जय पद्म श्री दोस्तों,
आपने वीर दास की वो कविता तो सुनी होगी जहाँ वो छाती पीटकर अपने दो तरह के हिंदुस्तान से आने का विलाप सुना रहा था। लेकिन शनिवार (6 जून 2026) को ऐसी ही दो तरह की दिल्ली मैंने एक दिन में देख डाली। अब वैसे तो किसी पर शनि चढ़ जाए तो उसकी लंका लगनी तय समझी जाती है इसीलिए मुझे शनिवार को देखना था कि लंका आज किसकी लगती है, सरकार की या कोकरोचों की।
एक तरफ़ 6 जून को विपक्ष एंजेल प्रिया नाम की दूसरी आईडी से देश के पॉलिटिकल इकोसिस्टम में लॉग इन करना चाहता था और वहीं दूसरी तरफ़ सरकार थी जो ख़ुद को GENZ का बेस्ट फ्रेंड बताने के लिए मोदी सरकार मैदान में Youth For Viksit Bharat नाम के टेंट गाड़कर उतर चुकी थी।
अब आधी दुनिया तो जान ही चुकी थी कि आम आदमी पार्टी के अंडे से निकले कॉकरोच क्या कांड करने वाले थे, लेकिन सरकार ये दिखाना चाहती थी, की Gen Z के तकिए के नीचे आज भी मोदी जी की तस्वीर रहती है।
अब भाई 23-24 मिलियन पेज वाला ट्रेंड, जो किसी बुखार की तरह सोशल मीडिया पर चढ़ा हुआ था। एक ऐसा बवासीर जिस पर राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देकर उससे एक्स पर उसकी बकैती करने का हक भी सरकार ने निपटा डाला। सारा देश देखना चाहता था कि ट्विटर के ट्रेंड और इंस्टाग्राम के रील्स से निकलकर जब ये कॉकरोच सड़क पर उतरेंगे तो क्या हाल होगा, क्या कोई दंगा होगा, क्या नेपाल या बांग्लादेश जैसी बड़ी सी पिक्चर का कोई टीजर दिल्ली की सड़कों पर दिखेगा, लेकिन ऐसा कुछ हुआ नहीं, छी ससुर !
500 पुलिस वाले, 1000 मेला देखने के मूड से सड़क पर निकले, 400 कंटेन्ट क्रिएटर, 200 मीडिया और यूट्यूबर्स और 300 नेटफलिक्स के सतरंगी कैरेक्टर्स के अलावा यहाँ कुछ नहीं था। लेकिन वहीं दूसरी तरफ जंतर मंतर के पेड तंतर से दूर सोनिया गाँधी के शब्दों में लिखूँ तो ‘लोकतंतर’ की असली आवाज 7 हजार की भीड़ त्यागराज स्टेडियम में बैठी थी।
भाईसाहब जब मैं वहाँ पहुँची तो कदम रखने की जगह नहीं, पता चला कि वहाँ मोदी सरकार ने उन सभी युवाओं को बुलाया हुआ है, जिनकी पटरी देशभक्तों के साथ मैच खाती है। अब वहाँ मौजूद भजन गायकों की टेलर स्विफ्ट मैथिली ठाकुर के भाषण को सुनकर लग रहा था कि ऐसी ही प्रैक्टिस जारी रही तो भाजपा को अगली सुषमा या स्मृति ईरानी तो मिलना तय है।
साबरमती रिपोर्ट और ‘मोदी है तो मुमकिन है’ गाने के बाद विक्रांत मैसी जितना ज्यादा वामपंथी बिरादरी के निशाने पर आए, ऐसे में उनसे डरने की बजाए डबल अटैक मोड में अब वो पहले से ज्यादा सरकार के साथ उनके कार्यक्रम से लेकर उनकी आवाज बनकर दिखाई देते हैं। ये वाकई आज से पहले मैंने तो कभी नहीं देखा था कि मेन स्ट्रीम बॉलीवुड इस तरीके से सरकार के साथ खड़ा रहता है। 2014 से पहले Startup शब्द न सुनने वाले देश ने पिछले 12 सालों में 2 लाख से ज्यादा Startups देख डाले तो ऐसी कहानियाँ बोट म्यूजिक वाले अमन गुप्ता काहे नहीं आकर कहेंगे।
भाई, उधर जाकर लगा कि इस देश में हर मोर्चे पर वैभव सूर्यवंशी जैसा एक टैलेंट, दमदार काम कर रहा है और सरकार ना सिर्फ़ उनको पहचान दे रही है बल्कि सम्मान भी दे रही है। अब जिस देश को कारगिल युद्ध के टाइम हमारी सेना की लोकेशन बताने वाली पत्रकार बरखा दत्त को पकड़ कर पद्म श्री चिपकाया गया था, उस देश में असली काम करने वाले युवाओं का सम्मान होते देखना अभी न्यू नॉर्मल के ट्रैक पर जा रहा है।
लेकिन कमाल ये नहीं था, कमाल तो तब शुरू हुआ जब भीड़ में शामिल होकर कॉलेज के लड़के-लड़कियों के बीच मैं बैठी रही। मन टटोलने की कोशिश की तो यकीन मानिए मैं भी बाहर निकलते हुए कंविन्स हो चुकी थी कि फ़ॉरेन फंडिंग का पैसा उठाकर ये झोला छाप वामपंथी अपने लिए चरस गांजे के अलावा किसी सही जगह इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं।
बॉस, जब एक कॉलेज जाने वाली लड़की, जो 2029 में अपना पहला वोट देने वाली है और इजरायल-ईरान से लेकर रूस के तेल तक उसका ज्ञान किसी भी एवरेज JNU के बुढ़ऊ से डबल मिलेगा तो राहुल गाँधी कितनी भी यात्रा कर लें, जमीन पर नतीजे एकदम नहीं बदल सकते हैं।
अब आप ही बताओ जिस जगह की माँग शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की होनी थी, वहाँ पर उमर ख़ालिद की क़व्वाली गाने वालों की भीड़ थी। जहाँ बात स्टूडेंट्स के भविष्य की होनी थी, वहाँ भाड़े का झुंड हजारों साल पहले के मनुवाद पर विलाप कर रहा था। जहाँ पर हल्ला देश की दिक्कत को लेकर होना था, वहाँ वही पुराना आजादी वाला नारा गूँज रहा था। लेकिन वहीं त्यागराज में देश का आज बनाने वाले, देश का भविष्य सँवारने वाले युवाओं का सम्मान हो रहा था। वहाँ कोई भारत के टुकड़े-टुकड़े का नारा नहीं चल रहा था।हाँ, मैंने वहाँ ‘भारत माता की जय’ की गूँज ही सुनी थी।
मुझे भीतर गए मुश्किल से 30 मिनट ही हुए थे और मंच से एंकर आवाज लगाने लगी ‘GenZ कहाँ हैं’ और पूरा हॉल गूँज रहा था कि ‘GenZ यहाँ है।’ हाँ, हो सकता है कि ये एक साइलेंट स्टेटमेंट हो सरकार का कि अगर सामने वाला मोर्चा जंतर मंतर के जरिए सोशल मीडिया की थाली में नेगटिव का भरता, प्रोपागैंडा का पराठा और दंगों की दाल परोसने की कोशिश कर रहा था, तो हम भी दिखा देंगे कि देश की युवा शक्ति आज भी मेलोडी खिलाने वाले प्रधानमंत्री के साथ है।
आप ऐसे लीडर से नरेटिव की लड़ाई जीत ही नहीं सकते हैं जो 75 की उम्र में भी 25 के बालक की तरह सोचता हो। प्रधानमंत्री की पढ़ाई भले ही छूटे कई दशक बीत गए हों लेकिन होमवर्क करने की आदत आज भी कायम है। तभी मुझे ऐसा एक बार भी नहीं लगा कि खुद को GenZ बताने वाला एक मास समूह कभी भी उनसे कट्टी करने का मूड रखेगा।
भूतनाथ रिटर्न में एक डायलॉग आता है कि डेमोक्रेसी में कभी भी सही,गलत का चुनाव नहीं होता है, बल्कि कम गलत और ज्यादा गलत का चुनाव होता है। जाहिर सी बात है कि 140 करोड़ कि आबादी में शत प्रतिशत सहमति और संतुष्टि तो किसी सूरत में मिलने से रही। जिस देश में 98 % लाने वाले शर्मा जी के लड़के को भी ये सुनना पड़ता हो कि थोड़ी और मेहनत करते तो 99 आ सकते थे, ऐसी नस्लों के समाज में किसी न किसी चूक पर आक्रोश निकलना तो स्वाभाविक है।
पेपर लीक, सुस्त सिस्टम से युवा नाराज है लेकिन वही युवा ये भी जानता है कि इसका इलाज भी इसी सरकार में संभव है वरना सामने जो निकोबार में समंदर में गधा बनकर मछली के साथ डुबकी मार रहा था, वो हर दूसरे महीने आपको tension में छोड़कर खुद vacation में जाएगा।
तो हाँ, भाई लोग!
दिल्ली के GenZ ने तो आज बता दिया कि तराजू के एक तरफ मोदी और दूसरी तरफ कोई भी आकर बैठ जाए, वजन हमेशा मोदी जी कि साइड ही रहने वाला है। ऐसे में मेरी आज 2 तरह कि दिल्ली देखने की कहानी यही पूरी हुई।
दिल्ली पुलिस की लाठियाँ मायूस रह गईं, जवान भी हताश होकर घर चले गए। वो वापसी की राह में मन ही मन कहते होंगे कि
आज के लिए फिलहाल इतना ही
आपकी तरह मैं भी मायूस हूँ लेकिन
उम्मीद पर दुनिया कायम है
दिल दुखा है लेकिन टूटा तो नहीं है
और उम्मीद का दामन छूटा तो नहीं है


