सातवाहन और चालुक्य वंश के बाद तिलक ने गणेश चतुर्थी को बना दिया था स्वतन्त्रता का जन आंदोलन

ब्रिटिश काल में कोई भी हिन्दू सांस्कृतिक कार्यक्रम या उत्सव को साथ मिलकर या एक जगह इकट्ठा होकर नहीं मना सकते थे। पहले लोग घरों में ही गणेशोत्सव मनाते थे और गणेश विसर्जन करने का भी कोई रिवाज नहीं था। यही वो समय था जब लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने 1893 में पुणे में पहली बार सार्वजनिक रूप से गणेशोत्सव मनाया।

दास कपिताल लिखने वाले जर्मनी के क्रन्तिकारी विचारक कार्ल मार्क्स ने कहा था- ‘History repeats itself, the first as tragedy, then as farce.’ भारतीय इतिहास और भारतीयों के विदेशी आतताइयों से संघर्ष के संदर्भ में यह हमेशा सही साबित होता आया है। हम अक्सर अपने ही इतिहास से सबक सीखने में भूल कर बैठते हैं।

गणेश चतुर्थी की भारतीय इतिहास और स्वतन्त्रता आंदोलन में भूमिका देखकर कुछ समय पहले दिल्ली के हौज काजी स्थित दुर्गा मंदिर में हुई सांप्रदायिक घटना की याद आती है। जब मंदिर में मुस्लिम उग्रवादियों द्वारा मंदिर में तोड़फोड़ कर हिन्दू प्रतीकों को अपमानित करने के बाद कुछ हिन्दू एक्टिविस्ट्स ने मिलकर विशाल जागरण और सुंदरकांड का आयोजन किया था।

कुछ इसी तरह से लोगों को जोड़ने के लिए लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने महाराष्ट्र में भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के आंदोलन के दौरान गणेश चतुर्थी को एक विशाल आंदोलन का आकार दे दिया था। गणेश पूजा या गणेशोत्सव महाराष्ट्र का सबसे बड़ा त्यौहार है। यह त्यौहार भाद्रपद मास के चतुर्थी से चतुर्दशी तक कुल दस दिनों तक चलता है। गणेश चतुर्थी की भारतीय इतिहास में अहम भूमिका रही है।

भारतीय इतिहास में गणेशोत्सव

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बात चाहे ब्राह्मण साहित्य की हो या फिर भारतीय इतिहास में सातवाहन, चालुक्य और राष्ट्रकूट वंशों की, गणेश उत्सव हमेशा ही भारतीय और हिन्दू एकता का प्रमुख केंद्र रहा है। हिन्दू धर्म में पुराणों- अग्नि पुराण, ब्रह्मवैवर्त पुराण, शिवपुराण, स्कंद पुराण आदि में भगवान गणेश का जिक्र मिलता है। भगवान शिव द्वारा माता पार्वती के प्रहरी बने गणेश का सर उनके धड़ से अलग करने और फिर हाथी के बच्चे का सर जोड़ने की घटना का जिक्र नारद पुराण में मिलता है।

मौर्य साम्राज्य के बाद सातवाहन वंश में गणेश पूजा

अगर भारतीय इतिहास की बात करें तो महाराष्ट्र में सात वाहन, राष्ट्रकूट, चालुक्य जैसे राजाओं ने गणेशोत्सव की प्रथा चलाई थी। सातवाहन एक वंश था जो मौर्य साम्राज्य के बाद उभरा था। महान सम्राट अशोक की मृत्यु के बाद सातवाहनों ने खुद को स्वतंत्र घोषित कर दिया था। इस वंश की जानकारी मत्स्य पुराण में भी मिलती है। इस वंश ने ईसा पूर्व 230 से लेकर दूसरी सदी (ईसा के बाद) तक केन्द्रीय दक्षिण भारत पर राज किया।

छत्रपति शिवाजी के समय गणेश को राष्ट्रदेव का दर्जा दिया गया था

इसके बाद छत्रपति शिवाजी महाराज भी गणेश की उपासना करते थे। इस दौरान पेशवाओं ने गणेशोत्सव को बढ़ावा दिया। पुणे में कस्बा गणपति की स्थापना राजमाता जीजाबाई ने की थी।

महान मराठा शासक छत्रपति शिवाजी ने गणेशोत्सव को राष्ट्रीयता एवं संस्कृति से जोड़कर एक नई शुरुआत की थी। गणेशोत्सव का यह स्वरूप तब से इसी प्रकार कायम रहा और पेशवाओं के समय में भी जारी रहा। पेशवाओं के समय में गणेशजी को लगभग राष्ट्रदेव के रूप में दर्जा प्राप्त था, क्योंकि वे उनके कुलदेव थे। पेशवाओं के बाद 1818 से 1892 तक के काल में यह पर्व हिन्दू घरों के दायरे में ही सिमटकर रह गया।

भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन: बाल गंगाधर तिलक और गणेश चतुर्थी

भारतीय इतिहास में एक समय आया जब भारतीय जनमानस को अंग्रेजी औपनिवेशिक शासन के अत्याचारों की त्रासदी से गुजरना पड़ा। यही वो समय था जब लोकमान्य बालगंगाधर तिलक ने लोगों के आत्मविश्वास को जगाने और उनके अंदर ब्रिटिश शासन के खिलाफ खड़े होने के लिए गणेश पूजा को फिर से लोगों के बीच लोकप्रिय बनाया। भारत से ब्रिटिश राज की समाप्ति के लिए उन्होंने सामाजिक आंदोलनों के ज़रिए सामाजिक चेतना का प्रवाह तेज़ करके अंग्रेज़ी राज के ख़िलाफ़ जनमत निर्माण का निर्माण किया।

गणेश महोत्सव को सार्वजनिक रूप देते समय तिलक ने उसे केवल धार्मिक कर्मकांड तक ही सीमित नहीं रखा, बल्कि आजादी की लड़ाई, छूआछूत दूर करने और समाज को संगठित करने और आम जनता को जागरूक करने का उसे जरिया बनाया और उसे एक आंदोलन का स्वरूप दिया। अंत में इस आंदोलन ने ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिलाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

हालाँकि, बाल गंगाधर तिलक के इस अभियान से उस दौरान कॉन्ग्रेस सदैव किनारा ही करती रही। 1885 को भारतीय राष्ट्रीय कॉन्ग्रेस की स्थापना से ही कॉन्ग्रेस तिलक को निरंतर दरकिनार करती रही क्योंकि तिलक के व्यक्तित्व और उनके प्रति जनता के लगाव को देख अंग्रेज़ों को एहसास था कि अगर तिलक का सामाजिक चेतना का प्रयास मज़बूत हुआ तो, उनकी विदाई का समय और जल्दी आ जाएगा।

गणेश चतुर्थी बन गया था जन आंदोलन

ब्रिटिश काल में कोई भी हिन्दू सांस्कृतिक कार्यक्रम या उत्सव को साथ मिलकर या एक जगह इकट्ठा होकर नहीं मना सकते थे। पहले लोग घरों में ही गणेशोत्सव मनाते थे और गणेश विसर्जन करने का भी कोई रिवाज नहीं था। यही वो समय था जब लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने 1893 में पुणे में पहली बार सार्वजनिक रूप से गणेशोत्सव मनाया।

आगे चलकर उनका यह प्रयास एक विशाल आंदोलन बना और स्वतंत्रता आंदोलन में इस गणेशोत्सव ने लोगों को एकजुट करने में अहम भूमिका निभाई। आज गणेशोत्सव एक विराट रूप ले चुका है।

तिलक ‘स्वराज’ के लिए संघर्ष कर रहे थे। तिलक के सार्वजनिक गणेशोत्सव से दो फायदे हुए, एक तो वह अपने विचारों को जन-जन तक पहुँचाने में कामयाब रहे और दूसरा यह कि इस उत्सव ने जनता को भी स्वराज के लिए संघर्ष करने की प्रेरणा दी और उन्हें आत्मविश्वास दिया।

गणेश पूजा का प्रचलन गणेश चतुर्थी के दिन नियत रहा है, लेकिन इसे विशाल गणेशोत्सव का रूप देने की शुरुआत बाल गंगाधर तिलक ने की। तिलक ने जनमानस को अंग्रेजों के खिलाफ करने के लिए इसे नया रूप दिया और दस दिन के आयोजन के बाद गणेश मूर्ती को चतुर्दशी के दिन जल में विसर्जित कर दिया जाता है। बावजूद इसके कि यह हिन्दू धर्म के अनुसार अनुचित माना गया है।

लेकिन तिलक जनता के हर वर्ग को साथ जोड़कर अंग्रेजों को जो सन्देश देना चाहते थे वो इसमें कामयाब रहे। और कालांतर में अब यही प्रथा धर्म का एक अंग बन गई है।

तिलक उस समय युवा क्रांतिकारी दल के नेता बन गए थे। वह स्पष्ट वक्ता और प्रभावी ढंग से भाषण देने में माहिर थे। यह बात ब्रिटिश अफसर भी अच्छी तरह जानते थे कि अगर किसी मंच से तिलक भाषण देंगे तो वहाँ खिलाफ उग्र होना तय है।

दरअसल, 1857 की क्रांति के बाद स्वाधीनता आंदोलन में तिलक सबसे बड़ी भूमिका में रहे। कई लोग मानते हैं कि तिलक न होते तो आज़ादी पाने में कई दशक और लगते क्योंकि उन्होंने ही सबसे पहले लोगों को ब्रिटिश शासन के खिलाफ एक सूत्र में पिरोने का काम किया था। यह भी सत्य है कि कॉन्ग्रेस के भीतर तिलक की घोर अवहेलना हुई। वह मोतीलाल नेहरू जैसे समकालीन नेताओं की तरह ब्रिटिश राज से समझौते की मुद्रा में नहीं रहे।

यही कुछ कारण थे कि वह ब्रिटिश राज के लिए एक बड़ी चुनौती बनकर उभरे। तिलक की राय थी कि अंग्रेज़ों को यहाँ से किसी भी कीमत पर भगाना है। और वो कॉन्ग्रेस के अन्य नेताओं की तरह ब्रिटिश सत्ता के समक्ष हाथ फैलाने और याचना के बजाय उन्हें भारत से निकाल भगाने के पक्ष में रहते थे।

उनका मानना था कि स्वतंत्रता माँगने से नहीं बल्कि छीनने से मिलेगी और इसके लिए खुला संघर्ष कर बलिदान के लिए हर वक़्त तैयार रहना पड़ेगा। इसी बीच उन्होंने नारा दिया था जो स्वतंत्रता आंदोलन का सबसे लकप्रिय नारा भी माना जाता है- ‘स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है, मैं इसे लेकर रहूँगा।’ तिलक की इस घोषणा ने वर्ष 1914 में जनमानस में ज़बरदस्त जोश भर दिया था। और इस आंदोलन में अंग्रेजों के खिलाफ उनका हथियार बना गणेश चतुर्थी उत्सव।

हिन्दू धर्म के अधिकांश त्यौहार गणेश चतुर्थी की तरह ही लोगों के मन से जातिगत भेदभाव को हटाने से लेकर आपसी सौहार्द विकसित करने के लिए बने हैं। जिनकी प्रासंगिकता हमेशा बनी रहती है।

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