शाहीन बाग की इन औरतों का हंगामा और संविधान देने वाली उन 15 महिलाओं का हासिल

उन 15 महिलाओं ने संविधान के निर्माण में अपनी भूमिका इसलिए ही निभाई थी कि देश में अराजकता का माहौल न बनें। पहचान और मजहब के नाम पर शोरगुल न मचाया जाए। महिलाएँ सशक्त बनें न कि कठपुतली। इन कसौटियों पर शाहीन बाग की वे औरतें जिनकी डोर किसी और ने थाम रखी है, खरी नहीं उतरतीं।

एक महीने से ज्यादा वक्त से दिल्ली के शाहीन बाग में बैठी औरतों को सेक्युलर, संविधान बचाने वाली, महिला सशक्तिरण और न जाने कैसे-कैसे प्रतीकों के तौर पर स्थापित करने के लिए वामपंथी गिरोह ने तमाम घोड़े खोल रखे हैं। देश में जगह-जगह शाहीन बाग बनाने की कोशिशें भी हो रही हैं। लेकिन, वक्त-वक्त पर शाहीन बाग से ऐसी तस्वीरें, ऐसे वीडियो और ऐसे नारे सामने आ ही जाते हैं जो इनके प्रपंच की पोल खोल देते हैं। शाहीनबाग प्रदर्शन के मास्टरमाइंड बताए जा रहे शरजील इमाम पर तो देशद्रोह का मुकदमा तक दर्ज हो चुका है। असम को भारत से काटने की धमकी दे रहे शरजील से अब शाहीन बाग पल्ला झाड़ने की कोशिश कर रहा है। लेकिन, फेहरिस्त इतनी लंबी है कि दाग शायद ही धुले।

सो, संविधान के आईने में इन महिलाओं को देखने के लिए 26 जनवरी से बेहतर दिन शायद ही कोई हो। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या ये औरतें उसी रास्ते पर हैं, जिसका सपना उन 15 महिलाओं ने देखा था जिन्होंने संविधान बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। यकीनन, नहीं। क्योंकि उन 15 महिलाओं ने संविधान के निर्माण में अपनी भूमिका इसलिए ही निभाई थी कि देश में अराजकता का माहौल न बनें। पहचान और मजहब के नाम पर शोरगुल न मचाया जाए। महिलाएँ सशक्त बनें न कि कठपुतली। इन कसौटियों पर शाहीन बाग की वे औरतें जिनकी डोर किसी और ने थाम रखी है, खरी नहीं उतरतीं।

पितृसत्ता को तोड़कर देश की आवाज़ बनने वाली उन 15 महिलाओं ने बताया था कि सशक्तिरण और कट्टरपंथ के बीच का फर्क क्या होता है। 389 सदस्यीय संविधान सभा में इन महिलाओं की संख्या आँकड़ों के लिहाज से काफी कम यानी 15 ही था। लेकिन, उनकी आवाज आज भी महसूस की जाती है। संविधान का मसौदा तैयार करने में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका थी। इनमें एक मुस्लिम भी थीं।

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संविधान सभा की एक मात्र मुस्लिम महिला सदस्य बेगम एजाज रसूल महिला सशक्तिरण की अनूठी मिसाल थीं। मुस्लिम लीग का हिस्सा होने के बावजूद देश का साथ नहीं छोड़ा। 1950 में मुस्लिम लीग भंग होते ही कॉन्ग्रेस में शामिल हो गईं। साल 1952 में राज्यसभा के लिए चुनी गईं। 1969 से 1990 तक उत्तर प्रदेश विधानसभा की सदस्य रहीं। 1969 से 1971 के बीच वह सामाजिक कल्याण और अल्पसंख्यक मंत्री भी रहीं। समाज कल्याण में उनका योगदान इतना था कि साल 2000 में उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया गया।

बेगम एजाज के अलावा दक्षिणानी वेलायुद्ध भी संविधान सभा में एक ऐसी महिला सदस्य थीं जो उस दौर में पिछड़े समुदाय से उभर कर आगे आईं। इसी वर्ग के 70-75% (दलित, गरीब) प्रतिशत आबादी को नागरिकता संशोधन कानून के तहत नागरिकता मिलने वाली है। लेकिन शाहीन भाग की औरतों का विरोध देखकर लगता है कि वे इसके लिए राजी नहीं हैं। यही फर्क़ है संविधान बचाने वाली महिलाओं में और संविधान बनाने वाली महिलाओं में।

दक्षिणानी वेलायुद्ध का जन्म 4 जुलाई 1912 को कोचीन में बोल्गाटी द्वीप पर हुआ था। लेकिन आगे चलकर वे शोषित वर्गों की नेता बनीं। साल 1945 में, दक्षिणानी को कोचिन विधान परिषद में राज्य सरकार द्वारा नामित किया गया। वह साल 1946 में संविधान सभा के लिए चुनी गईं और पहली दलित नेता बनीं।

शाहीन बाग पर प्रदर्शन कर रही महिलाओं को आज देश की सबसे पुरानी पार्टी कॉन्ग्रेस का समर्थन है। उसी कॉन्ग्रेस का जिसकी नींव आजाद राष्ट्र के लिहाज रखी गई थी। लेकिन वही पार्टी जो भारत की आजादी के बाद ओछी राजनीति करने पर उतर आई । जिसका उद्देश्य आज केवल हिंदू-मुसलमान, ऊँच-नीच करवाना रह गया है।

एक समय में इसी पार्टी की मालती चौधरी, पूर्णिमा बनर्जी, कमला चौधरी, लीला रॉय, सरोजिनी नायडू, सुचेता कृपलानी, विजय लक्ष्मी पंडित, एनी मास्कारेन जैसी नेता संविधान सभा में शामिल थीं। संविधान का मसौदा तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इनके अलावा रेनूका रे, राजकुमारी अमृत कौर, हंसा जिवराज मेहता, दुर्गाबाई देशमुख और अम्मू स्वामीनाथन भी इसी सूची में शामिल हैं।

संविधान का मसौदा तैयार करने वाली उन महिलाओं की संक्षिप्त जानकारी, जिनका नाम इतिहास में कम ही पढ़ाया गया…
अम्मू स्वामीनाथन अम्मू स्वामीनाथन 1952 में तमिलनाडु के डिंडिगुल लोकसभा से चुनाव जीतकर संसद में पहुँचीं थीं। वे तमिलानाडु की तेज तर्रार गाँधीवादी नेताओं में शुमार थीं। छोटी उम्र से ही वे महिला अधिकारों की आवाज बनीं।
राजकुमारी अमृत कौर– संविधान सभा की सलाहकार समिति व मौलिक अधिकारों की उप समिति की सदस्य थीं। सभा में वह सेंट्रल प्राविंस व बेरार की प्रतिनिधि के तौर पर शामिल हुई थीं।
दुर्गाबाई देशमुख– दुर्गाबाई ने न सिर्फ देश को आजाद कराने बल्कि समाज में महिलाओं की स्थिति बदलने के लिए भी लडा़ई लडी़। भारत के दक्षिणी इलाकों में शिक्षा को बढा़वा देने के लिए इन्होंने ‘बालिका हिन्दी पाठशाला’ भी शुरू की। 12 साल की छोटी सी उम्र में वह असहयोग आंदोलन का हिस्सा बनीं। उन पर महात्मा गांधी का प्रभाव था। वकील होने के नाते उन्होंने संविधान के कानूनी पहलुओं में योगदान दिया।
हंसा मेहता– समाज सेविका व स्वतंत्रता सेनानी होने के साथ ही कवयित्री व लेखिका भी थीं। वह 1946 में ऑल इंडिया वुमन कांफ्रेंस की अध्यक्ष भी रहीं थीं। वह संविधान सभा की मौलिक अधिकारों की उप समिति की सदस्य थीं। उन्हें संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार की सार्वभौमिक घोषणा में ‘ऑल मेन आर बॉर्न फ्री एंड इक्वल’ को बदलकर ‘ऑल ह्यूमन बीइंग आर बॉर्न फ्री एंड इक्वल’ करवाने के अभियान के लिए भी जाना जाता है। संविधान सभा में वह मुंबई के प्रतिनिधि के तौर पर शामिल हुई थीं।
मालती नवकृष्ण चौधरी भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के महत्वपूर्ण अग्रदूतों में से एक थीं। उसने माना कि जीवन में उसका मिशन उड़ीसा के गरीब लोगों को शिक्षित करना था। मालती नवकृष्ण चौधरी अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों की दुर्दशा से चिंतित थीं। उन्होंने ओडिशा के गाँवों से गुजरते हुए अपनी पीड़ा का अनुभव किया था। उन्होंने अपना पूरा जीवन गरीब लोगों को ज्ञान देने के लिए समर्पित कर दिया। वह गाँधीजी और टैगोर की पसंदीदा संतान थीं। प्रेम में से गांधीजी ने उन्हें “टोफनी” और टैगोर ने उन्हें “मीनू” कहा।
कमला चौधरी-लखनऊ के समृद्ध परिवार से आने वाली कमला चौधरी ने साल 1930 में गाँधी द्वारा शुरू की गई नागरिक अवज्ञा आंदोलन में सक्रियता से हिस्सा लिया| अखिल भारतीय कॉन्ग्रेस कमेटी की उपाध्यक्ष बनीं और सत्तर के उत्तरार्ध में लोकसभा के सदस्य के रूप में चुनी गईं।
रेनूका रे-पद्मभूषण से सम्मानित रेणुका रे स्वतंत्रता-सेनानी, सामाजिक कार्यकर्ता के साथ दूसरी और तीसरी लोकसभा के सक्रिय सांसदों में थीं। लंदन स्कूल ऑफ इकॉनोमिक्स से शिक्षित रेणुका रे अपनी उच्च कोटि की सामाजिक आर्थिक समझ वाली सांसद के तौर पर याद की जाती हैं। 1959 में रेणुका रे की अगुवाई में समाज कल्याण और पिछड़ा वर्ग कल्याण के लिए एक समिति बनी। इस समिति की रिपोर्ट को रेणुका रे कमेटी के तौर पर जाना जाता है। इस समिति ने गृह मंत्रालय के अंतर्गत पिछड़ा वर्ग के लिए विभाग बनाने की सलाह दी।

सोचिए परिस्थियाँ कितनी अधिक बदल चुकी हैं। ये महिलाएँ थी, जिन्होंने अपनी शिक्षा और विवेक के बलबूते सामाजिक कुरीतियों को ध्वस्त किया और भारत को लोकतांत्रिक देश बनाने में योगदान दिया। एक शाहीन बाग पर बैठी महिलाएँ हैं, जिनका न विवेक उनके वश में है और न ही उनकी बुद्धि। वो खुले तौर पर शर्जील इमाम और ओवैसी जैसे इस्लामिक कट्टरपंथियों की कठपुतलियाँ बन चुकी हैं और इसी को वो आवाज़ उठाना बता रही हैं।

आज जिन महिलाओं को सशक्तिकरण का चेहरा बता पेश किया जा रहा है वे उस कानून को लेकर हंगामा कर रही हैं जिसका किसी भारतीय से कोई लेना-देना नहीं है। जिनकी डोर मजहब के ठेकेदारों के हाथ में है। जिनके नारे हिंदू विरोधी हैं। जो हलाला और माहवारी की उम्र होते ही निकाह कर देने की रवायत के खिलाफ आवाज नहीं उठाना चाहतीं। जो तीन तलाक की दरिंदगी से मुक्ति को अपने धर्म में दखल मान रहीं हैं। सोचिए!

26 जनवरी 1990: संविधान की रोशनी में डूब गया इस्लामिक आतंकवाद, भारत को जीतना ही था

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