Tuesday, April 13, 2021
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त्रयम्बक, नटराज, आदियोगी… शिव के कई नाम, विश्व की सबसे बड़ी प्रयोगशाला जिन्हें करती है सलाम!

जब आपकी भीतरी दृष्टि खुल जाती है, जब आपके पास एक आंतरिक दृष्टि होती है, तभी आपको पूर्ण स्पष्टता मिलती है। जिसे हम शिव कहते हैं, वह और कुछ नहीं, बस चरम बोध का साकार रूप है।

शिव का शाब्दिक अर्थ ही यही है, ‘जो नहीं है’। ‘जो है’, वह अस्तित्व और सृजन है। ‘जो नहीं है’, वह शिव है। ऐसे शायद शिव आपको भी पहेली लगें इसलिए संसार ने अपनी सुविधा के लिए शिव को कई अलग नाम और गुणधर्म दिए। सबकी अपनी-अपनी अलग-अलग व्याख्याएँ पर मूल रूप में सभी का मूल एक कल्याण। शिव अर्थात एक महायोगी, गृहस्थ, तपस्वी, अघोरी, नर्तक और भी कई अन्य अलग-अलग नाम और रूप। क्या कभी आपने सोचा कि क्यों इतने सारे विविध रूप धारण किए थे भगवान शिव ने?

त्रयंबक

शिव को हमेशा त्रयंबक कहा गया है क्योंकि उनकी एक तीसरी आँख है। तीसरी आँख का यह मतलब नहीं है कि माथे में कोई दरार है, जहाँ एक और आँख उग आई है। इसका मतलब बस यह है कि उनका बोध या अनुभव अपनी चरम संभावना पर पहुँच गया है। तीसरी आँख भौतिक नहीं अंतर्दृष्टि की आँख है।

त्रयम्बक शिव

दोनों भौतिक आँखे सिर्फ इन्द्रियाँ हैं। वे आपके मन को हर तरह की फालतू बातों से भरती हैं क्योंकि हम जो देखते हैं, वह सत्य नहीं है। सद्गुरु कहते हैं कि आप किसी इंसान को देखकर उसके बारे में कुछ अंदाजा लगाते हैं, मगर आप उसके अंदर शिव को नहीं देख पाते। इसलिए एक और आँख को खोलना जरूरी है, जो और गहराई में देख सके।

आपने भी अनुभव किया होगा कि कितना भी सोचने से या दार्शनिक चिंतन से कभी आपके मन को स्पष्टता नहीं मिल पाती है। बहुत सोचकर, कुछ तथाकथित प्रमाण इकठ्ठा कर हम कुछ मान लेते हैं। जिसके बल पर जानने का दावा करते हैं पर सच्चाई यही है कि कोई भी आपकी तार्किक स्पष्टता को बिगाड़ सकता है, मुश्किल हालात आपकी सोच और हर मान्यता को पूरी तरह अस्त-व्यस्त कर सकते हैं। जब आपकी भीतरी दृष्टि खुल जाती है, जब आपके पास एक आंतरिक दृष्टि होती है, तभी आपको पूर्ण स्पष्टता मिलती है। जिसे हम शिव कहते हैं, वह और कुछ नहीं, बस चरम बोध का साकार रूप है।

भोलेनाथ, भोले भंडारी

वैसे तो शिव को हमेशा से एक बहुत शक्तिशाली प्राणी के रूप में देखा जाता रहा है। साथ ही, यह भी समझा जाता रहा कि वह सांसारिक रूप से बहुत चतुर नहीं हैं। इसलिए, शिव के एक रूप को भोलेनाथ, भोले भंडारी भी कहा जाता है, क्योंकि वह किसी बच्चे की तरह हैं। ‘भोलेनाथ’ का मतलब है, मासूम या अज्ञानी।

शिव भोले भंडारी

आपने आम जीवन में भी देखा होगा कि सबसे बुद्धिमान लोग बहुत आसानी से मूर्ख बन जाते हैं, क्योंकि वे छोटी-मोटी चीजों में अपनी बुद्धि नहीं लगा सकते। बहुत कम बुद्धिमत्ता वाले चालाक और धूर्त लोग दुनिया में आसानी से किसी बुद्धिमान व्यक्ति को पछाड़ सकते हैं। यह धन-दौलत के अर्थ में या सामाजिक तौर पर मायने रख सकता है, मगर जीवन के संबंध में इस तरह की जीत का कोई महत्व नहीं है।

ध्यान रहे, बुद्धिमान से हमारा मतलब यहाँ स्मार्ट होने से नहीं है। इसका मतलब उस आयाम को स्वीकार करने से है, जो जीवन को पूर्ण रूप से घटित होने देता है, विकसित होने देता है। शिव भी ऐसे ही हैं। ऐसा नहीं है कि वह मूर्ख हैं, मगर वह हर छोटी-मोटी चीज में बुद्धि का इस्तेमाल नहीं करते। जो ऐसा करते हैं उनको आपने अपने आस-पास भी जीवन या आसान काम को भी जटिल बनाते देखा होगा।

नटराज

नटराज अर्थात नृत्य के देवता, शिव के सबसे महत्वपूर्ण रूपों में से एक है। शिव का लयात्मक रूप, क्रुद्ध हुए तो रूद्र अर्थात महाविनाशक।

नाभिकीय प्रयोगशाला (CERN) स्थित नटराज की प्रतिमा

आपको स्विटजरलैंड में स्थित नाभिकीय प्रयोगशाला (CERN) याद होगा। यह धरती पर भौतिकी की सबसे बड़ी प्रयोगशाला है, जहाँ अणुओं की सारी तोड़-फोड़ हो रही है। वहाँ के प्रवेशद्वार के सामने नटराज की एक मूर्ति है। क्योंकि उन्हें महसूस हुआ कि मानव संस्कृति में इसके सिवाए ऐसा कुछ नहीं है, जो उनके अभी के काम से मिलता-जुलता हो, उसके करीब हो। लय में हैं तो सृजन, क्रुद्ध हुए, लय बिगड़ा तो रूद्र अर्थात महा विनाशक। परमाणु और अणुओं से ही सृष्टि का कण-कण निर्मित है और वही परमाणु जब मुक्त हो जाता है तो महाविनाशक परमाणु बम।

खैर, नटराज रूप सृष्टि के उल्लास और नृत्य यानी कंपन को दर्शाता है, जिसने शाश्वत स्थिरता और नि:शब्दता से खुद को उत्पन्न किया है। चिदंबरम मंदिर में स्थापित नटराज की मूर्ति बहुत प्रतीकात्मक है। क्योंकि जिसे आप चिदंबरम कहते हैं, वह पूर्ण स्थिरता है। इस मंदिर के रूप में यही बात प्रतिष्ठित की गई है कि सारी गति पूर्ण स्थिरता से ही पैदा हुई है। शास्त्रीय कलाएँ इंसान के अंदर यही पूर्ण स्थिरता लाती हैं। स्थिरता के बिना सच्ची कला नहीं आ सकती। स्थिरता, लय और गति का सुन्दर तालमेल देखना हो तो महसूस करिए भारतीय संगीत परम्परा में छिपे जीवन के अनहदनाद को।

अर्धनारीश्वर

आम तौर पर, शिव को परम या पूर्ण पुरुष माना जाता है। मगर अर्धनारीश्वर रूप में, उनका आधा हिस्सा एक पूर्ण विकसित स्त्री का होता है। कहा जाता है कि अगर आपके अंदर की पौरुष यानी पुरुष-गुण और स्त्रैण यानी स्त्री-गुण मिल जाएँ, तो आप परमानंद की स्थायी अवस्था में रहते हैं। अगर आप बाहरी तौर पर इसे करने की कोशिश करते हैं, तो वह टिकाऊ नहीं होता और उसके साथ आने वाली मुसीबतें कभी खत्म नहीं होतीं। पौरुष और स्त्रैण का मतलब पुरुष और स्त्री नहीं है। ये खास गुण हैं।

अर्धनारीश्वर शिव

मुख्य रूप से यह दो लोगों के मिलन की चाह नहीं है, यह जीवन के दो पहलुओं के मिलन की चाह है, जो बाहरी और भीतरी तौर पर एक होना चाहते हैं। अगर आप भीतरी तौर पर इसे हासिल कर लें, तो बाहरी तौर पर यह सौ फीसदी अपने आप हो जाएगा। वरना, बाहरी तौर पर यह एक भयानक विवशता बन जाएगी।

यह रूप इस बात को दर्शाता है कि अगर आप चरम रूप में विकसित होते हैं, तो आप आधे पुरुष और आधी स्त्री होंगे। इसका मतलब यह नहीं कि आप नपुंसक होंगे, बल्कि एक पूर्ण विकसित पुरुष और एक पूर्ण विकसित स्त्री होंगे। तभी आप एक पूर्ण विकसित इंसान बन पाते हैं।

कालभैरव, महाकाल

कालभैरव शिव का एक मारक या जानलेवा रूप है, जब उन्होंने समय के विनाश की मुद्रा अपना ली थी। सभी भौतिक हकीकतें समय के भीतर मौजूद होती हैं। अगर समय नष्ट हो जाए तो सब कुछ नष्ट हो जाएगा।

महाकाल कालभैरव शिव

शिव भैरवी-यातना को पैदा करने के लिए उपयुक्त वस्त्र धारण करके कालभैरव बन गए। ‘यातना’ का मतलब है, घोर पीड़ा। कहा जाता है, जब मृत्यु का पल आता है, तो बहुत से जीवनकाल पूरी तीव्रता में सामने आ जाते हैं, आपके साथ जो भी पीड़ा और कष्ट होना है, वह एक माइक्रोसेकेंड में ‍घटित हो जाएगा। उसके बाद, अतीत का कुछ भी आपके अंदर नहीं रह जाएगा।

सद्गुरु कहते हैं कि अपने ‘सॉफ्टवेयर’ को नष्ट करना कष्टदायक है। मगर मृत्यु के समय ऐसा होता है, इसलिए आपके पास कोई चारा नहीं होता। लेकिन वह इसे जितना हो सके, छोटा बना देते हैं। कष्ट को जल्दी से खत्म करना चाहते हैं। ऐसा तभी होगा, जब हम इसे अत्यंत तीव्र बना देंगे। अगर वह हल्का होगा, तो हमेशा चलता ही रहेगा।

आदियोगी

योगिक परंपरा में शिव की पूजा ईश्वर के रूप में नहीं की जाती है। वह आदियोगी, यानि पहले योगी और आदिगुरु, यानि पहले गुरु हैं, जिनसे योगिक विज्ञान जन्मा। दक्षिणायन की पहली पूर्णिमा गुरु पूर्णिमा होती है, जब आदियोगी ने इस विज्ञान को अपने पहले सात शिष्यों, सप्तऋषियों को सौंपना शुरू किया।

शांत चित्त आदियोगी

सद्गुरु कहते हैं कि यह किसी भी धर्म से पहले की बात है। इंसान ने मानवता को तोड़ने-फोड़ने के विभाजनकारी तरीके ढूँढे, उससे पहले मानव चेतना को बढ़ाने के लिए जरूरी और सबसे शक्तिशाली साधनों को पहचाना और प्रचारित किया गया। उसकी गूढ़ता आश्चर्यजनक है। उस समय लोग इतने प्रबुद्ध थे या नहीं, इस सवाल का कोई मतलब नहीं है क्योंकि यह किसी खास सभ्यता या विचार प्रक्रिया से नहीं जन्मा था। यह एक आंतरिक ज्ञान से उपजा था। उन्होंने बस अपने आप को उड़ेल दिया। आप आज भी एक चीज तक नहीं बदल सकते क्योंकि जो कुछ भी कहा जा सकता है, उन्होंने वह सब बहुत ही सुंदर और समझदारी भरे रूपों में कहा। आप बस उसे समझने की कोशिश में अपना पूरा जीवन बिता सकते हैं।

आज महाशिवरात्रि के अवसर पर, शिव के कई नामों और उसके पीछे के रहस्यों से परिचय के साथ-साथ, शिव कृपा को साक्षात अनुभव करने के लिए, आज की रात आपके लिए सिर्फ घोर निद्रा की रात बनकर न रह जाए बल्कि इसे अपने लिए तीव्र जीवंतता और जागरूकता की रात बना दें। आज चाहें तो आप महाशिवरात्रि के इस अद्भुत उपहार का लाभ उठा सकते हैं, जो प्रकृति स्वयं इस दिन मानवता को प्रदान करती है।

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रवि अग्रहरि
अपने बारे में का बताएँ गुरु, बस बनारसी हूँ, इसी में महादेव की कृपा है! बाकी राजनीति, कला, इतिहास, संस्कृति, फ़िल्म, मनोविज्ञान से लेकर ज्ञान-विज्ञान की किसी भी नामचीन परम्परा का विशेषज्ञ नहीं हूँ!

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