Tuesday, July 23, 2024
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कुत्ता, हविष्य, माँ सीता… ‘स्त्री विमर्श’ के नाम पर रामायण का उपहास, राहुल गाँधी के फैन की किताब से उद्धरण: जानें एक श्लोक दिखा कर कितना कुछ छिपाया

क्या गांधारी ने महाभारत के बाद शोक करते हुए श्रीकृष्ण को जो श्राप दिया, उसे 'स्त्री विमर्श' की श्रेणी में देखा जाएगा या नहीं? कुंती के हर एक आदेश का पाँचों पांडव पालन करते थे, इसे 'स्त्री विमर्श' में लाया जाएगा या नहीं? कई बार कटु वचन द्रौपदी ने युधिष्ठिर को भी कहा है उनकी अति-उदारता देख कर, इसे 'स्त्री विमर्श' में रखा जाएगा या नहीं? कैकेयी के एक वचन से इतिहास बदल गया, इसे 'स्त्री विमर्श' का हिस्सा मान कर इस पर विश्लेषण होगा या नहीं?

सोशल मीडिया पर विकास दिव्यकीर्ति का एक वीडियो वायरल हो रहा है, जिसमें वो रामायण में भगवान श्रीराम और माँ सीता को लेकर कुछ ऐसा कहते दिख रहे हैं, जिससे उनका विरोध हो रहा है। विकास दिव्यकीर्ति ‘Drishti IAS’ नामक कोचिंग संस्थान चलाते हैं और UPSC की तैयारी करने वाले छात्रों के बीच काफी लोकप्रिय भी हैं। ऐसे में ये निश्चित है कि वो क्लासरूम में क्या कहते हैं, इसका प्रभाव लाखों छात्रों की सोच पर पड़ता है।

तथ्य तो दे दिए, लेकिन रामायण को उपहास की विषय-वस्तु की तरह पेश किया

उससे भी ज्यादा असर इसका पड़ता है कि ये चीजें किस अंदाज़ में पेश की जा रही हैं। विकास दिव्यकीर्ति जहाँ ये चीजें बोल रहे थे, वहाँ उन्हें काटने वाला कोई नहीं था। उनकी क्लास थी, उनके छात्र थे, उनका संस्थान था, उन्हें बोलने का अधिकार था – उन्होंने बोला। जिस अंदाज़ में उन्होंने कहा कि राम ने खराब वाक्य बोला और फिर कहने लगे कि बोलते हुए उनकी जबान कट कर रह जाएगी, उसके बाद छात्रों की हँसी और फिर उनकी हँसी – धर्मग्रंथ से तथ्य देने का ये अंदाज़ तो सही नहीं ही था।

खास बात ये है कि दूसरे मजहब के धर्म ग्रंथों का ऐसा विश्लेषण वो बंद कमरे में भी नहीं कर सकते। जब बात आप राम, सीता और रामायण की कर रहे हैं तो आपका अंदाज़ भी करोड़ों लोगों की आस्थाओं को ध्यान में रखते हुए उसी अनुरूप होना चाहिए। हमारे धर्मग्रंथ विश्लेषण, बदलाव या आलोचना से परे नहीं हैं, लेकिन ऐसा करने के लिए इन्हें लिखने वालों जैसी योग्यता भी होनी चाहिए। विकास दिव्यकीर्ति विद्वान हैं, लेकिन लाखों छात्रों के मन में वो जो सोच छोड़ गए हैं – हो सकता है इसका असर आज से कुछ वर्षों बाद तब दिखे जब यही छात्र डीएम-एसपी बन कर अलग-अलग इलाकों में पदस्थापित होंगे।

सब पहले बात करते हैं कि माजरा क्या है। पूर्व IAS अधिकारी पुरुषोत्तम अग्रवाल की पुस्तक से उद्धरण देते हुए विकास दिव्यकीर्ति ने उल्लेख किया कि कैसे रावण को हराने के बाद भगवान राम ने माँ सीता से कहा, ये तुम्हारी ग़लतफ़हमी है कि मैंने ये युद्ध तुम्हारे लिए लड़ा है, बल्कि अपने कुल के सम्मान के लिए लड़ा है। विकास दिव्यकीर्ति इसके बाद कहते हैं कि इसके बाद भगवान राम ने कहा कि जिस तरह कुत्ते द्वारा चाटे जाने के बाद घी भोजन योग्य नहीं रहता, उसी तरह अब तुम (माँ सीता) मेरे योग्य नहीं हो।

विकास दिव्यकीर्ति का कहना है कि ऐसे प्रसंगों को गोस्वामी तुलसीदास ने अपने रामचरितमानस में नहीं लिया। उनका तर्क है कि प्रतियोगी परीक्षाओं में ‘स्त्री विमर्श’ पर छात्रों में लिखने की समझ के लिए ये चीजें बतानी ज़रूरी है। वैसे ‘तीन तलाक’ और ‘हलाला’ इस ‘स्त्री विमर्श’ में आता है या नहीं, हजारों वर्ष पूर्व जाने वाले बस डेढ़ हजार साल पहले जा सकते हैं या नहीं – इस पर बोलने की हिम्मत शायद ही किसी शिक्षक में हो।

विकास दिव्यकीर्ति या अवध प्रताप ओझा जैसे शिक्षक जानते हैं कि उन्हें डिजिटल लोकप्रियता ही इसीलिए मिली है कि उनका पढ़ाने अंदाज़ अलग है और उससे भी ज्यादा इससे कि वो शिक्षक होने के साथ-साथ ‘मोटिवेशनल स्पीकर’ भी हैं। आज विकास दिव्यकीर्ति के कोचिंग संस्थान में उनके द्वारा पढ़ाए जाने वाले विषय (Essay) के अलग से रुपए लिए जाते हैं और उसमें भी अधिकतर उनकी रिकॉर्डिंग्स चलाई जाती हैं। खैर, बाजार के समय में जब सब कुछ बाजार बन चुका है तो नैतिकता की उम्मीद बेमानी है।

राहुल गाँधी का फैन पुरुषोत्तम अग्रवाल, जिसके पुस्तक से ‘स्टार शिक्षक’ ने दिए उद्धरण

आगे बढ़ने से पहले पुरुषोत्तम अग्रवाल की ही बात कर लेते है, जिसका लिखा एक स्टार शिक्षक पढ़ा रहा है और हिन्दू देवी-देवताओं का पूरे क्लासरूम में मजाक बन रहा है। इस व्यक्ति का ट्विटर हैंडल देख कर ही इसकी मानसिकता का अंदाज़ा लग जाता है। खुद को साहित्य आलोचक कहने वाले ये व्यक्ति UPSC बोर्ड का सदस्य रह चुका है। ग्वालियर में जन्मे पुरुषोत्तम अग्रवाल JNU से MA और Ph.D कर चुके हैं। ‘राज्य सभा टीवी (अब संसद टीवी)’ पर आए एक शो ‘किताब’ में वो बतौर एंकर मौजूद रहते थे।

इस व्यक्ति ने कई पुस्तकें लिखी हैं। ट्विटर पर कॉन्ग्रेस पार्टी के ट्वीट्स को रीट्वीट करते हुए वो आपको मिल जाएँगे। ‘भारत जोड़ो यात्रा’ और राहुल गाँधी के भविष्य को लेकर भी चिंतित हैं वो आजकल। नेहरू-गाँधी के बड़े फैन हैं। राहुल गाँधी के भाषण उन्हें अच्छे लगते हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का मजाक बनाना और लिबरल गिरोह के पत्रकारों के साथ सुर मिलना इनका पेशा है। आजकल इस तरह के ‘बरोजगार’ लोग जो करते है, मोदी सरकार आने के बाद वो भी यही सब कर रहे।

लेकिन, सरकार भले ही भाजपा की हो पर सिस्टम तो ऐसे ही लोगों का है। तभी UPSC एस्पिरेंट्स उन्हें ही पढ़ रहे। स्टार टीचर उन्हें ही पढ़ा रहा। अब आप कहेंगे कि भला कोई व्यक्ति मोदी विरोधी ये देश विरोधी हो गया, या फिर राहुल गाँधी का फैन ही हो गया तो इससे उसका लिखा कैसे गलत हो गया? चूँकि विकास दिव्यकीर्ति ने ‘द लल्लनटॉप’ में आकर महाभारत और वाल्मीकि रामायण की पुस्तकें लाकर अपनी बात साबित की, इसीलिए उन्हें भी तथ्यों से जवाब देना बनता है।

महाभारत में रामोपाख्यान’: वो प्रसंग, जब मार्कण्डेय मुनि ने किया ‘कुत्ते और हविष्य’ वाले कथन का जिक्र

आगे हम इसी सवाल का जवाब देंगे। विकास दिव्यकीर्ति ने ‘कुत्ते और हविष्य’ वाली जो बात कही है, निश्चित तौर पर वो वाल्मीकि रामायण में नहीं है। वो महाभारत में है। महाभारत में एक प्रसंग है जब वन में से जयद्रथ द्रौपदी को हर ले जाता है और पांडव उससे युद्ध कर अपनी पत्नी को छुड़ाते हैं। वन में युधिष्ठिर जब खुद के भाग्य पर ग्लानि कर रहे होते हैं, तब मार्कण्डेय मुनि उन्हें रामायण की कथा सुनाते हैं। विकास दिव्यकीर्ति ने जो उद्धरण दिया, वो यहीं का है।

उन्होंने महाभारत के ‘वन पर्व’ के 291वें अध्याय से उद्धरण दिया। गोरखपुर स्थित गीताप्रेस से अनुवाद का भी जिक्र किया। सबसे पहली बात तो ये है कि लाखों श्लोक वाले किसी साहित्य में कहीं से एक श्लोक का हिंदी अर्थ पढ़ लेने से सब कुछ अंदाज़ा लग जाए, ये मुश्किल है। मार्कण्डेय जी जो कथा सुना रहे हैं, उसमें बताया गया है कि सीता को देख कर राम के मन में शंका आती है और तब वो ये बात कहते हैं। इसमें न घृणा है, न हीन भावना और न ही लिंगभेद, बल्कि ये अपनापन में ‘दारुण वचन’ है, जो शोक में कहा गया है।

वेद व्यास रचित महाभारत में ‘रामोपाख्यान’: मार्कण्डेय मुनि द्वारा सुनाई गई रामायण

संस्कृत साहित्य एक अन्य विद्वान हैं नित्यानंद मिश्रा, जो इस प्रसंग को समझाते हुए नाट्य के रसों के बारे में बताते हैं, जिसमें अस्थायी रूप से आने वाले ‘श्रृंगार रास’ के शंका भाव के बारे में बताया गया है। वो बताते हैं कि वियोग श्रृंगार रस इस प्रसंग में आता है, जबकि कुत्ते और हविष्य वाले श्लोक में ‘करुण भाव/रस’ है। व आगे समझाते हैं कि करुण रस का स्थायी भाव शोक होता है और इस वचन को सुन कर सीता और वहाँ मौजूद वानर-भालू को शोक हुआ।

वो साहित्य के बारे में समझाते हैं कि किसी बात को धीरे से कहने और चिल्ला कर कहने से शोक या क्रोध का पता चलता है। यहाँ अगर संस्कृत शब्द ‘अवलीढ़’ को देखें तो इसके कई अर्थ निकलते हैं। हिंदी में सुनने में ‘कुत्ते का चाटा हुआ’ काफी अपमानकारी लगता है, लेकिन इसी शब्द का अर्थ खाया हुआ, चबाया हुआ या छुआ हुआ भी होता है। ‘अलंकार’ के रूप में भी इसका अर्थ होता है, जिसका कोई लिटरल अर्थ नहीं भी निकल सकता है।

इसका एक अर्थ ये भी है – चारों तरफ से घिरा हुआ। अर्थात, इसका अर्थ ये भी समझा जा सकता है कि ‘कुत्तों से घिरा हुआ।’ यहाँ एक सबसे बड़ी बात देखिए। माँ सीता की तुलना यहाँ किस्से की गई है? हविष्य से। हविष्य पवित्र होता है, यज्ञ में अर्पण किया जाता है, अतः माँ सीता के लिए अपमानजनक शब्द नहीं कही गई है। यहाँ भगवान राम घृणा का भाव नहीं प्रकट कर रहे, बल्कि वो शोक कर रहे हैं, करुणा का भाव प्रकट कर रहे हैं।

संस्कृत साहित्य शास्त्र में रस का सिद्धांत संस्कृत साहित्य का विद्वान ही समझा सकता है, इसे किसी ने छुआ भी नहीं हो और हिन्दुओं को बदनाम करने के लिए एक श्लोक उठा कर ले आए – ये उतना सरल नहीं है। खुद मार्कण्डेय ऋषि कथा सुनाते हुए कह रहे हैं कि राम यहाँ ‘दारुण वचन’ कह रहे हैं, कोई क्रोध या घृणा नहीं दिखा रहे। शोक में एक साधारण व्यक्ति ये बातें कह सकता है, वो स्त्री हो या पुरुष। इन ग्रंथों में अनेकों प्रसंग में ऐसा हुआ है जब लिंगभेद के बिना एक-दूसरे को खरी-खोटी सुनाई गई हो।

‘स्त्री विमर्श’ और ‘Literal Meaning’ उठाने का चक्कर: धर्मग्रंथों की आलोचना कीजिए, पर उपहास नहीं

क्या गांधारी ने महाभारत के बाद शोक करते हुए श्रीकृष्ण को जो श्राप दिया, उसे ‘स्त्री विमर्श’ की श्रेणी में देखा जाएगा या नहीं? कुंती के हर एक आदेश का पाँचों पांडव पालन करते थे, इसे ‘स्त्री विमर्श’ में लाया जाएगा या नहीं? कई बार कटु वचन द्रौपदी ने युधिष्ठिर को भी कहा है उनकी अति-उदारता देख कर, इसे ‘स्त्री विमर्श’ में रखा जाएगा या नहीं? कैकेयी के एक वचन से इतिहास बदल गया, इसे ‘स्त्री विमर्श’ का हिस्सा मान कर इस पर विश्लेषण होगा या नहीं?

मार्कण्डेय मुनि जब ये कथा सुना रहे हैं, वो द्वापर युग का समय है। ये घटना त्रेता युग की है, जिसे वाल्मीकि ने मूल रूप से लिखा है। वेद व्यास द्वारा रचित महाभारत, जिसे उनके शिष्य वैशम्पायन सुना रहे हैं, उसमें मार्कण्डेय मुनि जो कह रहे हैं – ये वो प्रसंग है। क्या इसके ‘Literal Meaning’ को कहीं से उठा कर कहीं रख कर समझ लेना इतना आसान है? गोस्वामी तुलसीदास ने इसका जिक्र करना उचित नहीं समझा, उन्होंने नहीं लिया। ये फिर अलग काल की बात हो गई।

रामकथा के कई रूप हैं और देश, समय एवं समाजिक परिवेश के हिसाब से बदलते रहे हैं। पूरे एशिया की अलग-अलग संस्कृति में इसके अलग-अलग रूप हैं। ये भी छिपा नहीं है कि हमारे ग्रंथों से हजार वर्षों के इस्लामी एवं ईसाई शासन के काल में काफी छेड़छाड़ हुए। उनके उलटे-सीधे अर्थ निकाले गए। आज भी यही कार्य हो रहा है। ऐसे में विकास दिव्यकीर्ति द्वारा इसे उपहास का विषय-वास्तु बना कर पेश करना सही नहीं है, क्योंकि उपर्युक्त प्रसंग में ऐसा कुछ भी नहीं है कि किसी की जबान कट कर गिर जाए।

भगवान श्रीराम के चरित्र को जानने वाले ये समझते हैं कि वो सबसे पहले जनता के शासक हैं, उसके बाद उनके लिए परिवार आता है – लेकिन खुद दुःख सह कर भी वो किसी को नाराज़ नहीं होने देना चाहते। सौतेली माँ एवं पिता के लिए वनवास झेलते हैं। माँ सीता के हरण के बाद विरह में जो उनका क्रंदन है, वो किसी को भी दुःखी कर दे। प्रजा के लिए सर्वस्व त्याग करने को तैयार रहते हैं। राम ऐसे हैं, जिन्होंने कभी स्वयं के सुख के लिए कुछ नहीं किया।

जनता के बीच बुरी चर्चा से बचाने के लिए, एक शासक के साथ-साथ पति धर्म निभाने के लिए – ‘हृदय प्रिया’ के लिए राम ने किया सब

अगर समीक्षा ही करनी है तो ये भी तो हो सकता है कि राम ने जनता तरह-तरह की बातें न करे, इसीलिए ऐसा कहा। इस प्रसंग के दौरान सृष्टि के पाँचों तत्व और स्वयं ब्रह्मा आकर कहते हैं कि सीता पवित्र है और आप उन्हें ग्रहण कीजिए। राम राजा हैं, अतः निवेदन उन्हीं से किया जाता है, सारा पराक्रम उन्होंने ही दिखाया है। जहाँ तक राम के चरित्र की बात है, लक्ष्मण से लेकर वानर-भालू तक इसके साक्षी हैं। भगवान श्रीराम ने साधारण मनुष्य की तरह युक्ति लगा कर प्रजा को तरह-तरह की बातें करने से रोका, ताकि सीता को अपमान न झेलना पड़े – ये भी तो इस ‘दारुण वचन’ का कारण हो सकता है?

राम ने अपने कुल के लिए, अपने राज्य के लिए ये सब किया, अपनी पत्नी और खुद के लिए – इसका ये अर्थ भी तो हो सकता है। उन्होंने रावण का वध कर संसार का कल्याण किया, वो सिर्फ खुद के हित के लिए नहीं गए थे। एक शिक्षक इस प्रसंग को इस तरह से भी तो समझा सकता था न? एक शिक्षक ये भी बता सकता था कि राम ने इस प्रसंग में सीता के लिए देवताओं का प्रमाण लेकर न सिर्फ जनता और इतिहास को चुप कराया, बल्कि ये भी जता दिया कि उनके व्यक्तिगत हित से ज्यादा संसार का कल्याण महत्वपूर्ण है।

वाल्मीकि रामायण देखिए, अपनी ‘हृदय प्रिया’ सीता के लिए ‘जनवाद भय’ राम को सता रहा है। ‘लोग क्या कहेंगे’ – क्या ये आज भी हम सब नहीं सोचते? यहाँ प्रश्न इससे भी बड़ा है। ऐसा क्या किया जाए कि लोग मेरी जो सबसे प्रिय है, उसके बारे में खोटी बुद्धि न रखें। एक पति और एक शासक के बीच धर्मसंकट वाली स्थिति में राम जीवन भर गुजरते रहे। विकास दिव्यकीर्ति सीता विरह में राम का विलाप भी पढ़ाएँ, उनके भीतर के अंतर्द्वंद्व को भी बताएँ – एक श्लोक उठा कर उपहास उड़ा देना हमारी संस्कृति को कमजोर ही करेगा।

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अनुपम कुमार सिंहhttp://anupamkrsin.wordpress.com
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