"सीजेआई रंजन गोगोई ने मिशन असंभव को संभव बना दिया हैं। उनके नेतृत्व में ये हुआ। जिसकी झलक अयोध्या विवाद पर फैसले में पूरी तरह दिखी। आज भारत माता CJI गोगोई को आशीर्वाद दे रही होंगी।"
पटना के इस हनुमान मंदिर का संचालन महावीर ट्रस्ट करता है। पूर्व आईपीएस अधिकारी किशोर कुणाल इसके अध्यक्ष हैं। मंदिरों में दलित पुजारियों की नियुक्ति के सामाजिक परिवर्तन में उनका बड़ा योगदान है। अयोध्या मामले से भी वे जुड़े रहे हैं।
जेकेएलएफ ने इस कार्यक्रम की प्रशंसा करते हुए कहा कि निधि राजदान के रूप में मंच पर एक 'कश्मीरी आवाज़' भी मौजूद था। जेकेएलएफ यासीन मलिक का संगठन है, जो अभी तिहाड़ जेल में बंद है।
यह दूसरा मजहब यदि सचमुच सहिष्णु है तो तत्काल कम से कम काशी और मथुरा के मंदिरों को खुद खाली करे और हिंदुओं के साथ वहाँ भव्य मंदिर बनवाए। बाकी, 30 हज़ार मंदिरों की तो बात भी नहीं हुई है….
चिंता का विषय यह है कि इन लोगों ने उन छात्रों को भी शिक्षित किया जो भविष्य में सैकड़ों लोगों को शिक्षित करेंगे। यह हमारी शिक्षा की स्थिति की एक भयानक तस्वीर को उजागर करता है। इससे यह बात भी स्पष्ट हो जाती है कि वर्तमान सरकार को प्राथमिकता के आधार पर छात्रों को पढ़ाए जाने वाले इतिहास के पाठ्यक्रम में संशोधन की आवश्यकता क्यों है?
असदुद्दीन ओवैसी ने हैदराबाद में एक जनसभा को संबोधित करते हुए कहा कि यदि बाबरी मस्जिद अवैध थी, तो इसे ढहाने को लेकर लालकृष्ण आडवाणी पर मुकदमा क्यों चल रहा है और अगर यह वैध थी, तो आडवाणी को जमीन क्यों दी जा रही है?
VHP के नेताओं ने भी संतों द्वारा सुझाई गई दो तारीखों पर अपनी सहमति दी है और कहा कि उनके द्वारा सुझाई गईं तारीख़ों से बेहतर और कोई तारीख़ नहीं हो सकती। कुल मिलाकर अब सरकार पर भी दबाव रहेगा कि वो जल्द ही ट्रस्ट बनाए और इसमें संतों के प्रमुख वर्गों को शामिल करें।
एनसीपी नेता नवाब मलिक ने कहा कि यदि शिवसेना को हमारा समर्थन चाहिए तो उसे बीजेपी के साथ सारे रिश्ते तोड़ने का ऐलान करना होगा। और अब अरविंद सावंत के केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफे के ऐलान के साथ ही यह साफ हो गया है कि शिवसेना ने एनडीए छोड़ने का मन बना लिया है।
एनसीपी ने कहा है कि यदि शिवसेना को हमारा समर्थन चाहिए तो उसे बीजेपी के साथ सारे रिश्ते तोड़ने होंगे। उसे एनडीए से बाहर आना होगा। मोदी कैबिनेट में शामिल उसके नेताओं को इस्तीफा देना होगा।
जस्टिस गांगुली का कहना है कि अल्पसंख्यकों ने अरसे तक वहाँ मस्जिद देखी है, जिसे तोड़ डाला गया। साथ ही संविधान के अस्तित्व में आने से पहले वहॉं मस्जिद थी। इसलिए उन्हें इस फ़ैसले को समझने में मुश्किल आ रही है।