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गणतंत्र दिवस को बनाया शोक दिवस, हिंदी पर की घटिया राजनीति और 70+ छात्रों की मौत: जानें कैसे 61 साल पहले भाषाई घृणा फैलाकर DMK आई सत्ता में, अब फिर से है क्या वही प्रयास?

डीएमके ने छात्रों को आगे करके राजनीतिक फायदा उठाया, जबकि कॉन्ग्रेस सरकार ने स्थिति को सही से नहीं संभाला। नतीजा 1967 में डीएमके की सत्ता और कॉन्ग्रेस का स्थायी कमजोर होना रहा।

26 जनवरी 1965 का दिन। पूरे देश में गणतंत्र दिवस की धूम थी। दिल्ली में परेड चल रही थी, तिरंगा लहरा रहा था, लोग उत्साह से भरे थे। लेकिन मद्रास (आज का तमिलनाडु) में माहौल बिल्कुल अलग था। सुबह का आकाश उदास था, काले झंडे लहरा रहे थे, और सड़कों पर युवा छात्रों की भीड़ थी। यह दिन उत्सव का नहीं, शोक का बन गया। हिंदी को आधिकारिक भाषा बनाने के विरोध में शुरू हुआ आंदोलन इतना उग्र हो गया कि कई नवयुवकों ने अपनी जान गँवा दी। कई पुलिस गोलीबारी में मारे गए, कई ने आत्मदाह किया।

आधिकारिक आँकड़ों में करीब 70 मौतें दर्ज हैं, लेकिन गवाहों और कार्यकर्ताओं का कहना है कि संख्या इससे कहीं ज्यादा थी। यह एक अनर्थ था, जो गणतंत्र दिवस के दिन हुआ। यहाँ दशकों पहले छात्रों का जो बलिदान हुआ, वो भाषा के नाम पर राजनीति की भेंट चढ़ गया। आज दशकों बाद हमें उस समय को याद करना चाहिए, ताकि समझ सकें कि कैसे एक भाषाई मुद्दे को राजनीतिक हथियार बनाकर युवाओं की जिंदगियाँ दाँव पर लगा दी गईं।

ये मामला सिर्फ हिंदी समर्थन या विरोध का नहीं है। यह मामला उस राजनीति से जुड़ा है, जिसमें डीएमके ने हिंदी विरोधी आंदोलन की आड़ में युवाओं को आगे कर दिया और कॉन्ग्रेस सरकार ने इसे सही से संभाला नहीं। डीएमके ने इसे उत्तर भारत बनाम दक्षिण भारत का रंग दे दिया, जबकि कॉन्ग्रेस ने अपने विरोध को हिंदी विरोध से जोड़कर सत्ता बचाने या हासिल करने की कोशिश की। नतीजा? निर्दोष छात्रों की मौतें, राज्य में अराजकता और लंबे समय तक राजनीतिक बदलाव।

तमिलनाडु में एंटी हिंदी जड़ें आजादी से पहले की

आंदोलन की जड़ें पुरानी थीं। स्वतंत्रता से पहले ही, 1937 में मद्रास प्रेसिडेंसी में कॉन्ग्रेस सरकार ने सी. राजगोपालाचारी के नेतृत्व में स्कूलों में हिंदी अनिवार्य की थी। तब भी विरोध हुआ था और सरकार को पीछे हटना पड़ा। संविधान सभा में भी टीटी कृष्णमाचारी जैसे नेताओं ने चेतावनी दी थी कि भाषाई साम्राज्यवाद देश की एकता को खतरे में डाल सकता है। ऐसे में साल 1950 में लागू हुए संविधान में मुंशी-अयंगार फॉर्मूला अपनाया गया, हिंदी को आधिकारिक भाषा बनाया गया, लेकिन अंग्रेजी को 15 साल तक सहायक भाषा के रूप में रखा गया।

यह अवधि 26 जनवरी 1965 को खत्म हो रही थी। हिंदी बेल्ट के नेता इसे हिंदी की जीत मानते थे। लेकिन दक्षिण और खासकर तमिलनाडु में इसे भाषाई दबदबा और सांस्कृतिक हमला समझा गया। छात्रों को डर था कि सिविल सेवा परीक्षाएँ हिंदी में हो जाएँगी और गैर-हिंदी भाषी नौकरियों से बाहर हो जाएँगे।

डीएमके ने छात्रों की बलि चढ़ाकर की राजनीति

साल 1964 से ही तनाव बढ़ रहा था। डीएमके के नेता सीएन अन्नादुराई ने बड़े प्रदर्शन शुरू किए। छात्र संगठन भी सक्रिय हो गए। डीएमके ने इसे ‘शोक दिवस’ घोषित किया। मद्रास के कॉन्ग्रेसी मुख्यमंत्री भक्तवत्सलम ने चेतावनी दी कि गणतंत्र दिवस को शोक दिवस मानने वाला देशद्रोही है। अन्नादुराई और कई डीएमके कार्यकर्ताओं को नजरबंद कर लिया गया। सरकार को लगा कि आंदोलन सिर्फ एक पार्टी का है और दब जाएगा। लेकिन यह गलतफहमी थी। असली ताकत छात्रों में थी। डीएमके ने छात्रों को आगे कर दिया और आंदोलन की आड़ में राजनीतिक फायदा उठाने की कोशिश की।

मदुरै जुलूस रोकने के लिए कॉन्ग्रेसियों ने की थी हिंसा

25 जनवरी को मदुरै में छात्रों ने जुलूस निकाला। उनके हाथों प्लेकार्ड थे- ‘हिंदी कभी नहीं, अंग्रेजी हमेशा!’ वे संविधान की उन प्रतियों को जलाने वाले थे, जिनमें हिंदी को आधिकारिक भाषा बनाने का प्रावधान था। कॉन्ग्रेस कार्यकर्ताओं से झड़प हुई। छोटी सी झड़प जल्दी ही दंगे में बदल गई। पत्थर चले, बसें जलाई गईं, रबर जलने की तेज गंध फैल गई। खबर पूरे राज्य में फैली और हिंसा भड़क उठी। कई प्रदर्शनकारी पुलिस से भिड़ंत में मारे गए, कई ने आत्महत्या कर ली।

26 जनवरी को मद्रास में काले झंडे लहराए गए। छात्र सड़कों पर थे। रेल की पटरियाँ ब्लॉक की गईं, रेलवे संपत्ति जलाई गई। परिवहन ठप हो गया। आंदोलन फरवरी तक चला। छात्रों ने ‘एंटी-हिंदी एजिटेशन काउंसिल’ बनाया, जो कॉलेजों के छात्रों को एकजुट करता था। हिंसा चरम पर पहुँच गई। पुलिस फायरिंग में कई मौतें हुईं। दो केंद्रीय मंत्रियों सी. सुब्रमण्यम और ओवी अलागेसन ने इस्तीफा दे दिया। उन्होंने प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री से कहा कि वे ऐसी सरकार में नहीं रह सकते जो अपने लोगों से लड़ रही हो।

1967 में अंग्रेजी को मिल गई स्थाई जगह

दिल्ली में शास्त्री और गृह मंत्री गुलजारीलाल नंदा कानूनी दाँव-पेंच में उलझे थे। तभी राजनीतिक साहस की कमी थी। तब सूचना एवँ प्रसारण मंत्री रहते हुए इंदिरा गाँधी ने तमाम प्रोटोकॉल तोड़ डाले और सीधे मद्रास पहुँच गई। उन्होंने प्रदर्शनकारियों से बात करके बिना सरकार से सलाह लिए ही प्रदर्शनकारियों की बातें मानते हुए अंग्रेजी को बनाए रखने का आश्वासन दे दिया। हालाँकि फरवरी में प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने खुद संसद में आश्वासन दिया कि अंग्रेजी अनिश्चित काल तक सहायक भाषा रहेगी। यह 1967 के आधिकारिक भाषा अधिनियम संशोधन में औपचारिक हो गया। अंग्रेजी तब तक रहेगी, जब तक सभी गैर-हिंदी राज्य सहमत न हों – यानी लगभग हमेशा के लिए।

कॉन्ग्रेस हमेशा के लिए हो गई सत्ता से बाहर

यह समझौता किसी की पूरी जीत नहीं था, लेकिन भारत की बहुलता को मान्यता दी। हिंदी को बढ़ावा मिलेगा, लेकिन थोपा नहीं जाएगा। लेकिन इसकी कीमत क्या थी? दर्जनों युवा मारे गए। डीएमके ने इस आंदोलन को राजनीतिक हथियार बनाया। हिंदी विरोध को उत्तर-दक्षिण विभाजन का रूप दिया। छात्रों को आगे कर, खुद पीछे रहकर फायदा उठाया। कॉन्ग्रेस सरकार ने भी गलतियाँ कीं- पहले प्रदर्शनों को दबाने की कोशिश, फिर देर से समझौता।

नतीजा? 1967 में डीएमके सत्ता में आई। कॉन्ग्रेस तमिलनाडु में हमेशा के लिए कमजोर हो गई। आज तक वहाँ कॉन्ग्रेस अकेले चुनाव नहीं जीत पाई। डीएमके और एआईएडीएमके के बीच सत्ता घूमती है और कॉन्ग्रेस किसी न किसी की गठबंधन की पिछलग्गू साथी बनकर रह जाती है।

तब के दुश्मन अब बने स्थाई साथी

आज डीएमके और कॉन्ग्रेस तमिलनाडु में साथ हैं। दोनों एक-दूसरे के बिना नहीं चल सकते। लेकिन उस समय की राजनीति ने क्या किया? नवयुवकों को बलिदान का मोहरा बना दिया। हिंदी विरोध की आड़ में क्षेत्रीय भावनाएँ भड़काईं और सत्ता हासिल की। हम एंटी-हिंदी आंदोलन के उस उग्र रूप का विरोध करते हैं, जिसमें निर्दोष जिंदगियाँ गईं। हिंदी थोपना गलत होता (हालाँकि ऐसा था नहीं), लेकिन आंदोलन को इतना हिंसक बनाना, छात्रों को आगे करना और मौतों को राजनीतिक सीढ़ी बनाना भी गलत था। कॉन्ग्रेस ने इसे सही से नहीं संभाला, डीएमके ने फायदा उठाया।

अब भी हिंदी विरोध को राजनीतिक हथियार बनाए हुए है DMK

हालाँकि डीएमके इस मुद्दे को अब भी हथियार की तरह ही इस्तेमाल कर रही है। बीते रविवार यानी 25 जनवरी 2026 को ‘तमिल भाषा शहीद दिवस’ पर मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने फिर वही पुराना राग अलापा।

स्टालिन ने सोशल मीडिया पर लिखा– “भाषा युद्ध बलिदान दिवस: तब और अब, हिंदी के लिए यहाँ कोई जगह नहीं है! एक ऐसा राज्य जो अपनी भाषा से जान से ज्यादा प्यार करता था, उसने हिंदी थोपे जाने के खिलाफ लड़ाई लड़ी। हर बार जब इसे थोपा गया, तो उसी जोश से लड़ा। इसने उपमहाद्वीप में अलग-अलग भाषाई राष्ट्रीयताओं के अधिकार और पहचान की रक्षा की। मैं उन बलिदानियों को श्रद्धांजलि देता हूँ जिन्होंने तमिल के लिए जान कुर्बान की। भाषा युद्ध में अब और जान नहीं जाएगी, हमारी तमिल पहचान नहीं मरेगी! हम हमेशा हिंदी थोपे जाने का विरोध करेंगे।”

स्टालिन ने 1964-65 के आंदोलन का पुराना वीडियो भी शेयर किया, जिसमें प्रदर्शन, आत्मदाह और हिंसा की तस्वीरें हैं। उन्होंने अन्नादुराई और करुणानिधि को श्रद्धांजलि दी। केंद्र पर NEP 2020 और तीन-भाषा नीति के जरिए हिंदी थोपने का आरोप लगाया। स्टालिन का दावा है कि तमिलनाडु की दो-भाषा नीति (तमिल-अंग्रेजी) से ही तरक्की हुई है।

लेकिन सवाल यह है क्या आज हिंदी थोपी जा रही है? केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान बार-बार कह चुके हैं कि NEP में हिंदी अनिवार्य नहीं, सभी भारतीय भाषाओं को बढ़ावा है। फिर भी स्टालिन इसे ‘थोपना’ बताते हैं। क्यों? क्योंकि 2026 में विधानसभा चुनाव नजदीक हैं। पुराने आंदोलन को उछालकर भावनाएँ भड़काना, क्षेत्रीय अस्मिता जगाना… यही डीएमके की पुरानी रणनीति है। 1965 में छात्रों की मौतों से सत्ता मिली, आज उन मौतों को याद कर वोट माँगना।

गणतंत्र दिवस का दिन उत्सव का होता है। लेकिन 1965 में तमिलनाडु में यह शोक का दिन बन गया। उन छात्रों को याद करें, जिन्होंने सोचा कि वे भाषा और संस्कृति बचा रहे हैं, लेकिन राजनीति की चाल में बलिदान हो गए। हमें याद रखना चाहिए कि भाषाई मुद्दों को राजनीतिक विभाजन का हथियार नहीं बनाना चाहिए।

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श्रवण शुक्ल
श्रवण शुक्ल
I am Shravan Kumar Shukla, known as ePatrakaar, a multimedia journalist deeply passionate about digital media. I’ve been actively engaged in journalism, working across diverse platforms including agencies, news channels, and print publications. My understanding of social media strengthens my ability to thrive in the digital space. Above all, ground reporting is closest to my heart and remains my preferred way of working. explore ground reporting digital journalism trends more personal tone.

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