Monday, September 28, 2020
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मोदी ने धोए पाँव, लेकिन नहीं पिया चरणामृत: माओवंशी पत्रकार गिरोह

अगर आप थोड़ी मेहनत करें, थोड़े अख़बार आदि पढें, थोड़े हेडलाइन देखें, थोड़ें स्टिंग पर नज़र दौड़ाएँ तो पता चलेगा कि विकास की हर योजना के पीछे बच्चों से उनकी कल्पना, मज़दूरों से उनकी मेहनत, ग़रीबों से उनकी रोज़मर्रा की जीवनशैली और दलितों से उनका दलित होना छीना जा रहा है।


नमस्कार

मैं दल-हित चिंतक पत्रकार!

जैसे-जैसे चुनाव पास आते जाते हैं, नेता लोग विचित्र तरह के काम करने लगते हैं। वोटरों को रिझाने के लिए विकास से लेकर प्रकाश तक की बातें की जाती हैं। जाती से याद आया कि जाति की बात सिर्फ मैं करता हूँ क्योंकि मैं अकेला व्यक्ति हूँ जो चाँद पर रखे अमेरिकी झंडे से भी पूछ लेता हूँ कि ‘कौन जात हो’। क्योंकि जाति पर ही सारा खेला होता है। हें, हें, हें…

हाल ही में प्रधानमंत्री मोदी जी, अब सम्मान देना पड़ रहा है क्योंकि 2019 के बाद अगर वो आ गए तो मैं गंगा नहाकर हिमालय निकल लूँगा, और उसमें मुझे कोई खट-पट नहीं चाहिए, ने जिम कॉर्बेट में मेरे रिपोर्टों के अनुसार 10-12 बार जैकेट बदल कर पूरा फोटो शूट कराया। पुलवामा हमला जिस दिन हुआ, उसी दिन ये भी हुआ। दिन बताऊँगा, लेकिन समय नहीं। वो इसलिए क्योंकि मैं चालाक पत्रकार हूँ तो बोलूँगा कम, छुपाऊँगा ज़्यादा ताकि समझने वाले समझ जाएँ, जो न समझे वो अनाड़ी हैं। 

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हालाँकि, इस बात का खंडन किया गया तो मैंने विज्ञान का सहारा लेते हुए रॉ फ़ुटेज माँगा कि डिस्कवरी वाले दे दें। भले ही मुझे ज्ञान नहीं है उसे जाँचने का, फिर भी जाँचने की बात करते हुए कुछ नई बात ही सामने आ जाती कि उनके कोट का दाम कितना है, किसने सिला, कितने में सिला आदि। राॅ फ़ुटेज तो मैंने अमेरिकी चाँद मिशन पर भी माँगी थी, जो कि नहीं मिली। लेकिन मुझे क्या, उनका मसला वो जानें। 

ज़्यादा नहीं घुमाऊँगा क्योंकि आप लोग चैनल बदल लेंगे या अमित शाह आपके घरों की छत पर बैठकर मेरे चैनल का तार काट देगा। आजकल तो इसरो वालों से भी इनकी बनने लगी है, क्या पता सैटेलाइट से ही हमारा चैनल अंधेरे में कर देते होंगे! ये जो तंत्र होता है, वो इतना व्यापक है कि कुछ भी हो सकता है। आप लोगों को लगेगा कि मैं पगला गया हूँ। आप ऐसा सोचने को स्वतंत्र हैं, लेकिन मैं एक पत्रकार हूँ, मैं आवाज उठाता रहूँगा। 

अमित शाह भले ही चाणक्य नीति का प्रयोग करके, संघियों से मंत्र पढ़वाकर मेरे चैनल का सिग्नल बाधित कर दें लेकिन मुझे यूट्यूब के महान लोगों से मिलने से कोई नहीं रोक सकता। मैं इसी स्टूडियो से हर रोज ‘मेरी आवाज़ दबाई जा रही है’ चिल्लाकर बोलता रहूँगा, बिकॉज़… व्हाय एफिंग नॉट! अंग्रेज़ी का स्लैंग हमको भी आता है जी… हें, हें, हें…

ताजा ख़बर यह आई है कि मोदी जी ने स्वच्छता कर्मियों के पाँव प्रच्छालन किए, चरण वंदना की, और आशीर्वाद लिया। हमने जब अपने खोजी कैमरा क्रू और रिपोर्टरों को इसकी खोज-ख़बर लेने प्रयागराज भेजा, तब तक मोदी जी वहाँ से जा चुके थे। उसके बाद वेबसाइटों पर से स्वच्छता दूतों की तस्वीर निकाल कर, सॉल्ट न्यूज वालों से उनके चेहरे का मिलान करके, उन लोगों को कैरे-बाईन मैगजीन के ख़ुशमिज़ाज मशरफ़ से फोन करवाकर उनकी जाति पता करवाई। 

इन सबसे जो ख़ुलासे हुए वो चौंकाने वाले थे। जैसा कि हम जानते हैं कि सफ़ाई कर्मचारी स्वयं साफ नहीं रहते। साफ नहीं रहते का मतलब है वो गंदगी में रहते हैं। रहते हैं का मतलब है कि उन्हें वैसा रहना पसंद हैं, उनका जीवन वैसा ही है। अब किसी के सामान्य जीवन में मोदी जी जाकर पानी डाल आए। उन्हें घरों से निकाला गया होगा, और उनके मना करने के बावजूद कि पीएम से पाँव नहीं धुलवाना, उन्हें डीएम ने स्वयं मोदी के लिए तैयार कराया होगा। मेरे पास कोई सबूत नहीं है, लेकिन मुझे ऐसा ही लगता है। 

इतना दिन काम किए हैं मीडिया में, तो ये सब तो पता लगिए जाएगा न जी! हें, हें, हें…

खैर, कहानी यह है कि इन गरीब लोगों को इनके रूटीन लाइफ से बाहर लाकर, नहलाया गया, डिटॉल से इनके कीटाणु साफ किए गए और गंगा के पानी से शुद्ध करने के बाद, उन्हें पीएम के पास लाया गया। हमारे साथी अनाकोंडा पोस्ट के पत्रकारों ने बताया कि कम से कम बहत्तर लोगों ने उन्हें कहा कि ऐसा ही हुआ होगा। इसलिए हमारे पास न मानने के कोई विकल्प नहीं हैं। 

अब आप ही यह बताइए कि मोदी जी कब तक गाँधी की मूर्ति के पास पर झाड़ू चलाकर, लोगों को बाहर लोटा लेकर प्रकृति के क़रीब बैठने से, उनके अंधेरे में रहने की आदत से, उनके घरों में जबरदस्ती उतना भारी सिलिंडर लगवाकर उनके जीवन में गैस भरवाने की नई टेंशन देकर, उन्हें अपने तरीके से जीने से रोकते रहेंगे? 

आप तो मुझे यही बता दीजिए कि आपके भक्त गण बोलते रहते हैं कि मोदी सड़कों पर झाड़ू ही देता रहेगा क्या? वो तो एक प्रतीकात्मक बात है कि लोग आस-पास साफ रखें। मने ठीक है, इतना कॉमन सेंस हम सब में है कि प्रधानमंत्री झाड़ू नहीं देता, वो एक बार घुमा देता है ताकि लोग इन्सपायर होते रहें। अंग्रेज़ी आती है भाई! ऐसे क्या देख रहे हैं? 

तो जिस दलित का पाँव धोया था, उसके साथ एक दिन बिता लेते। उसके घर में बने शौचालय में पानी डाल देते, उनके हाथ में मिट्टी देकर हाथ धुलवा देते, चापाकल से पानी चला देते। अरे, ज़्यादा कहाँ बोल रहा हूँ, सब प्रतीकात्मक ही तो है। 

आखिर ये आदमी भारत के सामान्य नागरिकों को इतना परेशान क्यों करता है? आखिर विकास हो ही क्यों रहा है? सड़कें बनवाकर ये आदमी वोट ही तो लेना चाहता है! आखिर बिजली के नहीं होने से कौन से लोग मर रहे थे? किसी भी आधिकारिक सर्वेक्षण में ऐसा डेटा नहीं मिला है कि लोग बिजली के बिना मर रहे थे। लोटा लेकर बाहर जाते हुए आदमी को एकाध बार साँप-बिच्छू ने काटा हो, वो अलग बात है, लेकिन किसी की जान तो नहीं जा रही थी!

फिर ये शौचालय की नौटंकी किस लिए? अगर आप समझदार हैं, जो कि हिन्दी के पाठकों को मैं नहीं मानता, खासकर उन्हें जो टीवी देखते हैं, तो आपको पता चलेगा कि टॉयलेट वाली योजना कितना बड़ा षड्यंत्र है। भारत में अधिकतर लोग जिनके घरों में टॉयलेट नहीं है, वो गरीब हैं, वंचित हैं, दलित हैं, और शायद अल्पसंख्यक भी। इन लोगों की संख्या भारत की तीन चौथाई आबादी है। इतने लोग सुबह-सुबह किसी खेत में जाते होंगे, और वहाँ खाद बनाते होंगे, जिससे मिट्टी की उर्वरा शक्ति बढ़ती है।

किसानों की बात करने वाले मोदी जी का यही है असली चेहरा। खेतों से लोगों को वापस लौटा कर नीम कोटेड यूरिया बेच रहे हैं, जबकि पूरी दुनिया को पता है कि पेशाब में यूरिया होता है। आखिर इतने पैसों से खाद क्यों बनाना जबकि उससे शिक्षा या स्वास्थ्य पर ख़र्च किया जा सकता था? मैंने तो यह भी सुना है कि खाद से बम बनाया जाता है, कहीं आतंकियों के हाथ लग गया तो? आप देखिए कि तंत्र किस तरीके से आपको पागल बनाता है। 

ऊपर से जो बातें आपको लगती हैं कि जीवन बदल देगी, उसकी जड़ में रिलायंस और अदानी होते हैं। ऐसे दलितों के सर पर छत लाकर रख दिया प्रधानमंत्री आवास योजना से… वाह मोदी जी वाह, एक ही दिल है कितनी बार लूटोगे! लेकिन आपने सर पर छत रखकर उनके जीवन का जो एक मोटिवेशन था, जिसके लिए वो व्यक्ति मेहनत करता था, वो भी आपने छीन लिया। अब उसका घर तो बन गया, वो काम क्यों करेगा? 

एक पूरी पीढ़ी को नकारा बनाने की साज़िश है मोदी सरकार! आप ही सोचिए कि ग़रीबों के घरों में रोशनी लाकर ये कौन सा भला कर रहे हैं? बचपन में मैं एक कहानी पढ़ा करता था कि स्ट्रीट लैंप के नीचे बैठकर पढ़ते थे ईश्वर चंद्र विद्यासागर। लेकिन अब तो घर में ही बिजली ला दी, वैसी कहानियाँ अब कहाँ से आएँगी। विद्यासागर तो छोड़िए, कोई विद्यापोखर भी बन पाएगा क्या? और स्ट्रीट लाइट की बिजली तो बेकार ही चली जाएगी अगर कोई उसके नीचे नहीं पढ़ेगा तो। आप अंदाज़ा लगाइए कि पूरे भारत में कितने बिजली के खम्भे हैं जिस पर बल्ब है। आपको पता चलेगा कि घरों में बिजली लाकर कितने नौनिहालों को पढ़ने से वंचित किया जा रहा है। पोल के नीचे कोई पढ़ लेता तो बिजली का इस्तेमाल हो जाता, लेकिन मेरी सुनता ही कौन है! 

बिजली से जुड़ी ये बात ज़रूर है कि तीन घरों में बिजली नहीं पहुँची थी, जिस पर मैंने कुल चालीस मिनट का शो किया था। एक ज़िम्मेदार पत्रकार को इससे मतलब नहीं होना चाहिए कि 18,000 गाँवों में बिजली पहुँच गई। उसका उद्देश्य यही होना चाहिए कि अगर ऐसा हो भी गया हो तो तीन घरों के तार काटकर, अंधेरे में बैठे परिवार को दिखाकर, चालीस मिनट का शो कर लेना चाहिए। यही असली पत्रकारिता है, सरकार अच्छा काम करे, तो उसको किसी भी तरह से बुरा बताओ। फिर एंटी-एस्टैबलिशमेंट का तमग़ा लेकर चौड़े में घूमो। 

ये सब बहुत ही व्यवस्थित तरीके से हो रहा है जनाब। नदी तैरकर स्कूल जाते थे राजेन्द्र प्रसाद और आपने नदियों पर बना दिए पुल। न तो तैरने वाले रहे, न ही केवट जो राम को पार ले जाए! और राम का नाम तो आप सोते-जागते लेते रहते हैं। अगर आप थोड़ी मेहनत करें, थोड़े अख़बार आदि पढें, थोड़े हेडलाइन देखें, थोड़ें स्टिंग पर नज़र दौड़ाएँ तो पता चलेगा कि विकास की हर योजना के पीछे बच्चों से उनकी कल्पना, मज़दूरों से उनकी मेहनत, ग़रीबों से उनकी रोज़मर्रा की जीवनशैली और दलितों से उनका दलित होना छीना जा रहा है। 

एक तय तरीके से मज़दूरों के बच्चों को स्कूल भेजकर, मिड डे मील के ज़रिए, बेहतर भविष्य के बहाने उनके जीवन का एकलौता उद्देश्य – बाल मजदूरी, बाल विवाह, बच्चे, वयस्क मजदूरी, पलायन – से बहुत दूर किया जा रहा है। आखिर सारे लोग पढ़ ही लेंगे तो मजदूरी कौन करेगा? आने वाली सरकारों के लिए क्या हम रोहिंग्या से मजदूरी करवाएँगे? आप तो उनको भी आने नहीं दे रहे! ये साज़िश है देश के खिलाफ कि मज़दूर बचे ही नहीं, ताकि आने वाली सरकारें कोई भी ढाँचागत विकास न कर सके। फिर उनकी जगह मशीन आएँगी और नौकरियाँ खत्म हो जाएँगी। 

अगर यह आपातकाल नहीं है तो मैं नहीं जानता आपातकाल क्या है। जाते-जाते दलितों के पाँव धोने से याद आया कि संस्कृत के शब्द- प्रच्छालन, चरण और वंदना लिख देने से दलितों को सम्मान नहीं मिल जाता। दलितों का सम्मान सिर्फ वही कर सकता है जिसके पार्टी का अजेंडा उनका वोट पाने का रहा हो। आपका क्या है, आप तो इन लोगों में फ़र्क़ भी नहीं कर पाते। आपके लिए तो ‘सबका साथ, सबका विकास’ है, जबकि ‘कुछ का साथ, कुछ का विकास’, हार्वर्ड, ऑक्सफोर्ड, कैम्ब्रिज के पढें लोगों की कॉन्ग्रेस पार्टी का मुद्दा रहा है। 

इससे कई फ़ायदे हैं। जैसे कि सबका विकास अगर हो ही जाएगा तो नेता लोग करेंगे क्या? सबका साथ, सबका विकास का मतलब है कि आप विधायिका को खत्म कर देना चाहते हैं, सबका विकास हो जाने के बाद चिर-परिचित और अनंत काल से चली आ रही ‘गरीबी हटाओ’ जैसे कालजयी नारों पर वोट लेने वाली पार्टियों का क्या होगा? ये एक चाल है कि विधायिका की प्रासंगिकता खत्म कर दी जाए और लोग बार-बार आपको ही चुनें। 

आप वो व्यक्ति हैं जो लोकतंत्र की अवघारणा के खिलाफ है। दलितों को भी अगर आपने वही स्तर दे दिया जो सवर्णों को हासिल है तो फिर राजनीति किस बात की होगी? मायावती जी जैसी महिला नेत्रियों का क्या होगा? आप दलितों की चरण वंदना करते हैं! ये सब एक चाल है। 

खैर छोड़िए, मुझे पता है कि रामदेव की स्पॉन्सरशिप टीम को छोड़कर मेरा प्रोग्राम बहुत कम लोग ही देखते हैं। आप तो बस यही बता दीजिए कि दलितों का पैर धोने के बाद उस पानी को आपने पिया क्यों नहीं? वो तो चरणामृत है, पी लेते तो कौन सा बुरा हो जाता? ये बात और है कि आप अगर पी लेते तो मैं नया प्राइम टाइम कर देता कि लोग वोटों के लिए पैर धोकर पी रहे हैं। हें, हें, हें…

मोदी जी, हमारे जैसे पत्रकार लिक्विड ऑक्सीजन हैं, लिक्विड आपको जीने नहीं देगा, और ऑक्सीजन आपको मरने नहीं देगा! 

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अजीत भारतीhttp://www.ajeetbharti.com
सम्पादक (ऑपइंडिया) | लेखक (बकर पुराण, घर वापसी, There Will Be No Love)

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