रवीश जी, आर्टिकल ट्रान्सलेट करने के बाद भांडाफोड़ होने पर लेख क्यों नहीं लिखते?

पत्रकारिता सरकार के विरोध में ही नहीं होती, पत्रकारिता समाज को सूचित करने को कहते हैं। सरकार की ख़ामियों को भी बताइए, और उपलब्धियों को भी। उपलब्धियों के प्रतिशत में हेर-फेर लगे तो बत्तीस मिनट उपलब्धि पर बोलकर, तीन मिनट बताइए कि डेटा गलत दे रही है सरकार।

पत्रकारिता के स्वघोषित चरम मानदंड ने, जो बराबर किसी न किसी अंग्रेज़ी प्रोपेगेंडा का अनुवाद हिन्दी में अपने वाल पर डालते रहते हैं ये कहकर कि हिन्दी पत्रकारिता ने हिन्दी पाठकों का नुकसान ही किया है, आज ‘द हिन्दू’ की चिरकुटई (जो आधे घंटे में धो कर सुखा दी गई) का अनुवाद किया।

वीडियो में इसी लेख को यहाँ देखें

चूँकि सरकार के ख़िलाफ़ वाली बात थी, तो हमेशा की तरह ख़बर या ख़ुलासे ‘चौंका देने वाले’ से लेकर अब ‘सन्न कर देने’ वाले तक पहुँची है। रवीश जी आजकल हर फ़र्ज़ी ख़बर का अनुवाद करते हुए सन्न हो जाते हैं, चौंक जाते हैं, अघोषित आपातकाल देखने लगते हैं, या छत पर जाकर बार-बार देखने लगते हैं कि एनडीटीवी का केबल तो अमित शाह काट नहीं रहा!

जस्टिस लोया वाली बात पर सुप्रीम कोर्ट के जवाब आने के बाद इन्होंने कोई आर्टिकल नहीं लिखा। अमित शाह के बेटे पर सवाल उठाने वाले आर्टिकल का भी अनुवाद करने के बाद इन्होंने उसके फ़र्ज़ी और ‘स्पिन-फ़्रेंडली’ पाए जाने पर कुछ ज्ञान नहीं दिया। कारवाँ द्वारा अजित डोभाल के बेटे पर सवाल उठाने वाले फ़र्ज़ीवाड़े का भी अनुवाद करने के बाद इन्होंने कोई माफ़ी नहीं माँगी।

- विज्ञापन - - लेख आगे पढ़ें -

चलिए माफ़ी भी मत माँगिए, लेकिन ये तो लिख ही सकते हैं कि चौंकाने और सन-सननन-साँय-साँय कराने से लेकर ‘बताता है कि इसकी जड़ें कितनी गहरी हैं’ वाले लेख को सत्य मानकर आपने जो ब्रह्मज्ञान अपने फ़ेसबुक वाल और प्राइम टाइम में दिया, उस पर लेटेस्ट ये चल रहा है। जब आदमी कोर्ट में केस करता है तो फिर आप ‘फ़्रीडम ऑफ़ एक्सप्रेशन’ पर आ जाते हैं, प्रेस फ़्रीडम पर अटैक दिखने लगता है आपको!

मतलब, आपने जो लिख दिया वही अंतिम सत्य है, और एक नागरिक को कोर्ट जाने का भी अधिकार नहीं क्योंकि आपने उस आर्टिकल का अनुवाद किया है? या आपको लगता है कि सुप्रीम कोर्ट के जज तभी तक कंपीटेंट हैं जब तक वो आपके मतलब की बातें करते हैं, और बाकी समय वो बेकार हो जाते हैं? ये किस तरह का अप्रोच है?

आप आधे समय टीवी नहीं देखने की बात करते हैं, और यह भी बताते हैं कि टेलिग्राफ़ का घटिया शीर्षक कैसे नए पत्रकारों के लिए सीखने लायक है। जबकि आपको पता है कि वो सीखने लायक नहीं, खिसियानी बिल्ली खम्भा नोंचे से आगे कुछ भी नहीं है।

आज भी आपने राफ़ेल वाले मुद्दे पर एन राम के लेख का अनुवाद करते हुए आपने विस्तार से लिख दिए। आधे घंटे में सरकार ने, उस नेगोशिएशन टीम ने और रक्षा मंत्रालय के अधिकारियों ने ख़ारिज कर दिया। यही नहीं, आपके सामने भी तो उसी सोशल मीडिया पर उस नोट का पूरा भाग आया होगा, क्या आपने उसी नोट का सही हिस्सा कभी लगाया अपने वाल पर?

लेख लिखने के 8 घंटे बाद तक भी कोई स्पष्टीकरण नहीं दिखा इनके वाल पर

या आपको लगता है कि आपने जो लिख दिया वो लिख दिया? क्या आपकी बुद्धि इतनी क्षीण पड़ गई है कि आपको ये पता नहीं चल रहा कि ‘द हिन्दू’ ने जानबूझकर ऊपर और नीचे के हिस्सों को क्रॉप कर दिया था? क्या आपने कहीं ये लिखा कि इससे एन राम की विश्वसनीयता पर सवाल उठता है?

आपने नहीं लिखा, क्योंकि वो आपको सूट नहीं करता। हो सकता है आप शाम में प्राइम टाइम भी कर दें, और ये साबित करने में तैंतीस मिनट निकाल दें कि ‘अगर इतना कुछ हो रहा है तो जाँच क्यों नहीं करा लेती सरकार’? जबकि, आपको अच्छे से पता है कि सुप्रीम कोर्ट ने इस पर अपना निर्णय दे दिया है। आपको अच्छे से पता है कि रक्षा मसलों को पब्लिक में गोपनीयता और द्विपक्षीय संधियों के कारण नहीं रखा जा सकता।

लेकिन इससे आपका मन नहीं भरता। क्योंकि आप लगातार झूठ की चाभी टाइट करके अपने करियर को रेंगने के लिए ऊर्जा दे रहे हैं। जब पूरे भारत में बिजली आती है तो आप चौंतीस मिनट बताते हैं कि तीन गाँव में तो नहीं आई। इस बात पर आप तीन मिनट ही बोलते कि ‘सरकार का दावा गलत है, लेकिन बिजली पहुँचाना एक बहुत बड़ी बात है’, तो भी समझ सकता था।

झूठ बोल कर निकल लेना आपकी आदत और मजबूरी दोनों ही है। आप आज के प्राइम टाइम में फिर से यही बात कहेंगे कि ‘जाँच से पीछे क्यों हट रही है सरकार’। आपको देखने वाले रवीश भक्त भी सोशल मीडिया पर बवाल काट देंगे कि ‘हाँ भाई, जाँच से क्यों भाग रही है सरकार’। जबकि आप जानते हैं, आप ये कहते रह सकते हैं, क्योंकि जो जाँच होनी थी वो हो गई, बस आपको मैग्निफाइंग ग्लास लेकर राफ़ेल के कॉकपिट में राहुल गाँधी के साथ बुलाना रह गया है!

पत्रकारिता सरकार के विरोध में ही नहीं होती, पत्रकारिता समाज को सूचित करने को कहते हैं। सरकार की ख़ामियों को भी बताइए, और उपलब्धियों को भी। उपलब्धियों के प्रतिशत में हेर-फेर लगे तो बत्तीस मिनट उपलब्धि पर बोलकर, तीन मिनट बताइए कि डेटा गलत दे रही है सरकार। मैं अब ये नहीं कहता कि मैं रवीश का प्राइम टाइम देखा करता था, क्योंकि अब आपने सुधरने की उम्मीद छोड़ दी है। मतलब, संभावना नहीं दिखती।

आपको तो अनुभव है इतना कि आप पत्रकारिता की नई परिभाषा गढ़ सकते हैं। एन राम जैसे लोगों का पतन देखकर लगता है कि पत्रकारिता विचारधारा से ऊपर कभी नहीं उठ सकती। ये लोग स्तम्भ हुआ करते थे, लोग आपके रिपोर्ट की क़समें खाते थे, आईएएस बनने की इच्छा रखने वाले इसी ‘हिन्दू’ को पढ़कर इंटरव्यू में कोट करते थे।

अब यही एन राम, यही हिन्दू और यही रवीश कुमार हर दिन ऐसे कारनामे कर रहे हैं कि मुझे कोई कल को पूछे कि पत्रकारिता में क्या नहीं करना चाहिए तो इनके नाम बताने में झिझक नहीं होगी। आप और आपका गिरोह पत्रकारिता के नाम पर कलंक है। आप टीवी पर आने वाले एक अवसादग्रस्त व्यक्ति हैं, पत्रकार नहीं।

आपको आयुष्मान योजना का लाभ लेकर मनोचिकित्सक से मिलना चाहिए, उसके बाद अपने पुराने संस्थान में लौटकर, नए लोगों से बात करनी चाहिए। और अंत में अपनी ही रिपोर्ट देखनी चाहिए जो आपने नौकरियों पर की, एसएससी पर की, गाँवों पर की, राजनीति पर की। आप वो कार्यक्रम देखिएगा जो आपने राजनीति पर की, न कि किसी नेता या पार्टी पर।


शेयर करें, मदद करें:
Support OpIndia by paying for content

ज़्यादा पढ़ी गईं ख़बरें

आतंकी एके सैंतालीस से खेल रहे क्रिकेट

इमरान खान, AK47 गाड़कर आतंकियों के ग्रेनेड से रिवर्स स्विंग मत कराइए, फट जाएगा

भैंस, गधे और कार बेचकर पैसे जुटाने वाले प्रधानमंत्री को यह सोचना चाहिए कि बंदूक़ों और आरडीएक्स के साथ-साथ आतंकियों को सैलरी पर रखना पाकिस्तानी हुकूमत की अजीबोग़रीब नीतियों की तरफ इशारा करता है।
रवीश कुमार

हिंदी हृदय सम्राट रवीश कुमार जी! थोड़ी अंग्रेजी भी पढ़ लीजिए, फ़र्ज़ीवाड़ा कम फैलाएँगे… हेहेहे!

दैनिक जागरण में रुपए की जिस ख़बर का हवाला देते हुए उन्होंने एक लंबा फर्जी लेख ''मीडिया विजिल'' में लिख मारा है, वह पूरी स्टोरी विशेषज्ञों के हवाले से लिखी गई है। काश! रवीश अंग्रेजी जानते और ऑरिजिनल आर्टिकल पढ़ पाते।
रविश, बरखा, राजदीप और वाजपेयी

मठाधीश पत्रकारों को औकात दिखाती सोशल मीडिया

रवीश कुमार का तो यह हाल है कि वे प्रनॉय रॉय के घर में तीसरी सबसे पुरानी चीज हो चुके हैं, लेकिन तब भी उनकी नौकरी छोड़ नहीं सकते क्योंकि उन्होंने इतना 'यश' कमाया है कि यहाँ से जाने के बाद उन्हें शायद ही कोई रोजगार दे।
राजदीप सरदेसाई और सैकात दत्ता

राजदीप जी, थोड़ी शरम बची हो तो हथेली पर थूक कर उसी में नाक डुबा के मर जाइए

जब तक इन्हें छीलेंगे नहीं, ये अपनी हरकतों से बाज़ नहीं आएँगे। इसलिए, इनके ट्वीट तो छोड़िए, एपिडर्मिस, इन्डोडर्मिस से लेकर डीएनए तक खँगालते रहिए क्योंकि बाय गॉड, ये लोग बहुत ही बेहूदे क़िस्म के हैं।
क्विंट आर्टिकल का स्क्रीनशॉट

क्विंट वालों ने टिक-टॉक विडियो से रॉकेट साइंस लगाकर ‘डेन्जरस हिन्दुत्व प्रोपेगेंडा’ कुछ यूँ निकाला

जब ये प्लेटफ़ॉर्म इस तरह की जोकरई और मूर्खतापूर्ण हरकतों से भरा हुआ है, तो वहाँ आपको राम मंदिर को लेकर भी 'ख़तरनाक राजनीति', या 'एक्सट्रीम हिन्दुत्व अजेंडा' के नाम पर सबसे ख़तरनाक पोस्ट यही मिलेगा कि 'मैं आरएसएस को पसंद करती हूँ', या यह कि 'मेरा जीवन संघ के लिए है।'
अजय कुमार

मेरठ के वीर अजय: ढाई साल का पुत्र, 8 महीने गर्भवती पत्नी और एक बिलखती माँ

मेरठ के जानी ब्लॉक के बसा टीकरी गाँव के रहने वाले अजय की उम्र 27 साल थी। 7 अप्रैल 2011 में अजय सेना की 20 ग्रेनेडियर में भर्ती हुए।

कश्मीरी राष्ट्रवादी, जो माँ-पिता को खो चुका है, PM से सुरक्षा की गुहार कर रहा है

हमने कई सारे इनिशिएटिव लिए हैं ताकि युवा इस चुनावी प्रक्रिया का हिस्सा बनें और शांति के प्रयास में हमारा साथ दे सकें। मेरे परिवार के कुछ सदस्य आतंकियों द्वारा पिछले कुछ सालों में मारे जा चुके हैं और यह बताता है कि यहाँ मेरी ज़िंदगी को कितना ख़तरा है।
मल्लिका दुआ

‘रोज मरते हैं लोग’ – पुलवामा पर थेथर मल्लिका दुआ का कॉमेंट, लोगों ने जम कर लगाई ‘लताड़’

पुलवामा हमले में वीरगति को प्राप्त हुए जवानों का अपमान करते हुए यौन शोषण के आरोपित पत्रकार विनोद दुआ की बेटी मल्लिका दुआ ने कहा कि रोज कई वजहों से लोग मरते हैं। मल्लिका दुआ अक़्सर ऐसी थेथरई करती रहती हैं।
कुलभूषण जाधव

पाक ने ICJ में कुलभूषण जाधव को RAW एजेंट साबित करने को लिया ‘The Quint’ का सहारा

पकिस्तानी पक्ष ने चन्दन नंदी द्वारा 'दी क्विंट' में लिखे गए एक लेख का भी सहारा लिया। इस लेख में नंदी ने दावा किया था कि जाधव के पास दो पासपोर्ट थे- एक उनके असली नाम से, और एक हुसैन मुबारक पटेल के नाम से।

Fact Check: NDTV वालो, और केतना बेज्जती करवाओगे शोना?

विवादस्पद NDTV की पहचान अब अक्सर फ़ेक न्यूज़ को प्रचारित करने की बन चुकी है। NDTV ने अपनी वेबसाइट में एक ऐसी भ्रामक हेडलाइन को प्रमुखता से जगह दी जिसमें यह दर्शाया गया कि पीएम मोदी ने वंदे भारत ट्रेन-18 का मजाक उड़ाते हुए लोगों के ख़िलाफ़ सज़ा की माँग की।

ताज़ा ख़बरें

हमसे जुड़ें

12,780फैंसलाइक करें
4,526फॉलोवर्सफॉलो करें
23,272सब्सक्राइबर्ससब्सक्राइब करें

ज़रूर पढ़ें