Monday, September 21, 2020
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मंदिर निर्माण एक धार्मिक घटना ही नहीं, संस्कृति का पुनर्जागरण है

भारत में मंदिरों का निर्माण 2300 साल से अधिक पुराना है। लेकिन आम जन को इसके बारे में पढ़ाया या बताया नहीं जाता। क्यों? क्योंकि ऐसा करने पर वैज्ञानिक गणना जैसी चीजों में भारतीय कितने सक्षम थे, इस पर भी बात करनी पड़ती, जो उनके बनाए नैरेटिव पर फिट नहीं आती।

अगर मंदिर बन नहीं रहा होता और हम मंदिरों की स्थापत्य शैली के बारे में लिखने बैठ जाते, तो उसे पढ़ता कौन? राम जन्मभूमि मंदिर के निर्माण शुरू होने के बहाने, हमें अपने मंदिरों की स्थापत्य शैली के बारे में बात करने का मौका भी मिल जाता है। ऐसा नहीं है कि इनके बारे में पढ़ा नहीं जाता या बताया नहीं जाता। हाँ ये जरूर है कि आम आदमी की पहुँच से इस जानकारी को दूर रखा गया है।

भारत में मंदिरों का निर्माण 2300 साल से अधिक पुराना है। इतना समय मिलेगा तो जाहिर कि ये काफी विकसित शास्त्र के रूप में बनकर तैयार हो गया होगा। शुरुआती दौर में मंदिर के लिए देवगृह, देवस्थान, देवालय जैसे शब्द प्रयुक्त होते थे। मंदिर निर्माण की जो तीन विशिष्ट शैलियाँ हैं- नागर, द्रविड़ और बेसर, उनका विकास अलग अलग क्षेत्रों में हुआ।

भारत की विविधता का ये धोती या साड़ी जैसा ही उदाहरण है। धोती अलग अलग तरीके से पहनी जाती है, महाराष्ट्र के साड़ी पहनने के तरीके और बंगाल वाले में काफी अंतर है। इस विविधता को स्वीकार करते हुए भी मूल में एक होना सनातन का लक्षण है। हम “वन साइज फिट्स ऑल” की जबरदस्ती के समर्थक तो कभी रहे नहीं ना?

उत्तरी से लेकर मध्य भारत तक के नगरों में जिस प्रकार के मंदिर बनते थे, उन्हें नगर शब्द के आधार पर ही नागर शैली का नाम दिया गया। द्रविड़ शैली नर्मदा के निचले हिस्से से दक्षिणी भारत तक अधिक प्रसिद्ध है और बेसर इन दोनों शैलियों का मिला जुला रूप है।

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अगर भारत में तीर्थों पर या मंदिरों के आस-पास विदेशों (और अब भारत) में प्रचलित “हेरिटेज वॉक” जैसा कुछ ज्यादा चलता तो इन मंदिर निर्माण शैलियों के बारे में जानकारी आम होती। अफ़सोस कि कक्षा के बाहर, वैकल्पिक पद्धतियों से शिक्षा देने की नीति भारत में कभी शुरू नहीं हुई और ऐसी सभी जानकारी आईएएस/यूपीएससी की तैयारी करने वालों तक सिमटी रही।

सोशल मीडिया के दौर और इंटरनेट से फैलती सूचनाओं के दौर ने इसे थोड़ा बदला है, वरना मंदिर निर्माण की किताबें भी बहुत महंगी होती हैं और अधिकतर आम लोगों की पहुँच से बाहर ही होंगी। मंदिर निर्माण पर चर्चा एक तो करीब 70 साल पहले हुई होगी, जब सोमनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार शुरू हुआ था। अब भी यदा-कदा उस पर बात होती रहती है।

90 के दशक में जब राम-जन्मभूमि मंदिर का निर्माण फिर से करवाने का आंदोलन जोर पर था, करीब-करीब तभी से एक मंदिर का प्रारूप सा सबने देख रखा है। ये तीन शिखरों वाला मंदिर था और जैसा ये दिखता था, करीब-करीब वही “नागर” शैली है। इसके वास्तुकार चंद्रकांत भाई सोमपुरा एक ऐसे परिवार से आते हैं, जो करीब 15 पीढ़ियों से मंदिर निर्माण से जुड़ा है।

अपने पिता के साथ मिलकर इन्होंने ही सोमनाथ मंदिर का नक्शा भी बनाया था। अगर आपने दिल्ली का अक्षरधाम मंदिर देखा है, तो वो भी इनका ही बनाया हुआ है। पिछले वाले नक़्शे से अब का नक्शा थोड़ा अलग है, लेकिन है ये भी नागर शैली ही। ये मंदिर उँचाई में 8 भागों में बाँटे गए हैं – मूल (आधार), गर्भगृह मसरक (नींव और दीवारों के बीच का भाग), जंघा (दीवार), कपोत, शिखर, गल, आमलक और कुंभ (शूल सहित कलश)।

मंदिर निर्माण में मुख्यत: पत्थर का प्रयोग होता रहा है, किंतु ईंटों के भी प्रचुर प्रयोग मिल जाते हैं। मौर्य काल में काष्ठ मंदिरों के भी साक्ष्य हैं। पहाड़ी क्षेत्र में लकड़ी के मंडपों का प्रयोग अधिक देखने को मिलता है।

नेपाल के काठमांडू का नामकरण ही काष्ठ मंडप शब्द से हुआ है। समतल क्षेत्र के मंदिरों में पत्थरों का प्रयोग अधिक है। नागर शैली के मंदिरों के 8 प्रमुख अंगों में से अधिष्ठान वो मूल आधार होता है, जिस पर सम्पूर्ण भवन खड़ा किया जाता है। शिखर मंदिर का शीर्ष भाग अथवा गर्भगृह का ऊपरी भाग, कलश शिखर का शीर्षभाग होता है, जो कलश ही या कलश जैसा होता है।

ताजमहल का ऊपरी भाग देख लें, तो वहाँ भी कलश की संरचना नजर आ जाएगी। आमलक शिखर के ऊपरी हिस्से पर कलश के ठीक नीचे का वर्तुलाकार (थाली-चकरी जैसा) भाग होता है। इसके नीचे ग्रीवा होती है जो शिखर से ढलान के जैसी दिखती है।

कपोत किसी द्वार, खिड़की, दीवार या स्तंभ का ऊपरी छत से जुड़े भाग को कहते हैं। फिर आता है मसूरक जो कि नींव और दीवारों के बीच का भाग होता है, जंघा विशेषकर गर्भगृह की दीवारों को कहते हैं। इनके अलावा भी कई अलग-अलग भागों के नाम होते हैं, जैसे अधिष्ठान का ऊपरी प्लेटफॉर्म जगती कहलाता है।

मूल मंदिर के शिखर के बाद थोड़ी सी जगह छोड़कर मंडप भी बनते हैं। ये भी क्रमश: घटती ऊँचाई व विस्तार के साथ महामंडप, मंडप, अर्धमंडप कहलाते हैं। द्वार व स्तंभ भी स्वरूप के हिसाब से अलग-अलग नाम वाले होते हैं, जैसे तोरण द्वार।

शिखर में जुड़ने वाले उपशिखर उरुशृंग कहे जाते हैं। शिखर को विमान भी कहा जाता है। मंदिर के विभिन्न स्थानों पर गवाक्ष भी दिख सकते हैं। अगर बहुत गौर से देखा जाए तो नागर शैली में वर्गाकार (स्क्वायर) क्षेत्र पर निर्माण होता है और द्रविड़ शैली में आयताकार (रेक्टेंगल)। 

इस आधार पर जन्मभूमि मंदिर को नागर कहें या द्रविड़, या बेसर, ये सोचना पड़ेगा। नागर शैली में गर्भगृह के सामने मंडप होता है, द्रविड़ में मंडप का वहीं होना आवश्यक नहीं और मंडप पर शिखर भी नहीं होता। इस आधार पर जन्मस्थान मंदिर नागर होगा। द्वार के लिए नागर शैली के मंदिरों में तोरण द्वार होते हैं और द्रविड़ में गोपुरम होता है। द्रविड़ शैली में मंदिर परिसर में ही जलाशय (जिसे कल्याणी या पुष्करणी कहते हैं) आवश्यक होता है, नागर शैली में ये आवश्यक नहीं है।

जैसी बहसें हाल में मंदिर निर्माण के शुरू होने के मुहूर्त को लेकर छिड़ी हुई दिखी, वैसी बहसें कभी स्थापत्य या वास्तु पर नहीं दिखीं। संभवतः इसका एक कारण ये होगा कि शिक्षा नीति बनाने वालों ने 70 साल तक स्थापत्य से जुड़ी भारतीय जानकारी को छुपाकर रखा होगा। इसके बाहर आने पर वैज्ञानिक गणना जैसी चीज़ों में भारतीय कितने सक्षम थे, इस पर भी बात करनी पड़ती, जो कि उनके बनाए नैरेटिव पर फिट नहीं आती थी।

अपर गंगा कनाल (हरिद्वार से कानपुर) का निर्माण 1842 में आरम्भ हुआ व 1854 में पूरा हो गया। 1858 तक भारत पर राज ईस्ट इंडिया कम्पनी का था, ब्रिटेन का नहीं। एक ट्रेडिंग कम्पनी क्यूँ इतना इन्वेस्ट करेगी?

जाहिर है लोग आपसी सूझ-बूझ से इतने बड़े निर्माण आराम से कर सकते थे। इनके बारे में चर्चा, शिक्षा के सबके लिए नहीं होने, सिर्फ ब्राह्मणों तक सीमित होने, के दावे की भी पोल खोल देता। भारत का सबसे पहला इंजीनियरिंग कॉलेज भी नहर की देखभाल और मरम्मत करने वालों के लिए बनाए जाने के नाम पर ही बनवाया गया था।

कहने का मतलब ये है कि आँखें खोलकर आपको देखना होगा। अपने आस पास देखना और सवाल पूछना भी हमें ही शुरू करना होगा। जन्मभूमि मंदिर का निर्माण केवल एक धार्मिक घटना ही नहीं है। ये संस्कृति का पुनः जागरण है।

इसके बनने से इतनी दिक्कत इसलिए भी है क्योंकि विदेशियों की फेंकी हुई बोटियों पर पलने वाले कुत्तों की दशकों की मेहनत पर ये एक झटके में पानी फेर देता है। बाकी अपनी आँखों से शेखुलरिज्म का टिन का चश्मा उतारिए तो शायद नजर आए। निर्माण में ढाई साल तो कम से कम लगेंगे ही, इतने वक्त में भी काफी कुछ बदल सकता है।

(इंटरनेट से साभार ली गई तस्वीर में एक, इस्लामिक आक्रमण में तोड़ दिए गए हिस्सा हम्पी के हजार राम मंदिर के अवशेषों का है, जिसे 1970 में लिया गया था और दूसरा हिस्सा उसके पुनः निर्माण के बाद का है। नागर थी, द्रविड़ या बेसर, ये आप खुद तय कर लें।)

हिंदू मंदिर
चित्र साभार: इंटरनेट

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Anand Kumarhttp://www.baklol.co
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