Homeदेश-समाजक्या बदला जा सकता है संविधान? लोकतंत्र की मर्यादा पुनर्स्थापित करने वाला केस

क्या बदला जा सकता है संविधान? लोकतंत्र की मर्यादा पुनर्स्थापित करने वाला केस

सवाल उठता है कि संविधान की मूल भावना क्या है? सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि समय-समय पर इसकी व्याख्या न्यायपालिका द्वारा की जाती रहेगी। संविधान के 'बेसिक स्ट्रक्चर', अर्थात 'मूल ढाँचा' को नहीं बदला जा सकता, ये कोर्ट ने स्पष्ट किया है।

भारत के संविधान के बारे में अक्सर कहा जाता है कि ये उधार का संविधान है। साथ ही आजकल ये आरोप भी शुरू हो गए हैं कि मोदी सरकार संविधान को बदल देगी। ये दोनों ही आरोप काफ़ी ज़्यादा घिस चुके हैं। यहाँ ये जानना ज़रूरी है कि हमें बेशक एक ऐसा संविधान मिला, जिसमें कई देशों के संविधान की उन अच्छी चीजों को शामिल किया गया, जो यहाँ लागू किए जा सकते थे। ये अच्छी बात है कि हमारे संविधान निर्माताओं ने दुनिया भर के संविधान का अध्ययन किया, उनकी समीक्षा की, उनके अच्छे-बुरे पहलुओं को समझा और फिर इस पर विस्तृत बहस किया कि भारत में उसे कैसे लागू किया जाए। ज़रूरी बदलावों पर भी विस्तृत बहस हुई।

संविधान की व्याख्या सुप्रीम कोर्ट समय-समय पर करता रहा है। जब भी संविधान के किसी हिस्से को लेकर टकराव की स्थिति बनी है, सुप्रीम कोर्ट ने अपनी व्याख्या के जरिए इसे सुलझाया है। आरोप लगाया जाता है कि मोदी सरकार संविधान को बदल देगी। असल में संविधान को बदलने की कोशिश की गई थी और ऐसा आपातकाल के वक़्त तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने किया था। इसके लिए हमें 42वें संविधान संशोधन को समझना पड़ेगा। देखा जाए तो ये अब तक का सबसे विवादित संविधान संशोधन रहा है। इसे कई लोगों ने ‘मिनी कांस्टीट्यूशन’ कहा था तो कइयों ने ‘इंदिरा का संविधान’ नाम दिया था।

इसी संविधान संशोधन में नागरिकों की ‘फंडामेंटल ड्यूटीज’ को परिभाषित किया गया। साथ ही ‘सेक्युलर’ शब्द संविधान की प्रस्तावना में जोड़ा गया। दरअसल, इंदिरा गाँधी की इच्छा थी कि न्यायपालिका की शक्ति को कमज़ोर कर दिया जाए और इसलिए उन्होंने संविधान का संशोधन किया था। हालाँकि, बाद में ‘केशवानंद भारती बनाम केरल सरकार‘ वाले ऐतिहासिक केस ने संविधान की मर्यादा को पुनर्स्थापित किया। इसे भारतीय न्यायपालिका का सबसे ‘लैंडमार्क फ़ैसला’ कहा जाता है। एक ऐसा निर्णय, जिसने लोकतंत्र की मर्यादा और संविधान की अक्षुण्णता को बरक़रार रखा।

सवाल एक था, जिसके लिए 71 देशों के संविधान को पढ़ना पड़ा। प्रश्न था कि क्या संसद इतनी शक्तिशाली है कि वो संविधान के किसी भी हिस्से को जब, जहाँ, जैसे चाहे संशोधित कर सकती है? क्या संसद नागरिकों के मूलभूत अधिकारों के साथ छेड़छाड़ कर सकती है? 703 पेज का जजमेंट देने वाली पीठ में तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश भी शामिल थे। 13 सदस्यीय पीठ ने 7-6 से जजमेंट दिया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि संविधान में संशोधन किया जा सकता है लेकिन इसकी मूल भावना के साथ छेड़छाड़ नहीं किया जा सकता।

यहाँ ये सवाल उठता है कि संविधान की मूल भावना क्या है? सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि समय-समय पर इसकी व्याख्या न्यायपालिका द्वारा की जाती रहेगी। संविधान के ‘बेसिक स्ट्रक्चर’, अर्थात ‘मूल ढाँचा’ को नहीं बदला जा सकता, ये कोर्ट ने स्पष्ट किया है। इसलिए ये सारे आरोप बेमानी हैं कि मोदी संविधान बदल देगा, भाजपा संघ के संविधान लागू कर देगी और हिन्दू राष्ट्र का अलग संविधान हो जाएगा।

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ऑपइंडिया स्टाफ़
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कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

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