Wednesday, April 8, 2020
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कॉन्ग्रेस क्या तो बचाए… अपनी खोई हुई राजनीतिक जमीन, RaGa को या फिर इंदिरा गाँधी की नाक?

सवाल यह है कि इंदिरा की नाक यानी प्रियंका गाँधी तो सबको नजर आती हैं, लेकिन किसी को फ़िरोज गाँधी जैसा कोई क्यों नहीं याद आता है? क्या कॉन्ग्रेस अब राहुल गाँधी को भूल जाना चाहती है?

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आशीष नौटियाल
पहाड़ी By Birth, PUN-डित By choice

“वही दूरदर्शित, वही निष्ठा, वही इच्छाशक्ति…. इंदिरा इज़ बैक” यानी, इंदिरा वापस आ चुकी है। यह हम नहीं बल्कि आज के दैनिक भास्कर अखबार का पहला पन्ना कह रहा है। कहने वाले सज्जन मध्य प्रदेश कॉन्ग्रेस में पर्यावरण एवं लोकनिर्माण मंत्री सज्जन सिंह वर्मा हैं। सज्जन सिंह यह बातें किसी और के लिए नहीं बल्कि इंदिरा की ही पोती और उन्हीं की नाक के जैसे दिखने वाली प्रियंका गाँधी के लिए कह रहे हैं। वही प्रियंका गाँधी जो कुछ दिन पहले ट्विटर पर अकाउंट से आधी रात को दुर्गा सप्तशती के मन्त्र ‘ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुंडाय विच्चे’ को ट्वीट कर रहीं थीं।

प्रियंका गाँधी के जन्मदिन की सुबह दैनिक भास्कर अख़बार के पहले पन्ने पर ही इंदिरा गाँधी के साथ उनकी तुलना करते हुए कॉन्ग्रेस के नेता जी द्वारा लिखी गई प्रशंसा तो यही बता रही है कि ट्विटर पर आधी रात को किए गए उनके मन्त्र जाप का असर प्रियंका गाँधी पर जल्द ही होने वाला है। जन्मदिन तो आज स्वामी विवेकानंद का भी है लेकिन मंत्री जी की प्राथमिकताएँ तय हैं, उन्हें पहले इंदिरा गाँधी को इस वसुंधरा पर उतारना है, उसके बाद अन्य कामों पर नजर डाली जाएगी।

नवंबर में ही मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ का भी जन्मदिन था, लेकिन ख़ास बात यह रही कि पूरे गाँधी परिवार ने उन्हें बधाई सन्देश नहीं दिया था। हो सकता है सज्जन सिंह इसी आंतरिक कलह का फायदा उठाना चाह रहे हों।

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लेकिन सवाल यह है कि किसी के जन्मदिन पर शुभकामना संदेशों से किसी को क्यों आपत्ति हो सकती है? वो भी तब जब राहुल गाँधी के कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष पद पर दोबारा नियुक्त होने की खबरें बाजार में चल रही हों। यह तो निश्चित है कि अपनी जमीन तलाश रही कॉन्ग्रेस और उसके नेता अब जल्दी ही किसी दिन इस वंशवाद में डूबी हुई पार्टी के पतन पर फूट पड़ेंगे। लेकिन कॉन्ग्रेस और उसके क्रियाकलापों पर सवाल उठाने पर जब शशि थरूर जैसे नेता को माफ़ी माँगने पर विवश होना पड़ता है तो फिर किसी और की क्या मजाल? बाकी सज्जन तो इंदिरा गाँधी को प्रसन्न करने में व्यस्त हैं ही।

सवाल यह है कि इंदिरा की नाक यानी प्रियंका गाँधी तो सबको नजर आती हैं, लेकिन किसी को फ़िरोज गाँधी जैसा कोई क्यों नहीं याद आता है? क्या कॉन्ग्रेस अब राहुल गाँधी को भूल जाना चाहती है। कॉन्ग्रेस के भीतर समय-समय पर प्रियंका गाँधी को मुख्य कमान सौंपे जाने की बातें उठती रहती हैं, लेकिन तब कॉन्ग्रेस नेता यह कहकर पल्ला झाड़ लेते हैं कि यह माँग बस कॉन्ग्रेस के छुटभइया नेता ही करते हैं। हालाँकि मणि शंकर अय्यर जैसे नेता भी प्रियंका गाँधी को कॉन्ग्रेस के भीतर मुख्य भूमिका में देखने की अपनी इच्छा कब की जाहिर कर चुके हैं। लेकिन मणि शंकर अय्यर को गंभीरता से लेता ही कौन है?

लोकसभा चुनाव 2019 के समय भी देखा गया था कि प्रियंका गाँधी ने शुरू में तो नरेंद्र मोदी के खिलाफ खूब हल्ला बोला लेकिन चुनाव के दौरान ही धीरे-धीरे कॉन्ग्रेस अपनी असलियत जानते हुए प्रियंका गाँधी को पीछे धकेलती गई। स्पष्ट था कि खुद कॉन्ग्रेस नहीं चाहती थी कि परिवारवाद की सर्कस के आखिरी जोकर को भी वो एक पहले से ही हारी हुई बाजी में उतार दें।

2019 के लोकसभा चुनाव में ही कॉन्ग्रेस की PR टीम से लेकर कॉन्ग्रेस का मीडिया गिरोह तक प्रियंका गाँधी के लिए मैदान बनाने लगा, इंदिरा 2.0 जैसे जुमले गढ़े गए। लेकिन, आखिर में नतीजा यह हुआ इंदिरा गाँधी के अवतरण में बाधा उत्पन्न हो गई और राहुल गाँधी के सर पर हार का ठीकरा फोड़ दिया गया। और राहुल गाँधी हमेशा की तरह ही हर हार के बाद फिर अज्ञातवास पर निकल गए।

अफवाहों का बाजार फिर से तेज है। राहुल गाँधी के राजनीतिक भविष्य से लेकर कॉन्ग्रेस की आगे की रणनीति अब तय होगी। इसी बीच प्रियंका गाँधी के जन्मदिन पर कॉन्ग्रेस नेताओं के उत्साह से भी कुछ रुझान आने शुरू हो गए हैं। कॉन्ग्रेस की हैसियत इस समय देश में वोट कटुआ पार्टी से अधिक कुछ नहीं है। उदाहरण के लिए अगर दिल्ली चुनाव को ही ले लें, तो कॉन्ग्रेस को इस चुनाव में कोई तीसरा कैंडिडेट तक मानने को राजी नहीं है। होना यह है कि कॉन्ग्रेस आगामी चुनावों में नोटा जैसा विकल्पों से भी पीछे खिसकने वाली है। अब कॉन्ग्रेस के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि वो पहले क्या बचाए- अपनी खोई हुई राजनीति की जमीन या फिर इंदिरा गाँधी की नाक?

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आशीष नौटियाल
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