राम मंदिर: हक हिन्दुओं का होना चाहिए, ‘सेक्युलरासुर’ सरकार का नहीं

हिन्दू-मुस्लिम के आधार पर हिंदुओं की पुण्यभूमि और पितृभूमि का बँटवारा करवाने वाले इक़बाल के शब्दों को रट कर भले ही कोई आज राम को कितना भी 'इमाम-ए-हिन्द' बता ले, लेकिन इससे ज़मीनी सच्चाई नहीं बदलेगी, मज़हबी सच्चाई नहीं बदलेगी।

राम मंदिर मामले पर अब फैसले में अधिक देर नहीं है। हिन्दू पक्ष मामले में अपनी जीत तय मानकर चल रहा है- केवल इसलिए नहीं क्योंकि “मंदिर वहीं बनाएँगे” के नारे पर ही हिन्दू समाज हजार साल की तंद्रा और कुंठा को अपने माथे से नोंच फेंक कर एकजुट हो गया था, बल्कि इसलिए भी कि हमने सुप्रीम कोर्ट में पूरी तरह न्यायोचित तरीके से अपनी न्यायपरक बात रखी है। हिन्दुओं ने “वराह मूर्ति तो खिलौने हैं”, “(कट्टर और क्रूर मुसलमान शासकों का राज होते हुए भी) हिन्दू मजदूरों ने संस्कृत के श्लोक लिख दिए होंगे बाबरी मस्जिद पर”, “(इतिहास के सबसे आततायी सुल्तानों में गिना जाने वाला) औरंगज़ेब तो उदारवादी शासक था”, “पुरातत्व तो कोई विज्ञान है ही नहीं (क्योंकि इसके नतीजे हमारे विरुद्ध जा रहे हैं)” जैसे तर्क नहीं रखे, हिन्दू पक्ष ने अदालत में साक्ष्य के तौर पर प्रस्तुत दस्तावेज़ फाड़, या “मामला टाल दीजिए वरना फलानी पार्टी चुनाव जीत जाएगी” जैसी बातें कर मामले को अटकाने की कोशिश नहीं की है।

अतः यह मानते हुए कि इस देश की न्यायपालिका में अभी भी कानून, न्याय और सिद्धांत के आधार पर फ़ैसले होते हैं, हिन्दुओं के पक्ष में फैसले की उम्मीद जताई जा सकती है। ऐसे में यह एक महत्वपूर्ण प्रश्न बन जाता है कि जब राम मंदिर बन गया तो उसे चलाएगा कौन!

और यह कोई ‘यूटोपियन’ ख्वाब नहीं, बहुत ही गंभीर मसला है- इसलिए भी कि हम एक मंदिर के बात कर रहे हैं, उसे देश जहाँ सरकारें मंदिरों को लूटतीं हैं और अदालतें “ये तो एक सेक्युलर मंदिर है” के फैसले देती हैं, और इसलिए भी कि यह राम मंदिर का सवाल है, जिसे मंदिर की जगह स्कूल-अस्पताल से लेकर के शौचालय तक बनवाने के लिए सेक्युलर गैंग सक्रिय शुरू से रहा है।

‘सेक्युलरासुर’ मशीनरी को समझना ज़रूरी

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यह शब्द ‘सेक्युलरासुर’ मेरा नहीं है, सोशल मीडिया पर शायद किसी को इस्तेमाल करते देखा था- और इसी एक शब्द में हिन्दुओं की आधुनिक बदहाली के सारे बीज समाहित हैं। इस शब्द से बेहतर सेक्युलरिज़्म की धोखेबाज डफली बजाते भारतीय तंत्र वर्णन नहीं हो सकता। और हर असुर की तरह यह सेक्युलरासुर भी देवताओं और उनके मंदिरों का शत्रु है। और इसे समझना ज़रूरी है यह जानने के लिए कि क्यों मंदिरों का नियंत्रण किसी भी सरकार के हाथ में नहीं होना चाहिए, चाहे वह एक धर्मगुरु योगी आदित्यनाथ की ही सरकार क्यों न हो।

यह असुर पहले तो ‘अव्यवस्था दूर करेंगे’, ‘मंदिर में सभी जातियों के लोगों को प्रवेश देने के लिए हमारा हस्तक्षेप ज़रूरी है’ (चाहे मंदिर में यह प्रथा कभी रही ही न हो, या खुद ही समय के साथ इसका अंत हो गया हो), ‘मंदिर का सरकारी पैसे से जीर्णोद्धार करेंगे’ (भले ही मंदिर में चढ़ावे की कोई कमी न होती हो, और मंदिर जीर्ण न भी हो), ‘आस्था का संरक्षण करेंगे’ (भले ही संविधान में जबरन जोड़ा गया ‘सेक्युलर’ शब्द कायदे से सरकार को आस्था और उपासना के मामलों से दूर रहने का निर्देश देता हो), आदि नाना प्रपंच से मंदिरों का नियंत्रण हाथ में लेता है। फिर धीरे-धीरे कपटी, अधर्मी, भ्रष्ट अधिकारियों की नियुक्ति मंदिर के सरकारी नियंत्रक के तौर पर करता है। और फिर यहाँ से मंदिरों के, धर्म के क्षरण का खेल शुरू होता है।

सेक्युलर तंत्र के असुर मंदिरों को कई तरीके से नोंचते-खसोटते हैं- मंदिरों की मूर्तियों को गायब कर ‘एंटीक’ के काले बाजार में बेचा जाता है, चढ़ावे के, दान-दक्षिणा के पैसे में गबन होता है, पुजारियों को भूखा मार कर या उनका वेतन ₹2 हजार, ₹3 हजार, यहाँ तक कि ₹750 जैसी घटिया तनख्वाहें दे कर टरका दिया जाता है। मंदिर की सम्पत्तियाँ, मंदिर की ज़मीन कभी ‘गायब’ हो जाते हैं तो कभी उन पर चर्च बनते दिखते हैं। रामलला के अस्थाई मंदिर की ही बात करें तो मंदिर को दान में प्रति महीने ₹6 लाख मिलते हैं, लेकिन मूर्ति की पूजा-अर्चना पर ‘रामलला के भत्ते’ के तौर पर महज़ ₹30,000 महीना और मुख्य पुजारी समेत सभी पुजारियों के वेतन को मिलाकर खर्च ₹1.5 लाख महीने से अधिक नहीं है। यानि मंदिर की कमाई का केवल एक-चौथाई मंदिर और हिन्दुओं के हाथ में, बाकी की सरकार खुली लूट करती है। यह सरकारी कुव्यवस्था खुद गोरखधाम मंदिर के अध्यक्ष होने के नाते मंदिर प्रबंधन मामलों से अवगत माने जा सकने वाले मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के समय में भी जारी हैक्यों?

फ़र्ज़ करिए अगर कल योगी सरकार न हो…

कोई सरकार हमेशा नहीं टिकेगी- न मोदी की, न योगी की। न ही मोदी-योगी अमृत पीकर आए हैं- जिन्हें विश्ववास न हो, वे अपने आसपास देखें और बताएँ अशोक सिंहल, महंत अवैद्यनाथ, गोपाल विशारद जैसे मंदिर आंदोलन से जुड़े लोग आस-पास दिख रहे हैं क्या।

सत्ता के परिवर्तन और समय के चक्र से कभी-न-कभी कॉन्ग्रेस, माकपा, हिन्दू कारसेवकों पर गोली चलवाने वाले ‘मुल्ला मुलायम’ की सपा जैसे लोग वापिस आ ही जाएँगे। उस समय अगर राम मंदिर सरकारी नियंत्रण में रहे तो क्या होगा, ये कभी सोचा है?

उस समय मंदिर के साथ वही होगा, जो दक्षिण भारत के कई मंदिरों के साथ आज हिन्दुओं से नफ़रत करने वाली सरकार और सरकारी मशीनरी के राज में, हिन्दूफ़ोबिक मीडिया के समर्थन और इशारे पर हो रहा है। याद करिए इसी साल जब तमिल नाडु में सरकारी नियंत्रण में पड़े मंदिरों में यज्ञ-हवन के लिए मंदिर विभाग के सर्कुलर को The Wire ने कैसे ‘अन्धविश्वास’ का नाम देकर मंदिरों से पूजा-पथ बंद करवाने का माहौल बनाने की कोशिश की थी। ऐसा आपको क्यों लगता है कि यह श्री राम मंदिर के साथ सपा-बसपा-कॉन्ग्रेस के भविष्य में संभावित राज में नहीं किया जाएगा? ‘Secular fabric’ के नाम पर मंदिर में कुरान की आयतें चलवाने, या ‘मुसलमानों की भावनाएँ आहत होतीं हैं’ के नाम पर रामायण का पाठ रोकने की कोशिश बिलकुल होगी- जैसे आज ममता बनर्जी के राज में बंगाल में दुर्गा पूजा रोकी जा रही है।

राम मंदिर की जगह ‘All Faith Center’ बनवाने के लिए कई सारे गिरोह पहले से सक्रिय हैं। आपको लगता है कि इन्हें हमेशा के लिए सरकारी बलबूते पर रोक कर रखा जा सकता है?

आपको अगर ऐसा लग रहा है कि आप अदालत का सहारा लेकर इन्हें रोक लेंगे तो आगे देखिए। केरल हाई कोर्ट ने सबरीमाला में सरकारी नियंत्रण में मंदिर होने के चलते ही गैर-हिन्दुओं के मंदिर में घुसने पर से रोक हटा दी, क्योंकि इससे मंदिर की ‘मालिक’ राज्य सरकार ‘सेक्युलर’ न बचती। यानी पहले सरकार ने मंदिर पर जबरन कब्ज़ा किया, बिना यह सोचे कि सेक्युलरिज़्म मंदिर में घुसने से आड़े आ रहा है, और अब जबरन बने मालिक ‘सेक्युलर सरकार’ के लिए मंदिर अपनो प्रकृति बदले। जबकि मंदिर का यह नियम है कि हिन्दुओं में भी 41 दिन का कठिन व्रत रखने वाले ही प्रवेश कर सकते हैं, वह भी मंदिर के द्वारा नियत समय पर।

राम मंदिर वैष्णव होगा न? यानि माँस-मदिरा तो दूर की बात, लहसुन-प्याज भी मंदिर के भीतर नहीं आना चाहिए! क्या कल को अगर ओवैसी की पार्टी का कोई व्यक्ति मुख्यमंत्री बन गया और मंदिर में हलाल मटन ले कर आ गया यह कहते हुए कि ‘सेक्युलर’, सरकारी ज़मीन है, तो क्या करेंगे हिन्दू?

हिन्दू समाज ‘perfect’ भले न हो, लेकिन…

हिन्दू-मुस्लिम के आधार पर हिंदुओं की पुण्यभूमि और पितृभूमि का बँटवारा करवाने वाले इक़बाल के शब्दों को रट कर भले ही कोई आज राम को कितना भी ‘इमाम-ए-हिन्द’ बता ले, लेकिन इससे ज़मीनी सच्चाई नहीं बदलेगी, मज़हबी सच्चाई नहीं बदलेगी। सच्चाई यह कि श्री राम हिन्दुओं की आस्था के अनुसार धरती पर आए भगवान थे, और हिन्दुओं के लिए ईश्वर के ही समकक्ष रहेंगे- कोई ‘पैगंबर’ या ‘नबी’ या ‘इमाम’ जैसा से ‘अल्लाह से निचले दर्जे वाला’ नहीं बन जाएँगे। यानि धर्म और ‘अल्लाह’ को सर्वोच्च और ‘दुनिया की किसी भी चीज़ को अल्लाह के समकक्ष’ बताने को पाप मानने वाले इस्लाम के बीच मज़हबी संधि हो सकती है, ऐक्य नहीं।

तो ऐसे में अगर राम मंदिर हिन्दू समाज की बजाय सेक्युलर सरकार के हाथों में रहता है, तो उसकी पवित्रता को, उसके धार्मिक स्वरूप को खतरा हमेशा बना रहेगा। और यह ‘धर्मनिरपेक्षता’ का ढिंढोरा पीटकर अधर्म-गामी, आसुरिक बनने की चाह रखने वाले सरकारी तंत्र को शोभा भी नहीं देता कि गंदे, बदबूदार काफ़िरों के मंदिर के बारे में सोच कर अपने उजले-चिकने-स्वच्छ-सेक्युलर स्वभाव को प्रदूषित करे, और अपना सेक्युलर समय बर्बाद करे।

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