Tuesday, September 27, 2022
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‘द हिन्दू’ वालो, पुरी में रथ बनेगा भी, चलेगा भी, और तुम्हारी एंटी हिन्दू छाती पर मूंग भी दलेगा

'द हिन्दू' का यह लेख कोई अपवाद नहीं, बार-बार आजमाया हुआ फार्मूला है हिन्दुओं की हर परंपरा को खत्म करने का- पहले सालों तक धीरे-धीरे उस पर परंपरा पर तमाम कुतर्की सवाल उठाओ, और जब 'माहौल' बन जाए, अपने प्रेशर ग्रुप तैयार हो जाएँ, तो न्यायिक याचिका डालकर उसे प्रतिबंधित कर दो।

‘हिन्दू’ नाम होते हुए भी हिन्दूफ़ोबिया का गढ़ अख़बार ‘द हिन्दू’ हिंदुत्व के पीछे हाथ धोकर पड़ गया है। गौड़िया वैष्णव संप्रदाय/इस्कॉन के एनजीओ ‘अक्षयपात्र फाउंडेशन’ के खिलाफ बच्चों के मिड-डे मील को प्याज-लहसुन, दलित कुक और पता नहीं क्या-क्या लेकर प्रोपेगैंडा किया था, और अब उनका जगन्नाथ पुरी के खिलाफ ‘हिट जॉब’ सामने आया है। इसमें जगन्नाथ पुरी की रथयात्रा में विघ्न डालने के लिए पर्यावरण की झूठी चिंता के बहाने रथ बनाने पर रोक लगाने की ज़मीन तैयार की जा रही है। एक संदिग्ध दिख रहे एनजीओ के हवाले से यह माँग की जा रही है कि पुरी की रथयात्रा के रथ बनाने के लिए पेड़ काटना बंद कर दिया जाए।

एकतरफ़ा कवरेज

पत्रकारिता के ककहरे में से एक होता है ‘संतुलित कवरेज’। यानि कि किसी भी स्टोरी के किसी एक पहलू को पकड़ने की बजाय हर पक्ष को अपनी बात कहने का मौका दिया जाता है, उसके बाद सभी के उत्तर प्रकाशित किए जाते हैं। 140 साल पुराने और 12 लाख प्रतियाँ रोज़ प्रकाशित करने वाले अख़बार की स्टोरी में यह सन्तुलन, यह निष्पक्षता पूरी तरह गायब हैं। केवल उस एनजीओ, वैदिक साइंस रिसर्च सेंटर, के निराधार, अनर्गल आरोपों को ऐसे छापा गया है मानो वह ब्रह्म-वाक्य हों।

कोई आँकड़े नहीं

एनजीओ दावा करता है कि पेड़ों के कटने से होने वाले ‘असली नुकसान’ की कभी भी भरपाई नहीं हो सकती- तब भी नहीं जब यह धूर्त एनजीओ खुद मानता है कि जगन्नाथ पुरी आगामी वर्षों में रथ-निर्माण के लिए जरूरी लकड़ी के लिए खुद पहले से पेड़ लगाता है। लेकिन यह कौन सा ‘असली नुकसान’ है, इसका क्या पैमाना है, इसे कौन नाप रहा है, कैसे नाप रहा है, इसका कोई भी हिसाब नहीं है। और हो भी नहीं सकता, क्योंकि ऐसा कोई ‘असली नुकसान’ है ही नहीं। एनजीओ को छपास की पिपासा है, और ‘द हिन्दू’ जैसे हिन्दूफ़ोबिक पत्रकारिता के समुदाय विशेष के अख़बार को कोई चाहिए जिसके हवाले से हिन्दूफ़ोबिक प्रोपेगैंडा फैलाया जा सके।

एनजीओ की भी कोई विश्वसनीयता नहीं

जिस एनजीओ, वैदिक साइंस रिसर्च सेंटर, का हवाला द (एंटी-)हिन्दू देता है, वह खुद भी विश्वसनीयता के किसी भी पैमाने पर खरा नहीं उतरता। जैसा कि ऊपर बताया गया है, वह ‘असली नुकसान’ का कोई आँकड़ा या प्रमाण नहीं देता, केवल दावा फेंक देता है। इसके अलावा भी इसकी कहानी में कई छेद हैं। द हिन्दू इसे ओडिशा स्थित एनजीओ बताता है, लेकिन इसके फेसबुक पेज पर अगर देखें तो यहाँ अधिकतर तमिल भाषा के अन्य लोगों के पोस्ट्स साझा होते हैं। न ही बहुत ज्यादा इस पेज के खुद के पोस्ट्स हैं, न ही इसकी कथित स्थानीय भाषा ओड़िया में पोस्ट्स हैं।

इसके अलावा इस लेखक ने जब इस एनजीओ की वेबसाइट पर जाने की कोशिश की तो कंप्यूटर के एंटी-वायरस सॉफ्टवेयर ने चेतावनी दी कि इस वेबसाइट पर जाने में निजी जानकारी के अनधिकृत प्रयोग, ऑनलाइन पहचान की चोरी (आइडेंटिटी थेफ़्ट) आदि का खतरा है। यह इस एनजीओ पर, और उसके ‘विरोध’ पर आधारित द (एंटी-)हिन्दू की रिपोर्ट पर और भी सवालिया निशान खड़े करता है।

हिन्दुओं की आस्था और परंपराओं पर सीधा हमला

हिन्दुओं की आस्था पर, उनकी परंपराओं पर हमला, उन्हें खत्म करने के लिए पृष्ठभूमि तैयार करना ही इस लेख का असली मकसद है, और उपयुक्त ज़मीन तैयार करने के बाद द (एंटी-)हिन्दू सीधे-सीधे यही करने पर उतर भी आता है। लेख में द (एंटी-)हिन्दू आगे लिखता है (संदिग्ध एनजीओ के हवाले से)- यह परंपरा आम लोगों के मानस में पेड़ों की महत्ता को कम करती है जो पेड़ों के परिपक्व होने में लगने वाले समय और उनके धरती के रक्षक होने को समझ नहीं पाते। यानि सीधे-सीधे रथयात्रा की परंपरा को अवैध साबित कर खत्म करने के लिए आह्वाहन किया जाता है।

अकेला अपवाद नहीं, पूरी शृंखला है

यह लेख कोई अपवाद नहीं, बार-बार आजमाया हुआ फार्मूला है हिन्दुओं की हर परंपरा को खत्म करने का- पहले सालों तक धीरे-धीरे उस पर परंपरा पर कभी समाजशास्त्रीय बहाने से, कभी पर्यावरण तो कभी लैंगिक-न्याय के नाम पर सवाल उठाओ, और जब ‘माहौल’ बन जाए, अपने प्रेशर ग्रुप तैयार हो जाएँ, तो न्यायिक याचिका डालकर उसे प्रतिबंधित कर दो।

सबरीमाला पर सालों तक मैगज़ीन्स आदि के जरिए सवाल उठा कर सामाजिक रूप से अमान्य करने का माहौल तैयार हुआ; पटाखों पर प्रतिबंध लगाने के पहले चुन-चुन कर केवल दीपावली के समय वायु प्रदूषण पर लेख लिखे गए ताकि ऐसा लगे कि एक दीपावली का त्यौहार ही सब लोगों के हिस्से की साल भर की ऑक्सीजन हड़प रहा है; दही-हांडी और जल्लीकट्टू को भी प्रतिबंधित करने के पहले ‘इकोसिस्टम’ ने उनपर सालों तक ‘चिंता जाहिर कर’ लोगों को इनमें भाग न लेने की एडवाइज़री जारी की, और अब काले दिल वाले इन असुरों की गिद्ध-दृष्टि पुरी के श्री कृष्ण के रथ पर है। यह हिन्दुओं पर है कि वह इन असुरों को रथ का पहिया तोड़ देने देते हैं, या इनके आसुरिक इरादों को ही रथयात्रा के नीचे कुचल देते हैं…

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