कल रात विश्व कप में हुए अप्रत्याशित उलटफेरों की चर्चा अभी थमी भी नहीं थी कि Round of 32 के अगले मुकाबलों ने फुटबॉल प्रेमियों का ध्यान फिर अपनी ओर खींच लिया। पहला मुकाबला डलास में खेला जाना था, जहां कोटे डी आइवोआर के सामने यूरोप की सबसे विस्फोटक आक्रमण पंक्ति वाली टीमों में से एक नॉर्वे खड़ी थी।
एक ओर एर्लिंग हालांड, एंटोनियो नूसा और अलेक्ज़ेंडर सोरलोथ जैसे खिलाड़ी थे, जो एक पल की चूक को भी गोल में बदलने की क्षमता रखते हैं। दूसरी ओर कोटे डी आइवोआर की युवा, तेज़ और आक्रामक टीम थी, जिसकी निगाहें लगातार पहली बार विश्व कप के अगले दौर में पहुंचने पर टिकी थीं। यान डियोमांडे और निकोलास पेपे आक्रमण की कमान संभाल रहे थे, जबकि मिडफील्ड में फ्रांक केस्सी अनुभव और संतुलन का आधार थे। उधर नॉर्वे के लिए कप्तान मार्टिन ओदेगार्द पूरे खेल की धुरी बनने वाले थे। उनका काम केवल पास बांटना नहीं, बल्कि हालांड तक हर निर्णायक गेंद पहुंचाना भी था।
किक-ऑफ से पहले ही यह साफ़ था कि यह मुकाबला केवल दो टीमों के बीच नहीं, बल्कि दो अलग-अलग फुटबॉल दर्शन के बीच होने वाला था; एक ओर तेज़ ट्रांज़िशन और घातक फिनिशिंग, दूसरी ओर गति, ड्रिब्लिंग और लगातार दबाव बनाकर मैच की लय अपने पक्ष में करने की कोशिश। डलास का मैदान तैयार था, और विश्व कप को एक और यादगार रात मिलने वाली थी।
मैच शुरू होता है। कोटे डी आइवोआर का प्रयास रहता है कि शुरुआती गोल दागकर नॉर्वे पर दबाव बनाया जाए। वह लगातार आक्रमण करते रहते हैं। खासकर मैदान के बाएं छोर से यान डियोमांडे अपनी मंत्रमुग्ध कर देने वाली ड्रिब्लिंग से लगातार नॉर्वे के लिए खतरे पैदा कर रहे थे। नॉर्वे किसी तरह खुद को बचाए हुए था। लेकिन मैच के उनतालीसवें मिनट में कप्तान मार्टिन ओदेगार्द गेंद को बाईं ओर एंटोनियो नूसा की तरफ बढ़ाते हैं। नूसा अपने सामने मौजूद डिफेंडर को छकाते हुए गोलपोस्ट से लगभग बीस मीटर की दूरी से एक शानदार शॉट लगाते हैं। गेंद गोलकीपर को छकाते हुए सीधे गोलपोस्ट के भीतर चली जाती है।
नॉर्वे मुकाबले में 1-0 की महत्वपूर्ण बढ़त हासिल कर लेता है। इसके बाद दोनों टीमों ने कई अवसर बनाए, लेकिन कोई भी उन्हें गोल में तब्दील नहीं कर सका। कोटे डी आइवोआर लगातार घातक मौके बना रहा था, मगर फिनिशिंग में चूक उसके रास्ते का सबसे बड़ा रोड़ा बनी रही। एंटोनियो नूसा के शानदार गोल की बदौलत नॉर्वे पहले हाफ की समाप्ति तक बढ़त बनाए रखने में सफल रहा।
दूसरे हाफ का खेल शुरू होता है। कोटे डी आइवोआर लगातार अच्छे मौके बना रही थी, लेकिन गोल अब भी उससे दूर था। मैच के साठवें मिनट के आसपास कोटे डी आइवोआर के कोच अपनी आक्रमण क्षमता बढ़ाने के उद्देश्य से बदलाव करते हैं। तेईस वर्षीय अमाद दियालो भी अब मैदान में उतर चुके थे। वहीं सत्तरवें मिनट में नॉर्वे की ओर से एंटोनियो नूसा और अलेक्ज़ेंडर सोरलोथ की जगह क्रमशः आन्द्रेस शेल्डरुप और ऑस्कर बॉब मैदान में आते हैं।
अमाद दियालो मैदान में आते ही अपनी टीम के आक्रमण में नई धार भर देते हैं। मैच के चौहत्तरवें मिनट में निकोलास पेपे गेंद को अमाद दियालो की ओर बढ़ाते हैं। नॉर्वे के दो-तीन खिलाड़ियों से घिरे होने के बावजूद दियालो शानदार फुटवर्क का प्रदर्शन करते हुए अकेले आगे बढ़ते हैं और बेहतरीन गोल दाग देते हैं। सब कुछ इतनी तेजी से होता है कि नॉर्वे के खिलाड़ी संभल भी नहीं पाते और स्कोर 1-1 से बराबर हो जाता है।
अब तो कोटे डी आइवोआर मानो तूफान की तरह लगातार आक्रमण करने लगती है। यान डियोमांडे, निकोलास पेपे और अमाद दियालो हर दिशा से नॉर्वे के डिफेंस पर दबाव बना रहे थे। नॉर्वे एकाएक बैकफुट पर आ गई थी। लेकिन फिर मैच के छियासीवें मिनट में सुपर स्ट्राइकर एर्लिंग हालांड अचानक ही एक गोल दागकर स्कोर 2-1 कर देते हैं। कोटे डी आइवोआर अंतिम क्षणों तक बराबरी के लिए संघर्ष करती रही। इंजरी टाइम में उसे एक फ्री-किक भी मिलती है। एक बार फिर अमाद दियालो गेंद के पीछे खड़े होते हैं। लियोनेल मेस्सी की याद दिलाने वाली उनकी सटीक किक सीधे गोलपोस्ट की ओर बढ़ती है। एक पल को ऐसा लगता है कि गेंद जाल में समा जाएगी, लेकिन नॉर्वे के अनुभवी गोलकीपर ओर्यान नायलांड मानो कह उठते हैं, “Not Today.” वह असाधारण सेव करते हैं। यह बचाव इतना शानदार था कि एक क्षण के लिए विश्वास ही नहीं होता कि गेंद गोलपोस्ट के भीतर नहीं गई।
कोटे डी आइवोआर ने इस मुकाबले में विपक्षी गोलपोस्ट पर कुल चौदह शॉट लगाए, जिनमें से पांच निशाने पर रहे। उसे पूरे मैच में चौदह कॉर्नर भी मिले, लेकिन आज ओर्यान नायलांड का शानदार गोलकीपिंग प्रदर्शन नॉर्वे के लिए ढाल बन गया। परिणामस्वरूप कोटे डी आइवोआर 2-1 से मुकाबला हारकर टूर्नामेंट से बाहर हो गई। जहां कल ओरलांडो गिल का दिन था, वहीं आज एक बार फिर इस विश्व कप में एक गोलकीपर अपनी टीम का सबसे बड़ा नायक बनकर उभरा।
यह मुकाबला इतनी तीव्रता से खेला गया कि मैच समाप्त होने के बाद एर्लिंग हालांड स्वयं भी कुछ क्षणों तक मानो विश्वास नहीं कर पा रहे थे कि उनकी टीम ने यह कठिन लड़ाई जीत ली है। अर्लिंग हालांड ने आज के गोल के साथ नॉर्वे के लिए अपने 53वें अंतरराष्ट्रीय मुकाबले में 60 गोल पूरे कर लिए। यह आँकड़ा अपने आप में बताता है कि आधुनिक फुटबॉल में उनके जैसा नैसर्गिक गोलस्कोरर कितनी दुर्लभ चीज़ है। इतनी कम पारियों में इस मुकाम तक पहुंचने वाले वह विश्व फुटबॉल के सबसे तेज़ गोलस्कोररों में शुमार हो गए। अब Round of 16 में नॉर्वे का सामना ब्राज़ील से होगा।
अगला मुकाबला, रात ढाई बजे, न्यू जर्सी स्टेडियम में फ्रांस बनाम स्वीडन के बीच खेला गया। इस मैच में दोनों ही टीमों के पास कई घातक गोलस्कोरर मौजूद थे। इसलिए दोनों ओर से गोल देखने की पूरी उम्मीद थी। जैसा कि हमने चर्चा की थी, स्वीडन को इस मुकाबले में कुछ अच्छा करने के लिए अपनी रक्षापंक्ति बेहद अनुशासित रखनी थी।
पिछले मैच में बत्तीसवें मिनट तक हैट्रिक दागकर उस्मान डेंबेले बता चुके थे कि फ्रांस का आक्रमण कितना घातक हो सकता है। मगर अफसोस, फ्रांसीसी तूफान के आगे स्वीडन की रक्षापंक्ति बीती रात पूरी तरह बेबस नजर आई।
यहां देर रात यह मुकाबला देखना ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो आपके शहर के किसी थिएटर में कोई मैटिनी शो चल रहा हो, जिसका नायक किलियन एमबाप्पे हो। फ्रांस के तमाम खिलाड़ियों की व्यक्तिगत प्रतिभा के बावजूद यह मुकाबला पूरी तरह किलियन एमबाप्पे के नाम रहा।
न्यू जर्सी में मैच शुरू होता है। शुरुआती सीटी बजते ही फ्रांस अपनी पूरी आक्रामक क्षमता के साथ मैदान पर उतरता है। मानो उसका उद्देश्य ही विपक्षी टीम पर पूरी तरह हावी हो जाना हो। आक्रमण पंक्ति में किलियन एमबाप्पे के साथ ब्रैडली बारकोला, उस्मान डेंबेले और माइकल ओलीसे लगातार स्वीडिश डिफेंस पर दबाव बनाते रहे। पिछले मुकाबले में जहां डेंबेले ने दाएं छोर से कहर बरपाया था, इस बार वही भूमिका सेंट्रल फॉरवर्ड किलियन एमबाप्पे निभाते दिखाई दिए।
पहले हाफ के अंतिम क्षणों में एमबाप्पे ने स्वीडन की सघन रक्षापंक्ति को भेदते हुए एक दर्शनीय गोल दागकर फ्रांस को बढ़त दिला दी। यह गोल देखने लायक था। बेहद तेज गति से वह हाफ लाइन से गेंद लेकर आगे बढ़ते हैं, विपक्षी ‘डी’ के बाहर पहुंचकर एक बैकहील के जरिए गेंद ब्रैडली बारकोला की ओर बढ़ाते हैं, स्वयं खाली स्थान बनाते हैं और जैसे ही गेंद दोबारा उनके पास लौटती है, वह बिना कोई गलती किए उसे गोल में बदल देते हैं। पहले हाफ की समाप्ति तक फ्रांस 1-0 की बढ़त हासिल कर चुका था।
दूसरे हाफ की शुरुआत भी फ्रांस ने उसी आक्रामक तेवर के साथ की। खेल शुरू होने के दस मिनट के भीतर माइकल ओलीसे शानदार रन बनाते हुए स्वीडिश डिफेंस को अपनी ओर खींच लेते हैं। सही समय पर वह गेंद ब्रैडली बारकोला की ओर बढ़ाते हैं और बारकोला बिना किसी गलती के उसे गोल में तब्दील कर फ्रांस की बढ़त 2-0 कर देते हैं।
स्वीडन अभी इस झटके से उबर भी नहीं पाया था कि एक बार फिर, चौहत्तरवें मिनट में माइकल ओलीसे स्वीडिश रक्षापंक्ति का ध्यान अपनी ओर खींचते हुए गेंद किलियन एमबाप्पे के लिए छोड़ते हैं। एमबाप्पे इस अवसर को भी व्यर्थ नहीं जाने देते और शानदार फिनिश के साथ अपना दूसरा तथा टीम का तीसरा गोल दाग देते हैं। इस गोल के साथ वह विश्व कप के नॉकआउट चरण में सर्वाधिक गोल करने वाले खिलाड़ी बन गए। साथ ही विश्व कप के विभिन्न संस्करणों में उनके नाम अब 18 गोल दर्ज हो चुके हैं। महज़ 27 वर्ष की उम्र में वह विश्व कप के इतिहास में सबसे अधिक गोल करने वाले खिलाड़ियों की सूची में वह अब शीर्ष स्थानों के बेहद करीब पहुंच चुके हैं।
फ्रांस इस गोल के साथ मुकाबला 3-0 से अपने नाम कर लेता है और अगले दौर का टिकट भी कटवा लेता है, जहां अब उसका सामना जर्मनी को पेनाल्टी शूटआउट में हराकर उलटफेर करने वाली पराग्वे की टीम से होगा। यह मुकाबला 4 जुलाई को फिलाडेल्फिया में खेला जाएगा।
ले ब्लूज़ की यह टीम कई मायनों में पिछले संस्करणों में उतरी टीमों से अलग है। इस बार यह टीम केवल घातक आक्रमण के भरोसे नहीं उतरी है। उसकी रक्षापंक्ति में विलियम सालीबा, जूल्स कूंदे, दायो उपामेकानो और लूका डीने जैसे अनुभवी खिलाड़ियों का मजबूत संयोजन मौजूद है।
वहीं बेंच पर रेयान शेरकी, जाँ-फिलिप मातेता, मार्कस थुराम और देज़िरे दूए जैसे आक्रमणकारी खिलाड़ी हैं, जो मैदान पर उतरते ही कुछ ही मिनटों में मैच का रुख बदलने की क्षमता रखते हैं। फिलहाल जिस आत्मविश्वास और संतुलन के साथ यह टीम खेल रही है, उसे देखते हुए ऐसा प्रतीत होता है कि उसका लक्ष्य केवल अच्छा प्रदर्शन करना नहीं, बल्कि विश्व कप ट्रॉफी जीतना है।
खैर, अब बात करते हैं तीसरे मुकाबले की। मेक्सिको, अपने ही घर में, ग्रुप चरण में जर्मनी जैसी दिग्गज टीम को हराकर सनसनी मचाने वाले इक्वाडोर के सामने थी। घरेलू परिस्थितियां, भरे हुए स्टेडियम और हजारों समर्थकों का उत्साह पहले से ही मेक्सिको के पक्ष में दिखाई दे रहा था।
लेकिन विश्व कप में केवल माहौल नहीं, मौके भुनाने की क्षमता भी मायने रखती है। मेक्सिको ने पहले ही हाफ में मुकाबले की दिशा तय कर दी। हूलियान क्वीनोनेज़ और 35 वर्षीय अनुभवी स्ट्राइकर राउल जिमेनेज़ ने एक-एक गोल दागते हुए स्कोर 2-0 कर दिया। इसके बाद इक्वाडोर ने वापसी की कोशिश जरूर की, मगर मेक्सिको की रक्षापंक्ति ने कोई बड़ी चूक नहीं की। इसी स्कोरलाइन के साथ मेक्सिको ने मुकाबला अपने नाम किया और Round of 16 में प्रवेश कर लिया, जहां अब उसका सामना इंग्लैंड और डीआर कांगो के बीच होने वाले मुकाबले के विजेता से होगा। उल्लेखनीय है कि अगला मुकाबला भी मेक्सिको अपने घरेलू मैदान पर खेलेगा।
अब निगाहें आज रात अटलांटा पर होंगी, जहां थॉमस टुखेल की इंग्लैंड का सामना डीआर कांगो से होगा। कागज़ों पर इंग्लैंड इस मुकाबले की प्रबल दावेदार दिखाई देती है, लेकिन विश्व कप बार-बार यही सिखाता है कि यहां भविष्यवाणियां अक्सर नब्बे मिनट के भीतर बदल जाती हैं। फुटबॉल अनिश्चितताओं का खेल है, और यही उसकी सबसे बड़ी खूबसूरती भी है।
डीआर कांगो के मुख्य कोच सेबास्टियन देसाब्रे अच्छी तरह जानते हैं कि यदि उनकी टीम खुलकर आक्रामक फुटबॉल खेलने लगी तो इंग्लैंड जैसी प्रतिभाशाली टीम उन्हें भारी नुकसान पहुंचा सकती है। यही कारण है कि इस पूरे टूर्नामेंट में उन्होंने परिस्थितियों के अनुसार अपनी रणनीति बदली है। पुर्तगाल और कोलंबिया जैसी मजबूत टीमों के खिलाफ उन्होंने पारंपरिक चार-डिफेंडर प्रणाली की जगह पांच रक्षकों वाली संरचना अपनाई थी। उसी अनुशासन की बदौलत उनकी टीम दोनों मुकाबलों से अंक लेकर बाहर निकली। ऐसे में आज भी यही उम्मीद की जा सकती है कि डीआर कांगो शुरुआत से ही मैच की गति धीमी रखने, इंग्लैंड के आक्रमण को रोकने और मुकाबले को अधिक से अधिक देर तक बराबरी पर बनाए रखने की कोशिश करेगा। यदि वह ऐसा करने में सफल रहा, तो मुकाबला अतिरिक्त समय या पेनाल्टी शूटआउट तक भी जा सकता है।
आज का दूसरा मुकाबला बेल्जियम और सेनेगल के बीच सिएटल में खेला जाएगा। भारतीय समयानुसार इसकी शुरुआत रात डेढ़ बजे होगी। इसके बाद सुबह साढ़े पांच बजे सैन फ्रांसिस्को में मेज़बान अमेरिका का सामना बोस्निया और हर्ज़ेगोविना से होगा। घरेलू परिस्थितियों और मौजूदा फॉर्म को देखते हुए मॉरिसियो पोचेतीनो की अमेरिकी टीम इस मुकाबले में बढ़त रखती दिखाई देती है, लेकिन विश्व कप में कागज़ी समीकरण कितनी जल्दी बदलते हैं, यह पिछले कुछ दिनों में पूरी दुनिया देख चुकी है।
आज के मुकाबलों में किलियन एमबाप्पे, माइकल ओलीसे, अमाद दियालो और एंटोनियो नूसा ने अपने आक्रामक खेल से दर्शकों का भरपूर मनोरंजन किया। वहीं दूसरी ओर, अंतिम क्षणों में अमाद दियालो की खतरनाक फ्री-किक को रोकने वाले नॉर्वे के गोलकीपर ओर्यान नायलांड भी किसी नायक से कम नहीं रहे। कई बार एक शानदार सेव भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है, जितना कोई निर्णायक गोल।
इस विश्व कप ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि यहां कुछ भी संभव है। यहां वही टीम अंत तक टिकती है, जो दबाव के सबसे कठिन क्षणों में भी अपने धैर्य और संयम को बनाए रख सके। यही कारण है कि विश्व कप केवल कौशल की नहीं, बल्कि साहस और मानसिक दृढ़ता की भी परीक्षा है।
इसी संदर्भ में जर्मनी और पराग्वे के बीच खेला गया पेनाल्टी शूटआउट भी लंबे समय तक याद रखा जाएगा। पांच-पांच पेनाल्टी के बाद भी जब दोनों टीमें बराबरी पर थीं, तो मुकाबला ‘सडन डेथ’ में पहुंच गया। अंततः पराग्वे ने शूटआउट अपने नाम किया और जर्मनी, जो विश्व कप इतिहास में पेनाल्टी शूटआउट में लंबे समय तक लगभग अजेय मानी जाती थी, टूर्नामेंट से बाहर हो गई। एक ओर पराग्वे के गोलकीपर ओरलांडो गिल ने शानदार बचाव किए, तो दूसरी ओर जर्मनी निर्णायक क्षणों में अवसरों का लाभ नहीं उठा सकी। विश्व कप अक्सर ऐसे ही छोटे-छोटे पलों में अपने सबसे बड़े नायक और सबसे बड़ी त्रासदियां चुनता है।
ऐसे ही क्षणों को देखकर होमर के महाकाव्य इलियड की ये पंक्तियां सहज ही स्मरण हो उठती हैं:
“Let me not then die ingloriously and without a struggle, but let me first do some great thing that shall be told among men hereafter.”
फुटबॉल केवल एक खेल नहीं है। यह जज़्बे का दूसरा नाम है। यह उम्मीदों, साहस, असंभव को संभव बनाने की जिद और करोड़ों लोगों की सामूहिक धड़कनों का उत्सव है। और इसलिए, फुटबॉल के ये खूबसूरत किस्से आगे भी यूं ही लिखे जाते रहेंगे।


