Thursday, January 20, 2022
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दिगंबर के लिए ‘उत्तम क्षमा’ तो श्वेताम्बर कहेंगे ‘मिच्छामि दुक्कड़म्’: जानिए क्या है मानवीय विकृतियों पर विजय का महापर्व पर्युषण

पर्युषण पर्व महावीर स्वामी के मूल सिद्धांत 'अहिंसा परमो धर्म' और 'जिओ और जीने दो' की राह पर चलना सिखाता है तथा मोक्ष प्राप्ति का मार्ग भी प्रशस्त करता है। इसके समापन पर 'विश्व-मैत्री दिवस' अर्थात संवत्सरी पर्व मनाया जाता है। पर्युषण के अंतिम दिन जहाँ दिगंबर 'उत्तम क्षमा' तो श्वेतांबर 'मिच्छामि दुक्कड़म्' कहते हुए लोगों से क्षमा माँगते हैं।

जैन धर्म का प्रमुख पर्व पर्युषण जिसका उद्देश्य न सिर्फ आत्मिक उन्नति है बल्कि कहीं न कहीं खुद को मानवता के उच्च शिखर पर स्थापित करना भी है। कहते हैं आत्मोथान के दसलक्षण अर्थात पर्युषण- क्रोध, मान, माया, लोभ आदि विकारों से मुक्त होते हुए संयमपूर्वक धर्म की आराधना करने का अवसर है। पर्युषण शब्द में ही इसका मूल अर्थ समाहित है परि यानी चारों ओर से, उषण अर्थात धर्म की आराधना।

यह पर्व महावीर स्वामी के मूल सिद्धांत ‘अहिंसा परमो धर्म’ और ‘जिओ और जीने दो’ की राह पर चलना सिखाता है तथा मोक्ष प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त करता है। जैन धर्म के दो पंथ श्वेतांबर और दिगंबर समाज में तप का पर्व पर्युषण, भाद्रपद महीने अर्थात भादो (अगस्त-सितम्बर) में मनाए जाते हैं। अंतर बस ये है कि श्वेतांबर के व्रत समाप्त होने के बाद दिगंबर समाज के व्रत प्रारंभ होते हैं।

जैन शास्त्रों के अनुसार- ‘संपिक्खए अप्पगमप्पएणं’ अर्थात आत्मा के द्वारा आत्मा को देखो। यह सभी के जीवन में आनंदमय परिवर्तन का कारण बन सकता है। यह मन, आत्मा या अपने मूल स्वरुप पर पड़ी बुराई रूपी बाहरी कालिमा को धोने का अवसर है। दूसरे शब्दों में कहें तो जो हमने जो तमाम बुराइयाँ, विकृतियाँ इस संसार में कार्य-व्यवहार के दौरान जाने-अनजाने में अर्जित किए हैं, उनका विनाश और विशुद्धि का विकास ही पर्युषण पर्व का मूल ध्येय है।

दस दिन चलने वाले इस पर्व में प्रतिदिन धर्म के एक अंग या लक्षण को जीवन में उतारने का प्रयास किया जाता है। इसलिए इसे दसलक्षण पर्व भी कहा जाता है। श्वेतांबर जहाँ 8 दिन तक पर्युषण पर्व मनाते हैं वहीं दिगंबर के लिए 10 दिन का होता है, जिसे ‘दसलक्षण’ कहते हैं। ये दसलक्षण हैं- क्षमा, मार्दव, आर्जव, शौच, सत्य, संयम, तप, त्याग, आकिंचन एवं ब्रह्मचर्य।

जैन धर्म के जिन दस लक्षणों की आराधना की जाती हैं, वे इस प्रकार हैं:

  1. उत्तम क्षमा : उत्तम क्षमा की आराधना से पर्युषण पर्व की शुरुआत होती है। व्यक्ति के अंदर सहनशीलता का विकास इसका केंद्रीय उद्देश्य है। प्रकृति के रूप के प्रति क्षमाभाव रखना।
  2. उत्तम मार्दव,: चित्त अर्थात मन में मृदुता व व्यवहार में नम्रता का होना। सभी के प्रति विनय का भाव रखना।
  3. उत्तम आर्जव : इसका अर्थ है भाव की शुद्धता। जो सोचना वही कहना। जो कहना, वही करना। छल, कपट या किसी भी प्रकार के चालाकी का त्याग करना। कथनी और करनी में अंतर नहीं होना।
  4. उत्तम शौच : मन में किसी भी तरह का लोभ या लालच न रखना। आसक्तिभाव को घटाना। न्याय और नीति पूर्वक धन अर्जन करना।
  5. उत्तम सत्य : सत्य बोलना। हितकारी बोलना। कम बोलना। प्रिय और अच्छे वचन बोलना।
  6. उत्तम संयम : मन, वचन और शरीर पर नियंत्रण रखना। संयम का पालन करना। मन तथा इंद्रियों को काबू में रखना।
  7. उत्तम तप : मलिन वृत्तियों को दूर करने के लिए तपस्या करना। यहाँ तप का उद्देश्य मन की शुद्धि है।
  8. उत्तम त्याग : सुपात्र को ज्ञान, अभय, आहार और औषधि का दान देना तथा राग-द्वेषादि का त्याग करना।
  9. उत्तम आकिंचन : अपरिग्रह को स्वीकार करना। अर्थात आवश्यकता से अधिक इकठ्ठा नहीं करना।
  10. उत्तम ब्रह्मचर्य : सद्गुणों का अभ्यास करना और पवित्रता का पालन करना। दूसरे अर्थों में चिदानंद आत्मा में लीन होना।

एक तरह से देखा जाए तो आज हम वर्षपर्यन्त भौतिकता की जिस अंधी रेस में दौड़ रहे हैं उसमें हर वर्ष आने वाला 8 या 10 दिन का यह पर्व जिंदगी को थोड़ा ठहरकर देखने, खुद का विश्लेषण करने, अपनी गलतियों के लिए पश्च्याताप करने का अवसर देकर फिर से नए अंदाज और अहोभाव से भरकर जीने का रास्ता दिखलाती है। यह पर्व व्यक्ति की चेतना का परिष्कार कर खुद को जागृत करने, होश पूर्वक जीने में सहायक बनता है। कुलमिलाकर, देखा जाए तो पर्युषण पर्व आमोद-प्रमोद का नहीं है बल्कि तप और त्याग के माध्यम से आत्मिक उन्नति का एक सुनहरा अवसर है।

बता दें कि श्वेतांबर परंपरा के जैन मतावलंबी इस वर्ष 3 से 10 सितंबर तक इस साधना में हैं। आज उनका समापन है तो वहीं दिगंबर परंपरा को मानने वाले इसे आज 10 सितम्बर से शुरू करके 19 सितंबर तक यह महापर्व मनाएँगे। संयम और आत्मशुद्धि के इस पावन पर्व पर भगवान जिनेन्द्र की आराधना, अभिषेक, शांतिधारा, विधान, जप, उपवास, प्रवचन श्रवण आदि किया जाता है। साथ ही कठिन व्रत और तप के नियमों का पालन किया जाता है।

पिछले साल की तरह इस वर्ष भी कोरोना गाइडलाइन का पालन करते हुए जैन धर्म के अनुयायी अपने घरों में ही जहाँ तक संभव हो सुबह छह से शाम छह बजे तक (12 घंटे) णमोकार मंत्र का जप करते हैं। अंतगड सूत्र वाचन के साथ ही कई लोग इस दौरान उपवास भी रखते हैं। सूर्यास्त के बाद हल्के भोजन के साथ व्रत खोला जाता है। पर्युषण पर्व पर कुछ लोग सिर्फ शाम के वक्त सरासू पानी (राख मिश्रित पानी) पीते हैं। जैन मंदिरों या स्थानक (मुनियों के ठहरने का स्थान) में जैन मुनि हर दिन एक-एक घंटे का प्रवचन कर अनुयायियों को इस पर्व का महत्व भी बताते हैं।

पर्युषण पर्व के समापन पर ‘विश्व-मैत्री दिवस’ अर्थात संवत्सरी पर्व मनाया जाता है। पर्युषण पर्व के अंतिम दिन जहाँ दिगंबर ‘उत्तम क्षमा’ तो श्वेतांबर ‘मिच्छामि दुक्कड़म्’ कहते हुए लोगों से क्षमा माँगते हैं।

नोट- यह लेख दर्शन सांखला (संस्थापक- RolBol: Rest Of Life Best of Life) ने लिखा है।

 

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