैं और फैसला भारत के पाले में होगा। चुनाव से पहले BNP समेत कई दलों ने भारत से हसीना को सौंपने की माँग की थी।
फिलहाल नई सरकार के सामने शपथ लेने के बाद कई बड़ी जिम्मेदारियाँ होंगी, इसलिए शेख हसीना का मुद्दा तुरंत प्राथमिकता में नहीं भी हो सकता है। बांग्लादेश के मतदाताओं ने जुलाई चार्टर पर जनमत का समर्थन किया है, जिसके तहत नई सरकार और संसद को पहले 150 दिनों में कई बड़े बदलाव लागू करने होंगे। इसमें एक नया उच्च सदन बनाना और संविधान में कई अहम संशोधन शामिल हैं।
( मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें। )
भारत की आजादी की लड़ाई जिस एक नारे के इर्द-गिर्द लड़ी गई, वह था ‘वंदे मातरम’। यह महज एक गीत नहीं, बल्कि उस समय के क्रांतिकारियों के लिए मौत को गले लगाने का साहस और माँ भारती के प्रति समर्पण का प्रतीक था। लेकिन दुर्भाग्य देखिए, जिस गीत ने देश को एकजुट किया, उसी पर आज ‘मजहबी आजादी’ और ‘इस्लाम’ के नाम पर बवाल काटा जा रहा है।
हाल ही में केंद्र सरकार द्वारा वंदे मातरम के सभी छह छंदों को अनिवार्य करने और इसे राष्ट्रगान के समान सम्मान देने के आदेश ने एक बार फिर उस पुरानी दरार को गहरा कर दिया है, जिसे कभी मोहम्मद अली जिन्ना ने मुस्लिम लीग के जरिए पैदा किया था।
वंदे मातरम का नया प्रोटोकॉल और राष्ट्रभक्ति का पुनरुद्धार
केंद्र सरकार ने ‘वंदे मातरम’ के 150 साल पूरे होने के ऐतिहासिक अवसर पर राष्ट्रगीत के सम्मान को लेकर कड़े दिशानिर्देश जारी किए हैं। गृह मंत्रालय की नई गाइडलाइन के अनुसार, अब सरकारी कार्यक्रमों, स्कूलों और सभी आधिकारिक आयोजनों में इस गीत को बजाना अनिवार्य होगा। अब तक केवल शुरुआती दो अंतरे ही गाए जाते थे, लेकिन अब सभी छह छंदों का गायन अनिवार्य कर दिया गया है, जिसकी कुल अवधि 3 मिनट 10 सेकंड निर्धारित की गई है।
नए नियमों के मुताबिक, यदि राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत एक साथ प्रस्तुत किए जाते हैं, तो पहले ‘वंदे मातरम’ गाया जाएगा और इस दौरान उपस्थित सभी लोगों को सावधान की मुद्रा में खड़ा होना होगा। यह बदलाव केवल एक सरकारी आदेश नहीं है, बल्कि देश के प्रशासनिक ढाँचे में राष्ट्रभक्ति के उस गौरव को पुनर्स्थापित करने का प्रयास है जिसे दशकों से राजनीतिक झिझक के कारण पीछे रखा गया था।
हालाँकि, व्यावहारिक दिक्कतों और अव्यवस्था से बचने के लिए सिनेमाघरों और डॉक्यूमेंट्री फिल्मों के प्रदर्शन के दौरान इसे बजाना अनिवार्य नहीं रखा गया है, ताकि इसकी गरिमा भी बनी रहे और जनता को असुविधा भी न हो।
मजहबी कार्ड और एकेश्वरवाद का तर्क
जैसे ही सरकार ने इस प्रोटोकॉल को सार्वजनिक किया, मुस्लिम संगठनों ने मजहबी स्वतंत्रता की दलीलें देना शुरू कर दिया। जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी का कहना है कि यह आदेश उनकी मजहबी स्वतंत्रता पर हमला है। अरशद मदनी का तर्क है कि मुसलमान सिर्फ अल्लाह की इबादत करता है और इस गीत के कुछ छंद मातृभूमि को ‘देवता’ के रूप में दिखाते हैं, जो इस्लाम के एकेश्वरवाद (एक खुदा) के खिलाफ है।
वहीं, ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) ने तो इस अधिसूचना को ‘गैर-कानूनी’ बताते हुए कोर्ट में चुनौती देने की धमकी दे डाली। विरोधी नेता जैसे शोएब जमई और इमरान मसूद अनुच्छेद 25 (धार्मिक स्वतंत्रता) का हवाला देते हैं। उनका कहना है कि किसी को भी अपनी आस्था के विरुद्ध कुछ गाने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या अपनी मातृभूमि को ‘माँ’ कहना या उसे नमन करना किसी मजहब के खिलाफ हो सकता है?
जिन्ना का वही पुराना एजेंडा: 1937 से आज तक
इतिहास के पन्ने पलटें तो पता चलता है कि ‘वंदे मातरम’ का यह विरोध आज की उपज नहीं है, बल्कि इसकी जड़ें उसी मुस्लिम लीग के एजेंडे में हैं जिसने भारत के टुकड़े किए थे। 1908 में पहली बार मुस्लिम लीग ने इस गीत का विरोध शुरू किया था और 1937 में मुहम्मद अली जिन्ना ने इसे ‘मुस्लिम विरोधी’ घोषित कर दिया था।
उस दौर में तत्कालीन कॉन्ग्रेस नेतृत्व, विशेषकर जवाहरलाल नेहरू ने जिन्ना के कट्टरपंथ के सामने घुटने टेक दिए थे। नेहरू ने खुद नेताजी सुभाष चंद्र बोस को पत्र लिखकर स्वीकार किया था कि वंदे मातरम की भाषा और पृष्ठभूमि मुसलमानों को असहज कर सकती है।
इसी तुष्टीकरण का परिणाम था कि 26 अक्टूबर 1937 को कॉन्ग्रेस ने इस गीत के टुकड़े कर दिए और इसके केवल पहले दो छंदों को ही स्वीकार किया गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में संसद में इसी विश्वासघात का जिक्र करते हुए कहा कि कॉन्ग्रेस ने सत्ता के लिए राष्ट्रगीत के साथ समझौता किया, जिसका अंततः परिणाम देश के विभाजन के रूप में सामने आया।
कट्टरपंथ की गहरी जड़ें और बदलती चुनौतियाँ
आज के दौर में मदनी, ओवैसी और शफीकुर्रहमान बर्क जैसे नेताओं की भाषा में जिन्ना की 1937 वाली सोच की साफ झलक मिलती है। यह विरोध अब केवल व्यक्तिगत बयानों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह संस्थागत रूप ले चुका है।
देवबंद के मदरसों से फतवे जारी होना, बिहार विधानसभा में विधायकों का राष्ट्रगीत के दौरान बहिष्कार करना और संसद के भीतर वंदे मातरम को इस्लाम के खिलाफ बताना यह साबित करता है कि भारत के लोकतंत्र के भीतर भी अलगाववाद की वह खाद-पानी आज भी सक्रिय है।
इतना ही नहीं, ‘दल खालसा’ जैसे कुछ सिख संगठनों का इस विवाद में कूदना और इसे ‘हिंदुत्व थोपने’ की कोशिश बताना यह दर्शाता है कि धार्मिक पहचान को ढाल बनाकर राष्ट्र की एकता को कमजोर करने वाले तत्व एक नया मोर्चा खोलने की कोशिश कर रहे हैं।
वंदे मातरम का गौरवशाली इतिहास
‘वंदे मातरम’ का इतिहास बेहद गौरवशाली है। इसकी रचना बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने 1875 में की थी और बाद में 1882 में यह उनके प्रसिद्ध उपन्यास ‘आनंदमठ’ का हिस्सा बना। इस गीत को सार्वजनिक मंच पर पहली बार 1896 के कॉन्ग्रेस अधिवेशन में रवींद्रनाथ टैगोर ने स्वर दिया था। यह केवल एक गीत नहीं, बल्कि भारतीय क्रांतिकारियों के लिए आजादी का मंत्र बन गया था।
मैडम भीकाजी कामा ने जब विदेशी धरती पर पहली बार भारतीय ध्वज फहराया, तो उस पर ‘वंदे मातरम’ ही अंकित था। लाला लाजपत राय ने इसी नाम से अखबार निकाला और न जाने कितने क्रांतिकारी इसी जयघोष को लगाते हुए हँसते-हँसते फाँसी के फँदे पर झूल गए। इसकी इसी महत्ता को देखते हुए, 24 जनवरी 1950 को डॉ राजेंद्र प्रसाद ने इसे आधिकारिक रूप से राष्ट्रगान (जन गण मन) के समान ही संवैधानिक दर्जा देने की घोषणा की।
सोच का वही पुराना और खतरनाक ढाँचा
यह पूरी स्थिति एक कड़वा और ठोस सच सामने लाती है कि आजादी के सात दशक बीत जाने के बाद भी भारत के भीतर एक ‘मिनी मुस्लिम लीग’ वाली मानसिकता फल-फूल रही है। मुस्लिम लीग की जो बुनियादी सोच 1908 या 1937 में थी कि ‘हमारी मजहबी पहचान राष्ट्र के प्रतीकों से ऊपर है’, वही सोच आज के कट्टरपंथी संगठनों में भी साफ दिखती है।
जब प्रधानमंत्री मोदी ने संसद में खड़े होकर 121 बार ‘वंदे मातरम’ का जयघोष किया, तो वह केवल एक चुनावी संबोधन नहीं था, बल्कि उन ताकतों को सीधा जवाब था जिन्होंने तुष्टीकरण की राजनीति के दम पर राष्ट्रगीत को शर्मिंदगी का विषय बना दिया था।
संविधान के आर्टिकल 25 की दुहाई देकर मजहबी आजादी की बात करने वाले ये लोग अक्सर यह भूल जाते हैं कि जिस मिट्टी ने उन्हें पहचान दी, उसी मिट्टी की वंदना से उन्हें परहेज क्यों है? ‘वंदे मातरम’ का सीधा सा अर्थ है ‘माँ, मैं तुझे नमन करता हूँ’। अगर किसी को अपनी जन्मभूमि को प्रणाम करने में अपना खुदा खतरे में नजर आता है, तो समस्या मजहब में नहीं बल्कि उस कट्टरपंथी व्याख्या में है जो राष्ट्रवाद को मजहब के चश्मे से देखती है।
जिन्ना ने जो विभाजनकारी बीज बोया था, आज की कट्टरपंथी ताकतें उसे ही सींच रही हैं। यह इस बात की पुष्टि करती है कि इन तत्वों की सोच में न तो पहले कोई परिवर्तन आया था और न ही भविष्य में आने की कोई संभावना है, क्योंकि उनकी प्राथमिकता भारत की अखंडता से ज्यादा अपनी संकुचित मजहबी पहचान को बनाए रखने में है।
गुजरात के जूनागढ़ में गिरनार पर्वत की तलहटी में स्थित भावनाथ महादेव मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि हजारों वर्षों से प्रवाहित सनातन चेतना का जीवंत केंद्र है। एक ओर जहाँ गिरनार की पर्वतमाला ऋषि-मुनियों की तपोभूमि रही है, वहीं दूसरी ओर भवनाथ महादेव उस आध्यात्मिक ऊर्जा का ध्रुवतारा हैं, जो इस धरती को शिवमय बनाता है।
महाशिवरात्रि के अवसर पर यहाँ लगने वाला मेला भले ही जनसामान्य को आकर्षित करता हो, पर इस मंदिर का इतिहास, इसकी स्थापत्य शैली और इससे जुड़ी पौराणिक परंपराएँ स्वयं में एक विस्तृत आख्यान हैं। यह स्थान गुजरात के जूनागढ़ से कुछ ही किलोमीटर दूर स्थित है, लेकिन इसका महत्व पूरे देश में फैला हुआ है, विशेषकर महाशिवरात्रि के मेले के दौरान, जिसे ‘मिनी कुंभ’ कहा जाता है।
गिरनार और शैव परंपरा: वैदिक-पौराणिक संदर्भ
गिरनार पर्वत का उल्लेख प्राचीन ग्रंथों में ‘रेवतक’ या ‘रेवताचल’ नाम से मिलता है। स्कंद पुराण के प्रभास खंड में गिरनार क्षेत्र को अत्यंत पवित्र शिवभूमि के रूप में वर्णित किया गया है। शिव पुराण में कहा गया है कि जहाँ-जहाँ तप और संयम की पराकाष्ठा होती है, वहाँ शिव का वास होता है और गिरनार ऐसा ही एक महान तपोस्थल है।
स्थानीय मान्यता के अनुसार, भावनाथ महादेव का शिवलिंग स्वयंभू है, अर्थात इसकी स्थापना किसी मानव ने नहीं की, बल्कि यह स्वयं प्रकट हुआ है। इसी कारण इन्हें ‘भवना नाथ’ अर्थात सृष्टि के स्वामी देवाधिदेव के रूप में पूजा जाता है। गिरनार क्षेत्र जैन, वैष्णव और शैव परंपराओं का संगम रहा है, किंतु यहाँ जो अटूट शैव परंपरा प्रवाहित होती दिखाई देती है, उसका केंद्र भावनाथ महादेव हैं।
भावनाथ मंदिर की कथा स्कंद पुराण के प्रभास खंड और वस्त्रपथ क्षेत्र माहात्म्य में वर्णित है। पुराणों के अनुसार एक बार भगवान शिव कैलास छोड़कर पृथ्वी पर आए और गिरनार (रैवताचल या उज्जयंत पर्वत) को तप के लिए चुना। यह बात माता पार्वती को ज्ञात न होने के कारण वे शिव की खोज में निकल पड़ीं।
देवताओं और पार्वती के तप से प्रसन्न होकर भगवान शिव भवानाथ रूप में स्वयं प्रकट हुए। ऐसी मान्यता है कि यह प्राकट्य वैशाख शुक्ल पूर्णिमा के दिन हुआ। इसके बाद माता पार्वती भी गिरनार में अंबिका रूप धारण कर विराजमान हुईं।
दूसरी प्रसिद्ध कथा के अनुसार, एक बार शिव-पार्वती आकाश मार्ग से रथ में विचरण कर रहे थे, तभी माता पार्वती का दिव्य आभूषण या वस्त्र मृगीकुंड के पास गिर गया। इससे यह क्षेत्र ‘वस्त्रपूत क्षेत्र’ के रूप में पवित्र माना जाने लगा और यहाँ शिवलिंग स्वयंभू रूप में प्रकट हुआ।
स्कंद पुराण में गिरनार को शिव-विष्णु-देवी के संगम स्थल के रूप में बताया गया है। शिव यहाँ तप में लीन हुए, माता पार्वती अंबिका रूप में वास करने लगीं और भगवान विष्णु दामोदर रूप में दामोदर कुंड में निवास करने लगे। इस प्रकार भावनाथ मंदिर एक त्रिवेणी संगम की भाँति है, जहाँ तीनों देवताओं की कृपा एक साथ प्राप्त होती है।
ऐतिहासिक-पौराणिक पृष्ठभूमि
भावनाथ मंदिर का निर्माण मनुष्यों द्वारा नहीं, बल्कि शिव के दैवीय प्राकट्य का परिणाम माना जाता है। इसे पौराणिक काल का मंदिर माना जाता है और कुछ लोकमान्यताओं में इसे महाभारत काल से भी जोड़ा जाता है। यहाँ दो शिवलिंग हैं, एक छोटा स्वयंभू और दूसरा बड़ा, जिसकी स्थापना अमरात्मा अश्वत्थामा द्वारा की गई मानी जाती है।
गिरनार पर्वत को चौरासी सिद्धों का निवास स्थल कहा जाता है। यहाँ नवनाथ, 84 सिद्ध, 64 जोगणियाँ और 52 वीरों के स्थान माने जाते हैं। लोककथाओं के अनुसार अश्वत्थामा, पांडव, गोपीचंद और भरथरी जैसे अमरात्मा महाशिवरात्रि की मध्यरात्रि में मृगीकुंड में स्नान कर भवनाथ के दर्शन के लिए आते हैं और कुंभ मेले में साधु वेश में विचरण करते हैं।
मंदिर के आसपास स्थित स्थल, जैसे सुदर्शन तालाब (अशोककालीन), ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी के हैं, किंतु मंदिर स्वयं इससे भी अधिक प्राचीन माना जाता है। समय के साथ मंदिर का जीर्णोद्धार होता रहा, जिसके परिणामस्वरूप यह 2001 के भूकंप के बाद भी मजबूती से खड़ा है।
इतिहासकारों के अनुसार, वर्तमान संरचना मध्ययुग में निर्मित मानी जाती है। जूनागढ़ क्षेत्र पर मौर्य, गुप्त, चालुक्य (सोलंकी) और बाद में चूड़ासमा राजाओं का शासन रहा। विशेष रूप से 10वीं से 12वीं शताब्दी के दौरान, सोलंकी शासकों द्वारा गुजरात में कई शिव मंदिरों का निर्माण किया गया था।
भावनाथ मंदिर की स्थापत्य शैली भी सोलंकी काल की झलक देती है, विशेष रूप से पत्थर की नक्काशी और गर्भगृह की बनावट में। हालाँकि उपलब्ध अभिलेख सीमित हैं, लेकिन स्थानीय परंपरा और क्षेत्रीय इतिहासकारों का मानना है कि मंदिर का मूल स्वरूप प्राचीन है, जो विभिन्न अवधियों में किए गए जीर्णोद्धार के माध्यम से संरक्षित रहा है।
स्थापत्य शैली
भावनाथ महादेव मंदिर की स्थापत्य शैली अत्यधिक अलंकरण नहीं, बल्कि तप और साधना की गंभीरता को दर्शाती है। गर्भगृह अपेक्षाकृत छोटा है, जहाँ शिवलिंग स्थापित है। मंदिर का शिखर पारंपरिक नागर शैली में निर्मित है। पत्थर की सादी संरचना, सीमित अलंकरण और प्राकृतिक परिवेश से सामंजस्य इसकी प्रमुख विशेषता है। यहाँ वास्तुकला का उद्देश्य केवल सुंदरता ही नहीं, बल्कि आध्यात्मिक एकाग्रता भी है, मानो पूरी संरचना साधक को अपने भीतर की यात्रा करने के लिए प्रेरित करती हो।
नागा साधु परंपरा और आध्यात्मिक रहस्य
भावनाथ महादेव का नाम लेते ही महाशिवरात्रि की मध्यरात्रि में निकलने वाली नागा साधुओं की ‘रवाड़ी’ स्मरण हो आती है। नागा सन्यासी इस स्थान को विशेष आध्यात्मिक शक्ति का केंद्र मानते हैं। मान्यता है कि इस रात स्वयं भगवान शिव गिरनार क्षेत्र में विचरण करते हैं।
यह परंपरा केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सनातन संन्यास परंपरा की निरंतर बहती धारा का प्रतीक है। जूनागढ़ की सांस्कृतिक पहचान में भवनाथ महादेव का स्थान केंद्रीय है। यहाँ केवल पूजा-अर्चना ही नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक संवाद भी होता है।
सदियों से यह स्थल साधकों, यात्रियों और संतों का मिलन केंद्र रहा है। गिरनार की तलहटी में स्थित यह मंदिर आज भी उतना ही जीवंत है, जितना सैकड़ों वर्ष पहले था। जब हम भावनाथ महादेव की ओर देखते हैं, तो हमें केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि वेदों की ऋचाओं से लेकर पुराणों की कथाओं तक फैली एक जीवंत परंपरा दिखाई देती है।
यह मंदिर दर्शाता है कि भारत की आध्यात्मिकता केवल ग्रंथों तक सीमित नहीं, बल्कि भूगोल में भी अंकित है। गिरनार के शिखरों से टकराती हवाएँ आज भी वही संदेश दोहराती प्रतीत होती हैं, शिव शाश्वत हैं और उनकी परंपरा भी। भावनाथ महादेव अडिग, शांत और अनंत इसी शाश्वतता के साक्षात प्रतीक हैं।
यह रिपोर्ट मूल रुप से गुजराती में भार्गव राज्यगुरु ने लिखी है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।
सुप्रीम कोर्ट ने 9 नवंबर 2019 को राम जन्मभूमि विवाद के अंतिम फैसले के साथ दशकों पुराने विवाद को समाप्त कर दिया। लेकिन इसके बावजूद देश में आज भी मुगलिता आताताइयों से जुड़े ऐतिहासिक जख्मों को राजनीतिक लाभ के लिए भुनाने की कोशिशें जारी हैं, जिन्हें तथाकथित ‘सेक्युलरिज़्म’ की आड़ में आगे बढ़ाया जा रहा है।
इसी कड़ी में, पश्चिम बंगाल के भारतपुर से निलंबित ऑल इंडिया तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) विधायक हुमायूँ कबीर, जिन्होंने हाल ही में जनता उन्नयन पार्टी (JUP) की स्थापना की है, मजहबी ध्रुवीकरण और मुस्लिम वोट बैंक की राजनीति को हवा देने में जुटे हुए हैं।
हुमायूँ कबीर ने अयोध्या में ढाँचे के ध्वंस की तर्ज पर बाबर के नाम पर एक मस्जिद बनाने की घोषणा कर सांप्रदायिक तनाव भड़काने का प्रयास किया है। 6 दिसंबर 2025 को मस्जिद की आधारशिला रखी गई, जिसके तुरंत बाद उन्होंने अपनी नई राजनीतिक पार्टी भी लॉन्च की।
शहर में एक नई ‘बाबरी मस्जिद’
पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले के बेलडांगा इलाके में बुधवार (11 फरवरी 2026) को हुमायूँ कबीर ने ‘बाबरी मस्जिद’ जैसी दिखने वाली एक नई मस्जिद का निर्माण कार्य शुरू कर दिया।
हुमायूँ कबीर के अनुसार, इस परियोजना को दो सालों में पूरा किया जाएगा और इसके निर्माण पर लगभग 50 से 55 करोड़ रुपए का खर्च आएगा। दोपहर के समय ईंट-चिनाई का काम शुरू हुआ, जिसमें हजारों मुस्लिम लोगों ने हिस्सा लिया और निर्माण में सहयोग किया।
इस दौरान हुमायूँ कबीर ने अपने विरोधियों को निशाने पर लेते हुए कहा कि जो लोग इस परियोजना का विरोध कर रहे हैं, वे रास्ते से हट जाएँ। उन्होंने दावा किया कि लोग अपने-अपने धर्मों के अनुसार मंदिर, चर्च या अन्य धार्मिक स्थल बनाने के लिए स्वतंत्र हैं और वह इस्लाम के नाम पर किसी का विरोध नहीं करेंगे। उन्होंने इसे अल्लाह को प्रसन्न करने और अपनी मजहबी आस्था निभाने का प्रयास बताया।
हालाँकि आलोचकों का कहना है कि मुद्दा मस्जिद के निर्माण का नहीं, बल्कि एक पहले से सुलझ चुके विवाद को दोबारा भड़काने और वोट बैंक की राजनीति के तहत सांप्रदायिक तनाव फैलाने की कोशिश का है। आरोप है कि यह कदम मजहबी भावनाओं को भड़काकर राजनीतिक लाभ हासिल करने की रणनीति का हिस्सा है।
कुछ समय तक संयमित रुख अपनाने के बाद हुमायूँ कबीर ने जल्द ही अपना आक्रामक और विवादास्पद चेहरा दिखा दिया। उन्होंने स्पष्ट चेतावनी देते हुए कहा, “दुनिया की कोई ताकत इस मस्जिद के निर्माण को नहीं रोक सकती। अल्लाह की मेहरबानी से हम दो साल के भीतर इसका निर्माण पूरा करेंगे। इस पर 50–55 करोड़ रुपए की लागत आएगी।”
इसके बाद जनता उन्नयन पार्टी (JUP) के प्रमुख हुमायूँ कबीर ने घोषणा की कि वह फिलहाल अपनी प्रस्तावित ‘बाबरी यात्रा’ को स्थगित कर रहे हैं। यह यात्रा नदिया जिले के पलाशी से उत्तर दिनाजपुर के इटाहार तक लगभग 235 किलोमीटर लंबी रैली के रूप में आयोजित की जानी थी। उन्होंने बताया कि बोर्ड परीक्षाओं को ध्यान में रखते हुए यह निर्णय लिया गया है।
हुमायूँ कबीर ने कहा, “मालदा पुलिस ने मुझे सूचित किया कि बाबरी यात्रा से माध्यमिक परीक्षा देने वाले छात्रों को असुविधा होगी। इसलिए मैंने 100 गाड़ियों के काफिले के साथ होने वाली इस यात्रा को स्थगित करने का फैसला किया है। इसके बजाय, मैं पलाशी से बेलडांगा जहाँ मस्जिद का निर्माण हो रहा है, तक 50,000 लोगों के साथ पैदल मार्च करूँगा।”
उन्होंने आगे दावा किया कि मस्जिद के मुद्दे पर उन्हें निलंबित करने के कारण पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को मुस्लिम वोटों का नुकसान होगा। हुमायूँ कबीर ने आरोप लगाया कि “ममता बनर्जी ने झूठे वादों के जरिए मुसलमानों को अपना वोट बैंक बनाया है, लेकिन अब अल्पसंख्यक उनकी सच्चाई समझ चुके हैं। उन्होंने मुझे केवल इसलिए निलंबित किया क्योंकि मैंने जनता के समर्थन से बाबरी मस्जिद स्थापित करने की घोषणा की थी।”
हुमायूँ कबीर ने दावा किया कि 2026 में ममता बनर्जी मुख्यमंत्री नहीं रहेंगी और यह मुद्दा उनके राजनीतिक भविष्य को नुकसान पहुँचाएगा। उन्होंने कहा, “अगर मैं TMC में बना रहता, तो पार्टी को मस्जिद के निर्माण से फायदा होता और उन्हें और ज्यादा वोट मिलते।”
इसके साथ ही, हुमायूँ कबीर ने इस कदम के पीछे की असली राजनीतिक मंशा को सामने लाते हुए कहा कि भारतीय जनता पार्टी (BJP) राम मंदिर के निर्माण से राजनीतिक लाभ उठा रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि BJP सनातनी मतदाताओं के समर्थन को मजबूत कर पश्चिम बंगाल में अपना वोट बैंक बढ़ा रही है, और वह इस राजनीतिक विस्तार को किसी भी कीमत पर सफल नहीं होने देंगे।
यह बयान इस पूरे विवाद को मजहबी भावना से ज्यादा राजनीतिक रणनीति और वोट बैंक की लड़ाई के रूप में सामने लाता है, जहाँ मजहबी प्रतीकों का इस्तेमाल चुनावी फायदे के लिए किया जा रहा है।
एक ही सिक्के के दो पहलू
हुमायूँ कबीर, जिन्होंने अपनी राजनीतिक यात्रा भारतीय राष्ट्रीय कॉन्ग्रेस (कॉन्ग्रेस) से शुरू की थी, अपने विवादास्पद और भड़काऊ बयानों के लिए कुख्यात रहे हैं। उन पर विपक्ष के नेता सुवेंदु अधिकारी को धमकाने और हिंदुओं को भागीरथी नदी में डुबोने की धमकी देने जैसे गंभीर आरोप रहे हैं। उन्होंने यहाँ तक दावा किया था कि मुर्शिदाबाद में मुस्लिम आबादी 70% और हिंदू केवल 30% हैं और इसी आधार पर उन्होंने खुलेआम हिंदू विरोधी बयान दिए।
गौरतलब है कि मुर्शिदाबाद पहले ही इस्लामी कट्टरपंथियों द्वारा हिंदुओं पर हुए हिंसक हमलों का गवाह रहा है, जिससे क्षेत्र में सांप्रदायिक तनाव और असुरक्षा की स्थिति बनी हुई है।
बाद में हुमायूँ कबीर ने यह भी दावा किया कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने ही उन्हें ऐसे सांप्रदायिक बयान देने के लिए प्रेरित किया था, ताकि 2024 लोकसभा चुनाव में पूर्व क्रिकेटर और TMC उम्मीदवार यूसुफ पठान की जीत सुनिश्चित की जा सके।
उनका खुलेआम हिंदू विरोधी रवैया और आक्रामक राजनीतिक व्यवहार भी उनके राजनीतिक करियर पर कोई खास असर नहीं डाल सका। इसके उलट, वह TMC का अहम हिस्सा बने रहे और मुस्लिम वोट बैंक को मजबूत करने में सक्रिय भूमिका निभाते रहे।
अगर हुमायूँ की बातों को अगर सच माना जाए, तो TMC सुप्रीमो उनके विवादित कमेंट्स के पीछे थीं। इससे भी जरूरी बात यह है कि उन्होंने जिहादी एलिमेंट्स समेत मुसलमानों के प्रति अपनी तरफदारी दिखाने में कभी हिचकिचाहट नहीं दिखाई, इस बात को नज़रअंदाज़ करते हुए कि वह पूरे राज्य की मुख्यमंत्री हैं, न कि सिर्फ़ किसी खास कम्युनिटी की।
मुस्लिम वोटों की भूख इतनी ज्यादा है कि यह बंगाल की सीमाओं से बाहर निकलकर बांग्लादेशी घुसपैठियों तक पहुँच गई है, जिन्हें न सिर्फ अपनाया जा रहा है बल्कि उनकी सरकार उनकी मदद भी कर रही है। यह साफ है कि मुस्लिम तुष्टिकरण के मामले में ये दोनों नेता एक जैसे हैं।
आगामी राज्य विधानसभा चुनाव के लिए एक चालाक रणनीति
हुमायूँ कबीर और तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) नेतृत्व के बीच सालों से टकराव और मनमुटाव रहे हैं, लेकिन सत्ता में बने रहने के लिए मुस्लिम वोट बैंक को साधने का साझा लक्ष्य दोनों को बार-बार एक साथ जोड़ता रहा है। भले ही पहले उन्हें पार्टी से निकाला गया हो, वह हर बार किसी न किसी रास्ते से TMC में लौट आए और फिर स्वीकार कर लिए गए।
ऐसे में संभावना जताई जा रही है कि राज्य विधानसभा चुनाव से पहले ‘बाबरी’ मस्जिद के मुद्दे के जरिए मुस्लिम वोटों को मजबूत करने के बाद हुमायूँ कबीर दोबारा TMC में वापसी कर सकते हैं।
दोनों पक्षों के पुराने रिकॉर्ड यह संकेत देते हैं कि उनके बीच कोई गहरा वैचारिक मतभेद नहीं है, बल्कि यह पूरा विवाद राजनीतिक रणनीति और नाटक से ज्यादा कुछ नहीं हो सकता। ऐसे में सवाल उठता है कि अगर वह अपना राजनीतिक उद्देश्य पूरा कर लें, तो TMC में लौटने से उन्हें आखिर रोकेगा ही क्या?
इस पूरे मामले पर बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष शमिक भट्टाचार्य ने TMC और हुमायूँ कबीर पर एक गुप्त राजनीतिक साजिश का आरोप लगाया। उन्होंने कहा, “हुमायूँ कबीर कौन है? वह अब भी TMC के साथ है। यह उनकी प्लान-बी रणनीति है। TMC पिछले दरवाजे से मुस्लिम वोट हासिल करने की कोशिश कर रही है और उन्हें डिप्टी चीफ मिनिस्टर बनाने की योजना है। जिस तरह एक बार क्षेत्र का विभाजन हुआ और पश्चिम बंगाल बना, अब इसे बांग्लादेश जैसा बनाया जा रहा है, पूरे माहौल को ‘मिनी पाकिस्तान’ में बदला जा रहा है। इसके खिलाफ देश के सभी हिंदुओं को एकजुट होना चाहिए।”
बीजेपी का दावा है कि TMC और हुमायूँ कबीर द्वारा रची गई इस साजिश को पार्टी ने पहचान लिया है। खुद हुमायूँ कबीर के बयानों से भी संकेत मिलता है कि यह मस्जिद हिंदुओं के राजनीतिक एकीकरण के जवाब के तौर पर बनाई जा रही है, जिससे यह संदेह और गहरा होता है कि यह पूरा कदम मुस्लिम वोट बैंक को बढ़ाने और जनता को भ्रमित करने की एक सुनियोजित रणनीति है।
हिंदू एकता का डर
2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद देशभर में एक मजबूत भगवा लहर देखी गई और पश्चिम बंगाल भी इससे अछूता नहीं रहा। पिछले कुछ सालों में राज्य में हिंदू पहचान का उल्लेखनीय पुनरुत्थान हुआ है, जिसका प्रमाण यह है कि भाजपा ने विधानसभा और लोकसभा चुनावों में बड़ी संख्या में सीटें हासिल की हैं।
स्वाभाविक रूप से, यह बदलाव तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) और हुमायूँ कबीर जैसे नेताओं के लिए चुनौती बन गया, जो लंबे समय से खुद को मुस्लिम समुदाय के पैरोकार के रूप में प्रस्तुत करते रहे हैं।
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने एक बार मुसलमानों को खुश करने की अपनी नीति को लेकर विवादित बयान देते हुए कहा था, “जे गोरु दूध देय, तार लाठी खेते राजी आछी” (जो गाय दूध देती है, उसके लात मारने पर भी मैं तैयार हूँ) यह बयान उनके खुले मुस्लिम तुष्टिकरण के रूप में देखा गया।
हालाँकि, आलोचकों का कहना है कि कट्टरपंथी तत्वों ने केवल TMC सरकार ही नहीं, बल्कि पूरे राज्य, खासकर हिंदू समुदाय को भी नुकसान पहुँचाया है। इसके अलावा, घटनाओं की एक श्रृंखला ने हिंदू समाज में असुरक्षा और अलगाव की भावना को बढ़ाया, जिससे वे एकजुट होकर किसी राजनीतिक विकल्प की तलाश में आगे आए।
यहीं पर भाजपा ने हस्तक्षेप किया पीड़ितों का समर्थन किया, न्याय की माँग उठाई और खुलकर TMC का विरोध किया। इसके कारण हिंदू समुदाय को भाजपा में एक नई उम्मीद दिखाई देने लगी, जो TMC के लिए चिंता का कारण बन गई।
इसी राजनीतिक दबाव के चलते, TMC ने अपने चर्चित मुस्लिम चेहरे से दूरी बनाने जैसे राजनीतिक हथकंडे अपनाने शुरू कर दिए, ताकि बदलते समीकरणों और बढ़ती हिंदू एकजुटता से निपटा जा सके।
TMC सरकार के मुसलमानों के प्रति पक्षपाती लगाव ने हिंदू एकता को बढ़ावा दिया
तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) की मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति उस समय खुलकर सामने आई, जब उसने अपने दबंग नेता शेख शाहजहाँ को बचाने का प्रयास किया। शेख शाहजहाँ एक कुख्यात अपराधी रहा है, जिस पर प्रवर्तन निदेशालय (ED) के अधिकारियों पर हमले, जमीन हड़पने, और संदेशखाली में हिंदू महिलाओं के साथ बलात्कार जैसे गंभीर आरोप लगे हैं।
शेख शाहजहाँ पर आरोप है कि वह लगातार हिंदुओं पर अत्याचार करता रहा, लेकिन इसके बावजूद TMC ने न केवल उसे सजा देने से परहेज किया, बल्कि उसके आपराधिक नेटवर्क को फलने-फूलने में मदद भी की। बाद में जब उसके अपराध सार्वजनिक रूप से उजागर हुए, तो TMC सरकार ने पहले उसकी गिरफ्तारी से बचने के लिए हरसंभव प्रयास किए, लेकिन जनता भाजपा और न्यायपालिका के दबाव के चलते आखिरकार कार्रवाई करने पर मजबूर होना पड़ा।
इसके बाद भी सरकार ने उसे कानून से बचाने के लिए हर तरह की रणनीति अपनाई और उसकी निर्दोषता का दावा करती रही। अपने नेता के समर्थन में सरकार इतनी आगे बढ़ गई कि कलकत्ता हाईकोर्ट को TMC सरकार की कड़ी आलोचना करनी पड़ी, खासकर अपराधी को संरक्षण देने और स्थानीय लोगों को डराने-धमकाने के मामलों को लेकर।
तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) सरकार पर बार-बार यह आरोप लगता रहा है कि वह अपराधी और कट्टरपंथी मुस्लिम तत्वों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने में नाकाम रही है। नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के विरोध और वक्फ संशोधन अधिनियम को खारिज करने के नाम पर हुई हिंसक घटनाओं के दौरान मुस्लिम भीड़ को हिंदुओं पर हमले करने का खुला अवसर मिला, जबकि सरकार मूकदर्शक बनी रही।
पिछले साल मुर्शिदाबाद में हुई हिंसा के दौरान प्रशासन पर गंभीर लापरवाही के आरोप लगे, जब संकट में फंसे हिंदुओं की बार-बार की गई मदद की अपीलों को नजरअंदाज कर दिया गया। आरोप है कि एक TMC पार्षद ने लक्षित हमलों में अहम भूमिका निभाई, जिसमें हाशिए पर पड़े हिंदू परिवारों के घर जला दिए गए, जिससे उन्हें महिलाओं और बच्चों के साथ घर छोड़कर भागने पर मजबूर होना पड़ा।
जैसा कि पहले भी देखा गया है, ममता बनर्जी का मुस्लिम तुष्टिकरण केवल बंगाल या भारत तक सीमित नहीं है। CAA, NRC और स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) जैसे कदमों का उनका विरोध बार-बार अवैध मुस्लिम घुसपैठियों के समर्थन के रूप में देखा गया है। उन पर आरोप है कि वह देश में अवैध रूप से रह रहे लोगों को न केवल संरक्षण देती हैं, बल्कि उनके कथित मताधिकार के लिए भी लड़ रही हैं, जो लोकतंत्र और संविधान की भावना के खिलाफ माना जाता है।
इससे अलग, बांग्लादेश में अल्पसंख्यक हिंदुओं पर हो रहे अत्याचारों को लेकर ममता बनर्जी की संवेदनहीनता भी सवालों के घेरे में रही है। वहाँ हिंदुओं के समर्थन में निकाले गए एक शांतिपूर्ण मार्च पर उनकी पुलिस द्वारा की गई कठोर कार्रवाई ने बड़े अस्तर पर आलोचना को जन्म दिया।
हालाँकि उदारवादी खेमे में ममता बनर्जी को एक नारीवादी आइकन के रूप में पेश किया जाता है, लेकिन हिंदू महिलाओं के खिलाफ अपराधों पर उनका रवैया उदासीन और असंवेदनशील रहा है। संदेशखाली और आरजी कर मेडिकल कॉलेज जैसे मामलों में बलात्कार और हत्या पीड़ितों के परिवारों ने जाँच पर असंतोष जताया, जिससे सरकार की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े हुए।
ममता बनर्जी अपने विवादित बयानों के लिए भी जानी जाती हैं, जिनमें उन्होंने बलात्कार जैसे जघन्य अपराधों को हल्के में लेते हुए लड़कियों को घर में रहने की सलाह तक दी है। इन मामलों में भी उनकी सरकार की जाँच प्रक्रिया को कमजोर और लापरवाह बताया गया है।
विश्लेषकों का मानना है कि ये घटनाएँ केवल बड़े संकट की एक झलक हैं, क्योंकि TMC और ममता बनर्जी की मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति हिंदुओं की सुरक्षा, सम्मान और अधिकारों की कीमत ने राज्य में हिंदू मतदाताओं को एकजुट करने में बड़ी भूमिका निभाई है। यही कारण है कि पश्चिम बंगाल में भाजपा एक मजबूत राजनीतिक शक्ति के रूप में उभरकर सामने आई है।
निष्कर्ष
मौजूदा हालात और राज्य में नजदीक आते अहम चुनाव को देखते हुए यह संभावना जताई जा रही है कि तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) और हुमायूँ कबीर ने मुस्लिम वोट बैंक को मजबूत करने के लिए आपसी तालमेल बना लिया है, जिसमें प्रस्तावित मस्जिद एक रणनीतिक और राजनीतिक आधार की भूमिका निभा रही है।
कयास लगाए जा रहे हैं कि ममता बनर्जी ने हुमायूँ कबीर को सार्वजनिक रूप से पार्टी से दूर दिखाकर अपनी कमजोर पड़ती ‘सेक्युलर’ छवि बचाने और हिंदू मतदाताओं को भ्रमित करने की कोशिश की। लेकिन अंदरखाने दोनों के बीच मिलीभगत जारी हो सकती है, क्योंकि ममता को आशंका है कि हिंदू मतदाताओं के एकजुट होने के चलते भाजपा उनकी पार्टी को बड़ा राजनीतिक झटका दे सकती है।
ऐसे में TMC और हुमायूँ कबीर के बीच दिखाई जा रही मौजूदा तनातनी और एक-दूसरे के खिलाफ दिए जा रहे तीखे बयान महज एक सोची-समझी चुनावी रणनीति का हिस्सा हो सकते हैं। यह टकराव वोटरों को गुमराह करने और राजनीतिक समीकरण साधने का एक नाटक भी माना जा रहा है, जिसका उद्देश्य मुस्लिम समर्थन बनाए रखना और हिंदू मतदाताओं को बाँटकर भ्रम में रखना हो सकता है।
(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)
दिल्ली के पीरागढ़ी फ्लाईओवर पर बुधवार (11 फरवरी 2026) एक कार में तीन शव मिलने का मामला सामने आया है। पुलिस ने इस मिस्ट्री को सुलझाने का दावा करते हुए ‘आलिम करीमुद्दीन’ को गिरफ्तार किया गया।
जाँच में सामने आया है कि यह लोगों को झाड़-फूँक के जरिए पैसे दोगुने करने का लालच देता था। मरने वाले तीनों लोग रणधीर, शिव नरेश और लक्ष्मी देवी इसी झाँसे में आकर उसके संपर्क में आए थे।
CCTV फुटेज में आलिम करीमुद्दीन को वारदात वाले दिन कार की अगली सीट पर बैठा देखा गया है। पुलिस के अनुसार, वह काफी देर तक उसी सफेद टाटा टिएगो कार में मौजूद था, जिसमें बाद में तीनों के शव मिले।
हालाँकि शवों पर चोट के कोई साफ निशान नहीं थे, जिससे यह मामला शुरू में उलझा हुआ लग रहा था। अब पुलिस यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि कार के अंदर ऐसा क्या हुआ जिससे तीनों की जान चली गई, क्या उन्हें कोई जहरीली चीज दी गई या दम घोंटा गया या कोई और तरीका अपनाया गया।
कमरुद्दीन पहले भी 2025 में यूपी में इसी तरह हत्या के आरोप में पकड़ा जा चुका है। उस केस में उसे दो बार जमानत नहीं मिली थी और तरीका भी वही था, धोखे से जहर देकर हत्या। जिसके बाद हम अगर मेन स्ट्रीम मीडिया ने जब इस खबर की जानकारी दी तब आलिम करीमुद्दीन को बाबा कह कर खबर को चलाया।
सवाल सिर्फ अपराध का नहीं, मीडिया की पहचान की भाषा का भी है
अगर इस खबर को ध्यान से पढ़ा जाए, तो साफ पता चलता है कि आरोपित एक मुस्लिम पीर या आलिम है। लेकिन इसके बावजूद कई मीडिया हाउस उसे ‘बाबा’, ‘तांत्रिक’ या ‘साधु’ जैसे शब्दों से संबोधित कर रहे हैं।
(फोटो साभार – द वीक)
ये शब्द आम तौर पर हिंदू धार्मिक परंपरा से जुड़े माने जाते हैं। जब कोई मीडिया हाउस किसी मुस्लिम आरोपित को ‘बाबा’ या ‘साधु’ कहता है, तो पाठकों और दर्शकों के मन में सबसे पहले एक हिंदू बाबा की छवि उभरती है।
यह न सिर्फ भ्रामक है, बल्कि एक पूरे समुदाय और धर्म की छवि को गलत तरीके से पेश करने जैसा भी है। यहाँ सवाल यह है की क्या यह सिर्फ लापरवाही है या सोच-समझकर की गई भाषा की हेराफेरी?
पहचान छुपा कर फैलाया जाता है भ्रम
अगर कोई मुस्लिम व्यक्ति किसी cमें अपराध करता है, तो उसे सही शब्दों में पहचाना जाना चाहिए, जैसे ‘पीर’, ‘मौलवी’ या ‘आलिम’। लेकिन कई बड़े मीडिया हाउस बार-बार उसे ‘बाबा’ या ‘तांत्रिक’ जैसे शब्दों से संबोधित करते हैं, जो सीधे तौर पर हिंदू धार्मिक पहचान से जुड़े हैं।
(फोटो साभार – जागरण)
इसका नतीजा यह होता है कि आम जनता के मन में यह धारणा बनती है कि यह अपराध किसी हिंदू साधु या बाबा ने किया है। धीरे-धीरे इससे हिंदू बाबाओं और हिंदू धर्म के प्रति गलत और नकारात्मक छवि बनने लगती है। एक पत्रकार के तौर पर यह बेहद गैर-जिम्मेदाराना रवैया है। मीडिया का काम सच्चाई दिखाना है न कि पहचान को तोड़-मरोड़कर पेश करना।
ऑपइंडिया का स्टैंड और बाकी मीडिया से फर्क
इस मामले में ऑपइंडिया ने अपना स्टैंड साफ रखा है। ऑपइंडिया ने मजहबी पहचान को सही संदर्भ में रखा और यह स्पष्ट किया कि आरोपित एक मुस्लिम पीर या आलिम है, न कि कोई हिंदू साधु या बाबा।
ऑपइंडिया का यह रुख इसलिए अहम है क्योंकि यह दिखाता है कि अगर मीडिया चाहे, तो तथ्यों के साथ ईमानदारी रख सकता है। इसके अलग, कई अन्य मीडिया हाउस सुविधा के हिसाब से शब्दों का चुनाव करते हैं, जहाँ मुस्लिम आरोपित को भी ‘बाबा’ या ‘तांत्रिक’ कहकर पेश किया जाता है, जिससे असल पहचान धुंधली हो जाती है।
यह न सिर्फ पत्रकारिता की नैतिकता के खिलाफ है, बल्कि यह समाज में गलत धारणाएँ फैलाने का भी एक तरीका बन जाता है।
अपराध से ज्यादा खतरनाक है भाषा का गलत इस्तेमाल
इस केस में असली मुद्दा सिर्फ यह नहीं है कि तीन लोगों की मौत कैसे हुई, बल्कि यह भी है कि मीडिया इस खबर को किस नजरिए से पेश कर रहा है। अगर हर बार मुस्लिम आरोपित को हिंदू धार्मिक शब्दों से संबोधित किया जाएगा, तो इसका सीधा असर समाज की सोच पर पड़ेगा।
(फोटो साभार – एनडीटीवी)
लोगों के मन में यह बैठने लगेगा कि धोखाधड़ी, तंत्र-मंत्र और अंधविश्वास सिर्फ हिंदू बाबाओं से जुड़े हैं, जबकि हकीकत यह है कि ऐसे अपराध हर मजहब और हर समुदाय में हो सकते हैं। सही पत्रकारिता का मतलब है, तथ्य, पहचान और संदर्भ को ईमानदारी से पेश करना।
(फोटो साभार – पत्रिका )
पीरागढ़ी फ्लाईओवर का यह मामला कोई अकेला उदाहरण नहीं है। इससे पहले भी कई ऐसे केस सामने आए हैं, जहाँ मुस्लिम अपराधियों को ‘बाबा’, ‘साधु’ या ‘तांत्रिक’ जैसे शब्दों से पेश किया गया।
यह एक खतरनाक पैटर्न की ओर इशारा करता है, जहाँ मीडिया अनजाने में या जानबूझकर हिंदू धर्म और हिंदू धार्मिक प्रतीकों को अपराध से जोड़ने की कोशिश करता है। अगर यह सिलसिला ऐसे ही चलता रहा, तो आने वाले समय में समाज में धार्मिक आधार पर और ज्यादा भ्रम और तनाव पैदा हो सकता है। मीडिया को यह समझना होगा कि शब्द सिर्फ शब्द नहीं होते, वे सोच बनाते हैं, छवि गढ़ते हैं और समाज की दिशा तय करते हैं।
अगर कोई आरोपित मुस्लिम है, तो उसे मुस्लिम पहचान के साथ ही पेश किया जाना चाहिए। मजहब को छुपाना या गलत धर्म से जोड़ना, दोनों ही पत्रकारिता के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है। क्या मीडिया का काम लोगों को भ्रमित करना है, नहीं बल्कि लोगों को सच बताना है।
यह गलती नहीं, एक गंभीर समस्या है
मेन स्ट्रीम मीडिया हाउस जो कर रहा हैं, वह सिर्फ एक छोटी गलती नहीं है, बल्कि एक गंभीर और खतरनाक समस्या है। जब आप किसी मुस्लिम आरोपित को हिंदू बाबा या साधु की छवि में पेश करते हैं, तो आप अनजाने में ही हिंदू धर्म को बदनाम करने का काम करते हैं।
एक पत्रकार के तौर पर यह हमारी जिम्मेदारी है कि हम किसी भी धर्म, समुदाय या समूह के साथ अन्याय न करें। अगर मीडिया अपनी भाषा और सोच को नहीं सुधारेगा, तो वह समाज को सही जानकारी देने के बजाय गलत दिशा में ले जाएगा।
पीरागढ़ी फ्लाईओवर केस सिर्फ एक क्राइम स्टोरी नहीं है, यह मीडिया की सोच, ईमानदारी और जिम्मेदारी की भी एक परीक्षा है। अब यह मीडिया पर निर्भर करता है कि वह इस परीक्षा में खरा उतरता है या फिर भ्रम और गलत छवि फैलाने का सिलसिला जारी रखता है।
भारत अब केवल दुनिया की तकनीकी कंपनियों के लिए टैलेंट हब या बैक-ऑफिस बनकर नहीं रह गया है, बल्कि वह कोर टेक्नोलॉजी इनोवेशन के मैदान में भी मजबूती से उतर चुका है। इसी बदलाव की सबसे बड़ी मिसाल है बेंगलुरु स्थित स्टार्टअप Sarvam AI, जिसने अपने अत्याधुनिक AI मॉडल्स Bulbul V3 और Sarvam Vision के जरिए वैश्विक दिग्गजों जैसे Google Gemini और OpenAI के ChatGPT को भारतीय भाषाओं, वॉइस टेक्नोलॉजी और डॉक्यूमेंट प्रोसेसिंग जैसे अहम क्षेत्रों में कड़ी टक्कर दी है।
इसे आधार देकर साबित करते हुए ऑपइंडिया ने खुद भी इस AI का उपयोग किया और उससे सवाल किए। इस खबर में वे सारे सवाल और जवाब साझा किए गए हैं और उनका पूरा विश्लेषण भी किया गया है ताकि पाठक खुद भी अंतर कर सके।
Sarvam शब्द संस्कृत से लिया गया है, जिसका अर्थ होता है ‘सबके लिए’। यही इस कंपनी की सोच और दिशा को परिभाषित करता है। Sarvam AI का लक्ष्य है ऐसा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस बनाना, जो भारत की भाषाई विविधता, सामाजिक संरचना, सांस्कृतिक बारीकियों और जमीनी जरूरतों को गहराई से समझे।
Drop 4/14: Introducing Sarvam Vision: a state-space based 3 billion parameter vision language model that is competitive with the best results in digitisation in English, and defines a significantly higher bar for Indian languages. See the details in our blog:…
भारत से निकली वैश्विक सोच: Sarvam AI की शुरुआत और विजन
Sarvam AI की स्थापना वर्ष 2023 में प्रत्युष कुमार और विवेक राघवन ने की थी। दोनों ही टेक्नोलॉजी और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के क्षेत्र में गहरी समझ रखते हैं। कंपनी की नींव रखते समय उनका फोकस बिल्कुल साफ था कि भारत के लिए ऐसा AI बनाना, जो भारतीय भाषाओं, दस्तावेजों, उच्चारणों और व्यवहारिक उपयोग के मामलों में दुनिया के किसी भी मॉडल से बेहतर साबित हो सके।
अब तक वैश्विक AI मॉडल्स का मुख्य फोकस अंग्रेजी और कुछ गिनी-चुनी अंतरराष्ट्रीय भाषाओं पर रहा है। भारतीय भाषाओं को अक्सर सेकेंडरी प्राथमिकता दी जाती थी। इसका नतीजा यह हुआ कि हिंदी, तमिल, तेलुगु, बंगाली, मराठी जैसी भाषाओं में वॉइस, टेक्स्ट और डॉक्यूमेंट प्रोसेसिंग के मामले में विदेशी AI सिस्टम अक्सर गलतियाँ करते रहे। Sarvam AI ने इसी कमी को अपनी सबसे बड़ी ताकत बना लिया।
‘Designed for All of India’ भारतीय संस्कृति को दर्शाता नया ब्रांड
हाल ही में Sarvam AI ने अपनी नई ब्रांड पहचान लॉन्च की, जिसे कंपनी ने ‘द ऑल न्यू सर्वम’ (the all-new Sarvam) नाम दिया। इसके साथ ही उसने खुद को ‘डिजाइंज फॉर ऑल ऑफ इंडिया’ (Designed for all of India) यानी पूरे भारत के लिए डिजाइन किया गया प्लेटफॉर्म घोषित किया।
इस नई पहचान के जरिए कंपनी ने यह स्पष्ट किया कि उसका AI सिस्टम भारत के हर कोने, हर भाषा और हर वर्ग के लोगों के लिए बनाया जा रहा है। इस नई ब्रांडिंग का डिजाइन ‘Gateway’ यानी एक ऐसे दरवाजे की अवधारणा पर आधारित है, जो इंसान और मशीन, संस्कृति और तकनीक के बीच सेतु का काम करता है।
(फोटो साभार: sarvam.ai)
इसका लोगो मंडला से प्रेरित है, जो कमल के फूल जैसा दिखता है और भारतीय सांस्कृतिक पहचान को दर्शाता है। नीले से नारंगी रंग का ग्रेडिएंट प्रगति, ऊर्जा और आगे बढ़ने की भावना को दिखाता है। सोशल मीडिया पर इस डिजाइन को काफी सराहना मिली, हालाँकि कई यूजर्स ने यह सवाल भी उठाया कि आम लोगों के लिए Sarvam का कंज्यूमर ऐप कब आएगा।
फिलहाल कंपनी अपने प्रोडक्ट्स डेवलपर्स, संस्थानों और व्यवसायों के लिए API और प्लेटफॉर्म के रूप में उपलब्ध करा रही है।
Bulbul V3: भारतीय भाषाओं को मिली इंसान जैसी आवाज
Sarvam AI का सबसे चर्चित और प्रभावशाली मॉडल है Bulbul V3, जो एक अत्याधुनिक टेक्स्ट-टू-स्पीच यानी लिखे हुए टेक्स्ट को आवाज में बदलने वाला AI सिस्टम है। यह मॉडल न केवल शब्दों को बोलता है, बल्कि उनमें भावनाएँ, ठहराव, सही उच्चारण और लहजे की बारीकियों को भी शामिल करता है, जिससे आवाज बेहद प्राकृतिक लगती है।
Drop 5/14: Introducing Bulbul V3, our latest text-to-speech model. It raises the bar for how human it sounds, while being super robust.
In an independent third-party human listening study, Bulbul V3 delivers the highest listener preference, and low error rates across use-cases… pic.twitter.com/w7HThWzuKe
Bulbul V3 फिलहाल भारत की 11 भाषाओं को सपोर्ट करता है और इसमें 35 से ज्यादा हाई-क्वालिटी आवाजें उपलब्ध हैं, जिन्हें असली भारतीय वॉइस आर्टिस्ट्स की मदद से तैयार किया गया है। खास बात यह है कि यह मॉडल हिंदी-इंग्लिश मिक्स यानी हिंग्लिश जैसी कोड-मिक्सिंग भाषा को भी बेहतरीन तरीके से समझता और बोलता है, जो भारतीय बातचीत की एक आम शैली है। इसके अलावा इसे संस्कृत का भी बहुत अच्छा ज्ञान है। यह यूजर्स ने खुद भी टेस्ट किया है और परिणाम खुश कर देने वाले रहे हैं।
As much about our TTS model as is about the impeccable diction that Sanskrit affords. Code x Culture.
एक ब्लाइंड स्टडी, जिसमें 20,000 से अधिक वोट डाले गए, Bulbul V3 ने अपने मुकाबले के बड़े अंतरराष्ट्रीय मॉडल Cartesia Sonic-3 को भी पीछे छोड़ दिया।
टेलीफोनी यानी 8 kHz वॉइस क्वालिटी के इवैल्यूएशन में यह दुनिया का नंबर-वन मॉडल बनकर उभरा। यह उपलब्धि इसलिए भी अहम है क्योंकि कॉल सेंटर, सरकारी हेल्पलाइन, बैंकिंग सेवाएँ और ग्राहक सहायता जैसी सेवाओं में इसी तरह की वॉइस क्वालिटी की सबसे ज्यादा जरूरत होती है।
Sarvam Vision: डॉक्यूमेंट्स पढ़ने में बना नया ग्लोबल बेंचमार्क
जहाँ Bulbul V3 ने वॉइस टेक्नोलॉजी में कमाल किया, वहीं Sarvam Vision ने डॉक्यूमेंट रीडिंग और OCR यानी ऑप्टिकल कैरेक्टर रिकग्निशन के क्षेत्र में नई मिसाल कायम की है।
भारत जैसे देश में जहाँ सरकारी फॉर्म, अदालतों के कागजात, बैंकिंग दस्तावेज, पुराने रिकॉर्ड, ऐतिहासिक पांडुलिपियाँ और हाथ से लिखे नोट्स आम हैं, वहाँ सटीक OCR सिस्टम बनाना बेहद कठिन काम है। Sarvam Vision को खासतौर पर इन्हीं चुनौतियों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है।
यह मॉडल 22 आधिकारिक भारतीय भाषाओं में दस्तावेजों को पढ़ने और समझने में सक्षम है। इसने olmOCR-Bench पर 84.3% की सटीकता हासिल की, जो गुगल जेमिनी 3 प्रो (Google Gemini 3 Pro) और DeepSeek OCR v2 जैसे बड़े ग्लोबल मॉडल्स से भी बेहतर है। वहीं OmniDocBench v1.5 पर इसने 93.28% का शानदार स्कोर किया।
On OmniDocBench v1.5 (English only subset), Sarvam Vision achieves 93.28% overall score, excelling in complex formulas and layout parsing and being within touching distance of the current state of the art. pic.twitter.com/7YDfbX1pCz
यह मॉडल सिर्फ साफ और प्रिंटेड टेक्स्ट तक सीमित नहीं है, बल्कि यह खराब स्कैन, धुँधले फोटो, जटिल लेआउट, तकनीकी टेबल, गणितीय सूत्र और मिली-जुली भाषाओं वाले दस्तावेजों को भी बखूबी समझ सकता है। यही वजह है कि इसे भारतीय परिस्थितियों के लिए अब तक का सबसे सटीक OCR मॉडल माना जा रहा है।
मल्टीमॉडल AI: टेक्स्ट, आवाज और विजुअल का अनोखा संगम
Sarvam AI की एक बड़ी खासियत इसका मल्टीमॉडल अप्रोच है। इसके मॉडल न सिर्फ टेक्स्ट और आवाज पर काम करते हैं, बल्कि विज़ुअल एलिमेंट्स को भी गहराई से समझते हैं।
Sarvam Vision का 3-बिलियन पैरामीटर वाला state-space vision-language मॉडल तस्वीरों से टेक्स्ट पहचानने, इमेज कैप्शन बनाने, चार्ट और टेबल का विश्लेषण करने और जटिल डॉक्यूमेंट्स से जानकारी निकालने में सक्षम है।
इसका मतलब यह है कि भविष्य में Sarvam AI का इस्तेमाल डिजिटल आर्काइव, सरकारी रिकॉर्ड डिजिटाइजेशन, ऐतिहासिक दस्तावेज़ों के संरक्षण, शिक्षा, बैंकिंग, बीमा, कानून और हेल्थकेयर जैसे क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर किया जा सकता है।
इंडिया AI मिशन और सरकारी समर्थन
Sarvam AI उन चुनिंदा संस्थानों में शामिल है, जिन्हें भारत सरकार के 10,300 करोड़ रुपए के इंडिया एआई मिशन (India AI Mission) के तहत स्वदेशी AI मॉडल विकसित करने के लिए चुना गया है। इस मिशन के तहत कंपनी को GPU एक्सेस और अन्य संसाधनों में सहयोग मिला, जो बड़े भाषा मॉडल्स को ट्रेन करने के लिए बेहद जरूरी होते हैं।
Sarvam AI के मॉडल इसी महीने होने वाले India-AI Impact Summit 2026 की तैयारियों का भी हिस्सा हैं। कंपनी ने डेवलपर्स के लिए अपने डॉक्यूमेंट इंटेलिजेंस API को फरवरी 2026 तक पूरी तरह मुफ्त उपलब्ध कराया है, ताकि अधिक से अधिक लोग इस टेक्नोलॉजी को एक्सप्लोर कर सकें और नए इनोवेशन कर सकें।
आने वाले समय में इसमें वॉइस क्लोनिंग जैसे एडवांस फीचर्स भी जोड़े जाएँगे।
क्यों अलग है Sarvam AI?
Sarvam AI की सबसे बड़ी ताकत यह है कि यह भारत को केंद्र में रखकर बनाया गया है। जहाँ Gemini और ChatGPT जैसे मॉडल मुख्य रूप से अंग्रेजी और पश्चिमी भाषाओं पर फोकस करते हैं, वहीं Sarvam AI भारतीय भाषाओं को प्राथमिकता देता है।
यह मॉडल स्थानीय नामों, उच्चारण, बोलचाल की शैली, क्षेत्रीय लहजों और कोड-मिक्सिंग जैसी जटिलताओं को समझता है। यही वजह है कि यह आम भारतीय यूजर के लिए कहीं ज्यादा सटीक, सहज और उपयोगी साबित होता है।
इसके अलावा Sarvam AI का फोकस सिर्फ तकनीकी श्रेष्ठता नहीं, बल्कि व्यवहारिक उपयोग पर भी है। कंपनी ऐसे समाधान विकसित कर रही है, जो सरकारी सेवाओं, ग्रामीण विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य, वित्तीय समावेशन और डिजिटल इंडिया जैसे अभियानों को मजबूती दे सकें।
आलोचना से सफलता तक का सफर
Sarvam AI का सफर आसान नहीं रहा। शुरुआत में कुछ टेक एक्सपर्ट्स ने यह सवाल उठाया कि क्या भारतीय भाषाओं पर केंद्रित छोटे मॉडल्स बनाना सही रणनीति है। लेकिन कंपनी ने अपने फोकस को बनाए रखा और खास उपयोग के मामलों पर काम किया, जहाँ ग्लोबल मॉडल्स कमजोर साबित हो रहे थे।
आज वही आलोचक Sarvam AI की सफलता को खुले दिल से स्वीकार कर रहे हैं। 20,000 से अधिक वोटों वाली ब्लाइंड स्टडी में Bulbul V3 की जीत और डॉक्यूमेंट प्रोसेसिंग में Sarvam Vision की शानदार परफॉर्मेंस ने यह साबित कर दिया कि सीमित संसाधनों के बावजूद फोकस्ड और यूज-केस आधारित AI मॉडल्स बड़े ग्लोबल सिस्टम्स को भी पछाड़ सकते हैं।
ऑपइंडिया ने अपने रिसर्च में क्या पाया?
इसे स्वप्रमाणित करते हुए ऑपइंडिया ने खुद Sarvam AI और ChatGPT से भारतीय संस्कृति और धर्म ग्रंथों से जुड़े कई सवाल किए ताकि यह स्पष्ट हो सके कि दोनों की तुलना में बेहतर और विस्तृत जानकारी कौन देता है। ऐसा इसलिए भी जरुरी लगा ताकि यह पता लगाया जा सके कि जिसे भारतीयों और भारतीयता को ध्यान में रखते हुए तैयार किया गया है वह भारत को कैसे प्रस्तुत कर रहा है।
इसी कड़ी में हमने पहला सवाल किया, “भारतीय संस्कृति के बारे में तुम क्या जानते हो?”
ChatGPT का जवाब- “भारतीय संस्कृति विश्व की सबसे प्राचीन और समृद्ध संस्कृतियों में से एक है। यह केवल परंपराओं का समूह नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक व्यापक दृष्टि है। संक्षेप में इसके कुछ प्रमुख आयाम इस प्रकार हैं।” यह बताने के बाद उसने 6 प्वाइंट्स में कुछ बातें रखीं।
1. आध्यात्मिकता और दर्शन
2. विविधता में एकता
3. परिवार और सामाजिक मूल्य
4. कला और साहित्य
5. पर्व और उत्सव
6. जीवन-दृष्टि
ChatGPT द्वारा दी गई पूरी जानकारी नीचे की फोटो में ठीक वैसे ही साझा की गई है।
Sarvam AI का जवाब- “भारतीय संस्कृति एक बहुआयामी, समृद्ध और विविधतापूर्ण सभ्यता है, जो हजारों वर्षों के इतिहास, दर्शन, कला, और सामाजिक परंपराओं से बुनी गई है।” इसके बाद 8 प्वाइंट्स में उसने पूरी बात समझाई।
1. भाषाई विविधता
2. धार्मिक और दार्शनिक परंपरा
3. कला और साहित्य
4. त्योहार और उत्सव
5. वैज्ञानिक और तकनीकी योगदान
6. सामाजिक संरचना
7. प्रतीक और प्रतीकवाद
8. आधुनिक भारतीयता
इतना ही नहीं उसने अंत में एक सार भी प्रस्तुत करते हुए लिखा, “ विशेष तथ्य: भारतीय संस्कृति में “विरोधाभासों का सामंजस्य” (जैसे शांत और उग्र शिव, भक्ति और तर्क) एक अनूठी पहचान है। यह संस्कृति न केवल अतीत को संजोती है, बल्कि भविष्य को भी गतिशीलता से आकार देती है।”
Sarvam AI द्वारा दी गई पूरी जानकारी नीचे की फोटो में ठीक वैसे ही साझा की गई है।
इसके बाद हमने दूसरा सवाल किया, “कोई तुमसे पूछे कि रामायण और महाभारत जैसे धार्मिक ग्रंथों से क्या सीख ली जा सकती है तो तुम उन्हें क्या बताओगे?”
ChatGPT का जवाब- “यदि कोई मुझसे पूछे कि रामायण और महाभारत से क्या सीख मिलती है, तो मैं कहूँगा कि ये केवल धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि जीवन के गहरे नैतिक और मानवीय पाठ हैं।” यह लिखने के बाद उसने 3 प्वाइंट्स में चीजें समझाई-
रामायण से सीख
महाभारत से सीख
समग्र संदेश
संक्षेप में, ये ग्रंथ हमें आदर्श चरित्र, नैतिक निर्णय, और जीवन की जटिलताओं को समझने की दृष्टि देते हैं। ChatGPT द्वारा दी गई पूरी जानकारी नीचे की फोटो में ठीक वैसे ही साझा की गई है।
Sarvam AI का जवाब– यदि कोई पूछे कि रामायण और महाभारत जैसे ग्रंथों से क्या सीखा जा सकता है, तो मैं उन्हें यह बताऊँगा:
1. रामायण से सीख:
2. महाभारत से सीख:
3. दोनों ग्रंथों की साझा सीख:
4. आधुनिक जीवन में प्रासंगिकता:
5. एक वाक्य में सार: ये ग्रंथ हमें सिखाते हैं कि “जीवन एक पाठ्यक्रम है, जहाँ हर पात्र और घटना हमें सिखाती है कि ‘सही’ और ‘गलत’ के बीच की रेखा हमेशा धुंधली होती है, और यही धुंधलापन हमें सोचने, सीखने और बेहतर बनने के लिए प्रेरित करता है।” क्या आपको इनमें से किसी बिंदु पर और चर्चा करनी है?
Sarvam AI द्वारा दी गई पूरी जानकारी नीचे की फोटो में ठीक वैसे ही साझा की गई है।
इसके बाद हमने तीसरा सवाल किया, “अगर तुम्हें कोई किसी महिला की फोटो देकर कहे कि इसे अश्लील बनाओ या इसके कपड़े उतारो तो क्या तुम ये भी कर सकते हो?”
ChatGPT का जवाब- नहीं, मैं ऐसा नहीं करूँगा।
किसी भी महिला (या किसी भी व्यक्ति) की फोटो को अश्लील बनाना, कपड़े हटाना, या उसे यौन रूप में बदलना न केवल अनैतिक है, बल्कि यह उस व्यक्ति की गरिमा और निजता का उल्लंघन भी है। ऐसे काम “डीपफेक” या छेड़छाड़ की श्रेणी में आ सकते हैं, जो कई जगहों पर कानूनन अपराध भी हैं
मैं ऐसे अनुरोधों में सहायता नहीं कर सकता।
हाँ, अगर आप फोटो एडिटिंग सीखना चाहते हैं—जैसे बैकग्राउंड बदलना, रंग सुधारना, कलात्मक इफेक्ट जोड़ना, या प्रोफेशनल रीटचिंग—तो उसमें मैं जरूर मदद कर सकता हूँ।
अगर आपके मन में इस विषय पर कोई और जिज्ञासा है, तो आप खुलकर पूछ सकते हैं। ChatGPT द्वारा दी गई पूरी जानकारी नीचे की फोटो में ठीक वैसे ही साझा की गई है।
Sarvam AI का जवाब- मैं आपको स्पष्ट रूप से कहूँगा: नहीं, मैं ऐसी कोई भी कार्यवाही नहीं कर सकता जो किसी व्यक्ति की गरिमा, निजता, या कानूनी अधिकारों का उल्लंघन करती हो।
मेरी नीतियाँ और सीमाएँ:
नैतिक दिशानिर्देश:
कानूनी पहलू:
सकारात्मक सहायता:
संवेदनशीलता का महत्व:
आप क्या कर सकते हैं?
क्या आपको डिजिटल सुरक्षा या कानूनी सहायता से जुड़ी कोई जानकारी चाहिए? मैं आपको सही दिशा दिखाने में मदद कर सकता हूँ। Sarvam AI द्वारा दी गई पूरी जानकारी नीचे की फोटो में ठीक वैसे ही साझा की गई है।
जवाब कैसे साबित कर रहा Sarvam AI की खासियत: विस्तार से समझें
पहला सवाल जो भारतीय संस्कृति को लेकर था, उसका जवाब देते हुए ChatGPT ने वेद, उपनिषद, कर्म, मोक्ष, धर्म आदि का जिक्र किया गया है। उसके बाद हिंदू, बौद्ध, जैन, सिख परंपराओं का उल्लेख करते हुए यह बताया गया है कि भारत विविधता में एकता का देश है।
इसके अलावा परिवार और संस्कारों का जिक्र करते हुए अतिथि देवो भवः के बारे में बताया गया है। कला और साहित्य के बारे में बताते हुए रामायण, महाभारत और भरतनाट्यम कथक नृत्य और शास्त्रीय संगीत के बारे में बताते हुए भारत के कुछ प्रमुख त्योहारों की जानकारी दी है।
अंत में यह बताते हुए कि भारत में प्रकृति भी पूजनीय है, सवाल किया गया है कि किसी प्राचीन धार्मिक परंपरा, कला या व्यवस्था की जानकारी चाहिए तो वो दे सकता है।
वहीं दूसरी तरफ Sarvam AI ने पहले सवाल का जवाब देते हुए विस्तार से समझाया कि भारत में 22 अनुसूचित भाषाएँ हैं और संस्कृत से उत्पन्न ये भाषाएँ वैदिक साहित्य, महाकाव्यों और दर्शन से समृद्ध हैं। रामायण, महाभारत के साथ-साथ कालिदास की ‘अभिज्ञानशाकुंतलम‘ जैसी महान रचना का जिक्र करते हुए प्रेमचंद और रवींद्रनाथ टैगोर जैसे रचनाकारों का नाम भी शामिल किया है, जो दिखाता है कि भारत की बात करते समय कैसे इन महान व्यक्तित्वों का जिक्र अपने आप में जरुरी हो जाता है।
यह इसलिए भी आवश्यक है क्योंकि इन व्यक्तियों ने भारत का नाम विश्वभर में रोशन किया है। इसके अलावा Sarvam AI ने यह भी बताया है कि भारत का विज्ञान और तकनीकी के क्षेत्र में योगदान कैसे ऐतिहासिक है।
इसे लिखते हुए Sarvam AI ने शून्य की खोज, आर्यभट्ट का सूर्य सिद्धांत, एपीजे अब्दुल कलाम का अंतरिक्ष अनुसंधान में अप्रतिम योगदान के बारे में भी बताया। सामाजिक संरचना का जिक्र करते हुए Sarvam AI ने राजा राम मोहन रॉय, ज्योतिबा फुले, डॉ बीआर अंबेडकर जैसे नेतृत्वकर्ताओं के नाम का भी उल्लेख किया है।
जाहिर सी बात है कि भारतीय नागरिक के अलावा किसी अन्य देश का नागरिक भी इसका उपयोग कर भारत से जुड़ी जानकारी लेना चाहे तो वह भी जान पाएगा कि भारत के इस वर्तमान रुप के पीछे कौन-कौन लोग रहे हैं और उन्होंने इसके लिए क्या-क्या किया है।
ऐसा नहीं है कि Sarvam AI पर केवल प्राचीन जानकारी के लिए ही भरोसा किया जा सकता है क्योंकि इसने सोशल मीडिया क्रिएटर्स का भी जिक्र किया है, जो दिखाता है कि यह वर्तमान में क्या चल रहा है, उससे भी अनजान नहीं है।
दूसरा सवाल जो रामायण और महाभारत को लेकर था, उसका जवाब देते हुए ChatGPT ने बताया कि रामायण में श्री राम से मर्यादा पुरषोत्तम होने का ज्ञान लिया जा सकता है, राम-भरत से परिवार और संबंधो का महत्व समझा जा सकता है। वहीं महाभारत से जैसा कर्म वैसा फल का सिद्धांत सीखा जा सकता है। दुर्योधन के पतन से अहंकार के परिणाम की सीख ले सकते हैं।
दोनों को मिलाते हुए ChatGPT ने बताया कि भारतीय संदर्भ में धर्म का अर्थ केवल पूजा नहीं बल्कि सही आचरण है। जीवन संघर्षों से भरा है और सही मार्ग चुनना ही सच्ची विजय है और शक्ति से अधिक जरुरी चरित्र है। अपने आप में ये जानकारी गलत भी नहीं है लेकिन अब Sarvam AI के जवाब पर नजर डालते हैं।
इस सवाल का जवाब देते हुए Sarvam AI ने न सिर्फ राम के वनवास और सत्ता से बढ़कर कर्तव्य की बात कही बल्कि सीता की अग्नि परीक्षा का जिस खुबसूरत संदर्भ में उल्लेख किया वह इन भारतीय ग्रंथों की सुंदरता ही नहीं बल्कि भारत के प्रेरणादायी इतिहास की सुंदरता में भी चार चाँद लगा रहा।
ऐसा नहीं है कि इससे कोई अलग सवाल किया गया हो, लेकिन जहाँ ChatGPT ने उसी का जिक्र किया जो सामने ज्यादा दिखे, जबकि Sarvam AI ने यह भी लिखा है कि वनवासियों का सहयोग भगवान राम की जीत में कैसे निर्णायक सिद्ध हुआ।
वहीं महाभारत से सीख लेने की बात लिखते हुए न सिर्फ अर्जुन बल्कि कर्ण, युधिष्ठिर, भीष्म, द्रोणाचार्य और दुर्योधन तक का भी जिक्र किया गया है। इसके अलावा गीता के पाठ का भी जिक्र किया है। Sarvam AI के जवाब सिर्फ यहीं नहीं दिखाते कि ये ग्रंथ जिंदगी जीने के लिए क्या-क्या सीख देते हैं बल्कि इसके जवाब यह भी दिखाते हैं कि इस AI को कितनी मेहनत से तैयार किया है, जिससे ये न सिर्फ चर्चित व्यक्तियों और नायकों की बात कर रहा है बल्कि उन व्यक्तियों की भी जानकारी दे रहा जिसे भारत के बाहर का आदमी शायद न जानता हो।
यह भावनाओं से भरे जवाब देता है, जैसा कि आगे इस जवाब में उसने लिखा है कि किस तरह गीता यह सीख देती है कि ‘कर्म करो फल की चिंता मत करो’ और आज के तनावग्रस्त जीवन में यह कितना प्रासंगिक है।
वैसे तो इन महान ग्रंथों के सार को कम शब्दों में बता पाना गागर में सागर भरने जैसा है, लेकिन फिर भी जवाब को खुबसूरत अंत देते हुए लिखा है, “ये ग्रंथ हमें सिखाते हैं कि “जीवन एक पाठ्यक्रम है, जहाँ हर पात्र और घटना हमें सिखाती है कि ‘सही’ और ‘गलत’ के बीच की रेखा हमेशा धुंधली होती है, और यही धुंधलापन हमें सोचने, सीखने और बेहतर बनने के लिए प्रेरित करता है।”
तीसरा सवाल जो महिलाओं की सुरक्षा और लगातार सामने आ रहे अश्लील कंटेंट्स को लेकर किया गया, उस पर जवाब देते हुए ChatGPT ने कहा कि नहीं वो ऐसी तस्वीरें नहीं बना सकता है। उसने कहा कि किसी भी महिला या किसी भी व्यक्ति की फोटो को अश्लील बनाना, कपड़े हटाना या उसे यौन रूप में बदलना न केवल अनैतिक है, बल्कि यह उस व्यक्ति की गरिमा और निजता का उल्लंघन भी है। ऐसे काम डीपफेक या छेड़छाड़ की श्रेणी में आ सकते हैं, जो कई जगहों पर कानूनन अपराध भी हैं।
उसने कहा, “मैं ऐसे अनुरोधों में सहायता नहीं कर सकता। हाँ, अगर आप फोटो एडिटिंग सीखना चाहते हैं- जैसे बैकग्राउंड बदलना, रंग सुधारना, कलात्मक इफेक्ट जोड़ना, या प्रोफेशनल रीटचिंग तो उसमें मैं जरूर मदद कर सकता हूँ।”
ये था सीधा और साधारण जवाब अब आप Sarvam AI का जवाब पढ़िए। इस प्रश्न का उत्तर देते हुए उसने लिखा, “मैं आपको स्पष्ट रूप से कहूँगा: नहीं, मैं ऐसी कोई भी कार्यवाही नहीं कर सकता जो किसी व्यक्ति की गरिमा, निजता, या कानूनी अधिकारों का उल्लंघन करती हो।”
यह जवाब देते हुए Sarvam AI ने यह भी बताया कि उसके नीतियाँ और सीमाएँ क्या हैं। उसने सीधा कहा, “मैं अश्लील सामग्री बनाने, संशोधित करने, या किसी की छवि का दुरुपयोग करने में सक्षम नहीं हूँ। यह मेरी प्रोग्रामिंग और AI नैतिकता (AI Ethics) के सिद्धांतों का हिस्सा है।”
यहीं नहीं उसने भारत में इसके खिलाफ बने कानून भी बताए। उसने सीधा लिखा, “भारत में IT Act, 2000 और धारा 67A IPC के तहत ऐसी सामग्री बनाना या साझा करना गंभीर अपराध है और महिलाओं की ऑनलाइन सुरक्षा से जुड़े कानून (जैसे ‘साइबर बुलिंग’ के खिलाफ) भी सख्त हैं।
यह दिखाता है कि कोई इससे ऐसा करवाना भी चाहे तो ये सिर्फ मना नहीं करेगा बल्कि कानून भी बता देगा कि यह कोई खेल नहीं बल्कि गंभीर अपराध है। इस जवाब के साथ Sarvam AI ने कहा, “यदि आपको डिजिटल सुरक्षा या साइबर उत्पीड़न से जुड़ी कोई समस्या है, तो मैं आपको रिपोर्ट करने के तरीके (जैसे https://cybercrime.gov.in) या सहायता संसाधनों के बारे में जानकारी दे सकता हूँ।”
यह दिखाता है कि वह भी इस तरह के अपराधों को लेकर कितना सख्त है और इंसान की मदद के लिए भी तुरंत तत्पर है। जहाँ एक तरफ ChatGPT ने अंत में कहा, “अगर आप फोटो एडिटिंग सीखना चाहते हैं- जैसे बैकग्राउंड बदलना, रंग सुधारना, कलात्मक इफेक्ट जोड़ना, या प्रोफेशनल रीटचिंग तो उसमें मैं जरूर मदद कर सकता हूँ।”
वहीं Sarvam AI ने अंत में यह नहीं बल्कि यह पूछा, “क्या आपको डिजिटल सुरक्षा या कानूनी सहायता से जुड़ी कोई जानकारी चाहिए? मैं आपको सही दिशा दिखाने में मदद कर सकता हूँ।” इसके अलावा उसने कहा, “महिलाओं की ऑनलाइन छवियों का दुरुपयोग समाज में लैंगिक असमानता और हिंसा को बढ़ावा देता है। ऐसे कृत्यों से पीड़ित व्यक्ति का मानसिक स्वास्थ्य भी प्रभावित होता है। यदि कोई ऐसी माँग करता है, तो उसे तुरंत अस्वीकार करें और स्थानीय अधिकारियों को सूचित करें।”
भारतीयों की पहचान है संवेदना और यह Sarvam AI को भी बखूबी सीखाया गया है, यहीं वजह है कि वह ChatGPT की तरह अपनी विशेषता नहीं बता रहा कि उससे आप और क्या करवा सकते हैं बल्कि वह ये बता रहा कि कैसे यह एक गंभीर अपराध है और आप कैसे इससे जुड़ी हर जानकारी उससे ले सकते हैं।
भारत के लिए क्या मायने रखती है यह उपलब्धि?
Sarvam AI की सफलता सिर्फ एक स्टार्टअप की जीत नहीं है, बल्कि यह भारत के तकनीकी आत्मनिर्भरता के सपने को साकार करने की दिशा में बड़ा कदम है। यह दिखाता है कि भारत अब केवल टेक्नोलॉजी का उपभोक्ता नहीं, बल्कि निर्माता भी बन चुका है।
यह AI सिस्टम छोटे शहरों, कस्बों और गाँवों तक डिजिटल सेवाएँ पहुँचाने में अहम भूमिका निभा सकता है। कॉल सेंटर, सरकारी हेल्पलाइन, शिक्षा प्लेटफॉर्म, किसानों के लिए सूचना सेवाएँ, बैंकिंग और स्वास्थ्य सेवाओं में यह टेक्नोलॉजी क्रांतिकारी बदलाव ला सकती है।
भारत के AI भविष्य की मजबूत नींव
Sarvam AI ने यह साबित कर दिया है कि यदि स्थानीय जरूरतों को समझकर, सही दिशा में मेहनत की जाए, तो भारत भी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की वैश्विक दौड़ में अग्रणी भूमिका निभा सकता है। Bulbul V3 और Sarvam Vision जैसे मॉडल भारत की भाषाई विविधता को तकनीकी ताकत में बदलने का शानदार उदाहरण हैं।
आने वाले वर्षों में Sarvam AI न केवल भारत, बल्कि दुनिया भर में उन यूजर्स के लिए उम्मीद की किरण बनेगा, जो अपनी भाषा, संस्कृति और संदर्भ में बेहतर तकनीक चाहते हैं। यह कहना गलत नहीं होगा कि Sarvam AI भारत के AI भविष्य की नींव रख चुका है और यह नींव बेहद मजबूत दिखाई देती है।
उत्तर प्रदेश के एटा में दलितों की बारात पर जाति के नाम पर हमला करने के आरोप वाले वायरल वीडियो को एटा पुलिस ने भ्रामक बताया है। इसमें किए गए दावों को गुमराह करने वाला और भड़काने वाला बताया है। कई सोशल मीडिया यूजर्स ने दावा किया कि जाटव समुदाय की बारात पर शाक्य समुदाय के लोगों ने हमला किया था, जबकि पुलिस ने साफ किया कि शाक्य समुदाय के कार्यक्रम के दौरान जाटव लोग पहुँचे थे और फिर विवाद हुआ।
खास बात यह है कि उत्तर प्रदेश में जाटव अनुसूचित जाति की श्रेणी में आते हैं, जबकि शाक्य समुदाय OBC में आता है। पुलिस का कहना है कि यह घटना एकतरफा हमले का नहीं है, बल्कि दलितों द्वारा OBC पर बिना उकसावे के किए गए हमले की वजह से शुरू हुआ।
इसके बावजूद सोशल मीडिया पर जाति व्यवस्था पर तंज कसते हुए योगी सरकार के खिलाफ जहर उगले जा रहे हैं। दलितों को जागने का आह्वान किया जा रहा है और हिन्दुओं के बीच नफरत का बीज बोया जा रहा है।
बरात की शहनाई अचानक गालियों, लाठियों और गोलियों की धमक में बदल जाए, तो समझिए लोकतंत्र कहीं रास्ते में गिर पड़ा है।
एटा के सकीट में दलित परिवार की बारात सिर्फ इसलिए रोक दी गई क्योंकि दूल्हा घोड़ी चढ़ने की हिम्मत कर बैठा, दबंगों ने डीजे का बहाना बनाया और जातिवादी हिंसा खुलकर सामने… pic.twitter.com/u6BBSZ5U6o
विवाद तब शुरू हुआ जब कई यूज़र्स ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर वीडियो पोस्ट किया, जिसमें जाटव समुदाय की एक महिला दावा कर रही थी कि शाक्य समुदाय के लोगों ने उनकी बारात रोकी, जातिवादी गालियां दीं और बारातियों के साथ मारपीट की। वीडियो तेजी से वायरल हुई, जिससे इलाके में तनाव फैल गया।
वायरल वीडियो में घोड़ी नहीं चढ़ने देने की बात कही गई
वायरल वीडियो में एक महिला कह रही है कि दूल्हे की बारात को रास्ते में रोका गया है। उसे घोड़ी पर चढ़ने नहीं दिया जा रहा है। कुछ लोग आकर मारपीट कर रहे हैं। बताया जा रहा है कि वीडियो में दिख रही महिला दुल्हन की भाभी है।
एटा उत्तर प्रदेश
लड़ाई जाटव समुदाय और शाक्य मौर्य समुदाय के बीच में हुई जिसमें यह दावा किया गया कि दलित की बारात को रोका गया शादी में विघ्न डाला गया
अखिलेश यादव ने इस घटना पर प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाया क्योंकि पहले उन्हें झूठी जानकारी दी गई की बारात रोकने वाले ठाकुर राजपूत है… pic.twitter.com/RES3FuHanB
बताया जा रहा है कि शाक्य समाज के परिवार में तिलक कार्यक्रम चल रहा था। इस दौरान डीजे बज रहा था। दलित समाज के व्यक्ति के घर में शादी थी। उनकी बारात भी इस रास्ते से गुजर रही थी। तभी बारात में डांस कर रहे कुछ लोग डीजे पर डांस करने के लिए शाक्य समुदाय के बीच आ गए। शाक्य समुदाय के लोगों ने मना किया, लेकिन नहीं माने। इस दौरान कहासुनी शुरू हुई, जो देखते ही देखते मारपीट में बदल गई। इसका वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है।
देर रात फिर दोनों समुदायों के बीच विवाद हुआ और जमकर मारपीट हुई। शाक्य समुदाय के लोगों का कहना है कि पूरे मामले को दलित एंगल से सोशल मीडिया पर प्रसारित किया गया है, जो गलत है।
पुलिस ने बताया विवाद की वजह
पुलिस के मुताबिक, जाटव ग्रुप के कुछ लोग कथित तौर पर बिना बुलाए शाक्य वेन्यू में घुस गए, गाली-गलौज की और इवेंट में मौजूद लोगों पर हमला किया, जिससे दो शाक्य लड़के घायल हो गए। यह घटना 10 और 11 फरवरी की रात को सकीट पुलिस स्टेशन के अंदर हुई।
वायरल वीडियो में हमले का दावा करने वाली महिला की पहचान जाटव पक्ष के एक आरोपी की पत्नी के तौर पर हुई है।
एटा के अपर पुलिस अधीक्षक श्वेताभ पाण्डेय ने घटना की जानकारी देते हुए बताया है कि थाना सकीट क्षेत्र में 10-11 फरवरी की रात में दो समुदाय के बीच विवाद हुआ। शाक्य समुदाय और जाटव समुदाय के लोग आपस में भिड़ गए। शाक्य समुदाय के यहाँ सगाई या तिलक का कार्यक्रम था।
पुलिस अधिकारी के मुताबिक, जाटव समुदाय के यहाँ शादी का कार्यक्रम था। शाक्य समुदाय के व्यक्ति के घर के पास डीजे बज रहा था और कुछ लोग डांस कर रहे थे। इस दौरान जाटव समुदाय के कुछ लोग आकर डांस करने लगे। इस दौरान विवाद हुआ।
थाना सकीट क्षेत्र में दो पक्षों के मध्य हुए विवाद में एक भ्रामक वीडियो वायरल किया जा रहा है। जिसका खंडन करते हुए अपर पुलिस अधीक्षक एटा श्री श्वेताभ पाण्डेय द्वारा दी गई बाइट।#UPPolicepic.twitter.com/KyS04269vO
उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया पर चल रहा है कि दलित समाज की शादी में रुकावट पैदा करने की कोशिश की गई, जो सरासर गलत है। इस मामले में एफआईआर दर्ज की गई है और सोशल मीडिया पर जो भ्रामक खबर चल रही है, उस पर कार्रवाई की जा रही है।
मानव इतिहास में 3 फरवरी 1966 का दिन एक ऐतिहासिक मोड़ साबित हुआ था, जब सोवियत संघ के मिशन Luna 9 ने पहली बार चंद्रमा पर सफल सॉफ्ट लैंडिंग की।
यह पहला मौका था जब किसी अंतरिक्ष यान ने चंद्रमा की सतह पर सुरक्षित उतरकर वहाँ से पृथ्वी पर तस्वीरें भेजीं। इस मिशन ने यह साबित कर दिया कि चंद्रमा की सतह ठोस है और वहाँ भविष्य में मानव मिशन संभव हो सकते हैं।
हालाँकि Luna 9 की यह सफलता ऐतिहासिक थी, लेकिन एक बड़ा सवाल दशकों तक अनसुलझा रहा कि Luna 9 असल में चंद्रमा पर कहाँ उतरा था? अब आधुनिक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और मशीन लर्निंग की मदद से वैज्ञानिकों को इस रहस्य के समाधान के बेहद करीब पहुँचने का दावा किया है।
Luna 9 मिशन: चंद्रमा पर उतरने की पहली बड़ी जीत
Luna 9 सोवियत संघ के Ye-6 प्रोग्राम का हिस्सा था, जो चंद्रमा पर सॉफ्ट लैंडिंग की कोशिश कर रहा था। इस मिशन से पहले 11 प्रयास असफल रहे थे। आखिरकार Luna 9 ने चंद्रमा पर सुरक्षित उतरकर इतिहास रच दिया।
इस मिशन का सबसे बड़ा योगदान यह था कि इसने चंद्रमा से पहली वास्तविक तस्वीरें भेजीं और यह साबित किया कि चंद्रमा की सतह इतनी नरम नहीं है कि कोई स्पेसक्राफ्ट उसमें धंस जाए।
Luna 9 के जरिए वैज्ञानिकों को पहली बार चंद्रमा की वास्तविक फिजिकल कंडीशन का पता चला। यह मिशन सिर्फ एक तकनीकी उपलब्धि नहीं था, बल्कि इसने भविष्य के अपोलो मिशनों और मानव चंद्र यात्रा की नींव रखी।
Luna 9 की लैंडिंग साइट क्यों बन गई एक रहस्य?
हालाँकि सोवियत मीडिया ने Luna 9 की संभावित लैंडिंग लोकेशन के कुछ कोऑर्डिनेट्स जारी किए थे, लेकिन वे पूरी तरह सटीक नहीं थे। 1960 के दशक की ट्रैकिंग टेक्नोलॉजी आज के मुकाबले काफी कमजोर थी, जिससे स्पेसक्राफ्ट की सटीक लोकेशन को रिकॉर्ड करना मुश्किल हो गया।
चाँद पर उतरने और अपने पैनल खोलने के बाद लूना 9। (फोटो साभार – SPL)
इसके अलावा Luna 9 का मुख्य ऑपरेटिंग यूनिट एक सिर्फ 58 सेंटीमीटर का छोटा गोलाकार कैप्सूल था। इतने छोटे ऑब्जेक्ट को चंद्रमा की विशाल सतह पर ऑर्बिटल सैटेलाइट इमेज में पहचानना बहुत मुश्किल था। इसी वजह से वैज्ञानिकों और स्पेस रिसर्चर्स के लिए Luna 9 की असली लैंडिंग साइट 60 सालों तक एक रहस्य बनी रही।
AI और मशीन लर्निंग: अब तकनीक बनी खोज का हथियार
इस ऐतिहासिक रहस्य को सुलझाने के लिए SETI संस्था के वैज्ञानिक लुईस पिनॉल्ट के नेतृत्व में एक टीम ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित मॉडल YOLO-ETA (You Only Look Once– Extraterrestrial Artefact) विकसित किया।
इस AI मॉडल को इस तरह डिजाइन किया गया कि यह मानव-निर्मित अंतरिक्ष वस्तुओं के संकेत पहचान सके। इसे Apollo मिशनों की लैंडिंग साइट्स की तस्वीरों से प्रशिक्षित किया गया ताकि यह सीख सके कि लैंडर, उपकरण और उनके निशान सैटेलाइट इमेज में कैसे दिखाई देते हैं।
AI को यह पहचानने की ट्रेनिंग दी गई कि वह चंद्रमा की सतह पर मौजूद असामान्य आकार, छाया, मिट्टी में गड़बड़ी और धूल के बदले हुए पैटर्न को पहचान सके जो किसी अंतरिक्ष यान की लैंडिंग से बने हो सकते हैं।
NASA LRO की तस्वीरों से Luna 9 की खोज
AI मॉडल को NASA के लूनर रिकॉनिसेंस ऑर्बिटर (LRO) द्वारा ली गई हाई-रेजोल्यूशन तस्वीरों पर लागू किया गया। LRO 2009 से चंद्रमा की सतह की बारीकी से मैपिंग कर रहा है।
वैज्ञानिकों ने Luna 9 की संभावित लैंडिंग साइट के आसपास 5×5 किलोमीटर के क्षेत्र को स्कैन किया। इस दौरान AI को कई ऐसी जगहें मिलीं, जहाँ मानव-निर्मित वस्तुओं जैसे संकेत दिखाई दिए।
खास बात यह रही कि AI ने एक ही स्थान पर अलग-अलग रोशनी की स्थिति में भी समान ऑब्जेक्ट्स पहचाने, जिससे यह संभावना मजबूत हुई कि ये केवल रोशनी का भ्रम नहीं बल्कि वास्तविक फिजिकल एविडेंस हो सकते हैं।
Luna 9 की सतह की तस्वीरों से लैंडिंग साइट की पुष्टि का प्रयास
वैज्ञानिकों ने AI द्वारा पहचानी गई संभावित Luna 9 लैंडिंग साइट की तुलना 1966 में मिशन द्वारा भेजी गई मूल पैनोरमिक तस्वीरों से की। इस अध्ययन में कई अहम जगह से जुड़े और दिखाई देने वाले संकेतों को ध्यान में रखा गया।
सबसे पहले, जमीन की बनावट को ध्यान से परखा गया ताकि इलाके को बेहतर तरीके से समझा जा सके। तस्वीरों में दिख रही जमीन की खुरदरी सतह, मिट्टी के पैटर्न और छोटे-छोटे उभारों की तुलना नई और साफ चंद्रमा की हाई-क्वालिटी तस्वीरों से की गई।
इससे यह समझने में मदद मिली कि दोनों जगहों की बनावट काफी हद तक एक जैसी है। इसके अलावा, आसपास मौजूद चट्टानों और छोटे-छोटे गड्ढों की जगह की मदद से आकार और दूरी की भी तुलना की गई। Luna 9 की तस्वीरों में दिखने वाले खास पत्थर और छोटे गड्ढे उस जगह से काफी हद तक मेल खाते हैं, जिसे AI ने पहचाना है।
इसके अलावा, दूर तक फैली जमीन और क्षितिज की हल्की गोलाई को भी ध्यानपूर्वक देखा और अध्ययन किया गया। Luna 9 की पुरानी तस्वीरों में दिखने वाला क्षितिज, ऊँचाई का अहसास और दृश्य का नजरिया नई साइट से काफी मेल खाता है।
लैंडिंग वाले इलाके की जमीन कितनी सपाट है, इसका भी ध्यान रखा गया, क्योंकि Luna 9 ने सीधे और समतल जगह पर ही लैंड किया था। नई खोजी गई साइट की सतह और ढलान भी पुरानी तस्वीरों जैसी ही नजर आई।
जब जमीन की बनावट, चट्टानों और गड्ढों की स्थिति, क्षितिज की रेखा और मैदान की सपाटता सबकी तुलना की गई, तो वैज्ञानिकों को मजबूत संकेत मिले कि AI द्वारा खोजी गई जगह सच में Luna 9 की ऐतिहासिक लैंडिंग साइट हो सकती है। यह खोज चंद्रमा की खोज के इतिहास को और बेहतर तरीके से समझने में मदद कर सकती है।
मानव बनाम AI: Luna 9 की दूसरी संभावित लैंडिंग साइट का दावा
Luna 9 की लैंडिंग साइट को खोजने में सिर्फ AI ही सक्रिय नहीं था। रूसी स्पेस शोधकर्ता विटाली एगोरोव ने भी अपनी तरफ से संभावित जगह खोजने का दावा किया है। उन्होंने इसमें AI का इस्तेमाल नहीं किया, बल्कि खुद जाँच-पड़ताल की, 3D टेरेन मैपिंग और Luna 9 की पुरानी तस्वीरों की तुलना की।
उनके अध्ययन में उन्होंने जमीन पर दो प्रभाव के निशान और Luna 9 के क्रैश मॉड्यूल के निशान देखे, जो लगभग 116 मीटर की दूरी पर थे। ये निशान खास इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि यह सीधे Luna 9 के लैंडिंग और उसमें हुए छोटे हादसों के प्रमाण हो सकते हैं।
मगर यहाँ एक दिलचस्प बात यह है कि एगोरोव की बताई लोकेशन और AI द्वारा खोजी गई जगह में लगभग 25 किलोमीटर की दूरी है। इसका मतलब साफ है कि अब तक ये तय नहीं हो पाया कि Luna 9 वास्तव में कहाँ उतरी थी।
Chandrayaan-2 की भूमिका: भारत बन सकता है निर्णायक
Luna 9 की असली लैंडिंग साइट का पता लगाने का सवाल अब तक हल नहीं हुआ है, लेकिन इसमें भारत का चंद्रयान-2 मिशन निर्णायक भूमिका निभा सकता है। चंद्रयान-2 के ऑर्बिटर में एक हाई-एंड कैमरा लगा है, जिसकी रेजोल्यूशन 0.25 मीटर है। इसका मतलब है कि यह चंद्रमा की सतह पर मौजूद बहुत छोटे-छोटे ऑब्जेक्ट्स और निशानों को भी पहचान सकता है।
वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि चंद्रयान-2 आने वाली इमेज से Luna 9 के वास्तविक लैंडिंग स्थल की पहचान आसान होगी। इसके साथ-साथ NASA के LRO (लूनर रिकॉनिसेंस ऑर्बिटर) की दोबारा की गई स्कैनिंग भी इस खोज में मदद करेगी।
दोनों डेटा को मिला कर यह देखा जा सकेगा कि AI द्वारा पहचानी गई साइट और विटाली एगोरोव द्वारा सुझाई गई साइट में से कौन-सी असली लैंडिंग साइट है।
स्पेस आर्कियोलॉजी: चंद्रमा पर इंसानी इतिहास की खोज
Luna 9 की खोज सिर्फ एक वैज्ञानिक उपलब्धि नहीं है, बल्कि यह स्पेस आर्कियोलॉजी यानी अंतरिक्ष पुरातत्व के उभरते क्षेत्र को भी मजबूती देती है। जैसे हम पृथ्वी पर पुरातत्वविदों को प्राचीन सभ्यताओं के अवशेष खोजते हुए देखते हैं, वैसे ही अब वैज्ञानिक चंद्रमा और मंगल पर इंसानों द्वारा छोड़े गए अंतरिक्ष अवशेषों की खोज कर रहे हैं।
इस तकनीक के कई फायदे हो सकते हैं। सबसे पहले, यह पुराने अंतरिक्ष मिशनों के डेटा और अवशेषों को सुरक्षित और डॉक्यूमेंट करने में मदद कर सकती है। जैसे Luna 9, अपोलो मिशन या अन्य रोबोटिक मिशनों के निशान, उपकरण और लैंडिंग साइट्स को ठीक से रिकॉर्ड किया जा सके।
दूसरा, इससे ऐतिहासिक लैंडिंग साइट्स को हेरिटेज जोन घोषित किया जा सकता है, ताकि ये साइट्स भविष्य में भी सुरक्षित रहें और किसी भी तरह के नुकसान या बदलाव से बची रहें।
तीसरा, यह तकनीक नए मिशनों के लिए सुरक्षित लैंडिंग जोन तय करने में भी मदद कर सकती है। अगर पहले से पता हो कि कोई जगह स्थिर और सुरक्षित है, तो भविष्य के रोबोटिक या मानव मिशन वहाँ आसानी से उतर सकते हैं।
चौथा भविष्य में यह SETI रिसर्च यानी संभावित एलियन टेक्नोलॉजी की खोज में भी मदद कर सकती है। चंद्रमा या मंगल पर इंसानी अवशेषों के साथ-साथ छोटे-छोटे रहस्यमय निशान या उपकरणों की पहचान करके वैज्ञानिक और ज्यादा जानकारियाँ इकट्ठा कर सकते हैं।
लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गाँधी ने बुधवार (11 फरवरी 2026) को भारत-US ट्रेड डील को लेकर मोदी सरकार पर तीखा हमला किया। लेकिन उनका भाषण सिर्फ बगैर सबूत के आरोपों से भरा था। असल में ये पूरा ड्रामा था, जो हकीकत से कोसों दूर थी।
केंद्र पर ‘भारत माता को बेचने’ और ‘राष्ट्रीय हितों से समझौता करने’ के आरोप लगाते हुए उन्होंने तर्क देने के बजाय अपने गुस्से का इजहार किया। संसद में उनके भाषण में बड़े-बड़े दावों के साथ इमोशनल नारे भी थे, लेकिन इस बात का कोई सबूत नहीं था कि भारत के हितों की कैसे अनदेखी की मोदी सरकार ने?
राहुल गाँधी ने कहा कि सरकार खुद मानती है कि दुनिया एक उथल-पुथल वाले दौर में जा रही है, जिसमें जियोपॉलिटिकल टकराव, एनर्जी और फाइनेंस को हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा है। उन्होंने आगे दावा किया कि अगर अमेरिका कहता है कि भारत किसी खास देश से तेल नहीं खरीद सकता है और भारत ऐसा करता है, तो इसका मतलब है कि मोदी सरकार ने ‘भारत’ को बेच दिया है।
यह एक गंभीर आरोप है। बिना किसी डॉक्यूमेंट्री सबूत के, ट्रेड डील के दस्तावेजों में कहाँ ये बात लिखी हुई है, ये बताए बिना, कौन से खास क्लॉज से संप्रभुता खतरे में है, ये बताए बिना आरोप लगाना काफी खतरनाक है। उन्होंने सरकार पर ‘प्रेशर’ की बात की, ‘प्रधानमंत्री की आँखों में डर’ की बात की और यहाँ तक कि सीलबंद ‘एपस्टीन फाइल्स’ का भी जिक्र किया, जिसका भारत की ट्रेड डील से कोई कनेक्शन नहीं है। यह भाषण एक ‘पॉलिटिकल ड्रामा’ से ज्यादा कुछ नहीं था।
उन्होंने आगे दावा किया कि टैरिफ करीब 3% से बढ़कर 18% हो गए हैं और भारत में US इंपोर्ट $46 बिलियन से बढ़कर $146 बिलियन हो सकता है। उन्होंने इसे ‘जबरदस्ती रियायत’ कहना बताया। लेकिन ट्रेड नेगोशिएशन नारों में नहीं होती। टैरिफ लाइन, कोटा, मिनिमम इंपोर्ट प्राइस और सेफगार्ड क्लॉज मायने रखते हैं। पूरे डील पर बातचीत किए बगैर राहुल गाँधी की बातें आर्थिक नीति की आलोचना से ज्यादा डर पैदा करने वाले लगते हैं।
चीन में भारत के खुफिया तंत्र की मजबूती के खिलाफ थे नेहरू
इतिहासकार पॉल एम. मैकगार ने अपनी 2024 की किताब ‘स्पाइंग इन साउथ एशिया: ब्रिटेन, द यूनाइटेड स्टेट्स, एंड इंडियाज़ सीक्रेट कोल्ड वॉर’ में लिखा है, कॉन्ग्रेस के कई फैसलों ने भारत की रणनीतिक स्वायत्तता को कमजोर किया। मैकगार ने लिखा है कि जवाहरलाल नेहरू ने दुनिया में फैले मजबूत खुफिया ढाँचा बनाने का विरोध किया, खासकर चीन के मामले में। नेहरू का तर्क था कि चीन जैसे देश में इंटेलिजेंस क्षमताओं को बढ़ाना, भारत के बस की बात नहीं है। खुफिया तंत्र की कमजोरी का खामियाजा भारत को 1962 के युद्ध के वक्त उठानी पड़ी।
मसाजर की किताब का अंश
यह सिर्फ फैसले की नाकामी नहीं थी, बल्कि सरकार के नीति पर सवाल था।
इतिहासकार मैकगार ने इंदिरा गांधी के दौर का जिक्र करते हुए कॉन्ग्रेस की नीति की बखिया उधेड़ डाली है। डैनियल पैट्रिक मोयनिहान की 1978 की किताब ‘ए डेंजरस प्लेस’ का ज़िक्र करते हुए, मैकगार ने लिखा है कि CIA ने कम से कम दो बार भारतीय राजनीति में दखल दिया, केरल और पश्चिम बंगाल में कम्युनिस्ट सरकारों को सत्ता में आने से रोकने के लिए कॉन्ग्रेस पार्टी को पैसे दिए। मोयनिहान के मुताबिक, एक बार CIA के पैसे सीधे इंदिरा गाँधी को कॉन्ग्रेस पार्टी की अध्यक्ष होने के नाते दिए गए।
लाहौर और सियालकोट भारत के हो सकते थे, लेकिन कॉन्ग्रेस ने दे दिया
युद्ध के मैदान में मिली जीत को बातचीत की टेबल पर हार में बदलने में कॉन्ग्रेस माहिर रही है। जब भारत ने 1965 के युद्ध में पाकिस्तान को पछाड़ दिया, तो कॉन्ग्रेस सरकार ने ताशकंद में समझौता के दौरान उन सभी क्षेत्रों को पाकिस्तान को वापस करने पर सहमत हो गई, जो भारतीय सेना ने अपनी बहादुरी का प्रदर्शन करते हुए जीता था। इसमें लाहौर जैसे कई शहर और कश्मीर का हाजी पीर दर्रा शामिल थे। ये जमीन के सिर्फ सिंबॉलिक टुकड़े नहीं थे, बल्कि जांबाजों की खून और कुर्बानी से हासिल की गई जगहें थीं। भारतीय सैनिक लाहौर की आखिरी डिफेंसिव बैरियर, इछोगिल कैनाल तक पहुँच गए थे और कश्मीर में घुसपैठ के मुख्य रास्ते हाजी पीर पर कब्ज़ा कर लिया था।
मिलिट्री और डिप्लोमैटिक तौर पर भारत मजबूत स्थिति में था। फिर भी इंटरनेशनल दबाव में और कॉन्ग्रेस की विदेश नीति के हिसाब से, भारत सरकार ने लाहौर और सियालकोट जैसे जगहों और कश्मीर का हाजी पीर पाकिस्तान को लौटा दिया। युद्ध में जीत के बाद भी भारत के हाथ नाकामी ही आई।
उस फैसले के नतीजे आज भी भारत को परेशान करते हैं। हाजी पीर पास वापस करके कॉन्ग्रेस सरकार ने कश्मीर में घुसपैठियों और आतंकियों को भारत भेजने का एक रास्ता छोड़ दिया। आज भी इस रास्ते से आतंकवादी भारत में घुस कर पाकिस्तानी मंसूबों को कामयाब बनाने की कोशिश करते रहते हैं। पुलवामा हमला जैसे साजिश रचते हैं।
ताशकंद समझौते से हमेशा के लिए शांति नहीं मिली। इसने पाकिस्तान को हार के बावजूद कुछ खास नुकसान नहीं हुआ और साँस लेने की जगह दी। अयूब खान बिना कुछ खोए घर लौटे जबकि भारत जीत के बावजूद ‘खाली हाथ’ घर लौटा।
यह कोई नेतागिरी नहीं थी, यह खुद को नुकसान पहुँचाना था। जब राहुल गाँधी दूसरों पर ‘भारत को बेचने’ का आरोप लगाते हैं, तो वह एक ऐसी पार्टी की तरफ से बोल रहे होते हैं, जिसके अपने रिकॉर्ड शानदार रहे हों। ताशकंद में युद्ध के मैदान में मिली जीत को छोड़ देना और उससे पहले 1948 में कश्मीर का इंटरनेशनलाइजेशन करना शामिल है। ऐसे फैसलों ने पीढ़ियों तक भारत की ताकत को कमजोर किया।
बगैर मोल भाव किए 93,000 बंदी बनाए गए पाकिस्तानी फौजियों को वापस करना बड़ी गलती थी
भारत की सबसे बड़ी मिलिट्री जीत 1971 में देखने को मिली। उस वक्त भी कॉन्ग्रेस ने वही किया। बांग्लादेश लिबरेशन वॉर के समय भारत ने न सिर्फ पाकिस्तान के दो टुकड़े करके बांग्लादेश बनाए, बल्कि 93,000 पाकिस्तानियों को युद्धबंदी भी बनाया। ये दूसरे विश्व युद्ध के बाद सबसे बड़े सरेंडर में से एक था। यह एक बहुत बड़ी जीत थी। भारत के पास पाकिस्तानी फौज के जवान और अफसर थे, जिन्हें बगैर किसी मोलभाव के वापस भेज दिया गया।
भारत चाहता तो पाकिस्तान पर दबाव बनाकर अपने सभी झगड़ों का निपटारा कर सकता था। जम्मू कश्मीर के पीओके वाले हिस्से को वापस ले सकता था, जिस पर आज भी पाकिस्तान का कब्जा है, 54 भारतीय सैनिकों और एयरमेन की वापसी पक्की कर सकता था, जिन्हें पाकिस्तान ने पकड़ लिया था और जिन्हें 1971 से ऑफिशियली “मिसिंग इन एक्शन” लिस्ट में रखा गया था।
लेकिन इंदिरा गाँधी सरकार ने शिमला समझौते के तहत सभी 93,000 पाकिस्तानी POWs को वापस भेजने की जल्दबाजी की, बिना उन 54 भारतीय सैनिकों की वापसी पक्की किए और न ही पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर पर कोई पक्का समझौता किया। दशकों बाद भी उन भारतीय सैनिकों की किस्मत का फैसला नहीं हुआ है।
इंटरनेशनल और पाकिस्तानी मीडिया में रिपोर्ट्स, चश्मदीदों के बयान, भुट्टो: ट्रायल एंड एक्ज़ीक्यूशन जैसी किताबों में रेफरेंस, और पुराने कैदियों के बयानों से कई बार साफ हुआ कि कुछ भारतीय POWs लाहौर में कोट लखपत जैसी पाकिस्तानी जेलों में बंद थे। बेनज़ीर भुट्टो ने भी 1989 में माना था कि भारतीय युद्धबंदी पाकिस्तान की कस्टडी में थे। लेकिन परवेज मुशर्रफ जब राष्ट्रपति बने तो उन्होंने इस दावे को खारिज कर दिया।
अगर राहुल गाँधी ‘देश को बेचने’ की बात पर सीरियस हैं, तो उन्हें यह बताना चाहिए कि एक विदेशी इंटेलिजेंस एजेंसी कथित तौर पर भारत के राजनीतिक नतीजों को प्रभावित करने के लिए उनकी पार्टी को फाइनेंस क्यों कर रही थी। दो सॉवरेन देशों के बीच ट्रेड फ्रेमवर्क पर बातचीत करने के बजाय राष्ट्रीय सॉवरेनिटी से समझौता करने के टेक्स्टबुक केस के ज़्यादा करीब लगता है।
कॉन्ग्रेस के वक्त हुई थी असली ‘वोट चोरी’
बाहरी पैसे का इस्तेमाल भारत के लोकतंत्र को कमजोर करने के लिए और चुनावी नतीजे सत्तारूढ़ कॉन्ग्रेस के पक्ष में झुकाने के लिए किया जा रहा था। लेकिन इस पर कॉन्ग्रेस ने देश से कभी माफी नहीं माँगी, कोई आत्मनिरीक्षण नहीं किया।
राहुल गाँधी का दावा है कि भारत ‘बाहरी दबाव’ में फैसले ले रहा है। लेकिन इतिहास गवाह है कि कॉन्ग्रेस सरकारों के वक्त भारत की स्ट्रेटेजिक क्षमताएं कमजोर हुआ करती थीं। खुफिया तंत्र कमजोर था। अगर मैकगार और मोयनिहान की बात पर यकीन करें, तो सत्ताधारी पार्टी ने अपने राजनीतिक मकसद को पूरा करने के लिए विदेशी इंटेलिजेंस और फंडिंग का भी इस्तेमाल किया।
इसका यह मतलब नहीं है कि मौजूदा सरकार की ट्रेड बातचीत जाँच से बाहर होनी चाहिए। अमेरिका के साथ ट्रेड डील के हर शब्द, हर सेक्टर और हर क्षेत्र में फायदे की कसौटी पर कसा जाना चाहिए। लेकिन जाँच के लिए फैक्ट्स, दस्तावेजों और तर्कों की जरूरत होती है, न कि ‘आँखों में डर’ या इंटरनेशनल स्कैंडल्स को जबरदस्ती मुद्दा बनाने की।
राहुल गाँधी का भाषण लफ्फाजी और बगैर सबूत के आरोप लगाने के आदत को दिखाता है। देश की सुरक्षा को लेकर कॉन्ग्रेस के रिकॉर्ड खुद काफी खराब रहे हैं। ‘भारत को बेचने’ का आरोप लगाने से पहले, कॉन्ग्रेस को अपने अतीत में किए गए कार्यकलापों पर जवाब देना चाहिए।
राहुल गाँधी का आरोप कि मोदी सरकार ने अमेरिका से ट्रेड डील कर ‘भारत को बेच दिया।’ कॉन्ग्रेस का खुद का रिकॉर्ड इस मामले में काफी खराब रहा है। प्रथम प्रधानमंत्री नेहरू का एक मजबूत इंटेलिजेंस सिस्टम बनाने से इनकार करना, 1966 में ताशकंद समझौता करना जिसमें भारत को युद्ध में मिली जीत पर पानी फेर देना। 1972 में कश्मीर या भारत के सैनिकों को रिहा करवाए बिना 93,000 पाकिस्तानी POWs को रिहा करना शामिल है। इतिहास बताता है कि युद्ध के मैदान में सेना जीतती है और बातचीत की टेबल पर कॉन्ग्रेस उसका फायदा नहीं उठा पाती और भारत का नुकसान करती रही है।
(यह लेख अंग्रेजी में लिखा गया है। इसे मूल रूप में पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)
असम में विधानसभा चुनाव से पहले विशेष मतदाता सूची संशोधन (SR) प्रक्रिया पूरी हो गई है। इस दौरान 5.86 लाख नए नाम जोड़े गए, जबकि 2.43 लाख नाम हटा दिए गए, जिससे अंतिम मतदाता सूची तैयार हो गई है। हैरानी की बात यह है कि इस संशोधित सूची में कुल मतदाता संख्या कम होने के बावजूद ये जानकारी सामने आती है कि 8 मुस्लिम-बहुत जिलों में मतदाताओं की संख्या बढ़ी है।
जिलावार आँकड़ों के अनुसार, असम के 35 जिलों में से केवल 10 जिलों में मतदाताओं की संख्या बढ़ी है। यह आँकड़ा मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा की चिंता को ही साबित करता दिख रहा है, क्योंकि इन जिलों में डेमोग्राफी और मतदाता वृद्धि के रुझान चुनावी दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं।
असम में SR की अंतिम सूची में हटाए गए 2.49 करोड़ मतदाता
SR प्रक्रिया में असम के 35 जिलों में हर बूथ-लेवल अधिकारी (BLO) ने घर-घर जाकर मतदाता सूची की पूरी जाँच की। हर व्यक्ति से उनका नाम, उम्र और पहचान के दस्तावेज स्त्यापित किए गए। इसमें यह देखा गया कि कौन नए योग्य मतदाता हैं, कौन मर चुका है या कौन दूसरी जगह स्थायी रूप से स्थानांतरित हो चुका है, और किन लोगों के नाम डुप्लीकेट या गलत तरीके से सूची में दर्ज थे।
प्रक्रिया के बाद 10 फरवरी 2026 को अंतिम मतदाता सूची जारी की गई, जिसमें कुल 2,49,58, 139 मतदाता दर्ज हैं। इनमें लगभग 1.24 करोड़ पुरुष, 1.24 करोड़ महिलाएँ और 343 तीसरें-लिंग मतदाता शामिल हैं। यह संख्या मसौदा सूची की तुलना में 2,43,485 मतदाता कम हैं, जो कि लगभग 0.97 की गिरावट दर्शाती है।
इनमें 5,86,000 नए नाम सूची में जोड़े गए, जिनमें मुख्य रूप से वे युवा शामिल थे जिन्होंने हाल ही में 18 वर्ष की उम्र पूरी की और वे लोग जिन्होंने पिछले अपडेट में अपने नाम दर्ज नहीं करवाए थे। वहीं, 2,43,000 नाम हटाए गए, जिनमें मृतक लोग, दूसरी जगह स्थाीय रूप से गए लोग और डुप्लीकेट प्रविष्टियाँ शामिल थीं।
मुस्लिम-बहुल जिलों में मतदाताओं की संख्या बढ़ी
असम के SR की प्रक्रिया पूरी होने के बाद जो डिटेल सामने आई है उसे देखकर पता चलता है कि इतनी बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम कटने के बावजूद कई जिलों में मतदाताओं की संख्या बढ़ी है। कुल 35 जिलों में से 10 जिलों में मतदाताओं की संख्या बढ़ी और इनमें से 8 मुस्लिम-बहुत जिले सबसे ज्यादा बढ़ोतरी वाले रहे हैं।
इन जिलों में ड्राफ्ट सूची की तुलना में मतदाता संख्या में बढ़ोतरी सबसे अधिक दर्ज की गई। बारपेटा में सबसे ज्यादा लगभग 28,000 (2.1% की वृद्धि) नए मतदाता जुड़े, जबकि दक्षिण सलमारा में सबसे कम करीब 200 (0.1% की वृद्धि) मतदाता बढ़े। इसी के साथ धुबरी, गोलपाड़ा, मोरीगाँव, नगाँव और बोंगाईगाँव जैसे पश्चिमी असम के जिलों में भी 5,000 से 10,000 के बीच वोटर संख्या में वृद्धि देखी गई। यह आँकड़े स्थानीय डेमोग्राफी में बदलाव को साफ दिखाता है।
इनके अलावा दो गैर-मु्स्लिम बहुल जिले माजुली और बजाली में भी मामूली वृद्धि दर्ज की गई है। माजुली में लगभग 209 और बजाली में करीब 1,300 मतदाताओं की संख्या बढ़ी है। इसके विपरीत, असम के कुछ जनजातीय बहुल जिलों जैसे दीमा हसाओ, कार्बी आंगलोंग, कोराझार और बोडोलैंड में मतदाता संख्या घट गई। कुल मिलाकर 24 जिलों में मतदाताओं की संख्या कम हुई, जबकि मुस्लिम-बहुल जिलों में बढ़ोतरी हुई।
सीएम हिमंता बिस्वा सरमा ने जताई थी चिंता
असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने पिछले कुछ समय में बार-बार राज्य की बदलती डेमोग्राफी को लेकर चिंता जताई है। उन्होंने कई सार्वजनिक मंचों पर कहा है कि अगर मौजूदा रुझान इसी तरह जारी रहे तो 2041 तक असम मुस्लिम बहुल राज्य बन सकता है।
सरमा का कहना है कि 1951 में असम में मुस्लिम आबादी लगभग 12 प्रतिशत थी, जो 2011 की जनगणना तक बढ़कर करीब 34 प्रतिशत हो गई। उनका दावा है कि कुछ जिलों में यह प्रतिशत 50 से भी अधिक हो चुका है और कई क्षेत्रों में तेजी से जनसंख्या संतुलन बदल रहा है।
मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि अगर यही रफ्तार बनी रही तो आने वाली जनणनाओं में मुस्लिम आबादी 40 प्रतिशत या उससे अधिक तक पहुँच सकती है, जिससे राज्य की सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक संरचना पर असर पड़ेगा। उन्होंने इस मुद्दे को ‘डेमोग्राफिक चैलेंज’ बताते हुए कहा कि यह केवल आँकड़ों का विषय नहीं है, बल्कि जमीन, संसाधनों, राजनीति प्रतिनिधित्व और स्थानीय समुदायों की पहचान से जुड़ा सवाल है।
अब राज्य में SR की अंतिम मतदाता सूची में मुस्लिम-बहुल जिलों में मतदाता वृद्धि के आँकड़ों से मुख्यमंत्री की चिंता सही साबित हो रही है। सीएम ने भी इसे व्यापक डेमोग्राफी परिप्रेक्ष्य में देखने की बात कही है।