‘हिन्दू’ शब्द पर इतिहास ज्ञान खराब है कमल हासन का, बस 2200 सालों से चूके हैं

यह वक्तव्य, बिना कुछ बोले उत्तर-दक्षिण, पेरियारवादी और फर्जी आर्य बनाम द्रविड़, हिंदी-अहिंदी विभाजन को बढ़ावा देने के लिए है। नीयत यही है कि हिन्दू जब खुद को एक हिन्दू समुदाय का न मानकर इष्ट देवता, क्षेत्र, भाषा आदि के आधार पर अलग-अलग मानेंगे तो उनके वोटों की फ़सल काटना आसान होगा।

कमल हासन ने अपने हालिया बयान में कहा है कि हिन्दू शब्द मुगलों/मुसलमानों की देन है, और यह ‘बेवकूफ़ी’ होगी कि विदेशियों की दी हुई इस पहचान से हम ‘चिपके’ रहें। उन्होंने अलवर और नयनर परम्परा के संतों को क्रमशः (केवल) वैष्णव और शैव बताते हुए दावा किया कि इन संतों ने हिन्दू शब्द का प्रयोग अपनी पहचान में नहीं किया (अतः ‘हिन्दू’ पहचान अवैध है)।

“जब हमारी अलग-अलग पहचानें हैं तो यह विदेशियों द्वारा दी गई मज़हबी पहचान ओढ़े रहना बेवकूफ़ी होगी।” ऊपरी तौर पर राष्ट्रवादी या सांस्कृतिक रूप से स्वदेशीवादी लगने वाला यह बयान असल में हिन्दुओं में आई हालिया राजनीतिक एकता को तोड़ कर दोबारा अलग-अलग जातियों, सम्प्रदायों, क्षेत्रवाद आदि में बाँट देने का कुत्सित प्रयास भर है।

मुगलों से सैकड़ों साल पुराना है ‘हिन्दू’ शब्द का उद्गम

सबसे पहले तो पहचान, धर्म, संस्कृति आदि को भूल कर केवल शब्द की उत्पत्ति की बात करते हैं। हिन्दू शब्द ‘सिंधु’ के फ़ारसी अपभ्रंश से बना है। इसका सबसे पहले इस्तेमाल मुगलों ही नहीं, इस्लाम से भी एक सहस्राब्दी (1000 वर्ष)  से भी पहले का है। फारसी साम्राज्य के राजा डैरियस-प्रथम के अभिलेखों में हिन्दू शब्द का ज़िक्र ईसा से 6 शताब्दी पूर्व का है, जबकि इस्लाम ईसा से 600 साल बाद का। और मुगलों का हिंदुस्तान में आगमन तो 16वीं शताब्दी, यानि इस्लाम के अविष्कार के भी 1000 साल बाद हुआ। यानि विशुद्ध तकनीकी रूप से भी कमल हासन 22 शताब्दियों की ‘मामूली’ सी चूक कर गए हैं।

अलवर और नयनर हिन्दू ही थे, विष्णु और शिव हिन्दुओं के ही देवता हैं

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यह सच है कि हमारे प्राचीनतम धार्मिक शास्त्रों में हिन्दू शब्द नहीं है, और अलवर-नयनर संत खुद को वैष्णव-शैव ही कहते थे। पर इससे किसी भी तरह से हिन्दू शब्द या पहचान की वैधता कम नहीं हो जाती, जो कि कमल हासन जताना चाहते हैं। यह उसी सनातन धर्म के विभिन्न पंथ हैं जिसे आज हिंदुत्व (या अंग्रेजों का दिया, राजनीतिक प्रत्यय वाला, ‘हिन्दूइज़्म’) कहा जाता है। इसके किसी भी पंथ के अनुयायी को उस पंथ को मानने वाला हिन्दू (जैसे शैव हिन्दू, शाक्त हिन्दू, और यहाँ तक कि नास्तिक/अनीश्वरवादी हिन्दू) ही कहा जाएगा।

अलवर-नयनर संतों ने हिन्दू शब्द का इस्तेमाल इसलिए नहीं किया क्योंकि उनके समय में (अलवर 500 से 1000 ईस्वी के थे, नयनर 6ठी से 8वीं शताब्दी ईस्वी के) इस्लामी आक्रांता हिन्दुओं के लिए गंभीर खतरा नहीं बने थे, उनसे उस समय हमारे धर्म-संस्कृति को इतना बड़ा खतरा महसूस नहीं हुआ था, अतः उनकी आस्था और अपनी आस्था में अंतरों को स्पष्टतः रेखांकित करने के लिए एक अलग छत्र-शब्द (umbrella-term) की आवश्यकता महसूस नहीं हुई थी, जो इस देश में पैदा हुई उपासना पद्धतियों को एकत्रित करते हुए बाहर से आ रही और हमसे बेमेल मूल्यों पर आधारित आस्थाओं के अंतर को एक शब्द-भर में रेखांकित कर सके।

कमल हासन का यह कथन हिंदुत्व को अब्राहमी (इस्लामी-ईसाई) लेंस से देखने, उनके मापदण्डों पर मापने का परिणाम है। इस्लाम और ईसाईयत की आपसी और बाकी सबसे लड़ाई ही इस बात की है कि ‘मेरा ईश्वर को लेकर विचार, मेरी पवित्र किताब ही सही हैं, मेरा पैगंबर ही अंतिम और अकाट्य है, बाकी सब गलत ही नहीं, बुरा भी है’। ज़ाहिर बात है कि इस चश्मे से देखने पर पर अलवर-नयनर क्या, हर गाँव अपना अलग ग्राम देवता, ग्राम देवी होने के नाते एक अलग पंथ, एक अलग मज़हब दिखेगा। और अंदर देखें तो पितृ-पक्ष में अलग-अलग पूर्वजों के हेतु खाना खिलाने से हर घर एक अलग अल्पसंख्यक पंथ लगेगा।

इसी अब्राहमी चश्मे से देखने पर आस्था-आधारित पहचान संकुचन लगती है कमल हासन को जब वह कहते हैं, “वाणिज्यिक राजनीति और आध्यात्म ने हमारी महान संस्कृति को महज़ एक मज़हब तकसंकुचित  कर दिया है।” यह फिर से इस्लाम और ईसाईयत की चारित्रिक विशेषताएँ हिन्दू आस्था पर थोपने का प्रयास है। संकुचित विश्वदृष्टि ईसाई और इस्लामी पंथ की है (जो ‘मेरा पैगंबर/ईसा सही, बाकी गलत’ पर आधारित और संचालित हैं), हिन्दुओं की नहीं।  हिन्दू दर्शन सबको अपने हिसाब से चलने की पूर्ण स्वतंत्रता देता है, और यह स्वतंत्रता हमारी आस्था से ही आती है।

पहचान की राजनीति है यह वक्तव्य

यह वक्तव्य, जैसा कि मैंने ऊपर भी लिखा है, राष्ट्रवादी/स्वदेशीवादी लगता हुआ विभाजनकारी बयान है। यह बिना कुछ बोले उत्तर-बनाम-दक्षिण, पेरियारवादी और फर्जी आर्य बनाम द्रविड़, हिंदी बनाम अहिंदी विभाजन को बढ़ावा देने के लिए है। यह केवल इस नीयत से दिया गया बयान है कि हिन्दू जब खुद को एक हिन्दू समुदाय का न मानकर इष्ट देवता, क्षेत्र, भाषा आदि के आधार पर अलग-अलग मानेंगे तो उनके वोटों की फ़सल काटना आसान होगा। न केवल वोटों की राजनीति बल्कि चर्चों का आस्था-परिवर्तन का धंधा भी इसी कथानक (narrative) पर चलता है।

ईसाई और पेरियारवादी है कमल हासन की पृष्ठभूमि  

कमल हासन की पृष्ठभूमि को देखें तो यह और भी साफ़ हो जाता है कि उनकी इस बयान के पीछे नीयत क्या है। करण थापर को दिए एक पुराने इंटरव्यू में उन्होंने साफ़-साफ़ बोलै है कि बचपन में वह क्रिश्चियन आर्ट्स एन्ड कम्यूनिकेशन सेंटर में काम करते थे (देखें 9:22 से 9:30 तक)।

देखें 9:22 से 9:30 तक

उनकी राजनीति को देखते हुए यह साफ हो जाता है कि उन्होंने वहाँ महज पैसों के लिए नौकरी नहीं की थी, शायद वहीं से उनकी हिन्दुओं की आस्था के लिए घृणा नींव भी रखी गई थी। इसके अलावा वह घोषित तौर पर पेरियार के प्रशंसक खुद को बता चुके हैं। उन्होंने पिछले ही साल घोषित किया था कि उनकी अपनी पहचान (भारतीय की नहीं) द्रविड़ की है

अतः ऐतिहासिक से लेकर संदर्भित रूप से, किसी भी दृष्टि से ढूँढ़कर कमल हासन के इस वाहियात बयान में कुछ भी सकारात्मक नहीं निकाला जा सकता।

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