Saturday, September 26, 2020
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अगर वीसी ने धर्म संकाय में नियुक्ति नियमों का ध्यान रखा होता तो BHU की बदनामी नहीं होती: प्रो. वशिष्ठ त्रिपाठी

काशी विद्वत परिषद, 50 से अधिक प्रोफेसरों, शंकराचार्य सहित बनारस के कई आचार्यों और विद्वानों ने BHU के विजिटर महामहिम राष्ट्रपति को पत्र लिखकर आवश्यक हस्तक्षेप का अनुरोध करते हुए फिरोज खान की नियुक्ति रद्द करने को कहा, जिसका कार्यकारिणी ने संज्ञान भी लिया।

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान के छात्रों द्वारा गैर हिन्दू फिरोज खान की नियुक्ति का विरोध जारी है। छात्रों को शंकराचार्यों, काशी विद्वत परिषद, पूर्व और वर्तमान प्रोफेसरों, संकाय प्रमुख और विभागाध्यक्षों का जबरदस्त समर्थन मिल रहा है। काशी विद्वत परिषद, 50 से अधिक प्रोफेसरों, शंकराचार्य सहित बनारस के कई आचार्यों और विद्वानों ने BHU के विजिटर महामहिम राष्ट्रपति को पत्र लिखकर आवश्यक हस्तक्षेप का अनुरोध करते हुए फिरोज खान की नियुक्ति रद्द करने को कहा, जिसका कार्यकारिणी ने संज्ञान भी लिया। BHU की बदनामी से चिंतित कार्यकारिणी की अगली बैठक 7 दिसम्बर को बुलाई गई है। जिसमें फिरोज खान प्रकरण पर भी निर्णय लिया जाएगा।

दूसरी ओर छात्रों का आंदोलन निर्बाध गति से चल रहा है। प्रशासन के 10 दिन की मोहलत के अनुरोध पर छात्रों ने धरना भले समाप्त कर दिया हो लेकिन कक्षाओं और परीक्षाओं का पूर्णतया बहिष्कार जारी है और आंदोलन को गति देने के लिए रोज कई कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं जिसमें तमाम विद्वानों और आचार्यों को अपने विचार प्रकट करने के लिए बुलाया जा रहा है। चूँकि, इसमें से अधिकांश आचार्य-प्रोफ़ेसर अब विश्विद्यालय की नौकरी में नहीं हैं इसलिए वाइस चांसलर को खरी-खोटी सुनाने से लेकर लानत-मलामत में भी कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं।

आंदोलन की कड़ी में ही 26 नवंबर को अस्सी घाट पर एक सभा हुई। सभा मे आए मुख्य वक्ता न्याय शास्त्र के मूर्धन्य विद्वान प्रो. वशिष्ठ त्रिपाठी ने संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय में हुई नियुक्ति को महामना के मूल्यों व विश्वविद्यालय के संविधान के विपरीत बताया। साथ ही यह भी कहा, “इतिहास शिलालेखों के आधार पर ही लिखे जाते हैं। BHU स्थापना स्थल पर लगे शिलालेख से अगर BHU के स्थापना काल का निर्धारण किया जाता है तो धर्म विज्ञान संकाय में लगे शिलालेख को भी मानना ही पड़ेगा। हमारी परंपरा में तो न्याय का विद्यार्थी साहित्य में, व्याकरण में नहीं पढ़ा सकता तो दूसरे धर्म का व्यक्ति कैसे पढ़ा सकता है।”

SVDV के ही पूर्व छात्र व प्राध्यापक रहे, राष्टपति, विश्वभारती आदि अनेक पुरस्कारों से सम्मानित प्रोफ़ेसर वशिष्ठ त्रिपाठी ने चयन समिति पर ही सवाल उठाते हुए कहा कि विभागाध्यक्ष व संकाय प्रमुख को विचार करना चाहिए था। उहोंने कहा कि महामना ने किसी विशिष्ट उद्देश्य के साथ ही इस संकाय को बनाया होगा और साथ ही नियम भी बनाए होंगे। साथ ही यह भी बताए कि अन्य संकायों में जहाँ संस्कृत पढ़ाया जाता है वहाँ नियुक्ति में कोई आपत्ति नहीं होती किसी को। संविधान किसी को भी किसी के धर्म मे हस्तक्षेप की अनुमति नहीं देता।

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साथ ही साथ उन लोगों के बयानों को खंडित करते हुए कहा कि जो कहते हैं कि जैन, बौद्ध हिन्दू नहीं है, तो वो लोग विक्षिप्त हैं, भारत में उदय हुआ कोई भी धर्म सनातन धर्म से अलग नहीं हो सकता। आस्तिक-नास्तिक, वैदिक-अवैदिक को लेकर जरूर भेद है। साथ ही साथ उन्होंने भारत सरकार से इस नियुक्ति की जाँच कराने की भी माँग की।

प्रोफ़ेसर शिवराम गंगोपाध्याय एवं प्रोफ़ेसर वशिष्ठ त्रिपाठी

प्रोफ़ेसर त्रिपाठी ने कहा, “आंदोलन तो छात्रों के बल पर चल रहा है। कितने प्रोफ़ेसर खुल कर सामने आए कि कुलपति, विभागाध्यक्ष और संकायप्रमुख को उनकी गलती और विश्विद्यालय का नियम बताएँ? बाद में कुछ लोग आए और अब सब आ रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा कि बहुत लोग अभी भी कोई मुद्दा अखबार और टीवी से समझते हैं। मीडिया ने गलत ही समझाना शुरू किया इससे भी लोगों को मूल बात पकड़ने में समय लगा। पुराने लोग जानते हैं कि विश्विद्यालय के इस संकाय में क्या नियम है लेकिन कुलपति, रजिस्ट्रार, विभागाध्यक्ष ने उनसे संपर्क ही नहीं किया।” उन्होंने इस आंदोलन को ‘न भूतो न भविष्यति’ की संज्ञा दी। कहा लोग ध्यान रखते तो आज ऐसी जरुरत ही नहीं पड़ती कि छात्र आज पठन-पाठन छोड़कर धर्म और सनातन मूल्यों की रक्षा के लिए सड़क पर हैं।

धर्म विज्ञान संकाय के न्याय विभाग के पूर्व छात्र व प्राध्यापक रहे डॉ. शिवराम गंगोपाध्याय जी ने कहा, “दो धर्मों को एकसाथ नहीं निभाया जा सकता। शास्त्रों का उदाहरण देते हुए बताए कि दो धर्मों को मानने वाले व्यक्ति को अपने घर मे भी नहीं प्रवेश देना चाहिए, क्योंकि वह अविश्वासी होता है।”

डॉ. शिवराम गंगोपाध्याय जी ने यह भी कहा, “अगर इतना ही संस्कृत भाषा पढ़े लिखे हैं व उसके प्रति सम्मान है तो अभी तक सनातन धर्म को स्वीकार कर लेना चाहिए था। साथ ही यह शास्त्र का नियम बताया कि हर व्यक्ति को अपने धर्म का पालन करना चाहिए तभी आपकी पूजा होगी। किसी भी परिस्थिति में अपने धर्म का त्याग नहीं करना चाहिए। दूसरे धर्म को जानना, पढ़ना अलग बात है, पर उस धर्म की शिक्षा देना अलग। हो सकता है पढ़ाते समय वह अपने धर्मों के अनुसार शास्त्रों की व्याख्या करने लगे जिससे हमारी परम्परा ही नष्ट हो जाय।”

उन्होंने यह भी कहा कि संस्कृत भाषा पढ़ाने पर कोई आपत्ति नहीं है। लेकिन जहाँ बात धर्म की और उसके मूल्यों की है तो यह हम सबकी ज़िम्मेदारी है कि जैसे हमारे पुरखों ने आज तक इसे बचाए और संरक्षित रखा, हमें भी इसे आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखना चाहिए। आज मुसलमान इसकी व्याख्या करेगा तो कल ईसाई ऐसे में उनके अपने प्रभाव से अछूता नहीं रहेगा। आखिर इसकी ज़रूरत ही क्या है। हिन्दू धर्म में विद्वानों का अकाल थोड़ी न है।

इस अवसर पर SVDV के ही पूर्व छात्र अंतरराष्ट्रीय कवि डॉ. अनिल चौबे भी उपस्थित रहे, हालाँकि, स्वास्थ्य ज्यादा खराब होने से वे बोल नहीं पाए, लेकिन छात्रों को समर्थन देने के लिए कार्यक्रम में उपस्थित रहे।

डॉ. मुनीश मिश्र ने मीडिया के माध्यम से समाज मे फैले भ्रम के सभी पक्षों का निवारण करते हुए प्रशासन की गलतियों को भी गिनाया। उन्होंने कहा, “आज विश्वविद्यालय की बदनामी कुलपति (VC) की नासमझी की वजह से हो रही है। जब कोई ऐसा कुलपति हो जिसे न उस संस्थान और उसके संस्थापक के मूल्य पता हों, न हिन्दू धर्म में आस्था तो ऐसा अनर्थ होना स्वाभाविक हो जाता है। सरकार को सोचना चाहिए जब वो कुलपति का चुनाव करती है कि कहाँ के लिए कैसा कुलपति उपयुक्त है।” बता दें कि 80 के दशक में इंदिरा गाँधी ने भी ऐसी एक गलती की थी जब BHU में ईसाई धर्म को मानने वाले एक कुलपति को नियुक्त कर दिया जिसका विश्विद्यालय सहित बनारस में जबरदस्त विरोध हुआ, इंदिरा जी को अपनी गलती समझ आई और उनके निर्देश पर उन्होंने खुद ही अपने आपको इस पद से अलग कर लिया।

15 दिनों तक चले धरने में और उसके बाद भी चल रहे आंदोलन में प्रमुख भूमिका निभाने वालों में शशिकांत मिश्र सहित SVDV के छात्रों की उपस्थिति में कार्यक्रम का संचालन शुभम तिवारी ने, स्वागत व विषय प्रस्तावना कृष्ण कुमार मिश्र व धन्यवाद ज्ञापन करते हुए चक्रपाणि ओझा ने इस आंदोलन में सभी के शामिल होने आह्वान किया। उक्त अवसर पर आंदोलनरत छात्रों के साथ बड़ी संख्या में पूर्व छात्र व सामान्य जन भी उपस्थित रहे।

आंदोलन की आज की कड़ी में शशिकांत मिश्र ने बताया कि महामना के मूल्यों व धर्म के रक्षार्थ 27 नवंबर को 4:30 बजे से बीएचयू सिंहद्वार से मशाल जुलूस निकाला जाएगा जिसमें आप सभी बंधु-बांधवों से अनुरोध हैं कि अपनी गरिमामय उपस्थिति समय को ध्यान में रखते हुए दर्ज कराएँ।

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रवि अग्रहरि
अपने बारे में का बताएँ गुरु, बस बनारसी हूँ, इसी में महादेव की कृपा है! बाकी राजनीति, कला, इतिहास, संस्कृति, फ़िल्म, मनोविज्ञान से लेकर ज्ञान-विज्ञान की किसी भी नामचीन परम्परा का विशेषज्ञ नहीं हूँ!

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