1999 में एक ईसाई मिशनरी की हत्या पर फिल्म बन जाती है, लेकिन 2008 में स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती की हत्या पर कोई चर्चा नहीं। वनवासी समाज के उत्थान के लिए किए गए उनके कार्यों को याद नहीं किया जाता।
काँवड़ यात्रा में जातिवाद, क्षेत्रवाद और लिंगभेद का नामोनिशान तक नहीं। काँवड़ियों ने अपनी पहचान बस 'भोले भक्त' बताई। महिलाओं और साधु-संतों से भी हमने की बात।