Sunday, July 5, 2020
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जब लोकमान्य तिलक की प्रेस को बिकने से बचाने के लिए लोगों ने जुटाए थे ₹3 लाख

क्या ही संयोग है कि हम सबने हाल ही के कुछ वर्षों में महसूस किया कि किस तरह से दक्षिणपंथी विचारधारा पर भी ऐसे ही कई तरह के आरोप लगाए जाते रहे हैं और ऐसे संस्थान या उस विचारधारा के समर्थकों को 'समाज में अशांति फैलाने' वाला साबित करने के प्रयास किए गए। यह सब किस कारण किया गया?

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आशीष नौटियाल
पहाड़ी By Birth, PUN-डित By choice

यह देखना दिलचस्प है कि आज के समय में भी पाश्चात्य बौद्धिक साहित्य का दास इस देश का बौद्धिक दैन्य वर्ग, जो खुद को पत्रकारिता का एकमात्र सिपहसलार घोषित कर चुका है, महज इस तथ्य से रूठ जाता है कि सत्य का कोई दूसरा पहलू भी हो सकता है, जो कि उनके द्वारा तय परिभाषा के दायरे में न आता हो।

मसलन, एक ओर प्रेस की आजादी की वकालत की जाती है तो दूसरी तरफ पत्रकारिता की परिभाषाएँ गढ़ी जा रही है। सोशल मीडिया पर कमोबेश हर दूसरे दिन गतानुगतिक वाम-उदारवादियों को लोगों को पत्रकारिता के सर्टिफिकेट बाँटते देखा जा सकता है।

अभिव्यक्ति की आजादी के लिए राष्ट्रवादी विचारधारा को वही संघर्ष आज भी देखना पड़ता है, जिससे एक समय लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक को गुजरना पड़ा था।

वही लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक, जिन्हें अपनी राष्ट्रवादी सोच के कारण ‘अशांति का जनक’ कहा गया। उन्हें ऐसा कहने के पीछे कई कारणों में से एक उनकी ओजस्वी भाषा थी, जिसने तत्कालीन समाज को तत्परता से स्वराज्य के विषय पर सोचने पर मजबूर किया।

क्या ही संयोग है कि हम सबने हाल ही के कुछ वर्षों में महसूस किया कि किस तरह से दक्षिणपंथी विचारधारा पर भी ऐसे ही कई तरह के आरोप लगाए जाते रहे हैं और ऐसे संस्थान या उस विचारधारा के समर्थकों को ‘समाज में अशांति फैलाने’ वाला साबित करने के प्रयास किए गए। यह सब किस कारण किया गया? तिलक पर दो बार राजद्रोह के आरोप लगाए गए? आख़िर वह किस कारण हुआ था? वैचारिक वर्चस्व की जंग में विपरीत विचारधारा परएफ़आईआर-वादी’ संगठन तब भी थे और आज भी ऐसे उदाहरण मौजूद हैं।

इन्हीं सब घटनाओं के बीच आज ‘हिंदी पत्रकारिता दिवस’ है। इस पर सबसे पहले लोकमान्य बाल गंगाधार तिलक का नाम का स्मरण हो आना भी वाज़िब है, जिन्हें मराठा दैनिक समाचार पत्र ‘केसरी’ और ‘महरात्ता’, जो कि एक अंग्रेजी साप्ताहिक था, में उनके लेखन के लिए अंग्रेजों द्वारा दो बार राजद्रोह के आरोप में गिरफ़्तार किए गए।

जब प्रेस को गिरवी होने से बचाने के लिए जुटाया था चंदा

‘सर’ वेलेंटाइन चिरोल लंदन टाइम्स के इंपीरियल विभाग के निदेशक थे। चिरोल ने वर्ष 1910 के बाद ‘द इंडियन अनरेस्ट’ (The Indian Unrest) नामक पुस्तक में भारत की राजनीतिक स्थिति पर कुछ आक्रामक लेख प्रकाशित किए।

इसी में उसने लोकमान्य तिलक को ‘भारतीय अशांति का जनक’ भी कहा था। चिरोल ने भारत में क्रांतिकारियों के साथ लोकमान्य के संबंधों को स्थापित करने का प्रयास किया और लिखा कि बंगाल में बम विस्फ़ोट और तेजी से बढ़ रहे गुप्त सोसायटी के प्रेरक और आयोजक तिलक ही थे। इस किताब में चिरोल ने तिलक के ‘चितपावन’ ब्राह्मण वंश के बारे में कई तरह की आपत्तिजनक बातें लिखीं थीं।

चिरोल ने मुख्यतः छह आधारों पर लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक को बदनाम करने की कोशिश की थी –

  • नासिक के कलेक्टर जैक्सन की हत्या
  • रैंड की हत्या
  • ताई महाराज केस
  • ब्लैकमेल
  • जिम्नास्टिक सोसाइटीज
  • गौ-रक्षक समाज

जब यह पुस्तक प्रकाशित हुई तब बाल गंगाधर तिलक ने साल 1908 से लेकर 1914 तक राजद्रोह के मामले में मांडले (वर्तमान म्यांमार) में जेल की सज़ा काट रहे थे। भारत में प्रेस की स्वतन्त्रता पर ऐसा हमला पहली बार हुआ था। लोकमान्य तिलक ने अपने अखबार ‘केसरी’ में मुज़फ्फरपुर में क्रांतिकारी खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चाकी के मुक़दमे पर लिखते हुए तुरंत ‘स्वराज’ की माँग उठाई थी।

मांडले जेल में तिलक का अधिकांश समय ‘गीता रहस्य’ और कोर्ट में अपनी दलीलें लिखने में गुजरता था

इस मुकदमे में तिलक की वकालत मोहम्मद अली जिन्ना ने की थी, जो कि अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत में एक उदारवादी थे लेकिन स्वतन्त्रता तक एक प्रमुख कट्टरपंथी बनकर उभरे।

जिन्ना ने इस मुकदमे में तिलक को ज़मानत दिलाने की कोशिश की, लेकिन ये कोशिश सफल नहीं हो सकी और आखिरकार तिलक को 6 सालों के लिए जेल भेज दिया गया। यह भी एक दूसरा सत्य है कि खिलाफत आन्दोलन में गाँधी की भूमिका के बाद से उनसे दूरी बनाकर रखने वाले जिन्ना, तिलक के बहुत करीबी थे।

वर्ष 1916 में तिलक और जिन्ना के बीच हिंदू-मुस्लिम एकता और दोनों समाजों की सत्ता में भागीदारी को लेकर एक समाधान निकाला गया। 1920 में तिलक की मृत्यु के बाद जिन्ना भी कॉन्ग्रेस की राजनीति से दूर होते चले गए। माना जाता है कि यदि यह फॉर्मूला कायम रहता तो देश का विभाजन नहीं होता।

राजद्रोह की सजा के बाद

राजद्रोह के आरोप में सजा काटने के बाद जेल से निकलते ही 1915 में उन्होंने चिरोल पर मुकदमा किया था। सरकार की देरी के कारण वह सितम्बर 1918 में शिकायत दर्ज करने के लिए लन्दन रवाना हुए। इंग्लैंड जाने की अनुमति उन्हें इस शर्त पर दी गई कि वे किसी भी तरह की राजनीतिक गतिविधि में शामिल नहीं होंगे।

लोकमान्य तिलक ने चिरोल से कहा कि वह माफी माँगे और भारतीय युद्ध राहत कोष में योगदान करे। हालाँकि, उन्हें इसमें जीत की आशा बहुत कम थी और हुआ भी यही। आखिर में ज्यूरी ने फैसला चिरोल के ही पक्ष में दिया।

लेकिन इस मुकदमे के बाद चिरोल तिलक के व्यक्तित्व से बेहद प्रभावित हुआ और 1926 में तिलक के देहांत के बाद एक दूसरी पुस्तक लिखते हुए तिलक के साहस और उनके लक्ष्य के प्रति समर्पण की जमकर तारीफ़ की।

चिरोल से मुकदमा लड़ते हुए तिलक को करीब तीन लाख रुपए की हानि हुई थी। यही नहीं, उन्हें अपना घर, गायकवाड़ वाड़ा और केसरी-महरात्ता प्रिंटिंग प्रेस को गिरवी रखना पड़ा। ऐसे में उनके समर्थकों ने चन्दा इकठ्ठा किया और लगभग तीन लाख रुपए कुछ ही समय में जमा हो गए।

वर्ष 1905 में, लोकमान्य तिलक ने बड़ौदा के महाराजा सयाजीराव गायकवाड़ से पुणे में ‘गायकवाड़ वाड़ा’ खरीदा था। वर्तमान में इस स्थान को ‘तिलक वाड़ा’ या ‘केसरी वाड़ा’ (केसरी अखबार के प्रधान कार्यालय के कारण) के रूप में जाना जाता है।

तिलक ने चंदे के माध्यम से जुटाए गए इस धन के बारे में सुना तो उन्होंने फ़ौरन डीवी गोखले को इंग्लैंड से एक पत्र लिखकर कहा कि भारत की जनता से कोई धन ना लिया जाए, क्योंकि तिलक का मानना था कि चिरोल मुकदमा उनका निजी मसला था।

इसके बाद लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक मई 22, 1920 को पुणे के तत्कालीन गायकवाड़ वाड़ा (अब तिलक वाड़ा) में जब डॉ. नानासाहेब देशमुख के साथ एक सभा में मौजूद थे, तभी उस चंदे से जमा करीब तीन लाख पच्चीस हजार रुपए लोगों ने तिलक को सौंपे।

आखिरकार उनके तमाम विरोध के बावजूद उन्होने यह धन स्वीकार किया और जनता को धन्यवाद करते हुए कहा कि उन्होंने सरकार से संघर्ष में यह योगदान कर के उनके जीवन के दो-चार वर्ष और बढ़ा दिए हैं।

कैसे शुरू हुए ‘केसरी’ और ‘महारात्ता’

लोकमान्य तिलक, विष्णुशास्त्री चिपलूनकर और गोपाल गणेश अगरकर ने पुणे में जनवरी 02, 1880 में ‘न्यू इंग्लिश स्कूल’ शुरू किया। महादेव बल्लाल नामजोशी, एक स्थानीय संपादक भी स्कूल का हिस्सा थे।

उसी वर्ष, इसके संस्थापकों ने स्कूल के विस्तार के लिए 2 शाखाओं में बाँटने का विचार किया। इस बारे में फैसला लिया गया कि एक कॉलेज जबकि दूसरी शाखा एक प्रिंटिंग प्रेस और एक अखबार के रूप में शुरू की जाएगी।

अखबार शुरू करने का विचार सबसे पहले विष्णुशास्त्री और नामजोशी के दिमाग में कौंधा था। तिलक और अगरकर ने इस पर अपनी सहमति दी। इसी समय नामचीन विद्वान वामनराव आप्टे भी वर्ष 1880 के अंत में स्कूल में शामिल हुए।

एक दिन आप्टे के घर में दोपहर का भोजन करते समय, तिलक, अगरकर, नामजोशी और विष्णुशास्त्री ने जनवरी 1881 में केसरी और महरात्ता समाचार पत्र शुरू करने का फैसला किया। उन्होंने तय किया कि इसके लिए आवश्यक कागजात को वे अपने स्वयं के प्रिंटिंग प्रेस से ही मुद्रित किया जाना चाहिए।

पुणे में प्रसिद्ध विंचुरकर वाड़ा, जहाँ लोकमान्य तिलक ने 1881 में ‘केसरी’ की शुरुआत की थी। 1903 तक लोकमान्य खुद यहाँ पर एक किराएदार के रूप में रहते थे। स्वामी विवेकानंद 1892 में तिलक के अतिथि के रूप में यहाँ रुके थे।

इसके संस्थापकों ने एक सामान्य बांड पर केशव बल्लाल साठे से मशीनरी का अधिग्रहण किया। यह मशीनरी ‘आर्यभूषण प्रेस’ में स्थापित की गई थी, जिसकी स्थापना 1878 में बुधवर पेठ में मोरोबाडाडा वाडा में विष्णुशास्त्री द्वारा की गई थी।

प्रेस में पहला प्रिंट ‘केसरी’ के उद्देश्यों के विवरण का था, जिस पर विष्णुशास्त्री, तिलक, अगरकर, आप्टे, नामजोशी और डॉ. गणेश गद्रे के हस्ताक्षर थे। साथ ही, इसमें विष्णुशास्त्री के प्रसिद्ध ‘निबन्धमाला’ के 66वें संस्करण को भी प्रिंट किया गया। आखिरकार जनवरी 02, 1881 और जनवरी 04, 1881 को क्रमशः महरात्ता और केसरी (द लायन) के पहले संस्करण प्रकाशित हुए।

समय के साथ केसरी जनता की आवाज बन गया। जब पुणे में प्लेग की बीमारी फैली, तब आर्यभूषण प्रेस, जिसमें कि उनके समाचार पत्र छपते थे, के मालिक ने लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक से कहा कि प्रेस में कर्मचारियों की संख्या प्लेग के कारण गिरती जा रही है और इसलिए जब तक यह महामारी ख़त्म नहीं हो जाती, तब तक ‘केसरी’ की प्रतियाँ समय पर नहीं छप सकती। इस पर लोकमान्य तिलक ने दृढ़ता से उन्हें जबाव देते हुए कहा-

“आप आर्यभूषण के मालिक और मैं ‘केसरी’ का संपादक, यदि इस महामारी में हम दोनों को ही मृत्यु आ गई, तब भी हमारी मृत्यु के बाद, पहले 13 दिनों में भी ‘केसरी’ मंगलवार की डाक से जाना चाहिए।”

यह वो दौर था जब लोगों ने प्रेस की स्वतन्त्रता की आवश्यकता को समझकर तिलक के प्रेस को गिरवी रखने से बचाया था। राष्ट्रवादी लोग यह अच्छी तरह से जानते थे कि औपनिवेशिक ब्रिटिश साम्राज्य से स्वराज्य के लिए स्वतंत्र आवाज का कितना महत्व है।

आज के समय में राष्ट्रवाद को विचारधारा मानने से ही इनकार कर दिया जाता है। रक्तपिपासु कम्युनिस्ट आवाज दबाने में निपुण हैं। अपनी पत्रकारिता के इसी आडम्बर के बीच बेहद शातिर तरीके से वो यह भी साबित करते देखे जाते हैं कि उनकी ही आवाज को दबाया जा रहा है। विपरीत स्वरों को सुनने की जिस क्षमता का अभाव उस समय के ब्रिटिश शासन में था, उससे कहीं अधिक वामपंथी एजेंडाबाजों में यह अभाव आज मौजूद है।

इन्हीं आत्मरतिक वामपंथियों के द्वारा विचारधारा के वर्चस्व की तुलना प्रेस की स्वतन्त्रता से भी की जाती है। प्रेस की आजादी के सन्दर्भ में हर काल-खंड में अंतिम प्रश्न बस यही होगा कि जब सब कुछ आत्यंतिक हो, तब आप वैचारिक रूप से कितने उदासीन रह सकते हैं?

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आशीष नौटियाल
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