Monday, October 26, 2020
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व्यंग्य: आँखों पर लटके फासीवाद के दो अखरोट जो बॉलीवुड कभी टटोल लेता है, कभी देख तक नहीं पाता

जो इंडस्ट्री स्त्रियों के शोषण, उन्हें हाशिये पर रखने वाले चरित्र, उनके वक्षस्थल और कूल्हों के क्लोजअप दिखाने के लिए कुख्यात हो, वहाँ 'थाली में छेद' करने वाले तो असल में जया बच्चन टाइप के ही लोग हैं।

‘अरे आइए… आइए दीपिका जी, ये रहा आपका सामान!’
‘ये नहीं वो…’
‘आप तो हमेशा वो महँगा वाला पीआर पैकेज…’
‘लेती थी, पर वही कवरेज सिर्फ ‘रिपीट आफ्टर मी’ लिख कर भी मिले, तो कोई ये क्यों ले, वो न ले!’
‘मान गए!’
‘किसे?’
‘आपकी पारखी नजर और बॉलीवुड सुपर स्टार्स, दोनों को’
‘हीं हीं हीं… डिम्पल ही डिम्पल, रीयल ही रीयल…’

ऐसा वाला एक विज्ञापन बचपन में दूरदर्शन पर आता था। तब दीपिका जी महँगी वाली टिकिया लिया करती थीं, आजकल वही महँगी वाली टिकिया बॉलीवुड के कई लोग दूसरे चक्रवर्ती सम्राटों से लेने लगे हैं। पहले चक्रवर्तियों का बड़ा बोलबाला था। कपूर लोगों की आरती उतारी जाती थी, खान लोग दान दे कर खानदान से ताल्लुक़ बना लिया करते थे।

अब कपूरों की आरती नहीं उतारी जा रही, अब उन्हें ही प्लेट में रख कर भक्क से आग लगा दी जाती है और बाकी लोग ताप लेते हैं। पहले ये लोग चेहरे की मलिनता को मेकअप पोत कर, कर्पूरगौरम् बन कर छिपा लेते थे, पर्यावरण पर ट्वीट करते हुए, किसी गरीब की फोटो शेयर कर के करुणावतारम् हो जाते थे। इन्हें लगता था कि संसारसारम् यही हैं और भुजगेन्द्र हारम् तो ‘पीके’ में ट्वायलेट वाले सीन के लिए होते हैं। पहले ये लोग सोचते थे कि यही लोग सदा बसन्तम् हृदयारबिन्दे हैं क्योंकि फिल्म तो लगेगी ही, जनता देखेगी ही चाहे ये लोग वैसे कॉमेडियन्स को रीट्वीट करें, उनका बचाव करें जो हमारे ‘भबम् भवानी’ को नमामि की जगह उपहास का पात्र बनाया करते थे।

दो-चार ट्वीट ‘आरे जंगल बचाओ’ पर, या फिर कुकुरदँत्ता वाले शेरों के सम्मान में ‘बेस्ट दँतैला एवर’ लिख कर उनकी चरणपादुका अपने कपोलों पर लगवाने को उत्सुक रहते थे। बदले में शेरों के कुत्ते इनके घरों के आगे भौंकना बंद कर देते थे। ये सब प्रागैतिहासिक बार्टर सिस्टम चलता रहा। ‘पार्टी यूँ ही चालेगी’ होती रही, और पार्टियों में महाकवि मीर तक़ी मीर द्वारा वर्णित ‘मीर उन नीमबाज़ आँखों में, सारी मस्ती शराब की-सी है’ वाले कारनामे होते रहे। ‘नीमबाज़ आँखों’ का मतलब है अधखुली, उर्दू आती हैं हमको भाई! हें हें हें!

कालांतर में पता चला कि प्रागैतिहासिक बार्टर सिस्टम के साथ-साथ ‘पार्टनर स्वापिंग’ जैसे अत्याधुनिक तकनीक वाले सखा-सहेलियों के बार्टर सिस्टम भी इन पार्टियों में हुआ करते थे। ‘पार्टनर स्वापिंग’ के लिए मेरे पास तत्सम शब्द नहीं हैं क्योंकि न तो ऐसे कांड संस्कृत में हैं, न संस्कृति में। ये बात और है कि शृंगारशतकम् में कवि भर्तृहरि लिख गए हैं:

स्मितं किञ्चिद् वक्त्रे सरलतरलो दृष्टिविभवः
परिस्पन्दो वाचामभिनवविलासोक्तिसरसः ॥
गतानामारम्भः किसलयितलीलापरिकरः
स्पृशन्त्यास्तारुण्यं किमिह न हि रम्यं मृगदृशः?

वैसे तो मैं इसकी सप्रसंग व्याख्या कर के पाँच नंबर पा सकता हूँ, लेकिन राष्ट्रवादी सिंगल आदमी नंबर ले कर करेगा क्या। खैर, कवि कहते हैं कि उठती जवानी की मृगनयनी सुंदरियों के कौन से काम मनोमुग्धकर नहीं होते ? उनका मन्द-मन्द मुस्काना, स्वाभाविक चञ्चल कटाक्ष, नवीन भोग-विलास की उक्ति से रसीली बातें करना और नखरे के साथ मन्द-मन्द चलना – ये सभी हाव-भाव कामियों के मन को शीघ्र वश में कर लेते हैं। और जो कवि भर्तृहरि जी ने नहीं कहा वो यह है कि ऐसे कामियों की उपस्थिति बॉलीवुड की पार्टियों में अवश्यम्भावी है।

चक्रवर्तियों के फँसते ही बॉलीवुड के खल और कामियों की, मुंबइया भाषा में कहें तो वाट लग गई है। वाट लगते ही वो बाप-बाप करते ट्वीट कर रहे हैं कि मीडिया ट्रायल हो रहा है, और वो जहाँ तहाँ मच्छरों को मारने वाले बैटरी वाले ‘चुटपुटिया’ टेनिस रैकेट से पेट्रियार्की को स्मैश करते फिर रहे हैं। पेट्रियार्की को स्मैश करने वालों में वो सबसे ज्यादा हैं जिनका सबसे अच्छा काम किसी बड़े हीरो की बेटी या बेटा बन जाना हुआ है।

बॉलीवुड में ये सब चलता रहता है भैया। वैसे भी, आपको और हमको थोड़े पता है कि ‘बाप’ कौन हैं और कितने हैं! आइडियोलॉकल हैं, बायलोजिकल हैं, पोलिटिकल हैं… तो कहीं न कहीं तो पेट्रियार्की हो रही होगी स्मैश। ये तो ‘बिलो दी बेल्ट’ हो गया अजीत जी… ऐसा है भाई कि हम ‘अभव दी बेल्ट’ भी मारेंगे तो थुथुन चूर के ओधबाध कर देंगे, और दर्द उतना ही होगा। बिलो दी बेल्ट खा लो, और हाथ से पकड़ के नीचे बैठ जाओ। नाना पाटेकर जी ने भी कहा है कि ‘सह लेंगे थोड़ा’।

आजकल बड़ी समस्या हो गई है। कोई सीधे-सीधे एक स्त्री को हरामखोर भी कह देता है तो इन नयनाभिराम मृगनयनियों के नयनों पर ‘मेको क्या’ वाला डार्क फिल्टर चढ़ जाता है। तब किसी कश्यप ऋषि का नाम ढोने वाले एथीइस्ट को यह याद नहीं आता कि नेताओं को किस तरह की भाषा का प्रयोग करना चाहिए। लेकिन हो सकता है ‘अतियथार्थवादी’ फिल्मों के निर्देशक को पूरी दुनिया वैसी ही दिखती हो जहाँ किसी लड़की को हरामखोर कहना तो आम बात है। क्या पता अगली फिल्म में डायलॉग में डाल दें।

इनके वैचारिक पिता ने सड़कों पर चलते-फिरते नाइयों की दुकानें खुलवा रखी हैं, साथ में ‘फेस मसाज’ भी देते हैं। इस पर भी बेचारे फासीवाद नहीं देख पाते। चौबीस घंटे का नोटिस दे कर किसी के ऑफिस पर बुलडोज़र चलवा देने में भी बेचारे फासीवाद नहीं देख पाते। नेवी के अफसर को सड़कछाप गुंडों द्वारा पीटे जाने पर भी फासीवाद नहीं दिखता। लेकिन बाकी समय इन्हें फासीवाद इतना स्पष्ट दिखता है जैसे इनकी दोनों आँखों पर दो अखरोट टँगे हों और वो उसके हर गड्ढे को छू कर महसूस कर पा रहे हों, और कहते हों कि ‘आ हा हा! ऐसे अखरोट तो जीवन में कभी नहीं टटोले!’

न तो ‘बोल की लब आजाद हैं तेरे’ गाया जा रहा है, न ही ‘सब तख्त हटाए जाएँगे’ वाला पोस्टर दिख रहा है, न ही पहले से तैयार ‘रियल हीरो, रील हीरो’ वाले डिजिटल पोस्टर आ रहे हैं कि दीपिका जी, महँगी वाली टिकिया घिस के, काले कपड़ों में जेएनयू परिसर में सर उठा कर खड़ी हो जाएँ और पेट्रियार्की को वैसे ही स्मैश कर दें जैसे डेमिगॉड लोकी को हल्क ने किया था।

‘उड़ता पंजाब’ बना कर ड्रग्स की समस्या को ‘रीयल’ बताने वाले लोग, ‘उड़ता बॉलीवुड’ के वास्तविक ट्रेलर को सेंसर करना चाह रहे हैं। अपने इंडस्ट्री की सहकर्मी, अपनी ही पार्टी की पूर्व नेत्री के अंडरवेयर का रंग बताने वाले आज़म खान पर चुप रहने वाली, अपने ही पार्टी अध्यक्ष के ‘बच्चों से गलतियाँ हो जाती है’ वाले बयान पर संज्ञान न लेने वाली जया बच्चन संसद में ‘थाली में छेद’ की बात करती दिखती हैं।

जो इंडस्ट्री स्त्रियों के शोषण, उन्हें हाशिये पर रखने वाले चरित्र, उनके वक्षस्थल और कूल्हों के क्लोजअप दिखाने के लिए कुख्यात हो, वहाँ ‘थाली में छेद’ करने वाले तो असल में जया बच्चन टाइप के ही लोग हैं। कितनी बार मुखर हो कर इन्होंने या, इन जैसों ने, इसी संसद में नवोदित कलाकारों के यौन शोषण या उन्हें मेहनताना न मिलने पर बोला है?

हो सकता है बोला होगा, चोरी-चोरी, चुपके-चुपके बोला होगा। ये लोग रीढ़ की बातें करते हैं और इनके प्रतिनिधि एक खास भवन में जा कर सेटलमेंट करते हैं कि ‘मालिक, हमारी फिल्म पर्दे पर लगने दे दो’। जिनकी सुबह व्हाट्सएप्प ग्रुप में आने वाले मैसेज को बिना समझे ट्वीट करने से शुरु होती हो, और शाम ‘फासीवाद’ के अखरोट सहलाने से, उन्हें कपड़े बदलते वक्त अपने शीशमहल की लाइट ऑफ कर देनी चाहिए।

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एनडीटीवी हो या 'द वायर', इन्हें कभी पैसों की कमी नहीं होती। देश-विदेश से क्रांति के नाम पर ख़ूब फ़ंडिग मिलती है इन्हें। इनसे लड़ने के लिए हमारे हाथ मज़बूत करें। जितना बन सके, सहयोग करें

अजीत भारतीhttp://www.ajeetbharti.com
सम्पादक (ऑपइंडिया) | लेखक (बकर पुराण, घर वापसी, There Will Be No Love)

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