रोज़गार कहाँ हैं? सिर्फ़ ऑटो और प्रोफ़ेशनल सेक्टर ने दी 1.8 करोड़ नौकरियाँ

या तो विश्वकर्मा हमारे सोने के बाद सड़कें बना दे रहे हैं, या फिर भगवान गणेश और चित्रगुप्त रात में जगकर टैक्स डिपार्टमेंट में फ़र्ज़ी लोगों के नाम कम्प्यूटर में डाल रहे हैं, क्योंकि आँकड़े तो टीवी एंकरों की गम्भीरता पर सवाल उठाते दिखते हैं।

नोटबंदी और जीएसटी जब एक के बाद एक आई, तो राजनीति से प्रेरित आर्थिक विश्लेषकों ने भारतीय अर्थ व्यवस्था को लगभग ख़त्म मान लिया था। उनके कारण भी रहे क्योंकि इन दोनों कारकों से इकॉनमी पर असर तो पड़ा ही। लेकिन सरकार और वित्त मंत्रालय ने कम समय तक टिकने वाले उन नुक़सानों को इसलिए भी नज़रअंदाज़ किया क्योंकि इसके आने वाले समय में बहुत बड़े फ़ायदे होने वाले थे। 

नोटबंदी के कारण विरोधियों ने सिर्फ़ विरोध करने के लिए विरोध किया, और उससे होनेवाले फ़ायदों को अब तक नकार रहे हैं जबकि आँकड़े कुछ और ही कहानी कहते हैं। ये कहना कि सारे नोट बैंकिंग सिस्टम में वापस आ गए, और यह भी कि ये सारा पैसा ‘सफ़ेद’ हो गया, अज्ञान से शुरु होकर अल्पज्ञान तक ही पहुँच पाता है। इस पर विस्तार से अगर आप पढ़ना चाहें तो यहाँ पढ़ सकते हैं। 

वैसे ही, जीएसटी के बारे में राफ़ेल के फ़र्ज़ी अफ़वाहों के आने तक लगातार ख़बरें बनाई गईं कि ‘सारे स्लैब को एक कर दो’, ”वन नेशन, वन टैक्स’ का मतलब क्या है? जब लोगों को चार टैक्स देना पड़ रहा है’ आदि। ऐसा नहीं है कि जो ऐसी वाहियात बातें करते हैं, उन्हें इसका ज्ञान नहीं, लेकिन आदत से मज़बूर, मुद्दों की तलाश में भटकते लोग, जब कुछ नहीं पाते हैं तो प्रपंच ही करते हैं। जीएसटी के ‘वन टैक्स’ होने का मतलब यह नहीं है कि हर चीज पर एक ही ‘मात्रा’ में टैक्स लगे, बल्कि उसका मतलब है कि सत्रह ‘तरह’ के अलग ‘मात्रा’ के टैक्स की जगह, एक तरह का टैक्स लगे। इस विषय पर भी आप विस्तार में यहाँ पढ़ सकते हैं। 

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इन दो मुद्दों के बाद भी जब भारत लगातार एक स्थिरता के साथ, दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ने वाली बड़ी अर्थ व्यवस्था बनती है, तो भी कुछ छद्मबुद्धिजीवियों और पक्षकारों को लगता है कि वर्ल्ड बैंक से लेकर IMF जैसी संस्थाओं में संघ प्रचारक बैठे हुए हैं जिन्हें मोदी फोन करता है और वो कहते हैं, “अच्छा, इस साल भी 7.5% रखना है ग्रोथ फ़ोरकास्ट… दुनिया का ग्रोथ फ़ोरकास्ट घटा देता हूँ, भारत का बढ़ा देता हूँ? ठीक है मोदी जी? जी, प्रणाम… जी वंदे मातरम और भारत माता की जय।” 

फिर ख़बरें आती हैं कि भारत ने फ़्रान्स और ब्रिटेन को पछाड़ दिया और कुछ ही महीनों में विश्व की पाँचवी बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगी। ये सब पढ़ते रहने के बाद भी जब बार-बार रोज़गार सृजन को लेकर सरकार को घेरा जाता है, तो आश्चर्य होता है कि बिना रोज़गार दिए कोई अर्थ व्यवस्था इतनी तेज़ी से कैसे बढ़ रही है? 

दूसरी बात, रोज़गार के ही सिलसिले में ही देखा जाए तो साफ़ नज़र आती है कि हर तरफ़ सड़कें, और इन्फ़्रास्ट्रक्चर बन रहे हैं, फिर भी लोगों के पास काम नहीं है? ये सारे लोग कौन हैं? या वो सारे लोग कौन हैं जिन्होंने मुद्रा योजना के तहत लोन लिया और कम्पनी चला रहे हैं? या वो लोग कौन हैं जो टैक्सदाता बनकर पिछले कुछ सालों में टैक्स सिस्टम में आए हैं? और हाँ, पकौड़ा बेचना ‘भी’ रोजगार है जिसे कुछ स्पिन गेंदबाज़ पकौड़ा बेचना ‘ही’ रोज़गार है’ कहकर उपहास करते रहते हैं। 

इसी संबंध में टी वी मोहनदास पाई और यश बैद की एक रिसर्च सामने आई है जिसमें उन्होंने आँकड़ों के आधार पर यह बताया है कि ‘रोज़गार सृजन नहीं हो रहा’ कितना बड़ा झूठ है और मुद्रास्फीति कम रखते हुए उच्च जीडीपी वृद्धि दर लगातार बनाए रखना सरकार की एक बड़ी उपलब्धि है। 

भारत जैसे बड़े देश में जॉब क्रिएट करने वाले सेक्टर्स को देखें तो उसमें ऑटो सेक्टर बहुत बड़ी संख्या में रोज़गार देने वाला माना जाता है। अगर वाहनों की बिक्री बढ़ती है तो इसका मतलब है कि उनका उत्पादन बढ़ रहा है, उत्पादन करनेवालों के काम में स्थिरता है, और वहाँ नौकरियाँ बढ़ेंगी ही, घटेंगी नहीं। साथ ही, अगर कमर्शियल वाहनों (ट्रक, बस, ऑटोरिक्शा, टैक्सी, ट्रॉली, ट्रैक्टर आदि) की बात करें तो बिक्री का मतलब है कि कोई एक व्यक्ति तो उसे चलाएगा ही। कई बार एक ही ऑटो को शिफ्ट में चलाने का मतलब है कि संभवतः उसे एक से अधिक लोग चलाएँगे। साथ ही, अगर बिक्री बढ़ती है तो उससे जुड़े सेक्टर (रिपेयरिंग, सर्विसिंग आदि) में भी रोज़गार के बढ़ने की संभावना रहती है। 

ऐसी स्थिति में ऊपर के रिसर्च से मिले आँकड़ों को देखें तो 1 अप्रैल 2014 से 31 दिसंबर 2018 तक, ऑटो सेक्टर से संबंधित परोक्ष रोज़गारों को छोड़ते हुए (रिपेयर आदि), सिर्फ़ प्रत्यक्ष रोज़गारों की बात करें तो वहाँ लगभग 34 लाख लोगों को 2017-18 में रोज़गार मिले, और 2018 के अंतिम 9 महीनों में लगभग 28 लाख नई नौकरियों का सृजन हुआ। इस तरह से एनडीए सरकार के दिसंबर 2018 तक के कार्यकाल में अप्रैल 2014 से अप्रैल 2017 तक क्रमशः 26.02 लाख, 27.07 लाख और 28.37 लाख लोगों को रोज़गार मिले। इन सबको जोड़ा जाए तो इस सेक्टर में मोदी सरकार के कार्यकाल में लगभग 1.4 करोड़ लोगों को रोज़गार मिले।

इस पर आलोचनात्मक स्थिति में भी, कि इसमें से बहुत लोग ऐसे होंगे जो पुरानी गाड़ियों को बेच रहे होंगे, ये देखना मुश्किल नहीं है कि रोज़गार बढ़े ही हैं, घटे नहीं। क्योंकि नई गाड़ियाँ ख़रीदना सिर्फ़ मोदी सरकार में ही नहीं हो रहा, वो पहले भी हुआ है, आगे भी होगा। लम्बे समय में इस आँकड़े को देखा जाए, तो फिर वो एक स्थिर दर से रोज़गार में वृद्धि का संकेत देती है। 

मोहनदास और यश बैद ने ही दूसरे सेक्टरों में रोज़गार सृजन के आँकड़े देते हुए बताया है कि ‘प्रोफ़ेशनल’ सेक्टर एक ऐसा सेक्टर है जो कॉरपोरेट सेक्टर का हिस्सा न होने के बाद भी बहुत बड़ा रोज़गारदाता है। इस सेक्टर में वैसे लोग हैं जो अपने साथ कई और लोगों को काम देते हैं, जैसे चार्टर्ड अकाउंटेंट, वकील, मैनेजमेंट अकाउंटेंट, कम्पनी सेक्रेटरी, डॉक्टर, फ़ैशन डिज़ाइनर, रियल स्टेट ब्रोकर, वित्तीय सलाहकार आदि। 

चूँकि हम इन लोगों द्वारा जॉब क्रिएशन की बात कर रहे हैं, तो भी देखना ज़रूरी है कि क्या ऐसे कॉलेजों और विश्वविद्यालयों से (जो इस तरह की शिक्षा या स्किल्स देते हैं), उसी अनुपात में टैलेंट भी बाहर आ रहा है? इस बात पर भी मोहनदास और यश के लेख में ध्यान दिया गया है, और इस आँकड़े को न सिर्फ टैलेंट के कॉलेजों से आने, बल्कि नए टैक्सदाताओं की संख्या में हुई वृद्धि से जोड़कर देखा गया, तो सब कुछ सामान्य और आनुपातिक दिखता है। 

कहने का तात्पर्य यह है कि अगर इस सेक्टर में हम नौकरियों की बात कर रहे हैं, तो इसमें रोज़गार देनेवाले लोग हैं, जो वैसे लोगों को रोज़गार दे रहे हैं जो उनके मतलब की शिक्षा या कौशल के साथ कॉलेज से पढ़ाई करके बाहर आ रहे हैं, और जिन्हें नौकरी मिल रही है, वो लोग टैक्स सिस्टम का हिस्सा बन रहे हैं। ज़ाहिर तौर पर एक सामंजस्य देखा जा सकता है। 

अब इस सेक्टर के आँकड़ों की बात करें तो मार्च 2017 तक ऐसे नॉन-कॉरोपोरेट प्रोफ़ेशनल टैक्दाताओं की संख्या 20 लाख तक जाती है। इनकी संख्या में हो रही औसत वृद्धि (1,50,000/वर्ष) के हिसाब से मार्च 2019 तक यह संख्या 24 लाख तक जाती है। अब, यह भी कहा जा सकता है कि ये तो वैसे लोग हो सकते हैं जो पहले से प्रोफ़ेशनल थे, और अब टैक्स सिस्टम में आए हैं। ये तर्क सही है, लेकिन ऐसे लोगों के टैक्स ब्रेकेट में आने की प्रक्रिया सतत है, तो साल-दर-साल के आँकड़ों को देखते हुए यह सामान्यीकृत हो जाएगा। 

इस सेक्टर के लोगों की ख़सियत यह होती है कि ऐसे लोग न सिर्फ़ नौकरी करते हैं, बल्कि नौकरियाँ देते भी हैं। आम तौर पर एक टैक्स देने वाले प्रोफ़ेशनल के साथ कई और लोग कार्य करते हैं। उस आँकड़े को देखा जाए तो, एक प्रोफ़ेशनल द्वारा औसतन मात्र पाँच नौकरी भी माना जाए, तो ऐसे नए रोज़गारों की संख्या लगभग आठ लाख प्रति वर्ष होती है। साथ ही, हर साल टैक्स सिस्टम में आने वाले लोगों की संख्या लगातार बढ़ती दिखती है, जो कि एक सकारात्मक बात है।

इस हिसाब से नई नौकरियों के सृजन की संख्या देखें तो पाँच साल में लगभग 40 लाख लोगों को नौकरियाँ मिली हैं। ऊपर के ऑटो सेक्टर द्वारा सृजित रोज़गार के आँकड़ों को मिला दें तो ये संख्या 1.8 करोड़ तक पहुँच जाती है। सिर्फ दो सेक्टर ने इतने लोगों को नौकरियाँ दी हैं, जबकि मुद्रा लोन, इन्फ़्रास्ट्रक्चर सेक्टर से लाखों लोगों को काम देने की बात या स्वरोज़गार करते लोगों की संख्या आदि का कोई आधिकारिक या सरकारी आँकड़ा न होने के कारण ये कहना आसान हो जाता है कि ये ग्रोथ ‘जॉबलेस’ या रोज़गारहीन है।

इस तरह के तथ्यपरक आँकड़ों और तार्किक विश्लेषण से आम तौर पर झुठला दी जाने वाली बातों का खंडन किया जा सकता है। लेकिन हम ऐसे दौर में रहते हैं जहाँ अगर टीवी पर गम्भीर शक्ल लेकर बैठा एंकर ये सवाल पूछ दे कि ‘रोज़गार कहाँ हैं’ और हम मान लेते हैं कि रोज़गार नहीं हैं। या तो विश्वकर्मा हमारे सोने के बाद सड़कें बना दे रहे हैं, या फिर भगवान गणेश और चित्रगुप्त रात में जगकर टैक्स डिपार्टमेंट में फ़र्ज़ी लोगों के नाम कम्प्यूटर में डाल रहे हैं, क्योंकि आँकड़े तो एंकरों की गम्भीरता पर सवाल उठाते दिखते हैं। 

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