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2.5 लाख रेप पीड़िता, 87% आरोपित मुस्लिम और 149+ शहरों में फैला नेटवर्क: 219 पन्नों की ‘रेप गैंग इन्क्वायरी रिपोर्ट’ में सामने आई UK में दशकों से चल रही बर्बरता

रिपोर्ट के अनुसार, इन गिरोहों में अमूमन 87 प्रतिशत मुस्लिम आदमी शामिल थे और उनका शिकार ज्यादातर 'श्वेत' ब्रिटिश लड़कियाँ थीं। रिपोर्ट में कई पीड़िताओं ने बताया कि उन्हें 'व्हाइट ट्रैश' और 'काफिर' कहकर अपमानित किया जाता था।

ब्रिटेन (UK) में बरसों से ग्रूमिंग गैंग की समस्या पर रिपोर्ट जारी की गई है। यह 219 पन्नों की ‘रेप गैंग इन्क्वायरी रिपोर्ट’ एक ऐसी कहानी बताती है जिसे पढ़ना भी आसान नहीं है। रिपोर्ट का दावा है कि दशकों तक देश के अलग-अलग शहरों में संगठित गिरोह कमजोर और नाबालिग लड़कियों को निशाना बनाते रहे। रिपोर्ट के अनुसार, इन गिरोहों में 87 प्रतिशत मुस्लिम आदमी शामिल थे और उनका शिकार ज्यादातर ‘श्वेत’ ब्रिटिश लड़कियाँ थीं। जाँच में कहा गया कि यह कोई इक्का-दुक्का अपराध नहीं था, बल्कि पूरे देश में फैला हुआ एक संगठित नेटवर्क था जो वर्षों तक चलता रहा।

रिपोर्ट के मुताबिक लड़कियों को पहले दोस्ती, प्यार, उपहार, शराब, सिगरेट और नशे के जरिए फँसाया जाता था। कई गवाहियों में बताया गया कि 11 से 13 साल तक की बच्चियों को स्कूल के बाहर, देखभाल गृहों और सड़कों से टैक्सियों में ले जाया जाता था। इसके बाद उन्हें घरों, फ्लैटों, होटलों और रेस्टोरेंट तक पहुँचाया जाता था, जहाँ कई आदमी मिलकर बार-बार उनका बलात्कार करते थे। रिपोर्ट में कहा गया है कि कई पीड़िताओं को अलग अलग शहरों में ले जाकर बेचा गया, उनकी वीडियो बनाई गईं, ब्लैकमेल किया गया और उन्हें लगातार डर के माहौल में रखा गया।

सबसे चौंकाने वाला दावा पीड़िताओं की संख्या को लेकर है। रिपोर्ट के अनुसार कम से कम 2.5 लाख श्वेत लड़कियाँ इस तरह के अपराधों का शिकार हुईं। रिपोर्ट में कहा गया है कि इन मामलों में बार बार बलात्कार, सामूहिक बलात्कार, तस्करी, यातना, गर्भावस्था, जबरन गर्भपात, जबरन इस्लामी धर्मांतरण और जीवनरभर का मानसिक आघात शामिल था।

रिपोर्ट में कई पीड़िताओं ने बताया कि उन्हें ‘व्हाइट ट्रैश’ और ‘काफिर’ कहकर अपमानित किया जाता था। जाँच के अनुसार अपराधियों ने गैर मुस्लिम और खासकर गरीब श्वेत लड़कियों को शिकार बनाया। कुछ गवाहियों में यह भी आरोप लगाया गया कि लड़कियों पर इस्लाम कबूलने का दबाव बनाया गया, उन्हें मजहबी तौर-तरीकों का पालन करने के लिए मजबूर किया गया और कुछ मामलों में विदेश में ले जाकर बेच दिया गया।

लेकिन रिपोर्ट सिर्फ अपराधियों पर सवाल नहीं उठाती। उसका सबसे बड़ा आरोप उन संस्थाओं पर है जिनका काम बच्चों की सुरक्षा करना था। रिपोर्ट के अनुसार पुलिस, सामाजिक सेवाएँ, स्कूल, अस्पताल और स्थानीय प्रशासन के पास बार-बार चेतावनी के संकेत पहुँचे। कई मामलों में बच्चियों के साथ हुए अत्याचार के सबूत मौजूद थे, फिर भी कार्रवाई नहीं हुई। जाँच का निष्कर्ष है कि नस्लवाद के आरोप लगने के डर, राजनीतिक दबाव और संस्थागत विफलताओं ने अपराधियों को वर्षों तक खुला छोड़ दिया, जबकि हजारों बच्चियाँ लगातार शोषण का शिकार होती रहीं।

रिपोर्ट क्या है और इसे किसने तैयार किया

यह ‘रेप गैंग इन्क्वायरी रिपोर्ट‘ ब्रिटेन के ग्रेट यारमाउथ से सांसद रुपर्ट लोव के नेतृत्व में गठित स्वतंत्र जाँच समिति द्वारा तैयार की गई है। जाँच का मकसद ब्रिटेन में दशकों से सामने आ रहे ग्रूमिंग गैग्स और बाल यौन शोषण के मामलों की वास्तविक तस्वीर सामने लाना था।

रिपोर्ट तैयार करने के दौरान अदालतों के रिकॉर्ड, आधिकारिक और गैर-आधिकारिक जाँच रिपोर्टों, पीड़ितों की गवाही, विशेषज्ञों के बयान और विभिन्न शहरों से मिले साक्ष्यों का अध्ययन किया गया। जाँच समिति का दावा है कि उसने देशभर से बड़ी संख्या में पीड़ितों, गवाहों और संबंधित लोगों की गवाही दर्ज की।

219 पन्नों की इस रिपोर्ट में ग्रूमिंग गैंग्स के काम करने के तरीके, अपराधियों की पृष्ठभूमि, पीड़ितों के अनुभव, संस्थागत विफलताओं और राजनीतिक प्रतिक्रिया जैसे मुद्दों को विस्तार से शामिल किया गया है। रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि यह केवल कुछ स्थानीय मामलों की कहानी नहीं, बल्कि पूरे ब्रिटेन में फैला एक संगठित और लंबे समय तक चलने वाला संकट था।

कैसे लड़कियों को जाल में फँसाया जाता था?

रिपोर्ट के अनुसार ज्यादात मामलों में अपराध की शुरुआत किसी सुनसान जगह या हिंसा से नहीं, बल्कि दोस्ती से होती थी। गिरोह पहले ऐसी लड़कियों की तलाश करते थे जो भावनात्मक रूप से कमजोर हो, परिवार से दूर हों या किसी तरह की परेशानी से गुजर रही हों। उन्हें उपहार, पैसे, मोबाइल फोन, सिगरेट, शराब और नशीले पदार्थ देकर अपने करीब लाया जाता था।

जाँच में कहा गया है कि कई पीड़िताओं को यह विश्वास दिलाया गया कि अपराधी उनसे प्यार करते हैं और उनकी परवाह करते हैं। लेकिन एक बार भरोसा बन जाने के बाद हालात तेजी से बदल जाते थे। रिपोर्ट में दर्ज गवाहियों के मुताबिक लड़कियों को घरों, फ्लैटों, होटों, रेस्टोरेंट और टैक्सियों के जरिए अलग-अलग जगहों पर ले जाया जाता था, जहाँ उनका रेप किया जाता था।

(फोटो साभार: Rape Gang Inquiry Report)

रिपोर्ट में एक जगह कहा गया है कि लड़कियों को अकसर ‘passed between multiple adult men’ यानी कई वयस्क पुरुषों के बीच घुमाया जाता था। कई पीड़िताओं ने बताया कि एक बार गिरोह के कब्जे में आने के बाद उनके साथ बार-बार और कई लोगों द्वारा बलात्कार किया गया। जाँच के अनुसार विरोध करने पर मारपीट, धमकी, ब्लैकमेल और परिवार को नुकसान पहुँचाने की चेतावनी दी जाती थी।

ढाई लाख से ज्यादा लड़कियाँ बनीं शिकार, जुर्म करने वालों में अधिकतर पाकिस्तानी मुस्लिम

रिपोर्ट के अनुसार ब्रिटेन में कम से कम 2.5 लाख श्वेत ब्रिटिश लड़कियाँ ग्रूमिंग गैंग का शिकार बनीं। जाँच में कहा गया है कि इन पीड़िताओं के साथ बार-बार बलात्कार, सामूहिक बलात्कार, तस्करी, यातना, जबरन गर्भधारण, जबरन इस्लामी धर्मांतरण और गंभीर मानिक शोषण हुआ। रिपोर्ट का दावा है कि वास्तविक संख्या इससे भी कहीं अधिक हो सकती है।

अदालत के रिकॉर्ड और आधिकारिक जाँचों का हवाला देते हुए रिपोर्ट में बताया गया है कि ग्रूमिंग गैंग के मामलों में दोषी ठहराए गए लोगों में करीब 87 प्रतिशत के नाम मुस्लिम हैं। हालाँकि जाँच यह भी कहती है कि गिरोहों में शामिल अधिकांष लोग कभी दोषी ठहराए ही नहीं गए।

(फोटो साभार: Rape Gang Inquiry Report)

रिपोर्ट के मुताबिक इन नेटवर्कों में सबसे बड़ी संख्या पाकिस्तानी मूल के मुस्लिम आदमियों की थी। इसके अलावा कुछ मामलों में सोमाली, सीरियाई, ईरानी और तुर्की मूल के मुस्लिम आदमियों के नाम भी सामने आए। ऑक्सफोर्ड इस्लामी कांग्रेगेशन के इमाम डॉ. ताज हार्गे का हवाला देते हुए रिपोर्ट में कहा गया कि ग्रूमिंग गैंग में शामिल मुस्लिम आदमियों की वास्तविक संख्या 95 प्रतिशत हो सकती है।

पूरे ब्रिटेन में फैला था ग्रूमिंग गैंग नेटवर्क

रिपोर्ट के अनुसार ग्रूमिंग गैंग्स का एक जैसा मॉडल ब्रिटेन के दर्जनों शहरों और कस्बों में देखने को मिला। सांसद रूपर्ट लोव के नेतृत्व में हुई इस जाँच में ऐसे सबूत मिलने का दावा किया गया है, जिनसे पता चलता है कि यह नेटवर्क देश के लगभग हर हिस्से तक फैला हुआ था।

(फोटो साभार: Rape Gang Inquiry Report)

जाँच के मुताबिक कम से कम 149 स्थानीय प्रशासनिक क्षेत्रों में ऐसे मामलों के सबूत मिले हैं। रिपोर्ट का कहना है कि यह आँकड़ा दिखाता है कि समस्या किसी एक शहर या कुछ इलाकों तक सीमित नहीं थी, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर फैली हुई थी।

रिपोर्ट में कहा गया कि अदालतों के रिकॉर्ड, विभिन्न जाँच रिपोर्टों और गवाहों की गवाही से एक समान पैटर्न सामने आया। जाँच का निष्कर्ष है कि यह अलग-अलग स्थानीय विफलताओं की कहानी नहीं, बल्कि संगठित बाल यौन शोषण का ऐसा नेटवर्क था जो उत्तर से लेकर दक्षिणी तट तक बार-बार एक जैसे तरीके से संचालित होता रहा।

पीड़िताओं की प्रमुख गवाहियाँ

  • हर दिन यौन शोषण: कई महिलाओं ने बताया कि उनके साथ महीनों और वर्षों तक लगातार बलात्कार हुआ। एक पीड़िता ने कहा, “मेरे साथ हर दिन रेप हुआ, कभी-कभी तो दिन में कई बार भी।”
  • एक से दूसरे व्यक्ति तक पहुँचाया जाता था: गवाहियों के अनुसार लड़कियों को अलग-अलग घरों, होटलों, फ्लैटों और कारों में ले जाया जाता था। रिपोर्ट में कहा गया कि कई पीड़िताओं को वयस्क पुरुषों के बीच इधर से उधर किया जाता था।
  • नस्लीय और मजहबी गालियाँ: कई महिलाओं ने बताया कि उन्हें ‘व्हाइट ट्रैश’ और ‘काफिर’ कहकर तक अपमानित किया जाता था। गवाहियों में बताया गया कि गैर-मुस्लिम होने के कारण उन्हें नीचा दिखाया जाता था। कुछ गवाहियों में कहा गया कि गैर-मुस्लिम होने के कारण उन्हें नीचा दिखाया जाता था।
  • धर्म बदलने का दबाव: कई महिलाओं ने बताया कि उनकी तस्वीरें और वीडियो बनाकर उन्हें चुप रहने के लिए मजबूर किया गया। कुछ को परिवार को नुकसान पहुँचाने और जान से मारने तक की धमकियाँ दी गईं।
  • धमकी और ब्लैकमेल: कई महिलाओं ने बताया कि उनकी तस्वीरें और वीडियो बनाकर उन्हें चुप रहने के लिए मजबूर किया गया। कुछ को परिवार को नुकसान पहुँचाने और जान से मारने तक की धमकियाँ दी गईं।
  • शराब और नशे के जरिए नियंत्रण: पीड़िताओं के अनुसार उन्हें शराब, ड्रग्स और अन्य नशीले पदार्थ दिए जाते थे ताकि वे विरोध न कर सकें और अपराधियों के नियंत्रण में रहें।
  • मदद माँगने पर भी नहीं सुनी गई बात: कई महिलाओं ने कहा कि उन्होंने पुलिस, स्कूलों और सामाजिक सेवाओं से मदद माँगने की कोशिश की, लेकिन उनकी शिकायतों को गंभीरता से नहीं लिया गया। कुछ मामलों में उन्हें ही दोषी मान लिया गया।
  • जिंदगी भर का मानसिक आघात: गवाहियों में अवसाद, डर, आत्महत्या के विचार, रिश्तों में समस्याएँ और जीवनभर बने रहने वाले मानसिक घावों का बार-बार जिक्र मिलता है। रिपोर्ट में बताया गया कि इन अपराधों का असर पीड़िताओं पर आज भी बना हुआ है।

पुलिस, स्कूल और सामाजिक सेवाओं की विफलता

रिपोर्ट का कहना है कि यह सिर्फ अपराधियों की कहानी नहीं है, बल्कि उन संस्थाओं की विफलता की भी कहानी है जिनका काम बच्चों की सुरक्षा करना था। जाँच रिपोर्ट के अनुसार, पुलिस और अन्य सरकारी संस्थाएँ वर्षों तक यह जानती थीं कि बच्चियों के साथ क्या हो रहा है, लेकिन फिर भी समय रहते कार्रवाई नहीं की गई।

पुलिस को बार-बार शिकायतें मिलती रहीं, लेकिन कई मामलों में पीड़िताओं की बातों को नजरअंदाज कर दिया गया। रिपोर्ट में आरोप लगाया गया है कि कुछ मामलों में अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई करने के बजाय पीड़ित लड़कियों को ही अपराधी की तरह देखा गया, सबूत नष्ट हुए और कई ज्ञात बलात्कार आरोपित जमानत पर बाहर घूमते रहे।

(फोटो साभार: Rape Gang Inquiry Report)

सामाजिक सेवाओं को लेकर रिपोर्ट और भी गंभीर आरोप लगाती है। जाँच के मुताबिक कई बच्चियों को ऐसे बाल संरक्षण गृहों में रखा गया, जो बाद में शोषण और तस्करी के केंद्र बन गए। रिपोर्ट कहती है कि साफ संकेत मिलने के बावजूद कई मामलों को बंद कर दिया गया और उन लोगों के खिलाफ भी कार्रवाई की गई जिन्होंने इस समस्या को उजागर करने की कोशिश की।

स्वास्थ्य सेवाओं की भूमिका पर भी सवाल उठाए गए हैं। रिपोर्ट के अनुसार अस्पतालों और डॉक्टरों के पास 13 साल तक की बच्चियों में यौन हिंसा के संकेत, यौन संक्रमण, बलात्कार के कारण हुई गर्भावस्था और आत्महत्या के प्रयासों के रिकॉर्ड मौजूद थे। इसके बावजूद कई पीड़िताओं को बिना उचित सुरक्षा व्यवस्था, परामर्श या विशेष देखभाल के वापस उसी माहौल में भेज दिया गया, जहाँ उनका शोषण हो रहा था।

स्कूलों को भी चेतावनी के संकेत दिखाई दे रहे थे। रिपोर्ट में कहा गया है कि कई शिक्षकों ने स्कूल के बाहर बड़ी उम्र के पुरुषों को लड़कियों का इंतजार करते देखा, कुछ मामलों में स्कूल परिसर के अंदर ही बलात्कार की शिकायतें सामने आईं। लेकिन जाँच के अनुसार कई बार पीड़िताओं को सुरक्षा देने के बजाय उन्हें ही स्कूल से निकाल दिया गया या अनुशासनहीन छात्रा मान लिया गया।

(फोटो साभार: Rape Gang Inquiry Report)

रिपोर्ट में बताया गया कि राजनीतिक शुद्धता, नस्लवाद का आरोप लगने का डर और कुछ समुदायों का समर्थन खोने की आशंका ने बच्चों की सुरक्षा को पीछे धकेल दिया। रिपोर्ट में कहा गया है कि कई संस्थाओं ने समस्या का सामना करने के बजाय उससे बचने का रास्ता चुना, जिसका खामियाजा हजारों बच्चियों को भुगतना पड़ा।

रिपोर्ट की सिफारिशें और आगे क्या होगा?

रिपोर्ट का कहना है कि अब केवल पुरानी घटनाओं की जाँच करना पर्याप्त नहीं है। जाँच समिति ने पूरे देश में एक नई राष्ट्रीय सार्वजनिक जाँच शुरू करने की माँग की है, ताकि दशकों से चले आ रहे इस घोटाले की पूरी सच्चाई सामने आ सके और जिम्मेदार लोगों की पहचान की जा सके।

रिपोर्ट में सिफारिश की गई है कि ग्रूमिंग गैंग्स से जुड़े सभी मामलों की दोबारा समीक्षा की जाए और उन अपराधियों की फिर से जाँच हो जो कभी अदालत तक नहीं पहुँचे। इसके अलावा पुलिस, सामाजिक सेवाओं, स्कूलों और स्वास्थ्य विभाग की भूमिका की भी स्वतंत्र जाँच कराने की माँग की गई है, ताकि यह पता चल सके कि चेतावनियों के बावजूद कार्रवाई क्यों नहीं हुई।

(फोटो साभार: Rape Gang Inquiry Report)

जाँच समिति ने पीड़िताओं के लिए विशेष सहायता कार्यक्रम शुरू करने की भी सिफारिश की है। रिपोर्ट के अनुसार हजारों महिलाएँ आज भी मानसिक आघात, अवसाद और अन्य समस्याओं से जूझ रही हैं। इसलिए उन्हें लंबे समय तक मनोवैज्ञानिक, कानूनी और आर्थिक सहायता उपलब्ध कराई जानी चाहिए।

रिपोर्ट यह भी कहती है कि अधिकारियों और राजनीतिक नेताओं को अपराधियों की जातीय या धार्मिक पृष्ठभूमि से जुड़े तथ्यों को छिपाने के बजाय खुलकर सामने रखना चाहिए। जाँच के अनुसार समस्या की सही पहचान किए बिना उसे रोकना संभव नहीं होगा।

आगे क्या होगा, यह काफी हद तक ब्रिटिश सरकार और कानून प्रवर्तन एजेंसियों की प्रतिक्रिया पर निर्भर करेगा। रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि यदि इसकी सिफारिशों को लागू नहीं किया गया, तो हजारों पीड़िताओं को न्याय मिलने की संभावना और कमजोर हो सकती है। समिति का कहना है कि अब सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि क्या हुआ था, बल्कि यह है कि इतने वर्षों तक ऐसा होने क्यों दिया गया और भविष्य में इसे कैसे रोका जाएगा।

दशकों से ब्रिटेन में खतरा है ग्रूमिंग गैंग स्कैंडल

ब्रिटेन में 2002 के आसपास पहली बार ग्रूमिंग गैंग से जुड़े मामले उजागर हुए थे, जहाँ पाकिस्तानी मूल के पुरुषों पर इन नाबालिगों के शोषण के आरोप लगे थे। 2010 में यह ग्रूमिंग गैंग स्कैंडर राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बना, जब ब्रिटिश अखबार ‘द टाइम्स’ ने जाँच के बाद अपनी रिपोर्ट में इन बाल यौन शोषण के मामलों का खुलासा किया। उस रिपोर्ट में भी यह सामने आया कि अधिकतर आरोपित मुस्लिम थे और वे कमजोर एवं असुरक्षित परिस्थितियों में रहने वाली लड़िकयों को अपना शिकार बना रहे थे।

हाल ही में जून 2026 की शुरुआत में ब्रिटेन की संसद में भी दोबारा से यह मुद्दा उठा था। जब सांसद रुपर्ट लोव ने संसद में ग्रूमिं गैंग की कई पीड़ित महिलाओं और लड़कियों की गवाहियाँ पढ़कर सुनाईं। इन गवाहियों में भी 600-700 आदिमयों ने किया रेप, टूटी बोतलों के टुकड़ों से रेप, पुलिस ऑफिसर द्वारा रेप, नस्लीय आधार पर ब्रिटिश लड़कियों को निशाना बनाने जैसी बेहद दर्दनाक घटनाओं का जिक्र था।

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