Wednesday, December 2, 2020
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‘कबीर सिंह’ में जिनको मर्दवाद दिख रहा है: नकली समीक्षकों की समीक्षा

अर्जुन रेड्डी स्त्री विरोधी नहीं थी लेकिन कबीर सिंह है! हें हें हें! गैंग्स ऑफ़ वासेपुर कल्ट है और कबीर सिंह कबाड़ा! हें हें हें! मानोगे नहीं ना सुपर दोगलों!

एक चीज़ होती है “टाइटल” जिसका मलतब होता है कि परोसी जा रही चीज़ का बहुत बड़ा प्रतिशत टाइटल में समाहित है। “कबीर सिंह” नाम से पता तो चल रहा होगा कि कबीर सिंह नाम का किरदार। उसी के इर्द गिर्द होगा जो भी होगा। बाकी सब साइड में ही रहेंगे। ठीक ना!

अर्जुन रेड्डी की रीमेक है और उसके मुकाबले उन्नीस ही है। खैर… इधर कुछ मिलने वालों ने इस फिल्म के रिव्यू भेजे जिन्हें पढ़कर दिमाग हिल गया। जिसमें से सबसे ज़्यादा आकर्षित किया मुझे स्त्री-विरोधी शब्द ने। एक तो मुझे ये समझ नहीं आता कि आजकल हर किसी चीज़ में ये स्त्री-विरोधी (फर्ज़ी वाला) क्या एंगल है! मतलब हर कहीं, कभी भी। ना हो तब भी, जबरन! ज़बरदस्ती हर बात में ये एंगल ढूंढना और फिर पूरी बात का रुख मोड़कर रख देना सही नहीं है भाई।

एक किरदार लिखा गया, कबीर सिंह नाम का। किरदार कुछ यूँ है कि सनकी है। एंगर मैनेजमेंट की समस्या है उसे। नशा करता है। मेडिकल स्टूडेंट है। जो भी करता है शिद्दत से करता है। “होप इज गुड” उसका दर्शन है। कॉलेज छोड़कर जा रहा होता है और एक लड़की आती है, रुक जाता है। यहाँ आपको ये बात पकड़नी होगी कि उसे पहले किसी लड़की में दिलचस्पी नहीं होती है उस तरह की लेकिन एक लड़की आती है और वो अपना फैसला बदल लेता है। आपको ये बात एंड तक पकड़कर रखनी होगी क्योंकि जब आप उस लड़के को परवर्ट कहते हैं तब ये फैक्टर बीच में आएगा ही।

लड़का लड़की से प्यार करता है। पज़ेसिव होता है। केयर करता है। ध्यान रखता है लड़की का हर लेवल पर। जो भी करता है उसमें दोनों का कंसेंट रहता है। एक सीन ऐसा नहीं जहाँ लड़का लड़की के साथ ज़बरदस्ती कर रहा हो और लड़की ने विरोध किया हो। एक सीन ऐसा नहीं जहाँ लड़की असहज हुई हो और चेहरे से लगा हो।

एक संवाद है जहाँ नायक बोल रहा है कि, “चुप नहीं रहना चाहिए। चुप रहना आदत बन जाती है फिर।” इससे उसका व्यक्तित्व समझ में आ जाना चाहिए तब तक तो। ये दूसरी बार होता है फिल्म शुरू होने के बाद तक जहाँ आप कबीर सिंह के बारे में जान पाते हैं उसके डार्क शेड्स के अलावा।

हाँ तो आगे, प्यार होता है और प्यार में वो सब होता है जो होता ही है और होना ही चाहिए। प्यार में आदर्श मत ढूँढिए। वो आदर्श नहीं होता। वो रफ़ हो होता है जब तक किसी को नुकसान नहीं पहुँचा रहा। प्यार है आपकी सेल्फी नहीं जिसमें फिल्टर्स लगाकर दिखाया जाए। जो है सो है। प्यार महत्वपूर्ण है और रहेगा। भाई बिना पज़ेसिव हुए कौन-सा प्यार होता है एक तो कोई महान आत्मा मुझे ये समझाए और पजेसिव हो जाए तो स्त्री-विरोधी कैसे हो जाए, दूसरी बात ये समझाए।

स्पेस नाम की चीज़ को प्यार में इतना हाइप दिया गया है कि अधिकार को गुलामी का नाम दिया गया और अब अगर लड़का अपनी प्रेमिका को प्यार में दुपट्टा सही करने को बोल दे तो उसे गुलामी कहना आम बात हो गयी है। पेरेंट्स कह दें तो वही बात गुलामी से शिफ्ट होकर उनका कंसर्न बन जाती है। है ना!

तो स्त्री विरोधी है ये फिल्म! अच्छा! मेरी मति थोड़ी कम साथ देती है शायद इसलिए इसको पॉइंट्स से समझाती हूँ, आइए आप भी मेरे साथ अगर वक़्त है तो।

1. संभवतः बॉलीवुड में मैंने पहला ऐसा सीन देखा है जहाँ लड़का अपने दोस्त से अपनी प्रेमिका के पीरियड्स की तकलीफ और दर्द पर बात कर रहा है कि, “यार तुझे पता है जब पीरियड्स होते हैं तब उसे कितना दर्द होता है। गर्म पानी का बैग रखना होता है उसकी थाई पर वगैरह वगैरह, समझ रहा है तू मेरी बात? और ये स्त्री-विरोध है! वाह। यहाँ पतियों और प्रेमियों को अपनी पत्नियों और प्रेमिकाओं के पीरियड्स कब आए कब गए हवा नहीं लगती और ये बात कर रहे हैं। गज़ब।

2. लड़का लड़की को थप्पड़ मारता है ये बात उछाल दी गई लेकिन एंड में लड़की लड़के को एक के बाद एक थप्पड़ जड़ती है जिसे वो गर्दन झुकाकर प्यार से सहता है, ये बात नहीं दिखी! अब ये पॉइंट्स लिखा है तो बात ये होने लगेगी कि अच्छा! तो मतलब थप्पड़ मारना सही है? जबकि ये मैंने कहा ही नहीं, मैंने तो ये ध्यान दिलाया कि लड़की वाले थप्पड़ आप मिस कर गए पॉपकॉर्न के चक्कर में।

3. लड़का लड़की को प्रॉपर्टी समझता है! गलत। कहीं नहीं ऐसा। वो उसकी परवाह करता है। अपने साथ रखकर उसकी पढ़ाई में मदद करता है, उसकी चोट ठीक करता है। लड़की सहज होती है सहमति रखती है। नहीं रखती है तो बताएँ।

ये पॉइंट्स मैं इसलिए गिना रही हूँ ताकि आपकी एक साइड की आँख में जो इन्फेक्शन हो रखा है वो सही हो जाए और आप दोनों आँखों से देख पाए।

खैर, मेरे मुद्दे कुछ और हैं उस पर आती हूँ।

कबीर सिंह आपके संस्कारी समाज का रफ़ चिट्ठा है बिना फ़िल्टर का, जिसमें लड़का जैसा है वैसा ही दिखता है। जो-जो उसके साथ घटता है उसके बाद उसके व्यक्तित्व में आए परिवर्तनों से वो खुद जूझ रहा है। अब चूँकि टाइटल में कबीर सिंह ही है तो प्रीति सिक्का के खाते में कम डायलॉग क्यों हैं, ये मूर्खता वाला सवाल ना कीजिए।

जो ज्ञान की गंगा कबीर सिंह को लेकर बहाई जा रही है उसे देखकर तो डायरेक्टर और एक्टर्स ने भी एक्स्ट्रा दो बार फिल्म देख डाली होगी कि यार कहीं सच में औरतों पर अत्याचार तो नहीं बना दिया!

एक बात बताइए, सिनेमा पहले आया कि समाज! पहले चेहरा आया कि दर्पण! तो कौन किसका प्रभाव है ये आपको समझ नहीं आता क्या? आप प्रक्रिया को परिणाम और परिणाम को प्रभाव कैसे बोल सकते हैं, क्या लॉजिक क्या है आपका?

समाज पहले बना ना! तो फिर इस फिल्म में ऐसा क्या दिखाया गया है जो पहले से आपके समाज में भयंकर रूप से मौजूद नहीं है? अतिरेक से समस्या हुई आपको! हम्म। तो वो तो सिनेमा में होगा ही। मसाला डाला जाएगा ना, नहीं तो आप जाएँगे ही क्यों!

गैंग्स ऑफ़ वासेपुर कल्ट है और कबीर सिंह कबाड़ा!

वैसे इसमें स्टार्टिंग में दिखाया गया है ना कि लड़का एंगर मैनेजमेंट की समस्या से ग्रसित है! तो अब मुझे ये जानना है कि एंगर मेनेजमेंट से जूझ रहा किरदार किस तरह का व्यवहार करेगा? संतुलित! नहीं ना! सनकी इन्सान किस तरह से पेश आता है! फ़िल्टर लगाकर! नहीं ना! और किसने कहा कि लड़कियों को कबीर सिंह जैसा प्रेमी ही चाहिए या नहीं चाहिए? ये आप और हम कैसे तय करेंगे और क्यों करेंगे?

कबीर सिंह से रातों रात सब बिगड़ेंगे। गर्लफ्रेंड को प्रॉपर्टी समझेंगे। शराब, सिगरेट, ड्रग्स में नहाएँगे, रेंडमली किसी को भी रास्ते चलते पीट पिटा देंगे? अब सब कबीर सिंह बनकर घूमेंगे? अच्छा मतलब सब एमबीबीएस भी करेंगे? हैं? मतलब कुछ भी। कुछ भी। अबे! कुछ भी।

स्टार्टिंग में ही एक चीज़ और दिखाई गई है जब कबीर की दादी बोलती है “होप इज़ गुड और कबीर को यकीं है कि उसकी गुड़िया कहीं नहीं गई है वो उसे ढूँढ लेगा।” इसका मतलब अंत तक भी समझ नहीं आया क्या इतनी लम्बी फिल्म में? नहीं आया होगा क्योंकि स्त्री-विरोधी कोहरा छंटे तब ना कुछ दिखे।

सिंपल है बाबा, एक लड़का है प्यार करता है। सब कुछ स्वाभाविक सा है। उसके साथ हुए गलत को लेकर लड़ जाता है। उसमें कमियाँ है वो परफेक्ट नहीं है, जो कोई भी नहीं होता।

क्या अपने प्यार के लिए लड़ना नहीं चाहिए? लड़का अगर अपने या लड़की के घरवालों की बात मानकर लड़की को छोड़ दे तो कायर और ना माने उनकी बात तो बागी, हिंसक? मतलब दोनों तरफ से आप ही खेल लो यार।

डायरेक्टर ने आपको बोला क्या कि मैंने अखंड रामायण का पाठ रखा है, सपरिवार पधारना! तो फिर वहाँ जाकर कौन-से आदर्श खोज रहे हैं आप? ए सर्टिफिकेट का मतलब नहीं बुझाता आपको?

कौन-सी ऐसी चीज़ है जिसको इस फिल्म में जस्टिफाई किया गया है? क्या इसमें लगातार कबीर को उसकी आदतों की वजह से लताड़ नहीं लगाई गई है? ट्रेलर से समझ नहीं आया समझदारों को कि डार्क शेड की सनकी मिजाज़ के किरदार की फिल्म है?

परवर्ट कैसे हुआ लड़का? प्यार के नाम पर वो किसको ठगता है ये जानना है मुझे। वो एक्ट्रेस को अप्रोच करता है साफ़ बोलकर कि फिजिकल होना है प्यार-व्यार कुछ नहीं और वो लड़की तैयार हो जाती है यानी कि वो लड़की क्या हुई इस लॉजिक के हिसाब से? मासूम! अब आप इस पर घेरेंगे कि अच्छा! तो मतलब लड़का किसी के भी साथ सोए कोई दिक्कत नहीं! अब मैं यहाँ स्पून फिडिंग नहीं करवाऊँगी, कम से कम धूर्तों को तो बिल्कुल नहीं।

एक सीन है जहाँ वो एक्ट्रेस कबीर के कपड़े प्रेस कर रही है और वो चिढ़कर अपने दोस्त से बोलता है, “यार मुझे पसंद नहीं कि कोई मेरे लिए ये सब करे। मुझे अच्छा लगता था ये सब करना प्रीति के लिए।” अब ये दिखा कि नहीं आपको? कितनी छोटी छोटी चीजें जो सबसे बड़ा इम्पेक्ट रख रही हैं वो सब अपने छोड़ दी और उठाकर लाए अपने मतलब की चीज़। क्यों?

लड़का जहाँ जाता है अपनी प्रेमिका को ढूँढ़ता है। एक फेज़ होता है लाइफ का और अब आती है वो तीसरी बारी जहाँ लड़का अपनी माँ से कहता है कि, “माँ समझो न मेरी लाइफ का एक फेज़ चल रहा है।” होता है भाई एक फेज़ लाइफ का, वो भी तब जब रिश्तों में हारता है इंसान। तब संतुलन हिलता है दिल का, दिमाग का, व्यक्तित्व के हर एक पहलू का। सही गलत का फर्क सबसे पहले धुंधला पड़ता है उस पर भी तब जब नशा चढ़ा रहता हो सारा वक़्त। वो अपने आप को जिलाए रखने के लिए सेल्फ डेसट्रक्टिव मोड में लाकर उल जुलूल करने को बाध्य रहता है और जो कि पूरी तरह से गलत ही होता है। ये है कबीर सिंह का किरदार। ये सारी चीजें हरगिज़ जस्टिफाई नहीं की जा सकती लेकिन ये संभावनाएँ तो हैं ना!

हाउ कैन यू थिंक कि नशे का आदि सनकी इंसान समाज को आदर्श देगा? हाउ कुड यू? वही बात की मछली को उसके पेड़ पर चढ़ने की काबिलियत से नापना है तो आपको इलाज की ज़रूरत है भाई।

चौथी बारी तब आती है जब वो अपने दोस्त से पूछता है कि “ये कास्ट वास्ट कौन सिखाता है यार ये सब? क्या है ये सब! अरेंज मैरिज में प्यार होता है क्या या फिर सुहागरात का सोचकर ही एक दूसरे पर कूद जाते हैं?” अगर एक सनकी आदमी ऐसे सवाल पूछता है तो फिर इस दुनिया का हर आदमी सनकी क्यों ना हो? मैं तो खुद ऐसी हूँ।

जब किरदार सनकी है तो गीता पाठ नहीं पड़ेगा। व्हॉट डू यू वॉन्ट? हम साथ साथ हैं की टीम इन कबीर सिंह?

ड्रग्स, शराब, सिगरेट, हिंसा निश्चित और निर्विवाद रूप से बेहद ख़राब चीज़ें हैं और वो सबको पता है। आपको भी तो। या आप ये फिल्म देखते ही ये सब पीने लगे? अगर नहीं तो दूसरों की समझदारी पर शक क्यों?

मतलब एक सिनेमा बना, जिसमें शाहिद की अल्टीमेट एक्टिंग गई तेल लेने, ये संस्कारी समाज का “रैंकिंग डिसऑर्डर” पहले कूद गया। ऐसे जज करेंगे आप?

फिल्म है फिल्म और कोई महान फिल्म नही है। आदमी तीन घंटे मनोरंजन के लिए जाता है वरना ज्ञान तो इधर फेसबुक पर भी घणा पसरा है। संस्कारों की खेती इधर वैसे ही बिना ब्रेक के हो रही है। ऐसे जज कीजिएगा तो बॉलीवुड, टाॅलीवुड, हॉलीवुड सब बंद करना पड़ जाएगा।

मैसेज चाहिए इनको! तो नैतिक शिक्षा की क्लास में जाइए न, ए सर्टिफिकेट की फिल्म देखने काहे जा रहे?

हर मिनट होते बलात्कार वाले समाज के लोग इन फिल्मों से बिगड़ रहे हैं? जबकि सदियों से घरों में रामायण रखी है लेकिन एक पेज ना खुलता इनसे। बिल्कुल फिल्मों का प्रभाव होता है समाज पर लेकिन माइंड इट कि फिल्में खुद समाज का जीता जागता प्रभाव है। समाज ने कबीर सिंह पैदा किए हैं फिल्मों ने तो एक्टिंग करवाई है।

कबीर सिंह कोई महान नायक नहीं है। प्यार करता है और उसके लिए लड़ना जानता है बाकी सब उसके किरदार की कहानी है। बाकि क्या बात करनी होती है! संगीत अच्छा है। कॉपी रीमिक्स के ज़माने में कुछ मौलिक गीत है कुछ अर्जुन रेड्डी का ही बैकग्राउंड संगीत लिया गया है। कुछ सीन एडिट किए जा सकते थे और अर्जुन रेड्डी वाले ही रहते तो बेहतर था। शाहिद अपने किरदार से हिले नहीं हैं आपको भी नहीं हिलने देंगे। खैर..

एक किरदार रचा जाता है सिनेमा के लिए और उसको वैसा का वैसा उतारा जाता है परदे पर। डायरेक्टर आपके मूड और संस्कारों के हिसाब से नहीं बनाएगा। ऐसे तो कभी कुछ भी नहीं बन पाएगा। फिल्म को ए सर्टिफिकेट मिला है। सोच समझकर जाइए ना। हर चीज़ की एक काबिल जगह होती है। नैतिक शिक्षा चाहिए तो किताबों का रुख करें, प्रेरणा चाहिए तो मोटिवेशनल क्लासेस जॉइन करें। और उसको समाज की भलाई में किस तरह लाया गया उस पर मुझे टैग करके निबंध लिखें। आई वुड लव टू रीड बेबीज़।

फिर भी इस फिल्म से ही सन्देश चाहिए तो वो है ये कि प्यार कीजिए तो उसके लिए लड़िए। घरवाले नहीं मानेंगे टाइप का टाइमपास मत कीजिए। छोड़ देने के बाद इन्सान की क्या हालत हो सकती है उस पर भी गौर कीजिए। उसकी बर्बादी की ज़िम्मेदारी कौन लेगा?

जाते जाते एक दिलचस्प बात बता दूँ कि अर्जुन रेड्डी स्त्री विरोधी नहीं थी लेकिन कबीर सिंह है! हें हें हें!

मानोगे नहीं ना सुपर दोगलों!

एंड अफ्कोर्स मासूमों! नशा कोई भी हो चेतावनी के साथ आता है। नहीं भी आता हो तब भी मुझे आपकी समझदारी पर कोई शक नहीं। ये एक विशुद्ध मसाला फिल्म है। बात बस ये है। झूठ मत फैलाइए।

और जो ये पूछ रहे कि आपको ऐसा प्रेमी मिले तब क्या हो? तो तब ये हो कि वो लड़का प्रेमी था तब ऐसा नहीं था, प्रेम के चले जाने के बाद सेल्फ डेसट्रकटिव मोड में आ जाता है! उसकी ज़िम्मेदारी कौन लेगा भाइयों और भाइयों की बहनों?

इस फिल्म में बेवफा कोई नहीं है। एक सीन है बस उसी की वजह से गलतफहमियाँ होती है और फिर ये सब। खैर।

लेखिका: भारती गौड़

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