Tuesday, October 19, 2021
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बजट 2020: रवीश कुमार का विश्लेषण, प्राइम टाइम से पहले लगा हमारे हाथ… हें हें हें

इस बजट में व्हाट्सएप्प यूनिवर्सिटी (वामपंथी कैंपस, लिबरलगंज) के लिए लगातार छठे साल भी फंड में कमी की गई है। जबकि दक्षिणपंथी कैंपस को लगातार बजट में पैसा दिया जा रहा है। वो अब राष्ट्रीय मीम योजना के तहत लाभ ले रहे हैं। वो भी कागज दिखाकर!

बजट आ चुका है और स्टूडियो में चर्चा हो रही है। रात में प्राइम टाइम भी होगा जब बजट पर विश्लेषण होगा। हमारे पास रवीश कुमार के बजट की लीक हुई स्क्रिप्ट आ गई है जिसे हमने इस बार न्यूज़लौंडी के झबरा कुत्ते से सुँघवा कर सत्यापित किया है। पेश है स्क्रिप्ट के मूल अंश:

देखिए, बजट किस दिन आया है, दिन है शनिवार, जो कि एक छुट्टी का दिन माना जाता है। बात यह नहीं कि ये छुट्टी का दिन है, गौर करने वाली बात यह है कि यह दिन हनुमान जी का है, इसीलिए उनको और उनके भक्तों को खुश करने के लिए बजट को लाल रंग के थैले में पेश किया जाता है। लाल रंग से याद आया…

लाल देह लाली लसे, अरु धरि लाल लँगूर। बज्र देह दानव दलन, जय जय जय कपि सूर॥

अब आपने विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश भारत की वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण को बजट पेश करने के दौरान देखा होगा, जोकि आज पीली साड़ी में थीं। अब इस साड़ी का रंग पीला ही क्यों था? यह कोई सामान्य बात नहीं इसके पीछे भी भक्तों को खुश करने की मंशा नज़र आती है, क्योंकि पीला रंग विष्णु भगवान का प्रतीक है। असल में बात यह कि देश में सांप्रदायिकता का ज़हर घोलने की कोशिश की जा रही है।

अब बात करें बजट की तो करोड़ों रुपए का बजट पेश कर यह दिखाने की कोशिश की गई कि इस बजट के बाद देश की जनता एकदम से अमीर हो जाएगी, लेकिन हकीक़त यह है कि जितना फायदा और सपने बजट के पेश करने के दौरान दिखाए जाते हैं, उतना कुछ है नहीं, क्योंकि अगर हम कैलकुलेटर से नापें तो पता चलता है कि 78000 रुपए सालाना बचत, 216 रुपए प्रतिदिन, 9 रुपए प्रति घंटे और 15 पैसे प्रति मिनट का फायदा हो रहा है। ये बहुत कम है।

पूरा विश्लेषण यहाँ देखें

जहाँ सामान्य तौर पर बजट के दौरान सेंसेक्स ऊपर जाता है, इससे वैसे आम जनता का ज्यादा कोई मतलब नहीं, लेकिन अग़र सेंसेक्स 1 अंक भी नीचे जाता है तो आप समझिए कि ये ग़रीब की थाली से रोटी छीन रहा है। हालाँकि मुझे ये बजट ज्यादा समझ नहीं आता, लेकिन एक बात साफ़ है कि इस बजट से सीधे तौर पर अंबानी और अडानी बंधुओं को फायदा पहुँचाया गया है।

वहीं इस बजट में आने वाले वेलेंटाइन-डे को लेकर कुछ नहीं बोला गया, जिससे साफ है कि युवाओं की अनदेखी की गई है। वह भी ऐसे समय में कि जब देश का बेरोजगार युवा प्रेम जाल में फँसकर भटक रहा है या फ़िर बंदूक उठा रहा है। अब आप देखिए कि ये बजट ऐसे माहौल में लाया गया, जब पूरे देश में, और खास तौर पर शाहीन बाग में, सीएए और एनआरसी के खिलाफ जमकर विरोध हो रहा है, तो क्यों न मान लिया जाए कि ये कहीं न कहीं शाहीन बाग से मीडिया का ध्यान भटकाने के लिए लाया गया है? क्योंकि आज पूरे दिन मीडिया शाहीन बाग की कवरेज और जनता के जरूरी मुद्दों को छोड़कर सिर्फ बजट पर ही चर्चा करती रही और एक दिन में ही वह रामभक्त अचानक से गायब हो जाता है, जिसने देश में आतंक फैलाने की कोशिश की हो।

कहने के लिए बजट में 85,000 करोड़ एससी/एसटी, ओबीसी के लिए दिया जाता है, लेकिन क्या इससे ग़रीब की भूख मिट पाएगी? क्या हम गरीब को अमीर बना पाएँगे? शिक्षा के लिए एक लाख करोड़ दिए जाने की घोषणा की जाती है। 94 (हज़ार करोड़) से 99 (हज़ार करोड़) हो गए, लेकिन अभी तक 2020 तक नहीं पहुँच पाए। हर साल युवाओं को उच्च शिक्षा का झुनझुना दे दिया जाता है। बच्चे IIT के विरोध में हैं, यूनिवर्सिटी सीएए के विरोध-प्रदर्शनों में जल रहे हैं। ऐसे समय में उच्च शिक्षा के लिए लाखों-करोड़ों रुपए के बजट पास करने का कोई मतलब नहीं हैं, क्या फायदा ऐसे पैसे का। भले ही वित्तमंत्री के रूप में आप सफल हो सकते हैं, लेकिन सभ्य समाज के रूप में हम हार गए हैं।

अगर बात करें डिफेंस की तो हम करोड़ों-अरबों रुपए देश की जनता का खर्च कर राफेल ले रहे हैं। जब लड़ाई किसी से होती नहीं, तो देश में इतने मँहगे जहाजों और हथियारों के लाने का क्या फायदा? इससे अच्छा है कि कागज के जहाज ही बनाकर उसे सजा के रख दिया जाए। अब पीछे की ओर देखिए, पिछले सालों में कितने युद्ध हुए। कोई हुआ है तो ज़रा एक भी वाीडियो दिखाइए।

अब बात करते हैं बजट से जुड़े लोकप्रिय मुद्दों पर जिन पर चर्चा हुई ही नहीं! लोगों के बीच के मुद्दों से ध्यान हटाया गया, जबरदस्ती के टैक्स और पैसे की बातें हुईं। पहला मुद्दा जो ध्यान में आता है कि उच्च क्वालिटी वीड आदि पदार्थों के लिए बजट में कोई राहत नहीं दी गई है, जिसका सेवन वामपंथी युवाओं के साथ-साथ फ़िल्म स्टार भी करते हैं। इससे साफ़ है कि बजट में वामपंथी युवाओं की अनदेखी की गई है। वहीं दूसरी तरफ, घोड़े की सूखी लीद, जिसका सेवन अनुराग करते हैं, कुणाल करते हैं, यहाँ तक कि स्वयं मैं भी करता हूँ, उस पर बढ़े हुए आयात शुल्क पर कोई चर्चा नहीं हुई। दरअसल ये आम लीद नहीं, ये मंगोलियाई घोड़े की नस्ल है, जिसके पूर्वजों का मिलन चंगेज खान के घोड़े से हुआ करता था। इसलिए ये लीद उच्च गुणवत्ता वाली मानी जाती है।

इस बजट में वामपंथी ट्रोलों की सुरक्षा के लिए कुछ नहीं किया गया है। ये इतनी चिंता का विषय है कि कोई भी आज कल आकर पेल देता है। यहाँ तक कि मेरे सोशल मीडिया हैंडल पर कोई कुछ भी कहकर चला जाता है। खैर, इस बजट में व्हाट्सएप्प यूनिवर्सिटी (वामपंथी कैंपस, लिबरलगंज) के लिए लगातार छठे साल भी फंड में कमी की गई है। जबकि दक्षिणपंथी कैंपस को लगातार बजट में पैसा दिया जा रहा है। वो अब राष्ट्रीय मीम योजना के तहत लाभ ले रहे हैं। वो भी कागज दिखाकर!

अब बात करते हैं कागज की, तो ध्यान देने वाली बात यह कि पूरे साल सरकार और मीडिया ने कागज दिखाने पर चर्चा की, लेकिन सरकार ने कागज पर टैक्स कम नहीं किया। कागज को लेकर सरकार गंभीर होती तो जरूर इस पर टैक्स कम करती, लेकिन ऐसा लगता है कि ‘कागज नहीं दिखाएँगे’ वालों से अब सरकार डर गई है।

वहीं दूसरी तरफ, ‘दो रुपया दे दो ना कामरेड, बीयर पीना है’ (तगड़ी तलब याचनामिश्रित स्वर में पैसा माँगते हुए) इस योजना पर टैक्स छूट नहीं की गई है। इससे पता चलता है कि जेएनयू को नजरअंदाज किया गया है, जहाँ एक नहीं बल्कि सैकड़ों छात्र-छात्राएँ इस योजना का लाभ उठा रहे हैं।

गमछों पर लगातार बढ़ते दामों और तेज़ी से बढ़ता सड़क निर्माण, तो कहीं रेल मार्ग बनाने की घोषणा की जा रही है। मतलब साफ है कि पत्थर कहीं भी देखने को नहीं मिलना चाहिए। इन घोषणाओं के बाद सवाल यह खड़ा होता है कि जब आते-जाते रास्तों में पत्थर ही नहीं होगा, तो एक ‘मास्क मैन’ अपने गुस्से का इजहार कैसे कर पाएगा। यह अभिव्यक्ति की आज़ादी को छीनने जैसा है।

दो फिल्मों से गंजेपन की समस्या पर ध्यानाकर्षण के बावजूद, इस बजट में बालों पर सरकार ने कुछ नहीं बोला है। ट्रांसप्लांट पर वित्तमंत्री ने चुप्पी साधी है। वह भी ऐसे समय में कि अब एक आदमी झबरा है तो दूसरा टकला। वहीं पंचर के पुराने ट्यूब पर भी कोई राहत नहीं दी गई है, जिसके पैसों से सॉल्ट न्यूज़ चुटकुलों की फैक्टचेकिंग करता है।

बजट पर हमने आम लोगों की भी राय ली। हमने फरजील इमाम से बजट पर बात करने की कोशिश की, उन्होंने बताया, “हमें क्या, हमारा तो PFI से फण्ड आता है।” हमने एकतरफा से भी बात की, उन्होंने कहा, “फोटोशॉप पर बजट में चर्चा के अभाव से वो दुखी हैं।” फिर हमने कुछ मीडिया वालों से भी बात की, जिसमें द स्क्विंट, द लायर, सॉल्ट न्यूज़, न्यूज़लौंडी प्रमुख रूप से शामिल हैं। अब इन्होंने एक लाइन में ऐसी बात कही, “हमें क्या साहब हमें तो वेटिकन से फंड मिल ही रहा है।”

फिर हमने जन्नत में पहुँचे आतंकियों से बात करने की कोशिश की, जिसमें जाकिर मूसा, बुरहान बानी आदि नाम शामिल थे, जिन्होंने कहा, “हमें क्या, हम तो आतंकवादी हैं। हम तो 72 हूरों के साथ जन्नत की सैर कर रहे हैं।” भले ही उन्होंने अपने आप को आतंकवादी कहा, लेकिन आज भी कई चैनल उनको आतंकवादी नहीं मानते।

इस मुद्दे पर अनंत सिह से हमारे रिपोर्टर क्रोधित मिश्रा ने बात की और उनके मुँह में माइक डालकर जवाब लेने की कोशिश की, जिससे आजिज आकर अनंत सिंह ने कहा, “&*^% का बजट है!”

अंत में बात यही कि मैं इस बजट को सांप्रदायिक मानता हूँ। यकीन मानिए आज इस बजट के दौरान गाँधी जी होते तो इसे पास नहीं होने देते। अब क्या बजट तो हर साल आता है-जाता है, लेकिन देश में अल्पसंख्यक के मुद्दे पर सभी चुप्पी साध लेते हैं। अंत में सवाल यही कि क्या इस बजट के पैसे से गरीब का पेट भर जाता है? कोई जवाब है… नहीं। हें.हें.हें…नमस्कार!

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अजीत भारती
पूर्व सम्पादक (फ़रवरी 2021 तक), ऑपइंडिया हिन्दी

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