Tuesday, August 3, 2021
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साल में 300 दिन सोते हैं राजस्थान के पुरखाराम, गाँव वाले बुलाते हैं कुंभकर्ण: जानिए क्या है ‘एक्सिस हायपरसोम्निया’

पुरखाराम के घर वालों ने बताया कि इसकी शुरुआत 23 साल पहले हुई थी, जब पुरखाराम 5 से 7 दिनों तक सोते रहते थे और उन्हें नींद से जगाना बहुत मुश्किल हो जाता था। इसके बाद उनकी नींद का समय बढ़ता गया और आज यह हालत है कि....

राजस्थान के नागौर जिले से एक ऐसे इंसान का मामला सामने आया है, जो साल में लगभग 300 दिन नींद में ही गुजार देता है। इस इंसान का खाना, नहाना और दिन के अन्य क्रियाकलाप नींद में ही होते हैं। दरअसल यह व्यक्ति एक गंभीर बीमारी ‘एक्सिस हायपरसोम्निया’ से ग्रसित है, जिसके कारण इंसान लगातार कई दिनों तक सोता रहता है। इसी बीमारी के कारण नागौर के भादवा गाँव में रहने वाले पुरखाराम जब एक बार सोते हैं तो फिर 25 दिनों तक सोते ही रहते हैं। बीच में अगर कभी जगाना हुआ तो वही संघर्ष करना पड़ता है, जो रावण को अपने भाई कुंभकर्ण को जगाने के लिए करना पड़ा था। पुरखाराम के गाँव के लोग भी उन्हें प्यार से कुंभकर्ण ही कहते हैं।

दैनिक भास्कर को जब इसके बारे में जानकारी मिली तो उनकी टीम पुरखाराम के घर पहुँची। टीम उनसे कुछ बातचीत कर सके इसके लिए उन्हें बड़ी मशक्कत करके जगाया गया। पुरखाराम को नींद से जगाने में ही 3 घंटे का समय लग गया। इसके बाद कहीं जाकर उनकी नींद टूटी लेकिन सिर्फ 2 मिनट के लिए ही। इसके बाद पुरखाराम फिर सो गए। भास्कर की टीम 3 घंटे तक उनके घर में टिकी रही लेकिन उन्हें जगाया न जा सका।

भास्कर को पुरखाराम के घर वालों ने बताया कि इसकी शुरुआत 23 साल पहले हुई थी, जब पुरखाराम 5 से 7 दिनों तक सोते रहते थे और उन्हें नींद से जगाना बहुत मुश्किल हो जाता था। इसके बाद उनकी नींद का समय बढ़ता गया और आज यह हालत है कि पुरखाराम महीने में 25 दिन तक सोते रहते हैं। पुरखाराम के परिजन नींद में ही उन्हें खाना खिलाते हैं, नहलाते हैं और यहाँ तक कि नींद में ही उन्हें टॉयलेट ले जाते हैं। हालाँकि, एक्सपर्ट का कहना है कि कहते हैं कि पूरी तरह से डायग्नोस करने के बाद इस बीमारी का ईलाज किया जा सकता है।

क्या है हायपरसोम्निया:

हायपरसोम्निया एक ऐसी बीमारी है जिससे ग्रसित व्यक्ति हमेशा ही नींद में रहता है। इस बीमारी से ग्रसित रहने वाला किसी भी समय सो सकता है, यहाँ तक कि अपनी दिनचर्या के काम करते हुए भी। ऐसे व्यक्ति में नींद के अलावा शारीरिक ऊर्जा और सोचने की शक्ति में कमी भी देखने को मिलती है। नेशनल स्लीप फाउंडेशन के मुताबिक, लगभग 40% लोग किसी न किसी तरह से नींद की समस्या से ग्रसित होते हैं। इसे प्राइमरी हायपरसोम्निया के नाम से भी जाना जाता है।

हायपरसोम्निया के प्रमुख कारण:

फिलहाल चिकित्सा विज्ञान में इस बीमारी के पीछे जिम्मेदार जो प्रमुख कारण बताए जाते हैं वो इस प्रकार हैं:-

  • 1. नींद से संबंधित डिसऑर्डर या नार्कोलेप्सी। नार्कोलेप्सी एक ऐसी न्यूरोलॉजिकल बीमारी है जिसमें व्यक्ति को नींद का दौरा आता है और इस कारण मरीज किसी भी समय सो सकता है। हालाँकि, नार्कोलेप्सी को तकनीकी रूप से हायपरसोम्निया से अलग माना जाता है।
  • 2. रात में पर्याप्त नींद न ले पाना।
  • 3. सामान्य से अधिक वजन का होना, जिसके कारण नींद में असंतुलन उत्पन्न होता है।
  • 4. ड्रग या शराब का अत्यधिक मात्रा में सेवन।
  • 5. सिर पर कोई पुरानी चोट।
  • 6. किसी दवा का उल्टा असर।
  • 7. जेनेटिक।
  • 8. तनाव।

हालाँकि, हायपरसोम्निया एक ऐसी बीमारी है, जिसमें मरीज अधिकांशतः दिन में भी सो जाता है। वहीं, पुरखाराम लगातार कई दिनों तक सोते रहते हैं। ऐसे में उनकी बीमारी हायपरसोम्निया के अगले स्टेज में पहुँच चुकी है, जो सेकंडरी हायपरसोम्निया या एक्सिस हायपरसोम्निया कहलाती है। इस बीमारी में ऐसा नहीं होता कि मरीज दिन या रात को सोए, बल्कि सेकंडरी या एक्सिस हायपरसोम्निया का मरीज कई-कई दिनों तक सोता ही रहता है, जैसा कि पुरखाराम के मामले में दिखाई दिया।

सेकंडरी या एक्सिस हायपरसोम्निया:

प्राइमरी हायपरसोम्निया से अलग सेकंडरी हायपरसोम्निया के पीछे कोई न कोई चिकित्सकीय कारक मौजूद होता है। इनमें स्लीप एपनिया (sleep apnea), पार्किन्सन बीमारी (parkinson disease), किडनी का फेल हो जाना (kidney failure) और क्रॉनिक फटीग सिंड्रोम (chronic fatigue syndrome) शामिल हैं। सेकंडरी हायपरसोम्निया के कारण व्यक्ति में थकान और ऊर्जा की मात्रा में इतनी कमी हो जाती है कि वह लगातार सोता रहता है। दरअसल प्राइमरी हायपरसोम्निया से पीड़ित मरीज जब अधिक समय तक बिना इलाज के रहता है तो एक समय के बाद उसकी बीमारी सेकंडरी या एक्सिस हायपरसोम्निया में बदल जाती है।

हायपरसोम्निया का इलाज:

नार्कोलेप्सी से जुड़ी कई दवाएं हायपरसोम्निया के इलाज में कारगर हो सकती हैं, लेकिन हायपरसोम्निया के इलाज का प्रमुख माध्यम है दिनचर्या में परिवर्तन और पोषणयुक्त आहार। हायपरसोम्निया के अधिकांश मामलों में देखा गया है कि मरीज तनाव से ग्रसित होता है अथवा किसी न किसी रूप में नशे का आदी होता है। ऐसी स्थिति में अपनी दिनचर्या को बदलते हुए हायपरसोम्निया से छुटकारा पाया जा सकता है। इसके अलावा, कई बार यह भी देखा गया है कि हायपरसोम्निया से पीड़ित मरीज में ऊर्जा की भारी कमी देखने को मिलती है। ऐसी स्थिति में सम्पूर्ण पोषण से युक्त आहार लेने पर हायपरसोम्निया के प्रभावों को कम किया जा सकता है। चिकित्सा विज्ञान में पूरी तरह से डायग्नोस करने के बाद इस बीमारी का इलाज संभव है।

हालाँकि, पुरखाराम के मामले में अभी तक यह नहीं ज्ञात है कि उन्हें यह बीमारी किस कारण से है, लेकिन डॉक्टरों का कहना है कि ऐसा नहीं है कि पुरखाराम कभी ठीक नहीं हो सकते। अगर एक बार उनका डायग्नोसिस हो जाए तो उनका इलाज किया जा सकता है।

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ऑपइंडिया स्टाफ़http://www.opindia.in
कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

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