Thursday, October 29, 2020
Home बड़ी ख़बर उत्तेजित मीडिया मोशाय, शांत हो जाइए; प्रियंका कभी अपने ही गढ़ में फेल हो...

उत्तेजित मीडिया मोशाय, शांत हो जाइए; प्रियंका कभी अपने ही गढ़ में फेल हो चुकी हैं

रॉबर्ट वाड्रा और प्रियंका गाँधी के बीच अंतर यह है कि एक पूछताछ से बचने के लिए अदालत के सामने अपनी बेटी की सर्जरी का बहाना बनाता है, तो दूसरे का उसके ठीक दो दिन बाद ही राजनीति में धमाकेदार एंट्री होती है।

प्रियंका गाँधी की राजनीति में एंट्री हो गई है और मीडिया के एक वर्ग की प्रसन्नता का ठिकाना नहीं है। जैसे किसी चिड़िया के दाना लेकर घौंसले में लौटने पर उसके बच्चे आह्वादित होकर नाच उठते हैं, ठीक वैसे ही मीडिया का एक बड़ा समूह चोंच उठाए दाने की प्रतीक्षा में झूम उठा है। उनके आनंदित, उत्तेजित एवं उल्लासित मन और तन-बदन की स्थिति यह हो गई है कि उन्हें न भूत दिख रहा है और न भविष्य। तैमूर अली खान की चड्डी के रंग तक को ‘बड़ी ख़बर’ और ‘डेली डोज़ ऑफ़ क्यूटनेस‘ बता कर लोगों को समक्ष परोसने वाला मीडिया का यह वर्ग उत्साह की उस चरम सीमा पर जा पहुँचा है जहाँ प्रियंका ही प्रियंका हैं… चोपड़ा नहीं, गाँधी। क्षमा कीजिए, गाँधी नहीं, वाड्रा।

रॉबर्ट वाड्रा और प्रियंका गाँधी के बीच अंतर यह है कि एक पूछताछ से बचने के लिए अदालत के सामने अपनी बेटी की सर्जरी का बहाना बनाता है, तो दूसरे का उसके ठीक दो दिन बाद ही राजनीति में धमाकेदार एंट्री होती है। मीडिया के उस वर्ग की ज्ञानेन्द्रियों को सचेतन अवस्था में लाने के लिए उन्हें इतिहास रूपी ऐसे दर्पण के समक्ष ला खड़ा करना होगा, जहाँ उन्हें इस बात की अनुभूति हो कि उनके ‘झूम बराबर झूम’ का अंत ‘खोदा पहाड़ निकली चुहिया‘ पर होने वाला है।

बात शुरू करते हैं 2012 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से। गाँधी परिवार के पुरातन गढ़ अमेठी और रायबरेली के भीतर 10 विधानसभा सीटों के लिए कॉन्ग्रेस पार्टी चतुष्कोणीय चुनावी संग्राम में पूरी शक्ति के साथ उत्तरी थी। केंद्र में पिछले 8 वर्षों से शासन कर रही कॉन्ग्रेस के लिए दोनों संसदीय क्षेत्रों में प्रियंका गाँधी ने स्वयं चुनावी प्रचार अभियान की कमान संभाली हुई थी। मीडिया का कहना है (और कॉन्ग्रेस नेताओं का भी) कि जनता प्रियंका में इंदिरा को देखती है। 2012 में प्रियंका गाँधी अपेक्षाकृत नई थी। उस से पहले वाले विधानसभा चुनाव में उन्होंने अपनी पहली रैली की थी। सक्रियता के मामले में 2012 में उनका कोई सानी न था।

मीडिया के एक वर्ग की नई राजमाता ने 1 महीने भी अधिक अवधि तक अमेठी-रायबरेली में जम कर प्रचार-प्रसार किया। 2007 के विधानसभा चुनाव में कॉन्ग्रेस यहाँ 7 सीटों पर जीत का परचम लहरा चुकी थी। ऐसे में, पार्टी के वफ़ादारों को अनुमान ही नहीं बल्कि विश्वास भी था कि पार्टी का झंडा और बुलंद होगा, और कॉन्ग्रेस यहाँ क्लीन स्वीप करेगी। कॉन्ग्रेस की स्टार प्रचारक ने अमेठी-रायबरेली का कोना-कोना छान मारा। वह जनता से मिलतीं, बूथ स्तर के कार्यकर्ताओं के साथ बैठकें करतीं। एक बार तो उन्होंने लगातार पाँच दिनों तक अमेठी में डेरा डाला।

चुनाव परिणाम ऐसे आए जिसे सुनकर मीडिया का एक वर्ग अचेत हो जाएगा। कॉन्ग्रेस पार्टी के सीटों की संख्या (अमेठी-रायबरेली में) 7 से घट कर 2 पर आ गई। प्रियंका गाँधी का योगदान रहा- माइनस 5। एक महीने के अंतराल में 150 सार्वजनिक बैठकें कर चुकी प्रियंका की कथित करिश्मा का परिणाम जिस रूप में मिला- उसे याद दिला कर मीडिया के ‘झूम बराबर झूम‘ गैंग को चूहे के बिल में छुपने को बाध्य किया जा सकता है।

ये रहा इतिहास। अब आते हैं वर्तमान पर। बीबीसी के अनुसार“रायबरेली और अमेठी में ज़्यादातर लोगों को हर तरह की सरकारी योजना का लाभ मिलता है क्योंकि प्रियंका ये ध्यान रखती हैं कि एक-एक व्यक्ति तक योजना की जानकारी पहुँचे और अगर वो उन योजनाओं के योग्य हैं, तो उसका लाभ मिले।”

अमेठी और रायबरेली के ग़रीब किसानों, झुग्गी-झोपड़ियों, और रुके हुए विकास कार्यों के समाचार हमारे पास पहुँचते रहे हैं। ऐसे में बीबीसी के दावे के अनुसार अगर वहाँ की जनता को प्रियंका सारी की सारी सरकारी योजनओं के लाभ दिलाती है- तो फिर आज तक वहाँ इतनी ग़रीबी क्यों है, शिक्षा की उचित व्यवस्था क्यों नहीं थी, और सारे विकास कार्य क्यों ठप्प थे? एक अंतर्राष्ट्रीय मीडिया पोर्टल का कहना है कि अमेठी के ‘एक-एक’ व्यक्ति तक सरकारी योजनाएँ पहुँची है- यह इतना हास्यास्पद है कि इस पर किसी प्रकार की चर्चा करना भी समय बर्बाद करने के सामान होगा।

रेडिफ्फ (Rediff) की वेबसाइट के अनुसार प्रियंका गाँधी के बारे में एक ‘महत्वपूर्ण’ बात यह है कि वो ‘हमारी-आपकी‘ तरह हैं और ‘सामान्य जीवन’ पसंद करती हैं। ये एक चौंकाने वाला ख़ुलासा है। वह ‘सामान्य जीवन’ जीती नहीं हैं, बल्कि ‘पसंद’ करती हैं। वैसे ख़बरों के अनुसार, अम्बानी और बिरला भी ‘सामान्य जीवन’ पसंद करते हैं (जीते नहीं हैं, पसंद करते हैं)। अर्थात, वो भी ‘हमारी-आपकी‘ तरह ही हैं।

द प्रिंट ने तो कमाल ही कर दिया। उसने प्रियंका गाँधी की प्रशंसा के लिए ऐसे शब्दों का चयन किया, जैसे वो नेता न हो कर कोई क्रिकेटर या अभिनेत्री हों। प्रियंका ‘स्मार्टर’ हैं, ‘क्लासिअर’ हैं। वेबसाइट के अनुसार प्रियंका को स्वयं को एक ‘पीड़ित’ के रूप में पेश करने का अधिकार है, क्योंकि उनके पति और सास- ED के रडार पर हैं। ऐसे में हर अपराधी के परिवार राजनीति में होना चाहिए ताकि वो ख़ुद को ‘पीड़ित’ दिखा सकें और इसे ‘वेंडेटा (बदले की भावना)’ का नाम देकर वोट बटोर सकें। शेखर गुप्ता यहाँ पिघल कर पानी हो चुके हैं।

इंडिया टुडे की एक पत्रकार तो प्रियंका गाँधी की राजनैतिक एंट्री से इतनी उत्साहित हो गई कि उन्होंने कॉन्ग्रेस कार्यकर्ताओं को कैमरा के सामने चिल्लाने के लिए ‘प्रियंका गाँधी ज़िंदाबाद‘ जैसे नारे भी दिए और कब, कैसे, क्या बोलना है- इसका निर्देश भी दिया। कुछ ऐसे फ़िल्म निर्देशक जिनकी फ़िल्में फ्लॉप हो रही हैं, और जिनका धंधा चौपट है- इंडिया टुडे के ‘नए जमाने के पत्रकार’ को देख कर उन्होंने भी इसी क्षेत्र में क़दम रखने का मन बना लिया है।

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अनुपम कुमार सिंहhttp://anupamkrsin.wordpress.com
चम्पारण से. हमेशा राइट. भारतीय इतिहास, राजनीति और संस्कृति की समझ. बीआईटी मेसरा से कंप्यूटर साइंस में स्नातक.

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