Tuesday, August 9, 2022
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तीर्थ पुरोहितों और साधु-संतों की माँग पूरी, CM धामी ने भंग किया चार धाम देवस्थानम बोर्ड: उत्तराखंड सरकार नहीं लेगी मंदिरों का नियंत्रण

सीएम धामी ने कहा, "आप सभी की भावनाओं, तीर्थ-पुरोहितों, हक-हकूकधारियों के सम्मान एवं चारधाम से जुड़े सभी लोगों के हितों को ध्यान में रखते हुए श्री मनोहर कांत ध्यानी जी की अध्यक्षता में गठित उच्च स्तरीय कमेटी की रिपोर्ट के आधार पर सरकार ने चार धाम देवस्थानम बोर्ड अधिनियम वापस लेने का फैसला किया है।"

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की सरकार ने उत्तराखंड चार धाम देवस्थानम बोर्ड को भंग करने का निर्णय लिया है। काफी समय से पुरोहितों-पंडितों की ये माँग थी। उन्होंने घोषणा की है कि अब ये चार धाम देवस्थानम बोर्ड अस्तित्व में नहीं रहेगा। बता दें कि ‘देवस्थानम प्रबंधन अधिनियम और बोर्ड को लेकर पुरोहितों-पंडितों के मन में कई शंकाएँ थीं, जिनका निवारण करने का राज्य सरकार लगातार प्रयास कर रही थी। इसके समाधान के लिए एक उच्च स्तरीय समिति और एक मंत्रिमंडलीय उप समिति के गठन किया गया है।

इन समितियों की रिपोर्ट के बाद राज्य की भाजपा सरकार ने ये फैसला लिया। राज्य सभा के पूर्व सांसद मनोहरकांत ध्यानी की अध्यक्षता में समिति का गठन किया गया था। इसके बाद इस समिति की रिपोर्ट का अध्ययन करने के लिए राज्य के धर्मस्व मंत्री सतपाल महाराज की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय मंत्रिमंडलीय उप-समिति का भी गठन किया गया। कैबिनेट मंत्री सुबोध उनियाल और स्वामी यतीश्वरानंद को भी इस समिति में जगह दी गई थी। दो दिनों के भीतर संस्तुति सहित परीक्षण रिपोर्ट देने का निर्देश दिया गया था।

इस उप-समिति की बैठक सोमवार (29 नवंबर, 2021) को हुई थी, जिसमें रिपोर्ट के सभी बिंदुओं पर चर्चा की गई। पहले ही तीर्थ पुरोहितों-पंडितों को आश्वासन दिया गया था कि इस सम्बन्ध में नवम्बर 2021 के अंतिम दिन तक फैसला ले लिया जाएगा। माना जा रहा था कि साधु-संतों की शंकाओं का संधान न कर पाने और उनकी नाराजगी के कारण ही पिछले मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र और तीरथ सिंह रावत की कुर्सी चली गई थी। जनवरी 2020 में इसका गठन त्रिवेंद्र सिंह रावत ने ही किया था।

इस बोर्ड के गठन कर के राज्य सरकार ने 51 मंदिरों का प्रबंधन अपने हाथ में ले लिया था। केदारनाथ, गंगोत्री, यमुनोत्री और बद्रीनाथ – इन चारों को उत्तराखंड का चार धाम कहा जाता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब आदिगुरु शंकराचार्य की प्रतिमा का अनावरण करने और कई विकास परियोजनाओं के शिलान्यास/उद्घाटन के लिए केदारनाथ पहुँचे थे, उससे पहले भी साधु-संतों ने विरोध प्रदर्शन किया था, लेकिन राज्य सरकार उन्हें मनाने में सफल रही थी।

इसके बाद जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरु परब के दिन तीनों कृषि कानूनों को वापस लिए जाने का फैसला लिया, तब उत्तराखंड के मंत्री हरक सिंह रावत ने कहा था कि इसी तरह उनकी सरकार भी बड़ा दिल दिखाएगी। उन्होंने कहा था कि अगर ऐसा लगेगा कि ये आमजनों के हित में नहीं है तो इसे वापस ले लिया जाएगा। लेकिन, पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत मानते रहे हैं कि इससे देश भर के हिन्दुओं का भला होगा। उन्होंने दावा किया था कि कई पुरोहित-पंडित इसके समर्थन में भी हैं।

इसका ऐलान करते हुए मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा, “आप सभी की भावनाओं, तीर्थ-पुरोहितों, हक-हकूकधारियों के सम्मान एवं चारधाम से जुड़े सभी लोगों के हितों को ध्यान में रखते हुए श्री मनोहर कांत ध्यानी जी की अध्यक्षता में गठित उच्च स्तरीय कमेटी की रिपोर्ट के आधार पर सरकार ने चार धाम देवस्थानम बोर्ड अधिनियम वापस लेने का फैसला किया है।” सोशल मीडिया पर भी आम लोगों ने इसका स्वागत किया है और हिन्दू हित में इसे सही बताया है।

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ऑपइंडिया स्टाफ़
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कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

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