Wednesday, April 1, 2026
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मिडिल ईस्ट युद्ध से ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित, चर्चा में रणनीतिक पेट्रोलियम रिजर्व: जानें- ये क्या हैं और तेल संकट से निपटने के लिए भारत कैसे कर रहा तैयारी

रणनीतिक पेट्रोलियम रिजर्व (SPR) इसलिए जरूरी होते हैं ताकि आपूर्ति श्रृंखला में कितनी भी उथल-पुथल या संकट क्यों न आ जाए देश में तेल की सप्लाई बिना रुके जारी रह सके।

मिडिल ईस्ट में अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच बढ़ते टकराव ने क्षेत्र को गंभीर सुरक्षा संकट में डाल दिया है। इसका असर अब वैश्विक ऊर्जा बाजार पर भी दिखने लगा है। इस संकट से दुनिया के तेल और गैस व्यापार को बाधित करने की आशंका पैदा हो गई है।

दुनिया के टॉप 10 तेल उत्पादक देशों में से पाँच ‘सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, इराक, ईरान और कुवैत’ इसी क्षेत्र में हैं। साल 2024 में वैश्विक तेल उत्पादन का 31% हिस्सा यहीं से आया जबकि 38% तेल निर्यात भी पश्चिम एशिया से हुआ।

2 मार्च को कतर ने ईरान के ड्रोन हमले के बाद दुनिया की सबसे बड़ी LNG निर्यात इकाई में उत्पादन रोक दिया। इसके अलावा सऊदी अरब और इराक समेत खाड़ी के कई देशों में रिफाइनरियां बंद करने की घोषणा की गई है। स्थिति तब और गंभीर हो गई जब ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ को बंद कर दिया गया। इस समुद्री मार्ग से दुनिया की लगभग 20% तेल आपूर्ति गुजरती है। भारत की करीब 50% तेल और गैस आपूर्ति भी इसी रास्ते से आती है। इसके चलते अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल और पेट्रोल की कीमतें बढ़ गई हैं।

भारत कैसे कर रहा है इस संकट से निपटने की तैयारी?

इस संकट के बीच केंद्र की मोदी सरकार ने कहा है कि देश के पास 6 से 8 सप्ताह का ईंधन और कच्चे तेल का भंडार मौजूद है। सरकार का कहना है कि फिलहाल पेट्रोल, डीजल और एलपीजी की कमी की आशंका नहीं है।

द हिंदू को सरकारी सूत्रों के मिली जानकारी के अनुसार, भारत के पास करीब 25 दिन का कच्चा तेल और 25 दिन के पेट्रोल, डीजल व एलपीजी का स्टॉक उपलब्ध है। इसमें आपात स्थिति के लिए बनाए गए स्पेशल पेट्रोलियम रिजर्व (SPR) शामिल नहीं हैं। इन्हें जोड़ने पर भंडार और बढ़ जाता है।

आधा कच्चा तेल भंडार नियमित रूप से रिफिल होता रहेगा क्योंकि गैर-होर्मुज क्षेत्रों से आयात जारी है। इसमें समुद्र में आ रहे टैंकरों का तेल और रिफाइनरियों के स्टोरेज टैंक में रखा स्टॉक भी शामिल है। रिफाइनरियाँ लगातार कच्चा तेल प्रोसेस कर नई खेप मँगा रही हैं, जिससे आपूर्ति बनी रहने की उम्मीद है।

पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय (MoPNG) ने हालात की समीक्षा के लिए भारतीय कंपनियों के साथ कई बैठकें की हैं। मंत्रालय बैकअप योजना तैयार कर रहा है जिसमें वैकल्पिक आपूर्ति क्षेत्रों की पहचान शामिल है।

मनीकंट्रोल की रिपोर्ट के मुताबिक, होर्मुज के अलावा केप ऑफ गुड होप जैसे समुद्री रास्ते विकल्प हो सकते हैं, हालाँकि इससे बीमा और माल ढुलाई की लागत बढ़ेगी। LNG के मामले में भारत की सुरक्षा सीमित है क्योंकि इसे कच्चे तेल की तरह बड़े पैमाने पर स्टोर करना मुश्किल होता है। भारत को एलएनजी का सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता कतर है और वहाँ उत्पादन रुक गया है।

सरकारी अधिकारियों का कहना है कि अगर रुकावट एक हफ्ते या 10 दिन तक रहती है तो बड़ा असर नहीं पड़ेगा। लेकिन लंबा संकट होने पर स्थानीय स्तर पर बदलाव और वैकल्पिक स्रोतों पर निर्भरता बढ़ानी पड़ सकती है। भारतीय तेल और गैस कंपनियां रूस, अमेरिका, पश्चिम अफ्रीका और लैटिन अमेरिका से अतिरिक्त LNG और कच्चा तेल मँगाने के विकल्प तलाश रही हैं। अरब सागर और हिंद महासागर में उपलब्ध रूसी कार्गो, जिनमें फ्लोटिंग स्टोरेज भी शामिल है, भारत के लिए राहत का जरिया बन सकते हैं।

ईरान ने ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ पर नियंत्रण का किया दावा

ईरान ने दावा किया है कि उसने रणनीतिक रूप से अहम ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ पर पूरा नियंत्रण कर लिया है। यह संकरा समुद्री मार्ग दुनिया की लगभग 20% तेल और LNG आपूर्ति के लिए इस्तेमाल होता है और फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी से जोड़ता है।

ईरानी मीडिया में दावा किया गया कि ईरान इस मार्ग से गुजरने वाले किसी भी जहाज पर गोलीबारी कर सकता है जिसके बाद बीमा कंपनियों ने क्षेत्र में काम कर रहे जहाजों को कवर देना बंद कर दिया। इसके चलते मालभाड़ा और बीमा दरें बढ़ गई हैं जबकि कई टैंकर और कार्गो जहाजों ने अपना रास्ता बदलना शुरू कर दिया है।

फार्स न्यूज एजेंसी को जारी बयान में रिवोल्यूशनरी गार्ड्स नेवी के अधिकारी मोहम्मद अकबरजादेह ने कहा, “इस समय ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ इस्लामिक रिपब्लिक की नौसेना के पूर्ण नियंत्रण में है।” उन्होंने चेतावनी दी कि यहाँ से गुजरने वाले जहाज मिसाइल या ड्रोन हमले की चपेट में आ सकते हैं।

इस बीच, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि उन्होंने संयुक्त राज्य विकास वित्त निगम (DFC) को निर्देश दिया है कि खाड़ी क्षेत्र से गुजरने वाले सभी समुद्री व्यापार, खासकर ऊर्जा आपूर्ति के लिए राजनीतिक जोखिम बीमा और वित्तीय गारंटी उपलब्ध कराई जाए।

ट्रंप ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रूथ सोशल पर लिखा कि जरूरत पड़ने पर अमेरिकी नौसेना टैंकरों को हॉरमुज़ से सुरक्षित एस्कॉर्ट करेगी। उन्होंने कहा कि अमेरिका हर हाल में दुनिया में ऊर्जा की निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित करेगा।

रणनीतिक पेट्रोलियम रिजर्व (SPR) और उनका भंडारण

हर औद्योगिक अर्थव्यवस्था की नींव ऊर्जा सुरक्षा पर टिकी होती है। तेजी से बढ़ती ऊर्जा जरूरतों वाले देश के लिए कच्चे तेल की स्थिर आपूर्ति बेहद जरूरी है। इसी उद्देश्य से रणनीतिक पेट्रोलियम रिजर्व (SPR) बनाए जाते हैं ताकि आपात स्थिति में भी देश की ऊर्जा आपूर्ति बाधित न हो।

SPR अत्यधिक सुरक्षित और विशेष भंडारण सुविधाएँ होती हैं जहाँ आपातकाल के लिए कच्चा तेल जमा किया जाता है। ये भंडार परिवहन में देरी, प्राकृतिक आपदा या अंतरराष्ट्रीय बाजार में उतार-चढ़ाव जैसी परिस्थितियों में बफर का काम करते हैं।

अधिकांश SPR गहरे भूमिगत कृत्रिम गुफाओं में बनाए जाते हैं। ये कम लागत, पर्यावरण पर कम प्रभाव और उच्च सुरक्षा के लिए जाने जाते हैं। आमतौर पर ये दो प्रकार के होते हैं- हार्ड रॉक कैवर्न और साल्ट कैवर्न। भारत में ज्यादातर हार्ड रॉक कैवर्न बनाए गए हैं जबकि अमेरिका में साल्ट कैवर्न अधिक प्रचलित हैं।

फोटो साभार: drishtiias.com

साल्ट कैवर्न ‘सोल्यूशन माइनिंग’ तकनीक से बनाए जाते हैं। इसमें नमक की परतों में पानी डाला जाता है, जिससे नमक घुलकर बाहर निकल जाता है और खाली जगह बन जाती है। नमक मिले पानी (ब्राइन) को निकालने के बाद उस स्थान पर कच्चा तेल भरा जाता है। यह प्रक्रिया चट्टानों को काटकर गुफा बनाने की तुलना में सस्ती और तेज होती है।

हार्ड रॉक कैवर्न ड्रिलिंग और ब्लास्टिंग के जरिए तैयार किए जाते हैं। इनकी दीवारें और छत प्राकृतिक अवरोध का काम करती हैं जिससे तेल सुरक्षित रहता है।

अमेरिका का रणनीतिक पेट्रोलियम रिजर्व दुनिया का सबसे बड़ा आपातकालीन तेल भंडार है जो पूरी तरह साल्ट कैवर्न संरचना पर आधारित है। वहीं, भारत में राजस्थान को नमक के विशाल भंडार के कारण ऐसे भंडार बनाने के लिए उपयुक्त स्थान माना जाता है।

भारत के रणनीतिक पेट्रोलियम रिजर्व

रणनीतिक पेट्रोलियम रिजर्व की व्यवस्था केवल किसी एक देश तक सीमित नहीं है। ऊर्जा आपूर्ति को लंबे समय तक सुरक्षित और स्थिर रखने के लिए इसे वैश्विक स्तर पर अपनाया गया है। हाल ही में मध्य पूर्व में OPEC सदस्य ईरान से जुड़ा संकट और उसका ऊर्जा व्यापार पर असर, इन रिजर्व की अहमियत को और स्पष्ट करता है।

भारत में SPR नेटवर्क का संचालन इंडियन स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व्स लिमिटेड (ISPRL) करता है जो पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय के तहत एक विशेष संस्था है। भारत के पास कुल 5.3 मिलियन टन कच्चे तेल को भंडार करने की क्षमता है जो तीन जगहों पर है इनमें विशाखापत्तनम (1.33 MMT), मंगलुरु (1.5 MMT) और पदुर (2.5 MMT) शामिल हैं। ये सभी परियोजनाएँ SPR कार्यक्रम के पहले चरण में बनाई गई थीं। इनकी कुल क्षमता करीब 39.1 मिलियन बैरल कच्चे तेल की है।

9 फरवरी को केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने राज्यसभा में बताया कि किसी भू-राजनीतिक संकट की स्थिति में ये भंडार देश की ऊर्जा जरूरतों को 74 दिनों तक पूरा कर सकते हैं। बाद में भारतीय ऊर्जा एजेंसी ने इसे बढ़ाकर 90 दिन तक बताया।

फोटो साभार: drishtiias.com

ये भंडार समुद्र तट के पास रिफाइनरियों के निकट चट्टानी गुफाओं में बनाए गए हैं ताकि लॉजिस्टिक्स, सुरक्षा और संचालन में सुविधा बनी रहे। जुलाई 2021 में सरकार ने दूसरे चरण के तहत दो और वाणिज्यिक-सह-रणनीतिक भंडार केंद्र स्थापित करने को मंजूरी दी। ये केंद्र चाँदीखोल (4 MMT) और पदुर (2.5 MMT) में बनाए जाएँगे। कुल 6.5 MMT क्षमता वाली ये परियोजनाएँ पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (PPP) मॉडल पर विकसित की जा रही हैं।

अमेरिका ने अपने रणनीतिक पेट्रोलियम रिजर्व का कैसे इस्तेमाल किया

दुनिया का सबसे बड़ा आपातकालीन तेल भंडार अमेरिका के पास है। सरकार इसे अक्सर संकट के समय ईंधन की कीमतों को नियंत्रित करने और बाजार को स्थिर रखने के लिए इस्तेमाल करती है।

रॉयटर्स के अनुसार, इन भंडारों में करीब 415.4 मिलियन बैरल कच्चा तेल जमा है, जिसमें अधिकतर ‘सौर क्रूड’ (उच्च सल्फर वाला तेल) शामिल है। कई अमेरिकी रिफाइनरियाँ इस तरह के तेल को प्रोसेस करने के लिए तैयार हैं।

यह तेल भूमिगत नमक की विशाल गुफाओं में सुरक्षित रखा जाता है जो खाड़ी तट के राज्यों लुइसियाना और टेक्सास में स्थित हैं। इन संरचनाओं की कुल भंडारण क्षमता लगभग 714 मिलियन बैरल तक है।

क्या है रणनीतिक पेट्रोलियम रिजर्व का महत्व?

‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ पर रुकावट समुद्री व्यापार मार्गों पर बढ़ते खतरों की ताजा मिसाल है। इससे पहले 2023 में यमन स्थित हूती विद्रोहियों ने अंतरराष्ट्रीय शिपिंग लेनों पर हमला किया था। 23 दिसंबर 2023 को हूती नियंत्रण वाले क्षेत्रों से दक्षिणी लाल सागर में दो एंटी-शिप बैलिस्टिक मिसाइलें दागी गई थीं।

गाजा विवाद के बीच इजरायल से आने-जाने वाले जहाजों को लाल सागर और हिंद महासागर में निशाना बनाया गया। इन हमलों के कारण कई कंटेनर शिपिंग कंपनियों को छोटा और व्यस्त मार्ग ‘रेड सी’ या ‘सुएज नहर’ का उपयोग करने की योजना छोड़नी पड़ी। ‘सुएज नहर’ भूमध्य सागर को लाल सागर से जोड़ती है।

इजरायल और ईरान के बीच टकराव ने हालात को और अस्थिर कर दिया है। जैसे-जैसे देशों के बीच कूटनीतिक संबंध बिगड़ते हैं, वैश्विक व्यापार मार्ग और ज्यादा असुरक्षित होते जा रहे हैं। ऐसे में ऊर्जा आपूर्ति बाधित होने का खतरा उन देशों के लिए गंभीर है जो आयात पर निर्भर हैं- जैसे भारत।

इन्हीं सब मसलों में रणनीतिक पेट्रोलियम रिजर्व बेहद अहम हो जाते हैं। ये सुनिश्चित करते हैं कि आपूर्ति श्रृंखला में बाधा आने पर भी तेल की उपलब्धता बनी रहे। ये सिर्फ राष्ट्रीय सुरक्षा या आर्थिक स्थिरता का साधन नहीं हैं बल्कि संकट के समय जीवनरेखा की तरह काम करते हैं खासतौर पर उन देशों के लिए जिनकी विकास यात्रा तेल पर निर्भर है।

(यह खबर मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई है जिसे इस लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं)

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Rukma Rathore
Rukma Rathore
Accidental journalist who is still trying to learn the tricks of the trade. Nearing three years in the profession.

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