अयोध्या, प्रयाग, काशी, मथुरा: ‘हिन्दू पद पादशाही’ के लिए मराठों की संघर्ष गाथा

1761 की लड़ाई में हार के चलते यह सपना पूरा नहीं हो पाया। हालाँकि उस हार से राजनीतिक रूप से मराठे 10 साल में ही उबर गए, लेकिन तब तक भारत में अंग्रेज़ों के जमते कदमों ने मराठों की धमक को कम कर दिया था।

अयोध्या विवाद पर आसन्न फैसले से भगवान श्री राम की भूमि वापिस पाने के सदियों पुराने हिन्दू स्वप्न के पूरा होने की उम्मीद है। बर्बर जिहादियों से यह पवित्र भूमि वापिस पाने के लिए सैकड़ों सालों में अनगिनत प्रयास हुए हैं। लेकिन दुर्भाग्यवश एक भी प्रयास सफल नहीं रहा। इसके बाद भी अयोध्या-मथुरा-काशी की पुण्यत्रयी और तीर्थराज प्रयाग हमेशा से हिंदवी स्वराज्य के सपने का अभिन्न अंग रही और मराठाओं ने इन्हें पाने के लिए अनथक प्रयास किए

योजनाएँ

पठानों के साथ सफ़दर जंग की दूसरी लड़ाई (1751-52) में मराठाओं ने निमंत्रण पाने पर साथ दिया और फतेहगढ़ की लड़ाई जीतने के बाद होल्कर ने तीनों पवित्र स्थान पेशवा को सौंपे जाने की माँग की। लेकिन उस समय वह माँग पूरी न कर उन्हें केवल धन दे दिया गया। मराठों ने उस समय ज़्यादा चिल्ल-पों इसलिए नहीं की, क्योंकि वे भी लम्बी रणनीति पर चल रहे थे। उन्होंने सफ़दर जंग का साथ देते हुए भी पठानों का पूरा सफाया नहीं किया और उन्हें जंग के प्रतिद्वंद्वी मुस्लिम के रूप में रहने दिया, ताकि बँटे मुस्लिम धड़ों के बीच हिन्दू साम्राज्य को इस युद्ध का सबसे अधिक फायदा हो।

इतिहासकार एएल श्रीवास्तव की किताब The First Two Nawabs of Awadh के मुताबिक करोड़ों की धनराशि, दैनिक खर्चे का पैसा अलग से और आधे बंगश राज्य को पाकर मराठों ने 50 लाख रुपए अहमद खान बंगश और सदुल्लाह खान रुहल्ला से भी वसूले। यह राशि युद्ध की क्षतिपूर्ति नहीं थी, जैसा कि इतिहासकार सरदेसाई दावा करते हैं, बल्कि उनके लिए संधि में सकारात्मक पहलुओं का जुगाड़ करने के ऐवज में था, जबकि नवाब वज़ीर को केवल दुश्मन को जंग के मैदान में हराने का खोखला हर्ष मिला।


The First Two Nawabs of Awadh का अंश
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पेशवा के सेनापतियों (‘सरदारों’) में से एक मल्हार राव होल्कर एक बड़ी सेना लेकर काशी पहुँच भी गए थे। वे वहाँ औरंगज़ेब की बनाई ज्ञानवापी मस्जिद को तोड़ देना चाहते थे और उसकी जगह पुण्यभूमि पर प्राचीन मंदिर की पुनर्स्थापना करना चाहते थे। लेकिन काशी के लोगों ने ही मराठों को रोक दिया, क्योंकि उन्हें डर था कि मराठों के चले जाने के बाद जिहादी इसका बदला स्थानीय निरीह हिन्दुओं का कत्लेआम करके लेंगे। काशी के ब्राह्मणों ने ही पेशवा से अपने सरदार को ऐसा करने से रोकने की अपील की। इतिहासकार जीएस सरदेसाई इस घटना का सबूत अपनी किताब New History of the Marathas में 18 जून, 1751 को एक मराठा दूत के लिखे गए पत्र के हवाले से देते हैं। वे इसके अलावा प्रयाग के लिए भी मराठा भावनाओं की सशक्तता का ज़िक्र करते हैं।

बनारस, इलाहाबाद, अयोध्या: पेशवा के पत्र

1759 में पेशवा बालाजी राव द्वारा दत्ताजी शिंदे को लिखे गए एक पत्र में भी इन तीनों स्थलों का ज़िक्र है। ‘सिंधियाओं के प्रबंधक’ माने जाने वाले रामजी अनंत के ज़रिए यह संदेश भिजवाया गया था। पेशवा ने लिखा था कि शुजा-उद-दौला से दो-तीन लक्ष्य हासिल किए जाने हैं। उन्होंने शिंदे को शुजाउद्दौला से बनारस, अयोध्या और इलाहाबाद हासिल करने के लिए कहा। उसी पत्र में कहा गया कि उसने 1757 में ही मराठों को बनारस और अयोध्या देने का वादा कर दिया था और काशी पर बात चल रही थी। अतः अगर सम्भव हो तो शिंदे तीनों को पाने की कोशिश करें।

इसके कुछ महीनों बाद भी एक पत्र में बनारस और काशी का ज़िक्र है। उस पत्र में शिंदे को दिल्ली में डेरा डाल कर मानसून बिताने, वहाँ पर भ्रष्ट अन्ताजी मानकेश्वर को गिरफ़्तार कर पुणे भिजवा देने और उसके बाद मुग़ल वज़ीर (जिससे वैसे तो वे दोस्ताना संबंध चाहते थे) को हटा कर शुजाउद्दौला को उसकी जगह दिला देने समेत किसी भी कीमत पर काशी, मथुरा और प्रयाग को मराठा नियंत्रण में ले आने की हिदायत दी गई है। यानी हिन्दू पवित्र स्थल हमेशा पेशवाई के जेहन में बने रहे।

ज़मीन पर साकार क्यों नहीं हुई धार्मिक स्थलों की मुक्ति?

हम देख सकते हैं कि हिन्दू पवित्र स्थलों को विधर्मियों से वापिस लेना मराठों की प्राथमिकता हमेशा ही थी। इसके भी सबूत हैं कि अहमद शाह अब्दाली के खिलाफ पानीपत की तीसरी लड़ाई में मराठा सेना के सेनापति रहे सदाशिव राव भाऊ को भी यह आदेश पेशवा से मिले थे। लेकिन 1761 की इस लड़ाई में हार के चलते यह सपना पूरा नहीं हो पाया। हालाँकि उस हार से राजनीतिक रूप से मराठे 10 साल में ही उबर गए, लेकिन तब तक भारत में अंग्रेज़ों के जमते कदमों ने मराठों की धमक को कम कर दिया था।

मराठे अविभाजित भारत के मध्य-दक्षिण यानि दक्कन के पठारों से सत्ताबल पाते थे और उत्तर भारत में उनकी शक्ति सीमित थी। इतिहास के इस काल के बारे में बहुत विस्तृत जानकारी रखने वाले ट्विटर हैंडल @ArmchairPseph के एडमिन का भी मानना है कि उत्तर में अवध और बंगाल के नवाबों की ताकत मराठों के सामने ठीक-ठाक रूप से थी। अतः दक्षिण में फैले साम्राज्य की ताकत के बल पर उससे काफ़ी दूर उत्तर में इन स्थानों पर कब्ज़ा करने लायक शक्ति उस समय तक मराठों के पास नहीं आई थी। उनकी सेनाओं के लौटने के बाद इन स्थानों की सुरक्षा लायक ताकत उस समय तक उनके पास नहीं थी।

अहिल्याबाई होल्कर

मल्हार राव होल्कर की बहू अहिल्या बाई होल्कर, जिन्होंने 1767 में खुद का साम्राज्य बनाया और रानी बनीं, ने आखिरकार 1780 में आज का काशी विश्वनाथ मंदिर बनवाया। मुख्यतः उनके धन और बाकी अन्य मराठाओं के योगदान से बने मुसलमानों द्वारा तोड़ दिए गए मंदिरों जैसे पुरी के रामचंद्र मंदिर, रामेश्वरम के हनुमान मंदिर, परली का वैद्यनाथ मंदिर, अयोध्या में सरयू घाट, केदारनाथ, उज्जैन और कई अन्य मंदिरों पर उनकी अमिट छाप है।

हालाँकि राजनीतिक और सैन्य कारणों से मराठे हिन्दुओं के पवित्र स्थलों को वापिस हिन्दुओं के लिए पाने का सपना पूरा नहीं कर पाए, लेकिन भरसक प्रयासों में कोई कोताही न रहने की बात मानने के लिए इतने सबूत काफी होने चाहिए। आज जब हम इतिहास के इस मुहाने (राम जन्मभूमि पर आसन्न फैसले की घड़ी) पर खड़े हैं, तो यह याद करना ज़रूरी है कि हमारे पूर्वजों ने धन, प्राण, शक्ति समेत इसके लिए कितनी कुर्बानियाँ दी हैं।

(मूलतः अंग्रेजी में प्रकाशित इस लेख का हिंदी रूपांतरण मृणाल प्रेम स्वरूप श्रीवास्तव ने किया है।)

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