Home Blog Page 96

बांग्लादेश चुनाव में केवल 4% महिला उम्मीदवार, उन्हें भी मिल रहीं रेप-हत्या की धमकियाँ: शेख हसीना- खालिदा जिया के देश में महिलाओं के नेतृत्व के खिलाफ कट्टरपंथी

बांग्लादेश में दो ताकतवर महिला नेताओं ने सफलतापूर्वक दशकों तक राज चलाया। अवामी लीग की शेख हसीना और बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी की दिवंगत खालिदा जिया। कट्टरपंथी अब कहते हैं कि महिलाएँ कौम का नेतृत्व नहीं कर सकतीं इसलिए मात्र 4 फीसदी महिलाओं को पार्टियों ने उम्मीदवार बनाया है। इन महिलाओं को यौन उत्पीड़न, चरित्र हनन और ऑनलाइन ट्रोलिंग का सामना करना पड़ रहा है। शेख हसीना को पद से हटाने के बाद जिस तरह से कट्टरपंथियों का राज वहाँ आ गया है, निकट भविष्य में महिलाओं के दिन अच्छे नहीं आने वाले।

30 पार्टियों ने एक भी महिला को नहीं दिया टिकट

15 फरवरी को बांग्लादेश में आम चुनाव है। इसके लिए 51 पार्टियों ने 1981 उम्मीदवार चुनाव मैदान में उतारे हैं। इनमें सिर्फ 78 महिलाएँ हैं। करीब 30 पार्टियों ने एक भी महिला को टिकट नहीं दिया। शेख हसीना की पार्टी आवामी लीग को चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। खालिदा जिया दुनिया छोड़ चुकी है। उनकी पार्टी बीएनपी ने 10 महिलाओं को टिकट दिया है।

द डेली स्टार के मुताबिक, जमात-ए-इस्लामी, इस्लामी आंदोलन बांग्लादेश, बांग्लादेश खिलाफत मजलिस, खिलाफत मजलिस, बांग्लादेश इस्लामी फ्रंट, लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी, जोनोतार दल, बांग्लादेश सांस्कृतिक मुक्ति जोत, बांग्लादेश कांग्रेस, जातीय पार्टी , बांग्लादेश खिलाफत आंदोलन, बांग्लादेश नेशनलिस्ट फ्रंट और बांग्लादेश जसद समेत कम से कम 30 पार्टियों ने सिर्फ पुरुष उम्मीदवार को चुनाव मैदान में उतारा है।

जानकारी के मुताबिक, 78 महिलाओं में से एक तिहाई भी खुद राजनीतिज्ञ नहीं हैं, बल्कि असरदार राजनीति लोगों की रिश्तेदार हैं, पार्टी नेताओं की पत्नियाँ, बेटियाँ या परिवार की सदस्य हैं।

बांग्लादेश में आधी से ज्यादा आबादी औरतों की है। देश में पुरुषों और औरतों का अनुपात 97 : 100 है। इसके बावजूद देश में मात्र 3.93 परसेंट औरतों को उम्मीदवार बनाया गया है। 78 महिला उम्मीदवारों में से 61 को 21 राजनीतिक पार्टियों ने टिकट दिया है, जबकि 17 निर्दलीय हैं।

रिप्रेजेंटेशन ऑफ द पीपल ऑर्डर 1972 के तहत पॉलिटिकल पार्टियों को सेंट्रल लेवल सहित कमिटी में कम से कम 33 फीसदी पद महिलाओं के लिए आरक्षित करना जरूरी है, लेकिन कोई भी पार्टी ऐसा करने में नाकाम रही तो 2021 में चुनाव आयोग ने इसकी मियाद 2030 तक बढ़ा दी।

महिला नहीं कर सकती कौम का नेतृत्व- जमात

जमात-ए-इस्लामी के अमीर शफीकुर रहमान जैसे नेता खुलेआम कहते हैं कि महिला पार्टी, समाज या देश का नेतृत्व नहीं कर सकतीं, इसलिए उनकी पार्टी ने किसी महिला को टिकट नहीं दिया।
कुछ ऐसा ही बयान हिफाजत ए इस्लाम जैसी इस्लामिक संगठन का भी है। इसके नेता अजीज उल हक का कहना है कि जिस कौम का लीडर महिला होता है, वह कौम तरक्की नहीं कर सकती। उन्होंने अमेरिका का उदाहरण देते हुए कहा कि अमेरिका में आज तक कोई महिला राष्ट्रपति नहीं बन पाई। उन्होंने यहाँ तक कहा कि बांग्लादेश में शरिया कानून लागू होना चाहिए।

जमात-ए-इस्लामी महिला विंग की सेक्रेटरी नूरुन्निसा सिद्दिका ने कहा, “कुरान के अनुसार, पुरुष महिलाओं के डायरेक्टर होते हैं, जिसे इस्लाम में एक आदेश और जिम्मेदारी माना जाता है।” सिद्दिका ने महिलाओं को टिकट नहीं दिए जाने को ‘संगठन का फैसला’ बताया।

मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि ऐसे बयान पितृसत्तात्मक मानदंडों को मजबूत करते हैं। इससे महिलाएँ और भी राजनीति से दूर हो गई है। महिलाओं में जबरदस्त असुरक्षा की भावना है और ऐसे बयान उन्हें हतोत्साहित करते हैं। राजनीत जैसे क्षेत्र में आने के लिए विश्वास की काफी जरूरत है, मानवाधिकार कार्यकर्ता भी कट्टरपंथी बयानों से बेहद चिंतित हैं।

महिलाओं को मिल रही धमकियाँ

कई महिला उम्मीदवारों का कहना है कि उन्हें ऑनलाइन और जमीनी स्तर पर उत्पीड़न का सामना करना पड़ रहा है। साइबरबुलिंग, यौन उत्पीड़न की धमकी, चरित्र हनन करने की कोशिश की जा रही है। उनके खिलाफ साजिश रची जा रही है, ताकि चुनाव मैदान छोड़ दें।

नेशनल सिटिजन पार्टी यानी एनसीपी की उम्मीदवार दिलशाना पारुल का कहना है कि उन्हें हेडस्कार्फ को लेकर ट्रोल किया जा रहा है। हिजाब पर छींटाकशी की जा रही है। ट्रोल करने वालों में तथाकथित प्रोग्रेसिव लोग भी शामिल हैं। उनका कहना है कि पुरुष नेताओं को उनकी कार्यशैली, भ्रष्टाचार जैसे वजहों से आलोचना की जाती है, लेकिन महिलाओं के चरित्र पर आसानी से वार कर देते हैं।

एनसीपी की एक और उम्मीदवार नबीला तस्नीद ढाका 20 से चुनाव मैदान में हैं। उनका कहना है कि उनके बैनर पोस्ट तक फाड़ दिए गए। अधिकारियों ने उन्हें मदद करने के बजाए किसने किया उसका वीडियो लाने को कह रहे हैं। उन्हें डराया धमकाया जा रहा है।

एक और उम्मीदवार तस्लीमा अख्तर का कहना है कि ऑनलाइन उन्हें धमकियाँ मिल रही हैं। ऑनलाइन टारगेट करना आसान होता है। उनका कहना है कि देश की कानून व्यवस्था काफी लचर है, महिलाओं को घर में रहने के लिए मजबूर कर दिया गया है। इसलिए महिलाएँ वोट डालने कितनी निकलेंगी, ये भी बड़ा सवाल है।

जमीन पर संघर्ष कर राजनीति में आगे बढ़ने वाली महिलाएँ काफी कम है। इसके पीछे पारिवारिक माहौल है। कोई नहीं चाहता कि उनके घर की बेटी अनसेफ हो। इसलिए राजनीति में नहीं आने देते।

दो दशक बाद लाहौर में लौटा ‘बसंत’ लेकिन अपने गढ़े इतिहास के साथ, हिंदू संस्कृति को नकार खुसरो से जोड़ा नाता: जानिए क्यों लग रहे हैं पाकिस्तान पर ‘कल्चर चोरी’ के आरोप

पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में दो दशक बाद आधिकारिक तौर पर बसंत उत्सव मनाया गया। लाहौर का आसमान एक बार फिर रंग-बिरंगी पतंगों से पट गया। 6 से 8 फरवरी 2026 तक शहर में जमकर पतंगबाजी हुई। पंजाब की मुख्यमंत्री मरियम नवाज ने खुद इसे प्रमोट किया है। इस दौरान सोशल मीडिया पर भारतीयों ने सवाल किए कि पाकिस्तान बसंत पंचमी त्योहार के नाम पर केवल पतंगबाजी करके कल्चर चोरी करने की कोशिश कर रहा है।

पाकिस्तान ने इसे ‘पंजाबी कल्चरल फेस्टिवल’ कहने की पूरी कोशिश की। इस दौरान निगरानी के लिए ड्रोन तैनात किए गए, QR-कोड वाली पतंगों की बिक्री हुई लेकिन पतंगों के आसमान में लौटने के बावजूद कई कमियाँ दिखी। सोशल मीडिया X पर कई यूजर्स ने कहा कि पाकिस्तान में मनाया जाने वाला बसंत भारत की बसंत पंचमी से बिल्कुल अलग है। यूजर्स ने दावा किया कि इसे लाहौर में अमीर खुसरो ने पतंग उड़ाने वाले बसंत के रिवाज के तौर पर शुरू किया था, जिसका हिंदू परंपरा या भारतीय सभ्यता से कोई लेना-देना नहीं है।

भारत में पतंग उड़ाने और बसंतोत्सव का इतिहास रहा है। लेकिन आमिर खुसरो की कहानी सदियों पुरानी सभ्यता की निरंतरता को एक सूफी कहानी तक सीमित कर देता है। जानबूझकर सांस्कृतिक भागीदारी और सांस्कृतिक शुरुआत के बीच की लाइन को धुँधला कर देता है। यह एक तरह से सांस्कृतिक चोरी है। त्योहार, उत्सव और उसकी परंपराएँ स्थानीय पहचान को बतलाती हैं।

इस्लाम और खुसरो से पहले बसंत की हुई शुरुआत

बसंत कोई ऐसा ‘मौसमी त्योहार’ नहीं है, जो पंजाब में मनाने की परंपरा हो। यह वसंत (बसंत) मनाने का एक आम तरीका है, जो भारतीय संस्कृति से जुड़ा है। यह इस्लाम के आने से पहले से ही मनाया जाता रहा है। परंपरागत संस्कृत साहित्य, मंदिर कैलेंडर और इलाके की लोक परंपराएँ, सभी बसंत को खेत और फसलों से जोड़ती है। बसंत का खास रंग पीला, कोई सजावटी इत्तेफाक नहीं है। यह पकते हुए सरसों के खेतों, बदलते खेती के चक्र और पूरे उत्तर भारत की उपजाऊ शक्ति को दिखाता है।

ये निशानियाँ लोकल संस्कृति में किसी भी सूफी जुड़ाव से सदियों पहले से मौजूद थीं। जब तक पंजाब और दिल्ली में मुस्लिम राज आया, बसंत पहले से ही एक सामाजिक सच्चाई बन चुका था। प्रकृति से जुड़ा यह पर्व खुद में एक परंपरा थी।

इसके बाद जो हुआ वह कोई नई खोज नहीं बल्कि बदलाव था। यह फर्क बहुत जरूरी है। जब मुस्लिम हमलावरों, अमीर लोगों या आम लोगों ने बसंत में हिस्सा लिया, तो वे पहले से ही बनी बनाई परंपरा का पालन कर रहे थे। इसलिए इनके आने से त्योहार में शुरुआत में कोई बदलाव नहीं आया। ये फसल चक्र से जुड़ा था इसलिए इसे कोई बदल भी नहीं सकता था।

अमीर खुसरो के साथ बसंत का संबंध अलग तरह का

बसंत के साथ अमीर खुसरो का रिश्ता समझ में आता है। ऐतिहासिक तौर पर खुसरो ने बसंत मनाने को शुरुआत लाहौर में नहीं बल्कि दिल्ली की निजामुद्दीन दरगाह में की थी। इसे किसी त्योहार से नहीं बल्कि एक घटना से जोड़ते हैं। कहा जाता है कि अपने जवान भतीजे की मौत के बाद हजरत निजामुद्दीन औलिया दुख में डूब गए थे। उस वक्त अमीर खुसरो भी थे, जिनकी शायरी में फारसी दरबारी कल्चर और लोकल बोलचाल दोनों था।

परंपरा के अनुसार, खुसरो को पीले कपड़े पहने और फूल लिए हिंदू महिलाओं का एक ग्रुप मिला, जो बसंत मनाने के लिए कालकाजी मंदिर जा रही थीं। खुसरो ने पीले रंग की पोशाक धारण की और दरगाह वापस आ आए। उन्हें देख कर उनके गुरु का दुख कुछ देर के लिए कम हो गया। इस घटना की याद में निजामुद्दीन दरगाह में बसंत का त्योहार आज भी रस्म के तौर पर मनाया जाता है।

दिल्ली में एक खास सूफी दरगाह पर बसंत मनाने की परंपरा का न तो बसंत के महत्व से कोई लेना देना है और न ही बसंतोत्व से। इससे ये दावा भी गलत साबित होता है कि खुसरो ने बसंत को एक मुस्लिम त्योहार के तौर पर ‘शुरू’ किया।

लाहौर में पतंग उड़ाने की परंपरा दिल्ली के बाद हुई। आज का कोई भी फारसी इतिहास या ऐतिहासिक ब्यौरा ऐसा दावा नहीं करता कि दिल्ली से पहले लाहौर में पतंगबाजी हुई। आज जो समझाने की कोशिश की जा रही है, वह इतिहास नहीं है, बल्कि मनगढ़ंत कहानियाँ है।

इस्लाम से पहले शुरू हुई बसंत पंचमी उत्सव

पाकिस्तान का इस्लाम से पहले के इतिहास के साथ रिश्ता हमेशा से अजीब रहा है। हिंदू मंदिरों को खत्म कर इतिहास बदलने की कोशिश की गई। किताबों में भारतीय इतिहास को नजरअंदाज किया गया। लेकिन बसंतोत्सव पंजाब के सामाजिक जीवन में इतनी गहराई से जुड़ा हुआ है कि इसे पूरी तरह से खत्म नहीं किया जा सकता।

इसका एकमात्र उपाय यह रहा है कि त्योहार को बनाए रखा जाए और इसकी शुरुआत को अपने तरीके से बताया जाए। बसंत को भारतीय त्योहार के बजाय ‘पंजाबी’ त्योहार, हिंदू त्योहार के बजाय मुस्लिम कल्चरल रिवाज और इस्लाम से पहले की परंपरा के बजाय खुसरो की परंपरा बताना, इसे नए तरीके से परिभाषित करना ही है। बिना भारतीय सभ्यता की विरासत को अपनाए पाकिस्तान को इस त्योहार को मनाने का मौका मिलता रहा है।

यही कल्चरल चोरी का मतलब है, रिवाज को बनाए रखना, सोर्स को मिटा देना।

नहीं मिटा सकते विरासत को

पाकिस्तान में पंजाबियों का बसंत मनाना नकल नहीं है। आखिर, कल्चर बॉर्डर की सीमा से बाहर है। लेकिन किसी त्योहार को उसकी शुरुआत को नकारते हुए मनाना बेईमानी है। बसंत को इस्लामिक पहचान की जरूरत नहीं है। अमीर खुसरो को सभ्यता और परंपरा का निर्माता बनाने की जरूरत नहीं है। और पंजाबी कल्चर को मनाने के लिए इतिहास को भूलने की जरूरत भी नहीं है।

आप पतंग उड़ा सकते हैं। आप शहर को पीला रंग सकते हैं, लेकिन आप उस डोर को नहीं काट सकते जो बसंत को उसकी भारतीय, हिंदू, सभ्यता की जड़ों से जोड़ती है, चाहे कहानी कितनी भी बार लिखी जाए।

(मूल रूप से यह लेख अंग्रेजी में लिखा गया है, इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

ठाकुर हूँ ब@%$ मत करना… जिस वायरल वीडियो को देख सवर्णों पर उठाए गए सवाल, जानिए उस अधूरे क्लिप पर क्या बोलीं HDFC कर्मचारी: बताया- अब रेप तक की मिल रही धमकियाँ

इन दिनों सोशल मीडिया पर एक वीडियो खूब चर्चा में है। वीडियो में HDFC बैंक की कर्मचारी आस्था सिंह गुस्से में कहती हैं- ठाकुर हूँ… ब@%$ मत करना। लोगों ने इस वीडियो पर प्रतिक्रिया देते हुए आस्था सिंह पर जातिवाद के आरोप लगाने शुरू कर दिए। लेकिन आस्था सिंह ने पूरे मामले में सफाई देते हुए कहा कि अधूरी वीडियो पर उन्हें गालियाँ दी जा रही है, जबकि यह पूरा सच नहीं है। उन्होंने यह भी दोहराया कि वह ठाकुर हैं, और इस पर उन्हें गर्व है।

यह वीडियो ऐसे समय में वायरल हुई है, जब देशभर में UGC के नए नियमों को लेकर विवाद छिड़ा हुआ है। एक तरफ जहाँ UGC के नए नियमों को लेकर ब्राह्मण, ठाकुर और पूरे सवर्ण समाज को ताक पर रखा जा रहा है, वहीं समाज की निचली जाति इन सवर्ण समाज के लोगों पर सालों से भेदभाव और जातिवाद के आरोप लगा रहे हैं। ऐसे में आस्था सिंह नाम की HDFC कर्मचारी का वीडियो सामने आया और लोगों ने इस अधूरी और एकतरफा जानकारी के साथ आस्था पर जातिवाद के आरोप लगाने शुरू कर दिए।

सोशल मीडिया पर लोगों ने आस्था को ‘जातिवाद’ पर घेरा

सोशल मीडिया पर आस्था सिंह की यह वीडियो खूब वायरल तो हुई, लेकिन लोगों को निशाना बनते हुए। लोगों ने उन पर जातिवाद करने के आरोप लगाए। इतना ही नहीं इस वीडियो के तहत पूरे सवर्ण समाज को भी घेरने की भी कोशिश की गई है।

एक ‘एक्स’ यूजर सूरज कुमार बौद्ध लिखते हैं, “HDFC की कर्मचारी आस्था सिंह ने बैंक परिसर में अपनी जाति का प्रदर्शन किया और बेशर्मी से एक ग्राहक को पीटने की कोशिश की। इस ‘मनु की नातिन’ से सिर्फ नफरत ही पैदा होती है। HDFC को इस जातिवादी मसखरे को तुरंत निकाल देना चाहिए।”

Nher_who नाम के एक्स यूजर कहते हैं, “उसने बैंक परिसर में अपनी जाति का प्रदर्शन किया और एक ग्राहक को पीटने की कोशिश की। यह जातिवादी लोगों का असली चेहरा है, जो एक बार फिर साबित करता है कि UGC की आवश्यकता क्यों है।”

वहीं एक अन्य विंगमैन नाम का यूजर कहता है, “पुराने जमाने में लोग शांति कायम करने के लिए उसे विदेशी आक्रमणकारियों को सौंप देते थे। लेकिन आज वे इसे जातिगत गौरव के रूप में दिखा रहे हैं। छी!”

एक सुमित नाम के यूजर ने तो यह तक कहा, “इसीलिए हमें निजी क्षेत्र में भी आरक्षण की आवश्यकता है।”

यही नहीं, कई आधिकारिक सोशल मीडिया हैंडल से भी वीडियो को शेयर कर आपत्तिजनक टिप्पणी की गई। यहाँ तक कि राजपूतों और उनके राजाओं को निशाना बनाते हुए इतिहास को बदनाम किया गया, ठाकुरों को निशाना बनाते हुए महिलाओं को बेइज्जत तक किया गया। वो भी सिर्फ 10 सेकेंड की वायरल वीडियो से, जो कि अधूरा सच है।

आस्था के सपोर्ट में उतरे नेटिजंस

वहीं सोशल मीडिया पर कुछ लोग आस्था सिंह के सपोर्ट में भी उतरे। उन्होंने वीडियो अधूरी क्लिप को देखकर जातिवाद की टिप्पणी करने का विरोध किया। साथ ही खुद का बचाव करने के लिए आस्था सिंह की तारीफ भी की।

एक्स यूजर ‘बींग पॉलिटिकल’ ने कहा, “एक 10 सेकंड के क्लिप पर लोग भड़क उठे और ‘जातिवाद’ का आरोप लगाने लगे, सिर्फ इसलिए कि उसने कहा ‘मैं ठाकुर हूँ’… लेकिन जब ग्राहक ने कथित तौर पर पहले उसे गाली दी थी, तब आक्रोश कहाँ था? बैंक कर्मचारी आस्था सिंह ने उकसाए जाने पर पलटवार किया, फिर भी हेडलाइन बन गई ‘बैंक में ठाकुरों का अहंकार’। क्या ये दोहरा मापदंड नहीं है? इसे एक और ‘उच्च जाति बुरी’ तमाशा बनाने से पहले पूरा संदर्भ देखें।”

एक यूजर ने लिखा, “मुझे अपनी जाति पर गर्व करने वाली महिलाओं के लिए सम्मान है। किसी भी जाति की हों। यह एक क्रॉप किया हुआ वीडियो है, इसलिए मैं कोई राय नहीं दूँगा। लगता है उसे उकसाया गया था। और हमारे देश में इस मामूली झगड़े से कहीं ज़्यादा गंभीर मुद्दे हैं।”

एडवोकेट आशुतोष जे दुबे नाम के यूजर ने कहा, “इस एक कटी हुई क्लिप का इस्तेमाल महिला को निशाना बनाने के लिए किया जा रहा है। पूरा वीडियो स्पष्ट रूप से दिखाता है कि पहले उसके साथ दुर्व्यवहार किया गया था। उसने आत्मरक्षा में जवाब दिया, अपनी पहचान पर ज़ोर दिया और किसी के साथ भेदभाव नहीं किया। तो फिर जाति आधारित भेदभाव कहाँ है? एडिटेड क्लिप नहीं, पूरा संदर्भ देखें।”

यदु सिंह नाम के एक्स यूजर ने लिखा, “जब आप किसी के साथ दुर्व्यवहार करते हैं, उसे परेशान करते हैं और गाली देते हैं (इस मामले में, आस्था सिंह के साथ), तो वह व्यक्ति आपको मौखिक रूप से जवाब दे सकता है और आपको फटकार लगा सकता है। आत्मसम्मान एक वैध अवधारणा है, और ठाकुर या किसी अन्य जाति का होना अपराध नहीं है।”

उन्होंने आगे कहा, “भारतीय न्याय संहिता 2023 (BNS) के किसी भी धारा का उल्लंघन नहीं किया गया है। अधूरा वीडियो साझा करना कायरता है। एजेंडा फैलाने वाले लोग अपना घिनौना खेल खेल रहे हैं।”

वायरल वीडियो पर आस्था का बयान

वायरल वीडियो पर आक्रोश के बाद खुद आस्था सिंह ने सामने आकर सफाई दी और लोगों को पूरा सच बताया है। उन्होंने घटनाक्रम के बारे में बताते हुए कहा कि वह अब भी अपने बयान पर टिकी हैं, वह ठाकुर होने पर गर्व महसूस करती हैं। आस्था सिंह की इस वीडियो के बाद जातिवाद करने वाले लोगों के मुँह बंद हो गए हैं।

वीडियो जारी कर आस्था सिंह ने बताया कि यह घटनाक्रम 06 जनवरी 2026 का है, जब बैंक में साथी कर्मचारी रितु त्रिपाठी के इस्तीफे से संबंधित कामकाज जारी था। आस्था बताती हैं कि रितु ने इस्तीफा देकर उसी दिन रिलीविंग की माँग की थी। इस दौरान रितु की ननद सुबह से ही बैंक ब्रांच में मौजूद थी, जिसमें हल्की बहस हो गई।

उन्होंने कहा कि बाद में रितु ने यह बात अपने पति ऋषि त्रिपाठी को बताई, जो बैंक बंद होने के वक्त ब्रांच में आए और अभ्रदता करने लगे। आस्था ने कहा कि रितु के पति ने उनकी डेस्क पर आकर उनकी जाति पूछी और धमकी दी- “मैं तुम्हारी हेकड़ी निकाल दूँगा। सारी की सारी गर्मी निकाल दूँगा।”

आस्था ने बताया जो वीडियो वायरल है, वो अधूरी क्लिप है। सिर्फ आस्था की प्रतिक्रिया की, जो उन्होंने खुद पर की गई अभद्र टिप्पणी के बाद जाहिर की। उन्होंने कहा कि वीडियो को जातिवाद का मुद्दा बनाकर पेश किया गया। आस्था ने कहा कि इसके बावजूद वह अपने बयान पर टिकी रहेंगी। वह कहती हैं, “कोई बदतमीजी से बात करेगा, तो बर्दाश्त नहीं करूँगी। मैं ठाकुर हैं और इस पर गर्व करती हूँ।”

आस्था ने कहा- रेप की धमकी मिली

इसके अलावा वायरल वीडियो पर मीडिया से बात करते हुए उन्होंने बताया कि इस मामले में उन्हें रेप करने और बाल काटने तक की धमकी दी जा रही हैं। वे कहती हैं, “हर इंसान फेमस होना चाहता है, लेकिन गलत तरीके से नहीं। मैं गलत मायने में फेमस हो रही हूँ।”

कंपनी के रुख पर आस्था सिंह कहती हैं, “इस केस में इंटरनल मेल अपने सीनियर्स को फॉरवर्ड कर दिया है। सबको पता है कि मैं गलत नहीं हूँ, इसलिए हमें इसमें इतना एक्शन लेने की जरूरत नहीं थी। मगर जब इस तरीके की चीजें हो रही हैं, तो मैं बिल्कुल मानहानि का केस करना चाहूँगी।”

हेकड़ी गुम, अब ‘भिखमंगा पाकिस्तान’ को चाहिए पैसा: भारत के साथ T20 विश्व कप मैच को लेकर PAK में बवाल

T20 वर्ल्ड कप में भारत पाकिस्तान के बीच 15 फरवरी को मुकाबला होना है, लेकिन पाकिस्तान ने इसके बहिष्कार का ऐलान किया है। इस मुद्दे पर आईसीसी के दो प्रतिनिधि इमरान ख्वाजा और मुबाशिर उस्मानी लाहौर गए हुए हैं और उनकी पाकिस्तान क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड के साथ बैठक हुई है। पीसीबी चेयरमैन नकवी ने अब प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ से बात कर आईसीसी को जानकारी देने की बात कही है।

उम्मीद की जा रही है कि पाकिस्तान अपना फैसला बदलेगा और भारत के साथ मैच खेलने के लिए तैयार हो जाएगा। दरअसल भारत-पाकिस्तान का मैच आईसीसी के लिए काफी अहम है और इसे सबसे बड़ा कॉमर्शियल मैच माना जाता है।

मेजबान श्रीलंका ने भी पाकिस्तान को लिखा खत

पाकिस्तान के सारे मैच श्रीलंका में हो रहे हैं और भारत के साथ प्रस्तावित मैच भी कोलंबो के प्रेमदासा स्टेडियम में खेला जाना है। मेजबान श्रीलंका ने पीसीबी को कहा है कि बड़े मुकाबले रद्द होने से उन्हें आर्थिक नुकसान उठाना पड़ेगा, इसलिए फैसले पर पुनर्विचार करें।

आईसीसी और पीसीबी की बैठक

आईसीसी के साथ पाकिस्तान क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड की बैठक हुई है। इसके बाद पीसीबी चेयरमैन मोहसीन नकवी ने कहा है कि वह शहबाज शरीफ को सारी बातें बताएँगे, फिर फैसला लिया जाएगा यानी ये फैसला राजनीतिक होगा।

इस बीच खबर यह भी है कि पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड ने आईसीसी के सामने खेलने के लिए शर्तें रखी हैं। इनमें ICC रेवेन्यू में ज़्यादा हिस्सेदारी और द्विपक्षीय क्रिकेट की बहाली से लेकर मुआवजे से जुड़ी माँगें शामिल हैं यानी भारत के साथ खेल के बहिष्कार का मुद्दा आईसीसी को बारगेन कर पैसा वसूली भी हो गया है। ये पीसीबी का आत्मविश्वास नहीं, बल्कि कमजोरी को दिखाता है।

बांग्लादेश को लेकर भी रखी शर्तें

बांग्लादेश की क्रिकेट में योगदान का हवाला देते हुए आईसीसी से ज्यादा फंडिंग की डिमांड की गई है। पीसीबी का तर्क है कि बांग्लादेश में इंफ्रास्ट्रक्चर, नए खिलाड़ियों और नेशनल टीम को स्टंडर्ड बनाए रखने के लिए आर्थिक सहायता ज्यादा दिया जाए।

टी20 से बाहर होने के बावजूद बांग्लादेश की पार्टिसिपेशन फीस न काटी जाए। इसके अलावा, बांग्लादेश में क्रिकेट को बढ़ावा देने और ग्लोबल पहचान बनाने के लिए आईसीसी टूर्नामेंट की मेजबानी का मौका दिया जाए। बोर्ड का दावा है कि इसके लिए बांग्लादेश के पास जरूरी सुविधाएँ मौजूद हैं। हालाँकि बांग्लादेश के मुद्दे को लेकर आईसीसी ने साफ कर दिया है कि उसके पास मुआवजा के तौर पर बांग्लादेश को देने के लिए कुछ नहीं है, सिर्फ आईसीसी की कमाई का हिस्सा मिल सकता है।

पाकिस्तान पर खेलने का दबाव

भारत-पाकिस्तान T20 वर्ल्ड कप मैच को लेकर फैसला राजनीतिक रूप से लेने को क्रिकेट के प्रति संवेदनशीलता कम और राजनीतिक दखलंदाजी ज्यादा माना जा रहा है। भारत के साथ न खेलने का ऐलान भी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने ही किया था।

अब एक T20 मैच खेलने के लिए पाकिस्तान के कैबिनेट की रजामंदी चाहिए। यह दिखाता है कि पाकिस्तान में राजनीति ने खेलों पर कितना कब्जा कर लिया है। पीसीबी संवैधानिक तौर पर इतना कमजोर है कि क्रिकेट की सेहत को मजबूत करने की उसमें ताकत ही नहीं है। वह राजनीति को क्रिकेट से अलग नहीं रख पा रहा। ये बात भी उतनी ही सही है कि जब पीसीबी का चेयरमैन मोहसिन नकवी खुद पाकिस्तान का एक मंत्री है, तो क्रिकेट और राजनीति अलग कैसे रह सकते हैं।

मोहसिन नकवी पाकिस्तान के लॉ एंड ऑर्डर के लिए ज़िम्मेदार मंत्री हैं। PCB चीफ के तौर पर क्रिकेट से जुड़े फैसले लेने की उन पर जिम्मेदारी है। ऐसे में क्रिकेट पर फैसला स्वतंत्र रूप से कैसे लिया जा सकता है।

दूसरी तरह क्रिकेट के प्रशंसकों को इस बात पर गुस्सा आ रहा है कि राजनीति की वजह से शहबाज सरकार भारत से क्रिकेट खेलने को लेकर आईसीसी से सौदेबाजी कर रही है। लोगों के गुस्से को सरकार भी महसूस कर रही है।

एक सीनियर पाकिस्तानी सरकारी सूत्र के हवाले से सीएनएन न्यूज18 ने कहा, “कैबिनेट में चर्चा क्रिकेट के बारे में नहीं है। यह एक ऐसी सरकार की बैठक है, जो जनता के गुस्से को झेलने से बचने के लिए बहाने सोच रही है।” ये गुस्सा सिर्फ क्रिकेट को लेकर नहीं है। पाकिस्तानी सरकार अपने देश में ही घिर गई है। देश में महँगाई और बेरोजगारी चरम पर है। सेना सरकार पर हावी है और हर तरफ फौज के खिलाफ जनता सड़कों पर दिखाई दे रही है। बलुचिस्तान से लेकर खैबर पख्तूनख्वाँ में जनता विद्रोह कर चुकी है और पाकिस्तानी फौजियों को पीट रही है।

ऐसे में जनता का ध्यान भटकाने के लिए क्रिकेट का मुद्दा सरकार के हाथ में आया है। भारत के साथ मैच अब पाकिस्तानियों के सेंटिमेंट से जुड़ा मुद्दा है। भारत के साथ मैच को मुद्दा बना कर शहबाज शरीफ सरकार राजनीतिक फायदा उठाने में लगी है और पीसीबी आर्थिक हालत को सुधारने में। इसलिए पाकिस्तान मैच खेलने को लेकर बारगेन कर रहा है, ताकि अधिक से अधिक वसूली की जा सके।

कैसे शुरू हुआ था ड्रामा

ICC T20 वर्ल्ड कप में ग्रुप A का मैच 15 फरवरी को कोलंबो में भारत बनाम पाकिस्तान है। टूर्नामेंट का सबसे बड़ा माना जाने वाला ये मैच पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड (PCB), इंटरनेशनल क्रिकेट काउंसिल (ICC) और पाकिस्तान की सियासत के बीच फँस गई है।

पाकिस्तान ने सबसे पहले क्रिकेट की दुनिया को यह ऐलान करके चौंका दिया कि वह भारत के मैच का बॉयकॉट करेगा, जबकि उसकी टीम टूर्नामेंट में बनी हुई है। सोशल मीडिया पर पाकिस्तान सरकार का रुख सामने आया, इसमें कहा गया कि टीम भारत के खिलाफ पाकिस्तान की टीम ‘मैदान में नहीं उतरेगी।’ यह कदम बांग्लादेश के साथ ‘एकजुटता’ दिखाने के लिए किया गया था, क्योंकि बांग्लादेश की टीम को आईसीसी ने टूर्नामेंट से बाहर कर दिया था। दरअसल बांग्लादेश क्रिकेट बोर्ड ने भारत में मैच नहीं खेलने की बात कही थी और इसके लिए सुरक्षा का हवाला दिया था, जिसे आईसीसी ने रिजेक्ट कर दिया।

अंबाजी में ‘शक्ति कॉरिडोर परियोजना’: शक्तिपथ से लेकर विश्व स्तरीय सुविधाओं तक, कैसे होगा देवी धाम का कायाकल्प?

गुजरात के बनासकांठा जिले में स्थित आद्यशक्ति धाम अंबाजी भारत के 51 शक्तिपीठों में विशेष स्थान रखता है। माँ अम्बा के दर्शन के लिए हर वर्ष लाखों श्रद्धालु इस पवित्र स्थल पर पहुँचते हैं खासकर भादरवी पूर्णिमा महा मेले के दौरान यहाँ भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्रेरणा और मार्गदर्शन से गुजरात सरकार इस स्थान को विश्वस्तरीय आधुनिक और आदर्श तीर्थ स्थल बनाने के उद्देश्य से महत्वाकांक्षी शक्ति कॉरिडोर (अंबाजी-गब्बर कॉरिडोर) प्रोजेक्ट शुरू कर रही है। मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल ने इस परियोजना का शिलान्यास किया है।

इस परियोजना की कुल अनुमानित लागत 1,632 करोड़ रुपए है जिसमें से विकास कार्यों के पहले चरण के लिए 950 करोड़ रुपए का निवेश किया जाएगा। यह दूरदर्शी मास्टर प्लान अगले 25 वर्षों तक श्रद्धालुओं की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है। इस परियोजना को गुजरात पवित्र यात्रा धाम विकास बोर्ड और अरासुरी अंबाजी माता देवस्थान ट्रस्ट के सहयोग से किया जा रहा है।

अंबाजी शक्ति कॉरिडोर प्रोजेक्ट के पहले फेज की रखी गई नींव

अंबाजी शक्ति कॉरिडोर परियोजना के प्रथम चरण का शिलान्यास 7 फरवरी 2026 को ऐतिहासिक समारोह में किया गया। मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल ने आद्यशक्ति धाम अंबाजी पहुँचने के बाद सबसे पहले माता अम्बा के दर्शन किए। इसके बाद उन्होंने औपचारिक रूप से 950 करोड़ रुपए की लागत से होने वाले विभिन्न विकास कार्यों का शिलान्यास किया। यह समारोह अंबाजी के मुख्य मंदिर परिसर में आयोजित हुआ जिसमें श्रद्धालुओं, स्थानीय लोगों, अधिकारियों और राजनीतिक प्रतिनिधियों की भी उपस्थिति रही।

मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल हेलीकॉप्टर से अंबाजी के निकट चिखला हेलीपैड पर उतरे और वहाँ से सीधे मंदिर परिसर पहुँचे। इस अवसर पर उन्होंने कहा कि यह परियोजना PM मोदी की प्रेरणा और मार्गदर्शन में ‘विकास भी विरासत भी’ के मंत्र को अपनाते हुए लागू की जा रही है। उन्होंने बताया कि अगले 25 वर्षों तक श्रद्धालुओं की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर तैयार किया गया यह दूरदर्शी मास्टर प्लान अंबाजी को विश्वस्तरीय तीर्थ स्थल के रूप में विकसित करेगा।

प्रथम चरण में पूरे किए जाने वाले काम

प्रथम चरण में 950 करोड़ रुपए की लागत से होने वाले ये कार्य कुल 1,632 करोड़ रुपए की मेगा परियोजना का हिस्सा हैं, जिसे दो चरणों में लागू किया जाएगा। इस चरण का मुख्य उद्देश्य श्रद्धालुओं की सुविधा, सुरक्षा और आध्यात्मिक अनुभव को और बेहतर बनाना है। इसके तहत मल्टी-लेवल पार्किंग का निर्माण किया जाएगा, जिससे वाहनों की आवाजाही और यातायात जाम को पूरी तरह नियंत्रित किया जा सकेगा।

इसके अलावा अंडरपास सड़कें और पैदल मार्ग बनाए जाएँगे जिससे श्रद्धालुओं को सड़क पार करने में सुरक्षित और सहज सुविधा मिलेगी। परियोजना के अंतर्गत आधुनिक तीर्थयात्री आवास का निर्माण किया जाएगा जिसमें आरामदायक ठहरने की व्यवस्था, स्वच्छता और अन्य बुनियादी सुविधाएँ शामिल होंगी। दिव्य दर्शन चौक का निर्माण किया जाएगा जहाँ श्रद्धालुओं को विशेष दर्शन और आध्यात्मिक माहौल मिलेगा।

शक्तिपथ का निर्माण भी किया जाएगा जो लगभग 2.5 किलोमीटर लंबा भव्य मार्ग होगा और मुख्य मंदिर को गब्बर पर्वत तथा मानसरोवर से जोड़ेगा। परियोजना के अंतर्गत एक एम्फीथिएटर का निर्माण किया जाएगा जहाँ सांस्कृतिक कार्यक्रम, गरबा, मेले और अन्य आयोजनों का आयोजन किया जा सकेगा। इसके अलावा लाइट एंड साउंड शो को उन्नत और विस्तारित किया जाएगा जो गब्बर पर्वत पर देश का सबसे बड़ा शो बनेगा और इसमें पौराणिक कथाओं तथा माता जी की महिमा दिखाई जाएगी।

इसके अतिरिक्त, इवेंट प्लाजा, सांस्कृतिक ग्राम और चाचर चौक का तीन गुना विस्तार किया जाएगा जिसके जरिए मेलों और परिक्रमा के लिए अधिक स्थान उपलब्ध हो सके। आध्यात्मिक गैलरी, पौराणिक भित्तिचित्रों और गब्बर पर्वत के लिए केबल कार यानी रोपवे को भी उन्नत किया जाएगा।

इस समारोह में राज्य मंत्री प्रवीनभाई माली, डॉ. जयरामभाई गामित, कमलेशभाई पटेल, स्वरूपजी ठाकोर, बनासकांठा जिले के विधायक, पदाधिकारी, पर्यटन सचिव कुलदीप आर्य, जिला कलेक्टर मिहिर पटेल सहित अन्य अधिकारी उपस्थित रहे। समारोह के दौरान 16 फीट ऊँचे अखंड शक्ति त्रिशूल का भी अनावरण किया गया जो हिमालय की 1,500 वर्ष पुरानी पौराणिक ऊर्जा का प्रतीक है।

‘PM मोदी की लीडरशिप में ऐतिहासिक धार्मिक काम हुए’

मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल ने अपने संबोधन में कहा कि आद्यशक्ति पीठ अंबाजी का समग्र और दूरदर्शी विकास आद्यशक्ति के परम उपासक पीएम मोदी की प्रेरणा और मार्गदर्शन में किया जा रहा है। उन्होंने आगे कहा कि पीएम मोदी ने ‘विकास भी विरासत भी’ के मंत्र के साथ देश के तीर्थ स्थलों के पुनरोद्धार और आद्यशक्ति की उपासना का ऐतिहासिक कार्य किया है।

अन्य विकास कार्यों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि काशी विश्वनाथ कॉरिडोर, महाकाल लोक, केदारनाथ और बैजनाथ धाम जैसे पवित्र स्थलों के विकास ने उन्हें एक नई पहचान दिलाई है। राम मंदिर का संदर्भ देते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि अयोध्या में भव्य राम मंदिर के निर्माण और पावागढ़ में 500 वर्षों के बाद ध्वजारोहण जैसी ऐतिहासिक उपलब्धियाँ भी उनकी लीडरशिप में संभव हुई हैं।

मुख्यमंत्री ने आगे कहा कि 51 शक्तिपीठों में प्रथम स्थान पर स्थित अंबाजी धाम के विकास के लिए प्रधानमंत्री की परिकल्पना अब साकार हो रही है। हर वर्ष 51 शक्तिपीठ परिक्रमा महोत्सव का सफल आयोजन किया जाता है जिसमें लाखों श्रद्धालु माता जी के दर्शन का लाभ लेते हैं। उन्होंने यह भी बताया कि हाल ही में आयोजित परिक्रमा महोत्सव में 5 लाख से अधिक श्रद्धालुओं ने भाग लिया।

प्रधानमंत्री मोदी की परिकल्पना का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि तीर्थ स्थलों के विकास को पर्यटन से जोड़ने की प्रधानमंत्री की सोच के अनुरूप अंबाजी के गब्बर पर्वत पर देश का सबसे बड़ा लाइट एंड साउंड शो शुरू किया गया है और परिक्रमा पथ तथा सांस्कृतिक ग्राम जैसी परियोजनाओं के माध्यम से श्रद्धालुओं को नई सुविधाएँ प्रदान की जा रही हैं। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में अंबाजी-तरंगा रेल परियोजना से इस क्षेत्र की कनेक्टिविटी मजबूत होगी जिससे श्रद्धालुओं की सुविधा बढ़ेगी और स्थानीय आर्थिक विकास को गति मिलेगी।

अंबाजी शक्ति कॉरिडोर परियोजना का महत्व

अंबाजी शक्ति कॉरिडोर परियोजना का उद्देश्य अंबाजी को विश्वस्तरीय तीर्थ स्थल के रूप में विकसित करना है। इस परियोजना से श्रद्धालुओं, स्थानीय लोगों, अर्थव्यवस्था और पर्यटन क्षेत्र को कई बड़े लाभ मिलने वाले हैं।

श्रद्धालुओं और तीर्थयात्रियों के लिए लाभ

इस परियोजना का सबसे बड़ा लाभ श्रद्धालुओं को मिलेगा क्योंकि इसमें उनकी सुविधा और आध्यात्मिक अनुभव को प्राथमिकता दी गई है। पहले चरण में मल्टी-लेवल पार्किंग, अंडरपास सड़क, पैदल मार्ग, आधुनिक तीर्थयात्री निवास, दिव्य दर्शन चौक और एम्फीथिएटर जैसी सुविधाएं विकसित की जाएंगी, जिससे वाहनों की भीड़, असुविधा और सुरक्षा संबंधी समस्याएं कम होंगी। शक्ति कॉरिडोर श्रद्धालुओं के लिए यात्रा को अधिक सहज और आध्यात्मिक रूप से समृद्ध बनाएगा।

गब्बर पर्वत पर देश के सबसे बड़े लाइट एंड साउंड शो, आध्यात्मिक गैलरी, पौराणिक चित्रों और सांस्कृतिक ग्राम जैसी सुविधाएँ श्रद्धालुओं के आध्यात्मिक अनुभव को और भी विशेष और भावनात्मक बनाएँगी।

स्थानीय लोगों और बनासकांठा को आर्थिक लाभ

इस परियोजना के निर्माण और बाद के चरणों में हजारों रोजगार के अवसर पैदा होंगे। CM पटेल और मंत्रियों ने स्पष्ट किया है कि इन विकास कार्यों से स्थानीय स्तर पर बड़ी संख्या में नई नौकरियाँ सृजित होंगी। श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ने से होटल, धर्मशाला, रेस्तरां, दुकानें, हस्तशिल्प, प्रसाद और स्थानीय उत्पादों के कारोबार में तेजी आएगी।

इससे स्थानीय व्यापारियों, युवाओं और पूरे उत्तर गुजरात के आर्थिक विकास को नई गति मिलेगी। अंबाजी-तरंगा रेल परियोजना से जुड़ाव के कारण कनेक्टिविटी मजबूत होगी जिससे दूर-दराज से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए यात्रा आसान होगी और स्थानीय अर्थव्यवस्था को और मजबूती मिलेगी।

पर्यटन और सांस्कृतिक विरासत को लाभ

यह परियोजना अंबाजी को गुजरात का प्रमुख तीर्थ स्थल और विश्वस्तरीय पर्यटन केंद्र बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा, जिससे देश-विदेश से अधिक पर्यटक यहाँ आएँगे। इवेंट प्लाजा, एम्फीथिएटर और गरबा-मेले के लिए विस्तारित स्थान गुजराती संस्कृति, परंपराओं और लोक कला को नई पहचान देंगे।

यह परियोजना काशी विश्वनाथ कॉरिडोर और महाकाल लोक जैसी विकास और विरासत के समन्वय वाली योजनाओं पर आधारित है जिससे आध्यात्मिक विरासत को सुरक्षित रखते हुए आधुनिक सुविधाएँ उपलब्ध कराई जाएँगी।

क्या होंगे दीर्घकालिक लाभ?

यह परियोजना आने वाले दशकों में श्रद्धालुओं की बढ़ती संख्या को ध्यान में रखते हुए भविष्य की जरूरतों के अनुरूप विकसित की जा रही है। इसके साथ ही इसमें स्वच्छता, पर्यावरण और सतत विकास पर विशेष ध्यान दिया गया है, जिससे आध्यात्मिक अनुभव के साथ पर्यावरणीय संतुलन भी मजबूत होगा।

यह योजना अंबाजी को एक आदर्श तीर्थ स्थल के रूप में स्थापित करेगी जहाँ भक्ति, संस्कृति और आधुनिक विकास का अनूठा संगम दिखाई देगा। मुख्यमंत्री और सरकारी अधिकारियों ने कई बार कहा है कि यह विकास न केवल श्रद्धालुओं की सुविधा बढ़ाएगा बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था और रोजगार को भी मजबूत करेगा।

नेहरू की किस मानसिकता के कारण भारत को चीन से मिली पराजय, कॉन्ग्रेस शासन की विफलता की साहित्यिक समीक्षा

विश्व इतिहास साक्षी है कि भारत ने अपने शौर्य और शक्ति प्रदर्शन के लिए किसी भी देश की सांस्कृतिक, धार्मिक अस्मिता और इतिहास को ध्वस्त करने का प्रयास नहीं किया। क्योंकि किसी पर अधिपत्य रखना हमारा का स्वभाव नहीं है। हमारे देश में आक्रमणकारी शक्तियाँ आईं, भारत ने अपने सामर्थ्य से उन्हें अपने में ही विलीन कर लिया। किसी देश ने जब तक हमारी सामाजिक समरसता और सद्भावना को भंग करने का प्रयास नहीं किया, हमने युद्ध नहीं किया क्योंकि हम युद्ध नहीं बुद्ध के समर्थक है।

अगर कभी युद्ध की स्थिति बनी तो हमारे जवानों ने बिना हार–जीत की चिंता किए पूरी ताकत से युद्ध किया। राजनीति रूप से या राष्ट्रवादी भाव रखने के कारण मैं कई बार कॉन्ग्रेस की नाकामियों को सामने लाने का प्रयास करता हूँ। इस बार चीन से हार की साहित्यिक समीक्षा आपके सामने प्रस्तुत करने का प्रयास कर रहा हूँ।

स्वतंत्रता के बाद जो भारत हमें मिला, वह हमारे सपनों का भारत नहीं था। संघ और राष्ट्रवादी विचारकों ने हमेशा अखंड भारत का स्वप्न देखा और उसे बचाए रखने के लिए अपने प्राणों की बाजी तक लगा दी। भारत ने अब तक जितने भी युद्ध किए उसमें सबसे अधिक अपमानजनक हार 1962 के चीन युद्ध में हुई। यह हार हमारी सेना के माथे पर ऐसा कलंक है, जिसे आज तक नहीं धोया जा सका।

इस पराजय का कारण हमारी सेना नहीं बल्कि तत्कालीन सत्ता थी। नेहरू ऊपर से भारतीय लेकिन रहन-सहन, खान-पान और विचारों से पूरी तरह विदेशी थे। वह किसी भी शर्त पर भारत में केवल अपनी सत्ता बनाए रखने की कोशिश में थे, उन्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता था कि कौन सा देश कब भारत में घुसकर उसका कुछ हिस्सा कब्जा करके भारत भूमि को खंडित कर रहा है। 1962 का युद्ध इसी का प्रमाण है। इसी युद्ध को केंद्रित करके विख्यात कवि रामधारी सिंह दिनकर ने ’परशुराम की प्रतीक्षा’ नामक खंडकाव्य लिखा, जो चीन युद्ध में उनकी उदासीनता को सामने लाती है। यह खंडकाव्य तत्कालीन सत्ता की नाकामियों के साथ उसकी राष्ट्रविरोधी नीति के खिलाफ भी खुलकर चर्चा करता है।

चीन से पराजय आम जनता के लिए मात्र एक सूचना थी लेकिन सत्ता में बैठे लोग यह भली–भांति समझ रहे थे कि यह हार नहीं राष्ट्र से नेहरू का विश्वासघात था। चीन के युद्ध में सेना को सही समय पर और आवश्यक युद्ध सामग्री नहीं भेजी गई जो पराजय का सबसे बड़ा कारण बनी। साथ भी सेना प्रमुख पर युद्ध से वापसी के लिए दबाव बनाया गया। नेहरू की देवताओं वाली जो छवि राजनीतिज्ञ और साहित्यकार बनाने का प्रयास कर रहे थे उसे ध्वस्त करते हुए दिनकर ने लिखा–

घातक है, जो देवता-सदृश दिखता है,
लेकिन, कमरे में गलत हुक्म लिखता है,
जिस पापी को गुण नहीं; गोत्र प्यारा है,
समझो, उसने ही हमें यहाँ मारा है।
(परशुराम की प्रतीक्षा, रामधारी सिंह दिनकर, खंड दो, लोकभारती प्रकाशन, दिल्ली।)

दिनकर ने जिस समय यह खंडकाव्य लिखा उस समय वह नेहरू सरकार में ही राज्यसभा सदस्य थे। दिनकर राष्ट्रवादी विचारों के साहित्यकार थे उनके लिए राष्ट्र सर्वप्रथम था। जब चीन से भारत को अपनों के कारण साजिशन हार मिली तब दिनकर ने सत्ता के विरोध लिखना अपनी जिम्मेदारी समझा। सब जानते थे कि इस हार के असली कारण नेहरू ही थे लेकिन चुप्पी साधे हुए थे। दिनकर ने लिखा–

जो सत्य जान कर भी न सत्य कहता है,
या किसी लोभ के विवश मूक रहता है,
उस कुटिल राजतन्त्री कदर्य को धिक् है,
यह मूक सत्यहन्ता कम नहीं वधिक है।
(परशुराम की प्रतीक्षा, रामधारी सिंह दिनकर, खंड दो, लोकभारती प्रकाशन, दिल्ली)

यह अपमानजनक हार केवल सेना की नहीं बल्कि भारत के शौर्य और पौरुष का भी था, जिससे दिनकर आहत हुए। सरकार, सत्ता और साहित्यकार कोई बोलने को तैयार नहीं। नेहरू अपने अनुयायियों के साथ मिलकर अपनी समन्वयवादी और देवताओं की छवि गढ़ने का प्रयास कर रहे थे। सभी की चुप्पी में नेहरू का डर था लेकिन दिनकर नहीं डरे उन्होंने लिखा–

नेता निमग्न दिन-रात शान्ति-चिन्तन में,
कवि-कलाकार ऊपर उड़ रहे गगन में।
यज्ञाग्नि हिन्द में समिध नहीं पाती है,
पौरुष की ज्वाला रोज बुझी जाती है।
(परशुराम की प्रतीक्षा, रामधारी सिंह दिनकर, खंड दो, लोकभारती प्रकाशन, दिल्ली)

नेहरू गाँधीनीति से भारत की जनता को बरगला कर सत्ता बनाए रखना चाहते थे जबकि इस युद्ध में गाँधी नहीं भगत सिंह और बोस के विचारों की जरूरत थी। दिनकर गाँधीवाद का प्रतीकों में विरोध करते हैं–

गीता में जो त्रिपिटक-निकाय पढ़ते हैं,
तलवार गला कर जो तकली गढ़ते हैं;
शीतल करते हैं अनल प्रबुद्ध प्रजा का,
शेरों को सिखलाते हैं धर्म अजा का।
परशुराम की प्रतीक्षा, रामधारी सिंह दिनकर, खंड एक, लोकभारती प्रकाशन, दिल्ली)

नेहरू भारत में लोकतंत्र नहीं राजतंत्र चाहते थे। उनकी सत्ता पर काबिज रहने की भूख बहुत गहरी थी। साथ ही विदेशी नेताओं और राजाओं से उन्हें विशेष लगाव था। विदेशियों के प्रति उनकी यह आस्था कई बार अपमान का कारण बन जाती थी। जब अंग्रेजी सत्ता को हमारे देशवासियों ने जड़ से उखाड़कर फेंक दिया, और हम आजाद हुए तो नेहरू केवल इस बात से खुश थे कि उन्हें सत्ता के शीर्ष पर बैठने का अवसर मिलेगा।

जिन अग्रेजों ने वर्षों तक हमें गुलाम बनाकर रख उसी इंग्लैड की महारानी एलिजाबेथ 14 वर्षों बाद जब भारत आई तो नेहरू ने बड़ी भव्यता से उसका स्वागत किया बल्कि इससे कई साहित्यकार बेहद क्रोधित हुए क्योंकि वह इस घटना को औपनिवेशिक गुलामी के रूप में देख रहे थे। कवि नागार्जुन ने इसके विरोध में “आओ रानी” कविता लिखकर अपना प्रतिरोध दर्ज किया–

आओ रानी, हम ढोएँगे पालकी!
यही हुई है राय जवाहरलाल की
भूखी भारत-माता के सूखे हाथों को चूम लो
प्रेसिडेन्ट की लंच-डिनर में स्वाद बदल लो, झूम लो
पद्म-भूषणों, भारत-रत्नों से उनके उद्गार लो
पार्लमेण्ट के प्रतिनिधियों से आदर लो, सत्कार लो
मिनिस्टरों से शेकहैण्ड लो, जनता से जयकार लो।
यह तो नयी-नयी दिल्ली है, दिल में इसे उतार लो
एक बात कह दूँ मलका, थोडी-सी लाज उधार लो
बापू को मत छेड़ो, अपने पुरखों से उपहार लो
जय ब्रिटेन की जय हो इस कलिकाल की!
आओ रानी, हम ढोएँगे पालकी!
राय हुई है यही जवाहर लाल की।

यह समझना बहुत आवश्यक है कि आरंभिक समय में भारत को जिस तरह के राजनीतिज्ञों की आवश्यकता थी उसके विपरीत लोग मिले। हमें ऐसा प्रधानमंत्री चाहिए था जो भारत को भारतबोध की दृष्टि से देखने की हिम्मत रखता था। वर्तमान सरकार कॉन्ग्रेस की नाकामियों से मिले अपमान की भरपाई करने का निरंतर प्रयास कर रही है। हमें उसके साथ मिलकर इस देश की वास्तविक सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और राजनीतिक विरासत को संभालना होगा तभी हम भारत से विकसित भारत बनेंगे।

गुजरात में गौमांस बेचने के दोषी महेबुब और फरहान को 10-10 साल की सजा, तीसरा आरोपित सलीम बरी: जानें कोर्ट ने फैसले में क्या क्या कहा

गोधरा की सेशंस कोर्ट ने 2024 के एक गौहत्या और गौमांस हेराफेरी के केस में दो लोगों को 10 साल की जेल की सजा सुनाई है। दोषियों की पहचान महेबुब अब्दुल्ला सबुरिया और फरहान महेबुब सबुरिया के रूप में हुई है। दोनों बाप-बेटे हैं। जबकि एक अन्य आरोपित सलीम सिद्दीक को शक का फायदा देकर बरी कर दिया गया है।

मामला 9 जुलाई 2024 का है, जिसमें 2 फरवरी 2026 को फैसला सुनाया गया। कोर्ट ने आरोपितों को गुजरात पशु संरक्षण सुधार अधिनियम की धारा 5(A), 6(B), 8(4) और 10 के तहत दोषी ठहराते हुए 10-10 साल की सजा और 2 लाख रुपये जुर्माना लगाया है।

रिपोर्ट के मुताबिक, 9 जुलाई 2024 को गोधरा बी डिविजन पुलिस स्टेशन के अधिकारी रूटीन पेट्रोलिंग पर थे, तभी गोधरा-हमीपुर रोड पर अली मस्जिद के पास एक संदिग्ध गाड़ी दिखी। उसे रोककर पूछताछ करने की कोशिश की तो कुछ लोग भाग गए। उनमें से दो लोगों को पकड़ लिया गया।

दोनों को पकड़कर कार चेक की तो उसमें से मांस मिला। साथ में कुछ हथियार भी मिले। दोनों की पूछताछ में उन्होंने अपनी पहचान महेबुब अब्दुल्ला सबुरिया और फरहान महेबुब सबुरिया बताई। पुलिस को उन्होंने कहा कि सलीम सिद्दीक और फैसल मकसूद नाम के लोगों ने उन्हें हमीरपुर बुलाया था और वहाँ से यह मांस का जथ्था भरकर दिया था और उसे घर पर बेचने के लिए ले जा रहे थे।

फिर पुलिस ने वेटरनरी डॉक्टर को मौके पर बुलाकर चेक करवाया तो मांस का वजन 53 किलो निकला। फिर सैंपल सूरत FSL में जाँच के लिए भेजे गए, रिपोर्ट आने पर मांस गौमांस निकला। इसके बाद आरोपितोंके खिलाफ गुजरात पशु संरक्षण अधिनियम के तहत केस दर्ज करके गिरफ्तार कर लिया गया।

पुलिस ने कुल तीन लोगों के खिलाफ FIR दर्ज की थी। जिसमें महेबुब और फरहान गौमांस के साथ मौके से पकड़े गए थे, जबकि तीसरे सलीम पर इन दोनों को गौमांस सप्लाई करने का आरोप था। फिर केस सेशंस कोर्ट में चला गया, जहाँ 19 नवंबर 2024 को चार्जशीट दाखिल की गई। कोर्ट ने 20 फरवरी 2025 को चार्ज फ्रेम किए और आगे ट्रायल चलाया। एक साल बाद 2 फरवरी को फैसला सुनाया गया।

ट्रायल के दौरान कोर्ट ने पुलिस अधिकारियों, पंच गवाहों, वेटरनरी डॉक्टर, अधिकारियों सहित कई गवाहों की गवाही नोट की। इसके अलावा प्रोसिक्यूशन की तरफ से पंचनामा, वेटरनरी डॉक्टर की रिपोर्ट, फोरेंसिक साइंस लेबोरेटरी की रिपोर्ट वगैरह भी सबूत के तौर पर पेश किए गए।

कोर्ट ने फैसले में क्या कहा?

कोर्ट ने फैसले में नोट किया कि वेटरनरी और FSL दोनों रिपोर्ट साफ-साफ साबित करती हैं कि जब्त किया गया मांस गाय का मांस था। गुजरात में गौहत्या, गाय के मांस का संग्रह, हेराफेरी और बिक्री पर पूरी तरह बैन है।

कोर्ट ने यह भी नोट किया कि दोनों आरोपित गौमांस के साथ मौके से ही पकड़े गए थे। दूसरी तरफ ट्रायल के दौरान वे यह साबित करने में नाकाम रहे कि उनके पास कत्ल या मांस ट्रांसफर की कोई आधिकारिक परमिशन थी या नहीं। इसके अलावा आरोपियों ने ट्रायल में दलील दी कि पुलिस ने उन्हें गलत तरीके से फंसाया है, लेकिन कोर्ट ने जब्ती, सैंपल की जाँच वगैरह की प्रक्रिया सही तरीके से हुई होने का उल्लेख करके इन दलीलों को खारिज कर दिया और दोनों को दोषी ठहराया।

हालाँकि कोर्ट ने तीसरे आरोपित को यह कहकर छोड़ दिया कि उसके पास से गौमांस नहीं पकड़ा गया और प्रोसिक्यूशन का केस सिर्फ सह-आरोपियों के बयानों पर आधारित है। कोर्ट ने कहा कि ऐसे बयान, बिना स्वतंत्र पुष्टि के, ठोस नहीं माने जा सकते और उनके आधार पर किसी व्यक्ति को क्रिमिनल ट्रायल में दोषी नहीं ठहराया जा सकता, इसलिए तीसरे आरोपित को शक का फायदा देकर कोर्ट ने बरी कर दिया।

सजा सुनाते समय कोर्ट ने कहा कि गुजरात में गौहत्या पर बैन वाला कानून होने के बावजूद दोषी बाप-बेटे ने इतने बड़े जथ्थे में घर पर छुट्टा बिक्री के इरादे से गौमांस खरीदकर हेराफेरी की थी। साल 2017 में सरकार ने कानून में किए संशोधन को ध्यान में रखकर सजा सुनाई जाए तो कानून का मूल उद्देश्य भी कायम रहेगा और समाज में ऐसे अपराधों पर काबू भी आएगा और इस तरह के अपराध करने वालों पर कानूनी लगाम भी लगेगी।

आखिर में कोर्ट ने दोनों दोषियों को गुजरात पशु संरक्षण अधिनियम की धारा 5(A), 6(B), 8(4) और 10 के तहत दस साल की जेल की सजा और दो लाख का जुर्माना ठोका। अगर जुर्माना नहीं भरा तो दोनों की सजा 2 साल और बढ़ाने का आदेश दिया गया है।

मूल रूप से ये रिपोर्ट गुजराती में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।

ओम बिरला को हटाने के लिए अविश्वास प्रस्ताव लाने की तैयारी कर रहा विपक्ष: जानिए क्या है लोकसभा स्पीकर को हटाने का नियम और कब-कब लाया गया प्रस्ताव

लोकसभा में विपक्ष लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने की तैयारी कर रहा है। कॉन्ग्रेस सांसद राहुल गाँधी को संसद में बोलने नहीं देने का आरोप विपक्ष लगा रहा है। राष्ट्रपति के अभिभाषण के दौरान राहुल गाँधी पूर्व सेनाध्यक्ष नरवणे के अप्रकाशित किताब का हवाला देते हुए सरकार पर आरोप लगा रहे थे। उस वक्त स्पीकर ओम बिरला ने नियमों का हवाला देते हुए राहुल गाँधी को रोका। इस मुद्दे पर कई दिनों तक विपक्ष ने सदन को नहीं चलने दिया।

कॉन्ग्रेस इस बात से भी नाराज है कि जब महिला सांसदों ने पीएम की सीट को सदन में घेरा, तो स्पीकर ओम बिरला ने कहा था कि कोई अप्रत्याशित घटना घट सकती थी, इसलिए प्रधानमंत्री को सदन आने से उन्होंने रोका। लेकिन ऐसी घटनाएँ सदन में पहली बार हुई कि महिला सांसद राष्ट्रपति के अभिभाषण पर चर्चा के दौरान लोकसभा को संबोधित नहीं कर पाए। इसकी वजह महिला सांसदों का इस तरह से पीएम की सीट को घेरना था।

विपक्ष का आरोप है कि बीजेपी सांसद निशिकांत दूबे ने पूर्व पीएम इंदिरा गाँधी और दूसरे प्रधानमंत्रियों पर आरोप लगाया। संसद में हंगामे के दौरान 8 विपक्षी सांसदों को पूरे सत्र के लिए निलंबित कर दिया गया। सासंदों के निलंबन और महिला सांसदों द्वारा पीएम की सीट घेरने को लेकर कॉन्ग्रेस पर आरोप लगे थे। इस पर नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी बोलना चाहते हैं, लेकिन बोलने की अनुमति नहीं मिली।

स्पीकर के खिलाफ ‘हटाने का प्रस्ताव’ लाया जाता है

लोकसभा अध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने की प्रक्रिया सरकार के खिलाफ जो अविश्वास प्रस्ताव लाया जाता है, उससे थोड़ा अलग होता है। इसमें लोकसभा स्पीकर को ‘हटाने का प्रस्ताव’ यानी मोशन ऑफ रिमूवल ऑफ स्पीकर लाया जाता है। यह संविधान की अनुच्छेद 94 सी के तहत लाया जाता है। इस अनुच्छेद में लोकसभा अध्यक्ष और उपाध्यक्ष को हटाने की प्रक्रिया बताई गई है।

लोकसभा स्पीकर को हटाने का प्रस्ताव पेश करने के लिए 14 दिन पहले नोटिस देना होता है। ये नोटिस लिखित होना चाहिए। इस प्रस्ताव पर कम से कम 50 सांसदों का हस्ताक्षर होना जरूरी है यानी कोई भी सांसद लोकसभा में खड़े होकर अपने दम पर स्पीकर के खिलाफ प्रस्ताव नहीं ला सकता। स्पीकर पर स्पष्ट और ठोस आरोप लगे हों। प्रस्ताव स्वीकार होने के बाद इस पर सदन में चर्चा होती है और फिर सांसद वोटिंग करते हैं। इस दौरान स्पीकर सदन की अध्यक्षता नहीं करते हैं, बल्कि डिप्टी स्पीकर या सदन का वरिष्ठ सदस्य सदन की अध्यक्षता करते हैं।

हटाने के लिए साधारण बहुमत की जरूरत

लोकसभा में प्रस्ताव सदन में उपस्थित सांसदों द्वारा बहुमत से पास होना जरूरी है, कोई दो-तिहाई बहुमत की जरूरत नहीं होती। स्पीकर को हटाने के लिए सिर्फ बहुमत की जरूरत होती है। जितने सांसद वोट दे रहे हों, उनका 50 फीसदी से एक ज्यादा जरूरी है।

अगर प्रस्ताव पास हो जाता है तो तुरंत ही स्पीकर पद से हट जाता है। वह सांसद बना रहता है, लेकिन स्पीकर नहीं और फिर सदन को दूसरा स्पीकर चुनना होता है।

स्पीकर को हटाने के लिए आज तक कभी वोटिंग नहीं हुई

सदन में स्पीकर को हटाने के लिए कई बार नोटिस दिया गया है। सदन में प्रस्ताव पर बहस भी हुई है, लेकिन वोटिंग नहीं हुई है।

पहली बार 1954 में तत्कालीन स्पीकर जीवी मावलंकर के खिलाफ विपक्ष ने अविश्वास प्रस्ताव लाया था। इस पर सदन में बहस हुई। विपक्ष ने उनपर कॉन्ग्रेस का पक्ष लेने का आरोप लगाया था। सदन ने प्रस्ताव को खारिज कर दिया और वोटिंग हुई नहीं।

दूसरी बार लोकसभा स्पीकर डॉक्टर नीलम संजीव रेड्डी के खिलाफ 1967 में हटाने का प्रस्ताव पेश किया। इन पर कॉन्ग्रेस का पक्ष लेने का विपक्ष ने आरोप लगाया। विपक्ष का कहना था कि उन्हें सदन में बोलने नहीं दिया जा रहा है। इस वक्त भी मतदान नहीं हुआ।

तीसरी बार 8वीं लोकसभा स्पीकर बलराम जाखड के खिलाफ विपक्ष ने 1987 में अविश्वास प्रस्ताव रखा। उस वक्त बोफोर्स को लेकर कॉन्ग्रेस सरकार पर विपक्ष हमलावर था। विपक्ष का आरोप था कि जाखड नियमों का हवाला देकर विपक्ष को बोलने से रोकते हैं और सरकार को बचाते हैं। इस प्रस्ताव पर भी वोटिंग की नौबत नहीं आई।

13वीं लोकसभा स्पीकर जीएमसी बालयोगी को हटाने के लिए विपक्ष ने नोटिस दिया। उस वक्त एनडीए की सरकार थी। 2001 में नोटिस दिया गया, लेकिन प्रस्ताव खारिज हो गई। उनपर आरोप था कि सरकार के पक्ष में स्थगन प्रस्ताव को वह खारिज कर देते हैं।

2011 में 15वीं लोकसभा की स्पीकर मीरा कुमार पर विपक्ष ने आरोप लगाया कि उन्हें 2जी, सीडब्लूजी घोटालों को लेकर बहस में बोलने का मौका नहीं दिया जा रहा। स्पीकर सरकार का बचाव कर रही हैं। इस नोटिस को भी खारिज कर दिया गया और वोटिंग तक बात नहीं पहुँची।

17वीं लोकसभा में 2020 में वर्तमान स्पीकर ओम बिरला ने कृषि कानूनों को लेकर विपक्ष के जबरदस्त हंगामे पर विपक्षी सांसदों को निलंबित किया था। इसके विरोध में विपक्ष ने स्पीकर को हटाने का नोटिस देने की बात सार्वजनिक रूप से की. लेकिन पर्याप्त समर्थन नहीं मिलने पर प्रस्ताव सदन में लाया ही नहीं जा सका।

संपत्ति का सिर्फ 1/3 हिस्सा ही वसीयत कर सकता है मुस्लिम व्यक्ति: छत्तीसगढ़ HC, वक्फ की आड़ में जमीनों पर कब्जा करना भी मुश्किल

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने मुस्लिम व्यक्तिगत कानून (मोहम्मदन लॉ) के तहत संपत्ति की वसीयत को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि कोई भी मुस्लिम व्यक्ति अपनी कुल संपत्ति का केवल एक-तिहाई हिस्सा ही वसीयत के जरिए किसी को दे सकता है। इससे ज्यादा हिस्सा देने के लिए बाकी कानूनी वारिसों की मृत्यु के बाद स्पष्ट और स्वतंत्र सहमति जरूरी है। बिना सहमति के पूरी संपत्ति की वसीयत अवैध मानी जाएगी। यह फैसला इस्लामी कानून के उस मूल सिद्धांत को मजबूत करता है, जिसका उद्देश्य वारिसों के अधिकारों की रक्षा करना है।

जस्टिस बिभु दत्ता गुरु की एकल पीठ ने 2 फरवरी 2026 को यह फैसला सुनाया। कोर्ट ने कोरबा जिले की एक विधवा जैबुन निशा की अपील को मंजूर करते हुए निचली अदालतों के फैसलों को रद्द कर दिया। हाईकोर्ट ने कहा कि निचली अदालतों ने गंभीर कानूनी गलती की थी, जब उन्होंने विधवा को उसके वैधानिक हिस्से से पूरी तरह वंचित कर दिया। कोर्ट ने वसीयत के फायदार्थी को संपत्ति का एक-तिहाई से ज्यादा हिस्सा देने से इनकार कर दिया।

संपत्ति के उत्तराधिकार से जुड़ा पूरा मामला क्या था?

यह विवाद कोरबा जिले की रहने वाली 64 वर्षीय जैबुन निशा से जुड़ा है। वह दिवंगत अब्दुल सत्तार लोधिया की पत्नी हैं। अब्दुल सत्तार का निधन 19 मई 2004 को हुआ था। उनके नाम पर कोरबा शहर में खसरा नंबर 1045/3 की 0.004 एकड़ (लगभग आठ डिसमिल) जमीन और उस पर बना मकान था। यह उनकी निजी संपत्ति थी।

अब्दुल सत्तार की कोई संतान नहीं थी। उनकी मृत्यु के बाद उनके भतीजे मोहम्मद सिकंदर (उम्र करीब 27 साल) ने दावा किया कि वह अब्दुल सत्तार का गोद लिया हुआ बेटा है और पूरी संपत्ति उसकी है। सिकंदर ने 27 अप्रैल 2004 की एक वसीयत पेश की, जिसमें कथित तौर पर अब्दुल सत्तार ने पूरी संपत्ति उसके नाम कर दी थी।

सिकंदर ने तहसीलदार के सामने आवेदन देकर राजस्व रिकॉर्ड में अपना नाम जैबुन निशा के साथ संयुक्त रूप से दर्ज करवा लिया। तहसीलदार ने 7 दिसंबर 2004 को दोनों के नाम दर्ज करने का आदेश दिया। जैबुन निशा ने दावा किया कि उन्हें इसकी जानकारी नवंबर 2007 में हुई और उन्होंने वसीयत को फर्जी व अवैध बताया। उनका कहना था कि वसीयत उनकी सहमति के बिना बनाई गई और मुस्लिम कानून के खिलाफ है।

जैबुन निशा ने 2014 में सिविल जज कोरबा के सामने मुकदमा दायर किया। उन्होंने मांगा कि संपत्ति पर उनका अकेला मालिकाना हक घोषित किया जाए और सिकंदर का नाम हटाया जाए। लेकिन ट्रायल कोर्ट ने 7 फरवरी 2015 को उनका दावा खारिज कर दिया। अपील में दूसरी अतिरिक्त जिला जज कोरबा ने 28 जनवरी 2016 को ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा। इसके बाद जैबुन निशा हाईकोर्ट पहुंचीं। हाईकोर्ट ने 17 अगस्त 2023 को अपील को स्वीकार करते हुए दो महत्वपूर्ण कानूनी सवालों पर सुनवाई की।

दोनों पक्षों की तरफ से पेश की गई दलीलें

जैबुन निशा की ओर से अधिवक्ता पराग कोटेचा ने दलील दी कि मुस्लिम कानून में गोद लेने की कोई मान्यता नहीं है। सिकंदर ने खुद लिखित बयान में स्वीकार किया कि वह अब्दुल सत्तार का सगा बेटा नहीं है। फिर भी उसने राजस्व रिकॉर्ड में खुद को बेटा बताया। वसीयत पूरी संपत्ति की है, जबकि मुस्लिम कानून में बिना वारिसों की सहमति के एक-तिहाई से ज्यादा नहीं दिया जा सकता। जैबुन निशा ने कभी सहमति नहीं दी।

सिकंदर की ओर से अधिवक्ता मीरा अंसारी और अमन अंसारी ने कहा कि अब्दुल सत्तार ने सिकंदर को बचपन से बेटे की तरह पाला था। समाज में भी उसे बेटा माना जाता था। वसीयत स्वेच्छा से बनाई गई थी और दो गवाहों ने इसकी पुष्टि की। जैबुन निशा ने खुद वसीयत सिकंदर को सौंपी थी और कई साल तक चुप रही, जो सहमति मानना चाहिए।

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने क्या कहा?

जस्टिस बिभु दत्ता गुरु ने विस्तार से दोनों पक्षों की दलीलें सुनीं और रिकॉर्ड का गहन अध्ययन किया। कोर्ट ने कहा कि भले ही वसीयत की लिखत और गवाहों से साबित हो जाए, लेकिन उसका कानूनी प्रभाव मोहम्मदन लॉ की धारा 117 और 118 के आधार पर जांचना जरूरी है।

कोर्ट ने धारा 117 और 118 का उल्लेख करते हुए कहा-

  • धारा 117: वारिस को वसीयत तभी वैध है, जब बाकी वारिस मृत्यु के बाद सहमति दें। एक भी वारिस की सहमति से उसका अपना हिस्सा बंध जाता है।
  • धारा 118: मुस्लिम व्यक्ति अंत्येष्टि और कर्ज चुकाने के बाद बची संपत्ति का केवल एक-तिहाई हिस्सा ही वसीयत कर सकता है। इससे ज्यादा के लिए वारिसों की मृत्यु के बाद सहमति जरूरी है।

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि सहमति स्पष्ट, स्वतंत्र और मृत्यु के बाद की होनी चाहिए। केवल चुप रहना या मुकदमा देर से दायर करना सहमति नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने कहा कि सिकंदर ने कोई ठोस सबूत नहीं दिया कि जैबुन निशा ने मृत्यु के बाद स्पष्ट सहमति दी थी। गवाहों के बयान भी केवल वसीयत सौंपने तक सीमित थे, सहमति तक नहीं।

छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के फैसले की मुख्य बात

कोर्ट ने निचली अदालतों की गलती गिनाते हुए तीन मुख्य बिंदुओं पर प्रकाश डाला-

  • सबूत का बोझ गलत तरीके से जैबुन निशा पर डाला गया, जबकि सिकंदर पर था कि वह सहमति साबित करे।
  • भले ही वसीयत वैध मान लें, तो भी सिकंदर को केवल एक-तिहाई हिस्सा ही मिल सकता था। फिर भी निचली अदालतों ने जैबुन निशा का दावा पूरी तरह खारिज कर दिया, जो कानूनी रूप से गलत था।
  • मुकदमे में ज्यादा राहत माँगने से वैध हिस्सा नहीं छीना जा सकता।

छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने दिया पुराने फैसलों का हवाला

हाईकोर्ट ने अपने फैसले को मजबूत करने के लिए कई महत्वपूर्ण पुराने निर्णयों का जिक्र किया-

  • नूरुल इस्सा बनाम रहमान बी (2001) 3 एमएलजे 141 (मद्रास हाईकोर्ट): कोर्ट ने कहा कि मुस्लिम व्यक्ति केवल एक-तिहाई संपत्ति ही वसीयत कर सकता है। इससे ज्यादा के लिए वारिसों की सहमति जरूरी है। वारिस को वसीयत बिना सहमति के पूरी तरह अवैध है।
  • बयाबाई बनाम बयाहाई (एआईआर 1942 बॉम्बे 328): बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा कि सुन्नी मुस्लिम कानून में दो प्रतिबंध हैं – एक-तिहाई से ज्यादा नहीं और वारिस को बिना सहमति नहीं।
  • यासिम इमामभाई शेख बनाम हजराबी (एआईआर 1986 बॉम्बे 357): बॉम्बे हाईकोर्ट ने फिर दोहराया कि एक-तिहाई से ज्यादा की वसीयत बिना सहमति के अमान्य है।
  • वलशियिल कुन्ही अवुल्ला बनाम ईंगायिल पीटिकायिल कुन्ही अवुल्ला (एआईआर 1964 केरल 200): केरल हाईकोर्ट ने कहा कि बिना सहमति के वारिसों को ज्यादा हिस्सा देने वाली वसीयत अवैध है।
  • रहुमथ अम्माल बनाम मोहम्मद माइदीन रोउदर (1978) 2 एमएलजे 499 (मद्रास हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच): कोर्ट ने कहा कि वारिस और गैर-वारिस दोनों को वसीयत में हिस्सा देने पर भी एक-तिहाई की सीमा लागू होती है। वारिस को दिया हिस्सा बिना सहमति के अमान्य रहेगा।
  • मोहम्मद अशरफ बनाम तबस्सुम (आईएलआर 2014 कर्नाटक 6861): कर्नाटक हाईकोर्ट ने धारा 117 को अनिवार्य बताते हुए कहा कि बिना सहमति के केवल एक-तिहाई ही वैध है।
  • सुलक्सनी बनाम सत्तार अली (2022 एससीसी ऑनलाइन छत्तीसगढ़ 803): छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की ही समन्वय पीठ ने कहा कि बिना सहमति के पूरी संपत्ति की वसीयत अमान्य है।

इन सभी फैसलों से हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि इस्लामी कानून का मूल उद्देश्य वारिसों के अधिकारों की रक्षा करना है। ज्यादा वसीयत से वारिसों का नुकसान नहीं होना चाहिए।

हाईकोर्ट ने दोनों महत्वपूर्ण सवालों का जवाब जैबुन निशा के पक्ष में दिया। अपील मंजूर कर ली गई। ट्रायल कोर्ट और अपील कोर्ट के फैसले रद्द कर दिए गए। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जैबुन निशा वैधानिक वारिस होने के नाते संपत्ति में अपना हिस्सा पाने की हकदार हैं।

वसीयत के नाम वक्फ बनाने वाले दावों पर कितना असर?

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का यह फैसला मुख्य रूप से वसीयत (विल) पर केंद्रित है, न कि वक्फ पर। मुस्लिम पर्सनल लॉ में वसीयत और वक्फ दो अलग-अलग कॉन्सेप्ट हैं, इसलिए यह फैसला उन मामलों पर सीधे लागू नहीं होगा जहाँ मृत्यु के बाद संपत्ति को ‘वक्फ’ बताकर कब्जा किया जाता है।

वसीयत और वक्फ में मुख्य अंतर

वसीयत मृत्यु के बाद प्रभावी होती है और व्यक्ति अपनी संपत्ति का केवल एक-तिहाई हिस्सा ही बिना वारिसों की सहमति के दे सकता है (मोहम्मदन लॉ की धारा 117-118)। वहीं वक्फ जीवित व्यक्ति द्वारा किया जाने वाला स्थायी दान है, जो अल्लाह के नाम पर धार्मिक या चैरिटेबल कामों के लिए होता है। सुन्नी मुस्लिम लॉ (जो भारत में ज्यादा लागू है) में वक्फ वसीयत से नहीं बन सकता, यह जीवित रहते ही वैध होता है। शिया लॉ में कुछ छूट है, लेकिन सामान्यतः वक्फ मृत्यु के बाद प्रभावी नहीं माना जाता। भारत में वक्फ एक्ट 1995 से यह अलग कानून से नियंत्रित होता है।

फर्जी वक्फ क्लेम के कई मामले सामने आए हैं जहाँ वक्फ बोर्ड या लोग फर्जी दस्तावेज बनाकर संपत्ति पर कब्जा करते हैं, जैसे-

इसके साथ ही अहमदाबाद में किराया घोटाला या गुजरात में करोड़ों के फ्रॉड जैसे कई उदाहरण हैं। लेकिन ये ज्यादातर जीवित लोगों या बोर्ड की गलत कार्रवाई से जुड़े हैं, न कि मृत्यु के बाद ‘वसीयत के नाम पर वक्फ’ से।

फर्जी वक्फ जैसे मामलों में मदद करेगा ये फैसला?

अगर कोई मृत्यु के बाद फर्जी वसीयत बनाकर संपत्ति को वक्फ बताता है, तो हाईकोर्ट का यह सिद्धांत (एक-तिहाई सीमा और सहमति जरूरी) चुनौती देने में मदद कर सकता है। कोर्ट इसे वसीयत मानकर अवैध घोषित कर सकती है। लेकिन अगर क्लेम शुद्ध वक्फ एक्ट के तहत है (भले फर्जी हो), तो अलग कानून लागू होगा और वक्फ बोर्ड की जाँच या सिविल सूट से लड़ना पड़ेगा। ऐसे फ्रॉड रोकने के लिए वक्फ संशोधन कानून भी चर्चा में हैं। कुल मिलाकर यह फैसला वसीयत वाले विवादों में मजबूत हथियार है, लेकिन शुद्ध वक्फ फ्रॉड के लिए अलग रणनीति चाहिए।

वसीयत की सीमा सख्ती से लागू करने की जरूरत

कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यह फैसला मुस्लिम संपत्ति विवादों में एक मिसाल बनेगा। कई मामलों में लोग पूरी संपत्ति वसीयत कर देते हैं, जिससे विधवाएँ या अन्य वारिस परेशान होते हैं। यह फैसला स्पष्ट करता है कि वसीयत की सीमा सख्ती से लागू होगी और सहमति के बिना एक-तिहाई से ज्यादा नहीं मिलेगा।

बेंगलुरु मेट्रो का किराया बढ़ाने के पीछे क्या है सिद्दारमैया सरकार की मंशा? कर्नाटक की वित्तीय स्थिति बदहाल: जानें- क्यों BJP सांसद तेजस्वी सूर्या ने दिखाई ‘खाली डिग्गी’?

बेंगलुरु की नम्मा मेट्रो (Namma Metro) से सफर करने वालों के लिए राहत की खबर यह है कि फिलहाल मेट्रो का किराया नहीं बढ़ेगा। दरअसल, कर्नाटक की सिद्दारमैया सरकार की 09 फरवरी 2026 से नम्मा मेट्रो के किराए में करीब 5 फीसदी तक बढ़ोतरी करने की तैयारी थी। लेकिन बीजेपी के आरोपों और यात्रियों के विरोध के बाद इस फैसले पर रोक लगा दी गई है।

वहीं बीजेपी सांसद तेजस्वी सूर्या लगातार किराया बढ़ोतरी के विरोध में मोर्चा खोले बैठे हैं। सोमवार (09 फरवरी 2026) को बेंगलुरु की आरवी मेट्रो पर तेजस्वी ने ‘खाली डिग्गी’ दिखाकर प्रदर्शन किया, तो पुलिस ने उन्हें हिरासत ले लिया। अब सवाल उठता है कि आखिर इस खाली डिग्गी के मायने क्या हैं? क्यों कर्नाटक की सिद्दारमैया सरकार किराया बढ़ाना चाहती है और BJP इस फैसले को गलत क्यों बता रही है? इन सवालों के जवाब जानना बेहद जरूरी है।

BMRCL का किराया बढ़ाने का प्रस्ताव

दरअसल, बेंगलुरु मेट्रो रेल कॉरपोरेशन (BMRCL) ने प्रस्ताव रखा था कि हर टिकट पर 1 से 5 रुपए तक ज्यादा वसूले जाएँगे। अगर यह लागू होता तो न्यूनतम किराया 10 रुपए से बढ़कर 11 रुपए और अधिकतम किराया 90 रुपए से बढ़कर 95 रुपए हो जाता। यह बढ़ोतरी पूरे मेट्रो नेटवर्क पर लागू होने वाली थी।

BMRCL का कहना था कि यह सालाना किराया संशोधन है, जिससे बढ़ते ऑपरेशन खर्च, बिजली, कर्मचारियों के वेतन और रखरखाव की लागत को पूरा किया जा सके। लेकिन जैसे ही किराया बढ़ने की बात सामने आई, लोगों में नाराजगी बढ़ गई।

पहले से ही बेंगलुरु मेट्रो देश की सबसे महँगी मेट्रो मानी जाती है। रोजाना मेट्रो से ऑफिस जाने वाले कर्मचारी, छात्र और आम यात्री बोले कि अगर हर दिन 2-3 बार मेट्रो ली जाए तो महीने के आखिर में 60 से 100 रुपए तक अतिरिक्त बोझ पड़ेगा, जो हर किसी के लिए आसान नहीं है।

BJP सांसद तेजस्वी सूर्या का सिद्दारमैया सरकार पर आरोप

इस बीच बीजेपी ने सीधे तौर पर कर्नाटक की कॉन्ग्रेस सरकार पर हमला बोला। बीजेपी युवा मोर्चा के अध्यक्ष और बेंगलुरु दक्षिण से सांसद तेजस्वी सूर्या ने इस प्रस्ताव का खुलकर विरोध किया। उन्होंने कहा कि बेंगलुरु पहले ही महँगाई से जूझ रहा है और मेट्रो किराया बढ़ाना आम लोगों पर सीधा हमा है। तेजस्वी सूर्या ने मेट्रो से आवाजाही करने वाले यात्रियों से बातचीत कर उनकी प्रतिक्रिया जानी।

बाद में तेजस्वी सूर्या ने पत्रकारों को बताया कि यात्री बार-बार किराया बढ़ने से नाखुश हैं। उन्होंने मुख्यमंत्री सिद्दारमैया और उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार पर केंद्र सरकार को किराया बढ़ोतरी के लिए दोषी ठहराकर जनता को गुमराह करने का आरोप लगाया। तेजस्वी सूर्या ने यह भी कहा कि घाटे की भरपाई का बोझ सीधे यात्रियों पर डालना गलत है और सिद्दारमैया सरकार को पहले अपने खर्च और सिस्टम को सुधारना चाहिए।

तेजस्वी सूर्या ने मौजूदा समिति की गणनाओं में अनियमितताओं का आरोप लगाते हुए किराया निर्धारण समिति के गठन की भी माँग की। इसके अलावा उन्होंने इस मुद्दे पर केंद्र सरकार में आवास एवं शहरी मामलों के मंत्री मनोहर लाल खट्टर से भी बात की और किराया बढ़ोतरी को तुरंत रोकने की माँग की।

इस पर मनोहर लाल खट्टर ने अधिकारियों को मेट्रो के किराए में प्रस्तावित बढ़ोतरी को अस्थायी रूप से रोक देने का निर्देश दिया और समिति के निष्कर्षों की व्यक्तिगत समीक्षा का आश्वासन दिया। उन्होंने यह भी कहा कि अगर सिद्दारमैया सरकार औपचारिक अनुरोध करती है तो एक नई समिति पर विचार किया जा सकता है।

सिद्दारमैया सरकार की पुलिस ने तेजस्वी सूर्या को हिरासत में लिया

इतना ही नहीं सोमवार (09 फरवरी 2026) को बेंगलुरु के आरवी रोड मेट्रो स्टेशन के बाहर किराया बढ़ोतरी के खिलाफ खाली डिग्गी लेकर प्रदर्शन करते हुए तेजस्वी सूर्या को पुलिस ने हिरासत में ले लिया। इस पर तेजस्वी सूर्या ने एक्स पर लिखा, “मुझे गिरफ्तार करने से मेरी आवाज नहीं दबेगी! यह शर्मनाक है कि कॉन्ग्रेस सरकार ने मुझे सच उजागर करने के लिए गिरफ्तार किया। यह एक ‘खाली डिग्गी’ सरकार है।”

उन्होंने आगे कहा, “कर्नाटक की आर्थिक स्थिति खराब है, और किराए और बढ़ती लागत के रूप में इसकी कीमत चुका रहे हैं। अब कोई बहाना नहीं चलेगा। मुख्यमंत्री को बजट में ‘व्हाइट पेपर’ प्रश्तुत करना होगा और एक सवाल का जवाब देना होगा- राज्य की वित्तीय स्थिति इतनी कमजोर क्यों है, जैसा कि आपने FFC के समक्ष स्वीकार किया था?”

तेजस्वी ने सवाल पूछा, “कर्नाटक में महँगाई क्यों बढ़ती जा रही है? राज्य में कीमतें प्रतिदिन क्यों बढ़ रही हैं?” उन्होंने आगे कहा, “वित्तीय स्थिति सुधारें, मेट्रो को दी जाने वाली अप्रत्यक्ष वित्तीय सहायता बहाल करें और मेट्रो का किराया अपने आप कम हो जाएगा। इसके अलावा कुछ भी कहना छल है।”

कर्नाटक की सिद्दारमैया सरकार का पक्ष

वहीं कर्नाटक की सिद्दारमैया सरकार ने मेट्रो किराया बढ़ाने के फैसले को केंद्र सरकार पर थोपने की कोशिश की। सरकार का कहना है कि यह फैसला सीधे राज्य सरकार का नहीं है। कॉन्ग्रेस सरकार के मुताबिक, बेंगलुरु मेट्रो का किराया एक तय नियम और प्रक्रिया के तहत फेयर फिक्सेशन कमेटी (Fare Fixation Committee) की सिफारिशों से तय होता है। इसमें राज्य सरकार की सीधी भूमिका नहीं होती।

सरकार का कहना है कि मेट्रो के संचालन और किराया निर्धारण की जिम्मेदारी BMRCL और केंद्र सरकार से जुड़े नियमों के दायरे में आती है। इसीलिए कॉन्ग्रेस सरकार पर किराया बढ़ाने का आरोप लगाना गलत है। कर्नाटक सरकार ने यह भी कहा कि बीजेपी इस मुद्दे को राजनीतिक रंग दे रही है और जनता में भ्रम फैलाने की कोशिश कर रही है।